नागरिकता संशोधन अधिनियम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
नागरिकता संशोधन अधिनियम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

12 मार्च 2024

अपने ही नागरिकों को नागरिकता देने वाला कानून

चार वर्ष से अधिक की प्रतीक्षा के पश्चात् अंततः नागरिक संशोधन अधिनियम को भारत के राजपत्र में अधिसूचित कर दिया गया. दिसम्बर 2019 में यह अधिनियम संसद के दोनों सदनों में पारित हुआ था. अब इसे अधिसूचित किये जाने के बाद इस अधिनियम के क्रियान्वयन का मार्ग प्रशस्त हो गया है. इस कानून के लागू हो जाने से भारत के तीन पड़ोसी देशों-पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को भारत की नागरिकता मिल सकेगी. संसद के दोनों सदनों से पारित इस अधिनियम के द्वारा अफगानिस्तान , बांग्लादेश और पाकिस्तान से प्रताड़ित धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए भारतीय नागरिकता का त्वरित मार्ग प्रदान करके के लिए नागरिकता अधिनियम 1955 में संशोधन किया गया था. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 5 से 11 तक नागरिकता सम्बन्धी नियमों में परिवर्तन किये गए.

 



देश की स्वतंत्रता के बाद जब 26 जनवरी 1950 को यहाँ का संविधान लागू हुआ तो भारत में जन्म लेने वाले नागरिकों को यहाँ की नागरिकता स्वतः ही मिल गई थी. इसके पश्चात् 1955 में नागरिकता कानून बनाकर उन सभी नागरिकों को भारत की नागरिकता प्रदान की गई जो पूर्व-रियासतों के नागरिक रहे थे. इस कानून में समय-समय पर परिवर्तन भी किये जाते रहे. ऐसा करने के पीछे कारण गोवा, दमन-दीव, पुडुचेरी की भौगौलिक स्थितियों में आये परिवर्तन रहे थे. दरअसल पाकिस्तान और बांग्लादेश से भूमि विवाद सुलझाने के कारण से इन क्षेत्रों में रहने वाले निवासियों को भारत की नागरिकता देने के लिए ये संशोधन किये गए थे. भूमि विवाद के साथ-साथ इन पड़ोसी देशों में धार्मिक विवाद भी लगातार देखने को मिल रहे थे. इससे शायद ही कोई इंकार करे कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान में वहाँ के अल्पसंख्यक नागरिकों-हिन्दू, सिख, जैन, ईसाई, बौद्ध और पारसी आदि को लगातार अमानवीय व्यवहार, उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है. पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय की सुरक्षा, संरक्षण के लिए नेहरू-लियाकत समझौता भी इसी कारण से धरातल पर लाया गया था. कालांतर में उसका अनुपालन असल हो गया.

 

ये एक विचारणीय स्थिति है कि देश के विभाजन के पूर्व इन तीनों पड़ोसी देशों के ये अल्पसंख्यक नागरिक इसी भारत देश के नागरिक थे, यही इनकी भी मातृभूमि थी. ऐसी स्थिति जबकि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के संरक्षण के लिए किये गए समझौते का अनुपालन करना संभव नहीं हो रहा था तो भारत की संवैधानिक जिम्मेवारी बनती थी कि वह इन प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को संरक्षण प्रदान करे. लगातार मिलते उत्पीड़न, शोषण के कारण इन देशों के अल्पसंख्यक नागरिक लगातार अपनी मातृभूमि-भारत की तरफ एक आशा की दृष्टि के साथ दौड़ पड़ते हैं. पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के ऐसे हजारों नागरिक अवैध प्रवासी के रूप में भारत में रह रहे हैं. मानवीयता के आधार पर भले ही उनकी सहायता की जा सके मगर देश की कोई भी सरकार, राज्यों की सरकारें चाह कर भी संवैधानिक रूप से उनकी सहायता नहीं कर पा रही थीं. ये तीनों देश भी अपने देश में अपने अल्पसंख्यक नागरिकों की सहायता करने में असमर्थ ही नजर आ रहे थे. ऐसे में भारत सरकार ने अपना दायित्व समझते हुए नागरिकता संशोधन अधिनियम को दोनों सदनों में पारित करवाया और उसकी विस्तीर्ण नियमावली को अधिसूचित कर दिया. यह अधिनियम इन तीनों देशों के धार्मिक अल्पसंख्यकों को देश की नागरिकता लेने की सुविधा प्रदान करता है किन्तु वह इन्हीं तीनों पडोसी देशों के मुस्लिम नागरिकों को भारत की नागरिकता लेने की सुविधा प्रदान नहीं करता है.

 

देखा जाये तो भारत सरकार की तरफ से यह एक महत्त्वपूर्ण कदम का उठाया जाना है. इस अधिनियम से देश के किसी भी अल्पसंख्यक और मुस्लिम की नागरिकता पर किसी तरह का संकट नहीं खड़ा होता है, जैसा कि पूर्व में अनेक विपक्षी राजनैतिक दलों द्वारा कहा जाता रहा है. अनेक राजनैतिक दलों के साथ-साथ अनेक मुस्लिम संगठनों ने इस अधिनियम के पारित होने के पश्चात् इसका जबरदस्त विरोध किया था. शाहीन बाग़ में एक लम्बी अवधि तक चला विरोध प्रदर्शन इसका उदाहरण है. यहाँ स्पष्ट रूप से समझने वाली बात है कि यह अधिनियम देश के किसी भी व्यक्ति, वह चाहे किसी भी धर्म का हो, की नागरिकता को खतरे में नहीं डालता है न ही उसका हनन करता है. यह अधिनियम उन वंचितों को, धार्मिक अल्पसंख्यकों को कानूनी अधिकार देता है जो पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान में प्रताड़ित होकर भारत में शरणार्थी की स्थिति में हैं. नागरिकता अधिनियम में नागरिकता के प्रावधान के सन्दर्भ में आवेदक को पिछले 12 महीनों के दौरान और पिछले 14 वर्षों में से आखिरी वर्ष में 11 महीने भारत में रहना चाहिए. कानून में हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई जो तीन देशों-अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से सम्बंधित हैं, उनके लिए 11 वर्ष की जगह 6 वर्ष तक का समय निर्धारित किया गया है. कानून में यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि किसी नियम का उल्लंघन किया जाता है तो ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया कार्डधारकों का पंजीकरण रद्द किया जा सकता है. 


भारत सरकार द्वारा कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में अपने ही उन नागरिकों को संरक्षण, सुरक्षा प्रदान किये जाने का प्रावधान किया है जो आज़ादी के समय तत्कालीन स्थितियों के चलते अनचाहे ही किसी दूसरे देश के नागरिक बन गए थे और उन देशों में वे धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यक भी थे, प्रताड़ित भी थे. इस तरह के कदम के लिए देशव्यापी समर्थन, सहयोग मिलना चाहिए था मगर कतिपय राजनैतिक स्वार्थ के चलते इस अधिनियम का अतार्किक विरोध किया गया. अब जबकि इस अधिनियम को अधिसूचित कर दिया गया है, राज्यों का अनापेक्षित हस्तक्षेप न रहे इसके लिए केन्द्रीय पोर्टल की व्यवस्था की गई है, तब सभी को अपने ही पूर्व-नागरिकों का स्वागत, सम्मान करना चाहिए जो अभी तक अपने ही देश में शरणार्थी की तरह रहने को विवश थे. 





 

26 मार्च 2020

विरोधी मानसिकता

सीएए को लेकर देश भर में तमाम राजनैतिक दलों के साथ-साथ मुस्लिम भी विरोध में हैं. देश भर में इसे लेकर हिंसा, उपद्रव होते रहे हैं. कोरोना वायरस की महामारी के चलते दिल्ली में सड़क जाम किये बैठे शाहीन बाग़ के विरोधियों को भी वहाँ से हटा दिया गया है. अब खुले रूप में कहीं भी इसका विरोध नहीं दिखाई दे रहा है. वर्तमान में ये विरोध ऊपरी तौर पर भले ही देश में न दिखाई दे रहा हो मगर मुस्लिम समुदाय के लोगों के दिमाग से विरोधी मानसिकता अभी भी गई नहीं है. अभी हाल में ऐसी घटनाएँ सामने आईं हैं जिनमें ऐसा देखने को मिला है. घटनाएँ भी सामान्य नहीं कही जा सकती हैं. 

हाल-फिलहाल हमारी अपनी निगाह से दो घटनाएँ ऐसी सामने आई हैं जिनमें सीएए का विरोध मुसलमानों में दिखाई दे रहा है, जबकि समय और स्थिति के अनुसार ऐसा किया जाना शर्मनाक कहा जाना चाहिए. ऐसी ही एक घटना में जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर अबरार अहमद ने अपने गैर-मुस्लिम विद्यार्थियों को फ़ेल कर दिया था. इसका कारण उन विद्यार्थियों का सीएए का समर्थन करना रहा है. इसे उन्होंने स्वयं अपने एक ट्वीट के द्वारा व्यक्त किया.

अपने ट्वीट में उन्होंने कहा “15 गैर मुस्लिमों को छोड़कर मेरे सभी छात्र पास हो गए हैं. अगर आप सीएए के खिलाफ आंदोलन करते हैं तो मेरे पास सीएए के पक्ष में  55 छात्र हैं. अगर आंदोलन खत्म नहीं हुआ तो बहुमत आपको सबक सिखाएगा. कोरोना के चलते आपके आंदोलन के चिह्न मिट गए हैं. मैं हैरान हूं कि आपको मुझसे नफरत क्यों है?


मामला तूल पकड़ने के बाद यूनिवर्सिटी ने उनको सस्पेंड कर दिया और जांच शुरू हो गई है. समझने वाली बात है कि यदि शिक्षक ही इसी तरह की विभेदपूर्ण मानसिकता रखेंगे तो विद्यार्थियों के साथ न्याय कैसे हो सकेगा? प्रशासन और जनता को खासतौर पर अभिभावकों को अपने आस-पास ऐसी बातों का संज्ञान लेना चाहिए.

इसी तरह एक अन्य घटना में कोरोना वायरस संक्रमण से रोकने के लिए विभिन्न समुदाय, संस्था के लोग मास्क का, दवाइयों का, सेनेटाइजर आदि का वितरण कर रहे हैं. इसी में मुस्लिम समुदाय के कुछ युवकों की तस्वीर सामने आई है जिसमें कि वे कोरोना से बचाव के लिए मास्क का वितरण कर रहे हैं. विभेद इस वितरण से नहीं अपितु उस मानसिकता से है जो इसके पीछे दिख रही है. उनके द्वारा वितरित किये जाने मास्क में No CAA छपा हुआ है. सोचने वाली बात है कि आखिर महामारी के इस संकट भरे समय में भी उनकी मानसिकता सहायता करने की बनी तो भी एक विभेद के साथ.



सरकार को, प्रशासन को ऐसी घटनाओं पर निगाह डालते हुए कार्यवाही करनी चाहिए जिससे सामाजिक सद्भाव न बिगड़ने पाए. 

.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

01 मार्च 2020

स्थितियाँ बदली नहीं हैं एक साल बाद भी

ठीक एक वर्ष पूर्व पूरा देश अपने जांबाज़ अभिनन्दन के सकुशल स्वदेश वापसी की प्रार्थना कर रहा था. पाकिस्तान के एक विमान को मार गिराने के बाद के क्रम में अभिनन्दन पाकिस्तानी सीमा में गिर पड़े. पाकिस्तान द्वारा उनको कैद किया गया. बाद में भारत की तरफ से जबरदस्त कूटनीतिज्ञ दवाब बनाया गया. इसका सुखद परिणाम ये हुआ कि अभिनन्दन की घर वापसी एक मार्च को हो गई. 



आज, ठीक एक साल बाद पूरा देश दिल्ली में हुई हिंसा के पक्ष-विपक्ष में लगा हुआ है. नागरिकता संशोधन अधिनियम को लेकर चलते विरोध के पीछे हिंसा की मानसिकता पनपती रही. अंततः दिल्ली हिंसा की चपेट में आ गई. लगभग तीन दर्जन लोग मारे गए. इसमें आम जनता शामिल है, साथ ही पुलिस के, आई बी के जवान भी चपेट में आये. सैनिकों पर तेजाब फेंका गया. 

फिलहाल कुछ शांति सी समझ आ रही है, वास्तविकता क्या है, ये दंगाई ही जानें. एक वर्ष पहले हम सीमा पार के दुश्मन से लड़ रहे थे. ठीक एक वर्ष के अंतराल में हम सीमा के भीतर के दुश्मनों से संघर्ष कर रहे हैं. स्थितियाँ बदली नहीं हैं, एक साल बाद भी. 

.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

26 फ़रवरी 2020

हम CAA का समर्थन करते हैं

देश में CAA से किसी की नागरिकता नहीं जानी है, किसी की नागरिकता छीनी नहीं जा रही है, इसके बाद भी भाजपा के विपक्षी दलों का, मुसलमानों का हंगामा मचा हुआ है. समूचे कानूनी स्वरूप में बस इतना है कि इस कानून से बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के धार्मिक अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता मिलने का रास्ता खुल गया है. यह कानून कहता है कि 31 दिसंबर 2014 या उससे पहले भारत आने वाले पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के छह धर्मों के अल्पसंख्यकों को घुसपैठिया नहीं माना जाएगा. इससे पूर्व बना नागरिकता अधिनियम 1955 अवैध प्रवासियों को भारतीय नागरिकता प्राप्त करने से प्रतिबंधित करता था. इसमें इन तीन देशों के धार्मिक अल्पसंख्यक भी शामिल थे. वर्तमान संशोधन अधिनियम के बाद इन तीन देशों के हिन्दू, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी धार्मिक अल्प्संखयक रूप में माने गए हैं.


इसी बिन्दु पर देश के मुसलमानों को राजनैतिक दलों ने बरगला कर उत्पात मचवाया हुआ है. मुसलमानों में यह भ्रान्ति फैला दी गई है कि इस कानून से उनकी नागरिकता खतरे में है. असलियत में ऐसा कुछ नहीं है मगर राजनैतिक रोटियाँ सेंकने वालों ने ऐसा माहौल बना दिया है कि समूचे देश में आग लगी हुई है. 

सच से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता. कुछ भी हो हम CAA का समर्थन करते हैं. 


#हिन्दी_ब्लॉगिंग

23 फ़रवरी 2020

CAA विरोधी उत्पातियों पर सख्ती क्यों नहीं?


CAA पर काफी लम्बे समय से दिल्ली के शाहीन बाग पर कब्ज़ा जमाकर बैठे अनशनकारियों के साथ अदालती वार्तालाप निष्फल ही निकली. इसका कोई सुफल निकलता तो दिखा नहीं बल्कि दिल्ली में अन्यत्र जाफराबाद में भी इसी तरह सड़क जाम करके उत्पात मचाने की खबर सामने आई है. शाहीन बाग़ से पहले भी लगभग सम्पूर्ण देश में CAA के नाप पर मुसलमानों द्वारा, गैर-भाजपाइयों द्वारा उत्पात मचाया जाता रहा है. ऐसा आज भी छुटपुट रूप में यहाँ-वहाँ हो रहा है. सोचने वाली बात है कि आखिर ऐसे लोगों ने देश को क्या धर्मशाला समझ रखा है? ऐसे लोगों ने क्या देश को अपनी उत्पाती फितरत को पूरा करने का मैदान समझ लिया है? इसके साथ-साथ समझ नहीं आ रहा है कि आखिर प्रशासन क्या कर रहा है? अदालत इसके लिए कोई ठोस और सशक्त आदेश क्यों नहीं देती है? उत्पात मचाते लोगों से, एक लम्बे समय से सड़क जाम करके लाखों लोगों के लिए परेशानी पैदा करने वाले लोगों से आखिर वार्ता का औचित्य क्या है? 

इस मसले पर केन्द्र सरकार को, दिल्ली सरकार को कड़े से कड़ा कदम उठाया जाना चाहिए. यदि जल्द ही इस तरह से बनते जा रहे शाहीन बाग, जाफराबाद को हटाया नहीं गया तो ये प्रदर्शन समूचे देश में एक नजीर की तरह पेश किये जायेंगे. ये आने वाले समय के लिए, देश के लिए सुखद संकेत नहीं है.