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14 जुलाई 2026

अनावश्यक युद्ध में घिरी वैश्विक व्यवस्था

अमेरिका और ईरान के बीच चले आ रहे तनाव का अंत दिखता नहीं है. वर्तमान परिदृश्य में इनके युद्ध ने समूचे विश्व की नींद उड़ा रखी है. दोनों देश कभी युद्ध में होते हैं तो कभी कूटनीतिक प्रयास में लगे होते हैं. कभी युद्धविराम जैसी स्थिति सामने आती है लेकिन यह स्थायी रूप में नहीं रहती है. युद्धविराम के कुछ दिनों बाद पुनः वही युद्ध का माहौल नजर आने लगता है. दोनों देश अपनी-अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने लग जाते हैं. युद्धविराम का होना और फिर अचानक से युद्ध; एक अस्थायी युद्धविराम और फिर वही दुश्मनी; एक तरह का अनावश्यक युद्ध. आखिर इस युद्ध का मतलब क्या है? यदि युद्ध ही करते रहना है तो थोड़े-थोड़े अन्तराल पर युद्धविराम जैसे कदम क्यों उठाये जाते हैं?

 

अमेरिका और ईरान युद्ध के पीछे उनकी आंतरिक राजनीति, उनका लम्बा संघर्षमय इतिहास समझ आता था. इसमें 1979 की इस्लामिक क्रांति के पश्चात् ईरान ने स्वयं को अमेरिकी विरोधी घोषित कर दिया था. ऐसा करना उसकी शासन व्यवस्था की वैचारिक नींव था. इसी तरह अमेरिका अपने रणनीतिक हितों के लिए महत्वपूर्ण तेल मार्गों पर अपना नियंत्रण रखना चाहता था. इन दोनों के अपने-अपने निजी मकसद होने के कारण वर्तमान में चल रहे इस युद्ध का कोई स्पष्ट सैन्य मकसद नहीं है. यही कारण है कि दोनों देश बजाय एक-दूसरे को जीतने के, एक-दूसरे को अपनी सैन्य क्षमता दिखा रहे हैं. अब यह युद्ध स्वयं को सर्वोच्च सिद्ध करने की लड़ाई बन गया है. अमेरिका भले ही दिखावे के लिए यह चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह बंद कर दे किन्तु उसका मूल मकसद तेल मार्ग पर अपना नियन्त्रण स्थापित करना है. इसी तरह ईरान स्वयं को महाशक्ति के रूप में स्थापित करने के लिए अमेरिकी साम्राज्यवाद को नकारता रहता है.

 



दोनों देशों के अपने-अपने नितांत निजी, व्यक्तिगत मकसद होने के कारण यह युद्ध रुकता रहता है, चलता रहता है. दोनों देशों के मध्य युद्धविराम की घटनाओं को देखकर ऐसा आभास होता है कि जैसे ही दोनों में से किसी को भी यह एहसास होता है कि हमले खुद के लिए ही हानिकारक बने हुए हैं तो वे स्वतः ही युद्ध से अपने-अपने को पीछे खींच लेते हैं. ये और बात है कि वैश्विक परिदृश्य में इसे युद्धविराम के रूप में देखा जाने लगता है. तात्कालिक मुद्दों के आधार पर, अपनी-अपनी स्थिति के आकलन के आधार पर बनी व्यवस्था के आधार पर युद्धविराम तो होता है किन्तु किसी तरह की दीर्घकालिक व्यवस्था न होने के कारण युद्धविराम टिक नहीं पाता है. देखा जाये तो दोनों देशों के बीच मतभेद की मूल समस्याओं का कोई ठोस समाधान नहीं निकाला जाता है; परमाणु कार्यक्रम, विस्तारवादी नीति आदि का बना रहना दोनों के लिए ही समस्या बना रहता है. ऐसे में युद्धविराम अस्थायी रूप धारण कर लेता है. किसी भी बिंदु पर टकराहट का, मतभेद का अवसर मिलते ही दोनों देश अपनी-अपनी ताकत का प्रदर्शन करने लगते हैं.  कभी परमाणु कार्यक्रम के नाम पर, कभी तेल मार्ग होर्मुज़ के नाम पर, कभी तेलवाहक जहाजों के नाम पर युद्ध का दुष्चक्र चलता ही रहता है. ऐसे में लगता है कि इन दोनों देशों का उद्देश्य युद्ध जीतना नहीं है, दूसरे को हराना नहीं है बल्कि सामने वाली शक्ति को कमजोर करते हुए खुद को वर्चस्ववादी साबित करना है. अपने आपको अपने देश के नागरिकों के सामने एक हीरो के रूप में पूरी मजबूती के साथ दिखाना है.

 

इन दोनों देशों के अहं के कारण, इस अनावश्यक संघर्ष के कारण से आज पूरा विश्व एक अभूतपूर्व संकट से घिरा हुआ है. इनके बीच चलते युद्ध का सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है और इसके केन्द्र में कच्चे तेल का बना होना है. दुनिया के कुल कच्चे तेल उत्पादन का बहुत बड़ा भाग मध्य पूर्व द्वारा नियंत्रित किया जाता है. इन दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने के कारण फारस की खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (जलडमरूमध्य) जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर खतरा मंडराने लगता है. इन रास्तों से दुनिया का लगभग एक-तिहाई तेल गुजरता है. ऐसे में युद्ध के कारण यहाँ से कच्चे तेलवाहक जहाजों का आवागमन बाधित होता है और वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगती हैं. तेल का मँहगा होना अर्थात परिवहन, विनिर्माण, दैनिक उपयोग की वस्तुओं आदि की कीमतों में वृद्धि हो जाना. यह स्थिति किसी भी विकासशील अथवा गरीब देश के लिए किसी आपदा से कम नहीं होती है. यह युद्ध भले हो दो देशों के मध्य नजर आ रहा है किन्तु ऐसा है नहीं. इसमें कई वैश्विक और क्षेत्रीय ताकतें भी किसी न किसी रूप में शामिल हैं. इस कारण से इस युद्ध के द्वारा किसी तीसरे विश्व युद्ध की आहट लगातार गूँजती ही रहती है. इन दोनों देशों  के मध्य के हमले, मिसाइलों, ड्रोनों का सञ्चालन पूरी मानवता के लिए खतरनाक नजर आते हैं. इसके चलते अनेक देशों का खर्च अपने नागरिकों के जीवन-यापन पर व्यय होने के बजाय हथियारों की खरीद में व्यय होने लगता है. हथियारों की इस अंधी दौड़ ने पूरे विश्व को असुरक्षित बना दिया है.

 

आज जब वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन, भुखमरी, आपदाएँ, बीमारियाँ, आर्थिक असमानता आदि जैसी वास्तविक चुनौतियाँ हैं, जिनसे सबको मिलकर लड़ना चाहिए, तब पूरा विश्व किसी बड़े वैश्विक तनाव के साये से गुजर रहा है. यह युद्ध उदाहरण है राजनीतिक हठधर्मिता का, अनावश्यक अहं का, आपसी अविश्वास का, साम्राज्यवादी मानसिकता का. इस तरह के अनावश्यक कदमों से किसी भी देश का भला नहीं होने वाला है, किसी भी देश के नागरिकों का हित नहीं होने वाला है. काश कि ये दोनों देश भी इस बात को समझ लें कि इस युद्ध का अंतिम परिणाम जय-पराजय के रूप में नहीं निकलना है. इसलिए वैश्विक शांति के लिए एक स्थायी विकल्प तलाशा जाये. जब तक शांति का स्थायी स्वरूप निर्मित नहीं होता है, तब तक यह अनावश्यक नाटक चलता रहेगा. वैश्विक व्यवस्था, निर्दोष नागरिक, निरीह मानवता इसकी कीमत चुकाती रहेगी.

 


17 मार्च 2026

बारूद के ढेर पर खड़ी दुनिया की ख़ामोशी

इस वर्ष का आरम्भ पश्चिम एशिया को एक ऐसे दोराहे पर ले आया है, जहाँ से वापसी का रास्ता हाल-फ़िलहाल युद्ध के मैदानों से गुजरता दिख रहा है. ईरान, इज़राइल-अमेरिका के बीच का छद्म युद्ध अब एक सीधे युद्ध में बदल चुका है. यह संघर्ष केवल तीन देशों की सीमाओं तक सीमित नहीं है बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, परमाणु अप्रसार और नई विश्व व्यवस्था के भविष्य को निर्धारित करने वाला है. इस युद्ध में प्रत्यक्ष रूप से शामिल तीनों देशों- ईरान, इजरायल और अमेरिका के अपने-अपने निहितार्थ हैं. ईरान एक तरह से प्रतिरोधात्मक नेतृत्व का परिचायक बना हुआ है. वह इजरायल के खिलाफ कभी परदे के पीछे से लड़ता है तो कभी मिसाइलों के द्वारा सीधी चुनौती देता है. यह ईरान की बदलती सैन्य मानसिकता को दर्शाता है. यदि इस युद्ध को इजरायल के सन्दर्भ में देखा जाये तो उसके लिए यह युद्ध केवल सैन्य अभियान नहीं बल्कि अस्तित्व की लड़ाई है. उसका रणनीतिक उद्देश्य अपनी सीमाओं की रक्षा करना मात्र नहीं है बल्कि ईरान के आतंकी ढाँचे- हमास, हिजबुल्लाह और हुथी को जड़ से मिटा देना है. यदि अमेरिका की बात करें तो वह इस त्रिकोण का सबसे जटिल सिरा है. अमेरिका एक तरफ इज़राइल को पूर्ण समर्थन देने की नीति अपनाना चाहता है साथ ही वह किसी भी तरह के पूर्ण क्षेत्रीय युद्ध से बचना भी चाहता है. उसका उद्देश्य कतई यह नहीं कि वह ऐसे किसी युद्ध के द्वारा मध्य-पूर्व में लम्बे समय तक उलझा रहे.

 



इन तीनों देशों की स्थितियाँ कुछ भी क्यों न रही हों, वर्तमान में कुछ भी क्यों न बनी हो किन्तु सत्य तो यही है कि ये तीनों देश आज प्रत्यक्ष युद्ध में उतर चुके हैं. इस तरह की स्थितियों से साफ़-साफ़ समझ आ रहा है कि किसी समय विश्व पटल पर बनी एकध्रुवीय व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है. अब विश्व जहाँ बहुध्रुवीय व्यवस्था की बात तो करता है साथ ही शांति के बजाय शक्ति प्रदर्शन को तैयार रहता है. एक अकेले इसी युद्ध की बात नहीं है, वर्तमान में वैश्विक स्तर पर चल रहे अनेक युद्ध, संघर्ष इसी का परिचायक हैं. लम्बे समय से चल रहे रूस-यूक्रेन संघर्ष ने साफ़ कर दिया है कि यूरोपीय सुरक्षा संरचना ताश के पत्तों की तरह बिखर चुकी है. ऐसा ही कुछ मध्य-पूर्व क्षेत्र में नजर आ रहा है. देखा जाये तो अब मध्य-पूर्व का यह तनाव केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है, इस युद्ध ने खाड़ी देशों को भी अपनी चपेट में ले लिया है.

 

यहाँ सर्वाधिक चिंता का विषय यह है कि अब युद्ध केवल टैंकों और मिसाइलों तक सीमित नहीं रह गए हैं. समाज के अन्य क्षेत्रों की तरह युद्ध भी अब हाइब्रिड दौर में हैं. यहाँ सीधा हमला करने के बजाय साइबर हमला किया जा सकता है. साइबर हमला करके किसी भी देश की आंतरिक मूलभूत व्यवस्था को ध्वस्त किया जा सकता है, न केवल दैनिक जीवन वाले क्षेत्रों में सेंध लगाई जा सकती है बल्कि आर्थिक सञ्चालन को भी प्रभावित किया जा सकता है. युद्ध अब केवल दो देशों के मध्य ही नहीं लड़ा जाता है बल्कि सम्बंधित देशों से कहीं दूर जमीन पर भी यह युद्ध चलता दिखता है. यदि वर्तमान ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध की बात करें तो होर्मुज जलडमरूमध्य को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है. ईरान के कब्जे में होने के कारण यहाँ से गुजरने वाले जहाजों को उसकी अनुमति की आवश्यकता है. ऐसा न होने की दशा में समूचे विश्व में तेल की, गैस की कमी दिख रही है. कहा जा सकता है कि अब युद्ध में केवल सैनिक नहीं मरते बल्कि आर्थिक मंदी और रसद की कमी के कारण दूर देशों के आम नागरिक भी इसकी कीमत चुकाते हैं. इसे ड्रोन, मिसाइल, बम आदि के साथ-साथ युद्ध में आर्थिक हथियार का प्रयोग करना कहा जा सकता है. होर्मुज से जहाजों का निकलना प्रतिबंधित करना, अन्य देशों पर अनेक तरह के प्रतिबंधों का लगाया जाना एक तरह का हथियार ही है, जिसमें उन देशों की आम जनता पिसती है जिनका युद्ध से कोई लेना-देना नहीं है. इसे ऐसे समझा जा सकता है कि ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध के चलते भारत सहित अनेक देशों में पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति बाधित होने से परेशानी उत्पन्न हुई जबकि ऐसे देशों का इस युद्ध से कोई सीधे-सीधे सम्बन्ध नहीं है.

 

ऐसे समय में विश्व की महाशक्तियों को समझना होगा कि शेष विश्व के लिए क्या सही है? विश्व जनसमुदाय की अपेक्षाएँ क्या हैं? अपनी शक्ति के अनावश्यक प्रदर्शन के स्थान पर महाशक्तियों को समझना होगा कि उनकी श्रेष्ठता सैन्य शक्ति से ज्यादा शांति बनाए रखने की क्षमता से तय होगी. यदि समय रहते हथियारों की होड़ को न रोका गया, विकास की दौड़ में शामिल न हुआ गया तो आने वाली पीढ़ियाँ बारूद की राख के भीतर ही अपना अस्तित्व खोजती रहेगी. विश्व भर में चल रहे बड़े-छोटे युद्धों, संघर्षों के परिप्रेक्ष्य में समझना होगा कि अब समय आ गया है कि विश्व समुदाय केवल सीमाओं की रक्षा न करे, केवल विस्तारवाद की नीति पर काम न करे बल्कि उस साझा मानवता की रक्षा करे जो युद्ध की भेंट चढ़ रही है. सत्यता यही है कि शांति कोई विकल्प नहीं बल्कि अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है.


10 मार्च 2026

अमेरिका का बड़बोलापन

पिछले दिनों अमेरिका की वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के एक बयान के बाद भारतीय समाज में हलचल सी मच गई. इसमें न केवल राजनीति बल्कि बौद्धिक वर्ग, मीडिया, सोशल मीडिया, आमजनमानस चर्चा में शामिल हुआ. इस चर्चा में केन्द्र सरकार को, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को घेरा जाने लगा. ईरान के साथ चल रहे अमेरिका-इजरायल युद्ध के बीच अमेरिकी वित्त मंत्री ने बयान जारी करते हुए कहा कि उन्होंने भारत को तीस दिनों के लिए रूस से तेल खरीदने की अनुमति दी है. इस बयान के आते ही देश में केन्द्र सरकार को कमजोर बताया जाने लगा. विपक्षी दलों द्वारा पहले से ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए सरेंडर नरेंदर का नारा उछाला जा रहा था, इस बयान से इस नारे को और हवा मिली.

 

यहाँ एक बात समझने वाली है कि राजनीतिज्ञों का कार्य हमेशा से किसी भी तरह के बयानों को, कार्यों को, आँकड़ों को, जानकारियों को अपने मनमुताबिक तोड़-मरोड़ करके उसे जनता के बीच अपने लाभ के सन्दर्भ में उछालना रहा है. इस स्थिति से परिचित होने के बाद भी बौद्धिक वर्ग से जुड़े हुए लोगों द्वारा, मीडिया से जुड़े संस्थानों, व्यक्तियों ने, सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों ने बिना जाने-समझे, बिना जाँचे-परखे अमेरिकी वित्त मंत्री के बयान पर सरकार को दोषी ठहराना शुरू कर दिया. अमेरिकी वित्त मंत्री के बयान को परमसत्य मानने से पहले उसके मूल में छिपे सन्दर्भ को भी समझ लिया होता तो शायद सच्चाई समझ आती. उनके इस बयान के पीछे कुछ समय पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा भारत पर टैरिफ का लगाया जाना मुख्य बिन्दु रहा. दरअसल ट्रम्प ने भारत पर पचास प्रतिशत टैरिफ लगा दिया था, जो समूचे देशों पर लगाये गए टैरिफ से कहीं ज्यादा था. इसके लगाये जाने की जो वजह अमेरिका द्वारा बताई गई थी, उसने अमेरिकी वित्त मंत्री के हालिया बयान को मजबूती प्रदान की. गत वर्ष अगस्त माह में अमेरिका द्वारा भारत पर ज्यादा टैरिफ लगाए जाने का कारण रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत द्वारा रूस से तेल लेना बताया गया. अमेरिका का मानना है कि ऐसा करके भारत रूस की आर्थिक मदद कर रहा है.

 

ऐसे में एकबारगी अमेरिका के बयानों पर ध्यान देने के पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में उनके द्वारा दिए जा रहे बयानों, उनके कार्यों का आकलन ही कर लिया जाता तो भी भारत को रूस से तेल लेने के लिए तीस दिनों की अनुमति दिए जाने के सन्दर्भ में स्थिति स्पष्ट हो जाती. ऑपरेशन सिन्दूर के समय में भी ट्रम्प के बयानों में बार-बार जोर दिया जाता रहा कि उनकी कोशिशों से ही युद्ध रुका. इस तरह की बयानबाजी के बाद देश की केन्द्र सरकार को कटघरे में खड़ा किया गया. किसी आधिकारिक साईट पर जाकर सच देखने का प्रयास नहीं किया गया. ट्रम्प के ऐसे बयानों के बाद भी हमारे देश के अनेक सैन्य अधिकारियों, विशेषज्ञों के लगातार बयान आते रहे कि परमाणु हथियारों से सम्बंधित सुरक्षा को देखते हुए भारत द्वारा युद्ध-विराम जैसा कदम उठाया गया, न कि अमेरिका के दबाव में.

 

इन बयानों की सत्यता उस समय और पुख्ता होती है जबकि स्टेट ऑफ द यूनियन के सम्बोधन में ट्रम्प ने कहा कि उन्होंने भारत के ऑपरेशन सिंदूर को रोककर तीन करोड़ से अधिक लोगों की जान बचाई थी. उन्होंने दावा किया कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने कहा था कि अगर उन्होंने हस्तक्षेप नहीं किया होता तो ऑपरेशन सिंदूर के दौरान 3.5 करोड़ लोग मारे जाते. ट्रम्प ने अकेले ऑपरेशन सिन्दूर को रुकवाने की बात नहीं की बल्कि उनके द्वारा आठ युद्ध रुकवाने का भी दावा किया गया. देश के तमाम बयानवीर अभी ट्रम्प द्वारा तेल लेने की अनुमति सम्बन्धी कथित बयान पर अटके हुए हैं, उधर ट्रम्प ने अपने बड़बोलेपन में एक और विवादित बयान मीडिया के सामने सरका दिया. उन्होंने कहा कि उनके सैन्य अधिकारियों को ईरान के जहाजों को डुबोने में मजा आ रहा है. सोचा जा सकता है कि ट्रम्प किस हद तक अमानवीय होकर अपने बयानों को, अपने क़दमों को उठा रहे हैं.

 

ट्रम्प के ऐसे बयान उनको शांति का नोबेल पुरस्कार न मिल पाने की हताशा है. युद्ध उनके द्वारा महज अपनी हताशा को छिपाने और खुद को सर्वशक्तिशाली दिखाने के लिए किये जा रहे हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध में अप्रत्यक्ष रूप से यूक्रेन का भले ही साथ देना रहा हो मगर कूटनीतिज्ञ रूप से जेलेंस्की के साथ अमेरिका में किया गया बर्ताव उनकी अगम्भीरता को दर्शाता है. अब जबकि रूस से तेल लेने को अमेरिका द्वारा कथित अनुमति की चर्चा चरम पर है, उसी समय अमेरिका के ऊर्जा मंत्री क्रिस राईट बयान देते हैं कि पश्चिम एशिया में सैन्य तनाव को देखते हुए वैश्विक तेल बाजार को स्थिर रखने हेतु अमेरिका ने भारत से रूस से तेल खरीदने का आग्रह किया था. सीएनएन को दिए गए साक्षात्कार में ऊर्जा मंत्री क्रिस राईट ने बताया कि उन्होंने अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के साथ मिलकर भारतीय अधिकारियों से बातचीत कर समुद्र में पहले से उपस्थित रूसी कार्गो को भारतीय रिफाइनरियों में उतार लेने का आग्रह किया.

 

सोचने वाली बात है कि जो अमेरिका दो-चार दिन पहले भारत को अनुमति देने जैसी शब्दावली का प्रयोग कर रहा था, वही अब आग्रह जैसी भाषा बोल रहा है. दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने दूसरे कार्यकाल में बड़बोलेपन का ही उदाहरण पेश किया है, वो चाहे वैश्विक युद्ध रुकवाने की बात हो, नोबेल शांति पुरस्कार हो, टैरिफ हो या कि अब तेल खरीदने वाली बात हो. ऐसा लगता है कि ट्रम्प भली-भांति समझ चुके हैं कि भारत का विपक्ष इस स्थिति में है कि वह किसी भी छोटी से छोटी बात, झूठी बात के लिए केन्द्र सरकार का विरोध व्यापक स्तर पर करना शुरू कर देता है. इस मानसिकता को समझते हुए भारत को तेल खरीदे जाने की अनुमति देने जैसा बयान दिया. ये और बात है कि मुँह की खाने के बाद अमेरिका को अपने बयान से उलटना पड़ा. काश! ये बात भारतीय विपक्षी दल समझ पाता. 


16 दिसंबर 2025

विजय दिवस 16 दिसम्बर

आज 16 दिसम्बर को विजय दिवस देश भर में मनाया जाता है. इसको मनाये जाने का कारण 1971 में हुए युद्ध में भारत की पाकिस्तान पर जीत है. पाकिस्तान के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी ने भारत के पूर्वी सैन्य कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था. इस युद्ध के अंत के बाद 93000 पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया था. इस युद्ध में पाकिस्तान की पराजय के बाद पूर्वी पाकिस्तान स्वतंत्र हो गया था. यही स्वतंत्र भाग आज बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है. इस युद्ध में लगभग चार हजार भारतीय सैनिकों को वीरगति प्राप्त हुई थी और दस हजार के आसपास सैनिक घायल हुए थे. 




25 अक्टूबर 2025

हिंसात्मक गतिविधियों से भरा समाज

ये किसी तरह के समाज का निर्माण कर लिया हम लोगों ने? सुबह आँख खुलने से लेकर रात सोने तक कहीं न कहीं से हिंसात्मक खबरों का आना लगा ही रहता है. इन खबरों का केन्द्र देश ही नहीं रहता है बल्कि विश्व स्तर पर चारों तरफ से इसी तरह की खबरें सुनाई पड़ती हैं. कहीं दो व्यक्ति आपस में लड़ने में लगे हैं, कहीं दो परिवारों के बीच कलह मची हुई है, कहीं दो राज्यों के बीच विवाद की स्थिति है तो कहीं दो देशों में युद्ध चल रहा है. ऐसा लगता है जैसे समाज में चारों तरफ अशांति, हिंसा, वैमनष्यता, बैर आदि का समावेश बना हुआ है. सद्भाव, सहजता, शांति, धैर्य आदि को जैसे भुला ही दिया गया है. पारिवारिक सम्बन्धों में, रक्त-सम्बन्धियों में विभेद इस स्तर तक है कि एक-दूसरे की जान तक ले ली जा रही है. समाज की इकाई एक व्यक्ति के दायरे से बाहर निकल कर देखें तो एक देश के रूप में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है. विस्तारवाद की नीति के चलते, अपने वर्चस्व को, प्रभुता को थोपने की नीयत के चलते जहाँ बड़े-बड़े देशों द्वारा छोटे-छोटे देशों को किसी न किसी रूप में अपने कब्जे में किये जाने की मानसिकता काम करती है, वहीं महाशक्तियाँ अप्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे को नियंत्रित करने की नीतियाँ निर्धारित करती हैं.

 

समाज की वर्तमान स्थिति यह है कि यहाँ प्रेम, करुणा, शांति, अहिंसा से अधिक बैर, वैमनष्यता, हिंसा आदि दिखाई दे रही है. क्या कभी इस पर विचार किया गया कि आखिर ऐसा क्या है इंसानी स्वभाव के मूल में कि उसे सदियों से प्रेम, सौहार्द्र का पाठ पढ़ाना पड़ रहा है मगर वह सिर्फ और सिर्फ हिंसा की तरफ ही बढ़ता जा रहा है? आये दिन खबरें मिलती हैं मासूम बच्चियों के साथ दुराचार की, उनकी हत्या की. आये दिन देखने में आ रहा है कि प्रशासनिक अधिकारियों पर हमले किये जा रहे हैं, उनकी जान ले ली जा रही है. लगभग नित्यप्रति की खबर बनी हुई है किसी की हत्या, कहीं लूट, कहीं अपहरण, कहीं मारपीट. इसे महज दो पक्षों के बीच की स्थिति कहकर विस्मृत नहीं किया जाना चाहिए. गम्भीरता से विचार किया जाये तो स्पष्ट रूप से समझ आता है कि हिंसा, अत्याचार, क्रूरता इंसानी स्वभाव का मूल है. कोई व्यक्ति वह चाहे आम नागरिक हो या फिर अधिकार प्राप्त व्यक्ति, सभी के मन में कहीं न कहीं एक तरह का हिंसात्मक भाव-बोध छिपा होता है. आम नागरिक अपने इसी भाव-बोध के वशीभूत अपने आस-पड़ोस में हिंसात्मक गतिविधियाँ करता है तो वही किसी तानाशाही मानसिकता वाला राष्ट्राध्यक्ष विस्तारवादी मानसिकता के चलते अपने आसपास के देशों के प्रति नकारात्मक भाव रखता है.

 

यहाँ विचारणीय तथ्य यह है कि आदिमानव से महामानव बनने की होड़ में लगे इंसान को लगातार प्रेम, दया, करुणा आदि का पाठ पढ़ाया जाता रहा है. उसे समझाया जाता रहा है कि हिंसा गलत है, वह चाहे जीव पर हो, निर्जीव पर हो, पेड़-पौधों पर हो. इंसान को कदम-कदम पर सीख दी गई कि उसे आपस में सद्भाव से रहना चाहिए. आपसी वैमनष्यता से उसे दूर रहना चाहिए. उसे कभी नहीं सिखाया गया कि कैसे हिंसा करनी है. उसे किसी ने नहीं सिखाया कि कैसे दूसरे से बैर भावना रखनी है. उसे किसी भी तरीके से नहीं बताया गया कि सामने वाले की हत्या कैसे करनी है. इसे विडम्बना ही कहा जायेगा कि जो पाठ उसे सदियों से पढ़ाया जाता रहा, शिक्षकों द्वारा पढ़ाया जा रहा, परिवार द्वारा पढ़ाया जाता रहा, समाज द्वारा पढ़ाया जाता रहा इंसान उसी पाठ को कायदे से नहीं सीख पाया. इसके सापेक्ष जिस पाठ को किसी ने नहीं सिखाया, जिसे सिखाने के सम्बन्ध में कोई संस्थान नहीं है वे कार्य उसने न केवल भली-भांति सीख रखे हैं वरन वह उन्हें तीव्रता के साथ करने भी लगा है. ऐसा लगता है जैसे उसने अपने आसपास तनावपूर्ण माहौल वाली दुनिया बनाने का ही संकल्प ले रखा है.

 

इस तरह की दुनिया में जहाँ सब कुछ स्वार्थ पर आधारित होने लगा है; जहाँ व्यक्तियों की, देशों की प्रतिष्ठा का आधार अधिकार, उसका आर्थिक स्तर, शक्ति प्रदर्शन आदि होने लगा हो वहाँ आपस में खाई बनना स्वाभाविक है. वैश्विक परिदृश्य में दो देशों के बीच विगत कई वर्षों से चल रहे युद्ध, संघर्ष इसके सशक्त उदाहरण हैं. यदा-कदा संघर्ष विराम के नाम पर चंद दिनों की शांति भले ही देखने को मिल जाए, भले ही कोई अपनी पीठ स्वयं ही थपथपा ले किन्तु तनाव, संघर्ष, हमला आदि पुनः अपनी तीव्रता के साथ आरम्भ हो जाते हैं. नागरिकों के हितार्थ लिए जाने वाले निर्णय अचानक से भुला दिए जाते हैं. ऐसी स्थिति न केवल चिंतनीय है बल्कि भयावह भी है.

 

सामाजिक रूप से कितने भी प्रयास किये जाएँ किन्तु इंसानों का मूल स्वभाव बदले बिना शांति सम्भावना की स्थिति अब संभव नहीं लगती है. वर्तमान समाज इतने खाँचों में विभक्त हो चुका है कि उसे मानवीय समाज कहने के बजाय कबीलाई समाज कहना ज्यादा उचित होगा. प्रत्येक वर्ग के अपने सिद्धांत हैं, अपने आदर्श हैं, अपने विचार हैं, अपनी विचारधारा है. सबकी विचारधारा, सबके आदर्श दूसरे की विचारधारा, आदर्श से श्रेष्ठ हैं. ऐसे में श्रेष्ठता, हीनता का बोध भी इंसानी स्वभाव पर हावी हो रहा है. समझने वाली बात है जब आक्रोश की छिपी भावना के साथ-साथ स्वयं को श्रेष्ठ समझने और दूसरे को सिर्फ और सिर्फ हीन समझने की खुली भावना समाज में विकसित हो रही हो तब हिंसात्मक गतिविधियों को देखने-सहने के अलावा और कोई विकल्प हाल-फ़िलहाल दिखाई नहीं देता है. सरकार, प्रशासन, समाज, व्यक्ति सबके सब असहाय बने खुद पर हमला होते देख रहे हैं.

 


15 अक्टूबर 2025

शांति की राह पर इजराइल हमास?

अंततः अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सकारात्मक हस्तक्षेप के पश्चात् इजरायल-हमास के बीच संघर्ष विराम हो ही गया. अमेरिकी राष्ट्रपति की बीस सूत्री शांति योजना के रूप में इजरायल और हमास शांति बनाये जाने पर सहमत होने के साथ एक-दूसरे के बंधकों को छोड़े जाने पर भी सहमत हो गए. विगत दो वर्षों से चले आ रहे इस युद्ध से अब गाजा में फिलिस्तीनियों को राहत मिलेगी. हमास के आतंकी हमले के विरोध में जवाबी कार्यवाही करते हुए इजराइल ने अक्टूबर 2023 को युद्ध शुरू किया था. इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू हमेशा से ही अपनी पूर्ण विजय प्राप्त करने की नीति के लिए वैश्विक स्तर पर जाने जाते रहे हैं. अपनी इसी छवि के चलते उन्होंने युद्ध जैसी कार्यवाही शुरू करने के साथ ही इस्लामी आतंकवादी संगठन हमास को नेस्तनाबूद करने का संकल्प लिया था. उनके इस संकल्प के चलते ही विगत दो वर्षों में गाजा एक तरह के मलबे में बदल चुका है. हमास द्वारा किये गए हमले में एक हजार से अधिक इजराइली नागरिक मारे गए थे और लगभग ढाई सौ के आसपास नागरिकों को बंधक बना लिया गया था. तबसे चली इजराइली जवाबी कार्यवाही में लगभग सत्तर हजार फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं, लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं.

 

शांति का नोबेल पुरस्कार पाने की जबरदस्त आकांक्षा रखने और आखिर में निराशा हाथ आने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ने इजराइल-हमास संघर्ष विराम के द्वारा खुद को सफल साबित करने का प्रयास किया. चूँकि इजराइल शुरूआती दौर से ही अमेरिका प्रभावित रहा है और यह भी माना जा रहा था कि विगत कुछ समय से अमेरिकी राष्ट्रपति इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू से इस युद्ध को लेकर नाराज से चल रहे थे. इसके पीछे का कारण इजराइल द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति के शांति प्रयासों को कमजोर करना बताया जा रहा था. इजराइल और हमास में संघर्ष विराम की स्थिति बनने के पश्चात् इधर हमास द्वारा इजराइल के बीस बंधकों को रिहा भी कर दिया गया है उधर इजराइली सैनिकों ने दक्षिण में राफा से लेकर उत्तर में सीमावर्ती गाजा शहर तक प्रारम्भिक वापसी रेखा की ओर हटना शुरू कर दिया है. इजराइल की तरफ से भी लगभग दो हजार फिलिस्तीनी कैदियों को रिहा करने का विश्वास व्यक्त किया गया है.

 

निश्चित रूप से अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प इस संघर्ष विराम के मुख्य सूत्रधार रहे हैं. यहाँ एक बात को ध्यान में रखना होगा कि हमास आरम्भ से ही एक अनसुलझी समस्या बना रहा है. ऐसे में इस संघर्ष विराम की अवधि कितनी लम्बी हो सकेगी इस पर संशय के बादल समझौते के तत्काल बाद से नजर आने लगे हैं. इजराइल और हमास के बीच समझौता भले हो चुका को किन्तु हमास के निरस्त्रीकरण, गाजा के शासन और फिलिस्तीन को राष्ट्र के रूप में मान्यता देने जैसे जटिल मुद्दे अभी भी ज्यों के त्यों बने हुए हैं. हमास के निरस्त्रीकरण को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने उसे चेतावनी देते हुए कहा है कि उन्हें अपने हथियार छोड़ने होंगे. अगर हमास ऐसा नहीं करता है तो अमेरिका कार्यवाही करेगा.

 

देखा जाये तो यह संघर्ष विराम फिलिस्तीनियों, बंधकों और उनके परिवारों के लिए एक बड़ी राहत है. बावजूद इसके गाजा में स्थायी शांति की स्थापना अभी भी बहुत बड़ा सवाल बना हुआ है. हाल-फिलहाल यह संघर्ष विराम डोनाल्ड ट्रम्प की योजना का आरम्भिक चरण मात्र है, जिसमें गाजा को एक अंतरराष्ट्रीय शासन निकाय के अधीन रखने और उसकी सुरक्षा के लिए एक अंतरराष्ट्रीय बल की तैनाती का भी प्रावधान किया गया है. इसे लेकर हमास ने बीस बंधकों को तो रिहा कर दिया है किन्तु अन्य शर्तों पर कोई प्रतिबद्धता नहीं जताई है. गाजा में स्थायी शांति स्थापना में एक बहुत बड़ा अवरोध गाजा में इजराइली रक्षा बलों (आईडीएफ) की लगातार, नियमित रूप से बनी रहने वाली उपस्थिति भी है. संघर्ष विराम समझौते के अनुसार होने वाली सैन्य वापसी के बाद भी गाजा का पचास प्रतिशत से अधिक भाग आईडीएफ के नियंत्रण में रहेगा.

 

इजराइल-हमास संघर्ष विराम निश्चित रूप से अंतरराष्ट्रीय फलक पर एक सकारात्मक घटनाक्रम है लेकिन क्या यह संघर्ष विराम इजराइल और फिलिस्तीन के बीच की खाई को पाटकर स्थायी शांति बना सकेगा? इजराइल का कहना है कि हमास अपने हथियार छोड़े. जब तक उसकी सैन्य शक्ति खत्म नहीं होगी तब तक इस अभियान को पूरा नहीं माना जाएगा. इसके उलट हमास सशस्त्र प्रतिरोध को अपना अधिकार बताता है. इसकी सम्भावना भी नगण्य है कि हमास खुद को समाप्त किये जाने की माँग को स्वीकार करेगा. सम्भव है कि उसके ऊपर यह दबाव बनाया जाये कि वह गाजा में अपनी सत्ता छोड़कर अंतरराष्ट्रीय महाशक्तियों द्वारा समर्थित फिलिस्तीनी प्राधिकरण को सत्ता सौंप दे. इस पर इजराइल ने पश्चिमी तट की फिलिस्तीनी प्राधिकरण को किसी भी तरह की भूमिका देने से इंकार करने के साथ-साथ फिलिस्तीनी राज्य की सम्भावना को भी सिरे से नकार दिया है.

 

ऐसी असमंजस भरी स्थितियों के बीच अमेरिका, कतर, मिस्र, तुर्की सहित अन्य सहमत देशों के प्रतिनिधियों का एक संयुक्त निगरानी दल बनाये जाने का प्रस्ताव है जो संघर्ष विराम, कैदियों की रिहाई सहित हर प्रक्रिया पर नजर रखेगा. यह दल सुनिश्चित करेगा कि दोनों पक्ष अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन करें. दो सौ से अधिक अमेरिकी सैनिक इजरायल पहुँच कर वहाँ की शांति प्रक्रिया पर नजर रखने के साथ-साथ यह भी देखेंगे कि कोई भी पक्ष समझौता न तोड़े. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की नोबेल शांति पुरस्कार की चाह में इजराइल-हमास संघर्ष विराम को उनके कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि बताया जाएगा, जिससे उनको नोबेल पुरस्कार का प्रबल उम्मीदवार बनाया जा सके. ऐसे में अब ट्रम्प को स्थायी शांति के लिए प्रयास करना चाहिए. उनको किसी एक देश के पक्ष में खड़े होने के स्थान पर एक स्वतंत्र मध्यस्थ के रूप में कार्य करना चाहिए.


25 अगस्त 2025

देश का सुरक्षा कवच सुदर्शन चक्र

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस को लाल किले से मिशन सुदर्शन चक्र की घोषणा करके भारतीय सामरिक शक्ति की मजबूती तथा सक्षमता का विश्वास व्यक्त किया था. भगवान श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र से जोड़ते हुए मिशन को आधुनिक रक्षा नवाचारों में मार्गदर्शन के साथ-साथ भारतीय सांस्कृतिक और पौराणिक विरासत से प्रेरणा लेने वाला बताया जा रहा है. यह अपने आपमें सुखद है कि सुदर्शन चक्र अभियान को एक तरफ देश की पौराणिक, सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ा जा रहा है वहीं यह देश की एक प्रमुख स्ट्राइक कोर से भी जुड़ा हुआ है. भारत की प्रमुख स्ट्राइक कोर 21 को भी सुदर्शन चक्र के नाम से जाना जाता है.

 

सुदर्शन चक्र प्रोजेक्ट के पहले चरण में कम और मध्यम दूरी के लिए परीक्षण का कार्य भी सफलतापूर्वक सम्पन्न कर लिया गया है. परीक्षण के पहले चरण में भारतीय रक्षा अनुसन्धान संगठन (डीआरडीओ) ने ओड़िशा के तट पर इंटीग्रेटेड एअर डिफेंस वेपन सिस्टम (आइएडीडब्ल्यूएस) का सफल परीक्षण किया. आगामी दस वर्षों में अर्थात 2035 तक देश के प्रमुख स्थलों, सामरिक और नागरिक क्षेत्रों को तकनीकी के अत्याधुनिक स्वरूप से सुसज्जित सुरक्षा कवच प्रदान किया जाएगा. इंटीग्रेटेड एअर डिफेंस वेपन सिस्टम अर्थात आइएडीडब्ल्यूएस वह रक्षा प्रणाली है जो एक दिशा में कार्य न करते हुए समग्रता में कार्य करेगी. इसके द्वारा किसी भी दुश्मन देश द्वारा एक साथ छोड़े गए अनेकानेक ड्रोन हमलों के विरुद्ध जवाबी कार्यवाही की जा सकेगी. व्यापक रूप से वायु रक्षा प्रदान करने के लिए इस प्रणाली को रडार, मिसाइल, कमांड-कंट्रोल यूनिट के द्वारा लक्ष्य को सटीक रूप से चुनने, उस पर निशाना साधने के सन्दर्भ में निर्मित किया जा रहा है.

 



विगत लम्बे समय से वैश्विक सुरक्षा की स्थितियों, सामरिक वातावरण, भू-राजनीतिक परिदृश्य में जिस तरह के बदलाव देखने को मिल रहे हैं, उसमें सुरक्षा तंत्र का, सुरक्षात्मक प्रणालियों का विशेष महत्त्व बढ़ता जा रहा है. दो देशों के मध्य आपसी तनाव बढ़ने की स्थिति में, युद्ध की स्थिति में अब देखने में आ रहा है कि ड्रोन, मिसाइल के हमले आम बात हो गई है. विश्व भर में चल रहे अनेक युद्धों, देशों के आपसी तनाव के दौरान किये जाने वाले हमलों में इनका चलन बढ़ा ही है. अभी हाल ही में ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान देखने में आया था कि पाकिस्तान की तरफ से अनेक ड्रोन, मिसाइल ने केवल सैनिक क्षेत्रों में बल्कि नागरिक इलाकों में भी छोड़ी गईं. ऐसे में आवश्यक है कि न केवल सामरिक क्षेत्र बल्कि नागरिक क्षेत्र भी सुरक्षित रहें. सुदर्शन चक्र मिशन का मूल उद्देश्य यही है कि आने वाले समय देश के न केवल सामरिक इलाकों को बल्कि रिहायशी क्षेत्रों को भी सुरक्षात्मक रूप से मजबूत बनाया जाये.

 

वर्तमान दौर में युद्ध जैसी स्थिति में दुश्मन देश के द्वारा केवल सैनिक प्रतिष्ठानों को ही निशाना नहीं बनाया जाता है बल्कि बिजली व्यवस्था, ग्रिड, संचार साधनों, खाद्य आपूर्ति, यातायात, स्वास्थ्य सुविधाओं आदि को भी निशाना बनाया जाता है. ऐसा करने के पीछे दुश्मन की मानसिकता समूची व्यवस्था को पंगु बना देना होता है. युद्धकाल में अथवा किसी भी तरह की तनाव जैसी स्थिति में इस तरह की विषम से देश को बचाने के लिए सुदर्शन चक्र जैसी सुरक्षा प्रणाली की, एक सुरक्षा कवच की महती आवश्यकता है. यद्यपि सुदर्शन चक्र मिशन का अभी पहला चरण ही सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ है तथापि आने वाले दस वर्षों में इसके द्वारा दुश्मन के मिसाइल-ड्रोन हमलों का जवाब देने, साइबर हमलों को निष्प्रभावी बनाने, हैकिंग के खतरों को दूर करने आदि का कार्य पूर्ण क्षमता के साथ किया जाना सम्भव हो सकेगा. अब जबकि सुदर्शन चक्र जैसा सुरक्षा तंत्र अपने प्रभावी रूप में कार्य करने के लिए व्यावहारिक रूप धारण कर चुका है तो निश्चित ही यह अत्याधुनिक तकनीक, सशक्त सुरक्षा प्रणाली के द्वारा भारतीय सामरिक ढाँचे का प्रमुख आधार बनेगा.


24 जून 2025

इजराइल-ईरान युद्ध का असमंजस

ऐसा समझा जा सकता है कि पर्ल हार्बर की घटना से हम सभी परिचित ही होंगे? ऐसे समय में जबकि विश्वयुद्ध जैसा खतरा मंडरा रहा है तब पर्ल हार्बर घटना याद आना स्वाभाविक है. इसी घटना ने अलग-थलग, खामोश पड़े अमेरिका को न केवल द्वितीय विश्वयुद्ध में घसीटा बल्कि जापान पर परमाणु हमले का आधार भी तैयार किया. दरअसल द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका तब तक शामिल नहीं हुआ था लेकिन जापान को भय था कि प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका अपने इस नौसैनिक बेड़े के द्वारा जापान के क्षेत्रीय विस्तार को बाधित करेगा. इसी आशंका में जापानी वायुसेना ने अमेरिकी नौसैनिक अड्डे पर्ल हार्बर पर हमला करके अमेरिका को सैनिकों, नौसैनिक जहाजों, विमानों का भयंकर नुकसान पहुँचाया.

 

पर्ल हार्बर घटना का स्मरण तब हुआ जबकि इज़राइल-ईरान युद्ध से विश्वयुद्ध का खतरा नजर आया. ईरान के परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करने की अपनी जिद के चलते इज़राइल ने ईरान पर हवाई हमले कर दिए. ऐसे में ईरान ने भी पूरी तीव्रता से इजराइल पर पलटवार किया. युद्ध की इस स्थिति में अमेरिका के असमंजस भरे रुख को देखकर शंका हो रही थी कि कहीं इजराइल ने ईरान पर हमला करके गलती तो न कर दी? शंका से भरे वातावरण में अमेरिका ने ऑपरेशन मिडनाइट हैमर के द्वारा ईरान के तीन परमाणु ठिकानों- फोर्दो, नतांज और इस्फहान पर हमला कर दिया. इस हमले में 125 एयरक्राफ्ट, सात बी-2 स्टेल्थ बॉम्बर्स के द्वारा ईरान के परमाणु ठिकानों पर 13,608 किलो वजनी बस्टर बम गिराए गए. युद्ध में शामिल होने के बाद भी अमेरिका ने कहा कि वह ईरान से युद्ध नहीं चाहता है मगर यदि इस हमले का पलटवार ईरान द्वारा किया गया तो उसके परिणाम बहुत बुरे होंगे.

 



अमेरिका द्वारा ईरान के परमाणु संयत्रों पर हमला करने के बाद इस तरह की धमकी भरे अंदाज में बयान देने के बाद ऐसा माना जा रहा था कि ईरान इसका जवाब नहीं देगा किन्तु जिस तरह से कतर, इराक, कुवैत पर उसने मिसाइलें दागी हैं, उससे ईरान ने दुनिया को दिखा दिया है कि वह अमेरिका की धमकी या उसकी दबंगई से डरने वाला नहीं है. ईरान के इस पलटवार को पर्ल हार्बर की घटना से इसी कारण संदर्भित किया जाने लगा क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने इस कार्यकाल में विध्वंसक मोड में दिख रहे हैं. आर्थिकी क्षेत्र हो, महाशक्तियों के साथ सम्बन्ध बनाये रखने का दौर हो, दो देशों के बीच युद्धविराम जैसी स्थिति लागू करवाने सम्बन्धी वार्ताएँ हों, अन्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ वार्तालाप का कूटनीतिक व्यवहार आदि ही क्यों न हो सभी जगह ट्रम्प आक्रामक रुख अपनाते ही दिखाई दिए. ऐसे में ईरान के पलटवार को विश्वयुद्ध की आहट समझा जा रहा था. यद्यपि ईरान द्वारा छोड़ी गई मिसाइलों से अमेरिकी एयरबेस को किसी भी तरह का नुकसान नहीं हुआ, किसी भी तरह के जानमाल को भी क्षति नहीं पहुँची है तथापि ये पलटवार अमेरिका के विरुद्ध था इसलिए वैश्विक चिंता होना स्वाभाविक थी.

 

शंकाओं, असमंजस भरे बादल उस समय छँटते नजर आये जबकि ईरान द्वारा अमेरिकी बेस पर मिसाइल दागने के बाद बदला पूरा हो जाने की बात कहे जाने पर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने ईरान के मिसाइल हमले को बहुत कमजोर बताते हुए मजाक उड़ाया. ट्रम्प ने ईरान को धन्यवाद देते हुए कहा कि तेहरान ने अपने परमाणु स्थलों पर अमेरिकी बी-2 स्टील्थ बॉम्बर हमले का जवाब देने का नाटक किया है. अपनी बात को अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा कि मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि किसी भी अमेरिकी को ईरानी हमले में नुकसान नहीं पहुँचा है. मैं ईरान को हमें पहले से सूचना देने के लिए धन्यवाद देना चाहता हूँ, जिससे किसी की जान नहीं गई और कोई भी घायल नहीं हुआ. शायद ईरान अब क्षेत्र में शांति और सद्भाव की ओर बढ़ सकता है. मैं उत्साहपूर्वक इजरायल को भी ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करूँगा. इस तरह की सोशल मीडिया पोस्ट के साथ ही ट्रम्प द्वारा इजराइल और ईरान के मध्य युद्धविराम किये जाने सम्बन्धी पोस्ट भी लगाई गई. इस खबर को संतोषजनक और विश्वयुद्ध की आशंका के अंत के रूप में देखा जा रहा है.

 

इजराइल का ईरान पर हमला, ईरान द्वारा इजराइल को मुँहतोड़ जवाब देना, अमेरिका का असमंजस के बाद भी ईरान के तीन परमाणु ठिकानों को नष्ट कर देना, ईरान द्वारा अमेरिकी हमले का बदला लेने के लिए अमेरिकी एयरबेस पर मिसाइल हमला करने के भयग्रस्त वातावरण के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा इजराइल-ईरान के बीच युद्धविराम की घोषणा करना अल्पकालिक राहत ही समझ आता है. ऐसा इसलिए क्योंकि इजराइल-ईरान के मध्य युद्ध की स्थिति जिस कारण से बनी थी, अभी उसका समाधान नहीं हुआ है. इस युद्ध के केन्द्र में ईरान का परमाणु कार्यक्रम था, जो फोर्दो परमाणु संयंत्र के पूरी तरह से बर्बाद हो जाने के बाद भी अस्तित्व में है. ऐसा अंदेशा लगाया जा रहा है कि ईरान ने अमेरिकी हमले से पहले ही संवर्द्धित यूरेनियम को किसी दूसरे स्थान पर स्थानांतरित कर दिया है. यदि यह अंदेशा सही है तो ईरान का परमाणु कार्यक्रम उसे परमाणु बम बनाने तक ले जा सकता है. निश्चित है कि ऐसी कोई भी आशंका न तो अमेरिका के हित में है न ही इजराइल के. बारह दिनों तक चले युद्ध के बाद भी, अमेरिका के हमले के बाद भी यदि ईरान का परमाणु कार्यक्रम अस्तित्व में बना रहा तो यह अमेरिका और इजराइल की प्रभुता, उसकी सैन्य क्षमता के लिए भी चुनौती होगी. फ़िलहाल तो देखना यह है कि जिस युद्धविराम की घोषणा ट्रम्प द्वारा की गई है वह कितने समय तक लागू रह पाता है.


13 मई 2025

समाज के दुश्मन से लड़ने को तैयार रहें

पहलगाम में आतंकियों की अप्रत्याशित रूप से धार्मिक पहचान कर हिन्दुओं की हत्याएँ करने के बाद समूचे देश ने केन्द्र सरकार से कठोर कार्यवाही की अपेक्षा की थी. निर्दोषों को मौत की नींद सुलाने के साथ-साथ ‘मोदी को बता देना जैसी चुनौती के बीच जनसामान्य को दृढ़ विश्वास था कि केन्द्र सरकार की तरफ से जबरदस्त जवाबी कदम उठाया जायेगा. प्रत्येक दिन जितनी आशा के साथ आता, उतनी निराशा के साथ चला जाता. उरी और पुलवामा के आतंकी हमलों के बाद सरकार की तरफ से की जा चुकी सैन्य स्ट्राइक के बाद भी इस बार की चुप्पी जनसामान्य के भीतर एक तरह के रोष को जन्म दे रही थी. बहुसंख्यक भारतीय नागरिक पाकिस्तान को, पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों को सिर्फ सबक सिखाने की मंशा नहीं बल्कि उनका सम्पूर्ण विध्वंस करने की चाह रख रहे थे.

 

दरअसल जनता का मनोविज्ञान तुरंत बदला लेने का होता है. उसके लिए रणनीति, कूटनीति आदि का कोई सन्दर्भ नहीं होता है. इसके उलट सरकार के लिए युद्ध का तात्पर्य किसी दूसरे देश पर केवल हमला करना भर नहीं होता है बल्कि अपने देश, सेना, नागरिकों की अत्यल्प क्षति के साथ युद्ध को अपने पक्ष में ले जाना होता है. सरकार की मंशा कुछ इसी तरह की रही होगी कि बिना युद्ध जैसे ट्रैप में फँसे पाकिस्तान को सबक सिखाया जाये. देखा जाये तो दक्षिण एशिया की वर्तमान भू-राजनैतिक स्थितियाँ भारत के पक्ष में नहीं हैं. सभी पड़ोसी देशों में राजनैतिक हलचल मची हुई है. ऐसे में अनिश्चितकालीन अथवा दीर्घकालिक युद्ध वाला माहौल न केवल देश को क्षति पहुँचा सकता है बल्कि चीन को हस्तक्षेप करने का अवसर प्रदान कर सकता है.

 



सरकार ने अपनी नीति, अपनी योजना के अनुसार कार्य करते हुए ऑपरेशन सिन्दूर के द्वारा पाकिस्तान स्थित आतंकी शिविरों, प्रशिक्षण शिविरों पर आधी रात में मिसाइल स्ट्राइक करके उनको ध्वस्त कर दिया. जानकारी होते ही आक्रोशित जनमानस उत्साह, जोश से भर गया. बहुसंख्यक नागरिक वर्ग खुद को इस ऑपरेशन से जुड़ा हुआ महसूस करते हुए पाकिस्तान से निर्णायक मोर्चा खोलने की मंशा बनाने लगा. पाकिस्तान समर्थित आतंकियों के खिलाफ भारत सरकार की सैन्य कार्यवाई से भारतीय जनमानस का जोश अचानक से उस समय शांत कर दिया गया जबकि खबर आई कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के हस्तक्षेप से भारत और पाकिस्तान में युद्ध विराम होने जा रहा है. युद्ध विराम की घोषणा होते ही वो जनमानस जो पाकिस्तान पर कब्ज़ा किये जाने के, उसके कई हिस्सों में टूट जाने के, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के मुक्त हो जाने की बात करते हुए सरकार की शान में कशीदे पढ़ रहा था, वही एकदम से सरकार के विरुद्ध हो गया.

 

बहरहाल, मुद्दा यह नहीं कि सरकार ने आतंक के खिलाफ कार्यवाही देर से क्यों शुरू की? मुद्दा यह भी नहीं कि सम्पूर्ण ध्वंस किये बिना आखिर सरकार ने युद्ध विराम पर सहमति क्यों दी? यहाँ विचार करना होगा कि बहुतायत लोग पाकिस्तान के खिलाफ आर-पार की लड़ाई चाह रहे थे, आतंकियों का सर्वनाश चाह रहे थे उन बहुतायत लोगों के परिवारों से सेना में भर्ती होने वालों की संख्या कितनी है? इस बिन्दु पर आकर माना जा सकता है कि चलिए सभी को सेना में भर्ती नहीं किया जा सकता है; सभी को सैनिक नहीं बनाया जा सकता है; सभी को युद्ध के मैदान में नहीं भेजा जा सकता है. इन्हीं स्थितियों के बीच से एक स्थिति यह निकलती है कि देश के दुश्मन को मिट्टी में मिला देने की हुँकार भरने वाले, आतंकियों का नामोनिशान मिटाने की बात करने वाले लोग समाज के दुश्मन से, समाज के आतातायियों से लड़ने सामने क्यों नहीं आते हैं? महिलाओं-बेटियों के साथ छेड़खानी करने वाले, खुलेआम हत्या करने वाले, चेहरे पर तेजाब फेंक देने वाले, चलती गाड़ी में गैंग-रेप जैसा जघन्य कृत्य करने वाले, सरेआम लूटमार करने वाले भी किसी रूप में आतंकवादियों से कम नहीं हैं. जैसे देश के दुश्मन बड़े रूप में देश को नुकसान पहुँचाते हैं, वैसे ही ये लोग समाज को नुकसान पहुँचाते हैं.

 

ऐसे अपराधियों के मनोबल बढ़ने का कारण कहीं से इनका विरोध नहीं होना है. शांति मार्च निकाल देने, मोमबत्तियाँ जला देने, भाषणबाजी कर लेने से अपराधियों के हौसले पस्त नहीं होते. जनसामान्य की एक आम सोच है कि समाज में क्रांतिकारी तो पैदा हो मगर पड़ोसी के घर में. ऐसी सोच के चलते एक सामान्य नागरिक खुलेआम होते अपराध का सीधा विरोध नहीं करता है. किसी अपराधी का सीधा विरोध न होने से ही वह निरंतर अपराध को अंजाम देता रहता है. सोचिए, जिस तरह से हम किसी भी विरोध से पहले अपने परिजनों का, अपने परिवार का  स्मरण करने लगते हैं, उनके भविष्य के प्रति चिंतातुर होने लगते हैं ठीक वैसे ही सीमा पर तैनात सैनिक का परिवार है, परिजन हैं; वे भी किसी का परिवार हैं, परिजन हैं. उनके दुश्मन देश में सीमा पार घुसकर हमला करने को हम सभी अपना जोश, अपना उत्साह, अपनी वीरता मान लेते हैं मगर असल में यह हमारी वही मानसिकता होती है जिसमें क्रांतिकारी पड़ोस में जन्मा होता है.

 

देश के वीर सैनिक तो सीमा पर दुश्मन के खिलाफ डटे खड़े रहते हैं, अपनी जान की बाजी लगाये रहते हैं. हमें भी समाज के दुश्मनों के खिलाफ, अपने सभ्य नागरिकों के अपराधियों के विरुद्ध सीना तानकर खड़े होने की आवश्यकता है. स्मरण रखना होगा कि युद्ध सिर्फ और सिर्फ युद्ध होता है, वह चाहे देश के दुश्मन के साथ हो या समाज के दुश्मन के साथ. इसमें जानें ही जाती हैं, क्षति होती है, दुश्मन की और अपनी भी. सोचियेगा, क्या आप समाज के दुश्मन से लड़ने को तैयार हैं?


10 मई 2025

क्रोध-रोष, जोश-प्रतिशोध

पहलगाम में आतंकियों की अप्रत्याशित रूप से धार्मिक पहचान कर हिन्दुओं की हत्याएँ करने के बाद समूचे देश ने केन्द्र सरकार से कठोर कार्यवाही की अपेक्षा की थी. निर्दोषों को मौत की नींद सुलाने के साथ-साथ ‘मोदी को बता देना जैसी चुनौती के बीच जनसामान्य को दृढ़ विश्वास था कि केन्द्र सरकार की तरफ से जबरदस्त जवाबी कदम उठाया जायेगा. दिन बीतते जा रहे थे, सरकार की चुप्पी बयानों के सन्दर्भ में ही टूट रही थी, मीडिया की तरफ से लगातार कुछ न कुछ बड़ा होने जैसा संकेत दिया जाता मगर प्रत्येक दिन जितनी आशा के साथ आता, उतनी निराशा के साथ चला जाता. उरी और पुलवामा के आतंकी हमलों के बाद सरकार की तरफ से की जा चुकी सैन्य स्ट्राइक के बाद भी इस बार की चुप्पी जनसामान्य के भीतर एक तरह के रोष को जन्म दे रही थी. पहलगाम हत्याकांड के बाद आतंकवादियों, पाकिस्तान के विरुद्ध उपजा क्रोध अब सरकार की ख़ामोशी, कदमों को देखते हुए रोष में बदलने लगा था. जनसामान्य की एकराय सिर्फ और सिर्फ युद्ध जैसा कठोर कदम उठाने की थी. बहुसंख्यक भारतीय नागरिक भी पाकिस्तान को, पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों को सिर्फ सबक सिखाने की मंशा नहीं बल्कि उनका सम्पूर्ण विध्वंस करने की चाह रख रहे थे.

 

केन्द्र सरकार ने पहलगाम घटना के बाद से ही अपनी सक्रियता शुरू कर दी थी. गृह मंत्रालय के आदेश पर एनआईए ने हमले की जाँच आरम्भ की. सिन्धु जल समझौता अनिश्चितकाल के लिए निलम्बित कर दिया गया. पाकिस्तान से युद्ध होने, तनाव की स्थितियों के बाद भी इस समझौते को कभी निलम्बित नहीं किया गया था. यह पहली बार है जबकि भारत ने इसको निलम्बित किया. पाकिस्तान ने भारत के इस कदम को ‘युद्ध की कार्यवाई बताया. पाकिस्तानी नागरिकों के सभी प्रकार के वीजा रद्द करते हुए उन्हें तत्काल वापसी के आदेश दिए गए. इसी के साथ इस्लामाबाद में भारतीय मिशन और नई दिल्ली में पाकिस्तानी उच्चायोग के कर्मचारियों की संख्या को कम कर दिया गया. पाकिस्तानी उच्चायोग के रक्षा, नौसेना और वायुसेना सलाहकारों को एक सप्ताह में भारत छोड़ने का आदेश भी दिया गया. सेना के सर्च ऑपरेशन शुरू कर दिए गए. केन्द्र सरकार के ऐसे क़दमों, निर्णयों से स्पष्ट संकेत मिला कि इस बार वह शांत बैठने के मूड में नहीं है.

 



केन्द्र सरकार स्वयं तो कूटनीतिक, राजनैतिक निर्णय लेते हुए काम कर रही थी साथ ही सैन्य गतिविधियों को भी सक्रियता प्रदान कर रही थी. सरकार की तरफ से लगातार बैठकों के द्वारा सेना को उनकी सैन्य गतिविधियों के लिए खुली छूट देने जैसा आक्रामक एवं विश्वासपरक कदम उठाकर दर्शाया गया कि सरकार सुस्त अथवा खामोश नहीं है. भारतीय वायुसेना द्वारा सेंट्रल सेक्टर में एक बड़ा सैन्य अभ्यास शुरू किया गया, जिसमें पहाड़ी और जमीनी लक्ष्यों पर हवाई हमलों का अभ्यास किया गया. इसे 'आक्रमण' नाम दिया गया जिससे इसका उद्देश्‍य स्पष्ट हो जाता है. वायु सेना के अलावा नौसेना ने अरब सागर में अपनी गतिविधियों को बढ़ा दिया था. युद्धपोतों को हाई अलर्ट पर रख कर कई एंटी-शिप और एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइलों का सफलतापूर्वक परीक्षण भी किया गया.  

 

इसके बाद भी जनाक्रोश कम नहीं हो रहा था. जनमानस पाकिस्तान के विरुद्ध खुले रूप में सैन्य गतिविधि को देखना चाहता था. दरअसल जनता का मनोविज्ञान तत्काल कार्यवाही करने का, तुरंत बदला लेने का होता है. उसके लिए रणनीति, कूटनीति, राजनीति आदि का कोई सन्दर्भ नहीं होता है. इसके उलट किसी भी सरकार के लिए युद्ध तात्कालिक प्रतिक्रिया के रूप में नहीं स्वीकारा जाता है. युद्ध का तात्पर्य किसी दूसरे देश पर केवल हमला करना भर नहीं होता है बल्कि अपने देश, सेना, नागरिकों की अत्यल्प क्षति के साथ युद्ध को अपने पक्ष वाली स्थिति में ले जाना होता है. हम सभी वर्तमान में वैश्विक स्तर पर कई युद्ध देख रहे हैं, जो लम्बे समय के बाद भी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुँचे हैं. भारत सरकार की मंशा भी कुछ इसी तरह की रही होगी कि बिना युद्ध जैसे ट्रैप में फँसे पाकिस्तान को सबक सिखाया जाये. देखा जाये तो दक्षिण एशिया की वर्तमान भू-राजनैतिक स्थितियाँ भारत के पक्ष में नहीं हैं. सभी पड़ोसी देशों में राजनैतिक हलचल मची हुई है. ऐसे में अनिश्चितकालीन अथवा दीर्घकालिक युद्ध वाला माहौल न केवल देश को क्षति पहुँचा सकता है बल्कि चीन को हस्तक्षेप करने का अवसर प्रदान कर सकता है. सम्भव है कि ऐसा कुछ विचार करके केन्द्र सरकार किसी सटीक कदम को उठाने की तैयारियों में सक्रिय हो.

 

ऐसा कुछ उस समय समझ में भी आया जबकि केन्द्र की तरफ से युद्ध जैसी स्थितियों से निपटने के लिए नागरिकों को आगाह किया गया. एक निश्चित तिथि पर देश में मॉक ड्रिल, ब्लैक आउट के द्वारा युद्ध से निपटने के लिए जन-जागरूकता को बढ़ाने वाले दिशा-निर्देश जारी किये गए. इधर जनमानस में ब्लैक आउट को लेकर, मॉक ड्रिल को लेकर सक्रियता, सजगता देखने को मिल रही थी उधर सरकार कुछ बड़ा करने के मूड में थी. केन्द्र सरकार द्वारा अप्रत्याशित कदम उठाते हुए मॉक ड्रिल, ब्लैक आउट वाले दिन से पहले ही पाकिस्तान और पीओके में मिसाइल स्ट्राइक करके पाकिस्तान समर्थित आतंकियों की कमर तोड़ दी.

 

भारत की तीनों सेनाओं ने अपनी संयुक्त शक्ति के साथ आधी रात के बाद ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ के द्वारा पाकिस्तान और पीओके स्थित आतंकवादी ठिकानों पर सटीक सैन्य हमले किये. ख़ुफ़िया जानकारियों के आधार पर चिन्हित 21 आतंकी ठिकानों में से अभी 09 ठिकानों को सेना ने अपना निशाना बनाया है. इनमें पाँच केन्द्र पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में और चार पाकिस्तान में स्थित थे. इन हमलों में विशेष बात यह रही कि पाकिस्तान के किसी भी सैन्य ठिकाने को और नागरिकों को निशाना नहीं बनाया गया. सेना का निशाना पूरी तरह आतंकी केन्द्रित रहा, इसमें लश्कर-ए-तैयबा, टीआरएफ सहित कई आतंकी ठिकाने शामिल रहे. बहावलपुर (जैश-ए-मोहम्मद), मुरीदके (लश्कर-ए-तैयबा का मुख्यालय), टेहड़ा कलां (जैश-ए-मोहम्मद), सियालकोट (हिजबुल मुजाहिदीन), बरनाला (लश्कर-ए-तैयबा), कोटली (जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन का प्रशिक्षण शिविर), मुजफ्फराबाद (लश्कर-ए-तैयबा का आतंकी शिविर और जैश-ए-मोहम्मद का संचालन केन्द्र) इन हमलों में पूरी तरह ध्वस्त कर दिए गए.

 

केन्द्र सरकार ने एक सर्वदलीय बैठक में स्पष्ट रूप से कहा कि ऑपरेशन सिन्दूर अभी ख़त्म नहीं हुआ है. यह स्पष्ट सन्देश है कि आतंकी संगठनों का, उनके ठिकानों का सफाया किये बिना भारतीय सेना रुकने वाली नहीं है. अचम्भित करने वाली भारत की सैन्य कार्रवाई में दर्जनों आतंकियों और उनके करीबियों के मारे जाने की पुष्टि खुद पाकिस्तान ने की है. केन्द्र सरकार द्वारा उरी हमले के बाद की सर्जिकल स्ट्राइक तथा पुलवामा अटैक के बाद की एयर स्ट्राइक के बाद वर्तमान मिसाइल स्ट्राइक के द्वारा पाकिस्तान को स्पष्ट सन्देश दिया गया है कि भारत अब पाकिस्तानी आतंकवाद का घिनौना खेल बर्दाश्त नहीं करने वाला. निश्चित ही ऐसा दृढ़ विश्वास और आक्रामक रणनीति जनाक्रोश को समाप्त करेगी साथ ही आतंकियों का भी सर्वनाश करेगी.  


07 मई 2025

ऑपरेशन सिन्दूर के द्वारा पाकिस्तान को सबक सिखाने की शुरुआत

आज सुबह आँख खुली. जब मोबाइल पर आये हुए संदेशों को देखा तो सबसे पहले ये चित्र नजर आया. अभिन्न मित्र द्वारा भोर में भेजे गए इस चित्र से समझ आया कि किस तरह की सक्रियता रही होगी उच्च स्तर पर. 


(पहले चित्र देखिये...)



मन प्रसन्न हो गया था ये चित्र देख कर. आखिर पहलगाम आतंकी हत्याकांड में मिली चुनौती को जवाब देने का आरम्भ हो चुका था. इस चित्र के बाद जब सोशल मीडिया पर दस्तक दी गई तो चारों तरफ यही बम-बम मची हुई थी. सभी जगह से ऑपरेशन सिन्दूर पर ही गर्व किया जा रहा था. 


इसी उत्साह, उमंग, जोश ने शांत नहीं बैठने दिया. सोशल मीडिया पर कुछ सन्देश लिखित रूप में और कुछ चित्र के रूप में प्रसारित किये जाते रहे. उनकी एक झलक, आज की पोस्ट के रूप में....


Operation SINDOOR का एक अर्थ ये भी है...

ऑपरेशन SIN दूर

😊

#छीछालेदर_रस से खात्मा हो जाएगा इस SIN का.

+

अरे मोदी जी, थोड़ा सा पानी छोड़ दीजिए. बेचारे आग बुझाने से पहले पिछवाड़ा धो लें.

😜

ग़ज़ब #छीछालेदर_रस लपेटे दिख रहे टीवी पर

+

एक साथ दो-दो ऑपरेशन की जबर लहर चली,

पाकिस्तान में ऑपरेशन सिन्दूर, देश में ऑपरेशन फटी.

😜

#दुनाली कहरदार

+

भारत में सायरन बजेगा बोल के

पाकिस्तान का बैंड बजाया पेल के.

😜😆

#दुनाली ऑपरेशन सिन्दूर भरी

+

चिल्ला-चिल्ला के यही गा रहे.....

भाग डी के बोस... डी के बोस....

#छीछालेदर_रस

😜😆😜😆

(स्याले बोन चिड़ी के)

+

अंधियारे में उजियारा लाने वाली

सेना हिन्द की है,

दुश्मन को ठिकाने लगाने वाली

सेना हिन्द की है,

आघात सहकर खामोश बैठना

नहीं है अपनी फितरत,

ख़ामोशी को विस्फोट बनाने वाली

सेना हिन्द की है.

+

कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र

07.05.2025

+

ये कटपीस क्या चलायेंगे परमाणु बम,

भारतीय सेना ने सुलगा दिया इनका बम.

😜😜

बोल बम #दुनाली भारतीय सैन्य शक्ति की

+

यार, जे तो रोमंटी भई, मॉक ड्रिल की कहके तुमने तो रगड़ दओ.

अब बिलबिलाने फिर रये दोऊ तरफ़ के खजैले सुअर


कुछ चित्रों पर भी ध्यान दीजियेगा. 






(पंक्तियाँ कवयित्री अनीता सिंह की)

 




03 मार्च 2025

अमर्यादित, अशालीन कूटनीतिक व्यवहार

वर्तमान में दो राष्ट्रों रूस और यूक्रेन के बीच का युद्ध जितनी चर्चा में है, उससे कहीं अधिक चर्चा दो राष्ट्रों अमेरिका और यूक्रेन के राष्ट्रपतियों की मुलाकात की है. व्हाइट हाउस के ओवल हाउस में मीडिया के सामने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प और यूक्रेनी राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की की मुलाकात में शालीनता, मर्यादा, कूटनीति के सभी मानदण्डों का विखंडन देखने को मिला. अत्यंत कठोर और अमर्यादित लहजे में हुई बातचीत को समूचे विश्व ने देखा-सुना. अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने सख्त अंदाज़ में यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की को खरी-खोटी सुनाई वह अप्रत्याशित ही नहीं अशोभनीय भी है. सामान्य शिष्टाचार के रूप में ऐसा आचरण स्वीकार्य नहीं है, इसके साथ-साथ वैश्विक कूटनीति के स्तर पर भी इसे मर्यादित नहीं कह सकते. ट्रम्प के व्यवहार को देखकर लगा जैसे वे अपनी ताकत के बल पर, अपने सहयोग के एहसान के बदले यूक्रेन को युद्ध विराम के लिए एक तरह का दबाव बनाने का प्रयास कर रहे हैं. यूक्रेन को युद्ध के समय अमेरिकी मदद का जिक्र करना, मदद बिना यूक्रेन का युद्ध लड़ने में सक्षम न होने का दंभ दिखाना, यूक्रेन पर तीसरे विश्व युद्ध जैसे हालात उत्पन्न करने जैसा आरोप लगाना ट्रम्प का अहंकारी रवैया ही कहा जायेगा. अमेरिका संग खनन समझौते के लिए वाशिंगटन पहुँचे ज़ेलेंस्की पर अशालीन ढंग से ट्रम्प द्वारा अपना फैसला थोपने जैसा कदम उठाया गया.

 



जहाँ तक रूस-यूक्रेन युद्ध की बात है तो पिछले तीन सालों से चले आ रहे इस युद्ध का कोई अंतिम निष्कर्ष न तो निकला है और न ही निकलता दिखाई दे रहा है. इस बातचीत के बाद तो इस दिशा में अवरोध खड़े होने के आसार अधिक नजर आ रहे हैं. चूँकि ट्रम्प अपने चुनाव प्रचार के समय से ही रूस-यूक्रेन युद्ध विराम की बात करते रहे हैं, ऐसे में उनकी हडबडाहट को समझा जा सकता है. इस जल्दबाजी के कारण ही ट्रम्प पूरी मुलाकात में यूक्रेन के प्रति गम्भीर भाव नहीं दिखा सके. तीन वर्ष पूर्व आरम्भ हुए युद्ध के लिए वास्तविक जिम्मेदार कौन है, यह चर्चा का विषय अवश्य हो सकता है. रूस कभी भी इससे प्रसन्न नहीं रहा कि सोवियत संघ के कई देशों ने नाटो की सदस्यता ले ली. 1999 में अन्य यूरोपियन देशों के साथ हुई एक संधि पर रूस ने इस बात के लिए हस्ताक्षर किये थे कि प्रत्येक देश अपनी सुरक्षा के लिये किसी भी संगठन से जुड़ने को स्वतंत्र है. ऐसी संधि स्वीकारने के बाद भी रूस को सुखद प्रतीत नहीं हो रहा था कि यूक्रेन नाटो से जुड़े. ये और बात है कि 2008 में यूक्रेन द्वारा नाटो की सदस्यता माँगे जाने पर नाटो ने सदस्यता तो नहीं दी किन्तु भविष्य के लिए सदस्यता सम्बन्धी विकल्प को खुला रखा.

 

बहरहाल, रूस द्वारा यूक्रेन पर हमला करने का एक कारण यूक्रेन द्वारा नाटो की सदस्यता की मंशा रखना था. रूस द्वारा हमला किये जाने के पश्चात् यूक्रेन ने अपने दुश्मन के विरुद्ध हथियार नहीं डाले. ये भले ही अमरीकी मदद के बिना सम्भव नहीं हुआ मगर इसका अर्थ यह तो कतई नहीं कि एक राष्ट्रपति द्वारा दूसरे राष्ट्रपति को अपमानित किया जाये. ट्रम्प इस तथ्य से भली-भांति परिचित हैं कि अमेरिका की सैन्य सहायता के बिना यूक्रेन द्वारा रूस का प्रतिरोध कर पाना सहज नहीं होगा. ऐसे में युद्ध विराम के लिए ट्रम्प किसी अगुआ की भांति, किसी महाशक्ति की तरह, किसी सर्वमान्य नेता की तरह कूटनीति अपनाते हुए ज़ेलेंस्की को युद्ध विराम के लिए तैयार कर लेते तो उनके प्रयासों का महत्त्व समझ आता. जैसा कि ट्रम्प अपने बड़बोलेपन और अलग तरह की कार्य-शैली के लिए जाने जाते हैं किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि वे स्वयं को अहंकारी, अक्खड़ तरीके से प्रस्तुत करते हुए किसी दूसरे राष्ट्राध्यक्ष पर दबाव बनायें. यहाँ ट्रम्प को समझना चाहिए था कि ज़ेलेंस्की ने ट्रम्प से एक तरह का भरोसा चाहा था. अमेरिका के साथ अपने खनिज संसाधनों को बाँटने की स्थिति में यूक्रेन को भी आश्वासन चाहिए था कि रूस पीछे हट जाएगा, यूक्रेन के कब्ज़ाए हुए क्षेत्र वापस कर देगा और भविष्य में यूक्रेन पर आक्रमण नहीं करेगा. देखा जाये तो एक राष्ट्राध्यक्ष के नाते युद्ध विराम के बदले में ऐसी माँग अनुचित तो नहीं थी. ज़ेलेंस्की भी अच्छी तरह से जानते होंगे कि रूस के विरुद्ध युद्ध करते हुए यूक्रेन लगातार अपना ही नुकसान कर रहा है. भले ही यूक्रेन पूरी तरह से परास्त न हो पर वो रूस को अकेले नहीं हरा सकता है. ऐसे में सम्भव है कि ज़ेलेंस्की और यूक्रेन के नागरिक युद्ध-विराम जैसी स्थिति चाहते हों, भले ही इसके लिए अमेरिका अथवा किसी अन्य भरोसेमंद राष्ट्र की पहल का इंतजार कर रहे हों.

 

यहाँ ट्रम्प को यह नहीं भूलना चाहिए था कि वे राजनयिक अधिकारों एवं शिष्टाचार सम्बन्धी वियना समझौते के हस्ताक्षरकर्ता राष्ट्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. अहंकार में आकर वे यूक्रेन की सार्वभौमिकता, सम्प्रभुता का अपमान नहीं कर सकते. जेलेंस्की उनके मातहत किसी अधिकारी नहीं बल्कि एक संप्रभु, स्वतंत्र राष्ट्र के प्रतिनिधि के रूप में वहाँ उपस्थित थे. यह अपमान और प्रदर्शन व्हाइट हाउस की असभ्यता है, संयुक्त राष्ट्र संघ के सिद्धांतों का मखौल उड़ाना है. राजनैतिक असहमति के प्रदर्शन का यह तरीका निहायत ही निम्नस्तरीय है. ज़ेलेंस्की का खनिज समझौते पर हस्ताक्षर किये बिना वापस लौट आना, ट्रम्प का एकतरफा ऐलान सा करना कि ज़ेलेंस्की अभी शांति के मूड में नहीं हैं और जब शांति की बात करना चाहें तो हमारे दरवाजे उनके लिए खुले हैं, निश्चित रूप से युद्ध विराम सम्बन्धी स्थिति का बनने के पहले ही बिगड़ना है. ट्रम्प के इस तरह के बर्ताव के बाद यूरोपीय देशों में भी हलचल बढ़ने लगी है; रूस को भी हिम्मत मिली होगी, अब वह और अधिक हमलावर स्थिति में आने की कोशिश करेगा. यह बदलता परिदृश्य अनिश्चितताएँ बढ़ाने का कार्य करेगा.


10 दिसंबर 2024

मानवाधिकारों के समक्ष चुनौतियाँ

विश्व मानवाधिकार दिवस को सभी जगहों पर पूरी औपचारिकता, उत्साह के साथ मनाया गया. इस दिन न केवल अपने देश में बल्कि सम्पूर्ण विश्व में किसी न किसी तरह के आयोजन किये गए. कदाचित मानवाधिकार दिवस पर वे देश भी समारोह करते दिखे जो किसी न किसी तरह से युद्ध में, संघर्ष में संलिप्त हैं. संभवतः यही मानवाधिकारों की सबसे बड़ी विडम्बना है कि वैश्विक स्तर पर जिन अधिकारों को लेकर सहमति बनी हुई है उनको लेकर ही वैश्विक स्तर पर सकारात्मक सक्रियता देखने को नहीं मिलती है. मानवाधिकार इसलिए हमारे पास इसलिये हैं क्योंकि हम मनुष्य हैं. राष्ट्रीयता, लिंग, राष्ट्रीय या जातीय मूल, रंग, धर्म, भाषा या किसी अन्य स्थिति के प्रभाव से रहित इन अधिकारों को मानवों के लिए आरोपित किया गया है. इसके पीछे उद्देश्य यही रहा था कि सभी को जीने का अधिकार मिले. इस दृष्टि से मानवाधिकारों में मौलिक, जीवन के अधिकार से लेकर उन अधिकारों को शामिल किया गया है जो जीवन को जीने लायक बनाते हैं. इसमें व्यक्ति को भोजन, शिक्षा, कार्य की स्वतंत्रता, स्वास्थ्य और स्वतंत्रता का अधिकार आदि प्रदान किये गए हैं.

 

यदि उक्त कतिपय अधिकारों पर दृष्टिपात किया जाये तो प्रत्येक व्यक्ति तक इन्हीं अधिकारों की सुगमता नहीं है. सामान्य रूप से भोजन पाने की विवशता, शिक्षा पाने से बहुत बड़े वर्ग का आज भी वंचित रह जाना, जगह-जगह पर बाल-श्रम, बाल शोषण की स्थिति आज भी बनी हुई है, महिलाओं के विरुद्ध घरेलू हिंसा सम्बन्धी वातावरण का निर्मूलन नहीं हो सका है, महिलाओं के, बालिकाओं के शारीरिक शोषण सम्बन्धी घटनाओं में कमी नहीं आई है, दहेज़ हत्या, बलात्कार, ऑनर किलिंग, कन्या भ्रूण हत्या जैसी घटनाओं का समाज में अस्तित्व बना हुआ है, मजदूरों-नौकरों के प्रति अमानवीयता की घटनाएँ होती रहती हैं. न केवल अपने देश में बल्कि वैश्विक स्तर पर सामाजिक विकास की स्थिति में गिरावट आती जा रही है. आज लगभग सभी देश अपने यहाँ गरीबी, बेरोजगारी, जातीय-नस्लभेदी संघर्ष, क्षेत्रीय गुटबाजी, साम्प्रदायिक हिंसा, मानव तस्करी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, जातिगत भेदभाव आदि समस्याओं से जूझ रहे हैं. इसके अलावा कुपोषण, नशा, सुनियोजित अपराध, भ्रष्टाचार, विदेशी अतिक्रमण, तस्करी, आतंकवाद, असहिष्णुता, धार्मिक कट्टरता आदि बुराइयों का योजनाबद्ध तरीके से सञ्चालन भी मानवाधिकारों के उचित व्यवस्थापन में अवरोधक है.

 



ये सारी स्थितियाँ वे हैं जो एक देश की अंदरूनी स्थिति, परिस्थिति के कारण उत्पन्न होती हैं किन्तु विगत कुछ वर्षों से जिस तरह की स्थितियाँ वैश्विक परिदृश्य में उपजी हैं वे केवल एक देश की आंतरिक नहीं हैं. लम्बे समय से समूचा वैश्विक परिदृश्य किसी न किसी युद्ध के साये में घिरा रहा है. इन युद्धों के कारण अनेक परिवारों ने अपने सदस्यों को खो देने का दर्द सहा है. बहुतायत परिवारों, नागरिकों को पलायन का दंश सहना पड़ा है. बहुत बड़ी संख्या में युद्ध-बंदी अकारण ही यातनाओं को सह रहे हैं. देखा जाये तो इन युद्धों से केवल नागरिक ही नहीं बल्कि सैन्य परिवार भी नकारात्मक रूप से प्रभावित होते हैं. उनके भी मानवाधिकारों का हनन होता है, उनका भी उल्लंघन होता है. असल में युद्ध महज दो देशों के बीच चल रहा संघर्ष मात्र नहीं होता है बल्कि इसका नकारात्मक प्रभाव उसके आसपास तो पड़ता ही है, वैश्विक रूप में भी पड़ता है. युद्ध में संलिप्त दोनों देशों के नागरिकों के हितों, अधिकारों का हनन तो होता ही है इसके साथ-साथ आर्थिक, व्यापारिक, राजनैतिक व्यवस्थाओं में नकारात्मकता आती है. स्पष्ट है कि लम्बे समय से जहाँ एक तरफ मानवाधिकारों की स्थापना की बात की जा रही है वहीं लगातार मानवाधिकारों का उल्लंघन भी हो रहा है. बहुधा देखने में आता है कि मानवाधिकारों का उल्लंघन राज्य द्वारा भी किया जाता है. कई बार ऐसा प्रत्यक्ष रूप में दिखता है तो कई बार अप्रत्यक्ष रूप में. मानवाधिकारों का उल्लंघन एक तरह से राज्य की विफलता कही जाती है. किसी राज्य की सहायक शक्तियों के द्वारा बहुतायत में मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाएँ अक्सर होती रहती है.

 

मंच पर बैठकर, माइक के सामने खड़े होकर अधिकारों की बात तो की जाती है मगर न तो उनकी रक्षा के लिए कारगर कदम उठाये जाते हैं और न ही कर्तव्यों की बात की जाती है. सोचने वाली बात ये है कि यदि सभी अधिकार ही माँगते रहेंगे, अधिकारों का मानवों के लिए होना बताते रहेंगे मगर उनके सफल, सकारात्मक क्रियान्वयन के लिए काम नहीं किया जायेगा तो फिर ऐसे मानवाधिकारों के होने का लाभ क्या है? मानवाधिकारों की बात करते समय कभी कोई बात नहीं करता कि वह दूसरे के अधिकारों की रक्षा किस तरह से करेगा. अधिकारों की बात करने के बाद भी एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के प्रति हिंसात्मक सोच, विकृत मानसिकता, शोषण का भाव अपनाने लगता है. अपने लाभ को दरकिनार करते हुए किसी दूसरे के अधिकारों के लिए खड़े होना जीवट का काम है. वर्तमान दौर में जबकि सब एक-दूसरे को मारने-काटने की बात कर रहे हों, सभी स्वार्थ में लिप्त होकर केवल स्व की सोच में संलिप्त हों, कर्तव्यों के स्थान पर अधिकारों को प्राथमिकता दी जा रही हो तब मानवाधिकारों का संकट में घिरा होना नजर आता है, उसके सामने चुनौतियों का उभरना दिखाई देता है.


02 अक्टूबर 2024

इजरायल-ईरान संघर्ष के भारतीय सन्दर्भ

हिजबुल्लाह प्रमुख हसन नसरल्लाह की मौत के बाद भी इजराइल ने लेबनान में चरमपंथी समूह के ठिकानों पर बमबारी जारी रखी. उसने साफ कहा था कि वह हमले बंद नहीं करेगा और इजराइल के हितों पर हमला करने वाले किसी भी देश को नष्ट कर देगा. इजरायल द्वारा हिजबुल्लाह पर ताबड़तोड़ हमलों के बाद आशंका व्यक्त की जा रही थी कि कहीं इसकी परिणति ईरान द्वारा इजरायल पर हमला करने के रूप में न हो. यह आशंका मंगलवार शाम को सच साबित भी हुई जबकि ईरानी सेना ने इजरायल पर बैलिस्टिक मिसाइलों की बौछार कर दी. उसकी सेना द्वारा हमले में मुख्‍य रूप से सेना और सुरक्षा एजेंसी को निशाना बनाया गया. हमले के बाद इजरायली मीडिया ने बताया कि ईरान ने इजरायल पर 180 के आसपास बैलिस्टिक मिसाइलें दागी हैं. इस हमले के तुरंत बाद इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि ईरान ने उस पर हमला करके बहुत बड़ी गलती की है. उसे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी. नेतन्याहू के इस बयान के बाद दोनों देशों के मध्य सीधे युद्ध की आशंका तीव्र हो गई है. माना जा रहा है कि इजरायल किसी भी वक्त ईरान पर सीधा हमला कर सकता है.  

 

पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के साथ ही इजराइल और हिजबुल्लाह के बीच संघर्ष का वर्तमान दौर के चलते सम्पूर्ण अंतरराष्ट्रीय समुदाय महत्वपूर्ण मोड़ पर है क्योंकि इस संघर्ष में अब ईरान के शामिल हो जाने से भू-राजनीतिक चुनौतियाँ बढ़ गई हैं. ईरान की यौद्धिक स्थिति पर विचार करते समय सावधानी बरतना जरूरी है. इजराइल के पास बड़ी सैन्य शक्ति है और उसे अमेरिका से समर्थन प्राप्त है. ईरान के साथ इजरायल की युद्ध स्थिति यदि बढ़ती है तो इसके परिणाम को और वर्तमान को भारतीय हितों के सन्दर्भ में समझने की आवश्यकता है. जहाँ तक भारत के हितों का सवाल है, पश्चिम एशिया, विशेष रूप में खाड़ी देशों में भारतीय नागरिकों के लिए यह संघर्ष एक तरह का जोखिम पैदा कर ही सकता है.

 



यदि भारतीय सन्दर्भों में इजरायल और ईरान को देखें तो किसी समय भारत की नीति फिलिस्तीन को समर्थन देने की रही है मगर पिछले दो दशकों से अधिक समय से भारत और इजरायल के बीच सम्बन्ध प्रगाढ़ हुए हैं. सैन्य सम्बन्धों, उपकरणों, तकनीकी, ख़ुफ़िया तंत्र आदि के विकसित स्वरूप के लिए इजरायल बराबर भारत का साथ दे रहा है. पिछले दशक में 2.9 अरब डॉलर मूल्य की मिसाइलें, रडार, निगरानी और लड़ाकू ड्रोन का निर्यात इजरायल से किया गया है. इजरायल के साथ-साथ भारत के सम्बन्ध ईरान के साथ भी महत्त्वपूर्ण समझे जाते हैं. देश का चाहबार पोर्ट उन्हीं के क्षेत्र में हैं, जिसके माध्यम से यूरोप को जोड़ने की कल्पना को साकार किया जा सका है. भारत ने 2016 में चाबहार को विकसित करने के लिए 8.5 करोड़ डॉलर का निवेश किया था और तेहरान को 15 करोड़ डॉलर की क्रेडिट लाइन भी दी थी. इसके साथ-साथ ईरानी तेल-गैस भी भारत के लिए हाइड्रोकार्बन के निकटतम स्रोत हैं. अमेरिकी प्रतिबंधों से पहले भारत ईरानी तेल का बड़ा खरीदार था. ऐसे में इजरायल और ईरान का संघर्ष बढ़ने पर भारत के सामने नई चुनौती आएगी.

 

ईरान युद्ध में शामिल होने के बाद ऐसा माना जा रहा है कि वह तेल की आपूर्ति को बाधित कर सकता है या फिर यह बाधा युद्ध के कारण स्वतः बन सकती है. दोनों ही स्थितियों में तेल की कीमतों का बढ़ना तय है. भारत कच्चे तेल के क्षेत्र में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है और उसे अपनी ऊर्जा-आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आयात पर निर्भर रहना पड़ता है. ऐसे में तेल कीमतों की वृद्धि से भारतीय आर्थिक विकास दर के नकारात्मक स्थिति में जाने की आशंका भी बनती है. यह देश के आर्थिक विकास की दृष्टि से उचित नहीं. इसके अलावा खाड़ी देशों में काम करते भारतीयों पर भी इस युद्ध का नकारात्मक असर पड़ने की सम्भावना है. एक अनुमान के अनुसार नब्बे लाख के आसपास भारतीय नागरिक खाड़ी देशों में काम करते हैं. ईरान के हमले के बाद यदि इजरायल सीधे-सीधे युद्ध की स्थिति में उतर आया तो ऐसी स्थिति में ये भारतीय खाड़ी देशों से वापस अपने देश को आने लगेंगे. इससे भी मध्य पूर्व क्षेत्र में भारत के लगभग 195 बिलियन डॉलर के बाईलेटरल व्यापार पर भी असर पड़ेगा.

 

यद्यपि भारत द्वारा इजरायल-हमास संघर्ष के आरंभिक दौर से ही इस संघर्ष को शांत करने के प्रयास किये जाते रहे तथापि उसे इसमें सफलता नहीं मिली. इजराइल पर हमास के आतंकवादी हमले के बाद से ही भारत ने मध्य-पूर्व क्षेत्र के सऊदी अरब, ईरान, मिस्र, फिलिस्तीन सहित अनेक यूरोपीय नेताओं से वार्ता की. लगातार चर्चाओं, वार्ताओं के बाद भी संघर्ष बढ़ता ही गया और अब वह एक युद्ध के रूप में नजर आ रहा है. भारत के ईरान के साथ लम्बे समय से रणनीतिक संबंध हैं, वहीं मोदी सरकार ने इजराइल के साथ भी गहरे सम्बन्ध विकसित किए हैं. ऐसे में भारत को आतंकी संगठनों, आतंकवादियों के समूल नाश किये जाने के प्रति दृढ़प्रतिज्ञ रहते हुए भविष्य और तमाम आशंकाओं के सन्दर्भ में दोनों देशों के साथ कूटनीतिक स्तर पर कदम बढ़ाते हुए युद्ध जैसी स्थिति को न बनने देने के प्रयास करने चाहिए.