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13 अक्टूबर 2022

खुद का आकलन खुद की नजरों में

इधर बहुत दिनों से खुद अपने व्यवहार का अध्ययन किया जा रहा है. अपने आपको अपनी ही नजर से विश्लेषित किया जा रहा है, खुद का आकलन किया जा रहा है. अभी निष्कर्ष रूप में बहुत कुछ तो नहीं कहा जा सकता है किन्तु बहुत कुछ ऐसा है जो अपने बारे में और भी स्पष्ट दिखाई देने लगा है. वैसे ऐसा नहीं है कि अपने कामों के बारे में, अपने स्वभाव के बारे में इधर ही कुछ दिन से आकलन करना शुरू किया है. इस तरह का काम बरसों से किया जा रहा है. यदि कहा जाये कि बचपन से तो कोई अतिश्योक्ति न होगी.


उन दिनों हम कक्षा सात या आठ में पढ़ते होंगे. उस समय अपने बाबा जी के साथ सुबह की सैर पर जाया करते थे. बाबा जी के साथ की सैर का लाभ तो मिला ही, उनके बहुत सारे अनुभवों से सीखने का भी अवसर मिला. अजनारी गाँव तक लगभग तीन किमी तक की सैर के दौरान बाबा जी से बहुत सारी सीख, शिक्षाएँ भी मिलती रहती थीं, जिनके द्वारा आज तक मार्गदर्शन मिलता रहता है. बाबा जी ने ही उसी समय सिखाया था कि कभी भी कितनी ही बड़ी समस्या क्यों न हो, उसका समाधान उसके छोटे रूप से सोचना शुरू करो, निकल आएगा. समस्या को बड़ा करके देखने पर समस्या ही बहुत बड़ी समझ आने लगती है तो समाधान खोजना मुश्किल हो जाता है.




ऐसी अनेक शिक्षाओं के साथ बाबा जी ने सिखाया था कि रोज रात को सोने के पहले कुछ न कुछ पढ़ना अच्छा रहता है. लिखने-पढ़ने की आदत उसी का सुखद परिणाम है. आज भी विगत कई वर्षों से नियम बना हुआ है कि रोज रात को सोने के पहले कुछ न कुछ पढ़ा अवश्य जाता है, भले ही वह पढ़ना कुछ पृष्ठ का ही हो. इसी तरह से बाबा जी ने एक बात और बताई थी कि दिन भर जो भी काम करो, उनके बारे में रात को सोने के ठीक पहले विचार किया करो. देखो कि कौन सा काम गलत किया, कौन सा काम सही किया. किसकी सहायता की, किसका नुकसान किया. इसके बाद अगले दिन के लिए संकल्प करो कि गलत काम जो आज हुआ, वो कल से नहीं होगा. जो नुकसान दूसरे का किया, वो फिर न होने पाए. ये आदत आज तक बनी हुई है. इसी के चलते कोशिश रहती है, खुद को सुधारने की, अपना स्वभाव सही करने की.


इसी आदत को विगत कुछ समय से विस्तार देने की कोशिश है. खुद को खुद की नजर से देखने, परखने की कोशिश है. ऐसा लगता है हमें खुद के बारे में जैसे संबंधों, रिश्तों, दोस्ती में कई बार सामने वाले पर हम अपनी इच्छा थोपने सी लगते हैं. सामने वाले पर अपना अधिकार सा मानते हुए उससे अपनी बात को मनवाने की चेष्टा करते हैं. यद्यपि ऐसा करवाने के पीछे किसी तरह की गलत मानसिकता नहीं होती है तथापि लगता है कि आखिर सामने वाले की भी अपनी सोच है, उसकी भी अपनी पसंद है. ऐसा होना आम बात है कि कोई काम, कोई बात हमें नापसंद हो, आवश्यक नहीं वही बात हमारे अभिन्न मित्र को भी नापसंद हो. बावजूद ये समझने के हम उसे अपनी पसंद के लिए मजबूर सा करते हैं. बात न मानने की स्थिति में कई बार गुस्सा आता है मगर सामने वाले पर नहीं, खुद पर. लगता है कि आखिर क्यों अपनी बात को अगले पर थोप रहे थे, आखिर उसका भी अपना अधिकार है, किसी बात को मानने या न मानने का, किसी काम को करने या न करने का.


हमारी जिद तरीके की ऐसी हरकत महज इसी भाव में हो जाती है कि हम अगले व्यक्ति पर अपना सम्पूर्ण अधिकार सा मान लेते हैं, समझ लेते हैं. लगातार कोशिश यही है कि अपनी ऐसी आदत पर नियंत्रण कर सकें. अपनी जिद जैसी इच्छा को अपने किसी ख़ास, विशेष पर जबरन न थोपा जाये. 




 

28 नवंबर 2018

मनुष्य को आदतों का गुलाम नहीं बल्कि उनका स्वामी होना चाहिए


आदत किसी व्यक्ति के उस व्यवहार को कहते हैं जिसे वह बार-बार दोहराता है. ऐसा करने के पीछे उसकी विशेष मंशा या सोच काम नहीं करती है, बस उसका अंतर्मन सम्बंधित कार्य के लिए उसे एक तरह से उकसाता है. मनुष्य की आदत उसके द्वारा अर्जित की गई प्रवृत्ति होती है. यह किसी भी तरह से उसको जन्मजात नहीं मिली होती है. उम्र, समय, परिस्थिति के अनुसार मनुष्य की आदतें बदलती रहती हैं. कई बार देखने में आया है कि कोई एक आदत अथवा कई आदतें मुनष्य के मानसिक संस्कार का रूप ले लेती है. ऐसा होना उस व्यक्ति के स्वभाव पर निर्भर करता है. यदि व्यक्ति की मानसिकता अथवा स्वभाव अच्छी बातों के लिए, अच्छे कार्यों के लिए प्रेरणा प्राप्त करता है तो वह अच्छी आदतों को अपनाता है अन्यथा इसके उलट भी हो जाता है. बहुधा देखने में आया है कि लोगों में अच्छी आदतों के बजाय बुरी आदतों को ग्रहण करने की क्षमता अधिक होती है. इसे ऐसा भी कहा जा सकता है कि बुरी आदतें सहजता से किसी व्यक्ति द्वारा अपना ली जाती हैं जबकि अच्छी आदतें ग्रहण करने में उसे दिक्कत होती है. ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्योंकि बुरी आदतों को अपनाने में, डालने में किसी तरह का अनुशासन नहीं चाहिए, किसी तरह की प्रतिबद्धता नहीं चाहिए, किसी तरह का नियम नहीं चाहिए. इसके उलट किसी भी अच्छी आदत को अपनाने के लिए उसके प्रति एक तरह का अनुशासन चाहिए होता है.


ऐसा करना अथवा होना व्यक्ति की आतुरता पर निर्भर करता है. किसी भी आदत को बार-बार दोहराने के लिए व्यक्ति का उतावला होना दिखाई देता है. और यदि ऐसा नहीं हो पा रहा है तो सम्बंधित व्यक्ति में अपनी आदत को लेकर एक तरह का अनमनापन रहता है. जैसे किसी व्यक्ति को सुबह-सुबह टहलने की, पार्क आदि जाने की आदत है और यदि किसी कारण से ऐसा नहीं हो पाता है तो उसे अपने आसपास कुछ खालीपन सा लगता है. इसी तरह किसी न किसी शौक को एक समयबद्ध तरीके से पूरा करने वाले को भी यदि उस नियत समय में वो कार्य करने को न मिले तो उसे भी कुछ अधूरा सा महसूस होने लगता है. निश्चित समय पर सम्बंधित कार्य को करने के लिए वह उतावला होने लगता है. यह स्थिति अच्छी और बुरी दोनों आदतों के लिए होती है. यहाँ व्यक्ति को निर्धारित करना पड़ता है कि वह किस तरह की आदत को अपनाये.

आदतें व्यक्ति के विकास और चारित्रिक उन्नयन में विशेष प्रभाव डालती हैं. सामाजिक विज्ञान में मनुष्य को आदतों का पुँज कहा भी गया है. यह व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह अपने इस पुंज में से कौन सी आदत को अपनाता है. यह कहना गलत होगा कि किसी भी व्यक्ति के पास कोई आदत नहीं है. सामान्य रूप में सभी प्राणी चाहे वह मनुष्य हो या जानवर किसी न किसी आदत से संपन्न होता है. मनुष्य में आदतों के स्वरूप के द्वारा उसका आकलन श्रेष्ठ या दुश्चरित्र के रूप में किया जाने लगता है. किसी भी व्यक्ति के बहुत सारे कामों का आकलन उसकी आदतों के आधार पर, उनके अनुसार किया जाने लगता है. आदत के द्वारा वह अपने बहुत से कार्यों का सञ्चालन करता है. जैसा कि पूर्व में कहा कि अच्छी आदतों को अपने भीतर समाहित करने के लिए गंभीरता, अनुशासन चाहिए होता है. यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि वह आदतों के अच्छे स्वरूप को अपना नहीं पा रहा है तो उसे अपने संकल्प तथा अभ्यास से इसकी आदत डालनी चाहिए.

वर्तमान परिदृश्य में बहुत सारी आदतों पर सोशल मीडिया में सक्रिय रहने की, इंटरनेट पर उपस्थिति दिखाने की, स्मार्ट फोन पर उंगलियाँ नचाने की, हर छोटी-बड़ी स्थिति में सेल्फी लेने की आदत बहुतायत में देखने को मिल रही है. मनोवैज्ञानिक इसे एक तरह की बीमारी मान रहे हैं. सामाजिक विज्ञान की दृष्टि से इसे बुरी आदत में शुमार माना जाता है. ऐसा इसलिए क्योंकि कोई व्यक्ति अपनी इसी एक आदत के चलते भीड़ में भी खुद को अकेला समझने लगता है. कई लोगों के साथ बैठकर भी वह सामंजस्य नहीं बना पा रहा है. सबके साथ होकर भी वह बजाय उनके साथ घुलने-मिलने के अपने मोबाइल, सोशल मीडिया कि आभासी दुनिया में व्यस्त बना रहता है. पल-पल मोबाइल को देखना, जरा-जरा से काम के लिए इंटरनेट पर निर्भरता एक तरफ से व्यक्तियों को मानसिक पंगु बनाती जा रही है. इससे बचने के लिए किसी और को नहीं वरन स्वयं मनुष्य को ही प्रयास करने होंगे. ऐसा इसलिए क्योंकि मनुष्य को आदतों का गुलाम नहीं बल्कि उनका स्वामी होना चाहिए जिससे आदतें अपने अनुसार मनुष्य का नहीं बल्कि मनुष्य अपने अनुसार अपनी आदतों का आनंद उठाये.