होत-होते शाम हो गई, भाँग ने भी अपना असर कम नहीं किया. शाम को हम भाई अपने दोस्तों के साथ छत पर बैडमिंटन खेलते थे, उस शाम को भी खेले. खेलते समय हमें याद ही नहीं रहता था कि कब शॉट मारा, कब प्वाइंट बने किन्तु खेलते भी रहे.
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सानिया के शादी करने को लेकर देशभर में विमर्श चालू है। हमारी लेखक खोपड़ी में (जिस पर बहुतों को संदेह भी होगा, बना रहे) विचार आया कि किसी प्रकाशक से बात की जाये और तुरन्त मौके का फायदा उठाकर एक किताब छपवा ली जाये। वैसे भी देश में विमर्शों की चर्चा होती है तो बहुत से विमर्श याद आने लगते हैं। स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, मुस्लिम-विमर्श, आदिवासी-विमर्श, भाषाई-विमर्श आदि-आदि। हमने ब्लॉग पर अपने दोस्तों के साथ एक विमर्श की शुरुआत कर दी है - पुरुष-विमर्श। इसी तरह दिमाग में आया कि सानिया-विमर्श को चलाया जा सकता है।
| घटना ऐसी है कि हम एक बार झाँसी रेलवे-स्टेशन पर बैठे हुए भोपाल जाने के लिए ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। उसी समय एक हमउम्र लड़के ने आकर कंधे पर जोर से हाथ मार कर हमें नाम से पुकारा। एकदम से हम हड़बड़ा तो गये किन्तु नाम का सम्बोधन सुन लगा कि कोई परिचित ही है। पलटकर देखा तो एक परिचित चेहरा मुस्कुरा रहा था। याद आया कि यह लड़का हमारे साथ कालेज में पढ़ता था। उस समय उसे बहुत यारी-दोस्ती नहीं थी, इस कारण से चेहरा तो याद आया किन्तु नाम को याद नहीं कर सके। कालेज से निकले भी लगभग 6 या 7 साल हो गये थे तो आत्मीयता भी झलकी। उसने पूछा कि और क्या हाल है? हमने भी उसी प्रफुल्लता से जवाब दिया, बस मजे में। फिर उसकी ओर से अगला सवाल धमाके के रूप में आया, पहचाना? हमने भी अतिरिक्त अपनत्व दिखाते हुए कहा अबे! तुम्हें नहीं पहचानेंगे? यही कहकर फँस गये, उसने तुरन्त कहा, बताओ कौन? अब हम घबराये कि यदि नाम नहीं बता पाते तो अगले को लगेगा कि हम पहचान नहीं पा रहे और उसके जोश का उफान ठंडा हो जायेगा। तुरन्त बुद्धि दौड़ाते हुए अपने स्वर में तल्खी सी लाते हुए हमने कहा, इतनी छोटी बात कर दी, अब हम तुम्हें पहचानते हैं इसके लिए तुम्हारे नाम का सबूत देना होगा? जाओ हम तुम्हें जानते ही नहीं कि तुम कौन हो। उसने तुरन्त हमारे कंधे पर दोनों हाथ रखे और कहा कि यार तुम्हारी यही अदा तो कातिल है। बुरा न मानो हम तो देख रहे थे कि तुम्हें अभी भी गुस्सा आता है या कि कालेज से निकलते ही शान्त हो गये? उसके बाद हम दोनों बैठे-बैठे बात करते रहे। लगभग 50 मिनट के बाद हमारी गाड़ी आ गई और तब तक हमें उसका नाम भी याद आ गया। वह हमें ट्रेन में बिठाने आया तो हमने डिब्बे में चढ़ते हुए उसे उसका नाम बताया और अपना दर्शन उड़ेला, अबे दोस्तों के बीच नाम की जरूरत नहीं दिल की जरूरत होती है। |
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एक बेचारा शशि थरूर, एक बयान क्या दे दिया सब के सब उसके पीछे हाथ-पैर धोकर या कहें कि नहा धोकर उसके पीछे पड़ गये हैं। पार्टी अलग उसके पीछे पड़ी है, अब तो पड़ना भी चाहिए क्योंकि मैडम भी इकोनोमी क्लास की यात्री हो चुकीं हैं। उन्हें देखादेखी लत पड़ गई सभी को इकोनोमी क्लास में यात्रा करने की। मुश्किल तो ये लगता है कि कहीं अब इकोनोमी क्लास का किराया ही न बढ़ा दिया जाये? (वैसे हमें क्या, अभी तक हवाई जहाज छूकर भी नहीं देखा, बैठना तो दूर। हाँ खिलौने वाले तो बहुत उड़ाये और तोड़े हैं।)
बात हो रही थी शशि थरूर की। उसके बयान पर हंगामा क्यों? वही पुरानी गजल, हंगामा है क्यों बरपा थोड़ी सी जो पी ली है। यहाँ लाल और पीली का सवाल ही नहीं सवाल था जो कहा उस पर हंगामा क्यों? कौन थे शशि थरूर इस चुनाव को जीतने के पहले? कभी सोचा? नहीं न....
यही मुश्किल है इस देश के लोगों के साथ, किसी को दो-चार जगह किसी भी रूप में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर देख क्या लें समझो हो गये पागल उसके पीछे। वही अब खुदा, वही भगवान। कहते हैं न कि जब खुदा मेहरबान तो गधा पहलवान, कुछ ऐसा ही हुआ महाशय के साथ। दो-चार खबरें बनी अन्तरराष्ट्रीय स्तर की और आ गये भारत वर्ष में अपनी झींगा-मुश्ती करने।
पूरा दोष इन जैसे लोगों का नहीं है। हम भी तो उसी के लिए पलक-पाँवड़े बिछा कर तैयार रहते हैं जो अपने धन-बल से रसूख से हमें प्रभावित करता रहता है। हमने चुनाव में शायद ही किसी के विकास कार्यों को देखा हो (अपवाद स्वरूप कुछ उदाहरण यहाँ मौजूद हैं) हमने जब भी चयन करना चाहा तो देखा कि कौन ‘काम’ करवाने में सक्षम है? कौन हमारे दो नम्बर के कामों को एक नम्बर का बनवा देगा? किसके साथ बन्दूक वालों की भीड़ है? किसके पास लग्जरी कार है? किसका नाम किसी भी रूप में सही, ज्यादा से ज्यादा लोग जानते हैं?
अब कोई माने या न माने सत्य यही है। कोई बताये देश के लिए शशि थरूर का योगदान? ऐसे व्यक्ति को जिसने देश के आम आदमी की पीड़ा को नहीं देखा समझा उसे तो इकोनोमी क्लास वाला यदि जानवर लग रहा है तो भी उसका शुक्रिया अदा करो। ये कहो कि उसने आम आदमी को कुछ और नहीं कहा क्योंकि देश की बहुत बड़ी जनसंख्या रेलवे के साधारण श्रेणी के डिब्बे में बैठ कर यात्रा करती है। साधारण श्रेणी का डिब्बा क्या थरूर साहब जानते होंगे?
रही बात आम आदमी के दर्द की तो जो इस देश में जन्में और पीड़ा को सहा, अभावों को देखा, वही करोड़ों के बँगले में रहते हैं, लाखों की कार में यात्रा करते हैं, अरबों रुपये पत्थरों के नाम करते हैं तो विदेश के रंग-ढंग में पले शशि थरूर पर इतना गुस्सा क्यों?
मदारी-जमूरे के इस खेल पर तो हम-आप-सब ताली बजाते हैं, मजा लेते हैं और चल देते हैं अपनी-अपनी राह पर लेकिन इस खेल पर कोई ताली नहीं बजा रहा है, कोई मजा नहीं ले रहा है, कोई पैसों-रुपयों की बरसात नहीं कर रहा है...............बस खेल खेलने वाले खेल रहे हैं.................परेशान होने वाले परेशान हो रहे हैं. महाराष्ट्र में हो रहे इस हंगामे को और क्या नाम दिया जा सकता है? बेक़सूर परीक्षार्थियों की पिटाई सिर्फ़ इस बात पर कि कोई दूसरे प्रान्त का आदमी उनके हक़ को मार रहा है. उत्तर भारतीय मराठा मानुष के हकों को मार रहे हैं. अभी तक तो लड़ाई इस बात की थी कि यहाँ से गए उत्तर भारतीय मराठी भाषा नहीं बोलते पर अब लड़ाई इस बात की शुरू हो गई है कि उत्तर भारतीय उनकी जगहों पर नौकरी भी करने लगे हैं.
अब इस देश में ऎसी व्यवस्था बना दी जाए जिससे व्यक्ति पाने ही प्रांत में नौकरी कर सके, अपने ही प्रांत में व्यवसाय कर सके, यदि किसी दूसरे राज्य में जाना भी पड़े तो उसके लिए पासपोर्ट और वीसा बनवा कर जाए. वैसे ये बुरा विचार नहीं है, देखा जाए तो राज ठाकरे पूरे देश को इस तरह से बाँट देना चाहते हैं कि आदमी आसानी से अपने पासपोर्ट का प्रयोग कर सके। भाई हम जैसे तमाम होंगे जो पासपोर्ट तो बनवा लेते हैं और फ़िर पूरी जिन्दगी विदेश जाने के सपने देखते रहते हैं. कम से कम हम जैसों का तो विदेश जाने, अपने पासपोर्ट पर विदेश की मुहर लगी देखने का तो सपना पूरा होगा.
इसी के साथ-साथ आजकल भारतीय समाज में अपनी बेटियों की शादी के लिए NRI लड़कों को पहली पसंद के रूप में देखा जाता है, अपने बेटे के NRI के रूप में पहचान बनाने को देख कर गर्व होता है..........जो लोग इसके अतिरिक्त भी किसी न किसी रूप में NRI होने की चाह रखते हैं राज ठाकरे उनकी भी हसरत को पूरा कर रहे हैं।
तो फ़िर हंगामा कैसा? शोर कैसा? उपद्रव कैसा? आइये जो लोग सस्ती दरों पर विदेश की सैर करना चाहते हैं........जो लोग ज्यादा खर्च किए बिना NRI होने का मजा लेना चाहते हैं वे लोग भी इस खेल में जुट जाएँ, जुड़ जाएँ. आज नहीं तो कल ये देश कई हिस्सों में बँटा तो हो सकता है कि हमारा-आपका-हम सबका नाम होगा और विदेश का मजा अलग से मिलेगा......पासपोर्ट का भी उपयोग हो सकेगा.
तो जुड़िये इस महाभियान में (महाप्रयोग की तरह) और सफल कीजिए उत्तर भारतीयों और मराठा मानुष के बीच खोदी जा रही खाई के प्रयास को..........ये सब उस समय हो रहा है जबकि इस देश की प्रथम नागरिक (महामहिम राष्ट्रपति जी) भी एक मराठा मानुष हैं...........जय मराठा, जय उत्तर भारतीय, जय भारत (देश तो अब बाद में ही आता है)