25 दिसंबर 2025

स्वतंत्रता के नाम पर अमर्यादित होते युवा

दिन का समय, चलती ट्रेन का डिब्बा, दो विषमलिंगी युवा, बेशर्म-अमर्यादित आचरण, सार्वजनिक रूप से होती अंतरंगता. अभी हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल हुए उन वीडियो ने दिखाया कि किस तरह से देह की माँग और यौनेच्छा की पूर्ति ने पारम्परिक मान्यताओं को ध्वस्त ही कर दिया. चलती ट्रेन के सार्वजनिक कोच में नितांत बेशर्मी के साथ युवाओं की गतिविधियों ने समाज की इस प्रचलित धारणा को और बल दिया कि आज की पीढ़ी संस्कारों, मर्यादा को भूलकर स्वार्थ में लिप्त होती चली जा रही है. इस घटना के पहले भी युवाओं की अंतरंगता सम्बन्धी वीडियो, चित्र सोशल मीडिया पर वायरल होते रहे हैं. इन वीडियो, चित्रों में युवा बदलते रहे, उनके संसर्ग करने के स्थान बदलते रहे मगर सभी में मानसिकता एक ही रही, अपने परिवेश, अपने संस्कार, अपनी मर्यादा का त्याग करना. कॉलेज, लाइब्रेरी, पार्क, लिफ्ट, बाज़ार, पार्किंग आदि-आदि सार्वजनिक स्थल खुलेआम बेशर्मी भरे कृत्यों के गवाह बनने लगे.

 

वैश्वीकरण, आधुनिकता के दौर में ऐसा बहुत पहले से ही मान लिया गया था कि खुद के स्वतंत्र अस्तित्व के लिए युवाओं ने किसी भी तरह के बंधन को मानना बंद कर दिया है. अभिभावकों को एक दोस्त की तरह से मान लेने की अवधारणा ने भी उनके प्रति गम्भीरता का ह्रास करवा ही दिया था. इस तरह की मानसिकता, सोच ने युवाओं को जहाँ आर्थिक स्वतंत्रता प्रदान की, उनको स्वावलम्बी बनाया वहीं उनको उन्मुक्त भी बनाया, उद्दंड भी बनाया. ऐसे उन्मुक्त, उद्दंड युवाओं ने सामाजिक परिदृश्य में सिर्फ और सिर्फ स्वयं का ही अस्तित्व स्वीकारते हुए शेष सभी को नगण्य मान लिया है. इनको न तो उम्र का लिहाज है, न ही रिश्तों का. यही कारण है कि इनके द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर भीड़ की, किसी बुजुर्ग व्यक्ति की परवाह न करते हुए अशालीन ढंग से प्रेमालाप किया जाता है, नशेबाजी की जाती है, स्टंट किये जा रहे हैं अब तो यौन-सम्बन्ध भी बनाये जाने लगे हैं. सड़कों, पार्कों, मॉल, बाजार आदि में एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर घूमने से इतर अब तो एक-दूसरे के साथ चुम्बन लेते हुए भी युवा जोड़े दिख जाना आम हो गया है. उन्मुक्तता, उद्दंडता का आलम ये है कि इनको ये भी परवाह नहीं होती है कि वर्तमान दौर में जगह-जगह लगे सीसीटीवी कैमरों के द्वारा उनके कृत्य रिकॉर्ड हो रहे होंगे. उनको इस बात की भी चिंता नहीं कि आज प्रत्येक हाथ में स्मार्टफोन होने के कारण किसी भी कृत्य की, घटना की रिकॉर्डिंग हो जाना, उसका वायरल हो जाना बहुत सामान्य सी बात हो गई है.

 

ऐसी घटनाओं के पीछे के कारणों को खोजने और उनका समाधान करने पर गम्भीरता से चिंतन करने के बजाय यह कह देना आसान लगता है कि ये सब पश्चिमी सभ्यता का दुष्प्रभाव है, यह सब वैश्वीकरण के कारण हो रहा है. क्या हम सभी ने ऐसी घटनाओं के सामने आने के बाद भी ये विचार किया है कि हम अपने परिवार के किशोरों, युवाओं के कृत्यों, उनके व्यवहार, उनके दोस्तों आदि के बारे में जानने-समझने का प्रयास करें? क्या अपने परिवार के बच्चों के पहनावे, उनकी दिनचर्या आदि में आने वाले बदलावों को लेकर कभी उनसे कोई सवाल किया है? बहुतायत में इनका जवाब न में ही होगा क्योंकि आज बहुतायत परिवारों में बच्चों को समझाने की, उनको संस्कार सिखाने की, उनको मर्यादित आचरण करने की सीख देना लगभग बंद ही हो गया है. आज के आधुनिकता भरे दौर में ऐसा करना दकियानूसी माना जाने लगा है, पिछड़ा माना जाने लगा है और शायद ही कोई परिवार ऐसा होगा को स्वयं को दकियानूसी-पिछड़ा घोषित करवाना चाहेगा.

 

संस्कार सिखाने का तात्पर्य किशोरों, युवाओं को जंजीरों में बाँधना नहीं होता है बल्कि उनको सामाजिकता का ज्ञान देना होता है. उनको मर्यादित बनाने का अर्थ पाषाणकालीन सभ्यता में भेजना नहीं होता बल्कि उम्र-रिश्तों का सम्मान करना सिखाना होता है. शालीन बनाने का तात्पर्य उनको पिछड़ा बनाना नहीं होता बल्कि उचित जीवनशैली का निर्वहन करना बताना होता है. प्रत्येक कार्य को भौतिकता से जोड़ देना, किसी भी तरह के आचरण को स्वतंत्रता समझ लेना, सार्वजनिक रूप से अशालीन हो जाने को आधुनिक मान लेना कदापि उचित सोच नहीं है. यदि इस तरह की सोच पर, ऐसे कृत्यों पर नियंत्रण नहीं लगाया गया, परिवार से ही संस्कारों का बीजारोपण नहीं किया गया तो ऐसी स्थितियों के निकट भविष्य में और भयावह होने में कोई संशय नहीं.


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