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13 नवंबर 2025

निष्क्रिय कार्यव्यवस्था

निचले स्तर से लेकर उच्च स्तर तक के प्रशासनिक ढाँचे की, अधिकारियों की, कर्मचारियों की निष्क्रिय कार्यप्रणाली निराशा पैदा करने लगी है. पिछले दो-तीन साल में व्यक्तिगत समस्याओं के साथ-साथ अन्य लोगों की परेशानियों के सम्बन्ध में की गई अनेक शिकायतों में नकारात्मकता ही हाथ लगी. इस तरह की स्थिति से भ्रष्ट, लापरवाह, पक्षपाती कार्य-संस्कृति को, कार्य-प्रणाली को, आचरण को, व्यक्तियों को बेलगाम होने का अवसर मिलता है. ऐसे में तमाम सारी विसंगतियों की, अव्यवस्थाओं की, भ्रष्टाचार की, निरंकुशता की शिकायत करना समय, श्रम, धन, क्षमता आदि का अपव्यय लगता है.

 

बावजूद इसके शांत होकर तो बैठा नहीं जा सकता है, विसंगतियों को सहन भी नहीं किया जा सकता है, भ्रष्ट कार्य-संस्कृति को अनदेखा नहीं किया जा सकता है. सवाल ख़ुद से ही पूछते हैं कि क्या कभी ये दशा सुधरेगी? क्या कभी पारदर्शी व्यवस्था बनेगी? क्या समूचे तंत्र में दायित्व बोध जागेगा? क्या जनमानस की समस्याओं के प्रति संवेदनात्मक वातावरण बनेगा?

 

ऐसे अनेक प्रश्नों के साथ संघर्ष चलता रहेगा! चलता ही रहेगा!!





13 दिसंबर 2023

संसद भवन की सुरक्षा में सेंध : लापरवाही या चूक

बाईस साल पहले संसद पर हुए आतंकी हमले को लेकर संसद में कार्यवाही चल रही थी, उसी समय संसद की सुरक्षा में घनघोर चूक, जबरदस्त लापरवाही देखने को मिली. संसद में चलती कार्यवाही के दौरान दर्शक दीर्घा से दो युवकों ने कूद कर नारेबाजी की. सदन में कूदने के साथ ही उन युवकों ने रंगीन धुआँ फैलाने वाली कैन भी उछाली, इससे सदन में रंगीन धुआँ भर गया. इसे सामान्य घटना नहीं माना जा सकता है. संसद पर हमले वाले दिन ही दर्शक दीर्घा से युवकों का सदन में कूद जाना जहाँ सुरक्षा व्यवस्था में चूक को बताता है वहीं घनघोर लापरवाही का भी सूचक है.




कुछ वर्ष पहले हमें भी पुरानी संसद भवन में दर्शक दीर्घा में बैठकर सदन की कार्यवाही देखने का अवसर मिला था. संसद भवन में प्रवेश के साथ ही जबरदस्त चौकसी शुरू हो जाती. पहले ही प्रवेश द्वार पर व्यापक रूप से जाँच की जाती है. किसी भी व्यक्ति को अपने साथ किसी भी तरह का सामान ले जाने की अनुमति नहीं थी. उनको उसी पहले सुरक्षा स्थल पर जमा करवा लिया जाता था. हम स्वयं धोखे से अपना इयरफोन गले में लटकाए रह गए, उसे भी जमा करवा लिया गया था. इसके बाद जब संसद भवन इमारत में प्रवेश करना था, उसके ठीक पहले उस पास की जाँच हुई जो सम्बंधित सांसद ने जारी किया था. यहाँ भी मुस्तैद जाँच व्यवस्था से गुजरना पड़ा. पूरे संसद भवन में जगह-जगह अनेक तरह की जाँच मशीनें अपना काम कर रही थीं.


जिस जगह पर दर्शक दीर्घा में प्रवेश करना होता था, वहाँ पर भी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी उपस्थित थे. ऐसा बिलकुल भी महसूस नहीं हो रहा था कि किसी भी तरह से सुरक्षा में, जाँच में कोताही बरती जा रही है. दर्शक दीर्घा में जाने वाले नागरिकों के जूते-चप्पल तक उतरवा लिए जा रहे थे. यहाँ भी एक-एक व्यक्ति की जाँच की जा रही थी. हमने अपनी शारीरिक असमर्थता बताते हुए जूते न उतार पाने की बात कही, छड़ी को न छोड़ पाने की असमर्थता जताई तो सुरक्षा में लगे एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्वयं ही व्यक्तिगत रूप से हमारी शारीरिक स्थिति की जाँच की. जूते उतार कर उनको पैर की स्थिति से अवगत कराया. इसके बाद उन्होंने छड़ी वहीं दरवाजे पर बाहर रखवा ली और एक सुरक्षाकर्मी ने हमें अपने हाथों का सहारा देकर अन्दर कुर्सी तक पहुँचाया. दर्शक दीर्घा में भी व्यवस्था चाक-चौबंद दिखी. सदन में कूदने का कोई रास्ता नहीं था क्योंकि चारों तरफ जाली लगी हुई थी. इसके बाद भी अन्दर सुरक्षाकर्मी पूरी मुस्तैदी से सभी पर निगाह रखे हुए थे. आपस में न तो किसी को बातें करने दे रहे थे और न ही अपने हाथ-पैर हिलाने की अनुमति दे रहे थे. अपनी आँखों को इधर-उधर घुमाते हुए अनुमान लगाया तो हर चौथे-पाँचवें व्यक्ति के आसपास सुरक्षाकर्मी मौजूद था.




पुराने संसद भवन में इस तरह की कड़ी चौकसी बरती जा रही थी, ऐसे में नए संसद भवन में चूक कैसे हो गई, ये गम्भीर प्रश्न है. कैसे दो युवक अन्दर कूद गए? कैसे उनके पास रंगीन धुएँ वाली कैन दर्शक दीर्घा तक बनी रही? क्या किसी सुरक्षाकर्मी के ही इसमें मिले होने का अंदेशा है? क्या किसी सांसद के करीबी का इसमें हाथ है? ऐसी आशंका इसलिए उभरती है क्योंकि उस समय भी किसी भी सांसद के नजदीकी रक्त-सम्बन्धी को, उनके सचिव को, खुद उनको मोबाइल सहित किसी भी सामान सहित संसद भवन के भीतर जाने की छूट थी. अब जबकि नया संसद भवन आधुनिक सुरक्षा व्यवस्था से लैस है, अत्याधुनिक तकनीक, संसाधन वहाँ मौजूद हैं, तक ऐसी चूक बिना किसी भीतरी व्यक्ति के शामिल हुए वगैर संभव नहीं लगती.


फिलहाल तो आरम्भिक जाँच आरम्भ हो गई है. इस चूक में, लापरवाही में कौन, किस तरह शामिल था इसके बारे में तो विस्तृत रिपोर्ट आने के बाद पता चलेगा. अंतिम निष्कर्ष क्या रहेगा ये तो बाद की बात है किन्तु मामला गंभीर और चिंताजनक अवश्य है. 




 

01 अक्टूबर 2021

भयावह माहौल का इंतजार

सितम्बर माह का भी समापन होने को है। इस साल के नौ महीने बीत जायेंगे कुछ घंटों बाद। वर्ष 2020 खतरनाक आहट के साथ आया था और वर्ष 2021 ने खतरनाक रूप दिखाया भी। इस खतरनाक रूप को गुजरे अभी कुछ महीने ही बीते हैं मगर ऐसा लगता है कि जैसे लोग सबकुछ भूल चुके हैं। याद करिए पिछले वर्ष 2020 को अगस्त सितम्बर से सबकुछ सामान्य होने लगा था। इस सामान्य होती दिनचर्या को तगड़ा झटका इस साल लगा। अचानक से भयावहता दिखने लगी। एकदम से ऑक्सीजन की कमी होने लगी। भयावह तरीके से मौतों की संख्या बढ़ने लगी।


रुकिए, रुक कर सोचिए, विचार करिए कि क्या ये सब महज एक बीमारी के कारण हुआ? फिर सोचिए कि इस साल के आरम्भ में वैक्सीनेशन भी शुरू हो गया था। सबकुछ सामान्य था फिर एकदम से ये भयावह रूप? मानवजनित बीमारी के बाद क्या ये सम्भव नहीं कि मानवजनित माहौल बना दिया गया हो, लोगों के मरने के लिए? क्या ये सम्भव नहीं कि जानबूझकर ऑक्सीजन की कमी कर दी गई हो? चिकित्सकों की लापरवाही तो हमने व्यक्तिगत स्तर पर देखी, अनुभव की थी। बहरहाल, जो हुआ सो हुआ पर अब क्या करना है? क्या अब तीसरी लहर के रूप में एक और साजिश का, एक और मानवजनित माहौल का सामना करना है?


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30 सितंबर 2019

वाहन चालकों के अलावा भी बहुत सी जानें कीमती हैं साहब!


शासन-प्रशासन इस समय इस चिंता में हैं कि कैसे वाहन चालकों की जान बचाई जाये. ऐसा पढ़कर आपको आश्चर्य लगेगा. लगना भी चाहिए क्योंकि बात ही ऐसी है. पिछले दिनों वाहन सम्बन्धी अधिनियम में जबरदस्त बदलाव करते हुए जुर्माने को कई-कई गुना बढ़ाया गया. कई प्रदेशों से अचानक से बड़ी-बड़ी धनराशि वाले चालानों के काटे जाने की खबरें आनी शुरू हो गईं. वाहनों के कागजातों को सही रखने, पूर्ण रखने के सम्बन्ध में जितना जोर दिया गया, उससे कहीं अधिक जोर दोपहिया वाहन चालकों के हेलमेट पहनने पर, कार चालक के सीट बेल्ट लगाने पर दिया गया. मंत्री स्तर से ऐसे बयान भी आये कि सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए ही जुर्माने को बढ़ाया गया है. समझ नहीं आया कि शासन-प्रशासन को सिर्फ वाहन चालकों की जान की ही चिंता क्यों है? सरकार की प्राथमिकता में अन्य नागरिकों की जान की सुरक्षा इस प्राथमिकता में क्यों नहीं है, जिस प्राथमिकता में वाहन चालकों की है? स्वास्थ्य, नागरिक सुरक्षा, जान-माल सुरक्षा के प्रति अभी भी लापरवाही दिखाई दे रही है. 

बहरहाल, सरकार क्या विचार कर रही है, क्या कदम उठा रही है इस पर चर्चा करना अभी इस पोस्ट का अभीष्ट नहीं है. इस पोस्ट का मंतव्य महज इतना दिखाना है कि जिम्मेवार प्रशासन भी अपने कदमों को उसी स्थिति तक उठाता है जितना कि उसे आदेशित किया जाता है. कहते हैं न कि ‘जितनी चाभी भरी राम ने, उतना चले खिलौना’ कुछ ऐसा ही रवैया प्रशासन का रहता है या कहें कि अभी वर्तमान में ऐसा बना हुआ है. जबसे मोटर अधिनियम में बड़े बदलाव हुए हैं, प्रशासन पूरी तत्परता से, तन्मयता से दोपहिया वाहन चालकों के हेलमेट को पकड़ने में लगा है. जो बिना हेलमेट पकड़ में आये उनको चालान पकड़ा दिया जा रहा है. ऐसा लग रहा है जैसे एकमात्र उसी व्यक्ति की जान कीमती है जो दोपहिया वाहन चला रहा है. ऐसा सभी जगहों की तरह से जनपद जालौन में भी हो रहा है. जिला मुख्यालय उरई में ऐसी तत्परता कुछ ज्यादा ही देखने को मिल रही है.


इसी तत्परता के बीच उरई में एक ऐसी सड़क पर, जहाँ दिन में कई बार जिला प्रशासन का, अधिकारियों का निकलना होता है, असुरक्षा विगत कई वर्षों से बनी हुई है. शहर के बीचों-बीच बने एक प्रसिद्द मंशापूर्ण हनुमान मंदिर के पास कुछ ऐसी स्थिति बनी हुई है. शहर की मुख्य सड़क और मंदिर को जाने वाली सड़क आपस में मिली हुई है मगर दोनों के बीच कई फीट का फासला (ऊँचाई) है. मुख्य सड़क और मंदिर वाली सड़क के बीच के अंतर को एक तिरछी स्थिति से पाटने की कोशिश की गई है. इस सड़क पर पूरे दिन काफी आवाजाही रहती है. इसका कारण एक तो इसका जनपद जालौन और उसके आगे अन्य मुख्य नगरों को मिलाना है. इसी सड़क पर आगे चलकर परिवहन विभाग का बस स्टैंड भी बना हुआ है, जहाँ उत्तर प्रदेश परिवहन की सभी बसों का जाना होता है. इसके साथ-साथ इसी सड़क पर जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक कार्यालय, आवास होने के साथ-साथ सभी मुख्य अधिकारियों के कार्यालय और आवासों के बने होने से भी आवाजाही बराबर बनी रहती है. दक्षिणमुखी  हनुमान जी का मंदिर होने के कारण भी श्रद्धालुओं के बीच इस मंदिर की विशेष महत्ता है. इस कारण से मंगलवार और शनिवार को यहाँ विशेष रूप से भीड़ हुआ करती है. इसके बाद भी प्रशासन द्वारा कभी भी यहाँ पर किसी तरह की ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की गई, जिससे किसी अनहोनी की स्थिति में सड़क से वाहन या पैदल नागरिक को फिसल कर मंदिर वाली सड़क गिरने से रोका जा सके.


सोचने वाली बात है कि सड़क की व्यस्त आवाजाही के बीच छोटे-बड़े वाहनों का निकलना, परिवहन विभाग की बसों की नियमित आवाजाही के चलते यहाँ वाहन चालक और पैदल यात्री असुरक्षित ही हैं. यह तो सौभाग्य है लोगों का कि छुटपुट घटनाओं के अलावा यहाँ अभी तक कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हुई है. लगता है प्रशासन अभी किसी बड़ी दुर्घटना के इंतजार में है. तब तक बिना हेलमेट वालों को पकड़ कर उनकी जान की सुरक्षा में व्यस्त रहा जाये.  




19 मई 2018

दुर्घटनाओं से नहीं सीखेंगे

बनारस में निर्माणाधीन फ्लाईओवर की बीम गिरने से हुए हादसे को महज इसलिए संवेदनशील नहीं माना जा सकता कि वह देश के प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र का हादसा है. इस हादसे को इसलिए भी संवेदनशील माना जाना चाहिए क्योंकि इस हादसे का शिकार लोग वे मासूम नागरिक हैं जिनका कोई दोष नहीं. वे सभी के सभी सेतु निगम के अधिकारियों सहित समस्त कार्यशील लोगों की लापरवाही का शिकार हो गए. बीम के रखे जाने के समय अथवा उसके बाद सम्बंधित क्षेत्र में यातायात को न रोकने, उसका डायवर्जन न करने को हादसे का जिम्मेवार बता रहे हैं वे कहीं न कहीं हादसे की गंभीरता को कम कर रहे हैं. ये समझने वाली बात होती है कि जब इस तरह के बड़े निर्माण हो रहे होते हैं और उसे सार्वजनिक क्षेत्र की कोई बड़ी संस्था के द्वारा संपन्न किया जा रहा होता है तो आम नागरिकों का एक विश्वास बना होता है. तमाम तरह की विसंगतियों के बाद जैसे आम नागरिक लोकतंत्र पर भरोसा करता है, अपने-अपने प्रदेश, देश की सरकार पर विश्वास करता है, उसके कदमों-नीतियों की आलोचना करने के बाद भी उनके प्रति विश्वास व्यक्त करता है ठीक उसी तरह की स्थिति यहाँ बनी होती है. फ्लाईओवर जैसे निर्माण आनन-फानन में नहीं किये जाते. ऐसे विस्तारपूर्ण निर्माण के लिए सम्पूर्ण मशीनरी एकजुटता से कार्य करती है. इसके बाद भी यदि किसी तरह की चूक होती है तो माना जा सकता है कि सम्बंधित तंत्र अपनी जिम्मेवारी को समझ नहीं रहा था.


अब जबकि सेतु निगम के वरिष्ठ अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है. उनसे और बाकी सम्बंधित पक्षों से पूछताछ की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. इस तरह की कार्यवाही से आगे के लिए कोई सबक मिलेगा, ऐसा लगता नहीं है. निगम के कुछ उच्चधिकारियों पर गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज करा दिया गया है, इससे होगा क्या? अदालती प्रक्रिया में तारीखों पर तारीखें पड़ती रहेंगी. हादसे का शिकार परिवार मुआवजे के कुछ लाख रुपये लेकर अपने आँसुओं को रो-रोकर सुखा लेंगे. कई-कई साल बाद संभव है कि कुछ अधिकारियों को सजा, जुरमाना जैसा कुछ हो जाये, ये भी संभव है कि वे छूट भी जाएँ. छूटने की सम्भावना इसलिए भी प्रबल दिखाई दे रही है क्योंकि पूछताछ के दौरान एक तथ्य यह भी निकल कर आया कि बीम रखने सहित अन्य निर्माण सम्बन्धी कार्यों के लिए यातायात रोकने पर निगम के कर्मियों पर प्रशासन द्वारा प्राथमिकी दर्ज करवा दी गई थी. इससे भी साफ़ है कि देश के प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में सार्वजनिक संस्थाओं के बीच आपस में ही समन्वय नहीं है.

यदि प्राथमिकी दर्ज करवाए जाने की बात सत्य है तो यह भविष्य के लिए भी बुरा संकेत है. देश लगातार विकास की प्रक्रिया से गुजरता रहता है. इस चरण में बड़े-बड़े निर्माण समाज में आम नागरिकों के बीच ही संपन्न होते हैं. दैनिक जीवन-चर्या के बीच ऐसे निर्माणों में जोखिम भी बहुत ज्यादा रहते हैं. इन जोखिमों का शिकार कई बार कर्मचारी भी होते हैं और कई बार नागरिक भी इसका शिकार हो जाते हैं. ऐसे किसी भी मामले में सम्बंधित तंत्र को चाहिए कि उससे जुड़े जितने भी विभाग हैं, संस्थाएं हैं सभी में आपस में समन्वय स्थापित कर लिया जाये. इससे भविष्य में भले ही दुर्घटनाओं को, जोखिमों को रोका न जा सके किन्तु कम तो किया ही जा सकता है. इस दुर्घटना से संस्थाएं, शासन, प्रशासन, नागरिक क्या सबक लेंगे कहा नहीं जा सकता है क्योंकि ये कोई पहली या आखिरी दुर्घटना नहीं है. आये दिन मानव-रहित रेलवे क्रासिंग की दुर्घटनाओं को हम देखते-पढ़ते हैं. आये दिन निर्माणाधीन इमारतों का गिरना सुनाई देता है, अक्सर किसी न किसी सार्वजनिक, निजी संपत्ति के कारण दुर्घटनाएं होती रहती हैं. देखने में आया है कि इन दुर्घटनाओं से कोई सीखने को तत्पर नहीं दिखता है. दुर्घटनाओं के होने के बाद भी न केवल मानव-रहित रेलवे क्रासिंग नागरिकों द्वारा पार की जाती है वरन जहाँ क्रासिंग है वहां भी दो-पहिया वाहनों वाले, पैदान नागरिक उसे पार करते देखे जाते हैं. सेल्फी मोड के चलते भी नौजवान अक्सर दुर्घटनाओं का शिकार हो रहे हैं.

ये सवाल सबसे अहम है कि हम कब सीखेंगे? क्या हम हादसों को देख-सुनकर उन्हें विस्मृत करने का काम ही करते रहेंगे? दुर्घटनाओं के बाद सरकार, शासन, प्रशासन को कोसने का काम करते रहेंगे? मुआवजे के चंद रुपये किसी व्यक्ति की भरपाई नहीं कर सकते. ये बात सरकार को, हम नागरिकों को समझनी ही होगी. न केवल समझना होगा बल्कि प्रण करना होगा कि अब ऐसी लापरवाहियाँ और नहीं, वे चाहें सम्बंधित तंत्र की तरफ से हों या फिर नागरिकों की तरफ से. आखिर एक-एक जान की कीमत उसके परिवार को, देश को चुकानी होती है.

22 नवंबर 2016

लापरवाही का खामियाजा

फिर गैरजिम्मेवारी, फिर दुर्घटना, फिर सैकड़ों इंसानों की मौत, फिर सैकड़ों घायल, फिर अनेक परिवार शोक-संतप्त, फिर मुआवजा, फिर घोषणा, फिर जाँच, फिर रिपोर्ट, फिर वही ढाक के तीन पात. कितना आसान होता है किसी दुर्घटना पर एक उच्चस्तरीय जाँच समिति बना देना. कई-कई लोगों के बयान ले लेना और फिर कार्यवाही के नाम पर महज खानापूर्ति. हर दुर्घटना के बाद, चाहे वो छोटी हो या बड़ी, सामने सिर्फ यही आता है कि इंसानी चूक के चलते, मानवीय त्रुटि के कारण दुर्घटना हुई. दुर्घटना के जिम्मेवार चंद लोगों में से कुछेक को मामूली सी सजा देकर कार्यवाही से इतिश्री कर ली जाती है. कुछ ऐसा ही किया जायेगा कानपुर देहात में पुखरायाँ के निकट दुर्घटनाग्रस्त हुई इंदौर-पटना एक्सप्रेस के मामले में भी. रविवार की सुबह तड़के तीन बजे जबकि लोग गुलाबी ठंडक में कम्बल-रजाई में दुबके नींद का आनंद ले रहे होते हैं, उसी समय मानवीय चूक का शिकार ट्रेन होती है जो देखते ही देखते सैकड़ों लोगों की जान से खेल जाती है. जोरदार धमाके और धूल के गुबार के बीच ट्रेन के चौदह डिब्बे पटरी से उतर कर जिंदगी को मौत में बदल जाने का कारक बन जाते हैं. गहन अंधकार के बीच मचती चीख-पुकार और फिर संवेदनशील नागरिकों का बचाव कार्य आरम्भ हो जाता है. इंसानी लापरवाही का नतीजा लाशों, घायलों के रूप में सामने आने लगता है. आनन-फानन सत्ता के शीर्ष की तरफ से उच्चस्तरीय जाँच के आदेश दे दिए जाते हैं. यात्रियों के बचाव कार्य, उनको उनके गंतव्य तक पहुँचाने, घायलों को उपचार के साथ-साथ सम्बंधित जिम्मेवार लोगों के बयान लेने-देने का सिलसिला भी आरम्भ होता है.
दुर्घटना स्थल पर प्रथम दृष्टया ही समझ आता है सिवाय इंसानी चूक, सम्बंधित कर्मियों की लापरवाही के अलावा कुछ हो ही नहीं सकता है. सामने आया भी कुछ ऐसा ही. ज़िन्दगी के मामले में सौभाग्यशाली रहे बहुतेरे यात्रियों ने बताया कि ट्रेन के झाँसी से चलते ही उसके एक कोच में तकनीकी समस्या सामने आ गई थी. इसके बाद भी ट्रेन को चलाये रखा गया. यात्रियों की इस तरह की बयानबाजी को उस समय बल मिला जबकि दुर्घटनाग्रस्त ट्रेन के ड्राईवर ने भी अपने बयान में कुछ इसी तरह की बात कही. सम्बंधित अधिकारियों को उसके द्वारा तकनीकी खराबी के बाद ट्रेन को कानपुर तक लिए जाने की बात कहकर समस्या से मुँह चुराने जैसी स्थिति सामने आई. इस स्थिति के चलते सम्बंधित अधिकारियों को दोषी माना जा सकता है कि उन्होंने ट्रेन की समस्या को सुधारने की कोशिश क्यों नहीं की. इसके साथ-साथ ट्रेन ड्राईवर को भी निर्दोष नहीं माना जा सकता है क्योंकि उसको तकनीकी समस्या ज्ञात हो चुकी थी, इसके बाद भी ट्रेन सौ से अधिक की रफ़्तार से दौड़ने में लगी थी. ये घनघोर लापरवाही का खामियाजा है जो सैकड़ों नागरिकों ने, कई-कई परिवारों ने भुगता है. एक जरा सी चूक, एक मामूली सी लापरवाही के चलते न जाने कितने मासूम बच्चे असमय काल का शिकार बन गए, न जाने कितने अनाथ होकर सड़कों पर भटकने लगेंगे. आखिर कब तक किसी और की लापरवाही का खामियाजा निर्दोष इंसानों को भुगतना पड़ेगा?
ये अपने आपमें शर्मसार करने वाली स्थिति है कि एक तरफ देश उन्नति, तरक्की, विकास की बात करता है, दूसरी तरफ आये दिन दुर्घटनाओं से सामना करता है. एक तरफ बुलेट ट्रेन लाने की कवायद शीर्ष सत्ता द्वारा की जा रही है वहीं दूसरी तरफ अधिकारियों द्वारा लापरवाही दिखाई जा रही है. ये समझने वाली बात है कि किसी भी स्तर पर सरकारी मशीनरी में लापरवाही चरम पर है. उनमें अपनी जिमेवारियों के प्रति, अपने दायित्व के प्रति जागरूकता का घनघोर आभाव दिखता है. इसके पीछे उनकी लापरवाही के बाद भी समुचित दंड न दिए जाने की स्थिति है. कहीं न कहीं सम्पूर्ण मशीनरी अपने बीच के लोगों को बचाने के लिए आगे-आगे काम करने लगती है. यही वो स्थिति है जहाँ कि लापरवाही शनैः-शनैः चरम पर पहुँचती जाती है. यदि किसी भी मामले में दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा देने का प्रावधान बनाया जाये तो संभवतः लोगों में अपने दायित्व के प्रति नकारात्मक भाव न जागे और लापरवाही भी कम से का हो. यदि इसी ट्रेन दुर्घटना का सन्दर्भ लिया जाये तो अधिकारियों में, सरकारी मशीनरी में जितनी मुस्तैदी अब दुर्घटना के बाद दिख रही थी यदि उतनी मुस्तैदी तकनीकी खराबी आने के पहले चरण में दिखा ली जाती तो शायद इतनी बड़ी विभीषिका को टाला जा सकता था. 



बहरहाल, लापरवाही का अंजाम जो होना था वो हुआ. हँसी-ख़ुशी अपनी मंजिल को निकले सैकड़ों यात्री बीच में ही हमेशा-हमेशा के लिए सो गए. अब सरकारी खानापूर्ति चलेगी. मुआवजे का खेल खेला जायेगा. कागजों की लीपापोती की जाएगी. कुछ दिनों के लिए कुछ लोगों का निलंबन जैसा सामान्य सा दंड दिखाई देगा और फिर सबकुछ अपने ढर्रे पर आ जायेगा. नागरिक उसी तरह से जान जोखिम में डालकर यात्रा करते रहेंगे. अधिकारी उसी निर्लज्जता के साथ लापरवाही दिखाते रहेंगे. शीर्ष सत्ता उसी तरह से सबकुछ नजरअंदाज़ करके अपने खेल में लग जाएगी. सोचना-समझना होगा कि इन सबके बीच आखिर नुकसान किसका हो रहा है?