मानसिकता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मानसिकता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

26 अप्रैल 2026

अंत की ओर बढ़ता समाज?

पिता द्वारा अपने बच्चों की हत्या करने के बाद आत्महत्या करने की, माँ द्वारा अपनी संतान को कुँए में फेंकने की, पति-पत्नी द्वारा एक-दूसरे की हत्या करवाने-करने की, प्रेमी-प्रेमिका द्वारा सम्बन्धों में बाधक बनने पर परिजनों की हत्या कर देने की घटनाएँ अब लगभग रोज ही पढ़ने को मिलने लगी हैं. आपराधिक कृत्यों की ये घटनाएँ समाचार मात्र नहीं हैं बल्कि सामाजिक संवेदनाओं के क्षरण का, पारिवारिक मूल्यों के समाप्त होते जाने का संकेत हैं. इस तरह की घटनाएँ बताती हैं कि इंसान का तेजी के साथ मानसिक और सामाजिक क्षरण होता जा रहा है. रक्त-सम्बन्धियों के मध्य जब घृणित अपराधों का ताना-बाना बुना जाने लगता है तो यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारी सामाजिकता में बड़ी गिरावट आ चुकी है. इन घटनाओं को किसी एक व्यक्ति की अथवा व्यक्तियों के समूह की विकृति कह कर नजरंदाज नहीं किया जा सकता है. देखा जाये तो ऐसी घटनाएँ हमारी बदलती जीवनशैली, गिरते नैतिक मूल्यों और बढ़ते अलगाव के कारण उत्पन्न होती हैं.

 

दरअसल आधुनिक जीवन की भागदौड़, आर्थिक प्रतिस्पर्धा ने व्यक्ति को मानसिक दबाव में जकड़ लिया है. इस दबाव ने उसे अकेलेपन का भी एहसास कराया है. ऐसी स्थिति में उसे अनुभव होने लगता है कि उसके प्रति लोगों का, परिवार का, समाज का समर्पण नहीं है. सामान्य रूप में कहा जाये तो वह व्यक्ति स्वयं को सामुदायिक समर्थन-विहीन समझने लगता है. वर्तमान नाभिकीय परिवारों और फ्लैट कल्चर ने व्यक्ति के अकेलेपन को और बढ़ा दिया है. इस एकाकीपन ने मनुष्य को भावनात्मक रूप से कमजोर तो बनाया ही है साथ ही मानसिक अवसाद जैसी स्थिति ने उसे हिंसक भी बना दिया है. इसी अवसाद, हिंसक व्यवहार, अकेलेपन ने परिवारवाद के स्थान पर व्यक्तिवाद को प्रमुखता दी है और इसके चलते नैतिक मूल्यों का पतन चारों ओर दिखाई देने लगा है. न केवल समाज में अपरिचित लोगों के मध्य बल्कि परिवार में भी स्वार्थ और कुत्सित वासनाओं से भरा व्यवहार चलन में आता जा रहा है. रिश्तों की पवित्रता पर व्यक्तिवाद और कामुकता हावी होती जा रही है. यह इस बात का प्रमाण है कि वर्तमान में लोगों ने सही और गलत के बीच का अंतर समझना बंद कर दिया है.

 



सामाजिक अकेलेपन, व्यक्तिवाद, संकुचित सोच के साथ-साथ यदि विस्तीर्ण रूप में विचार करें तो वर्तमान में व्यक्ति के मन-मष्तिष्क को अपने नियंत्रण में करते जा रहे डिजिटल युग, सोशल मीडिया को भी नकारा नहीं जा सकता है. इसके चलते चरित्र निर्माण, नैतिकता, सहानुभूति आदि तो पूरी तरह से रसातल की ओर जा रहे हैं. इस दुनिया ने मनुष्य के भीतर एक तरह की होड़ पैदा करवा दी है. दूसरों की चमक-धमक, उसकी आभासी शानो-शौकत देखने से वह खुद को हीन महसूस करने लगता है. ऐसी कथित हीनभावना के कारण मनुष्य के भीतर धीरे-धीरे ईर्ष्या, क्रोध पनपने लगता है. इस तरह की नकारात्मकता के लिए उत्प्रेरक का कार्य इंटरनेट पर परोसी जा रही हिंसा और अश्लीलता के द्वारा किया जाने लगता है. लगातार आँखों के सामने से गुजरती हिंसा, वीभत्सता ने मानवीय मस्तिष्क को संज्ञा-शून्यता की स्थिति में ला खड़ा किया है. ये सहज रूप में देखने में आया है कि अब दुर्घटना की, अपराध की, मृत्यु की, हिंसा की खबरें विचलित करने के स्थान पर उनको शेयर करने के लिए उकसाती हैं. इस संवेदनहीनता ने मानसिक विकार को जन्म दिया है जो मनुष्य को अपराध के रास्ते पर ले जाता है.

 

नैतिकता, मूल्य, सामाजिकता, पारिवारिकता, हिंसा, अश्लीलता आदि को भले ही एकबारगी सामाजिक विघटन के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया जाये किन्तु यह कहने में भी कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि कानून व्यवस्था के कारण भी आपराधिक प्रवृत्ति वालों के हौसले बुलंद रहते हैं. इन घटनाओं के पार्श्व में न्याय व्यवस्था में होने वाली देरी और कानून के भय का कम होना भी शामिल है. यद्यपि केवल कानून से समाज नहीं सुधर सकता है तथापि इसके लिए समाज को भी बदलना होगा. हमें फिर से उन मूल्यों की ओर लौटना होगा जहाँ इंसान, इंसानियत, रिश्तों, भावनाओं, संवेदनाओं आदि का सम्मान होता था. जहाँ परिवार का अस्तित्व था, रिश्तों में मर्यादा थी, आपस में संवादहीनता नहीं थी, पारिवारिक सदस्य एक दूसरे के साथ भावनात्मक रूप से जुड़े हुए थे.

 

समाज में मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर चर्चा करनी होगी. शिक्षा क्षेत्र में जीवन कौशल, संवेगात्मक बुद्धि पर ध्यान देना होगा जिससे लोग संवेदनशील इंसान भी बन सकें. मन-मष्तिष्क को, ह्रदय को विचलित करने वाली ये घटनाएँ हमारे लिए एक चेतावनी है. यदि हमने अब भी अपने सामाजिक और नैतिक ढाँचे को सुधारने का प्रयास नहीं किया तो रिश्तों की गरिमा पूरी तरह समाप्त हो जाएगी. तकनीक और आधुनिकता के साथ-साथ अपने मूल्यों और संस्कारों को भी विकसित करना होगा. ध्यान रखना होगा कि इस तरह के आपराधिक कृत्यों से केवल एक परिवार का नहीं बल्कि यह एक सभ्यता का, एक समाज का अंत होता है. जीवन की आपाधापी में, कथित आधुनिकता की अंधी दौड़ में भागते हुए हमें एक पल को रुक कर विचार करना होगा कि कहीं हम समाज को उसके अंत की तरफ तो नहीं ले जा रहे? 

 


29 मार्च 2026

समावेशी राष्ट्र हेतु समान नागरिक संहिता

गत माह गुजरात समान नागरिक संहिता को लागू करने वाला दूसरा राज्य बन गया. इससे पूर्व फरवरी 2024 में उत्तराखण्ड ने इसे लागू किया था. यह संहिता मुख्य रूप से विवाह, तलाक और विरासत जैसे व्यक्तिगत मामलों को सभी नागरिकों के लिए एकसमान रूप से प्रभावी करती है. यह किसी राजनैतिक दल विशेष की मानसिकता की उपज नहीं बल्कि देश की आज़ादी के तुरंत बाद ही व्यापक दृष्टिकोण से जन्मी अवधारणा है. नवम्बर 1948 में संविधान सभा की बैठक में समान नागरिक संहिता को लागू किये जाने पर लम्बी बहस चली. बहस में इस्लामिक चिन्तक मोहम्मद इस्माईल, जेड.एच. लारी, हुसैन इमाम, नजीरुद्दीन अहमद सहित अनेक मुस्लिम नेताओं ने अम्बेडकर का विरोध किया था. तब अम्बेडकर ने समान नागरिक संहिता का समर्थन करते हुए कहा था कि देश में एक आपराधिक विधि संहिता है, दंड विधान में एक विधि है, सम्पत्ति हस्तांतरण का एक विधान है. बहस के दौरान जबरदस्त विरोध के बीच मतदान करवाया गया, जिसमें अम्बेडकर के प्रस्ताव को स्वीकार किया गया. समान नागरिक संहिता का विरोध करने वाले मुस्लिम सदस्यों के पराजित होने के पश्चात् संविधान के अनुच्छेद 44 में बहुमत से समान नागरिक संहिता को लागू किये जाने सम्बन्धी विधान लाया गया. इस प्रस्ताव के लाये जाने के बाद भी समान नागरिक संहिता को लागू करने का विचार कुछ वर्षों के लिए इसलिए टाल दिया गया ताकि बँटवारे की त्रासदी झेल रहे मुसलमानों के प्रति सौहार्द्र दर्शाया जा सके. संविधान सभा द्वारा सौहार्द्र दर्शाने के बावजूद मुस्लिम कट्टरता बढ़ती गई, मुस्लिम तुष्टिकरण बढ़ता गया और समान नागरिक संहिता की राह संकीर्ण होती गई. इसी विरोध और कट्टरता के चलते 1972 में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का जन्म हुआ. तबसे यह समान नागरिक संहिता का विरोध करते हुए शरीयत को संविधान और कानून से ऊपर बताता-मानता है.

 



चूँकि समान नागरिक संहिता लागू किये जाने का बिन्दु भाजपा द्वारा उठाया जाता रहा है ऐसे में गैर-भाजपाई राजनैतिक दलों द्वारा इसे राजनैतिक रंग देकर विवादित बना दिया गया है. इन राजनैतिक दलों का आरोप है कि भाजपा द्वारा ध्रुवीकरण के लिए इस विषय को उठाया जाता है. ऐसे आरोपों के बीच यह समझना होगा कि आज़ादी के तुरंत बाद तो भाजपा नहीं थीउस समय हिंदुत्व साम्प्रदायिकता जैसी कोई स्थिति भी नहीं थी तब उस समय संविधान सभा द्वारा समान नागरिक संहिता को लागू करने का विधान क्यों बनाया गया? तब भी मुस्लिम सदस्यों द्वारा इस संहिता का विरोध क्यों किया गयाआखिर सभी नागरिकों के एकसमान अधिकार होने का विरोध क्योंशरीयत की बात करने वाला कट्टरपंथी मुसलमान क्या सभी कार्य शरीयत के अनुसार ही करता हैकिसी मुसलमान द्वारा अपराध किये जाने पर शरीयत के अनुसार उसको कोड़े मारनाहाथ काटनापत्थर मारनाफाँसी पर लटकाना आदि जैसी सजाएँ दी जाती हैंकुरान में बाल विवाह प्रतिबंधित है. उसके अनुसार विवाह केवल बालिग स्त्री-पुरुष के बीच हो सकता है जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अनुसार ख्याल-उल-बलूग अर्थात बाल विवाह का प्रावधान है. कुरान के अनुसार तलाक बिना अदालती हस्तक्षेप के सम्भव नहीं जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अनुसार मुस्लिम मर्द को अपनी मर्जी से तलाक लेने का अधिकार है. ऐसे एक-दो नहीं अनेक उदाहरण हैं जिनके आधार पर न ही शरीयत का सम्पूर्ण पालन होता दिखता है न ही कुरान और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में समन्वय दिखता है. ऐसे में आखिर शरीयत की दुहाई देते हुए समान नागरिक संहिता का विरोध क्यों किया जाता है

 

देखा जाये तो भारतीय लोकतंत्र के विकसित और सशक्त राष्ट्र बनने की प्रक्रिया में समान नागरिक संहिता केवल राजनैतिक मुद्दा नहीं बल्कि सामाजिक न्याय की अनिवार्यता है. भारतीय संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 44 के माध्यम से जिस स्वप्न को नीति निदेशक तत्वों में संजोया था, उसे वर्तमान की कसौटी पर परखने का समय आ गया है. एक देश में नागरिक कानूनों की विविधता न केवल प्रशासनिक जटिलताएँ पैदा करती है, बल्कि यह उस संवैधानिक संकल्प के भी आड़े आती है जो हर नागरिक को कानून के समक्ष बराबरी का अधिकार देता है.

यहाँ समझना होगा की कानूनी समानता के लिए अस्तित्व में आने वाली समान नागरिक संहिता किसी धार्मिक आस्था पर चोट नहीं है, किसी भी व्यक्ति को उसके मजहबी आचरण से विलग करने की नीति नहीं है बल्कि इसके द्वारा मानवाधिकारों की सुरक्षा का, व्यक्तिगत पहचान को पुख्ता करने का कदम है. एक ऐसे देश में जहाँ धार्मिक स्वतंत्रता है, वैचारिक स्वतंत्रता है वहाँ एक संहिता के द्वारा किसी को कैसे प्रतिबंधित किया जा सकता है? समान नागरिक संहिता एक नागरिक के प्रति उसके अधिकार और उसे मिलने वाले न्याय की प्रक्रिया को सार्वभौमिक स्वरूप प्रदान करती है.

 

राष्ट्रीय एकता और अखंडता के दृष्टिकोण से भी कानूनों का यह सरलीकरण आवश्यक है. इससे न केवल नागरिकों के बीच एकसमान अवधारणा कार्य करेगी बल्कि न्यायपालिका के लिए भी वर्षों से लंबित पड़े पारिवारिक विवादों का निपटारा करने में सहजता होगी. बेशक, भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में सर्वसम्मति बनाना एक चुनौती है किन्तु यह समझना भी होगा कि सुधार कभी भी यथास्थितिवाद से नहीं आते. समान नागरिक संहिता वास्तव में आधुनिक और समतामूलक समाज की अवधारणा पुष्ट करती है. इसके लिए हमें संकीर्णता से ऊपर उठकर एक विधान के विचार को धरातल पर उतारना होगा ताकि आने वाली पीढ़ियाँ संगठित और न्यायप्रिय भारत का निर्माण कर सकें.

 

22 मार्च 2026

पानी की बर्बादी को रोकना होगा

मनुष्य के लिए पानी हमेशा से एक महत्वपूर्ण और जीवन-दायक पेय रहा हैये बात हम सभी को अच्छी तरह से ज्ञात है. इसके साथ ही इस बात से भी हम अनभिज्ञ नहीं हैं कि कि जल सभी के जीवित रहने के लिए अनिवार्य है. ऐसा माना जाता है कि मनुष्य बिना भोजन के लगभग दो माह तक जीवित रह सकता है किन्तु बिना पानी के एक सप्ताह भी जीवित रहना मुश्किल है. इधर मानवीय क्रियाकलापों के कारण धरती लगातार पेयजल-विहीन होती जा रही है. जल-संकट को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ की तरफ से विश्व भर में 22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाने की शुरुआत कीजिसकी घोषणा वर्ष 1992 में रियो डि जेनेरियो में आयोजित पर्यावरण तथा विकास का संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (यूएनसीईडी) में की गई. इसके अंतर्गत सर्वप्रथम वर्ष 1993 में 22 मार्च के ही दिन सम्पूर्ण विश्व में जल संरक्षण और रख-रखाव पर जागरुकता लाने का कार्य किया गया. 



पूरी धरती के 70 प्रतिशत भाग में जल होने के बाद भी इसका कुल एक प्रतिशत ही मानवीय आवश्यकताओं के लिये उपयोगी है. आज सभी को जल की उपलब्धता करवाना मुख्य मुद्दा है. आने वाले समय में बिना जल-संरक्षण के ऐसा कर पाना कठिन कार्य होगा. इस दृष्टि से जल संरक्षण भी एक बड़ा मुद्दा है. इसके अलावा शुद्ध पेयजल की आपूर्ति भी एक मुद्दा बना हुआ है क्योंकि धरती के हर नौवें इंसान को ताजा तथा स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है. इसके चलते संक्रमण और अन्य बीमारियों से प्रतिवर्ष 35 लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है. विकासशील देशों में जल से उत्पन्न रोगों को कम करना स्वास्थ्य का एक प्रमुख लक्ष्य है. आज हमारा देश ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व जल-संकट से जूझ रहा है. जल सहयोग के रूप में प्रमुख कार्य पानी के बारे में जागरूकता बढाने और उसकी अहमियत की जानकारी लोगों तक पहुंचाने का होना चाहिए. जल उपयोग में मितव्ययता बरतनी होगी और पानी की बर्बादी को रोकना होगा. इसके अतिरिक्त वर्षा जल के संरक्षण के उपाय खोजने होंगे तथा घरेलू उपयोग में भी जल-संरक्षण के प्रति सचेत होना पड़ेगा. यदि हम आज इसका उपयोग सावधानी एवं किफायत से न करेंगे तो भविष्य में स्थिति अत्यंत ही गंभीर हो सकती है.

अब हालात ऐसे हो गए हैं कि महज कमियाँ निकाल करअव्यवस्थाओं का रोना रोकर इनका समाधान नहीं किया जा सकता है. काफी समय पहले भारत सरकार के सिंचाई एवं विद्युत मंत्रालय के आंकड़ों से ज्ञात हुआ था कि बुन्देलखण्ड में सम्पूर्ण वर्षाजल का लगभग ग्यारह प्रतिशत जल ही उपयोग में लाया जा पाता हैशेष जल बर्बाद हो जाता है. अब ऐसे जल को बचाए जाने की जरूरत है. सरकार के साथ-साथ यहाँ के जनसामान्य को जागरूक होने की आवश्यकता है. कृषि फसलों में ऐसी फसलों का चुनाव करे जिनमें कम से कम पानी की आवश्यकता हो. वर्षाजल के संग्रहण की व्यवस्था भी करनी होगी. पानी की बर्बादी को रोकना होगा. अपने-अपने क्षेत्रों के तालाबोंजलाशयोंकुँओं आदि को गन्दगी सेकूड़ा-करकट से बचाना होगा. जहाँ तक संभव होनए-नए तालाबोंकुँओं आदि का निर्माण भी जनसामान्य को करना चाहिए. इसके अलावा सरकारी स्तर पर बुन्देलखण्ड में क्रेशर परसीमेंट निर्माण कारखानों पर रोक लगाई जानी चाहिए. इससे न केवल जंगल मिट रहे हैंउपजाऊ धरती नष्ट हो रही है वरन अनेकानेक बीमारियों के चलते यहाँ के निवासी भी गंभीर बीमारियों से ग्रसित हो रहे हैं. बुन्देलखण्ड का जल-संकट जितना प्रकृतिजन्य है उससे कहीं अधिक मनुष्यजन्य है. ऐसे में प्रकृति अपने स्तर से जल-संरक्षण कैसे करेगी उससे अधिक महत्त्वपूर्ण ये है कि जनसामान्य उसके संरक्षण में आगे कैसे आयेंगेभविष्य की भयावहता को वर्तमान की भयावहता से देखा-समझा जा सकता है. एक-एक दिन की निष्क्रियता अगली कई-कई पीढ़ियों के दुखद पलों का कारक बनेगी.

14 मार्च 2026

सहयोग, प्रेम-भाव में कमी भी एक समस्या है

इसे वही समझ सकते हैं जो संयुक्त परिवार में रहते हैं या रहे हैं... या फिर जिनके घर में पर्व-त्यौहार-किसी आयोजन में समूचे नाते-रिश्तेदार जुटते हैं... एकसाथ एक ही घर में रहते हैं....

+++++++++++++++

 

सोचिए एक पल को कि घर-परिवार के सब लोग, नाते-रिश्तेदार एकसाथ किसी आयोजन में मिले. पंद्रह-बीस लोगों से घर में चहल-पहल मची है, हल्ला-गुल्ला मचा हुआ है. ऐसे में भोजन के समय चार-चार, पाँच-पाँच लोग सहजता से खाना खाते जा रहे हैं. रसोई में घर की महिलाएँ हँसी-मजाक के साथ सभी को सहजता के साथ भोजन उपलब्ध कराती जा रहीं हैं.

 

किसी दिन इस हँसी-मजाक में, हल्ला-गुल्ला में परिवार में जुटे सभी लोग एकसाथ भोजन करने बैठ जाते हैं, एक-दूसरे के साथ भोजन करने की ललक में. ऐसा होता है बिना किसी पूर्व सूचना के, बिना किसी पूर्व जानकारी के... अचानक से ही. चार-छह लगी थालियों में ही परिवार के कई लोग एकसाथ बैठकर मिलजुल कर भोजन करने लगते हैं. किसी की थाली से सब्जी, किसी की थाली से दाल, किसी की थाली से अचार, किसी की थाली से रोटी, किसी की थाली से रायता.... अब फिर सोचिए कि क्या स्थिति उत्पन्न होगी? भोजन करने वाले तो हँसी-मजाक करते हुए बिना कुछ परवाह किये खाना खाने में लगे हैं तभी अचानक से रसोई से रोटियाँ आने की गति रुक जाती है या कहें कि रोटियों का आना रुक सा जाता है. 

 

ऐसा नहीं है कि रसोई में घर की महिलाएँ रोटियाँ नहीं बना रहीं. ऐसा भी नहीं कि आटा समाप्त हो गया हो. ऐसा भी नहीं कि किसी तरह की कोई समस्या उत्पन्न हो गई हो. इसके बाद भी रोटियों के आने की गति थम गई, रोटियाँ एक-दो, एक-दो करके आने लगीं, बाहर खाने के लिए जुटे सभी लोगों को रोटियों की उपलब्धता सहजता से नहीं हो पा रही. किसी को आधी रोटी मिल रही, किसी को उसी में से एक कौर मिल  रहा, कोई किसी की थाली में आने के पहले ही रोटी का कौर उसके हाथ से खींच ले रहा. इन सबके बीच कोई रोष नहीं, कोई गुस्सा नहीं, कोई गाली-गलौज नहीं बल्कि हँसी-मजाक और बढ़ने लगता है, आपसी प्रेम और नजर आने लगता है.

 

क्यों नहीं कोई व्यक्ति बाहर सड़क पर जाकर कूड़े के ढेर में रोटी तलाशने लगता है? क्यों नहीं रोटी का एक कौर भी न हासिल कर पाने वाला व्यक्ति घर की महिलाओं की बुराई करने लगता है? क्यों नहीं घर का कोई सदस्य नाली से गंदगी निकाल कर रोटी की जगह खाने लगता है? और भी बहुत कुछ क्यों नहीं होता है? फिर सोचिए, ऐसा इसलिए होता है क्योंकि परिवार के सभी सदस्यों में आपस में प्रेम-भाव है, एक-दूसरे के प्रति सम्मान है, एक-दूसरे की स्थिति का भान है. यही नहीं है हम सबमें. समाज में व्यक्तिगत रूप से जो है वो पहले हमारे लिए है. समाज में जो है वो पहले हमें मिले. इस तरह की मानसिकता से न समाज का भला होता है और न ही देश का. कुछ ऐसा ही इस समय दिख रहा है. घर में एक सिलेंडर भरा रखा है मगर एक और मिल जाए. बाकी का क्या ही लिखें. जो युद्ध की माँग करते हैं, सीमा पर जान देने का दम भरते हैं, वे दो-चार रोज की स्थिति में अपनी ही गैस निकाल बैठे.


14 फ़रवरी 2026

देश का ये दुर्भाग्य कब समाप्त होगा?

देश के लोकतंत्र का एक दुर्भाग्य ये रहा कि इसे लोकतंत्र अचानक ही मिल गया, जिसके लिए वह कभी तैयार ही नहीं था. गौर करिए, देश अपनी आज़ादी के ठीक पहले अंग्रेजों का गुलाम था, उसके पहले मुगलों सहित अनेक आक्रमणकारियों, विदेशी आक्रान्ताओं की गुलामी को सहा है. इस स्थिति से पहले भी देश में रियासत, कबीलाई संस्कृति देखने को मिलती थी. लोकतान्त्रिक स्वरूप की अवधारणा आज़ादी से पहले देखने को नहीं मिलती है. (विभिन्न साम्राज्यों की जो भी स्थिति थी वो लोकतान्त्रिक नहीं थी) ऐसे में आज़ादी के बाद भी हम लोग दो मानसिकताओं में जीते रहे, एक मालिक वाली और दूसरी नौकर-दास वाली. ये स्थिति संसद से लेकर निम्न स्तर तक देखने को मिलती है.




संसद की तरफ देखें तो यहाँ भी यही स्थिति दिखाई देती है. किसी और की चर्चा न करते हुए नेता पक्ष नरेन्द्र मोदी और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को ही देखें तो सब साफ़ हो जाता है. राहुल गांधी की पारिवारिक पृष्ठभूमि जिस तरह की रही है वे उसका दृश्य लगभग रोज ही संसद में प्रस्तुत कर देते हैं. सदन को वे अपने घर का आँगन ही समझते हैं. सदन की कार्यवाही के बीच में खड़े होकर चाय पीने लगना, प्रधानमंत्री के गले लग जाना, आन मारना, नॉनसेन्स जैसा शब्द बोलने के बाद भी मुकर जाना, तथ्यात्मक रूप से गलती करना, सदन के नियमों की अवहेलना करना इसका उदाहरण है. पीठासीन अधिकारी को वे अपने घर-परिवार का कोई कर्मी ही समझते हैं तभी आसन को अपने दल का पूर्व सदस्य बताने लगना, बार-बार टोकने के बाद भी विषय पर न बोलना दर्शाता है कि राहुल गांधी सदन को, पीठ को आज भी खुद से नीचे समझते हैं. इसके पीछे वही कबीलाई सोच कि वे किसी रियासत जैसे परिवार से आते हैं, उनके परिवार ने देश को प्रधानमंत्री दिए हैं.


यहाँ देश के प्रधानमंत्री, पक्ष के नेता नरेन्द्र मोदी को भी कटघरे में खड़े करने से मुक्त नहीं किया जा सकता है. जैसा कि पहले बताया कि मलिक और नौकर वाली मानसिकता ही आज भी काम करती है. यदि नेता प्रतिपक्ष मालिक वाली मानसिकता से अपने कृत्य करते हैं तो नेता पक्ष खुद को नौकर वाली स्थिति में दर्शाने से नहीं चूकते हैं. गाहे-बगाहे वे खुद को चाय बेचने वाला, गरीब माँ का बेटा, पिछड़े वर्ग का घोषित कर ही देते हैं. यहाँ सिर्फ एक बड़ा अंतर उनको राहुल गांधी से अलग करता है कि वे सदन का, लोकतंत्र का सम्मान करते हैं; सदन की गरिमा का ध्यान रखते हैं; अपने कृत्य से सदन का-पीठ का अपमान नहीं करते हैं.


बावजूद इसके, कहा जा सकता है कि देश संक्रमणकाल से गुजरने के साथ-साथ दुर्भाग्य के दौर से भी गुजर रहा है जहाँ इसके नागरिकों में समझ विकसित नहीं हो सकी है. आज भी वे सही और गलत का अंतर कर पाने समर्थ नहीं हो सके हैं. आज भी वे एक फोटो, एक वीडियो, एक फाइल के सहारे किसी और के हाथ की कठपुतली बन जाते हैं.


पता नहीं देश का ये दुर्भाग्य कब समाप्त होगा?


25 दिसंबर 2025

स्वतंत्रता के नाम पर अमर्यादित होते युवा

दिन का समय, चलती ट्रेन का डिब्बा, दो विषमलिंगी युवा, बेशर्म-अमर्यादित आचरण, सार्वजनिक रूप से होती अंतरंगता. अभी हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल हुए उन वीडियो ने दिखाया कि किस तरह से देह की माँग और यौनेच्छा की पूर्ति ने पारम्परिक मान्यताओं को ध्वस्त ही कर दिया. चलती ट्रेन के सार्वजनिक कोच में नितांत बेशर्मी के साथ युवाओं की गतिविधियों ने समाज की इस प्रचलित धारणा को और बल दिया कि आज की पीढ़ी संस्कारों, मर्यादा को भूलकर स्वार्थ में लिप्त होती चली जा रही है. इस घटना के पहले भी युवाओं की अंतरंगता सम्बन्धी वीडियो, चित्र सोशल मीडिया पर वायरल होते रहे हैं. इन वीडियो, चित्रों में युवा बदलते रहे, उनके संसर्ग करने के स्थान बदलते रहे मगर सभी में मानसिकता एक ही रही, अपने परिवेश, अपने संस्कार, अपनी मर्यादा का त्याग करना. कॉलेज, लाइब्रेरी, पार्क, लिफ्ट, बाज़ार, पार्किंग आदि-आदि सार्वजनिक स्थल खुलेआम बेशर्मी भरे कृत्यों के गवाह बनने लगे.

 

वैश्वीकरण, आधुनिकता के दौर में ऐसा बहुत पहले से ही मान लिया गया था कि खुद के स्वतंत्र अस्तित्व के लिए युवाओं ने किसी भी तरह के बंधन को मानना बंद कर दिया है. अभिभावकों को एक दोस्त की तरह से मान लेने की अवधारणा ने भी उनके प्रति गम्भीरता का ह्रास करवा ही दिया था. इस तरह की मानसिकता, सोच ने युवाओं को जहाँ आर्थिक स्वतंत्रता प्रदान की, उनको स्वावलम्बी बनाया वहीं उनको उन्मुक्त भी बनाया, उद्दंड भी बनाया. ऐसे उन्मुक्त, उद्दंड युवाओं ने सामाजिक परिदृश्य में सिर्फ और सिर्फ स्वयं का ही अस्तित्व स्वीकारते हुए शेष सभी को नगण्य मान लिया है. इनको न तो उम्र का लिहाज है, न ही रिश्तों का. यही कारण है कि इनके द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर भीड़ की, किसी बुजुर्ग व्यक्ति की परवाह न करते हुए अशालीन ढंग से प्रेमालाप किया जाता है, नशेबाजी की जाती है, स्टंट किये जा रहे हैं अब तो यौन-सम्बन्ध भी बनाये जाने लगे हैं. सड़कों, पार्कों, मॉल, बाजार आदि में एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर घूमने से इतर अब तो एक-दूसरे के साथ चुम्बन लेते हुए भी युवा जोड़े दिख जाना आम हो गया है. उन्मुक्तता, उद्दंडता का आलम ये है कि इनको ये भी परवाह नहीं होती है कि वर्तमान दौर में जगह-जगह लगे सीसीटीवी कैमरों के द्वारा उनके कृत्य रिकॉर्ड हो रहे होंगे. उनको इस बात की भी चिंता नहीं कि आज प्रत्येक हाथ में स्मार्टफोन होने के कारण किसी भी कृत्य की, घटना की रिकॉर्डिंग हो जाना, उसका वायरल हो जाना बहुत सामान्य सी बात हो गई है.

 

ऐसी घटनाओं के पीछे के कारणों को खोजने और उनका समाधान करने पर गम्भीरता से चिंतन करने के बजाय यह कह देना आसान लगता है कि ये सब पश्चिमी सभ्यता का दुष्प्रभाव है, यह सब वैश्वीकरण के कारण हो रहा है. क्या हम सभी ने ऐसी घटनाओं के सामने आने के बाद भी ये विचार किया है कि हम अपने परिवार के किशोरों, युवाओं के कृत्यों, उनके व्यवहार, उनके दोस्तों आदि के बारे में जानने-समझने का प्रयास करें? क्या अपने परिवार के बच्चों के पहनावे, उनकी दिनचर्या आदि में आने वाले बदलावों को लेकर कभी उनसे कोई सवाल किया है? बहुतायत में इनका जवाब न में ही होगा क्योंकि आज बहुतायत परिवारों में बच्चों को समझाने की, उनको संस्कार सिखाने की, उनको मर्यादित आचरण करने की सीख देना लगभग बंद ही हो गया है. आज के आधुनिकता भरे दौर में ऐसा करना दकियानूसी माना जाने लगा है, पिछड़ा माना जाने लगा है और शायद ही कोई परिवार ऐसा होगा को स्वयं को दकियानूसी-पिछड़ा घोषित करवाना चाहेगा.

 

संस्कार सिखाने का तात्पर्य किशोरों, युवाओं को जंजीरों में बाँधना नहीं होता है बल्कि उनको सामाजिकता का ज्ञान देना होता है. उनको मर्यादित बनाने का अर्थ पाषाणकालीन सभ्यता में भेजना नहीं होता बल्कि उम्र-रिश्तों का सम्मान करना सिखाना होता है. शालीन बनाने का तात्पर्य उनको पिछड़ा बनाना नहीं होता बल्कि उचित जीवनशैली का निर्वहन करना बताना होता है. प्रत्येक कार्य को भौतिकता से जोड़ देना, किसी भी तरह के आचरण को स्वतंत्रता समझ लेना, सार्वजनिक रूप से अशालीन हो जाने को आधुनिक मान लेना कदापि उचित सोच नहीं है. यदि इस तरह की सोच पर, ऐसे कृत्यों पर नियंत्रण नहीं लगाया गया, परिवार से ही संस्कारों का बीजारोपण नहीं किया गया तो ऐसी स्थितियों के निकट भविष्य में और भयावह होने में कोई संशय नहीं.


03 दिसंबर 2025

दिव्यांगजनों में विश्वास जगाना होगा

03 दिसम्बर का आना हुआ और शासन-प्रशासन की तरफ से सभी जगह दिव्यांगजनों के लिए अंतरराष्ट्रीय विकलांग (दिव्यांग) दिवस को मनाया गया. इस दिवस को लेकर वैसी चहल-पहल नहीं दिखती जैसी कि अन्य दिवसों को लेकर दिखाई पड़ती है. अभी 01 दिसम्बर को ही एड्स दिवस पर जागरूकता के लिए रैलियाँ निकाली गईं, कई जगह गोष्ठियाँ, प्रदर्शनियाँ आयोजित की गईं थीं वैसा कुछ आज देखने को नहीं मिला. इसके पीछे एक मुख्य वजह जो हमें समझ आती है वो यह कि विकलांगता को लेकर समाज में अभी भी एक तरह की दया का भाव बना हुआ है. यदि इस दया के भाव को समाज के साथ-साथ पारिवारिक रूप में, सहयोगियों में, मित्रों में भी उपस्थित माना जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. ऐसा हम स्वयं व्यक्तिगत रूप से अनुभव करते हैं.  

 



बहरहाल, वर्ष 1976 में संयुक्त राष्ट्र आम सभा द्वारा निर्णय लिया गया कि सन 1981 को विकलांगजनों के अंतरराष्ट्रीय वर्ष के रुप में मनाया जायेगा. इस दिवस का आरम्भ भले ही वर्ष 1981 से कर दिया गया हो मगर सन 1992 से संयुक्त राष्ट्र के द्वारा इसे अंतरराष्ट्रीय रीति-रिवीज़ के रुप में प्रचारित किया जा रहा है. इस दिवस के मनाये जाने का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर दिव्यांगजनों के लिये पुनरुद्धार, रोकथाम, प्रचार और बराबरी के मौकों पर जोर देने के लिये योजना बनाना है. विकलांगों के प्रति सामाजिक कलंक को मिटाने और उनके जीवन के तौर-तरीकों को और बेहतर बनाने के लिये उनके वास्तविक जीवन में बहुत सारी सहायता को लागू करने के द्वारा तथा उनको बढ़ावा देने के लिये साथ ही विकलांग लोगों के बारे में जागरुकता को बढ़ावा देने के लिये इसे सालाना मनाने के लिये इस दिन को खास महत्व दिया जाता है. इसके बाद से ही सन 1992 से इसे पूरी दुनिया में हर साल से लगातार मनाया जा रहा है.

 

इस दिवस को मनाये जाने के बाद भी, देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा विकलांग शब्द को दिव्यांग में परिवर्तित कर देने के बाद भी ऐसे लोगों के प्रति समाज की सोच में बहुत ज्यादा परिवर्तन नहीं हुआ है. आज भी दिव्यांगजनों के प्रति विभेद देखने को मिलता है. समाज के बहुत से क्षेत्रों में उनके साथ आज भी दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है. कई बार उनको उनके अधिकारों से वंचित कर दिया जाता है. आप सब लोगों ने भी महसूस किया होगा और यदि अभी तक ऐसा कुछ आपकी आँखों के सामने से नहीं गुजरा है तो अपने शहर के ऐसे केन्द्रों में जाकर देखिये जहाँ विकलांग व्यक्ति रहते हों, आज भी वे लोग दया, सहानुभूति का पात्र बनते हैं. ऐसे लोग भले ही शिक्षित हों अथवा अशिक्षित, शहरी हो अथवा ग्रामीण, रोजगार में हो अथवा बेरोजगार सभी के साथ समाज की तरफ से एक दया का भाव देखने को मिलता है.




ऐसा होने के पीछे को हम व्यक्तिगत रूप से समाज से अधिक दोष विकलांगता से जूझ रहे लोगों का मानते हैं. कमोबेश बहुतायत विकलांग व्यक्ति समाज से दया, सहानुभूति ही चाहते हैं. कुछ वर्षों पूर्व इस क्षेत्र में कार्य करने की मंशा से विकलांग शक्ति (जिसे बाद में दिव्यांग शक्ति कर दिया गया) के नाम से एक अभियान शुरू किया. इसके माध्यम से ऐसे विकलांग व्यक्तियों को प्रोत्साहित करने का मन बनाया था जिनमें किसी न किसी तरह की प्रतिभा हो, कोई न कोई हुनर हो. सोचा था कि ऐसे लोगों के हुनर को समाज के सामने लाकर इनको भी आगे बढ़ने का रास्ता बनाया जाये. इस अभियान से ऐसे विकलांग व्यक्ति बहुत कम जुड़े जिनको अपनी प्रतिभा का, अपने हुनर का प्रतिफल चाहिए था. बहुतायत लोगों के लिए भत्ता, पेंशन, सरकारी अनुदान, लाभ आदि को प्राप्त करना उनका अभीष्ट था.

 

ये सही है कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में समाज में सभी विकलांग लोगों को शामिल करने की दिशा में काम करने को प्रेरित करना आज के दिन का उद्देश्य है. ऐसे में जहाँ दिव्यांगजनों के प्रति उपेक्षा का भाव दूर करना होगा वहीं खुद दिव्यांगजनों को अपने आपको मजबूर, कमजोर मानसिकता से ऊपर लाना होगा. दिव्यांगजनों के प्रति उपेक्षा का भाव रखने की स्थिति ये है कि ज्यादातर लोग ये नहीं जानते कि उनके घर के आसपास कितने लोग दिव्यांग हैं. लोगों को इसकी भी जानकारी नहीं कि समाज में दिव्यांगजनों को बराबर का अधिकार मिल रहा है या नहीं. ऐसे में दिव्यांगजनों की वास्तविक स्थिति के बारे में, दिव्यांगजनों के बारे में लोगों को जागरुक करने के साथ-साथ दिव्यांगजनों में विश्वास पैदा करने के लिए, दिव्यांगजनों को प्रोत्साहित करने के लिए भी इस दिवस को मनाना बहुत आवश्यक है.


25 अक्टूबर 2025

हिंसात्मक गतिविधियों से भरा समाज

ये किसी तरह के समाज का निर्माण कर लिया हम लोगों ने? सुबह आँख खुलने से लेकर रात सोने तक कहीं न कहीं से हिंसात्मक खबरों का आना लगा ही रहता है. इन खबरों का केन्द्र देश ही नहीं रहता है बल्कि विश्व स्तर पर चारों तरफ से इसी तरह की खबरें सुनाई पड़ती हैं. कहीं दो व्यक्ति आपस में लड़ने में लगे हैं, कहीं दो परिवारों के बीच कलह मची हुई है, कहीं दो राज्यों के बीच विवाद की स्थिति है तो कहीं दो देशों में युद्ध चल रहा है. ऐसा लगता है जैसे समाज में चारों तरफ अशांति, हिंसा, वैमनष्यता, बैर आदि का समावेश बना हुआ है. सद्भाव, सहजता, शांति, धैर्य आदि को जैसे भुला ही दिया गया है. पारिवारिक सम्बन्धों में, रक्त-सम्बन्धियों में विभेद इस स्तर तक है कि एक-दूसरे की जान तक ले ली जा रही है. समाज की इकाई एक व्यक्ति के दायरे से बाहर निकल कर देखें तो एक देश के रूप में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है. विस्तारवाद की नीति के चलते, अपने वर्चस्व को, प्रभुता को थोपने की नीयत के चलते जहाँ बड़े-बड़े देशों द्वारा छोटे-छोटे देशों को किसी न किसी रूप में अपने कब्जे में किये जाने की मानसिकता काम करती है, वहीं महाशक्तियाँ अप्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे को नियंत्रित करने की नीतियाँ निर्धारित करती हैं.

 

समाज की वर्तमान स्थिति यह है कि यहाँ प्रेम, करुणा, शांति, अहिंसा से अधिक बैर, वैमनष्यता, हिंसा आदि दिखाई दे रही है. क्या कभी इस पर विचार किया गया कि आखिर ऐसा क्या है इंसानी स्वभाव के मूल में कि उसे सदियों से प्रेम, सौहार्द्र का पाठ पढ़ाना पड़ रहा है मगर वह सिर्फ और सिर्फ हिंसा की तरफ ही बढ़ता जा रहा है? आये दिन खबरें मिलती हैं मासूम बच्चियों के साथ दुराचार की, उनकी हत्या की. आये दिन देखने में आ रहा है कि प्रशासनिक अधिकारियों पर हमले किये जा रहे हैं, उनकी जान ले ली जा रही है. लगभग नित्यप्रति की खबर बनी हुई है किसी की हत्या, कहीं लूट, कहीं अपहरण, कहीं मारपीट. इसे महज दो पक्षों के बीच की स्थिति कहकर विस्मृत नहीं किया जाना चाहिए. गम्भीरता से विचार किया जाये तो स्पष्ट रूप से समझ आता है कि हिंसा, अत्याचार, क्रूरता इंसानी स्वभाव का मूल है. कोई व्यक्ति वह चाहे आम नागरिक हो या फिर अधिकार प्राप्त व्यक्ति, सभी के मन में कहीं न कहीं एक तरह का हिंसात्मक भाव-बोध छिपा होता है. आम नागरिक अपने इसी भाव-बोध के वशीभूत अपने आस-पड़ोस में हिंसात्मक गतिविधियाँ करता है तो वही किसी तानाशाही मानसिकता वाला राष्ट्राध्यक्ष विस्तारवादी मानसिकता के चलते अपने आसपास के देशों के प्रति नकारात्मक भाव रखता है.

 

यहाँ विचारणीय तथ्य यह है कि आदिमानव से महामानव बनने की होड़ में लगे इंसान को लगातार प्रेम, दया, करुणा आदि का पाठ पढ़ाया जाता रहा है. उसे समझाया जाता रहा है कि हिंसा गलत है, वह चाहे जीव पर हो, निर्जीव पर हो, पेड़-पौधों पर हो. इंसान को कदम-कदम पर सीख दी गई कि उसे आपस में सद्भाव से रहना चाहिए. आपसी वैमनष्यता से उसे दूर रहना चाहिए. उसे कभी नहीं सिखाया गया कि कैसे हिंसा करनी है. उसे किसी ने नहीं सिखाया कि कैसे दूसरे से बैर भावना रखनी है. उसे किसी भी तरीके से नहीं बताया गया कि सामने वाले की हत्या कैसे करनी है. इसे विडम्बना ही कहा जायेगा कि जो पाठ उसे सदियों से पढ़ाया जाता रहा, शिक्षकों द्वारा पढ़ाया जा रहा, परिवार द्वारा पढ़ाया जाता रहा, समाज द्वारा पढ़ाया जाता रहा इंसान उसी पाठ को कायदे से नहीं सीख पाया. इसके सापेक्ष जिस पाठ को किसी ने नहीं सिखाया, जिसे सिखाने के सम्बन्ध में कोई संस्थान नहीं है वे कार्य उसने न केवल भली-भांति सीख रखे हैं वरन वह उन्हें तीव्रता के साथ करने भी लगा है. ऐसा लगता है जैसे उसने अपने आसपास तनावपूर्ण माहौल वाली दुनिया बनाने का ही संकल्प ले रखा है.

 

इस तरह की दुनिया में जहाँ सब कुछ स्वार्थ पर आधारित होने लगा है; जहाँ व्यक्तियों की, देशों की प्रतिष्ठा का आधार अधिकार, उसका आर्थिक स्तर, शक्ति प्रदर्शन आदि होने लगा हो वहाँ आपस में खाई बनना स्वाभाविक है. वैश्विक परिदृश्य में दो देशों के बीच विगत कई वर्षों से चल रहे युद्ध, संघर्ष इसके सशक्त उदाहरण हैं. यदा-कदा संघर्ष विराम के नाम पर चंद दिनों की शांति भले ही देखने को मिल जाए, भले ही कोई अपनी पीठ स्वयं ही थपथपा ले किन्तु तनाव, संघर्ष, हमला आदि पुनः अपनी तीव्रता के साथ आरम्भ हो जाते हैं. नागरिकों के हितार्थ लिए जाने वाले निर्णय अचानक से भुला दिए जाते हैं. ऐसी स्थिति न केवल चिंतनीय है बल्कि भयावह भी है.

 

सामाजिक रूप से कितने भी प्रयास किये जाएँ किन्तु इंसानों का मूल स्वभाव बदले बिना शांति सम्भावना की स्थिति अब संभव नहीं लगती है. वर्तमान समाज इतने खाँचों में विभक्त हो चुका है कि उसे मानवीय समाज कहने के बजाय कबीलाई समाज कहना ज्यादा उचित होगा. प्रत्येक वर्ग के अपने सिद्धांत हैं, अपने आदर्श हैं, अपने विचार हैं, अपनी विचारधारा है. सबकी विचारधारा, सबके आदर्श दूसरे की विचारधारा, आदर्श से श्रेष्ठ हैं. ऐसे में श्रेष्ठता, हीनता का बोध भी इंसानी स्वभाव पर हावी हो रहा है. समझने वाली बात है जब आक्रोश की छिपी भावना के साथ-साथ स्वयं को श्रेष्ठ समझने और दूसरे को सिर्फ और सिर्फ हीन समझने की खुली भावना समाज में विकसित हो रही हो तब हिंसात्मक गतिविधियों को देखने-सहने के अलावा और कोई विकल्प हाल-फ़िलहाल दिखाई नहीं देता है. सरकार, प्रशासन, समाज, व्यक्ति सबके सब असहाय बने खुद पर हमला होते देख रहे हैं.

 


30 सितंबर 2025

अंतर्मन का रावण मारें

विजयादशमी का पर्व पूरे जोश-उत्साह के साथ मनाया जाता है. रावण का पुतला जलाया जाता है. सांकेतिक रूप से सन्देश देने के लिए प्रतिवर्ष बुराईअत्याचार के प्रतीक को सत्य और न्याय के प्रतीक के हाथों मरवाया जाता है इसके बाद भी समाज में असत्यहिंसाअत्याचारबुराई बढ़ती जाती है. साल-दर-साल रावण का पुतला फूँकने के बाद भी समाज से न तो बुराई दूर हो सकी और न ही असत्य को हराया जा सका है. देखा जाये तो विजयादशमी का पावन पर्व आज सिर्फ सांकेतिक पर्व बनकर रह गया है. इंसानी बस्तियों में छद्म रावण कोछद्म अत्याचार को समाप्त करके लोग अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं. दरअसल समाज व्यक्तियों का समुच्चय है. व्यक्तियों के बिना समाज का कोई आधार ही नहीं. समाज की समस्त अच्छाइयाँ-बुराइयाँ उसके नागरिकों पर ही निर्भर करती हैं. इसके बाद भी नागरिकों में समाज के प्रति कर्तव्य-बोध जागृत नहीं हो रहा है. समाज के प्रतिसमाज की इकाइयों के प्रतिसमाज के विभिन्न विषयों के प्रति नागरिक-बोध लगातार समाप्त होता जा रहा है. इसी के चलते समाज में विसंगतियाँ तेजी से बढ़ रही हैं. आलम ये है कि नित्य-प्रति एक-दो नहीं सैकड़ों घटनाएँ हमारे सामने आती हैं जो समाज की विसंगतियों को दृष्टिगत करती हैं.

 

प्रत्येक वर्ष पूरे देश में प्रत्येक नगर में, कस्बे में रावण को जलाने का कार्य किया जाता है, इसके बाद भी देश भर में रावण के विविध रूप अपना सिर उठाये घूमते दिखते हैं. कहीं आतंकवाद के रूप में, कहीं हिंसा के रूप में; कहीं जातिवाद के रूप में, कहीं क्षेत्रवाद के रूप में; कहीं भ्रष्टाचार के रूप में, कहीं रिश्वतखोरी के रूप में. यही वे स्थितियाँ हैं जो समझाती हैं कि आत्मा अमर-अजर है. यदि वाकई देह की मौत के साथ-साथ आत्मा की भी मृत्यु हो जाती तो जिस समय राम ने रावण को मारा था उसी समय उसी वास्तविक मौत हो गई होती. वह अपने विविध रूपों के साथ प्रत्येक कालखण्ड में अराजकता की स्थिति को पैदा नहीं कर रहा होता. आत्मा की अमरता के कारण ही रावण प्रत्येक वर्ष अपना रूप बदल कर हमारे सामने आ खड़ा होता है और हम हैं कि विजयादशमी को उसके पुतले को जलाकर इस मृगमारीचिका में प्रसन्न रहते हैं कि हमने रावण को मार गिराया है. वास्तविकता में रावण किसी भी वर्ष मरता नहीं है बल्कि वह तो साल-दर-साल और भी विकराल रूप धारण कर लेता है; साल-दर-साल अपार विध्वंसक शक्तियों को ग्रहण करके अपनी विनाशलीला को फैलाता रहता है.

 



सुनने में बुरा भले लगे मगर कहीं न कहीं हम सभी में किसी न किसी रूप में एक रावण उपस्थित रहता है. इसका मूल कारण ये है कि प्रत्येक इन्सान की मूल प्रवृत्ति पाशविक है. उसे परिवारसमाजसंस्थानों आदि में स्नेहप्रेमभाईचारा आदि सिखाया जाता है जबकि हिंसाअत्याचारबुराई आदि कहीं भी सिखाई नहीं जाती है. ये सब दुर्गुण उसके भीतर जन्म के साथ ही समाहित रहते हैं जो वातावरणपरिस्थिति के अनुसार अपना विस्तार कर लेते हैं. यही कारण है कि इन्सान को इन्सान बनाये रखने के जतन लगातार किये जाते रहते हैंइसके बाद भी वो मौका पड़ते ही अपना पाशविक रूप दिखा ही देता है. कभी परिवार के साथ विद्रोह करकेकभी समाज में उपद्रव करके. कभी अपने सहयोगियों के साथ दुर्व्यवहार करके तो कभी किसी अनजान के साथ धोखाधड़ी करके. यहाँ मंतव्य यह सिद्ध करने का कतई नहीं है कि सभी इन्सान इसी मूल रूप में समाज में विचरण करते रहते हैं वरन ये दर्शाने का है कि बहुतायत इंसानों की मूल फितरत इसी तरह की रहती है.

 

अपनी इसी मूल फितरत के चलते समाज में महिलाओं के साथ छेड़खानी कीबच्चियों के साथ दुराचार कीबुजुर्गों के साथ अत्याचार कीवरिष्ठजनों के साथ अमानवीयता की घटनाएँ लगातार सामने आ रही हैं. जरा-जरा सी बात पर धैर्य खोकर एक-दूसरे के साथ हाथापाई कर बैठनाहत्या जैसे जघन्य अपराध का हो जानासामने वाले को नीचा दिखाने के लिए उसके परिजनों के साथ दुर्व्यवहार कर बैठनास्वार्थ में लिप्त होकर किसी अन्य की संपत्ति पर कब्ज़ा कर लेना आदि इसी का दुष्परिणाम है. ये सब इंसानों के भीतर बसे रावण के चलते है जो अक्सर अपनी दुष्प्रवृतियों के कारण जन्म ले लेता है. अपनी अतृप्त लालसाओं को पूरा करने के लिए गलत रास्तों पर चलने को धकेलता है. यही वो अंदरूनी रावण है जो अकारण किसी और से बदला लेने की कोशिश में लगा रहता है. इसके चलते ही समाज में हिंसाअत्याचारअनाचारअविश्वास का माहौल बना हुआ है. अविश्वास इस कदर कि एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से भय लगने लगा है, आपसी रिश्तों में संदिग्ध वातावरण पनपने लगा है.

 

हममें से कोई नहीं चाहता होगा कि समाज मेंपरिवार में अत्याचार-अनाचार बढ़े. इसके बाद भी ये सबकुछ हमारे बीच हो रहा हैहमारे परिवार में हो रहा हैहमारे समाज में हो रहा है. हमारी ही बेटियों के साथ दुराचार हो रहा है. हमारे ही किसी अपने की हत्या की जा रही है. हमारे ही किसी अपने का अपहरण किया जा रहा है. करने वाले भी कहीं न कहीं हम सब हैंहमारे अपने हैं. ऐसे में बेहतर हो कि हम लोग रावण के बाहरी पुतले को मारने के साथ-साथ आंतरिक रावण को भी मारने का काम करें. हमें संकल्प लेना पड़ेगा कि देश में फैले विकृतियों के रावणों को जलाने का, मारने का कार्य करें. अपने आपको चारित्रिक शुचिता की शक्ति से सँवारें ताकि गली-गली, कूचे-कूचे में घूम-टहल रहे रावणों को मार सकें. तब हम वास्तविक समाज का निर्माण कर सकेंगेवास्तविक इन्सान का निर्माण कर सकेंगेवास्तविक रामराज्य की संकल्पना स्थापित कर सकेंगे.


08 सितंबर 2025

कुछ कर या न कर मगर सोशल मीडिया में डाल

अभी कुछ दिन पहले हमारे एक मित्र का मिलना हुआ. तमाम सारी बातों के बाद चलते समय वे एक बिन्दु हमारी तरफ उछाल गए और चलते-चलते बोले कि इस पर कुछ लिखिए. उनका कहना था कि आजकल त्रयोदशी संस्कार में ये देखना आम बात हो गई है कि लोग आते हैं, बैठते हैं और फिर खुद को एक तरह के वीआईपी स्टेटस में रखते हुए 'बस जरा प्रसाद ले लेंगे' बोलकर कुछ न कुछ खाद्य-सामग्री मँगवा कर उसका स्वाद ले लेते हैं.

 

मित्र का कहना एकदम सही है. आजकल यही हो भी रहा है. किसी समय में ऐसी व्यवस्था उनके लिए बनाई गई होगी जो किसी तरह से अक्षमता का अनुभव करते होंगे मगर आज ये स्टेटस सिम्बल बन गया है. संस्कार से सम्बंधित स्थान पर पड़ी कुर्सियों पर बैठना और फिर वहीं पर खीर, बूँदी, रसगुल्ला आदि-आदि मँगवा कर ग्रहण करना और चलते बनना.

 

इस पर विस्तार से लिखा जायेगा. इस तरह की स्थिति के साथ-साथ अब एक और स्थिति देखने को मिल रही है और वो है त्रयोदशी संस्कार में पहुँच कर वहाँ फोटो सेशन करवाने की. दिवंगत व्यक्ति के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करने पर, वहाँ किसी परिचित के मिल जाने पर, किसी माननीय के प्रकट हो जाने पर, किसी जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी आदि के आ जाने पर फोटो सेशन करवाने का अर्थ समझ नहीं आता.

 

बहरहाल, अब जमाना करने से ज्यादा दिखाने का है. गोपनीय रखने से ज्यादा अगोपन का है. खुद तक सीमित रखने से ज्यादा सोशल मीडिया में डालने का है. वाकई ज़माना अब 'नेकी कर कुँए में डाल' से ज्यादा 'कुछ कर या न कर मगर सोशल मीडिया में डाल' का है.


01 सितंबर 2025

वर्तमान दौर की कविता

कविता लिखना

कितना आसान हो गया है अब.

कुछ भी लिखते जाओ

छोटे छोटे वाक्यों में.

न छंद की चिंता

न लय की फ़िकर,

जो मन में आए

उसे शब्दों में ढाल दो,

कई-कई हिस्सों में बाँट दो

फिर देखो गौर से

तुमको दिखेगी एक कविता

बलखाती काव्य रचना.

मत परवाह करो

कि रस, अलंकार, मात्राएँ

सिरे से गायब हैं,

तुकांत, अतुकांत का

सिरदर्द पाले बिना

बस लिखते जाओ कुछ भी,

शब्द भारी भरकम हों

या फिर हों आम बोलचाल के

बस, शब्द होने चाहिए.

न कोई ज्ञान

न कोई आदर्श

न किसी तरह का प्रवचन,

बस, लिखते जाओ

जब तक कि

तुम ख़ुद न थक जाओ

लिखते-लिखते,

शब्दों को

धकेलते-धकेलते,

रुको, रुक कर देखो

नजर आने लगी कविता?

देखो न!

देखो जरा ध्यान से

ये भी तो

बन गई है एक कविता.

करो वाह वाह

या कि आह आह

हमें इससे क्या?

हमें तो लीपना था,

कुछ थोपना था

सो रख दिया सामने,

समझ सको तो ठीक

न समझ सको

तो भी हमें क्या?

हमने तो लिख दी

एक कविता,

आज के दौर की

एक अद्भुत कविता.

 

13 अगस्त 2025

बदलाव एवं उपलब्धियों भरी सुखद यात्रा

देश के गौरवशाली इतिहास की छत्रछाया में अमृतकाल जैसी अवधारणा संग स्वतंत्रता का उत्सव जोर-शोर से मनाया जा रहा है. यह समय गौरव करने का इसलिए भी है क्योंकि वैश्विक पटल से अनेकानेक सभ्यताएँ लुप्त हो गईं किन्तु भारतीय संस्कृति, सभ्यता तमाम चोटों, आघातों को सहने के बाद भी अपनी वैभवशाली गाथा को साथ लिए आगे बढ़ रही है. बहुत से लोगों के लिए इसे भले राजनैतिक कदम, सरकारी एजेंडा कहा जाता हो मगर स्वतंत्रता के उत्सव को उमंग-उत्साह के साथ ही मनाये जाने की आवश्यकता है. यह एक तरफ जहाँ हमारी प्राचीन वैभवशाली संस्कृति, सभ्यता से परिचय कराता है वहीं वर्तमान युवा पीढ़ी को हमारे वीर-वीरांगनाओं का वह बलिदान याद करवाता है, जिसके चलते आज ऐसे उत्सव मना रहे हैं.

 

स्वतंत्रता के इन वर्षों में बहुत सी उपलब्धियाँ हैं जिनका सुखद एहसास रोम-रोम को पुलकित कर देता है. बावजूद बहुत सारी उपलब्धियों के आज भी बहुत से ऐसे लोग हैं जो गुलामी के दिनों को, अंग्रेजों के शासन को सही ठहराते हैं. ऐसे में सवाल उठने स्वाभाविक हैं कि क्या वाकई देश ने आज़ादी से अब तक कुछ पाया नहीं है? क्या अभी तक की यात्रा में किसी तरह की कोई उपलब्धि हासिल नहीं हुई है? विगत उपलब्धियों, अनुपलब्धियों को यदि पूर्वाग्रह मुक्त होकर समग्र रूप में देखें तो हम लोगों को निराशा नहीं होगी. यह सबसे बड़ी उपलब्धि कही जाएगी कि जब देश स्वतंत्र हुआ तब देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह कृषि पर निर्भर थी. आज स्थिति यह है कि कृषिप्रधान कहे जाने के बाद भी देश का आर्थिक ढाँचा अकेले कृषि आधारित नहीं है, अन्य क्षेत्रों ने अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान की है. वर्तमान में अर्थव्यवस्था में उत्पादन क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 27 प्रतिशत, सेवा क्षेत्र का योगदान लगभग 54 प्रतिशत है.

 



शिक्षा के बिना उन्नति, विकास की कल्पना करना संभव नहीं. नालंदा, तक्षशिला जैसे शैक्षणिक संस्थानों के नष्ट कर दिए जाने के बाद महसूस हो रहा था कि शायद देश का शैक्षणिक विकास बहुत देर में हो. इस आशंका को विगत वर्षों की यात्रा में गलत सिद्ध किया गया है. प्राथमिक क्षेत्र से लेकर उच्च शिक्षा और शोध क्षेत्र तक देश में पर्याप्त विकास हुआ है. आज़ादी के समय देश में साक्षरता दर लगभग 18.3 प्रतिशत थी जो वर्तमान में लगभग 78 प्रतिशत है. चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में 1950 में देश में केवल 28 मेडिकल कॉलेज थे. नेशनल मेडिकल काउंसिल के अनुसार 2024-25 में 766 मेडिकल कॉलेज हैं, इनमें से 423 सरकारी और 343 निजी मेडिकल कॉलेज हैं. क्या इसे विकास या उपलब्धियों के रूप में नहीं देखा जायेगा? इसके अलावा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, भारतीय प्रबन्ध संस्थान, कृषि संस्थान, उच्च शैक्षणिक संस्थानों ने भी संख्यात्मक, गुणात्मक रूप में पर्याप्त विकास किया है.

 

आज़ादी के बाद से लगातार अनेकानेक क्षेत्रों में विकास और बदलाव होते रहे हैं. तकनीक के मामले में क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिले. किसी समय दूरसंचार माध्यम की अपनी सीमितता थी वहीं आज इस क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं. समाज में गिने-चुने लोगों के घरों में बेसिक फोन की सुविधा हुआ करती थी जो आज हर हाथ में मोबाइल के रूप में परिवर्तित हो गई है. इंटरनेट सुविधा, उसकी स्पीड के द्वारा न केवल धरती पर वरन अन्तरिक्ष क्षेत्र में भी व्यापक बदलाव देखने को मिले. ज्ञान-विज्ञान में भी देश में हुए बदलाव प्रत्येक नागरिक को गौरवान्वित कर सकते हैं. किसी समय में सेटेलाईट भेजे जाने के लिए हम दूसरे देशों की तकनीक पर निर्भर हुआ करते थे जबकि आज हमारे केंद्र अन्य देशों को यह सुविधा उपलब्ध करवा रहे हैं. परमाणु परीक्षण, टेस्ट ट्यूब बेबी, मंगल ग्रह का अभियान, अन्तरिक्ष स्टेशन पर किसी भारतीय का जाना, बुलेट ट्रेन की तैयारी, ओलम्पिक में पदक जीतना, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 का हटना आदि वे स्थितियाँ हैं जिनको उपलब्धि के रूप में ही स्वीकारा जाता है.

 

कहते हैं न कि सफ़ेद पटल पर एक छोटा सा काला बिंदु भी बहुत दूर से चमकता है, कुछ ऐसा हाल इन उपलब्धियों का है, लोगों की मानसिकता का है. ये सच है कि तकनीकी विकास के दौर में हमारे यहाँ सामाजिक विकास में गिरावट देखने को मिली है. साक्षरता का स्तर बढ़ा है मगर स्त्री-पुरुष लिंगानुपात में अंतर भी बढ़ा है, महिलाओं-बच्चियों के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएँ बढ़ी हैं. एक तरफ हमें अन्तरिक्ष में अपने कदम रखे हैं तो दूसरी तरफ हमने अपनी ही धरती को जबरदस्त नुकसान पहुँचाया है. कृषि, खाद्यान्न के मामले में हम यदि आत्मनिर्भर होते जा रहे हैं तो हम जनसंख्या पर नियंत्रण नहीं रख सके हैं. हमारा आर्थिक ढाँचा वैशिक स्थितियों को देखते हुए बहुत सुदृढ़ है मगर लगातार होते घोटालों को हम नहीं रोक सके हैं. मोबाइल, इंटरनेट क्रांति ने समूचे विश्व को एक ग्राम की तरह बना दिया है मगर आपसी भाईचारे-सौहार्द्र को हम मजबूत नहीं कर सके हैं, उसमें अश्लीलता की, अपराध की दीमक लगा दी है.

 

ऐसे कुछ और पहलू भी हैं, जिनके आधार पर बहुत सारे लोग देश की वास्तविक उपलब्धियों को विस्मृत कर जाते हैं. वे भूल जाते हैं हमारी लोकतान्त्रिक शक्ति को जहाँ अंतिम पायदान के व्यक्ति तक को भी अवसर उपलब्ध हैं. ये और बात है कि संवैधानिक नियमों की आड़ में यहाँ एक निर्दलीय विधायक भी मुख्यमंत्री बन जाता है मगर यही संवैधानिक खूबसूरती भी है कि कोई ऑटो चलाने वाला, आदिवासी समाज से आने वाला, अत्यंत पिछड़ी पृष्ठभूमि से आने वाला भी जनप्रतिनिधि बन कर सदन में पहुँचता है, देश का प्रथम नागरिक बनता है. निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि विगत वर्षों की भदलाव भरी यात्रा सुखद रही है, उपलब्धियों भरी रही है. इस यात्रा में यदा-कदा मिलते झटकों को भी सफ़र का हिस्सा समझते हुए उनको स्वीकार करना होगा, उनका भी एहसास करते हुए आगे बढ़ना होगा.


29 जुलाई 2025

समाज की कड़वी हकीकत है बाल श्रम

ऐसे दृश्य हम सबकी आँखों के सामने से आये दिन गुजरते ही होंगे जबकि छोटे-बड़े व्यापारिक संस्थानों, दुकानों, ढाबों आदि में बच्चे काम कर रहे हैं. कहीं कोई चाय-पानी पिलाने का काम कर रहा है, कहीं कोई झाड़ू-पोंछा करने का काम कर रहा है. सामान्य रूप में इस स्थिति को बाल श्रम के रूप में जाना जाता है. कृषिकार्य, पारिवारिक व्यापार में मदद, होटल, ढाबों आदि में बच्चों को जबरिया काम पर लगा दिया जाता है. कई बार इन बच्चों से बलपूर्वक भी काम लिया जाता है. ऐसा उस स्थिति में सहजता से होता दिख रहा है जबकि बाल श्रम ( निषेध एवं विनियमन) संशोधन बिल 2016 पारित हो चुका है. इसके पश्चात् बाल श्रम के साथ-साथ किशोरों को भी श्रमिक सम्बन्धी कार्यों में लगाये जाने को प्रतिबंधित करने के सम्बन्ध में बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) संशोधन नियम 2017 पारित किया गया. यह संशोधन भारत में बाल और किशोर श्रम को समाप्त करने के उद्देश्य से कानूनी ढाँचे को मजबूत करने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है. इसके द्वारा नियमों में बाल श्रम के स्थान पर बाल एवं किशोर श्रम शब्द जोड़ा गया तथा व्यापक आयु वर्ग को मान्यता दी गई. यहाँ बाल श्रम का सन्दर्भ ऐसे कार्यों से है जिसमें कार्य करने वाला व्यक्ति कानून द्वारा निर्धारित आयु सीमा से छोटा होता है. इसको कई देशों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने बच्चों का शोषण करने वाला माना है.

 



भारत में बाल श्रम की समस्या दशकों से प्रचलित है. सरकारें लगातार इसके उन्मूलन हेतु चिन्तित दिखाई देती हैं. देश के संविधान का अनुच्छेद 23 खतरनाक उद्योगों में बच्चों के रोजगार पर प्रतिबंध लगाता है. भारत सरकार द्वारा बाल श्रम की समस्या को समाप्त करने हेतु नियमित रूप से क़दम उठाए गए हैं. 1986 में बाल श्रम निषेध और नियमन अधिनियम पारित किया गया. इसके अनुसार खतरनाक उद्योगों में बच्चों की नियुक्ति निषिद्ध है. इसी तरह वर्ष 1987 में राष्ट्रीय बाल श्रम नीति बनाई गई थी. इसके बाद भी देश में बाल श्रमिकों की बड़ी संख्या है. इन बाल श्रमिकों में अधिकतर घरेलू नौकर, ग्रामीण और असंगठित क्षेत्रों में, कृषि क्षेत्र में कार्य करते हैं. इन सामान्य से कार्यों के अलावा खतरनाक और जोखिमयुक्त माने जाने वाले उद्योगों जैसे बीड़ी बनाना, गलीचा बुनाई, चूड़ी निर्माण, काँच उद्योग, चमड़ा, प्लास्टिक का सामान निर्माण, विस्फोटक आदि में भी कम उम्र के बच्चे लगे हुए हैं. भारत की जनगणना 2011 के अनुसार 5-14 वर्ष की आयु वर्ग के लगभग एक करोड़ बच्चे कार्यरत हैं जिनमें से लगभग 80 लाख बच्चे ग्रामीण क्षेत्रों में कृषक और खेतिहर मजदूरों के रूप में कार्य करते हैं. 

 

किसी अधिनियम के अस्तित्व में आ जाने भर से बाल श्रम को रोका जाना सम्भव नहीं. ऐसा इसलिए क्योंकि समाज में अनेकानेक परिवार ऐसे हैं जिनको अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए, अपने जीवन को बचाए रखने के लिए न चाहते हुए भी अपने बच्चों को श्रमिक के रूप में कार्य करवाना पड़ता है. ऐसे परिवारों के माता-पिता के लिए बाल श्रम एक सामान्य सी प्रक्रिया होती है. इस तरह की सोच का मुख्य कारण गरीबी को माना जा सकता है. आज के दौर का यह बहुत बड़ा सच है कि विकास के बहुत बड़े-बड़े दावे करने के बाद भी समाज से गरीबी को दूर नहीं किया जा सका है. आज भी बहुतायत में ऐसे परिवार हैं जिनकी बुनियादी ज़रूरतें पूरी नहीं हो पा रही हैं. ऐसे परिवारों के सामने भोजन, पानी, वस्त्र, घर, शिक्षा, चिकित्सा आदि की समस्या विकराल रूप में होती है. ऐसी स्थिति में इन परिवारों को भरण-पोषण सहित अन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए अपने बच्चों को काम पर लगाना पड़ता है.  

 



देखा जाये तो बाल श्रम और गरीबी का सह-सम्बन्ध बना हुआ है. इसका दुष्प्रभाव निश्चित रूप से बच्चों के स्वास्थ्य पर तो पड़ता ही पड़ता है, उनकी शिक्षा भी नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है. जहाँ एक तरफ कुपोषण और अन्य शारीरिक बीमारियाँ आये दिन बच्चों को घेरे रहती हैं वहीं दूसरी तरफ गरीबी और बाल श्रम में संलिप्त होने के कारण बच्चों में अवसरों, शिक्षा की कमी के कारण मानसिक परेशानियाँ देखने को मिलती हैं. बाल श्रम को रोकने के लिए सरकारों द्वारा समय-समय पर अनेक कानून बनाये गए हैं. इसी तरह से बच्चों की शिक्षा व्यवस्था पर भी ध्यान देते हुए शिक्षा का अधिकार अधिनियम पारित किया गया. इस कानून के द्वारा 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिया गया है. इसके पीछे सोच यही रही है कि इस आयु-वर्ग के बच्चे शिक्षा प्राप्त कर खुद को बाल श्रम, गरीबी आदि के चंगुल से मुक्त कर सकें. इसके बाद भी स्थितियों को सुखद नहीं कहा जा सकता है.

 

एक कड़वा सच यही है कि सिर्फ कानूनों के द्वारा बाल श्रम को रोका जाना सम्भव नहीं. इसके लिए जनजागरूकता भी आवश्यक है, परिवारों की गरीबी दूर होना आवश्यक है. ऐसे में बाल श्रम को समाप्त करने के लिए समाज और सरकार दोनों को सामूहिक रूप से सक्रिय होना होगा. प्रत्येक नागरिक को संकल्पित होना पड़ेगा कि वह बाल श्रम में संलिप्त लोगों को जागरूक करेगा. बाल श्रमिकों के अभिभावकों को बाल श्रम से होने वाले नुकसान के बारे में समझाना होगा. सरकार को ऐसे अभिभावकों की आय निर्धारण सम्बन्धी कदम उठाने होंगे. बच्चों को स्कूली शिक्षा के साथ-साथ गरीबी उन्मूलन की दिशा में भी प्रयास करने होंगे. समवेत प्रयासों से ही बाल श्रम को समाप्त करने की उम्मीद की जा सकती है.


23 जुलाई 2025

नशे की तरफ बढ़ते युवा-कदम

हर फ़िक्र को धुँए में उड़ाता चला गया, एक गीत की इस पंक्ति ने युवाओं को बहुत प्रभावित किया है. उनके लिए इस पंक्ति का सन्दर्भ उन्मुक्त रूप से धुँआ उड़ाना भर है. इसके वशीभूत युवाओं की बहुत बड़ी संख्या जगह-जगह कहीं छिपे रूप मेंकहीं उन्मुत भाव से धुआँ उड़ाती नजर आती है. ऐसे युवाओं को गीत की इस पंक्ति ने जितना प्रभावित किया है उतना इसके अगले भाग ने नहीं किया है. धुँए से खेलती इस पीढ़ी को मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गयावाला दर्शन याद नहीं है. रील बनाने में खोयी रहने वाली, अपने आपको स्वतंत्रता से उद्दंडता की तरफ ले जाती पीढ़ी को कतई भान नहीं है कि किसी भी गीत की पंक्तियों का अनुसरण करना और ज़िन्दगी की वास्तविकता को समझना दो अलग-अलग स्थितियाँ हैं. ज़िन्दगी को जीने के अंदाज, ज़िन्दगी को ज़िन्दगी बनाये रखने की कार्य-शैली से इतर आज का युवा नशे की दुनिया में हँसते-मुस्कुराते हुए प्रवेश कर रहा है. उसके लिए ये किसी खतरे का सूचक नहीं बल्कि एक तरह का एडवेंचर है, जिसे वह किसी भी कीमत पर पूरा करना चाहता है.

 

सामाजिक रूप से यह स्थिति चिंताजनक है कि जिस उम्र में किशोरों, युवाओं को अपने दैहिक सौष्ठव की तरफ, बौद्धिक विकास की तरफ, अध्ययन की तरफ ध्यान दिया जाना चाहिए उस उम्र में वे नशे का शौक पालने में लगे हैं. शौक-शौक में कभी-कभी ही नशे की तरफ बढ़े कदम कब उनकी मजबूरी बन जाते हैं, उनको इसकी भनक तक नहीं लगती है. शौकिया उठाये गए कदम की मजबूरी में फँसकर वे इसे ज़िन्दगी जीने का तरीका समझने लगते हैं. अपनी मस्तीअपनी दुनियाअपनी स्वतंत्रता में इनको आभास ही नहीं होता है कि वे कब ज़िन्दगी को जीने की कोशिश में ज़िन्दगी से खिलवाड़ करने लगे हैं.

 



ऐसी स्थितियों के लिए पूरी तरह से युवाओं को अथवा किशोरों को दोष देना भी उचित नहीं है. देखा जाये तो भौतिकतावादी दौड़ में ऐसे बच्चों के अभिभावक भी शामिल हैं. आधुनिकता की अंधी दौड़ में दौड़ते-दौड़ते अनुशासन का पाठ सिखाने वाले, जीवन की जिम्मेदारियों से परिचय कराने वाले अभिभावक अपने ही बच्चों के मित्र रूप में परिवर्तित हो गए. मैत्री भरे कथित वातावरण में अब बच्चों को किसी भी संसाधन की, उत्पाद की महत्ता समझाने के बजाय उसकी सहज उपलब्धता करवाई जा रही है. अनुशासन-मुक्त लाड़-प्यार में उपलब्ध संसाधनों के चलते ऐसे बच्चों को न तो धन की महत्ता समझ आती हैन समय कीन कैरियर की और न ही अपनी ज़िन्दगी की. इसी मानसिकता के कारण समाज का बहुसंख्यक युवा वर्ग गैर-जिम्मेदारी का परिचय देते हुए उद्दंड नजर आने लगा है. इसी का दुष्परिणाम है कि अधिकांश बच्चों में आपराधिक प्रवृत्ति पनप रही है, वे गलत रास्तों की तरफ बढ़ जाते हैं, नशे की गिरफ्त में आ जाते हैं.

 

नशा-मुक्त समाज की संकल्पना समाज के प्रत्येक जागरूक व्यक्ति की चाह है. इसके बाद भीनशे के दुष्प्रभाव की जानकारी होने के बाद भी युवाओं में ही नहीं बल्कि समाज में नशे के प्रति आसक्ति लगातार बढती ही जा रही है. शादी-विवाह के समारोहकिसी भी हर्ष-उमंग का अवसर होनायुवाओं की अपनी मस्ती आदि अब बिना नशे के पूरी नहीं हो पाती है. कहीं न कहीं समाज में इस तरह के नशे को स्वीकार्यता मिल चुकी है. किसी भी तरह का आयोजन होछोटे-बड़े स्तर के क्लब या होटल हों सभी में किसी न किसी रूप में नशे की उपस्थिति देखने को मिलने लगी है. बहुत सी जगहों पर खुलेआम या चोरी-छिपे ड्रग्स पार्टियाँहुक्का बार आदि जैसी संकल्पना धरातल पर देखने को मिलती है. दुर्भाग्य यह है कि ऐसे आयोजनों में बहुतायत में किशोरों का, युवाओं का सम्मिलन रहता है. आधुनिकता के परिवेश में लिपटी ऐसी पार्टियों में सिगरेट, शराब की आड़ में नशीले तत्त्वों, विभिन्न ड्रग्स की सहज पहुँच बनी होती है.  

 

नशा-मुक्त समाज की अवधारणा को पूरा करने के लिए सर्वप्रथम तो ऐसे नशीले पदार्थों की आवक पर ध्यान देने की जरूरत है; उसके स्त्रोतों को पकड़ने की जरूरत है; इनको बाज़ार में खपाने वाले तत्त्वों को खोजने की जरूरत है. इसके साथ-साथ यह भी समझना होगा कि आखिर नशे की गिरफ्त में विशेष रूप से युवा वर्ग क्यों आ रहा हैइसके लिए समाज में युवाओं कीकिशोरों की समस्याओं पर विचार करने की आवश्यकता है. औद्योगीकरणवैश्वीकरण की परिभाषा इस तरह से चारों तरफ घेर दी गई है कि सिवाय लाखों के पैकेज के युवाओं को और कुछ सूझ नहीं रहा है. आपस में बढ़ती गलाकाट प्रतियोगी भावनाजल्द से जल्द सफलता की अधिकतम ऊँचाइयों को प्राप्त कर लेने की लालसाकम से कम प्रयासों में अधिकतम प्राप्ति की चाह आदि ने युवा वर्ग को अंधी दौड़ में शामिल करवा दिया है. इस दौड़ में एक बार शामिल हो जाने के बाद उनको न तो अपना भान रहता है और न ही सामाजिकता का. इसके अलावा ग्रामीण इलाकों के युवाओं के समक्ष कार्य के अवसरों के अत्यल्प होने के कारण से अवसाद जैसी स्थिति है. लाभ केउन्नति केसमर्थ कार्य करने आदि के कम से कम अवसरों के कारण यहाँ के युवा निराश तो रहते ही हैं साथ ही महानगरों की चकाचौंध उनको हताश भी करती है.

 

सरकार कोसमाज के जागरूक लोगों को नशा मुक्ति के साथ-साथ युवाओं के लिए अवसरों की अनुकूलता बढ़ाने की आवश्यकता है. जो युवा वर्ग भौतिकता की अंधी दौड़ में फँस गया है उसको समझाने कीसँभालने की जरूरत है. यदि हम अपनी युवा पीढ़ी को सही-गलत का अर्थ समझा सकेसामाजिकता-पारिवारिकता का बोध करा सकेकर्तव्य-दायित्व को परिभाषित करा सके तो बहुत हद तक नशा-मुक्त समाज स्थापित करने में सफल हो जायेंगे.