19 June 2010

ब्रा वर्निंग...स्विमिंग पूल में टॉपलेस....ब्रा की मांग...अश्लीलता...फूहड़ता...अशोभनीय



पता नहीं इस विषय पर लिखना कितना सही है और कितना गलत पर आज कई दिनों की ऊहापोह के बाद आज लिखने बैठ ही गये। विषय किसी ऐसे-वैसे मुद्दे पर नहीं एक वस्त्र पर आधारित है और वह वस्त्र भी ऐसा जो महिलाओं के अधोवस्त्र के रूप में जाना जाता है।

कुछ महीनों पहले गुलाबी रंग के महिला अधोवस्त्र ने ब्लॉग पर और समाज में धमाका मचाया था पर हमारा ऐसा कोई इरादा नहीं है। हमारा इस गुलाबी रंग के अति आंतरिक अति गोपनीय, अति व्यक्तिगत अधोवस्त्र से इतर कुछ आंतरिक-कुछ बाह्य, कुछ खुला-कुछ गोपन, कुछ व्यक्तिगत-कुछ ???? जैसी स्थिति वाले वस्त्र ‘ब्रा के बारे में कुछ कम-कुछ ज्यादा कहना है।

इस समय हम एक शोध प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं जो स्त्री-विमर्श पर आधारित है। इसी के अध्ययन के दौरान पढ़ने में आया कि 1970 के आसपास नारीवादी आन्दोलनों की अतिवादिता के चलते अमेरिका में ब्रा वर्निंग जैसी घटनाएँ होने लगीं थीं। महिलाओं ने समानता के अधिकार के लिए सड़कों पर अपनी चोलियों की होली जलानी शुरू कर दी थी। (इस आन्दोलन का विस्तार नहीं, इतना बताना ‘ब्रा’ को चर्चा में शामिल करना था।)

अभी कुछ दिनों पूर्व देश के एक प्रतिष्ठित प्रकाशन से आये उनके समाचार-पत्र से ज्ञात हुआ कि देश के विख्यात लेखक राजकिशोर की एक पुस्तक आई है स्विमिंग पूल पर टॉपलेस। इस पुस्तक के कुछ अंश उस समाचार-पत्र में प्रकाशित थे। चूँकि महिलाओं से सम्बन्धित पुस्तक (टॉपलेस जैसी शब्दावली महिलाओं के सम्बन्ध में ही प्रयोग की जाती सुनी है, इस कारण), राजकिशोर जैसा लेखक और हमारा शोधकार्य का महिलाओं से सम्बन्धित होने के कारण इस अंश को पढ़ने का लोभ संवरण नहीं कर सके।

प्रकाशित अंश में राजकिशोर जी ने महिलाओं की गरमी सम्बन्धी समस्या को बताते हुए लिखा कि कैसे पुरुष तो कमर के ऊपर निर्वस्त्र होकर अपनी गरमी का निदान खोज लेते हैं और बेचारी महिलाएँ ऐसा नहीं कर पातीं हैं। कुछ इसी तरह की समस्या के सम्बन्ध में उन्होंने डेनमार्क के समाचार का जिक्र भी किया है। डेनमार्क में महिलाओं ने स्त्री-पुरुष समानता की दिशा में एक लड़ाई जीतते हुए वहाँ के स्विमिंग पूलों में टॉपलेस होकर तैरने तथा पूल के इर्द-गिर्द टॉपलेस अवस्था में टहलने की स्वतन्त्रता प्राप्त कर ली है। टॉपलेस फ्रंट द्वारा एक वर्ष के अभियान के बाद यह सफलता मिली।

उनके इन्हीं विचारों के कुछ अंश के रूप में यह भी पढ़ने को मिला कि सोशलिस्ट पार्टी के नेता फ्रैंक हेडेगार्ड का कहना है कि मेरी समझ में नहीं आता कि स्त्रियों के स्तनों को लेकर लोग इतने आक्रामक क्यों हो जाते हैं। यह फैसला इस आइडिया को फैलाने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि स्त्रियों की देह केवल यौन की वस्तु नहीं है। इसी के आगे उन्होंने बताया है कि एक नारीवादी महिला ने घोषणा की है कि यह हम तय करेंगे कि हमारे स्तन कब यौनिकता का वहन करेंगे और कब नहीं।

राजकिशोर आगे अपना मत व्यक्त करते हुए लिखते हैं कि दूसरे देशों में शरीर के प्रति ऐसी निर्विकारता आने में पता नहीं कितना समय लगेगा। लेकिन एक बात निश्चित है कि आधुनिक सभ्यता आदिवासी संस्कृति के एक समृद्ध संस्करण की ओर बढ़ रही है। मेरा अपना अनुमान है कि इसके नतीजे सकारात्मक ही होने चाहिए।

इन दो ब्रा सम्बन्धी घटनाओं के पढ़ने के बाद एक लगभग तीन वर्ष पुरानी घटना याद आ गई। हम अपने एक मित्र की दुकान पर खड़े थे। उसकी होजरी की दुकान है जिसमें स्त्री-पुरुषों से सम्बन्धित विभिन्न उत्पाद मिलते हैं। उसी समय दो युवा लड़कियाँ वहाँ आईं और कुछ सामान माँगा। हमारे मित्र ने सामान निकाल कर दे दिया। लड़कियों ने फिर इधर-उधर किया और दूसरी कम्पनी के सामान की माँग की। इत्तेफाक से दुकान पर उन दो लड़कियों, एक हमारे तथा हमारे मित्र और उसके दुकान के एक नौकर के अलावा कोई भी नहीं था। लगभग 15-20 मिनट की मेहनत के बाद भी उन लड़कियों ने कोई सामान नहीं लिया और वे वहाँ से गईं भी नहीं।

हमारा मित्र परेशान, उसका नौकर भी परेशान...तभी हमारा मोबाइल बजा, किनारे जाकर देखा तो उसी दुकान वाले मित्र का फोन। रिसीव करने से पहले कुछ बोलते कि उसने अपने होंठों पर उँगली रखकर फोन सुनने का इशारा किया। हमने आश्चर्य से फोन रिसीव किया तो उसी मित्र की आवाज आई कुमारेन्द्र तुम दो-चार मिनट में आओ।

हम कुछ समझे नहीं, पर दोस्त की बात थी सो वहीं से आवाज लगाई कि एक काम है दस मिनट में आते हैं। इधर-उधर घूमकर लगभग पाँच मिनट बाद दुकान पहुँचे। देखा दोनों लड़कियाँ गायब और हमारे मित्र महोदय हँसने में लगे थे। हमने पूछा तो बोला कुछ नहीं यार, इन लड़कियों कोब्रा-पैंटीलेनी थी, तुम्हारे खड़े होने के कारण नहीं माँग रहीं थीं। जबकि वे दोनों लड़कियाँ हमसे किसी भी रूप में परिचित नहीं थीं। हम दोनों फिर बहुत दिनों तक इस घटना को लेकर आपस में चुहलबाजी करते रहे।


(चित्र गूगल छवियों से साभार)

ऊपर पहले बताई दो घटनाओं में पढ़ने के बाद लगा कि आखिर वे दो लड़कियाँ हमारे सामने अपने अधोवस्त्र क्यों नहीं माँग पा रहीं थीं जबकि दुकानवाला भी एक लड़का ही था? इस प्रश्न का उत्तर तो आजतक नहीं खोज सके पर अब एक और प्रश्न खड़ा हो गया कि क्या महिलाओं का यह अधोवस्त्रब्रासेक्स का प्रतीक है? अश्लीलता का प्रतीक है? इसका पुरुष द्वारा उच्चारण करना अथवा पुरुष के सामने इसका दिखना फूहड़ता, असभ्यता है?

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(पूरी पोस्ट अन्त में दिये गये सवालों में ही सिमटी है। बाकी तो सन्दर्भ हैं ‘ब्रा’ की चर्चा पर उठे सवालों के लिए। अन्त में कुछ हल्का-फुल्का हो जायेब्रापर यदि किसी पुरुष का इस वस्त्र पर बोलना अश्लील नहीं हो, फूहड़ नहीं हो। )

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ब्रा के कुछ नये स्वरूप (मजाकिया अंदाज में)

1- गणितीय ब्रा -- एलजेब्रा (algeBRA)
2- चित्रकारी ब्रा -- जेब्रा (zeBRA)
3- अन्तर्राष्ट्रीय ब्रा -- ब्राजील (BRAzil)

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कृपया अन्तिम तीन बिन्दुओं को हल्के-फुल्के अंदाज में ही स्वीकारें।



19 comments:

अक्षय कटोच *** AKSHAY KATOCH said...

Wah!
algeBRA
zeBRA
BRAzil
------
sawal sahi uthaye hain par isi ko apni sankriti kahte hain, par sanskriti khul rahi hai ab.

अक्षय कटोच *** AKSHAY KATOCH said...

Wah!
algeBRA
zeBRA
BRAzil
------
sawal sahi uthaye hain par isi ko apni sankriti kahte hain, par sanskriti khul rahi hai ab.

Anonymous said...

sahi hai,

Anonymous said...

sahi hai,

दीपक 'मशाल' said...

क्या कहूं??? चुप रहना ही ठीक है..

बी एस पाबला said...

शायद यह BRAndy का असर हो लेकिन यही कहना है कि कोई BRAhmin हो ना हो लेकिन इतना BRAin तो होगा कि अक्सर BRAg मारने वाली कॉलेज के किसी BRAnch की BRAid वाली वे लड़कियां BRAcelet पहन कर BRAsh संस्कारों के BRAcket में इतना BRAve नहीं हो पाईं कि BRAird होती भावनायें जाहिर होने दें। कई बार तो पुरानी को ही BRAze कर लिया जाता है।

बहुत हुया, अब BRAke लगानी ही पड़ेगी। चला जाए BRAcken के नीचे।

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

जवाब तो उन लड़कियों के पास ही होगा. पर प्रश्‍न मित्रों के बीच विमर्श के लिए सार्थक है. संदर्भ में आधुनिक सभ्यता आदिवासी संस्कृति के एक समृद्ध संस्करण की ओर बढ़ रही हैइस बात में दम है.

प्रवीण शाह said...

.
.
.
"आखिर वे दो लड़कियाँ हमारे सामने अपने अधोवस्त्र क्यों नहीं माँग पा रहीं थीं जबकि दुकानवाला भी एक लड़का ही था?"

मूर्खों की कमी तो है नहीं हिन्दुस्तान में... वो दोनों भी इसी श्रेणी में आती हैं।

"क्या महिलाओं का यह अधोवस्त्र ‘ब्रा’ सेक्स का प्रतीक है?"

नहीं ! क्या पुरूषों की बनियान-फ्रेंची सेक्स के प्रतीक हैं ।

"अश्लीलता का प्रतीक है?"

फिर नहीं, अन्दरूनी कपड़े तो श्लीलता को बचाते हैं अश्लीलता के प्रतीक कैसे हो सकते हैं ?


"इसका पुरुष द्वारा उच्चारण करना अथवा पुरुष के सामने इसका दिखना फूहड़ता, असभ्यता है ?"

जवाब फिर नहीं है वजह है हमारे समाज में कुछ महिलाओं में आत्मविश्वास की कमी और नैतिकता व संस्कृति के स्वयंभू ठेकेदारों द्वारा फैलाई गई मिथ्या धारणायें... ज्यादा समय नहीं चलेगा यह सब... आज के दौर की नारी और पुरूष अपने अपने शरीर के प्रति कोई हीन भाव न रखते हुऐ सहज रहेंगे।


...

Anonymous said...

BRA = Bhim Rao Ambedkar

Anonymous said...

Bra ka basic mil gaya.

डॉ महेश सिन्हा said...

"आधुनिक सभ्यता आदिवासी संस्कृति के एक समृद्ध संस्करण की ओर बढ़ रही है"
आदिवासियों को यह समस्या नहीं है न इसे नग्नता समझा जाता है न वहाँ कोई तथाकथित सभ्रान्त समाज की दुरभावनाएँ हैं . तो समृद्ध कौन हुआ और आधुनिक कौन ?

Anonymous said...

Bra History - Complete History of Bra, Fashion Invention, Lingerie Evolution

Brassiere : A woman's underbodice worn to support the breasts.
A term used in America from 1907.
In France this garment is called a Soutien-gorge breast supporter.


Years ago, the bra was unknown. In Ancient Rome and Greece, in the third and fourth centuries, women wore simple tunics with no shaping undergarments. This floppy tradition continued on into the twelfth century. Somewhere in the thirteenth or fourteenth century things began to change. A stiff underbodice called a "cotte" was developed and by the fifteenth century it was named a "body" or more appropriately a "pair of bodies" since it was made in two pieces. In Spain they added wire, steel, whalebone, and other forms of reinforcements. It was not a very comfortable garment to wear. Breasts are a defining attribute of all that is a female: timeless icons representing female sexuality and motherhood throughout history. Serving both function and fantasy, the bra is perhaps the most powerful element of women's wardrobe. What other items of clothing inspires such devotion, yearning, and admiration, frustration and delight? The bra has been around in one form or another for centuries. In fact, throughout history, women have used various contraceptions to support and shape their breasts.
In the early part of the seventeenth century, these "iron maidens" became a little softer and more comfortable to wear, and they began to take the shape of corsets.
Even though the profession of tailoring was not confined to one sex or the other, most women's clothes were made by women. Except of course for the corset. The excuse was that the strength and skill needed to cut such garments was beyond the capabilities of mere women!

Anonymous said...

The popularity of such body shaping garments rose and fell over the ensuing centuries depending on the general moral attitudes of the times. Somewhere in the 1850's another item was added to the lady's wardrobe. It was a corset cover. It is unclear whether this was designed to protect the corset from the dress or protect the dress from the corset. This item eventually became known as a 'camisole', from the Arabic Kamis, meaning under tunic.

Anonymous said...

The women of 1901 to 1910 took on the look of being mono-bosomed. It was not considered polite to even suggest that she might have two breasts below her clothing.

About 1908, the bra took on its supporting role. Contrary to some popular beliefs, the bra was not invented by the German named Otto Titzling, but rather it came about through the efforts of the French seamstress and corsetiere Hermione Cadolle, Paul Poiret, and an American described as 'Lucile'

Anonymous said...

In 1913, a New York lady by the name of Mary Phelps Jacobs was preparing to go to a dance. She disliked the tight and restrictive corsets of the day so she used two handkerchiefs, and a pink ribbon to design the first model of what was to become the modern bra. She patented the design in 1914 under the name of Caresse Crosby. Due to poor marketing or other causes, the product didn't sell well, so she sold her patent rights to Warner Brothers Corset Company for $1500. Today the patent is worth at least $15,000,000.

Anonymous said...

http://www.google.co.in/search?sourceid=navclient&ie=UTF-8&rlz=1T4GGLL_enIN331IN331&q=bra+photos+

enjoy

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

मैं भी चुप रहूँगा।
--------
भविष्य बताने वाली घोड़ी।
खेतों में लहराएँगी ब्लॉग की फसलें।

Shah Nawaz said...

क्या लिखूं, चुप रहना ही बेहतर है. :-)


आप पढ़िए:

चर्चा-ए-ब्लॉगवाणी

चर्चा-ए-ब्लॉगवाणी
बड़ी दूर तक गया।
लगता है जैसे अपना
कोई छूट सा गया।

कल 'ख्वाहिशे ऐसी' ने
ख्वाहिश छीन ली सबकी।
लेख मेरा हॉट होगा
दे दूंगा सबको पटकी।

सपना हमारा आज
फिर यह टूट गया है।
उदास हैं हम
मौका हमसे छूट गया है..........





पूरी हास्य-कविता पढने के लिए निम्न लिंक पर चटका लगाएं:

http://premras.blogspot.com

रजनी मल्होत्रा नैय्यर said...

सारा दोष पिछड़े और संकुचित मानसिकता
का है वो स्त्रियों में हो या पुरुष में ...