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07 अगस्त 2013

जरूरतमंद नागरिकों को खाद्य सुरक्षा मिल पाना संदिग्ध




खाद्य सुरक्षा बिल सदन में प्रस्तुत कर ही दिया गया और कहीं न कहीं फिर से एक और योजना भ्रष्टाचार के लिए पेश कर दी गई. इसके पक्ष में सरकार और उसके समर्थकों द्वारा तर्क दिया जा रहा है कि इससे गरीबों को भोजन आसानी से सस्ती दरों पर उपलब्ध हो सकेगा. बेशक, ये योजना अपने आपमें अच्छी हो सकती है, गरीबों के लिए लाभकारी हो सकती है, उनके भरण-पोषण में मददगार हो सकती है किन्तु इसके सफल क्रियान्वयन पर सिर्फ संदेह ही नहीं है, घनघोर संदेह है. इस योजना के पूर्व भी नागरिकों के विकास के लिए, गरीबों के विकास के लिए, मजदूरों के विकास के लिए, बच्चों के विकास के लिए सैकड़ों योजनायें प्रस्तुत की जा सकी हैं और उनमें से अधिसंख्यक योजनाओं की परमगति असफलता की तरफ ही रही है. देश की आज़ादी का जश्न मनाने वाले माह में तमाम पुरानी योजनाओं का विश्लेषण करने के बजाय मजदूरों के लिए चल रही मनरेगा और बच्चों (विशेष रूप से गरीब ग्रामीण) के लिए चल रही मिड-डे-मील योजना का हश्र देख लिया जाए, सारी कहानी स्पष्ट हो जाती है.
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मिड-डे-मील योजना से बच्चों को भले ही फायदा न पहुँचा हो किन्तु इससे सम्बंधित अधिकारी-कर्मचारी-ग्राम प्रधान-प्रधानाध्यापक अवश्य ही लाभान्वित हुए हैं. इसके विस्तार में जाने की आवश्यकता कतई नहीं है क्योंकि इस योजना की असलियत जगजाहिर है. भोजन का सही से न बनाया जाना, सफाई न रहना, नियमित रूप से भोजन न बनना, शासन की तरफ से आते राशन, कन्वर्जन कोस्ट का बंदरबांट आदि वे बिंदु हैं जिनके आलोक में मिड-डे-मील योजना का सत्य जाना जा सकता है. इसी तरह से मजदूरों का भला करने के लिए, उनको एक निश्चित समयावधि के लिए रोजगार उपलब्ध करवाने की दृष्टि से नरेगा योजना को लागू किया गया था. नरेगा की जबरदस्त असफलता के बाद इसमें ‘गाँधी जी’ को जोड़कर इसे मनरेगा बना दिया गया किन्तु इसका परिणाम ज्यों का त्यों रहा. इस योजना में भी भारी-भरकम घोटाला, भ्रष्टाचार करके मजदूरों के साथ खिलवाड़ किया गया तो अधिकांश जगहों पर बिना काम के ही मजदूरी का बंदरबांट मजदूरों के साथ किया गया. बैंक खाते के द्वारा भुगतान के प्रयास भी इस योजना में चलने वाले भ्रष्टाचार को नहीं रोक सके.
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सरकार की उक्त दो योजनायें बच्चों के, मजदूरों के विकास के लिए बनी थी और इनका उद्देश्य भी व्यापक था, स्पष्ट था. इसके बाद भी योजना के क्रियान्वयन के लिए जिम्मेवार अधिकारियों-कर्मचारियों-जनप्रतिनिधियों ने दोनों महत्त्वपूर्ण योजनाओं को असफल ही बना दिया. ऐसे में जबकि देश में सकारात्मक कार्य करने की प्रवृत्ति लगभग समाप्ति पर है; ईमानदारी की सजा निलंबन है, मौत है; मानसिकता में घूसखोरी, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार, घोटाला शामिल होता जा रहा है; योजनाओं के लक्ष्य-समूहों के प्रति कोई संवेदना नहीं है तो फिर क्या बच्चे, क्या मजदूर और क्या गरीब. सरकार को खाद्य सुरक्षा बिल पर अतिशय जल्दबाजी दिखाने से बेहतर था कि इसके क्रियान्वयन सम्बन्धी सभी कमजोर पक्षों का निदान कर लिया जाता. उक्त दो महत्त्वपूर्ण योजनाओं से सबक लेकर इस योजना के क्रियान्वयन को लेकर मापदंड मजबूत कर लिए जाते. सरकार को ध्यान रखना चाहिए कि ये योजना गरीबों के भोजन से, जिजीविषा से सम्बद्ध है. जिस देश के योजना आयोग गरीबी की नई परिभाषा रच रहा हो, मंत्रीगण भोजन को चंद रुपयों में सहज-सुलभ बना रहे हों वहाँ जरूरतमंद नागरिकों को खाद्य सुरक्षा मिल पाना संदिग्ध ही है.

19 जुलाई 2013

मिड-डे-मील में भ्रष्टाचार से ज्यादा बच्चों के प्रति संवेदनहीनता



बिहार में मिड-डे-मील से बच्चों की मृत्यु ने इस की खामियों को एक बार फिर उजागर कर दिया. मिड-डे-मील में अव्यवस्था का ये कोई पहला मामला नहीं है, देश में जहाँ ये योजना लागू है वहां से इसमें गड़बड़ियों की शिकायत लगातार मिलती रही है. दरअसल समूची योजना को भले ही बच्चों को भोजन के माध्यम से शिक्षा देने के लिए लागू किया गया हो पर उसके क्रियान्वयन में इस नीयत को कतई शामिल नहीं किया गया. ये योजना अपने शुरूआती दौर से ही घनघोर भ्रष्टाचार का साधन बन गई. बच्चों की संख्या के हिसाब से मिलती खाद्य सामग्री और रसोइयों को मिलने वाले मानदेय को भ्रष्टाचार ने जकड़ लिया. भोजन पकाने को निश्चित मात्रा से कम सामग्री मिलना, समय से मानदेय न मिलने से क्षुब्ध रसोइयों द्वारा पूरी तन्मयता से भोजन निर्माण न करना, भोजन निर्माण-वितरण में स्वच्छता का ध्यान न रखना भी इस भ्रष्टाचार का हिस्सा बन गए.
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मिड-डे-मील में जब भी गड़बड़ी मिली, शिकायत दिखी तो उसे प्रथम दृष्टया भ्रष्टाचार माना गया, जबकि यह भ्रष्टाचार से कहीं अधिक बच्चों के प्रति राजनैतिक तंत्र की, सत्ता-पक्ष की, प्रशासन की, स्वयं हमारी संवेदनहीनता का परिचायक है. हमारे राजनैतिक तंत्र में हम मतदाताओं की कृपा-दृष्टि से ऐसे लोग पहुँच गए हैं जिनका एकमात्र उद्देश्य कहीं से भी, कैसे भी अकूत धन पैदा करना है. ऐसे लोगों में केन्द्रीय स्तर से ग्राम स्तर तक के जनप्रतिनिधि शामिल हैं, सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक शामिल है, जनप्रतिनिधि से लेकर प्रशासनिक लोग शामिल हैं. खाद्य-सामग्री का वितरण होने के पूर्व उसका बंदरबांट कर लिया जाता है. इसके अलावा भोजन सामग्री के बाज़ार में बेच दिए जाने में भी राजनीति-प्रशासन का समुचित गठजोड़ देखने को मिलता है. स्कूल स्टाफ द्वारा मिड-डे-मील में गड़बड़ी की शिकायत करने पर यदि उसको अपने उच्चाधिकारियों द्वारा किसी तरह का सहयोग नहीं मिलता है तो उसके ग्राम-प्रधान द्वारा प्रताड़ित किये जाने की आशंका रहती है. ऐसे में किसी भी तरह की धांधली पर स्कूल स्टाफ चुप्पी लगा लेना ही बेहतर समझता है. इसके साथ-साथ शिक्षा विभाग के सम्बंधित अधिकारियों-कर्मचारियों द्वारा भी चंद रुपयों की खातिर बच्चों के स्वास्थ्य, उनकी जिंदगी से खिलवाड़ किया जाता रहता है. 
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राजनैतिक, प्रशासनिक धांधलगर्जी के अलावा हम सभी की संवेदनहीनता ने भी भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया. गांवों के माता-पिता अपनी गरीबी के कारण भोजन की निम्न गुणवत्ता को जानने-समझने के बाद भी शांत रहते हैं. इसके पीछे उनके बच्चों को भोजन मिलना तो एक कारण होता ही है साथ ही ग्राम-प्रधान से बैर मोल लेने से बचना भी एक दूसरा कारण होता है. मजबूरी कितनी भी बड़ी क्यों न हो वो अपने बच्चों की जिंदगी से बड़ी नहीं हो सकती. ऐसे में किसी भी माता-पिता द्वारा घटिया भोजन की शिकायत न करना भी भ्रष्ट तंत्र को उत्प्रेरित ही करता है. इस आलेख के लेखक ने २००६-०७ में जनपद जालौन में मिड-डे-मील से सम्बंधित सर्वेक्षण कार्य स्वयं संपन्न किया था. उस समय जो विषम परिस्थितियां, अव्यवस्थाएं देखने को मिली थीं, उनमें आज २०१३ में सुधार होने के स्थान पर घनघोर गिरावट ही आई है. खाद्य-सामग्री का निम्न स्तर का मिलना, रसोई की हालत का खस्ता होना, पेयजल की कमी अथवा होने पर उसका स्वच्छ न होना, बर्तनों की उचित साफ़-सफाई न करना, भोजन निर्माण-वितरण के वातावरण का सामान्य ढंग का न होना भी संवेदनहीनता को दर्शाता है. जब तक हमारा समाज, राजनैतिक तंत्र, प्रशासन, हम सब बच्चों के प्रति संवेदनशील नहीं होंगे तब तक ये योजना घनघोर भ्रष्टाचार का शिकार बनी रहेगी और हमारे बच्चे असमय मौत का शिकार बनाये जाते रहेंगे.
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