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25 अप्रैल 2020

भाँग की भाव-भंगिमा में शरारतें

फुर्सत में फोटो एल्बम देख रहे थे. उसी में कुछ फोटो होली की दिख गईं. होली, दीपावली पर सभी चाचा लोग उरई आया करते थे. खूब धमाल हुआ करता था. उन्हीं होली की फोटो देखकर उनसे जुड़ी कहानियों, शैतानियों की चर्चा छिड़ गई. बात-बात में भाँग खाने की कहानियाँ सुनाई जाने लगीं. उसी में अपने भाँग खाने का एहसास याद आ गया. हमने सबसे पहली बार भाँग होली के तीन-चार दिन पहले खाई थी. हम उस समय साइंस कालेज, ग्वालियर में पढ़ा करते थे और छात्रावास में रह रहे थे. होली की छुट्टी होने वाली थीं और संयोग से छुट्टी के ठीक पहले रविवार पड़ा. हॉस्टल में होता यह था कि मैस में रविवार को शाम की छुट्टी रहती थी और दोपहर के भोजन में पक्का खाना यानि कि सब्जी, पूड़ी, खीर, रायता, पापड़ आदि हम छात्रों को मिलता था. उस वर्ष हम कुछ छात्रों ने और हमारे दो-तीन भाईसाहब लोगों ने विचार बनाया कि खीर में ही भाँग मिला दी जाये.


जैसा कि तय हुआ बिना अन्य किसी को बताये खीर में भाँग मिलाई गई. चूँकि हमारा सोमवार को एक प्रैक्टिकल था, इस कारण हमने खाना खाया और उसमें खीर कम खाई. इसके पीछे कारण ये था कि घर में कई बार सुन रखा था कि भाँग खाने के बाद आदमी का अपने ऊपर नियन्त्रण नहीं रह जाता. वह जो भी कार्य करता है तो उसे बस करता ही जाता है. डर ये था कि कहीं हम कुछ गलत-सलत कर बैठे और प्रैक्टिकल न दे पाये तो बहुत बुरा होगा. बहरहाल हमने खीर बहुत नहीं खाई थी, सो भाँग के मजे बजाय अपने के दूसरों के लिये. हमारे अन्य दूसरे साथियों ने काफी हंगामा किया. रेलवे स्टेशन तक दौड़ते जाना, वहाँ जाकर हॉस्टल के कुछ भाइयों को रँगना, हॉस्टल में बड़े भाईसाहब लोगों को नाम से पुकारते हुए उन्हें नाचने के लिए कहना आदि बहुत मजेदार था. उस समय एक गाना खूब हिट था, तिरछी टोपी वाले, ओए-ओए, उसी को बजा-बजा कर बड़े भाइयों को खूब नचवाया गया. कुछ ने बिना भाँग चढ़े ही भाँग की नौटंकी करके मस्ती की.

कम भाँग खाने के कारण हमने तो भाँग के असर का पूरा आनन्द तो नहीं लिया, इस कारण हमें लगता रहा कि कभी भाँग खानी है और उसका असर देखना है. इसी ताक में लगे-लगे एक साल हमारे पड़ोस के त्रिपाठी चाचा ने भाँग को मेवे, खोआ आदि के साथ तैयार किया. हमने भी उस मिठाई का आनन्द उठाया और इस बार उसका असर देखने के लिए सोये नहीं, न कम खाई. अबकी बार मालूम पड़ा कि भाँग का मजा कैसा होता है. हमने भाँग खाने के बाद खूब मीठा भी खाया क्योंकि सुन रखा था कि मीठा खाने से भाँग खूब चढ़ती है. दोपहर में खाना खाकर लेटे और कुछ देर बाद ऐसा लगा कि आज हमने खाना तो खाया ही नहीं. पलंग से उठे और सोचा कि मुँह धोकर अम्मा से खाना माँगा जाये. मुँह धोते-धोते एकदम से याद आया कि कुछ देर पहले भी तो हम मुँह धो रहे थे. हमने अम्मा से पूछा तो पता चला कि हम खाना खा चुके हैं.

हम फिर वापस पलंग पर जाकर लेट गये. दिमाग इस बारे में भी सचेत था कि कहीं हमारी हरकत से कोई ये न समझे कि हम नशे में ऐसी बातें कर रहे हैं, इस कारण हम चुपचाप लेटे रहे. इसके बाद भी भाँग अपना असर तो दिखा ही रही थी. मन में कभी आता कि ऐसा हो रहा है तो कभी लगता कि नहीं ऐसा नहीं हो रहा है.
होत-होते शाम हो गई, भाँग ने भी अपना असर कम नहीं किया. शाम को हम भाई अपने दोस्तों के साथ छत पर बैडमिंटन खेलते थे, उस शाम को भी खेले. खेलते समय हमें याद ही नहीं रहता था कि कब शॉट मारा, कब प्वाइंट बने किन्तु खेलते भी रहे.

अन्त में एक बात समझी कि भाँग का नशा दिमाग की सक्रियता को कम करता है किन्तु यदि अपने पर नियंत्रण है तो वह आप पर हावी नहीं हो सकता. आज भी हम लोग बैठ कर उस दिन की भाँग खाने की और भी हरकतों की चर्चा कर हँस लेते हैं.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

08 अप्रैल 2018

सुनसान सा गुजर जाता है रविवार


रविवार उतना खामोश नहीं गुजरता अब, जितना पहले कभी गुजरा करता था. तब स्कूल, कॉलेज की पढ़ाई जैसी भागदौड़ के बाद रविवार पूरी तरह से खुद का दिन हुआ करता था. एक अघोषित सा कर्फ्यू लगा रहता था पढ़ाई पर. चाहते, न चाहते हुए भी पूरे रविवार किताबों की तरफ ध्यान नहीं दिया जाता था. शनिवार शाम से ही योजना बनने लगती थी कि कल क्या-क्या करना है. उन दिनों हमारे शहर में पार्क, बाग़, बगीचे जैसा कुछ नहीं हुआ करता था, हालाँकि इसमें परिवर्तन आज भी नहीं हो सका है. आज भी पार्क, बगीचों आदि के मामले में वही स्थिति है. एक विशेष बात जो उस समय में थी और आज बिलकुल देखने को नहीं मिल रही है वह थी शहर के तमाम मैदानों में खेलते-कूदते बच्चों की भीड़. तब गिने-चुने कॉलेज हुआ करते थे, जिनके मैदान बच्चों से भरे रहते थे. रविवार तो जैसे रणक्षेत्र बना रहता था. कौन पहले आया था, कौन बहुत देर से जमा हुआ है, कौन अभी तक क्यों नहीं गया जैसे सवालों के बीच शोरगुल मचता और अंततः लड़ाई-झगड़े के बीच सुलह का रास्ता निकल आता. अब कॉलेज कई हैं, मैदान हैं मगर सब सुनसान. कहीं कोई भीड़ नहीं, कहीं कोई गुट नहीं, कहीं कोई झगड़ा नहीं, कहीं कोई हंगामा नहीं. अब मैदानों के लिए तो सब दिन एकसमान हैं. क्या रविवार और क्या सोमवार.


ऐसी स्थिति अकेले मैदानों के सम्बन्ध में नहीं आई है. इंसानों के साथ भी रविवार कुछ अलग तरह की स्थितियाँ लेकर आया है. सप्ताह के शेष दिनों में काम का बोझ, काम के निश्चित घंटे, ऑफिस जाने की भागमभाग के बीच समझ ही नहीं आता कि कब सारे दिन निकल गए. रविवार का आना जैसे ख़ामोशी का आना होता है. ऐसा लगता है जैसे कोई काम ही नहीं. न किसी से मिलने जाना है, न किसी का मिलने आना है. न किसी के घर से बुलावा आता है, न किसी को घर पर बुलाया जाता है. सामाजिक प्राणी होकर भी इन्सान घनघोर रूप से असामाजिक बनता जा रहा है. अपने आपमें सिमटा हुआ, अपने आपमें ही लिपटा हुआ. आस-पड़ोस की जानकारी उसे मोबाइल से मिल रही है. सोशल मीडिया के द्वारा मिल रही है. ऐसे में बार-बार अपने मोबाइल को देखना, बार-बार जाकर लैपटॉप की स्क्रीन ताकना, थोड़ी-थोड़ी देर में टीवी ऑन करके खुद को अपडेट दिखते रहने की कोशिश करना आदि आज रविवार के मुख्य काम होते जा रहे हैं.

एक और रविवार गुजरा. एक और सुनसान दिन गुजरा. एक और खालीपन खुद पर हावी हुआ. इस सुनसान शोर में फिर याद आया अपना वो सुहाना रविवार जबकि हम सब हल्ला-गुल्ला मचाते हुए मगन रहते थे. बच्चे होकर भी वाकई में सामाजिक प्राणी से दिखाई देते थे. अब बस इंतजार रहता है कि काश कोई रविवार आये फिर पुराने रविवार जैसा.

25 जुलाई 2015

बेदम कांग्रेस, हताश कांग्रेसी


सत्ता का मोह आसानी से छूटता नहीं वो चाहे नेताओं, मंत्रियों को लगा हो या फिर उनके समर्थकों को. इसे बहुत आसानी से, स्पष्ट रूप में वर्तमान केन्द्रीय विपक्ष, विशेष रूप से कांग्रेस के सन्दर्भ में देखा-समझा जा सकता है. देश की आज़ादी के बाद से लगातार दशकों तक केन्द्रीय सत्ता में विराजमान रही कांग्रेस के लिए ये बहुत ही असहज स्थिति है कि वे महज दो अंक सीटों में संसद में सिमटकर रह गए हैं. अपने इतिहास की सर्वाधिक शर्मनाक पराजय से उबरने, उससे सबक लेने के बजाय उस दल के समस्त नेतागण जिस तरह की हरकतें करने में लगे हैं उससे उनकी हताशा, निराशा ही परिलक्षित होती है. इस हताशा-निराशा का मुख्य कारण उनका सत्ता से हटना तो है ही साथ अपने एकमात्र पारिवारिक नेता का अगंभीर होना भी है. जिस तरह की कार्यसंस्कृति कांग्रेस में विगत वर्षों में जन्मी है उसमें किसी भी वरिष्ठ, बुजुर्ग, कद्दावर नेता के स्थान पर गाँधी-नेहरू पारिवारिक नाम को महत्त्व दिया जाता रहा है. यही कारण है कि समय-समय पर इसके बड़े-बड़े अनुभवी नेता, मंत्री पारिवारिक चाटुकारिता में बयानबाज़ी करते दिखने लगते हैं.
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इधर वर्तमान लोकसभा में निराशाजनक स्थान पाने के बाद कांग्रेस के भीतर से जिस तरह से पार्टी अध्यक्ष बदलने की मुहिम सी चली या चलाई गई उसने भी निराशा-हताशा को बढ़ाया ही है. पार्टी अध्यक्ष के रूप में और लोकसभा चुनाव में मोदी के बरक्श खड़े किये गए राहुल गाँधी भी कांग्रेस में किसी भी तरह की जान डालने में असफल रहे हैं. हास्यास्पद तो वो स्थिति रही जबकि वे स्वयं छुट्टी के नाम पर लम्बे समय तक देश से ही गायब रहे. जबकि उस समयावधि में कई-कई मुद्दों पर वर्तमान अध्यक्ष को सक्रियता दिखानी पड़ी. सोचने-समझने की बात है कि जिस व्यक्ति को पार्टी के लोग, नेता, मंत्री, समर्थक आदि प्रधानमंत्री के दावेदार के रूप में देख रहे हों वो लम्बे समय तक अकारण ही देश से गायब रहे. इसके साथ-साथ हास्यास्पद स्थितियां तब उत्पन्न होती हैं जबकि ऐसे व्यक्ति की तरफ से अनर्गल बयान जारी किये जाते हैं. खुद को गंभीर और सक्रिय दिखाने के फेर में ऐसे व्यक्ति की तरफ से लगातार गलतियाँ होती रहती हैं जो पार्टी की, पार्टी पदाधिकारियों की, समर्थकों की निराशा-हताशा को बढ़ाती ही हैं.
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कुछ इसी तरह की परेशानी, हताशा, निराशा मानसून सत्र से पूर्व और सत्र में देखने को मिल रही है. तमाम सारे ऐसे बिन्दु उठाये जा रहे हैं जिनकी जन्मदात्री कांग्रेसनीत सरकार ही रही है किन्तु अब अतिशय सक्रियता के चक्कर में उनके द्वारा सबकुछ भुला दिया गया है. बहुत पहले की बात न करते हुए महज उस सरकार के विगत दस वर्षों का लेखा-जोखा ही देख लिया जाये तो भ्रष्टाचार के, घोटालों के अनेक मामले सामने दिखने लगते हैं. इन दशाओं में जबकि कांग्रेस के अनेक नेता, मंत्री, समर्थक राहुल गाँधी को अध्यक्ष बनाये जाने की मांग कर चुके हैं, वहीं इसके साथ-साथ पार्टी की तरफ से ही प्रियंका गाँधी को अध्यक्षीय कमान दिए जाने की आवाजें खुले रूप में सामने आ चुकी हैं तब पार्टी को बजाय हल्केपन की राजनीति करने के कुछ ठोस कदम उठाने की जरूरत है. वैसे तो ये बात समस्त कांग्रेसी भली-भांति जानते हैं कि उन्होंने जितनी तीव्रता से, बिना किसी ठोस सबूत के मोदी का, भाजपा का विरोध किया है उसका उत्थान उससे भी अधिक तीव्रता से हुआ है. फ़िलहाल मानसून सत्र चालू है, विपक्षियों सहित कांग्रेस के द्वारा अनर्गल बयानबाज़ी, विरोध भी चालू है. एक वर्ष पूर्व संसद में गतिरोध पर जिस जनधन की बर्बादी की दुहाई ये कांग्रेसी देते थे, आज वे खुद उसी रास्ते पर चल रहे हैं. विरोध हो मगर तथ्यों के साथ न कि महज विरोध के लिए ही. खैर, कांग्रेसी भी बेचारे क्या करें, हाल-फिलहाल तो आगामी चार साल कोई मौका नहीं है सता की मलाई चाटने का, सो विरोध ही किया जायें अनर्गल ही विरोध किया जाये.

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04 जुलाई 2010

मसला स्वतंत्रता का, कोशिश अंग दिखाने की और विवाद समानता का




पिछले दिनों अपनी पोस्ट ब्रा बर्निंग, टॉपलेस इन स्वीमिंग पूल, ब्रा की माँग...... पर सीधे-सीधे टिप्पणी के द्वारा तो लोगों के विचार मिले, एक महानुभाव के विचार ई-मेल के द्वारा भी प्राप्त हुए। उनके नाम और ब्लॉग संसार में उनकी उपस्थिति को देखते हुए न तो हम नाम बता रहे हैं और न ही उनका लिंग। (अब यहाँ विवाद हो जाये कि महिलाओं के संदर्भ में भी इस पुरुषवादी शब्द की क्या जरूरत)

अपनी पोस्ट की मेल द्वारा टिप्पणी पर चर्चा बाद में पहले एक अनुरोध हिन्दी भाषा के शब्दों का निर्माण करने में लगे विद्वानों से कि अब कुछ शब्द इस तरह के बनाये जायें जो महिलाओं की पहचान का निर्धारण स्वतन्त्र रूप में करते हों। अब लिंग शब्द को भी महिलाओं की पहचान के लिए कैसे जोड़ा जाये और क्यों?

मेल पर जो टिप्पणी आई उसके अनुसार ब्रा, शरीर के उस भाग को ढकने का वस्त्र है जो महिलाओं का अपना अंग है। स्वयं महिलाओं को अधिकार है कि वे किस अंग को दिखाना चाहतीं हैं और किस अंग को नहीं। ब्रा को अश्लील माना जाये और यदि टॉपलेस की आजादी एक देश में मिल सकती है तो हमारे देश में क्यों नहीं? क्यों हमारे देश में महिलाओं को कपड़ों की कैद में रहना होता है? साड़ी की घेराबंदी में रहना पड़ता है? कपड़ों की, ब्रा की, साड़ी की कैद पुरुषों की देन है, इससे छुटकारा पाना महिलाओं का अगला मुक्ति संघर्ष होना चाहिए।


(चित्र गूगल छवियों से साभार)


इसके अलावा भी और कुछ भी था जिसका सीधा सा सार यही निकलता था कि महिलाओं के अंग विशेष को लेकर हमेशा पुरुषवादी प्रतिक्रिया क्यों होती है?

पोस्ट को ज्यादा बड़ा नहीं करना है, बस एक सवाल मन में उठा वही आज की पोस्ट का सार है। किसी भी इंसान के शरीर में चाहे वह स्त्री हो अथवा पुरुष अंगों के मामले में समान है। कुछ अंगों की बनावट में कुछ अंतर है, बस यदि इसे छोड़ दिया जाये तो। दोनों के बाल, दोनों के आँखें, नाक, गाल, माथा, कान, पेट, पीठ, हाथ, पैर, बाकी के अंगों में भी समानता है बस अंतर को नजरअंदाज कर दिया जाये।

अंगों के मामले में एकसमानता तो उसके उपयोग में अंतर क्यों? महिलाओं का यह तर्क और हमारा सवाल कि महिलाएँ आवश्यकता होने पर, थकान के समय में अपने हाथ, पैर, माथा, पीठ आदि किसी से भी दबाने के लिए कह लेतीं हैं, चाहे दबाने वाला स्त्री हो अथवा पुरुष; छोटा हो अथवा बड़ा। क्या अंगों के निर्धारण में शेष अंगों (जिन्हें गोपनीय श्रेणी में रखा जाता है) के मामले में भी ऐसा करवाया जा सकता है?

इस सवाल को अन्यथा की श्रेणी में न रखा जाये क्योंकि महिलावादी समर्थकों की ओर से सकारात्मकता को दरकिनार करके केवल कुतर्कों के सहारे महिला मुक्ति और तरक्की का सपना दिखाया जा रहा है। नकारात्मक संघर्ष अपासी विवाद को ही पैदा करता है न कि समाज में समरसता पैदा करता है। आज आवश्यकता समाज में समरसता पैदा करना होना चाहिए; आपसी समन्वय बढ़ाने की ओर बल देना चाहिए न कि किसी कुतर्क के सहारे विवाद को, वैमनष्यता को बढ़ाना।

एक सफाई साड़ी पहनने को लेकर, जिसको लेकर महिलाएँ (कु)तर्क देतीं हैं कि यह पुरुषों की साजिश है जिससे महिलाओं के अधिक से अधिक शरीर को पुरुष देख सकें, क्या देश की महामहिम राष्ट्रपति जी, देश की सत्ता पक्ष की पार्टी की अध्यक्ष, लोकसभा अध्यक्ष के ऊपर भी पुरुषों का दवाब है जो वे हमेशा साड़ी में ही दिखाई देतीं हैं?


05 अप्रैल 2010

पाकिस्तान को गरियाओ नहीं, अब वे हमारे रिश्तेदार होने जा रहे हैं, वो भी मान!!



शादी सानिया की और दिक्कत मीडिया को, राजनेताओं को, आम आदमी को....और भी बहुतों को (इन बहुतों में ब्लॉगर्स भी शामिल हैं।) आज हम भी हो लिए, लगा कि ऐसा न हो कि समय के ज्यादा निकलते ही कहीं ये मुद्दा पुराना न पड़ जाये और हम तब लिखने बैठें जब कोई पढ़ने वाला ही न मिले। यही सोचकर आज और अभी कॉलेज से आने के बाद तुरन्त लिखने बैठ गये। लाइट देवी की कृपा भी रही कि मिल गईं नहीं तो.............।


सानिया के शादी करने को लेकर देशभर में विमर्श चालू है। हमारी लेखक खोपड़ी में (जिस पर बहुतों को संदेह भी होगा, बना रहे) विचार आया कि किसी प्रकाशक से बात की जाये और तुरन्त मौके का फायदा उठाकर एक किताब छपवा ली जाये। वैसे भी देश में विमर्शों की चर्चा होती है तो बहुत से विमर्श याद आने लगते हैं। स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, मुस्लिम-विमर्श, आदिवासी-विमर्श, भाषाई-विमर्श आदि-आदि। हमने ब्लॉग पर अपने दोस्तों के साथ एक विमर्श की शुरुआत कर दी है - पुरुष-विमर्श। इसी तरह दिमाग में आया कि सानिया-विमर्श को चलाया जा सकता है।

अब बात आती है परेशान होने की, तो भाई आप परेशान क्यों होते हो? क्या आप भी लाइन में थे, नहीं न, तब? अरे! कोई शादी कर रहा है तो करने दो। वैसे भी कम से कम वह लिव इन रिलेशनशिप को तो नहीं अपना रही है। देश की शान ही बढ़ा रही है कि जिस देश से शांति-वार्ता करने में, सुलह करने-कराने में हमारे देश की सरकार लाखों-करोड़ों रुपयों को स्वाहा कर देती है, वहीं सानिया ने अपने प्यार की खातिर दोनों देशों में समधियाना वाला सम्बन्ध बना दिया।

अब हमें पाकिस्तान को गाली देने का हक और भी नहीं बनता है। पहले तो रीना राय ने शादी की थी, भले ही वह लम्बे समय तक न चली हो किन्तु भारतीय मान्यताओं के अनुसार पाकिस्तान में हमारे देश की लड़की ब्याही थी। इस दृष्टि से वे हमारे मान हुए। अब सानिया शादी कर अपने ससुराल जायेंगीं और हम भारतवासियों को पाकिस्तान का रिश्तेदार बनायेंगी। अब फिर अपनी लड़की वहाँ दी, अपनी बहिन-बेटी दी तो पाकिस्तान हमारा मान फिर से हुआ। अब चरण पखारने होंगे।

अरे! आप क्या कह रहे हो, आपकी बहिन-बेटी नहीं है सानिया? अच्छा तभी आपको ज्यादा मिर्ची लग रही है उसकी शादी से। कोई बात नहीं, आप कर भी क्या सकते हो। चले जाना शादी में कुर्सी, पंडाल वगैरह एकसा करवाने को, मेहमानों को खाना-पानी करवाने को।

भारत-पाकिस्तान के आपसी सम्बन्धों को बनाने में जो काम हमारे राजनेता, क्रिकेटर नहीं कर सके वह सानिया ने कर दिया। वाह सानिया! वाह!

इसके अलावा एक काम और भी किया है सानिया ने। नहीं पता, स्त्री-सशक्तिकरण का। उसने शादी की तो एक शादीशुदा से, यह अपने आपमें सशक्तिकरण का प्रतीक नहीं है? है भाई, आप सोचिएगा, यदि आप इसमें सशक्तिकरण नहीं खोज पाये तो हमें बताइयेगा, हम आपको बहुत से कारण बता देंगे। तब तक, खिसियाओ नहीं, शादी होती है तो होने दो।

मीडिया वालो, तुम भी देश की दूसरी समस्याओं पर ध्यान दो। शादी में तुमको निमंत्रण तो मिलेगा नहीं, फिर सड़के के किनारे खड़े होकर ताकना और झाँक-झाँक कर, कूद-कूद कर फोटो लेते रहना। कुछ ऐसा ही तो किया था तुम सबने अभिषेक की शादी में, भूल गये? भूल ही जाओगे, अपनी इज्जत से जुड़ी बात तो तुरन्त भूल जाते हो, कम से कम देश की इज्जत तो रख ही लो, देश की मीडिया की इज्जत तो रख ही लो। तुम लोगों से ही उम्मीद है क्योंकि देश की जनता जो आम है, उसके पास करोड़ों के खर्चे वाली शादी देखने के मौके कम ही आते हैं।

लगी रहो सानिया, ये टुच्चे आशिक तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। तुम देश की शान हो, अब हम पाकिस्तान को रिश्तेदार कहने की स्थिति में आ गये हैं।

गर्व करो कि हम भारतीय हैं।






(चित्र गूगल छवियों से साभार)

04 जनवरी 2010

ज्वालामुखी न फोड़ें....हाथ मिलाएं और दिल भी मिलाएं

आज शाम को मौका मिला कि नेट को चला सकें तो बैठ गये। सोचा था कि बुन्देलखण्ड पर कुछ लिखकर लगायेंगे। उससे पहले इधर-उधर की दौड़ लगाते रहे। कुछ पढ़ा, कुछ पर टिप्पणी भी की और शब्दकार की कुछ पोस्ट को सही भी किया।

इधर-उधर की दौड़ा भागी में दो-चार पोस्ट ऐसी दिखीं जिनको पढ़ने के बाद समझ नहीं आया कि किया क्या जाये? लिखने वाले भी ऐसे नहीं कि ये कहा जाये कि नाम के लिए लिख रहे हैं। नाम भी ऐसे नहीं कि जिनसे लड़कपन की महक उठ रही हो। इसके बाद भी ऐसी पोस्ट से लगा कि अपनी स्थिति को समझना अभी बहुत-बहुत बाकी है।

(ज्वालामुखी आयोजन के बाद का)


नाम नहीं लिखेंगे क्यों कि संदर्भ ऐसे हैं जिनके कारण आसानी से समझ आ जायेगा कि किस पोस्ट की चर्चा हो रही है। एक तो अलबेला खत्री के चयन को लेकर, सम्मान को लेकर सवाल उठाये गये हैं। ऐसा किसी एक ही पोस्ट पर नहीं है, दो एक पोस्ट और भी दिखीं। बहरहाल, हमारे लिए इस विषय पर कुछ भी कहना सूरज को रोशनी दिखाना हो जायेगा क्योंकि स्वयं अलबेला खत्री जी और अविनाश वाचस्पति जी काफी कुछ कह चुके हैं। अविनाश जी को पढ़ा तो लगा कि यही सही है और जब अलबेला जी की पोस्ट देखी तो वह सही दिखे। (परेशान हम क्योंकि हम तो कतार में हैं।)

सवाल यह नहीं कि नाम किसके हैं, यह आयोजक की मर्जी है। हमने अलबेला जी की पोस्ट पर टिप्पणी देते हुए कहा भी था कि देश में आयोगों और समितियों के द्वारा कितना काम हुआ है यह सभी जानते हैं। अरे भई कम से कम इस तरह की वोटिंग से सभी को मौका मिला है चयन का, ये बात अलग है कि नेताओं की तरह इसमें भी गलत ब्लागर का चयन हो जाये। (नामांकित ब्लागर माफ करेंगे, इस बात के लिए)

यदि चयनित ब्लागरों के नामों पर विचार किया जाये तो हम अकेले ही ऐसे हैं जिन्हें अपने नामांकन पर बहुत ही आश्चर्य हुआ था। आप स्वयं विचार करिए जहाँ अजित वडनेकर जी हों, आशीष खण्डेलवाल जी हों, अविनाश जी का नाम हो, काजल कुमार की सटीक दृष्टि हो, निर्मला कपिला की कलम की सार्थक अभिव्यक्ति हो, संगीता पुरी जी का ज्ञान हो, बी0एस0 पावला जी की बहुमुखी प्रतिभा हो, पं0 डी0के0शर्मा ‘वत्स’ जैसा नाम हो, राज भटिया, जी0के0अवधिया जैसी सक्रियता हो और उनके साथ प्राण शर्मा, रूप सिंह चन्देल, रवीन्द्र प्रभात, ओम आर्य जैसे धुरन्धर ब्लोगरों के नाम दिख रहे हों वहाँ कुमारेन्द्र सिंह सेंगर लिखा दिखना ही अपने आप में सम्मान है। (टीका टिप्पणी आयोजन पर नहीं, सवाल जीतने का है!!!)

एक-दो और पोस्ट पढ़कर कुछ अलग सा लगा। पोस्ट टिप्पणी को लेकर थीं, तब लगा कि क्या मात्र टिप्पणी लिखने के लिए ही किसी अन्य की पोस्ट पर टिप्पणी करनीं चाहिए?

यही पोस्ट कुछ ज्यादा बड़ी लग रही है। टिप्पणी पर टिप्पणीधारी पोस्ट कल।

इधर कुछ दिनों से चिट्ठाजगत के धड़ाधड़ महाराज अपना काम नहीं कर रहे हैं। क्या कोई निदान है किसी के पास इस समस्या का?

एक खुशनुमा सूचना (स्वयं को खुश करवाने वाली)

(आओ आगे बढ़ कर हाथ और दिल मिलाएं)


हमारे ब्लाग के (हमारे भी) अब 50 समर्थक--इन्हें समर्थक नहीं हमारे अपने कहिए--तो हमारे अपने लोगों की संख्या 50 हो गई है। सभी अपनों का, नहीं-नहीं, अपनों का धन्यवाद नहीं करते, अपनो को यह विश्वास कि किसी भी पोस्ट के द्वारा कभी किसी का दिल न दुखे, यही प्रयास हमेशा रहेगा। अपनों से निवेदन कि वे भी किसी गलत पोस्ट या भटकाव की स्थिति में सँभालते रहें।





26 नवंबर 2009

सार्थक प्रयास कर चुकीं महिलाओं के बारे में जानना-बताना अपराध हो गया

स्त्री-विमर्श से जुड़ी हुई एक पुस्तक पढ़ी थी जिसमें समूची पुस्तक को दो भागों में बाँटा गया था। उसमें से एक शीर्षक को नाम दिया गया था ‘हंगामा है क्यों बरपा थोड़ा सा जो जी लेते हैं।’ कुछ इसी तरह की बात हुई हमारी पिछली पोस्ट पर जो चोखेर बाली पर लगाई थी। भारतीय स्वाधीनता से सम्बन्धित कुछ महिलाओं के नामों के बारे में चर्चा कर ली तो हंगामा सा मच गया।

पोस्ट बाहियात है; आगे से ऐसी पोस्ट का सामूहिक बहिष्कार हो; ऐसे विचारों के लिए अलग से ब्लाग बनाने तक का सुझाव दिया गया; अलग से पोस्ट तक लिख डाली गई, क्या वाकई इतनी हंगामी पोस्ट थी? एक साहब ने तो अपनी पोस्ट के द्वारा हमारी नीयत पर सवाल उठा दिये।

यह बात एकदम सही है कि यह ब्लाग सामुदायिक ब्लाग है और सार्थक चर्चा करता है। हम भी इसी कारण से यहाँ आये थे। रही बात अपनी पोस्ट पर किसी तरह की माफी माँगने की तो किसी तरह की गलत बात नहीं कही है और न ही महिला को अपमानित किया है। इस दृष्टि से माफी माँगने का सवाल ही नहीं, हाँ यदि ब्लाग के सूत्रधार कहें तो अपने आपको बापस कर सकते हैं या फिर वो चाहें तो हमारी सहभागिता को समाप्त कर दें। हमें किसी तरह की कोई आपत्ति नहीं।

रही बात हमारी समझ को लेकर तो एक बात स्पष्ट कर दें कि जो व्यक्ति नारी का सम्मान नहीं कर सकता उसे अपने मनुष्य कहलाने के बारे में सोचना होगा। महिलाओं की प्रशंसा में कुछ कह देना ही यदि स्त्री का सम्मान है तो हम उसे गलत मानते हैं। सम्मान, स्नेह दिल से उपजता है, प्रशंसा में दो-चार कविताएँ, कहानियाँ, आलेख लिख देने से नहीं।

जहाँ तक इस पोस्ट को यहाँ लगाने का हमारा मन्तव्य था तो बस इतना कि आज स्त्री-विमर्श को लेकर जिस तरह से पुरुष-विरोध का वातावरण निर्मित है, जिस तरह से एक सशक्त आन्दोलन कुछ उच्च वर्ग की महिलाओं के हाथों में सिमटकर रह गया है, उसको यह बताना था कि हमारे देश में ऐसी भी महिलाएँ हुईं हैं जिन्होंने महिलाओं की दशा को सुधारने का कार्य किया और आज उन्हें कितने लोग जानते हैं?

जहाँ तक बात है कि संघर्ष सभी के लिए चल रहा है तो क्या इस बात का कोई जवाब देगा (क्षमा करिएगा, सवाल नहीं पूछना है) जवाब नहीं, अपने मन में झाँक कर देखिए और अपने से पूछिए कि बाँदा की सम्पतपाल को जब नक्सली होने का आरोप लगाकर सताया जाने लगा तो कितनी नारीवादी समर्थक महिलाओं ने उसका साथ दिया?

किसी के ऊपर आरोप लगाना, बिना कुछ सोचे-समझे तोहमत लगा देना, बात की गम्भीरता को समझे बिना अपना निर्णय थोप देना आसान है। पोस्ट की मंशा को समझें या न समझें पर हमारी इस मंशा को समझें कि हमारा उद्देश्य नारी की महत्ता को कम करना नहीं था और न ही किसी महिला को अपमानित करने का।

रही बात आगे के लिए तो हमारा हमेशा से प्रयास रहा है कि सार्थक बहस हो। आज इतने सशक्त आन्दोलन के बाद भी, घर से बाहर निकलने की छूट के बाद भी, शिक्षा के समस्त साधन उपलब्ध होने के बाद भी लड़कियाँ पढ़ क्यों नहीं पा रहीं हैं? और एक वह समय था जब शिक्षा के साधन दुर्लभ थे और महिलाओं को घर से बाहर झाँकने भी नहीं दिया जाता था, ऐसे समय में भी महिलाएँ स्नातक स्तर की शिक्षा ग्रहण कर रहीं थीं। क्या बतायेगा कोई भी पहली महिला स्नातक का नाम? (फिर सवाल, फिर परीक्षा)

बहरहाल टिप्पणियों को देखकर अपने मन्तव्य को स्पष्ट करना जरूरी लगा। आगे ब्लाग सूत्रधार की मर्जी।

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यही पोस्ट चोखेर बाली पर भी है

25 नवंबर 2009

जवाब तो मिला नहीं, मिला नसीहतों का पुलिंदा


कल अपनी पोस्ट में कुछ महिलाओं के नाम देकर बस यही जानना चाहा था कि नारीवाद की समर्थक महिलाएँ इन महिलाओं के बारे में जानतीं हैं या नहीं? यह किसी तरह का टेस्ट नहीं था क्योंकि टेस्ट लेने का हक हमें कदापि नहीं है, होना भी नहीं चाहिए।
इसी पोस्ट को चोखेरबाली ब्लाग पर भी लगाया था, यह सोचकर कि यहाँ नारी समर्थित मुद्दों पर बड़ी ही सार्थक चर्चा होती है तो शायद इन नामों के बारे में और सार्थक जानकारी प्राप्त हो। सोचना मात्र सोचना ही रहा ऊपर से ढेर सारी नसीहतें मिल गईं। नसीहत तो स्त्री-विमर्श को समझने तक की मिल गई। सत्य है इस विषय को समझना होगा क्योंकि स्वयं स्त्री-विमर्श के समर्थक इस विषय को न तो समझ पा रहे हैं और न ही समझा पा रहे हैं तो हम ठहरे मात्र छात्र, कैसे समझ सकते हैं?
एक बात हमें भी ज्ञात है कि आज के तकनीकी भरे दौर में जबकि गूगल महाराज तुरत ही हाजिर हो जाते हैं अपना ज्ञान का पिटारा लेकर, हम कैसे यह गुस्ताखी कर सकते थे कि कोई जानकारी चाहते? एक बात और हमें इन नामों के बारे में जानने की बस इतनी इच्छा थी कि शायद ब्लाग के पढ़े-लिखे लोगों के बीच से कुछ और सामग्री प्राप्त हो जाये, किन्तु खाली हाथ बापस आ गये।
पोस्ट में कहा था कि 25 तारीख को इसका जवाब देंगे, उसका कारण था हमारा बाहर जाना। बहरहाल बाहर जाना हुआ नहीं और पिछली पोस्ट में ऐसा कुछ था नहीं जो 25 तक रुका जाता, (वैसे भी कुछ देर बाद 25 होने वाली ही है) सो उसी पोस्ट के बारे में बताने आ गये।
अब बतायें भी क्या, बताने जैसा कुछ है भी नहीं, आप सभी हमसे ज्यादा समझदार हैं। सभी को पता है इस कारण से मात्र 1 लोगों ने हमारे ब्लाग पर और चोखेरबाली पर 8 लोगों ने आने की और अपने विचार देने की जहमत उठाई, सभी का आभार।
जवाब तो आपको पता ही है, नहीं पता तो गूगल जी हैं ही। पर इस पोस्ट के द्वारा यह तो पता ही लग गया कि इन महिलाओं के बारे में वास्तव में ज्यादा जानकारी हमारे पास नहीं है। यदि इनके स्थान पर किसी अन्य बाला का नाम होता तो उसकी जन्म कुंडली तक बनाकर बता दी जाती पर यहाँ जवाब को इतना गोलमोल दिया गया कि, बस पूछिये नहीं। इतने तरह के जवाब आये कि बहुत पुरानी एक घटना याद आ गई। उससे समझ आया कि यदि आपको किसी सवाल का जवाब नहीं मालूम और आप अपने को अज्ञानी भी सिद्ध नहीं करना चाहते तो किसी और मुद्दे को उठा दीजिए, बस असली मुद्दा गया पीछे और सामने आपकी बात!!!
घटना ऐसी है कि हम एक बार झाँसी रेलवे-स्टेशन पर बैठे हुए भोपाल जाने के लिए ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। उसी समय एक हमउम्र लड़के ने आकर कंधे पर जोर से हाथ मार कर हमें नाम से पुकारा। एकदम से हम हड़बड़ा तो गये किन्तु नाम का सम्बोधन सुन लगा कि कोई परिचित ही है। पलटकर देखा तो एक परिचित चेहरा मुस्कुरा रहा था। याद आया कि यह लड़का हमारे साथ कालेज में पढ़ता था। उस समय उसे बहुत यारी-दोस्ती नहीं थी, इस कारण से चेहरा तो याद आया किन्तु नाम को याद नहीं कर सके।
कालेज से निकले भी लगभग 6 या 7 साल हो गये थे तो आत्मीयता भी झलकी। उसने पूछा कि और क्या हाल है? हमने भी उसी प्रफुल्लता से जवाब दिया, बस मजे में।
फिर उसकी ओर से अगला सवाल धमाके के रूप में आया, पहचाना? हमने भी अतिरिक्त अपनत्व दिखाते हुए कहा अबे! तुम्हें नहीं पहचानेंगे? यही कहकर फँस गये, उसने तुरन्त कहा, बताओ कौन?
अब हम घबराये कि यदि नाम नहीं बता पाते तो अगले को लगेगा कि हम पहचान नहीं पा रहे और उसके जोश का उफान ठंडा हो जायेगा। तुरन्त बुद्धि दौड़ाते हुए अपने स्वर में तल्खी सी लाते हुए हमने कहा, इतनी छोटी बात कर दी, अब हम तुम्हें पहचानते हैं इसके लिए तुम्हारे नाम का सबूत देना होगा? जाओ हम तुम्हें जानते ही नहीं कि तुम कौन हो।
उसने तुरन्त हमारे कंधे पर दोनों हाथ रखे और कहा कि यार तुम्हारी यही अदा तो कातिल है। बुरा न मानो हम तो देख रहे थे कि तुम्हें अभी भी गुस्सा आता है या कि कालेज से निकलते ही शान्त हो गये?
उसके बाद हम दोनों बैठे-बैठे बात करते रहे। लगभग 50 मिनट के बाद हमारी गाड़ी आ गई और तब तक हमें उसका नाम भी याद आ गया। वह हमें ट्रेन में बिठाने आया तो हमने डिब्बे में चढ़ते हुए उसे उसका नाम बताया और अपना दर्शन उड़ेला, अबे दोस्तों के बीच नाम की जरूरत नहीं दिल की जरूरत होती है।

कुछ यही लगा अपनी पोस्ट की महिलाओं के नाम जानने में। पता है नहीं और पिला दिया गया लेक्चर ढेर सारा, हमारे दर्शन की तरह। ये स्थिति तब है जबकि सारे नाम भारतीय महिलाओं के हैं।
कहो तो पूछें फिर एक सवाल? नहीं जी अभी इतनी जल्दी नहीं, फिर कभी। तब तक महिला मोर्चा का गुस्सा थोड़ा ठंडा हो जाये। हाँ उन नामों की जानकारी तो खोजिए ही, अभी हमने बताया नहीं है। गूगल जी हैं न!
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चित्र गूगल से साभार

19 सितंबर 2009

एक बेचारे पर सभी पिल पड़े हैं, ग़लत बात

एक बेचारा शशि थरूर, एक बयान क्या दे दिया सब के सब उसके पीछे हाथ-पैर धोकर या कहें कि नहा धोकर उसके पीछे पड़ गये हैं। पार्टी अलग उसके पीछे पड़ी है, अब तो पड़ना भी चाहिए क्योंकि मैडम भी इकोनोमी क्लास की यात्री हो चुकीं हैं। उन्हें देखादेखी लत पड़ गई सभी को इकोनोमी क्लास में यात्रा करने की। मुश्किल तो ये लगता है कि कहीं अब इकोनोमी क्लास का किराया ही न बढ़ा दिया जाये? (वैसे हमें क्या, अभी तक हवाई जहाज छूकर भी नहीं देखा, बैठना तो दूर। हाँ खिलौने वाले तो बहुत उड़ाये और तोड़े हैं।)

बात हो रही थी शशि थरूर की। उसके बयान पर हंगामा क्यों? वही पुरानी गजल, हंगामा है क्यों बरपा थोड़ी सी जो पी ली है। यहाँ लाल और पीली का सवाल ही नहीं सवाल था जो कहा उस पर हंगामा क्यों? कौन थे शशि थरूर इस चुनाव को जीतने के पहले? कभी सोचा? नहीं न....

यही मुश्किल है इस देश के लोगों के साथ, किसी को दो-चार जगह किसी भी रूप में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर देख क्या लें समझो हो गये पागल उसके पीछे। वही अब खुदा, वही भगवान। कहते हैं न कि जब खुदा मेहरबान तो गधा पहलवान, कुछ ऐसा ही हुआ महाशय के साथ। दो-चार खबरें बनी अन्तरराष्ट्रीय स्तर की और आ गये भारत वर्ष में अपनी झींगा-मुश्ती करने।

पूरा दोष इन जैसे लोगों का नहीं है। हम भी तो उसी के लिए पलक-पाँवड़े बिछा कर तैयार रहते हैं जो अपने धन-बल से रसूख से हमें प्रभावित करता रहता है। हमने चुनाव में शायद ही किसी के विकास कार्यों को देखा हो (अपवाद स्वरूप कुछ उदाहरण यहाँ मौजूद हैं) हमने जब भी चयन करना चाहा तो देखा कि कौन ‘काम’ करवाने में सक्षम है? कौन हमारे दो नम्बर के कामों को एक नम्बर का बनवा देगा? किसके साथ बन्दूक वालों की भीड़ है? किसके पास लग्जरी कार है? किसका नाम किसी भी रूप में सही, ज्यादा से ज्यादा लोग जानते हैं?

अब कोई माने या न माने सत्य यही है। कोई बताये देश के लिए शशि थरूर का योगदान? ऐसे व्यक्ति को जिसने देश के आम आदमी की पीड़ा को नहीं देखा समझा उसे तो इकोनोमी क्लास वाला यदि जानवर लग रहा है तो भी उसका शुक्रिया अदा करो। ये कहो कि उसने आम आदमी को कुछ और नहीं कहा क्योंकि देश की बहुत बड़ी जनसंख्या रेलवे के साधारण श्रेणी के डिब्बे में बैठ कर यात्रा करती है। साधारण श्रेणी का डिब्बा क्या थरूर साहब जानते होंगे?
रही बात आम आदमी के दर्द की तो जो इस देश में जन्में और पीड़ा को सहा, अभावों को देखा, वही करोड़ों के बँगले में रहते हैं, लाखों की कार में यात्रा करते हैं, अरबों रुपये पत्थरों के नाम करते हैं तो विदेश के रंग-ढंग में पले शशि थरूर पर इतना गुस्सा क्यों?

21 अक्टूबर 2008

जाना हो विदेश तो राज की मदद करो

खेल चालू है, एक मदारी शेष या तो उसके जमूरे हैं या फ़िर दर्शक. मदारी अपना मजमा हर दो-चार दिन पर लगाता है और उसके जमूरे उसकी हाँ में हाँ मिलाते दीखते हैं. जमूरे मजा आयेगा, हाँ आयेगा. जमूरे, हाँ उस्ताद, हंगामा मचायेगा............मचाऊंगा. जमूरे, खेल दिखायेगा......हाँ दिखायेगा........इस तरह की आपसी जुगलबंदी होती है और फ़िर शुरू हो जाता है मदारी का डमरू पीटना. डमरू की दम-दम-दम पर जमूरा अपनी हरकतों को दिखाता है......लोगों को हंसाता है, करतब दिखाता है और अपने पेट की आग बुझाने का जुगाड़ करता है. जमूरे के करतब, मदारी का कमाल, उसके खेल मिल कर पूरे माहौल को इस कदर संवेदनशील बना देते हैं कि सभी को उनकी भूख में अपनी भूख दिखाती है और हो जाती है पैसे-रुपये की बरसात.

मदारी-जमूरे के इस खेल पर तो हम-आप-सब ताली बजाते हैं, मजा लेते हैं और चल देते हैं अपनी-अपनी राह पर लेकिन इस खेल पर कोई ताली नहीं बजा रहा है, कोई मजा नहीं ले रहा है, कोई पैसों-रुपयों की बरसात नहीं कर रहा है...............बस खेल खेलने वाले खेल रहे हैं.................परेशान होने वाले परेशान हो रहे हैं. महाराष्ट्र में हो रहे इस हंगामे को और क्या नाम दिया जा सकता है? बेक़सूर परीक्षार्थियों की पिटाई सिर्फ़ इस बात पर कि कोई दूसरे प्रान्त का आदमी उनके हक़ को मार रहा है. उत्तर भारतीय मराठा मानुष के हकों को मार रहे हैं. अभी तक तो लड़ाई इस बात की थी कि यहाँ से गए उत्तर भारतीय मराठी भाषा नहीं बोलते पर अब लड़ाई इस बात की शुरू हो गई है कि उत्तर भारतीय उनकी जगहों पर नौकरी भी करने लगे हैं.

अब इस देश में ऎसी व्यवस्था बना दी जाए जिससे व्यक्ति पाने ही प्रांत में नौकरी कर सके, अपने ही प्रांत में व्यवसाय कर सके, यदि किसी दूसरे राज्य में जाना भी पड़े तो उसके लिए पासपोर्ट और वीसा बनवा कर जाए. वैसे ये बुरा विचार नहीं है, देखा जाए तो राज ठाकरे पूरे देश को इस तरह से बाँट देना चाहते हैं कि आदमी आसानी से अपने पासपोर्ट का प्रयोग कर सके। भाई हम जैसे तमाम होंगे जो पासपोर्ट तो बनवा लेते हैं और फ़िर पूरी जिन्दगी विदेश जाने के सपने देखते रहते हैं. कम से कम हम जैसों का तो विदेश जाने, अपने पासपोर्ट पर विदेश की मुहर लगी देखने का तो सपना पूरा होगा.

इसी के साथ-साथ आजकल भारतीय समाज में अपनी बेटियों की शादी के लिए NRI लड़कों को पहली पसंद के रूप में देखा जाता है, अपने बेटे के NRI के रूप में पहचान बनाने को देख कर गर्व होता है..........जो लोग इसके अतिरिक्त भी किसी न किसी रूप में NRI होने की चाह रखते हैं राज ठाकरे उनकी भी हसरत को पूरा कर रहे हैं।

तो फ़िर हंगामा कैसा? शोर कैसा? उपद्रव कैसा? आइये जो लोग सस्ती दरों पर विदेश की सैर करना चाहते हैं........जो लोग ज्यादा खर्च किए बिना NRI होने का मजा लेना चाहते हैं वे लोग भी इस खेल में जुट जाएँ, जुड़ जाएँ. आज नहीं तो कल ये देश कई हिस्सों में बँटा तो हो सकता है कि हमारा-आपका-हम सबका नाम होगा और विदेश का मजा अलग से मिलेगा......पासपोर्ट का भी उपयोग हो सकेगा.

तो जुड़िये इस महाभियान में (महाप्रयोग की तरह) और सफल कीजिए उत्तर भारतीयों और मराठा मानुष के बीच खोदी जा रही खाई के प्रयास को..........ये सब उस समय हो रहा है जबकि इस देश की प्रथम नागरिक (महामहिम राष्ट्रपति जी) भी एक मराठा मानुष हैं...........जय मराठा, जय उत्तर भारतीय, जय भारत (देश तो अब बाद में ही आता है)