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15 मार्च 2025

दस पृष्ठ की पुस्तक पढ़ने में लगेंगे लगभग बीस करोड़ वर्ष





जो चित्र आप इस पोस्ट में देख रहे हैं, वे एक पुस्तक के हैं. यह एक ऐसी पुस्तक है जिसके बारे में अकाट्य तथ्य है कि कोई भी इंसान अपनी पूरी ज़िंदगी में इसे पूरा नहीं पढ़ सकता है. ये बात अपने आपमें एक आश्चर्य है और उससे बड़ा आश्चर्य ये है कि इस पुस्तक में मात्र 10 पृष्ठ हैं. आपको भी ये जानकार निश्चित ही आश्चर्य हुआ होगा.

 

यह कोई आश्चर्य नहीं, कोई काल्पनिकता नहीं, कोई जादू नहीं और न ही किसी और दुनिया की बात है. सन 1960 में फ्रेंच लेखक रेयमों क्वेनो (Raymond Queneau) ने दुनिया की सबसे कम पृष्ठ की मगर सबसे लम्बी पुस्तक इस संसार के सामने प्रस्तुत की. इस पुस्तक का नाम है Cent Mille Milliards De Poèmes अर्थात एक लाख अरब कविताएँ. मात्र दस पृष्ठों की इस पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ पर एक सॉनेट (Sonnet) छपा हुआ है. ये जानकर तो और भी अचम्भा लगा होगा कि मात्र दस सॉनेट को पूरी ज़िन्दगी में नहीं पढ़ा जा सकता. दरअसल सॉनेट की पंक्तियाँ एक ही तुकबंदी पर बनी हुई हैं और इसकी प्रत्येक पंक्ति को एक पट्टी (स्ट्रिप) में छापा गया है. ऐसा होने के कारण पुस्तक का पाठक अलग-अलग सॉनेट की पंक्तियों को आपस में मिलाकर नई कविताएँ बना सकते हैं.

 

पुस्तक की इस अनोखी संरचना के कारण कविता के कुल संभावित संयोजनों की संख्या 10¹⁴ यानी सौ लाख करोड़ (100 ट्रिलियन) बनती है. इसका सीधा सा अर्थ है कि इस पुस्तक में सौ लाख करोड़ अलग-अलग कविताएँ हैं. निश्चित है कि इतनी सारी सम्भावित कविताओं को पढ़ना किसी भी इंसान के लिए नामुमकिन है. यदि कोई व्यक्ति लगातार बिना खाए-पिए, सोए या कुछ और पढ़े बिना केवल यही पुस्तक पढ़ता रहे तब भी उसे सारी कविताएँ पढ़ने में लाखों साल लग जाएँगे. खुद क्वेनो ने कहा था कि अगर एक कविता पढ़ने में लगभग 45 सेकंड और अगली कविता तैयार करने में 15 सेकंड लगते हैं तो सारी संभावित कविताएँ पढ़ने में लगभग 20 करोड़ साल लगेंगे.

 

पुस्तक का मूल फ्रेंच संस्करण रॉबर्ट मैसिन द्वारा डिज़ाइन किया गया था. अंग्रेजी में दो पूर्ण अनुवाद प्रकाशित किए गए हैं जो जॉन क्रॉम्बी और स्टेनली चैपमैन द्वारा किए गए हैं. 1997 में एक फ्रांसीसी अदालत के फैसले ने क्यूनेउ एस्टेट और गैलिमार्ड प्रकाशन के विशेष नैतिक अधिकार का हवाला देते हुए इंटरनेट पर मूल कविता के प्रकाशन को गैरकानूनी घोषित कर दिया था.

 

इस पुस्तक का वीडियो यहाँ क्लिक करके देखा जा सकता है.  


उक्त जानकारी इंटरनेट, सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफ़ॉर्म से ली गई है. सभी का आभार.


14 दिसंबर 2020

स्याही की नमी में शब्द नहीं जीवन उभरता है, स्मृतियाँ बिखरती हैं

एक दौर था जबकि सुलेख पर बहुत ध्यान दिया जाता था. अब एक दौर ऐसा आया है जबकि लिखने पर ही बहुत ध्यान नहीं दिया जाता है. जो पीढ़ी अपने अनुभवों को लेकर आई है वह भी कंप्यूटर की चपेट में आ चुकी है, नई पीढ़ी तो कम्प्यूटर पर ही पैदा हुई है. ऐसे में लिखने-लिखाने, लेखन आदि की बात उसके लिए एकदम से बेवकूफी वाली बातें हैं. इस बेवकूफी भरी बातों के बीच यदि खुद को गंवार साबित करना है तो किसी भी स्टेशनरी की दुकान पर जाकर फाउंटेन पेन माँग लीजिये. दुकान वाला ऐसे देखता है जैसे मंगल पर भेजे गए अंतरिक्ष यान पर बैठ कर कोई प्राणी धरती पर आ गया है. इसमें भी और अजूबा बनने वाली स्थिति वह होती है जबकि आप उस दुकान वाले से फाउंटेन पेन में भरने के लिए स्याही माँगिए. मंगल ग्रह से आने के बजाय वह आपको न जाने कौन से अजीब से ग्रह से आया हुआ घोषित कर दे. आज के समय में बहुतेरे लोगों के लिए, खासतौर से वे लोग जिनके लिए लिखना बहुत बड़ी मशक्कत की विषय-वस्तु है उनके लिए फाउंटेन पेन, स्याही आदि चीजें अजूबा ही हैं.


इस अजूबी दुनिया में अभी भी बहुत से प्राणी ऐसे हैं जो खुद को इस पुरातन समाज से जोड़े रखने में खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं. ऐसे लोगों के लिए लिखना आज भी एक धर्म है, एक पावन कृत्य है, उनकी पूजा है. उनके लिए कम्प्यूटर का इस्तेमाल आधुनिक जीवन-शैली के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना है मगर लिखना उनके लिए जीवन है. इस जीवन को एक-एक साँस उनके शब्दों से मिलती है. इस जीवन की धड़कन आज भी की-बोर्ड से नहीं बल्कि फाउंटेन पेन से चलती है. ऐसे लोगों के लेखन शौक की देह में रक्त का प्रवाह उसी स्याही का होता है जो कागज़ पर शब्द बनकर उतरती है. आज की उस पीढ़ी के लिए जो की-बोर्ड की दुनिया में, मोबाइल की टच स्क्रीन के संसार में खो चुकी है, ऐसे लोग भले ही अजूब हों मगर ऐसे लोगों ने ही अपनी ज़िन्दगी को असलियत में जिया है, आज भी उसी का सुख उठा रहे हैं.




पठन-पाठन करने वालों के लिए, लिखने के शौक़ीन लोगों के लिए कागज, पेन, स्याही जैसा सुख कहीं और नहीं है. उनके सामने, उनकी मेज पर भले ही उत्तम दर्जे के कम्प्यूटर, मोबाइल क्यों न मौजूद हों मगर उनके लेखन का चरम तभी पूर्ण होता है जबकि हाथ में कलम हो और हथेलियों के नीचे कागज़. स्याही की नमी में उभरते शब्दों में कोई रचना नहीं बल्कि ऐसे लोगों का जीवन उभरता है, उनके अनुभव उभरते हैं, उनकी स्मृतियाँ बिखरती हैं. इस सुख का अनुभव आज की पीढ़ी शायद ही कभी कर सके.


एक निवेदन पेन, कागज, स्याही के शौकीनों से कि वे अपने इस शौक को, अपनी इस जीवन-शैली को अपनी आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित करने का प्रयास करें. इस सुख को उनकी धड़कनों में, उनकी साँसों में, उनके रक्त-प्रवाह में समाहित करने की चेष्टा करें. 


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वंदेमातरम्

11 सितंबर 2011

ओ दइया..जो तो कांग्रेस को झन्डा है..!!!



अन्ना की आंधी में जिस समय पूरा देश बहा जा रहा था उस समय इस पोस्ट को लगाना बेहतर नहीं समझा था। इस पोस्ट में अन्ना या उनकी टीम के प्रति किसी प्रकार की विरोधी बातें नहीं हैं वरन् उस आन्दोलन जैसे परिदृश्य में एक छोटी सी बालिका के भावों का सम्मिश्रण है।

सम्पूर्ण देश की तरह उरई में भी अन्ना के स्वर से स्वर मिला कर नगरवासी अपनी भूमिका का निर्वाह कर रहे थे। अनशन समाप्ति वाले दिन भी सभी के चेहरे पर एक प्रकार की खुशी, एक अलग तरह का उत्साह देखने को मिल रहा था। क्या बच्चे, क्या जवान और क्या बुजुर्ग सभी अपनी ही धुन में मस्त थे। उरई में लगातार बारह दिनों से चल रहे अनशन, धरने के समाप्त होने के समय गांधी चबूतरे पर सभी उत्साहीजन एकत्र होकर आगे की रणनीति पर विचार करने के साथ-साथ एक दूसरे को बधाइयां दे रहे थे, मुंह मीठा करवा रहे थे।

उत्साह में तिरंगा समान को छू रहा था। बच्चे भी अपनी लम्बाई से दो-चार गुने लम्बे झंडे लेकर उत्साह में झूम रहे थे। चार बच्चे ऐसे थे जो पहले दिन से ही बराबर धरनास्थल पर रहते थे और पूरे जोश के साथ अपनी उपस्थिति को दर्ज करवाते थे। उनकी उम्र में सम्भवतः बच्चों को पता ही नहीं होता है कि धरना क्या है, अनशन क्यों किया जाता है, भ्रष्टाचार क्या है, अन्ना और सरकार के बीच का टकराव क्या है पर फिर भी वे चारों बच्चे अपने पूर्ण भोलेपन के साथ हमारे आन्दोलन का हिस्सा बनते।

उनकी मासूमियत का दृश्य इस आन्दोलन के अन्तिम दिन दिखा। खुशी से झूमते लोगों के साथ नाचते-थिरकते बच्चों के साथ उछलती-कूदती बच्ची एकाएक चिल्ला पड़ती है-‘‘हाय दइया.........।’’ हम लोगों ने घबराकर, चौंककर उसकी तरफ देखा। उसकी पूरी बात को सुनकर एकदम से हंसी छूट गई। उस बच्ची ने अपने हाथ में पकड़ा हुआ झंडा एकदम छोड़कर चिल्लाई-‘‘हाय दइया, जो तो कांग्रेस को झंडा है, जो तिरंगा नईंयां।’’

दरअसल उसके हाथ में जो तिरंगा था उसमें सफेद पट्टी में अशोक चक्र नहीं बना हुआ था और उस मासूम को तो यही पता था कि जिस तिरंगे की सफेद पट्टी में नीला अशोक चक्र बना हो वही तिरंगा ध्वज है। उसको समझाकर उसके हाथों में उस तिरंगे को थमाया और वह बच्ची भी बात को समझकर पुनः उसी जोश में भारत माता की जय, इंकलाब जिन्दाबाद करने में अपने साथियों के साथ लग गई। इधर हम मित्र इस बात पर विचार करने लगे कि यदि बच्चों में राजनैतिक दलों के प्रति इस तरह की भावना है तो अब वाकई देश में राजनैतिक सुधारों की आवश्यकता है; घनघोर आवश्यकता है।


08 दिसंबर 2010

मां की जयकार, ख्वाजा का दरवार और अंडों का व्यापार


हमारे लिए कितना आसान होता है किसी भी बात पर विवाद पैदा कर देना। कभी हम विवाद पैदा करते हैं धर्म के नाम पर तो कभी क्षेत्र के नाम पर। कभी हमारा विवाद बहुत ही छोटी-छोटी बातों पर होता है। कभी तो ऐसी बातों पर जिनका कोई आधार ही नहीं होता है।

व्यवसाय के क्षेत्र में भी विवाद देखने को मिलते हैं तो इसी क्षेत्र में समन्वय की भावना दिखाई देती है। हम अकसर कहते भी हैं कि व्यवसाय करने वाला हमेशा अपना लाभ देखता है और इसी लाभ के लिए वह समन्वय की भावना को अपनाये रखता है।

व्यावसायिक रूप में इस समन्वय की भावना को हमने अभी एक-दो दिनों पूर्व देखा। समन्वय की यह भावना हमने अद्भुत रूप में देखी। दो-चार दिनों पूर्व एक कार्यक्रम के सिलसिले में बाहर जाना हुआ। वहां से लौटते हुए रास्ते में एक हाथ ठेला पर हमारी निगाह गई।

जैसा कि लेखक होने के कारण साथ ही साथ मीडिया से जुड़े होने के कारण बाल की खाल निकालने की कोशिश करते रहते हैं। इसके अलावा छीछालेदर रस की व्याख्या करते रहने के कारण भी राह चलते, बात करते हुए, इधर-उधर आते जाते समय ऐसी बातों पर अपनी निगाह जरूर दौड़ा लेते हैं।

इस कारण से भी इस हाथ ठेला पर टंगा बोर्ड और उस बोर्ड पर लिखी इबारत देखकर मजा आ गया। मजा इस रूप में आया कि एक कम पढ़े-लिखे व्यक्ति ने किस तरह से अपने दिमाग का इस्तेमाल किया और किसी न किसी रूप में पढ़े-लिखों को बेवकूफ बना रहा है।

चित्र गूगल छवियों से साभार

वह व्यक्ति अपने हाथ ठेला में अंडे बेच रहा था। अंडे बेचना कोई विशेष समन्वय बनाने वाली बात तो हुई नहीं। ऑमलेट भी बना रहा था, उबले अंडे भी बेच रहा था, कच्चे भी बेच रहा था, भुजिया भी बना रहा था और भी कई तरह से अंडों को बेच रहा था। अंडे बेचना कोई विशेष बात तो हुई नहीं और किसी विशेष तरह से भी बेचना भी कोई खास बात नहीं हुई।

खास बात तो यह लगी कि उसके हाथ ठेले पर टंगे बोर्ड पर एक ओर लिखा था मां रतनगढ़ वाली की जय और दूसरी ओर टंगे बोर्ड पर लिखा दिखा ख्वाजा पीर नवाज

इसमें शायद कुछ विशेष न दिख रहा हो किन्तु समझने की बात यह है कि हाथ ठेले वाला बेच रहा था अंडे और बोर्ड पर जो लिखा था वह आपको बता ही चुके हैं। देखने समझने की बात है कि उसके हाथ ठेले पर हिन्दू-मुस्लिम दोनों ही समुदाय के लोग अंडे खाने आते होंगे किन्तु किसी ने भी इस पर आपत्ति नहीं की कि अंडे वाले के हाथ ठेले पर मां रतनगढ़ वाली की जय और ख्वाजा पीर नवाज लिखा हुआ है।

हमारा मकसद इस पोस्ट को लगाने का यह नहीं था कि इसी बात पर विवाद होकर उस अंडे वाले का व्यवसाय बन्द करवा दिया जाये। आप स्वयं अनुमान लगाइये कि जरा-जरा सी बात पर विवाद पैदा करने वाले यहां शान्ति धारण कैसे रखे रहे।

हम तो देखकर चले आये और लिख बैठे एक पोस्ट मां की जयकार, ख्वाजा का दरवार और अंडों का व्यापार

चित्र गूगल छवियों से इस कारण से लेना पडा क्योंकि उस समय अपना कैमरा चालू कर पाने के कारण उस हाथ ठेले वाले की फोटो ले सके

31 अक्टूबर 2010

15 जून 2010

प्रधानमंत्री कार्यालय में हिन्दी की हालत भी देख लें....वाह! वाह!

पी एम् कार्यालय में पढ़ी जाने वालीं पत्रिकाओं और समाचार पत्रों की स्थिति के बारे में आज एक ब्लॉग में देखा साथ में हिन्दी भाषा की पत्र पत्रिकाओं की हालत (संख्या के आधार पर) देखी तो सोचा कि आपके साथ इस स्थिति को बाँट लें

ये जानकारी सूचना अधिकार से मिली है....

सभी चित्र उसी ब्लॉग से साभार लिए हैं..... सूचना एक्सप्रेस नामक इस ब्लॉग का इस सूचना से सम्बंधित लिंक नीचे है

यहाँ क्लिक करके आप सूचना देख सकते हैं







पत्रिकाओं की 45 की संख्या में हिन्दी की पत्रिकाएं सिर्फ 02 ==== ये हास्यास्पद है या नहीं पता नहीं.....

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समाचर पत्र जरूर सुखद स्थिति में हैं.....कुल 43 की संख्या में से 10 हिन्दी भाषी हैं.....ताली बजाओ...
ये पी एम् कार्यालय की हालत है....हिन्दी भाषा के प्रति...
जय हो....


31 मार्च 2010

डॉलर के ऊपर लिखी है पूरी कहानी, आप भी देखिये और गवाह बनिए


एक मेल मिली और मेल में मिली कुछ इतिहासपरक जानकारी, साथ में ये चित्रात्मक जानकारी।
20 डॉलर (नया) के इस कागज़ के टुकडे में क्या छिपा है, आप भी देखिये।

1) इसको इस तरह से मोड़िये....




2) पलट कर मोड़ने पर इस आकार में ये छवि दिखती है,
जो पेंटागन हमले का चित्र बनाती है.....





3) इस मोड़ को यदि पलट कर देखा जाए तो आभास ट्विन्स टॉवर का होता है....




4) अब इसी का एक और पहलू,,,,,,,,,,,
इसको कई फोल्ड के द्वारा देखा जाए तो देखिये क्या दीखता है??????

O S A M A






इन चित्रों को (यदि ऐसा ही है तो) देखने पर जो क्रम बनता है वो

पहला है पेंटागन हमले का
दूसरा है ट्विन्स टॉवर की तबाही का
तीसरा...............OSAMA????


एक और तथ्य इसमें छिपा है................... 9+11 = 20

(पेंटागन और ट्विन्स टॉवर पर हमला 9/11 ही कहलाता है)

सोचिये और विचार करिए, यदि ऐसा होता है तो आप भी इस तथ्य के पूर्व में जानने वालों में से होंगे।


14 मार्च 2010

अंधाधुंध लालच में भागने का दुष्परिणाम है ये सब

बाबा और महिलाएँ, मौलाना और महिलाएँ, धर्मगुरु और स्त्रियाँ.... ये किसी तरह का समीकरण नहीं वरन् वर्तमान में समाज में व्याप्त स्थिति है। पिछले कुछ दिनों से किसी ढोंगी बाबा और उसके चंगुल में फँसी अनेक लड़कियों की कहानी, किसी धर्मगुरु द्वारा महिलाओं को बच्चे ही पैदा करने की सलाह देना....ये सब मीडिया में बड़ी ही तेजी से आ रहा है।



इस तरह की स्थितियाँ आज ही समाज में सामने नहीं आई हैं बल्कि देखा जाये तो इस तरह की हरकतें हमेशा से किसी न किसी रूप में हमारे आसपास घटित होती रही हैं। किसी लड़की को नौकरी का झाँसा देकर भगाने की घटना, किसी युवती को शादी का लालच देकर उसका शारीरिक शोषण करने की घटना, किसी को रोजगार का लालच दिखाकर उसके साथ छल करना आदि-आदि हमें आये दिन देखने को मिलता रहा है।

इस तरह की घटनाओं के घटित हो जाने के बाद हम और हमारा समाज उसका पोस्टमार्टम करने में लग जाता है। इन घटनाओं में अपराध करने वाले को ही सबसे अधिक जिम्मेवार ठहराया जाता है। क्या वाकई सिर्फ और सिर्फ अपराध करने वाला अथवा इस तरह की हरकतों को अंजाम देने वाला ही जिम्मेवार होता है?

हमें यह देखना होगा कि घटना किसके साथ घटित हो रही है। यदि कोई नादान है अथवा समझदार नहीं है तब तो इस तरह की घटनाओं के लिए अपराध करने वाले को अपराधी करार दिया जाये किन्तु यदि जिसके साथ इस तरह की घटनाएँ घटित हों और वो पूर्ण रूप से समझदार हो तब?

इसे इस रूप में समझा जा सकता है कि आये दिन हम देखते हैं कि किसी न किसी बाबा के द्वारा महिलाओं को ठग कर उनका शारीरिक शोषण कर लिया जाता है। जैसे वर्तमान में एक ढोंगी बाबा के सेक्स रैकेट में 2000 लड़कियों के शामिल होने की आशंका जताई गई है। आप स्वयं आकलन करिए कि क्या किसी भी बाबा के लिए इतनी बड़ी संख्या में महिलाओं को बरगलाया जा सकता है? किसी प्रकार की जोरजबदस्ती से सेक्स के लिए मजबूर किया जा सकता है? हाँ, इस तरह की लड़कियों की संख्या कुछ दहाई के अंकों में हो तो आसानी से समझ में आता है किन्तु 2000 की संख्या....!!!

इसी तरह नौकरी का लालच अथवा शादी का झाँसा देना क्या वाकई बहुत ही आसान है? यदि किसी के द्वारा इस प्रकार के प्रलोभन दिये जाने की घटनाओं से कोई लड़का अथवा लड़की फँस रहे हैं तो सबसे अधिक अपराधी वही लड़के-लड़कियाँ हैं। ऐसी शिक्षा से क्या फायदा जो किसी के झाँसे में फँसने को मजबूर कर दे?

समझना होगा कि समाज का ढाँचा कैसा है और हम कैसा बनाना चाहते हैं? समाज में ढोंग के द्वारा पढ़े-लिखे लोगों को अपना शिकार बना लेने की घटनाएँ साबित करती हैं कि हम साक्षर भले ही हो गये हों किन्तु अभी भी शिक्षित नहीं हो सके हैं।

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चित्र गूगल छवियों से साभार

05 नवंबर 2009

इन चित्रों को जरूर देखिएगा - आश्चर्यजनक हैं.....

इस पोस्ट में कुछ चित्र हैं आपके दर्शनों के लिए।
हमारी एक परिचित हैं अंजलि दीवान जीशिमला, हिमाचल प्रदेश में रहतीं हैं और शिमला में ही एक डिग्री कॉलेज में अध्यापन कार्य से जुड़ीं हैं
उन्हीं के द्वारा समय-समय पर मेल के द्वारा हमें बड़ी ही सुंदर-सुंदर तस्वीरें भेजी जातीं हैं। पिछले दिनों उनकी तरफ़ से बहुत से चित्र मिले। इन चित्रों में एक व्यक्ति को अदृश्य रूप में दिखाया गया हैये किसी ट्रिक फोटोग्राफी का कमाल नहीं है ही किसी तरह की कलावाजीये पेंटिंग का एक नायब नमूना है
आप भी आनंद लें कुछ चित्रों का, विशेष रूप से चित्र 4 तथा चित्र 5 का

(चित्र 1)

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(चित्र 2)

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(चित्र 3)
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(चित्र 4)
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(चित्र 5)

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कहिये आनंद आया? धन्यवाद अंजलि जी को.............

22 अक्टूबर 2009

मंहगाई, मंदी के कथित दौर में इस रोजगार की तरफ भी ध्यान दिया जाये

यह आश्चर्यजनक हो भी सकता है और नहीं भी; यह विश्वास करने योग्य हो भी सकता है और नहीं भी पर आश्चर्यजनक भी है और विश्वास करने लायक भी। पहले आप लोगों के सामने स्पष्ट कर दें कि ये जो कुछ भी हमें बताया गया है वह इस शर्त पर कि नाम न छापा जाये, जगह का नाम न छापा जाये कुल मिला कर ये कि पहचान न जाहिर की जाये। हमारा भी उद्देश्य कोई ‘सबसे पहले हमने दिखाया’ की तर्ज पर टी0आर0पी0 को बटोरना नहीं था सो अगले व्यक्ति के विश्वास को पुख्ता रखते हुए सत्यता बताते हैं।
अपने देश के ही एक प्रदेश का रेल्वे स्टेशन है। इस रेल्वे स्टेशन पर एक भिखारी पिछले कई वर्षों से भीख माँग कर अपना और अपने परिवार का गुजारा कर रहा है। उसका परिवार भी है इस बात की जानकारी तो उससे बात करने के दौरान पता चली। अभी तक जिसने भी देखा और जो भी देखता है वह जानता है कि वह भिखारी अकेला ही है।
उस भिखारी के भीख माँगने का अंदाज कोई निराला नहीं है, किसी तरह की कोई अतिविशिष्ट शैली भी नहीं है, शारीरिक विकलांगता भी नहीं है। यदि उस भिखारी के पूरे व्यक्तित्व में विशेष है तो वह है उसका परिवार। आपको बतायें कि उसके परिवार में दो पुत्र और एक पुत्री है। दोनों पुत्र इंजीनियर हैं और बैंगलौर तथा मुम्बई में अपनी-अपनी पत्नियों और बच्चों के साथ रह रहे हैं। पुत्री मेडीकल की पढ़ाई कर रहीं है वो भी परास्नातक की, एम0एस0 की, अभी अविवाहित है।
और भी आश्चर्य वाली बात ये कि जिस शहर में वो भिखारी है उस शहर में उसकी तीन कोठियाँ हैं प्रत्येक की लागत कम से कम पच्चीस-तीस लाख के आसपास होगी।
ऐसा नहीं है कि उसके बच्चों को उसके पेशे के बारे में पता नहीं है, पता है और दोनों पुत्र उसे साथ भी कई बार ले गये पर अपने पेशे के प्रति वफादार भिखारी सप्ताह भर टिकने के बाद घर बापस आ जाता है।
इस पूरे कारोबार का फंडा समझाते हुए उस भिखारी ने बताया कि दिन भर में स्टेशन से कम से कम सौ-सवा सौ ट्रेनें आती-जाती हैं। यदि एक दिन में औसत सौ ट्रेनों में से ही भीख मिले और वो भी प्रति ट्रेन मात्र दस रुपये तो एक दिन में गिरी हालत में एक हजार रुपये पैदा हो जाते हैं। स्टेशन वालों को, सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने वालों को भी खिला-पिला देने के बाद दिन का लगभग आठ सौ-नौ सौ रुपये बच जाता है। इस तरह से महीने भर की आमदनी???? गजब लगभग चौबीस-पच्चीस हजार रुपये!!!!!
अब बताइये इतनी आमदनी प्रतिमाह वाले व्यक्ति के बच्चे इंजीनियर और डाक्टर नहीं बनेंगे तो क्या अपने पिता की तरह भीख माँगेगे? मंहगाई भरे मंदी के कथित दौर में इस रोजगार की तरफ भी ध्यान दिया जाये।