विज्ञान लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
विज्ञान लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

19 जुलाई 2026

प्रेरणास्रोत हैं ये दो युवा

युवाओं के लिए आदर्श होने चाहिए ये दो युवा और इनकी पूरी टीम.

 

स्काईरूट एयरोस्पेस के द्वारा 'विक्रम-1' को 18 जुलाई 2026 को प्रक्षेपित किया गया. यह भारत का पहला पूर्णतः निजी तौर पर विकसित ऑर्बिटल रॉकेट है. श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से इसका सफल परीक्षण किया गया. इसके पहले स्काईरूट का पहला ऐतिहासिक सब-ऑर्बिटल मिशन विक्रम-एस था. इसे 18 नवंबर 2022 में 'प्रारंभ' नामक मिशन के अंतर्गत प्रक्षेपित किया गया था. इस प्रोजेक्ट ने भारत के निजी स्पेस सेक्टर के लिए रास्ते खोले थे.

 

आपको बताते चलें कि स्काईरूट एयरोस्पेस के संस्थापक इसरो के दो पूर्व युवा वैज्ञानिक पवान कुमार चंदना (उम्र- 35 वर्ष) और नागा भरत डाका (उम्र- 36 वर्ष) हैं. उन्होंने 2018 में हैदराबाद स्थित प्राइवेट स्पेस स्टार्टअप की शुरुआत की थी.

 

एक ये ज़ेन-जी हैं और एक वे हैं जो कॉकरोच बने घूम रहे हैं.

 


12 जुलाई 2026

वृक्षारोपण में गणित

आज शाम एक ऐसे परिचित मिले जो बात-बात पर कटाक्ष करने की आदत से भरे-पूरे हैं. मिलते ही बिलबिलाये कि आज तुम्हारे कॉलेज में कितनी संख्या में पौधारोपण हुआ?

 

हम समझ रहे थे कि ये सवाल उनके मुँह से काहे निकल भागा है. बिना रुके अगले ही पल उनके मुँह पर ही जवाब दे मारा कि सत्तर हजार.

 

जवाब सुनते ही महोदय एकदम सन्न रह गए. इसकी भी एक वजह ये थी कि वे लालबुझक्कड़ के चिलगोजों में शामिल हैं. उनकी हालत देखकर और उनको किसी आपदा में जाने के पहले ही बताया कि हम ठहरे विज्ञान-गणित के विद्यार्थी.... बड़े से बड़े सवाल 'मान' लेने भर से निपटा दिए, बड़ी से बड़ी प्रमेय भी इसी 'मान' ने हल करवा दीं, सो यहाँ भी मान लिया कि एक गड्ढा बराबर एक हजार पौधे. इस हिसाब से सत्तर गड्ढों में सत्तर हजार पौधे लगे.

 

कुछ खिसियाकर इधर-उधर की पटकना शुरू किया उन्होंने तो कहा कि ज्यादा न बकबकाओ.... न तो कोष्ठक में बंद करके शून्य से गुणा कर देंगे.

 

बेचारे खी-खी करके भागते नजर आये.

 


10 दिसंबर 2025

क्या समय सच में मौजूद नहीं है?

क्या समय सच में मौजूद नहीं है? विज्ञान इस रहस्य को समझने लगा है!

 

हम अपनी ज़िंदगी के हर पल को समय में नापते हैं सेकंड, मिनट, दिन, साल लेकिन आधुनिक विज्ञान और कई प्रमुख वैज्ञानिकों का दावा है कि ‘समय’ शायद वैसा नहीं है जैसा हम सोचते हैं। BBC और कई प्रमुख विज्ञान लेखों में भी यह चर्चा तेज़ हो गई है कि समय एक illusion यानि एक मानसिक अनुभूति हो सकती है। यह विचार जितना हैरान करता है,उतना ही विज्ञान इसे गंभीरता से लेना शुरू कर चुका है।

 

समय क्या है? हमारी समझ बनाम विज्ञान

हम सभी समय को एक बहती हुई नदी की तरह मानते हैं,जहाँ अतीत बीत चुका है,वर्तमान अभी है और भविष्य आने वाला है लेकिन जब वैज्ञानिक समय को गणित और भौतिकी के नियमों में डालते हैं तो यह मॉडल टूटने लगता है।

 

आइन्स्टीन की Relativity कहती है- समय स्थिर नहीं है। यह गति और गुरुत्वाकर्षण के अनुसार धीमा या तेज़ हो सकता है।

 

Quantum Physics कहती है- सबसे छोटे स्तर पर कणों की दुनिया में समय का बहाव दिखाई ही नहीं देता यानि समय वह नहीं है जो हमें रोजमर्रा में महसूस होता है।

 

समय शायद है ही नहीं

कई वैज्ञानिक लेख बताते हैं कि दुनिया को समझने के लिए हमें समय की जरूरत नहीं भी पड़ सकती। विज्ञान का तर्क यह है:

=> Physics की equations बिना ‘समय’ के भी काम करती हैं:- कुछ fundamental equations में “time” का कोई स्पष्ट role नहीं होता।

=> अतीत, वर्तमान और भविष्य शायद साथ-साथ मौजूद हैं:- इस विचार को Block Universe Theory कहा जाता है। इस थ्योरी में समय एक direction नहीं बल्कि एक landscape की तरह है जहाँ सारे पल एक साथ मौजूद हैं।

=> समय शायद एक अलग entity नहीं बल्कि घटनाओं के बीच का संबंध है यानी हम परिवर्तन देखते हैं और उसको मापने के लिए ‘समय’ नाम की कल्पना बना ली।

 



क्या समय सिर्फ एक illusion है?

कई वैज्ञानिक कहते हैं कि:

=> समय खुद मौजूद नहीं बल्कि मस्तिष्क (consciousness) घटनाओं को क्रम में अनुभव करता है, इसी क्रम का नाम हम “time flow” रखते हैं. अगर ऐसा है तो ‘अभी’, ‘कल’, ‘भविष्य’ ये सब हमारी perception पर निर्भर हैं। यह उस घड़ी की तरह है जो दीवार पर टंगी है लेकिन असल में टिक-टिक सिर्फ हमारे मन में चल रही है।

 

क्या होगा अगर समय सच में अस्तित्व में नहीं है?

यह विचार हमारी पूरी समझ बदल देता है-

=> जीवन और मृत्यु की परिभाषा बदलेगी- अगर समय linear नहीं है, तो ‘पहले-जन्म, बाद-मृत्यु’ वाला क्रम भी एक perception हो सकता है।

=> कारण और परिणाम (Cause & Effect) की धारणा बदल सकती है- हम मानते हैं कि A हुआ इसलिए B हुआ। लेकिन अगर समय स्थिर नहीं तो यह relation भी अलग तरीके से काम कर सकता है।

=> यूनिवर्स की असली संरचना समझने का नया रास्ता खुलेगा- Universe शायद events का एक web हो जिसमें समय सिर्फ एक direction नहीं बल्कि एक coordinate (निर्देशांक) जैसा हो।

 

भावी विज्ञान कहाँ जा रहा है?

वैज्ञानिकों का ध्यान अब इस बात पर है कि-

=> क्या समय वास्तव में एक ‘fundamental चीज़ है?

=> फिर यह तापमान और दबाव की तरह एक ‘उभरती हुई property है जो कुछ conditions पर ही दिखती है? कई शोध यह संकेत दे रहे हैं कि समय शायद मूलभूत (fundamental) नहीं है और यदि ऐसा है तो हमारी पूरी physics बिग बैंग, ब्लैक होल, क्वांटम दुनिया सबकी व्याख्या नए तरीके से करनी पड़ सकती है।

 

निष्कर्ष: समय शायद है या शायद नहीं

हम जो समय कहते हैं,वह शायद सिर्फ हमारा अनुभव हो, एक illusion, एक perception या केवल परिवर्तन मापने का तरीका। विज्ञान अभी अंतिम जवाब नहीं दे पाया है लेकिन BBC समेत कई वैज्ञानिक संस्थाएँ इस दिशा में स्पष्ट कह रही हैं ‘समय को लेकर हमारी सोच अधूरी है और असली तस्वीर हम अब समझना शुरू कर रहे हैं।’

++++++++++++

यह पोस्ट फेसबुक पर Factwala01 प्रोफाइल से ली गई है. 

28 फ़रवरी 2023

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस - National Science Day

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस (नेशनल साइंस डे) प्रतिवर्ष 28 फरवरी को भारत में मनाया जाता है. यह दिन प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी चंद्रशेखर वेंकट रमन को समर्पित है. वर्ष 2023 पर विज्ञान दिवस की थीम है, सतत भविष्य के लिए साइंस और टेक्नोलॉजी में एकीकृत दृष्टिकोण. 28 फरवरी को विज्ञान दिवस मनाये जाने का विशेष कारण है. इसी दिन सन 1928 में सीवी रमन ने रमन प्रभाव की खोज की थी. इस महत्वपूर्ण खोज के लिए उनको वर्ष 1930 में नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था.


राष्ट्रीय विज्ञान और तकनीकी संचार परिषद ने सन 1986 में भारत सरकार से 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाये जाने का आग्रह किया था. तत्कालीन केन्द्र सरकार से स्वीकृति के बाद सन 1987 में पहली बार राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया गया.








 

28 मार्च 2019

अन्तरिक्ष तक सर्जिकल स्ट्राइक संभव


कल, 27 मार्च को जब डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम आईलैंड लॉन्च कॉम्पलेक्स से रक्षा अनुसन्धान एवं विकास संगठन (DRDO) की एक मिसाइल ने बतौर परीक्षण एक सैटेलाइट को मार गिराया तो भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया जो अंतरिक्ष में सैटेलाइट को मार गिराने की क्षमता रखते हैं. भारत से पहले अभी तक यह क्षमता रूस, अमेरिका और चीन के पास थी. यह एक एंटी-सैटेलाइट मिसाइल परीक्षण था, जिसे मिशन शक्ति नाम दिया गया. इसके लिए DRDO के बैलेस्टिक मिसाइल डिफेंस इंटरसेप्टर का इस्तेमाल किया गया. यह मौजूदा बैलेस्टिक मिसाइल रक्षा कार्यक्रम का हिस्सा है. इस मिशन में जिस सैटेलाइट को निशाना बनाया गया, वह निचली कक्षा में घूम रहा था. यह परीक्षण इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भारत ने इसके जरिये यह साबित किया है कि वह अपनी टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से बाहरी अंतरिक्ष में किसी सैटेलाइट को निशाना बना सकता है. चूँकि हमारा पड़ोसी देश चीन बहुत पहले यह क्षमता विकसित कर चुका है ऐसे में भारत पर काफी दबाव था. यह सत्य किसी से छिपा नहीं है कि आज की दुनिया में पारंपरिक हथियारों से शत्रु का मुकाबला नहीं किया जा सकता है और वह भी तब जबकि पड़ोसी देशों से आपके संबंध अच्छे नहीं हों. ऐसे में देश की तरफ से किया गया यह परीक्षण भारतीय रक्षा शक्ति को कई गुना मजबूत करता है. 


यह सफलता केवल उल्लेखनीय नहीं वरन गौरवपूर्ण है. इस सफल परीक्षण के द्वारा भारत जमीन, हवा, पानी के साथ-साथ अन्तरिक्ष में भी अपने दुश्मनों से निपटने में सक्षम हो गया है. ऐसी आशंका लम्बे अरसे से जताई जाती रही है कि आगामी युद्ध, यदि कभी हुआ तो, वह धरती, हवा या जल में लड़ने के बजाय बहुत हद तक संभावित है कि अन्तरिक्ष में हो. ऐसा नहीं कि युद्ध करने वाले देशों के द्वारा अन्तरिक्ष में सेना भेजकर वहाँ युद्ध किया जायेगा वरन जिस तरह से सम्पूर्ण विश्व आज तकनीक के हाथों से संचालित होने लगा है, आम आदमी से लेकर सरकारों तक के कार्यों में अन्तरिक्ष में तैर रहे सेटेलाईट मददगार बन रहे हैं उस स्थिति में किसी भी देश को सैकड़ों वर्ष पीछे भेजने के लिए उसके उपग्रह को नष्ट कर देना ही बहुत है. इस तरह की सम्भावना कपोल-कल्पना नहीं और न ही टीवी पर दिखाए जाने वाले स्टार वार्स जैसे कार्यक्रम हैं बल्कि वास्तविकता है. इस वास्तविकता को समझने की आवश्यकता है, जिसे भारत ने समय रहते समझने का प्रयास ही नहीं किया बल्कि उस पर अमल भी किया.

इस परीक्षण के बाद जैसी कि अपेक्षा थी, विपक्ष ने सरकार पर धावा सा बोल दिया. ऐसा दावा किया जाने लगा कि इस तरह का परीक्षण पिछली सरकार में किया जा चुका है, अब मोदी ऐसा बस चुनावों में लाभ लेने के लिए खोखला सन्देश दे रहे हैं. यहाँ समझने की आवश्यकता है कि पिछली सरकार में ऐसे किसी परीक्षण का सिद्धांत प्रस्तुत किया गया था. इसे खुद रक्षा अनुसन्धान एवं विकास संगठन के आला अधिकारियों द्वारा भी सामने लाया गया. बहरहाल, वर्तमान समय राजनीति के जाल में देश की इस उपलब्धि को फँसाना नहीं है वरन सभी वैज्ञानिकों को बधाई देने का है. वैश्विक स्तर पर आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए सभी देश किसी न किसी तरह के कदमों को उठाते रहते हैं, ऐसे में भारत द्वारा महाशक्ति बनने की राह में उठाया गया यह कदम निश्चित ही भारतीय सामरिक शक्ति को विश्वसनीय पहचान देगा.

28 फ़रवरी 2019

रमन प्रभाव से मनाया जाता राष्ट्रीय विज्ञान दिवस


आज, 28 फरवरी का दिन राष्ट्रीय विज्ञान दिवस (नेशनल साइंस डे) के रूप में मनाया जाता है. इस दिवस को मनाने का उद्देश्य दैनिक जीवन में वैज्ञानिक अनुप्रयोग के महत्व के संदेशों को लोगों के बीच फैलाना, मानव कल्याण के लिए विज्ञान के क्षेत्र की सभी गतिविधियों, प्रयासों और उपलब्धियों को प्रदर्शित करना है. इसके साथ-साथ विज्ञान के विकास के लिए चर्चा करके नई प्रौद्योगिकी को लागू करना भी इसका उद्देश्य है. इस दिवस को देश के प्रसिद्द भौतिक विज्ञानी प्रोफेसर चंद्रशेखर वेंकटरमन रमन के सम्मान में सन 1986 से प्रतिवर्ष मनाया जाता है. उन्होंने सन 1928 में कोलकाता में इसी दिन एक उत्कृष्ट खोज की थी, जिसे रमन प्रभाव के नाम से जाना जाता है. इस कार्य के लिए उनको 1930 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.  


रमन प्रभाव में एकल तरंगदैर्ध्य प्रकाश (मोनोक्रोमेटिक) किरणें जब किसी पारदर्शक माध्यम ठोस, द्रव या गैस से गुजरती है, उस दौरान प्रकाश की तरंगदैर्ध्य में बदलाव दिखता है. इसका अर्थ यह है कि जब प्रकाश की एक तरंग एक द्रव्य से निकलती है तो इस प्रकाश तरंग का कुछ भाग एक ऐसी दिशा में प्रकीर्ण हो जाता है जो कि आने वाली प्रकाश तरंग की दिशा से भिन्न है. छितराई किरणों का अध्ययन करने पर पता चला कि मूल प्रकाश की किरणों के अलावा स्थिर अंतर पर बहुत कमजोर तीव्रता की किरणें भी उपस्थित होती हैं. इन्हीं किरणों को रमन-किरण भी कहते हैं.

विज्ञान के क्षेत्र में आज रमन किरणों अथवा रमन प्रभाव का ही प्रयोग किया जाता है. जहां भी सैंपल को बिना क्षति पहुंचाए, द्रुतगति से पदार्थ विशेष के कुछ कण पहचान कर निष्कर्ष निकाले जा सकते हों, वहां रमन प्रभाव सबसे अधिक प्रभावी तकनीक प्रदान करता है. रमन प्रभाव का वर्तमान में मुख्य रूप से निम्न प्रक्रियाओं में उपयोग किया जाता है.
औषधियों, पेट्रोकेमिकलों और प्रसाधन सामग्रियों के निर्माण प्रक्रमों के अध्ययन, मॉनीटरन और गुणवत्ता निर्धारण में.
अपराध विज्ञान में पैकेट्स या बक्सों को बिना खोले उनके अन्दर विद्यमान विशिष्ट पदार्थों (जैसे मादक पदार्थों) के संसूचन (डिटेक्शन) में.
पेंट उद्योग में जैसे-जैसे पेंट सूखता है तो उसमें क्या रसायनिक अभिक्रियाएं होती हैं, इसका अध्ययन करने में.
हानिकारक अथवा रेडियोएक्टिव पदार्थों का सुरक्षित दूरी से अध्ययन करने में.
प्रकाश रसायनज्ञ और प्रकाश-जीववैज्ञानिक 1011 तक औसत आयु के क्षणजीवी रसायनों तक के स्पेक्ट्रम प्राप्त करने में. 
भूगर्भशास्त्र और खनिज-वैज्ञानिक रत्नों और खनिजों की पहचान तथा विभिन्न दशाओं में खनिज-व्यवहार आदि का अध्ययन करने के लिए. 
कार्बन नैनोट्यूबों एवं हीरों की गुणवत्ता और गुणों के अध्ययन के लिए.
जीवन-अध्ययनों जैसे डीएनए/आरएनए विश्लेषण में, रोग निदान, एकल सेल विश्लेषण आदि में.

25 फ़रवरी 2019

नसैला का भूत और विज्ञान


अपनी नियमित घुमक्कड़ी और मित्रों की बैठकी के बीच आज अचानक से कुछ परिचितों के बीमार होने की चर्चा छिड़ गई. विगत कुछ दिनों से कुछ परिचितों के बीमार होने, कुछ के दुर्घटना में घायल होने, कुछ के इस लोक से चले जाने की खबरें लगातार मिलती रही हैं. परिचितों, जान-पहचान वालों के सम्बन्ध में ऐसी खबरों का मिलना परेशान कर जाता है. कुछ परिचित लोगों के इस दौरान स्वाइन फ्लू से पीड़ित होने की खबर मिली. इसी बीमारी से एक मित्र का असमय जाना भी हम सभी मित्रों को दुखी कर गया. मित्रों की आपसी चर्चा के दौरान बात उठी कि हम लोग जितना शिक्षित होते जा रहे हैं, चिकित्सा विज्ञान जितना तरक्की करता जा रहा है, उतना ही बीमारियों का विकास भी होता जा रहा है. इसके सापेक्ष ऐसा भी कहा जा सकता है कि जैसे-जैसे तकनीक का, चिकित्सा विज्ञान का विकास होता गया वैसे-वैसे हम सभी लोग बीमारियों के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी लेते रहे, उनसे परिचित होते रहे. अन्यथा की स्थिति में कई वर्षों पहले तक बीमारी को किसी न किसी भूत-प्रेत से, किसी न किसी जादू-टोने से, किसी न किसी तंत्र-मन्त्र से जोड़कर देखा जाने लगता था.


इन्हीं बातों के क्रम में हमें अपने बचपन की कई ऐसी बातें याद आईं जिनमें हम लोगों ने भूत-प्रेत से सिर्फ बातों में ही साक्षात्कार किया. हालाँकि हर बार घटित होती किसी भी घटना में सिर्फ बातें ही बातें सामने आती रहीं, किसी बार भी भूत से सामना नहीं हुआ. ऐसी ही एक घटना का जिक्र आज दोस्तों की महफ़िल में हुआ. हमारी ननिहाल जनपद जालौन में ही कुसमरा गाँव में है और उसके जाने के लिए उसके नजदीक के एक अन्य गाँव इटौरा होते हुए जाना पड़ता है. कुसमरा और इटौरा के बीच बहुत ज्यादा दूरी न होने के कारण अक्सर हम बच्चे लोग दिन की मस्ती में दौड़ते-भागते गाँव से इटौरा तक आ जाया करते थे. बम्बा में तैरते हुए, बगीचों में दौड़ लगाते हुए, खेतों की मिट्टी फांकते हुए दिन भर में कितनी बार कुसमरा से इटौरा आना-जाना हो जाया करता था, पता ही नहीं चलता था. उसी रास्ते के बीच एक नामी भूतिया बगीचा पड़ा करता था. दिन की कितनी भी चमकदार रौशनी हो या फिर रात का घना अँधियारा, जब भी उस बगीचे के करीब से निकलना होता तो लगता कि उस बगीचे का वह नामी भूत हम लोगों को अपनी चपेट में लेने को निकल आया है.

नसैला नामक उसी भूत के नाम पर वह बगीचा आज तक प्रसिद्द है. उस समय हम बच्चों की पलटन में चाहे कितने लोग रहें मगर नसैला की बगिया के पास से निकलते ही चलने-दौड़ने की रफ़्तार अपने आप बढ़ जाया करती थी. गाँव के कई लोगों से अजीब-अजीब तरह के किस्से सुन-सुन कर भी नसैला के बारे में कल्पना लोक से न जाने कैसे-कैसे ख्याल दिमाग में आते रहते थे. गाँव के किसी  व्यक्ति को उसने तम्बाकू खिलाई होती थी, किसी से उसने बीड़ी माँग कर पी होती थी, किसी की बैलगाड़ी इसके कारण आगे नहीं बढ़ पा रही होती थी, किसी के कंधे पर कोई आकर बैठ गया होता था, किसी की साईकिल पर बैठने के लिए नसैला ने हाथ दिया होता था. कहने का मतलब, जितने लोग उतनी बातें. अब भी अक्सर अपने ननिहाल जाना होता है. अब नसैला की बगिया भी जिंदा नहीं है और शायद नसैला के भूत भी निधन हो गया है क्योंकि अब उस रास्ते में जाने पर किसी तरह की बगिया नहीं दिखाई देती और गाँव में भी अब कोई नसैला के किस्से नहीं सुनाता है. ऐसा लगता है जैसे आज की भागदौड़ और भीडभाड वाली दुनिया से बचने के लिए नसैला ने कहीं और अपनी दुनिया बना ली है. आज भी नसैला के साथ-साथ उस राजकुमारी की कहानी याद आती है जो तकुआ की सुई लगने से कई सालों के लिए सो गई थी और फिर एक राजकुमार के आने से उसकी नींद टूटी थी. 

चिकित्सा विज्ञान ने हमें इतना पढ़ा-लिखा दिया कि अब इन्सान समझने लगा है कि क्या भूत है, क्या बेहोशी है, क्या डेंगू है, क्या स्वाइन फ्लू है. इसके साथ-साथ इसी विज्ञान ने हम सबके भीतर से आध्यात्मिक, प्राकृतिक, ईश्वरीय डर, श्रद्धा को भी समाप्त किया है. इसने यदि हमें साक्षर बनाया है तो आपस में विद्वेष भी बढ़ाया है. आखिर अब हम पढ़-लिख कर समझने लगे हैं कि ईश्वरीय शक्ति जैसा कुछ नहीं, भगवान जैसा कुछ नहीं जो है सो सब विज्ञान है, सब इन्सान है. इसी ने आपस के प्रेम, सौहार्द्र को समाप्त किया है, आपस में कटुता का विस्तार किया है. अब लगता है इससे बढ़िया तो वह नसैला का भूत था जो इंसानों को भले डराता था मगर उ सबको एकजुट तो रखता था.

06 अक्टूबर 2018

चिंतन का वैज्ञानिक आधार


यह एक ऐसा लेख है जो आपको बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर सकता है। इसलिए इसे ध्यान से पढ़ें और पढ़ने के बाद अपने दिमाग से डिलीट कर दें अगर कर पाएं तो।

इस दुनिया में जितने भी विचार हैं वह वायुमंडल में तरंग के रूप में घूमते रहते हैं। हमारा दिमाग उन तरंगों को ग्रहण करने का एक हाईटेक यन्त्र है जो रिसीवर की तरह कार्य करता है। इस रिसीवर का एक विशेष असेम्बलिंग है जिसके अनुरूप वह अपना कार्य करता है। यह कुछ उसी तरह का कार्य है जैसे कोई रेडियो, मोबाइल या आपका डिश एंटीना कार्य करता है। मुझे लगता है कि अभी आप कुछ समझ नहीं पा रहे होंगे कि मैं कहना क्या चाहता हूँ।


आप जिस कमरे में बैठे हैं उस कमरे में सभी रेडियो चैनल, सभी मोबाइल कंपनी के सिग्नल, सभी टीवी चैनल के सिग्नल उपस्थित हैं पर क्या आप उन्हें देख पा रहे है? नहीं न। पर आपके पास जिस कंपनी का मोबाइल सिम है वह उसी कंपनी का नेटवर्क उन सबके बीच पकड़ लेता है और आप उसका प्रयोग कर किसी व्यक्ति से बात कर पाते हैं। इसी तरह आपका डिश टीवी नेटवर्क जिस कंपनी का है उसी अनुसार वह सिग्नल पकड़कर आपको चैनल दिखाता है।

अब हम थोड़ा पीछे चलते हैं अगर 25 वर्ष पहले कोई व्यक्ति आपसे यह कहता कि उसके पास एक ऐसा यंत्र है जिससे वह कहीं से भी अपने परिजनों से देखते हुए बात कर सकता है तो निश्चित ही आप उसे पागल करार देते। इसी तरह बहुत सारी बातें अभी भी ऐसी हैं जो कथा कहानियों ग्रंथो के माध्यम से कहीं तो गयीं हैं पर भौतिक रूप से देख न पाने के कारण हम उन्हें कपोल कथा घोषित कर देते हैं। जब पहला मोबाइल बना था तब हम वातावरण से केवल एक कंपनी का नेटवर्क यूज़ कर पाते थे अब एक मोबाइल में कई कई कंपनी का नेटवर्क यूज़ कर लेते हैं तो क्या यह सम्भव नहीं है कि भविष्य में कोई ऐसा यंत्र आ जाए जिससे वातावरण में उपलब्ध समस्त नेटवर्क का उपयोग करने में सक्षम हो जाएं।

आज से कोई तीस वर्ष पहले मैं नागराज और बुढ़िया टाइटल की कॉमिक्स पढ़ता था उसमें लिखा रहता थाबुढ़िया ने ग्लोब पर हाथ फेरकर देखा तो उसे नागराज गुफा की तरफ आता दिखाई दिया। कॉमिक्स के रचयिता संजय गुप्ता के दिमाग में यह यह कल्पना आयी होगी कि कोई ऐसा ग्लोब होता होगा जिस पर हाथ फेरकर देखा जा सकता है और मात्र 30 साल में टच स्क्रीन वीडियो कॉल ने हमें लगभग उसी स्थिति में पँहुचा दिया। मुझे याद है कि रामायण में रामानंद सागर ऐसे बाण की कल्पना करते हैं जो व्यक्ति को पाताल में भी ढूंढकर उसका संघार करने में सक्षम है और आप अप्रत्याशित रूप से पाएंगे कि वैज्ञानिक टारगेटड मिसाइल बना पाने में सफल हुए। आखिर कथा कहानियों के लेखक को ऐसे धांसू विचार कहाँ से आते हैं आखिर हमारे ऋषि मुनियों ने ऐसी परिकल्पनाएं कैसे कर लीं?


पुनः हम अपने दिमाग के रिसीबर पर आते हैं हमारा दिमाग भी हमारे जन्म के समय विशिष्ट संरचना या हमारे विशेष अभ्यास से कई विशेष तरंगों को ग्रहण करने में समर्थ है अब दिमाग जिस तरह से बना है उसी तरह की तरंगें वह ग्रहण कर पाने में सक्षम होता है और उसी के अनुरूप उसमें विचार आते हैं या यूँ कहें कि विचार ग्रहण कर पाता है। कभी कभी किन्ही खास लोगों में यह दिमाग विशिष्ट संरचना के चलते ऐसे विचार भी पकड़ लेता है जो पहले कभी किसी ने न सुने हो न देखे हो। ऐसे विचार ही सामान्य लोगों द्वारा कपोल कथा सिद्ध कर दिए जाते हैं पर समय बीतने के साथ जब अनेक लोगों का दिमाग उस विचार को पकड़ने लगता है और वैज्ञानिक प्रवृत्ति के लोग उस पर कार्य करने लगते हैं तब वह कपोल कथा यथार्थ पर परिणित होकर सबके सामने आ जाती है और तब आपको उस विचार को स्वीकार करना ही पड़ता है। अभी मात्र आधे दशक में ही हजारों कपोल कथाएं सच होने बाली हैं। जो व्यक्ति जेट विमान से ध्वनि की रफ़्तार से आवागमन में सक्षम हुआ है वह 50 साल बाद किसी चटाई पर खड़ा होकर यात्रा करता दिखे तो कोई आश्चर्य की बात न होगी। जो व्यक्ति आज मोबाइल से बात कर रहा है वह कल आँख बंद कर शरीर में फिट किसी यंत्र के माध्यम से किसी से मानसिक संपर्क करने में सक्षम हो जाए तो भी कोई आश्चर्य न होगा। 100 साल पहले मनोरंजन के उद्देश्य से रचीं गयी कपोल कथाएं अब सच सावित होती दिख रहीं है तो फिर आध्यात्मिक वेदों में लिखे तथ्य भी देर सवेर वैज्ञानिक कसौटी पर खरे उतरेंगे।


वस्तुतः हमारा शरीर एक बहुत उच्च कोटि का यंत्र है पर हम इसका उपयोग नहीं कर पाते है। मान लो कोई नया एंड्राइड आया है तो उपयोगकर्ता कुछ लोग केवल काल कर पाते हैं कुछ मैसेज भी कर लेते है कुछ मेल सीख लेते है कुछ वीडियो कॉल लेते है कुछ नेट चला लेते है कुछ सॉफ्टवेयर डाउनलोड कर लेते है पर इतना कुछ जानने के बाद भी उसके बहुत सारे फंक्शन ऐसे होते हैं जिन्हें आप कभी नहीं जान पाते हैं इसी तरह हमारे शरीर में भी असीमित शक्तियां होती है जिन्हें हम जान नहीं पाते है चिंतन और सृजन भी शक्तियां ही हैं। हमारे ऋषि मुनि योग अध्यात्म से इन शक्तियों को प्रयोग करने के तरीके सीख लेते थे वह इन शक्तियों से विश्व में घूम रहे विचारों को ग्रहण करने में सक्षम हो जाते थे और उसने हाँसिल अनुभव को ही लोगों को बताते थे या कहीं लिखते थे। जिन्हें आज का व्यक्ति इसलिए नकार देता है क्योंकि उसके दिमाग का तंत्र उस फ्रीक्वेंसी की बात कैच नहीं कर पा रहा है बिलकुल मोबाइल की तरह। जब तक उसका सिस्टम इस फ्रीक्वेंसी से ट्यून नहीं होगा तब तक विचार उसका दिमाग ग्रहण ही नहीं कर पायेगा। आपको ताज्जुब होता होगा कि पुराने समय में जब बच्चे के परदेश से चलते ही माँ को आभास हो जाता था कि उनका लड़का वापस आ रहा है। या उसके वीमार होते ही माँ को आभास हो जाता था। माँ सदैव बाहर गए अपने बच्चे से एक वायरलेस नेटवर्क से जुडी रहती थी।

अब आप सोच रहे होंगे की दिमाग तो सबके पास एक सा ही है, तो आप भूल में हैं। अल्बर्ट आइंस्टीन के दिमाग की विशिष्ट संरचना और दोनों ऑक्सिपिटल के बीच सामान्य व्यक्ति की तुलना में कई गुनी चौड़ी पट्टी आज भी दुनियाँ के लिए शोध का विषय है। महिलाओं का दिमाग पुरुषों की तुलना में ज्यादा विशिष्टताएं लिए होता है। अलग अलग लोगों के दिमाग की स्थिति भी साधारण कालिंग सिंगल सिम से आई फोन तक की सुविधा जैसी विभिन्नता बाली होती है और उसी के अनुसार किसी के दिमाग में कहानी, किसी के दिमाग में कबिता, किसी के दिमाग में साइंस प्रोजेक्ट और किसी के दिमाग में कपोल कल्पनाएं जन्म लेती है यह समस्त विचार वातावरण की तरंगों के इनपुट से दिमाग के कंप्यूटर में प्रोसेस होकर हमारी प्रतिक्रिया के रूप में बाहर आते हैं। इन ग्रहण किये गए विचारों के कारण ही धन लालसा, वैराग्य, समाज सेवा आदि को करने की इच्छा पैदा होती है।

आशा है कि आप समझ गए होंगे कि क्यों प्रथक प्रथक लोगों की, ग्रहण करने, सोचने और प्रतिउत्तर करने की क्षमता अलग अलग होती है और क्षमता से उसके सामाजिक क्रियाकलाप प्रभावित होते हैं।आप यह भी समझ गए होंगे कि कैसे अप्रत्याशित कल्पनाये जन्म लेती हैं पर समय के साथ स्वयं को सच सावित कर देती हैं। अगर नहीं समझे तो आप मान ले कि हमारे ब्राडकास्टिंग दिमाग को आपका दिमाग दिमाग ट्यून नहीं कर पा रहा है।

Disclaimer:- मैं इस आलेख की वैज्ञानिक प्रमाणिकता साबित नहीं कर सकता हूँ, इसे एक दिमागी फितूर की परिकल्पना के रूप में ही स्वीकार कर सकते हैं।
लेखक - अवनीन्द्र सिंह जादौन
इटावा

01 दिसंबर 2015

विज्ञान को सरल, रोचक बनाये जाने की जरूरत


व्यक्ति दिन-प्रतिदिन तरक्की करता हुआ आगे बढ़ता जा रहा है. इसके पीछे उसकी जिज्ञासा, कुछ नया करने की ललक, जीवन को सहज बना देने की मानसिकता रही है. यही कारण रहा कि उसने गुफाओं, वनों के आदिमनावीय जीवन में भी अपने मष्तिष्क को सक्रिय बनाये रखा तथा अनेकानेक खोजों, आविष्कारों के द्वारा खुद को आधुनिक मानव के रूप में विकसित कर पाया. इस वायुमंडल की जो-जो वस्तुएं, जो-जो स्थितियाँ उसके लिए कभी आश्चर्य का, भय का विषय हुआ करती थीं, उन सभी को मानव ने अपने जिज्ञासु दिमाग के चलते सहज-सरल रूप में प्रस्तुत कर दिया. आदिकाल से लेकर वर्तमान तक की खोजों, आविष्कारों में विज्ञान का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है, इससे किसी को इंकार नहीं होना चाहिए. विज्ञान के चरणबद्ध स्वरूप के सामने आते रहने के कारण ही इंसान ने ज्वार, भाटा, सूर्यग्रहण, चंद्रग्रहण, हवा, आग, पानी, अंतरिक्ष, चंद्रमा, तारों, पृथ्वी सहित अनेकानेक अद्भुत रहस्यों को सुलझाने में सफलता प्राप्त की. इसी विज्ञान की ताकत के सहारे इंसान ने जहाँ सागर की गहराइयों को नापने में सफलता प्राप्त की वहीं उसने सुदूर आकाश को भी अपने क़दमों तले कर लिया. विज्ञान के प्रति इंसानी रुझान का सुखद परिणाम यही रहा कि वर्तमान दौर में इंसान के लगभग प्रत्येक कार्य विज्ञान के सहारे संपन्न हो रहे हैं. प्रतिदिन आँख खुलने से लेकर सोने तक की स्थितियों में विज्ञान बराबर इंसान के साथ कदमताल करने में लगा हुआ है. विज्ञान की इस सहजता के बाद भी विज्ञान आम आदमी की समझ से बाहर दिखाई देता है. दरअसल हम सभी विज्ञान की सहायता से अपने जीवन को तो सरल, सहज बनाते चले जा रहे हैं किन्तु उसी विज्ञान को समझने की कोशिश नाममात्र के लिए भी नहीं कर रहे हैं.
.
कदम-दर-कदम विज्ञान का साथ होने के बाद भी, वैज्ञानिक तकनीक के सहारे, वैज्ञानिक आविष्कारों, खोजों के परिणामस्वरूप मिलते संसाधनों के बाद भी, विज्ञान-जनित उपकरणों पर पूरी तरह निर्भर होने के बाद भी इंसान में विज्ञान के प्रति अरुचि का भाव देखा जाता है. देखा जाये तो ऐसा भाव न केवल आम नागरिक में वरन उन लोगों में भी पनप रहा है जो विज्ञान की शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं अथवा विज्ञान विषय का अध्ययन करके किसी अन्य क्षेत्र में कार्यरत हैं. माध्यमिक शिक्षा से लेकर उच्च स्तरीय शिक्षा तक विज्ञान विषय से अध्ययन करने के बाद भी बहुतायत छात्रों में विज्ञान के प्रति अरुचि का भाव देखा जाता है. रोजमर्रा में प्रयुक्त होने वाले उपकरणों में विज्ञान किस तरह से कार्य कर रहा है, किस वैज्ञानिक तकनीक के सहारे ये उपकरण हमारे जीवन को सहजता प्रदान कर रहे हैं, इसको जानने-समझने की ललक, लालसा भी विज्ञान विषय के विद्यार्थियों में नहीं दिखती है. वर्तमान में समाज में एक और प्रवृत्ति देखने को मिल रही है कि विज्ञान विषय की तरफ उन अभिभावकों की ही रुचि दिख रही है जो अपने बच्चों को इंजीनियरिंग अथवा चिकित्सकीय शिक्षा प्रदान करवाने की मंशा रखते हैं अन्यथा की स्थिति में अभिभावक अपने बच्चों को विज्ञान विषयों से इतर अन्य विषयों में शिक्षा ग्रहण करवाने पर ज्यादा जोर देने लगा है. उसके लिए कला, वाणिज्य अथवा अन्य दूसरे विषय अब प्राथमिकता में होते जा रहे हैं.
.
विज्ञान पर पूर्ण निर्भरता होने के बाद भी विज्ञान के प्रति अरुचि का भाव, सामान्य विज्ञान के प्रति अरुचि का भाव पैदा होते जाना सुखद संकेत तो नहीं ही कहा जा सकता है. विज्ञान के क्षेत्र में कार्य कर रहे लोगों को, बुद्धिजीवियों को, साहित्यकारों को इस तरफ विचार करने की आवश्यकता है. देखा जाये तो विज्ञान के क्षेत्र में कार्यरत लोगों, चाहे वे शिक्षक रहे हों, चाहे वे वैज्ञानिक हों, चाहे वे वैज्ञानिक लेखक हों, सभी ने विज्ञान को अत्यंत क्लिष्टता का, सर्वोच्चता का मुलम्मा ओढ़ाकर आम नागरिकों से दूर रखने का ही प्रयास किया है. इस क्लिष्टता में विज्ञान के लिए प्रयुक्त होने वाली भाषा ने भी अपनी भूमिका निभाई है. विज्ञान की साधारण से साधारण जानकारी हो अथवा किसी विशिष्ट विषय पर प्रस्तुत सामग्री, उसे क्लिष्ट अंग्रेजी भाषा में प्रस्तुत करके विशिष्टजनों तक ही सीमित कर दिया जाता है. वैज्ञानिक आविष्कारों को, आम जीवन में प्रयुक्त होने वाले उपकरणों की वैज्ञानिकता को, उनकी तकनीक को भी सहज, सरल रूप में समझाने का प्रयास नहीं किया गया है.
.
इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि वर्तमान दौर विज्ञान का दौर है, इसके बाद भी ये कहने में कोई गुरेज नहीं कि यदि विज्ञान को सामान्य विज्ञान बनाकर आम आदमी के लिए प्रस्तुत नहीं किया जायेगा तो एक इंसान दैनिक जीवन में प्रयुक्त होने वाले उपकरणों के गुण-दोषों से परिचित हुए बिना उनका उपभोग ही करता रहेगा. यही कारण है कि आज समूचा विश्व पर्यावरण-संरक्षण की, पृथ्वी को बचाने की, ओजोन क्षरण रोकने की, जल-संरक्षण आदि की चर्चा करने में लगा हुआ है. आवश्यक रूप से इनके लिए कदम उठाये जाने के साथ-साथ विज्ञान को सरलतम रूप में आम आदमी के बीच प्रस्तुत करने के उपाय भी किये जाने चाहिए. हिन्दी भाषा के साथ-साथ अनेकानेक क्षेत्रीय भाषाओं में भी सहज-सरल भाषा-शैली में वैज्ञानिक लेखों, सामग्री का प्रकाशन किया जाना चाहिए. शिक्षा के क्षेत्र में प्राथमिक शिक्षा से ही विज्ञान को अत्यंत सरल, रोचक रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए, जिससे विद्यार्थियों में विज्ञान के प्रति भय, अरुचि का भाव पैदा न होने पाए. समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं आदि के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से, सोशल मीडिया के द्वारा भी रोजमर्रा में प्रयुक्त होने वाले वैज्ञानिक उपकरणों के बारे में जानकारी सहज, सरल, रोचक भाषा-शैली में प्रस्तुत करके आम इंसान को विज्ञान से, वैज्ञानिक उपकरणों से जोड़ने की कोशिश की जानी चाहिए. वायुमंडल, पर्यावरण, जल, पृथ्वी, आकाश आदि की सुरक्षा के लिए तत्पर वैज्ञानिकों, समाजसेवियों, सरकारों आदि को तब तक पूर्ण रूप से सफलता नहीं मिल सकती जब तक कि वे आम इंसान को जागरूक करने में असफल रहेंगे. स्पष्ट है, आम आदमी उस स्थिति में ज्यादा जागरूक हो सकेगा जबकि वो विज्ञान के महत्त्व को समझे, प्रयुक्त किये जा रहे वैज्ञानिक उपकरणों के गुण-दोषों को, हानि-लाभ को समझे. और ऐसा विज्ञान को सुलभ बनाये बिना संभव नहीं है.

.