आज़ादी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
आज़ादी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

15 अगस्त 2024

स्वतंत्रता का सिर्फ जश्न न मनाएँ अपनी जिम्मेवारी भी निभाएँ

आज़ादी का जश्न मनाने वाला एक और दिन हम सबके बीच उपस्थित है. देश में स्वाधीनता दिवस हो या फिर गणतंत्र दिवस, इन दोनों दिनों में नागरिकों में, बच्चों-बड़ों में जबरदस्त उत्साह रहता है. आखिर इन दोनों दिनों में स्वतः ही गौरव की भावना की अनुभूति होती है. ऐसी अनुभूति के चलते सारा दिन उमंग में, उल्लास में गुजर जाता है. स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस मनाते हुए अक्सर मन में सवाल उठता है कि हम सब जितना प्रसन्न, जितने उल्लासित इन दो दिनों में रहते हैं उतना शेष दिनों में क्यों नहीं रहते हैं?

 

यह सवाल कतई आश्चर्यचकित करने वाला नहीं लगेगा क्योंकि ऐसा सवाल एक अकेले हमारे मन में नहीं उठता है बल्कि उन सभी नागरिकों के मन में उठता है जो किसी न किसी रूप में देश के विकास में अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन पूरी ईमानदारी से कर रहे हैं. यदि पूरी निष्पक्षता से, बिना किसी पूर्वाग्रह के विचार करें, इन दो दिनों पर दृष्टिपात करें तो स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि इन दो दिनों के उल्लास के समाप्त होने के बाद अगले दिन से दिल-दिमाग तिकड़म में व्यस्त हो जाता है. भ्रष्टाचार करने के उपाय किये जाने लगते हैं, काम निकालने को रिश्वत देने-लेने की चर्चा की जाने लगती है, स्वार्थ-लिप्सा में लिप्त कदम उठाये जाने लगते हैं.

 



सोचिए एक पल को कि क्या देश का वास्तविक विकास इसी तरह से हो सकेगा? क्या दो दिनों में अपनी राष्ट्रभक्ति दिखाने से ही देश की वास्तविक आज़ादी का मंतव्य पूरा होता है? सच्चाई तो ये है कि अब हम सभी आज़ाद हैं और अपनी स्वतंत्रता का जश्न किसी एक दिन नहीं, किसी विशेष दिन नहीं बल्कि प्रत्येक दिन मनाया जाना चाहिए. आखिर हम सभी अपनी ही आज़ादी का, अपनी ही स्वतंत्रता का एहसास स्वयं नहीं करेंगे तो कैसे अपेक्षा करेंगे कि विदेशी हमारी स्वतंत्रता का सम्मान करेंगे? इसके लिए सबसे पहले हम सभी को अपने-अपने दायित्वों, कर्तव्यों का पूरी ईमानदारी से पालन करने की आवश्यकता है. देश के विकास के लिए किसी दूसरे की तरफ ताकने के स्थान पर हम सबका प्रयास यही होना चाहिए कि स्वतः ही अपना सकारात्मक योगदान दे सकें. जब तक इस तरफ की भावना एक-एक नागरिक में नहीं होती है तो अपनी आज़ादी का हम सब सिर्फ जश्न ही मनाते रहेंगे, उसकी वास्तविकता का लाभ नहीं उठा सकेंगे.

 

16 अगस्त 2022

आज़ादी का बदलाव भरा सफ़र

जिस देश का अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है, उसी देश की महज 75 वर्ष की यात्रा का जश्न बड़े जोर-शोर से मनाया जाना अपने आपमें अजब लगता है. इसके बाद भी इस अजब से लगने वाली यात्रा की कहानी को याद रखना भी आवश्यक है. ऐसा इसलिए क्योंकि गौरवशाली परम्परा, संस्कृति, सभ्यता होने के बाद भी देश सैकड़ों वर्षों तक गुलामी में रहने का कलंक आज तक ढो रहा है. वर्तमान समय वाकई गौरव करने का इसलिए भी है क्योंकि वैश्विक पटल से अनेकानेक सभ्यताएँ लुप्त हो गईं किन्तु भारतीय संस्कृति, सभ्यता तमाम सारी चोटों, आघातों को सहने के बाद भी अपनी वैभवशाली गाथा को साथ लिए आगे ही बढ़ रही है.

 

वर्तमान में हम सभी आज़ादी के अमृत महोत्सव आयोजन के द्वारा अपनी आज़ादी के 75 वर्षों की यात्रा का स्मरण कर रहे हैं. वर्तमान के सापेक्ष जब इसी कालखंड पर दृष्टि डालते हैं तो बहुत सारा सुखद एहसास रोम-रोम को पुलकित कर देता है. बावजूद बहुत सारी उपलब्धियों के आज भी बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो गुलामी के दिनों को, अंग्रेजों के शासन को सही ठहराते हैं. ऐसे तमाम लोगों के विचारों को जानने-सुनने के बाद सवाल उठने स्वाभाविक हैं कि क्या वाकई देश ने पिछले 75 वर्षों में कुछ पाया नहीं है? क्या देश ने इस यात्रा के किसी तरह की कोई उपलब्धि हासिल नहीं की है? क्या इन 75 वर्षों में हमने जो पाया है वह अंग्रेजी शासन की अपेक्षा कमतर है?



 

विगत 75 वर्षों की उपलब्धियों, अनुपलब्धियों को यदि समग्र रूप में देखा जाये तो हम लोगों को निराशा नहीं होगी. जिस समय देश आज़ाद हुआ, उस समय देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह कृषि पर निर्भर थी और इसकी हिस्सेदारी 53.7 प्रतिशत थी. आज यह महज 18.8 प्रतिशत रह गई हो मगर इसके सापेक्ष अन्य क्षेत्रों ने अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान की है. वर्तमान में उत्पादन क्षेत्र की हिस्सेदारी 26.9 प्रतिशत, सर्विस सेक्टर का भाग 54.3 प्रतिशत है.

 

शिक्षा किसी भी समाज के विकास हेतु अत्यावश्यक अंग है. इसके बिना उन्नति, विकास की कल्पना करना संभव नहीं. प्राथमिक क्षेत्र से लेकर उच्च शिक्षा और शोध क्षेत्र तक देश में पर्याप्त विकास हुआ है. आज़ादी के समय देश में साक्षरता दर लगभग 18.3 प्रतिशत थी जो वर्तमान में लगभग 78 प्रतिशत है. चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में 1950 में देश में केवल 28 मेडिकल कॉलेज थे. आज यदि मेडिकल कॉलेज की संख्या निकाली जाये तो पूरे देश में 612 मेडिकल कॉलेज हैं, जिनमें 322 सरकारी और 290 निजी हैं. इसके अलावा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, भारतीय प्रबन्ध संस्थान, कृषि संस्थान, उच्च शैक्षणिक संस्थानों ने भी संख्यात्मक, गुणात्मक रूप में पर्याप्त विकास किया है.

 

आज़ादी के बाद से लगातार अनेकानेक क्षेत्रों में विकास और बदलाव होते रहे हैं. अनेक नए-नए क्षेत्रों का उदय हुआ. तकनीक के मामले में जबरदस्त बदलाव देखने को मिले. किसी एक समय में दूरसंचार माध्यम की अपनी सीमितता थी वहीं आज इस क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिल रहे हैं. हमारे समाज में गिने-चुने लोगों के घरों में बेसिक फोन की सुविधा हुआ करती थी जो आज हर हाथ में मोबाइल के रूप में परिवर्तित हो गई है. इंटरनेट सुविधा, उसकी स्पीड के द्वारा न केवल धरती पर वरन अन्तरिक्ष क्षेत्र में भी व्यापक बदलाव देखने को मिले. ज्ञान-विज्ञान में भी देश में हुए बदलाव प्रत्येक नागरिक को गौरवान्वित कर सकते हैं. किसी समय में सेटेलाईट भेजे जाने के लिए हम दूसरे देशों की तकनीक पर निर्भर हुआ करते थे जबकि आज हमारे केंद्र अन्य देशों को यह सुविधा उपलब्ध करवा रहे हैं. परमाणु परीक्षण, टेस्ट ट्यूब बेबी, मंगल ग्रह का अभियान, बुलेट ट्रेन की तैयारी, ओलम्पिक में पदक जीतना, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 का हटना आदि वे स्थितियाँ हैं जिनको उपलब्धि के रूप में ही स्वीकारा जाता है.

 

कहते हैं न कि सफ़ेद पटल पर एक छोटा सा काला बिंदु भी बहुत दूर से चमकता है, कुछ ऐसा हाल इन उपलब्धियों का है, लोगों की मानसिकता का है. ये सच है कि तकनीकी विकास के दौर में हमारे यहाँ सामाजिक विकास में गिरावट देखने को मिली है. साक्षरता का स्तर बढ़ा है मगर स्त्री-पुरुष लिंगानुपात में अंतर भी बढ़ा है, महिलाओं-बच्चियों के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएँ बढ़ी हैं. एक तरफ हमें अन्तरिक्ष में अपने कदम रखे हैं तो दूसरी तरफ हमने अपनी ही धरती को जबरदस्त नुकसान पहुँचाया है. कृषि, खाद्यान्न के मामले में हम यदि आत्मनिर्भर होते जा रहे हैं तो हम जनसंख्या पर नियंत्रण नहीं रख सके हैं. हमारा आर्थिक ढाँचा वैशिक स्थितियों को देखते हुए बहुत सुदृढ़ है मगर लगातार होते घोटालों को हम नहीं रोक सके हैं. मोबाइल, इंटरनेट क्रांति ने समूचे विश्व को एक ग्राम की तरह बना दिया है मगर आपसी भाईचारे-सौहार्द्र को हम मजबूत नहीं कर सके हैं.

 

कतिपय राजनैतिक मूल्यों की गिरावट के कारण उनको अंग्रेजी शासन ज्यादा सुखद लगता है मगर वे भूल जाते हैं कि ये हमारी लोकतान्त्रिक शक्ति है कि यहाँ अंतिम पायदान के व्यक्ति तक को भी अवसर उपलब्ध हैं. संवैधानिक खूबसूरती ये है कि कोई ऑटो चलाने वाला, आदिवासी समाज से आने वाला, अत्यंत पिछड़ी पृष्ठभूमि से आने वाला भी जनप्रतिनिधि बन कर सदन में पहुँचता है, देश का प्रथम नागरिक बनता है. निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि विगत 75 वर्षों की भदलाव भरी यात्रा सुखद रही है, उपलब्धियों भरी रही है. इस यात्रा में यदा-कदा मिलते झटकों को भी सफ़र का हिस्सा समझते हुए उनको स्वीकार करना होगा, उनका भी एहसास करते हुए आगे बढ़ना होगा.

 




 

14 अगस्त 2022

तिरंगे को सच्ची सलामी कब?

स्वतंत्र भारत की पहली आधी रात को जब लाल किले से सबका प्रिय तिरंगा फहराया थातब हवा हमारी थीपानी हमारा थाजमीं हमारी थीआसमान हमारा था. सब कुछ हमारा था पर वहाँ उपस्थित जन-जन की आँखों में नमी थी. पहली बार स्वतन्त्र हवा में लहराते हुए अपने प्यारे तिरंगे को सलामी देने के लिए उठे हाथों में एक कम्पन अवश्य था मगर उन सभी की आत्मा में दृढ़ता थी. स्वभाव में अभिमान था. स्वर में प्रसन्नता थी. सिर गर्व से ऊँचा उठा था. समय बदलता गयापरिदृश्य बदलते रहे किन्तु तिरंगा हमेशा फहरता रहाहर वर्ष फहराया जाता रहा. सलामी हर बार दी जाती रही किन्तु अहम् हर बार मरता रहा. गर्व से भरा सिर हर बार झुकता रहा. आत्मा की दृढ़ता हर बार कम होती रही. यह एहसास साल दर साल कम होता रहा. सलामी को उठते हाथों का कम्पन हर बार बढ़ता रहा. आँखों की नमी आँसुओं में बदल गई.


आज समूचा देश आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है. हर देशवासी आज हर घर तिरंगा के माध्यम से अपने राष्ट्रीय ध्वज को सम्मान और आदर से देख रहा है. इसके बाद भी कई बार लगता है कि कुछ न कुछ कमी सी हम सबके आसपास है. पहली बार जब हाथ काँपे थे तो वे हमारे स्वाभिमान का परिचायक बने थे. अब यही कम्पन हमारे नैतिक चरित्रचारित्रिक पतन को दिखा रहा है. पहली बार आँखों से बहते आँसू खुशी के थे मगर अब लाचारीबेबसीहताशाभयआतंकअविश्वास आदि के हैं. सामने लहराता हमारा प्यारा तिरंगा हमसे हमारी स्वतन्त्रता का अर्थ पूछता है. हमसे हमारे शहीदों के सपनों का मर्म पूछता है.


शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेलेवतन पे मरने वालों का यही बाकी निशां होगा कुछ ऐसा सोचकर ही हमारे वीर-बाँकुरों ने आजादी के लिए हँसते-हँसते अपने प्राण न्यौछावर कर दिये थे. इस महान सोच के बाद ही हमें प्राप्त हुई खुलकर हँसने की स्वतन्त्रताखुलकर घूमने की आजादीअपना स्वरूप तय करने की आजादी. हम आजाद तो हुए किन्तु विचारों की खोखली दुनिया को लेकर. राष्ट्रवाद जैसी अवधारणा अब हमें प्रभावित नहीं करती वरन् इसमें भी हमें साम्प्रदायिकता का बोध होने लगा है. ये सब एकाएक नहीं हो गया हैदरअसल स्वतन्त्र भारत के वक्ष पर एक ऐसी पीढ़ी ने जन्म ले लियाजिसके लिए गुलामी एक कथा की भाँति हैशहीदों की शहादत उसके लिए गल्प की तरह हैआजादी के मतवालों की कुर्बानियाँ महज एक इत्तेफाक है. ऐसी पीढ़ी के लिए आजादी का अर्थ स्वच्छन्दताउच्शृंखलता आदि बना हुआ हैआजादी के गीतराष्ट्रगीतवन्देमातरम् इनके लिए आउटडेटेड हो गये हैं.




इक्कीसवीं सदी में खड़े हमारे आजाद देश के पास आज भी स्थिरता का अभाव सा दिखाई देता है. कभी हम अपने पड़ोसी देशों की कृत्सित नीतियों का शिकार बनते हैंकभी हमें सीमापार से हो रहे आतंकी हमलों से बचना पड़ता है तो कभी यह आग हमारे ही घरों में लगी दिखाई देती है. हम मंगल ग्रह पर पानी और जीवन की आशा में करोड़ों रुपये का अभियान चलाकर वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय के सामने सीना ठोंकते हैं तो शिक्षा के नाम पर वैश्विक जगत में अभी भी बहुत पीछे होने के कारण शर्मिन्दा होते हैं. हमारी गुरुकुल परम्परा एकदम से विलुप्त ही हो गई है. गुरु-शिष्य के संबंधों में भी लगातार गिरावट देखने को मिलने लगी. ये किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए.


अपनी संस्कृति के साथ विश्व की तमाम संस्कृतियों का समावेश कर हम सांस्कृतिक प्रचारक-विचारक के रूप में विख्यात होते हैं तो अपने देश की महिलाओं की गरिमाउनकी जान की सुरक्षा न कर पाने के चलते शर्म से सिर झुका बैठते हैं. हमें अभी भी बालिका शिक्षा के लिए लोगों को जागरूक करना पड़ रहा है. अभी भी बेटियों को बचाने की गुहार लगानी पड़ रही है उसके बाद भी बालिका संरक्षण गृहों से यातनाओं कीदुष्कर्म की खबरें आ रही हैं. हमने औद्योगीकरणउपभोक्तावादी संस्कृति के नाम पर हाथों में मोबाइल तो थमा दिये किन्तु शिक्षा के लिए हर हाथ को पुस्तकेंपेन्सिलें नहीं पकड़ा पाये. बच्चे अभी भी किताबों की जगह कूड़ा बीनने वाले झोले पकड़े दिखाई पड़ते हैं. मजदूरी करते दिखाई पड़ते हैं. हाथों में औजार थामे नजर आते . अभिजात्य वर्ग एवं पश्चिमीकरण की नकल में हमने हर हाथ को सस्ते दरों पर बीयर तो उपलब्ध करवा दी किन्तु बहुतायत में अपनी जनता को पीने का स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं करवा पाये.


देखा जाये तो विकास के बाद भी हम विकास की खोखली अवधारणा को पोषित करते जा रहे हैं. मॉलजगमगाते शहरमैट्रोमल्टीस्टोरीजशॉपिंग कॉम्प्लेक्स आदि हमारी विकास की सफलता नहीं हैं. जब तक एक भी बच्चा भूखा हैएक भी बच्चा अशिक्षित हैएक भी बच्चा रोगग्रस्त है तब तक हम अपने को विकसित और आजाद कहने योग्य नहीं. हमें आजादी की परिभाषा को समझाने-समझने की जरूरत है. जब तक देश का युवा भटकता हुआ आतंक की शरण में जाता रहेगाजब तक विदेशी ताकतों के द्वारा हम संचालित रहेंगेजब तक राजनीति में तुष्टिकरण हावी रहेगाजब तक लोकतन्त्र के स्थान पर राजशाही को स्थापित करने के प्रयास होते रहेंगेजब तक गाँवों की उपेक्षा कर औद्योगीकरण किया जाता रहेगाजब तक कृषि के स्थान पर मशीनों को प्राथमिकता प्रदान की जाती रहेगीजब तक इंसान उपभोग की वस्तु के तौर पर देखा जाता रहेगाजब तक हमारी जाति हमारी पहचान का साधन बनी रहेगी तब तक हम अपने को वास्तविक रूप में आजाद कहने के हकदार नहीं.


ऐसे में सवाल उठता है कि क्या फिर कोई हल नहीं इस समस्या काइन सबका हल हैमगर उसके लिए सत्ताधारियों के इंतजार के बजाय नागरिकों को ही आगे आना होगा. आपसी विभेद को समाप्त करना होगा. वैमनष्यता के चलते व्यक्ति अपना ही विकास नहीं कर सकता है तो वह समाज काअपने परिवार का विकास कैसे करेगाबच्चे हमारे भविष्य का आधार हैंयदि वे ही अशिक्षितभूखेअस्वस्थ रहेंगे तो विकास की अवधारणा बेमानी है. याद रखना होगा कि जिन्हें सत्ता चाहिए वो हमारा ही उपयोग करके सत्ता प्राप्त कर लेते हैं तो क्या हम स्वयं के लिए अपना उपयोग कर अपना और अपने राष्ट्र का विकास नहीं कर सकते हैंनागरिक किसी भी धर्म के होंकिसी भी जाति के होंकिसी भी क्षेत्र के हों किन्तु देश हमारा है और हम देश केइस सोच के द्वारा हम विकास कीएकता की राह पर आगे बढ़ सकते हैं. यदि ऐसा हम कर पाते हैं तो हम अपने प्यारे तिरंगे को सच्ची सलामी दे सकेंगे और एक बार फिर हमारा सिर उसके सामने गर्व से भरा होगादृढ़ता से हमारे हाथ उठे होंगेजयहिन्दवन्देमातरम् का घोष हमारे कंठों से निकलकर समूचे आसमान में गूँज उठेगा.

 




 

18 मई 2022

अमृत महोत्सव कार्यक्रम और अध्यापन कार्य

आजादी का अमृत महोत्सव कार्यक्रमों की एक विस्तृत श्रृंखला सरकारी स्तर पर जारी की गई है. इस कार्ययोजना में 09 अप्रैल 2022 से लेकर 29 अगस्त 2023 तक के कार्यक्रमों की सूची भी शासन स्तर से जारी की गई है. आजादी का अमृत महोत्सव कार्यक्रमों के अंतर्गत महापुरुषों एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की जीवन गाथाओं के साथ-साथ महत्त्वपूर्ण दिवसों पर भी कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना है. एक वर्ष से अधिक की उक्त समयावधि में कुल 116 कार्यक्रमों का आयोजन उच्च शिक्षण संस्थानों में किया जाना है. देश से जुड़ी भावना के सन्दर्भ में इस तरह के आयोजनों का सतत रूप से होना अच्छी बात है. अपनी आजादी को याद करना, उस पर गौरवान्वित होना, स्वतंत्रता सेनानियों और महापुरुषों के प्रति सम्मान व्यक्त करना आवश्यक भी है, ख़ुशी देने वाला है. यदि इसी ख़ुशी के सापेक्ष देखा जाये तो उक्त कार्यक्रमों की विस्तृत कार्ययोजना में बहुतायत समय इनके आयोजन में ही निकलने वाला है. 


सरकार एक तरफ राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के सुचारू क्रियान्वयन के लिए इस वर्ष ग्रीष्मावकाश को समाप्त करने का निर्णय सा ले चुकी है, दूसरी तरफ कार्यक्रमों की विस्तृत श्रृंखला जारी करके अध्यापन कार्य को ही बाधित करने जैसा कदम उठा रही है. आजादी का अमृत महोत्सव जैसी ख़ुशी और गर्व करने वाले आयोजन की सार्थकता उस समय और अधिक होती जबकि ये आयोजन माह में एक अथवा दो किये जाते. सामान्य रूप में भी एक कार्यक्रम करवाने में सभी तरह के संसाधनों को जुटाने और कार्यक्रम के समापन तक लगभग दो घंटे खर्च होते हैं. इसके साथ-साथ ऐसा तो होता नहीं है कि अकेले संयोजक और कुछ बच्चे ही इसमें शामिल हों. अनेक विद्यार्थी शामिल होते हैं, कई शिक्षक शामिल होते हैं. ऐसे में अनेक विषयों का अध्यापन कार्य प्रभावित होता है.


शासन को इस दिशा में पुनः विचार किया जाना चाहिए. नोडल अधिकारियों को सम्बंधित दिशा-निर्देश देते हुए एक माह में दो कार्यक्रमों के आयोजन की अनुमति देनी चाहिए. इससे एक तरफ आजादी का अमृत महोत्सव का आयोजन भी होता रहेगा, दूसरी तरफ अध्यापन कार्य भी चलता रहेगा. इसी में कार्यक्रम की सार्थकता भी है.




01 दिसंबर 2021

उरई में फहराया विशालकाय तिरंगा

राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा कहीं भी लहरा रहा हो, किसी भी आकार का हो हमें व्यक्तिगत रूप से बहुत आकर्षित करता है. किसी भी जगह पर लहराते, फहराते ध्वज को देखकर लगता है कि बस उसे देखते रहा जाये. दिल-दिमाग जैसे झंकृत होते रहते हैं और मन मंत्रमुग्ध सा होकर बस उसे ही देखता रहता है. किसी समय में राष्ट्रीय ध्वज का लहराना-फहराना सिर्फ राष्ट्रीय पर्वों पर ही होता था और वो भी शासकीय भवनों, इमारतों पर. कालांतर में कुछ कानूनी विषयों के उठाये जाने के बाद आम आदमी को भी ध्वज फहराने का अधिकार मिला. सरकारी इमारतों के साथ-साथ निजी भवनों में राष्ट्रीय ध्वज को फहराए जाने की छूट मिली. इसी क्रम में देश के विभिन्न शहरों में पार्कों में, किसी विशाल जगह पर, मुख्य स्थलों पर बड़े-बड़े ऊँचे पोल के द्वारा राष्ट्रीय ध्वज का भव्य स्वरूप लहराता-फहराता दिखाई देने लगा.


बरसों पहले राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का भव्य, मनमोहक रूप में फहराना दिल्ली में राजीव चौक पर देखा था. उससे पहले इतने विशालकाय तिरंगे को कहीं फहराते हुए नहीं देखा था. लगभग डेढ़ सौ फीट ऊँचे पोल पर विशालकाय तिरंगा का फहराना देखकर एक पल को हम सम्मोहन की स्थिति में आ गए थे. किस काम से वहाँ आना हुआ है, भूलकर उस भव्य स्वरूप को अपने कैमरे में कैद करने लगे थे. उसे देखकर मन में विचार आया था कि क्या इस तरह विशाल स्वरूप तिरंगा हमारे उरई में नहीं फहराया जा सकता? क्या इसके लिए स्थानीय स्तर पर पहल नहीं की जा सकती है? इस बारे में कई बार चर्चा हुई, सम्बंधित व्यक्तियों तक अपनी बात पहुंचाई गई. अनेक बार तमाम सारी बैठकों, मीटिंगों में तिरंगा शहर में लगाये जाने सम्बन्धी बातें उठीं मगर कोई भी सकारात्मक कदम नहीं उठाया जा सका.


आज, दोपहर बाद महाविद्यालय से वापसी हो रही थी. मौसम बहुत सुहाना बना हुआ था. हलकी-हलकी हवा भी चल रही थी. जिसे गुलाबी सर्दी कहा जाता है, उसका एहसास हो रहा था. उसी गुलाबी एहसास में एकदम से खुली आँखों के सामने स्वप्न सा तैर गया. बादलों भरे आसमान में तिरंगा शान से लहरा रहा था. एक पल को विश्वास ही नहीं हुआ कि ऐसा उरई में देखने को मिल रहा है. स्कूटर सी दिशा में मोड़ दिया. सामने वास्तविकता होने के बाद भी वास्तविकता स्वीकार सी नहीं हो रही थी. फिलहाल, सबकुछ भूल कर अपनी पूरी भव्यता के साथ लहराते तिरंगे को कैमरे में, दिल में कैद करने लगे.




राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा उरई शहर के टाउन हॉल परिसर में सौ फीट ऊँचे पोल पर पूरी आन-बान-शान के साथ लहरा रहा था. उसके लगाये जाने के पीछे की कहानी की यहाँ चर्चा करना उचित नहीं. उस समय जानकारी हुई कि अभी उसके आसपास रौशनी बनाये रखने की दृष्टि से लाइट लगाये जाने का काम चल रहा है, जो देर रात तक पूरा होगा. रात को दस बजे के आसपास सौ फीट ऊँचाई पर लहराते तिरंगे को रौशनी में रखने के लिए उसके चारों तरफ लाइट को व्यवस्थित करने का काम पूरा हो सका. तिरंगे का या कहें कि अपने शहर में विशाल तिरंगे को फहराते देखने की अभिलाषा के पूरा होने का सम्मोहन था कि रौशनी में जगमगाते देखने की मंशा लेकर रात दस बजे भी तिरंगे के दर्शन करने पहुँच गए.




स्थानीय जिम्मेवार लोगों के द्वारा यह पुनीत कार्य करवाया जा रहा है, सो सम्बंधित व्यक्तियों से जान-पहचान भी थी. इसी के चलते लाइट की व्यवस्था सम्बन्धी कुछ स्पेशल टिप्स भी दे डाले, जिनको माना भी गया. चारों तरफ से पड़ती रौशनी में तिरंगा अपनी आभा को बिखेरने में लगा था. किसी समय दिल्ली के राजीव चौक पर लहराते तिरंगे को देखकर मन में उपजी अभिलाषा आज पूरी हुई. उरई शहरवासियों के लिए यह गौरव का विषय है, अब हम भारतीयों की शान, गर्व के प्रतीक तिरंगे की आन-बान-शान की रक्षा करना, उसकी देखभाल करने का दायित्व समस्त उरईवासियों का है. 





15 अगस्त 2021

राष्ट्रगान न गा सकने वाले भारतीय नागरिक

स्वतंत्रता दिवस का आयोजन हर्षोल्लास के साथ पूरा देश मना रहा है. हर तरफ से फोटो, वीडियो दिखाई दे रहे हैं, जिनमें लोगों की ख़ुशी झलक रही है. इन्हीं वीडियो में से एक ऐसा वीडियो देखने को मिला जिसे देखकर एकबारगी ये विश्वास ही नहीं हो रहा है ये ध्वज फहराने वाले इसी देश के नागरिक हैं. किसी तरह का कोई आपत्तिजनक वीडियो नहीं देखने को मिला. कहीं कुछ ऐसा नहीं मिला कि स्वतंत्रता दिवस पर किसी और देश का ध्वज फहरा दिया गया हो. ऐसा भी नहीं हुआ कि अपने राष्ट्रीय ध्वज को उल्टा फहरा दिया गया हो, जैसा कि अक्सर कई जगहों पर होने की खबरें विगत वर्षों में मिलती रही हैं. ऐसा वीडियो भी नहीं था जिसमें राष्ट्रगान का विरोध किया गया हो अथवा उसके गायन से इनकार किया हो, ऐसा भी विगत वर्षों में बहुत सी जगहों पर होता रहा है.


इस बार एक वीडियो देखने को मिला जिसमें एक राजनैतिक दल के द्वारा ध्वजारोहण किया गया. इसके पश्चात् उनके नेताओं द्वारा पूरे जोश के साथ राष्ट्रगान का गायन शुरू हुआ. आरंभिक दो-तीन पंक्तियों के बाद किसी के मुँह से राष्ट्रगान की पंक्तियाँ न उभरीं. सब के सब दो-तीन-चार गलत-गलत शब्द गाते हुए खामोश हो गए. बाद में सभी के द्वारा अजब-अजब सी आवाजों को निकाला जाता रहा और राष्ट्रगान का अंत जय हे, जय हे के साथ कर दिया गया. ऐसा नहीं कि ध्वजारोहण के समय वहां दो-तीन लोग ही उपस्थित थे और उनको पूरा राष्ट्रगान नहीं आया. उस अवसर पर वहाँ अच्छी-खासी भीड़ जमा थी और यह आश्चर्य का विषय है कि उस भीड़ में किसी को पूरा राष्ट्रगान याद नहीं था. यह शर्म की बात है.


फिलहाल, ऐसे बहुत से वीडियो आते रहते हैं जहाँ प्रेंक के नाम पर अजीब-अजीब सी हरकतें करते युवा दिखते हैं, उन्हीं अजीब हरकतों के बीच कई बार इस तरह के मौके भी दिख जाते हैं जबकि उन युवाओं को देश से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी नहीं होती है. कुछ ऐसा ही ध्वजारोहण के अवसर पर दिखाई पड़ना दुखद भी है, शर्मनाक भी है.


.

09 सितंबर 2019

सोशल मीडिया पर होती अनावश्यक उछल-कूद को नियंत्रित करना होगा


सोशल मीडिया ने नियंत्रण के सारे बिन्दुओं को किनारे लगा रखा है. इस मंच पर न रिश्तों की कोई कद्र है, न संबंधों की, न उम्र की. इसकी उन्मुक्तता ने सभी को आज़ादी दे रखी है और वह भी पूरी तरह से निरंकुशता वाली. इस निरंकुश आज़ादी की कीमत लोगों के अपमान से, लोगों की बेइज्जती से चुकाई जा रही है. कई साल पहले कहीं पढ़ रखा था कि देश की आज़ादी के समय बहुत से लोगों ने अपना विचार इस रूप में दिया था कि भारत अभी उस स्थिति में नहीं है कि आज़ादी का सही अर्थ समझ सके या फिर उसका सही उपयोग कर सके. उस समय बहुतेरे लोगों ने आज़ादी के बाद भी कुछ सालों तक एक तरह की तानाशाही की वकालत की थी. उन स्थितियों में ऐसा किया जाना सही होता या गलत ये तो अब विमर्श का विषय है मगर अब लगता है कि वाकई देश अभी भी ऐसी स्थिति में नहीं है कि यहाँ आज़ादी का सही उपयोग किया जा सके. इसके उदाहरण के रूप में सोशल मीडिया के तमाम मंचों को लिया जा सकता है.


यहाँ किसी भी विषय पर एकतरफा कुतर्क (इसे बहस कतई नहीं कहा जा सकता है) चलते रहते हैं. उम्र, अनुभव, ज्ञान को दरकिनार करते हुए बड़े-बड़ों की इज्जत का कचरा यहाँ सहजता से किया जाने लगता है. किसी भी विषय पर किसी भी व्यक्ति से ऐसी अपेक्षा की जा सकती है कि वह किसी विशेषज्ञ की तरह अपना ज्ञान उड़ेल सकता है. अपनी बात पर ही, अपने विचार पर ही जमे रहने की कला इसी मंच पर आसानी से देखने को मिलती है. यहाँ एक अपने अलावा बाकी सभी के विचार तुच्छ और क्षुद्र की श्रेणी में शामिल मान लिए जाते हैं. ऐसा व्यक्ति जिसने किसी विषय को पढ़ना तो दूर कभी देखा भी न हो, उस पर भी किसी बड़े विशेषज्ञ से ज्यादा गंभीरता से अपनी राय दे सकता है. ऐसा किये जाने से न केवल विषय से सम्बंधित जानकारी का, सामग्री का नुकसान हो रहा है वरन इंटरनेट पर ऐसी सामग्री का भी जमावड़ा होता जा रहा है जो विशुद्ध रूप से संशय, भ्रम फ़ैलाने का काम कर रही है. इसी अनावश्यक स्वतंत्रता के चलते सभी को अपनी बात रखने का, अपने विचार पोस्ट करने का अधिकार मिला हुआ है. बिना किसी सेंसर के, बिना किसी संपादन के ऐसी सामग्री इंटरनेट पर दिखाई दे रही है जो न केवल भ्रामक है वरन अराजक भी है. इसे रोकने का या फिर इस पर नियंत्रण लगाने जैसा कोई कदम कहीं से भी उठता हुआ नहीं दिख रहा है. 

इस तरह की अराजक और भ्रामक स्थिति में आने वाली उस पीढ़ी का भी नुकसान होने वाला है जो इंटरनेट की सामग्री को ही प्रमाणित मानती है. उसके लिए पुस्तकों का, बुजुर्गों के ज्ञान का कोई अर्थ ही नहीं है. ऐसी स्थिति में अधकचरे ज्ञान से, अशिक्षित लोगों के विचारों से सोशल मीडिया हरा-भरा बना हुआ है. आने वाले समय में यही भ्रामक और तथ्यहीन सामग्री ही सामाजिक क्षति करवाएगी. आज भले ही इसके मायने समझ न आ रहे हों मगर आने वाले समय में इसी तरह की सामग्री के सहारे लोगों के दिमाग को, उनके ज्ञान को गुलाम बनाया जा सकेगा. आवश्यक नहीं कि प्रत्येक कालखंड में सेना, हथियार से ही गुलामी लायी जाए. वर्तमान समय तकनीक का है और आने वाला इससे भी ज्यादा तकनीक का, विज्ञान का, जानकारियों का, तथ्यों का होगा. ऐसे में एक गलत अथवा भ्रामक सामग्री भी किसी हथियार से कम साबित नहीं होगी. आज के लिए न सही मगर आने वाले कल के लिए, आने वाली पीढ़ी के लिए आज तथ्यों की गलतियों को, भ्रम को, अराजकता को संभालना होगा. सोशल मीडिया पर होती अनावश्यक उछल-कूद को नियंत्रित करना होगा.

18 अगस्त 2019

मृत्यु और गुमनामी की रहस्यगाथा में समाया विराट व्यक्तित्व


कहते हैं कि जो आया है वो जायेगा ही मगर कोई आने वाला बजाय जाने के विलुप्त ही हो जाये तो? क्या ऐसा भी हो सकता है कि आने वाला विलुप्त हो जाये? यदि ऐसा होता भी है तो वह विलुप्त क्यों हुआ? यदि खुद अपनी मर्जी से विलुप्त नहीं हुआ तो फिर किसने विलुप्त करवाया? उसके खुद विलुप्त होने में, किसी के द्वारा विलुप्त करवाए जाने में लाभ किसका? विश्व की तमाम रहस्यगाथाओं से ज्यादा बड़ी और रहस्यमयी गाथा नेता जी के विलुप्त होने की गाथा है. यह रहस्यमयी इसलिए भी है कि नेता जी का व्यक्तित्व जितना विराट और चुम्बकीय रहा है, उसी अनुपात में या कहें उससे भी अधिक जनमानस के बीच उनकी गाथा तैरती रही है, आज के दिन यानि 18 अगस्त 1945 को उनके गायब हो जाने की. कोई कुछ भी कहे मगर तमाम सारे घटनाक्रम, अनेक तथ्य इशारा इस तरफ करते हैं कि आज के दिन हुई तथाकथित विमान दुर्घटना में नेता जी की मृत्यु नहीं हुई थी.


दरअसल आज़ादी के आन्दोलन में सुभाषचंद्र बोस ब्रिटिश हुक्मरानों की आंख की किरकिरी बने रहे, साथ ही तत्कालीन कांग्रेस के लिए भी, गाँधी-नेहरू के लिए विरोधी रूप में प्रचारित रहे सो उनके हिस्से में केवल उपेक्षा, अपमान और विलुप्तता ही आई. उनकी मृत्यु को जिस विमान दुर्घटना में हुआ प्रचारित किया जाता है, कहा जाता है कि उस दिन कोई विमान दुर्घटना ताइवान में हुई ही नहीं. इसका ऐतिहासिक प्रमाण यह है कि 03 सितंबर 1945 को अमेरिकी सेना ने जापानी सेना को हराकर ताइवान पर क़ब्ज़ा कर लिया था. इसके बाद उसकी ख़ुफिया एजेंसी सीआईए ने अपनी रिपोर्ट में साफ़-साफ़ कहा था कि ताइवान में पिछले छह महीने से कोई विमान हादसा नहीं हुआ था. यहां यह गौर करने वाली बात है कि अपनी कथित मौत से दो दिन पहले 16 अगस्त 1945 को नेताजी वियतनाम के साइगॉन शहर से भागकर मंचूरिया गए थो जो उस समय रूस के क़ब्ज़े में था.

नेता जी के निजी गनर रहे जगराम भी दावा करते रहे हैं कि अगर विमान हादसे में नेताजी की मौत होती तो कर्नल हबीबुर्रहमान ज़िंदा कैसे बच जाते? क्योंकि वह दिन रात साये की तरह नेताजी के साथ रहते थे. रूस के इस घटनाक्रम में शामिल होने की चर्चा करते हुए डॉ० सुब्रह्मण्यम स्वामी दावा करते रहे हैं कि नेताजी की हत्या नेहरू के कहने पर रूसी तानाशाह जोसेफ स्तालिन ने करवा दी थी. डॉ० स्वामी के मुताबिक़, मेरठ निवासी श्यामलाल नेहरू के स्टेनो थे. नेताजी की मौत की ख़बर के पब्लिक होने के पहले नेहरू ने उन्हें आसिफ अली के घर बुला कर एक पत्र टाइप करावाया था, जिसमें उन्होंने ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लिमेंट एटली को लिखा था कि उनका वॉर क्रिमिनल रूस के क़ब्ज़े में है. नेता जी की मौत के रहस्य पर क़िताबें लिखने वाले और मिशन नेताजी के संस्थापक पत्रकार-लेखक अनुज धर ने कुछ साल पहले ही कह दिया था कि कांग्रेस और कांग्रेस का एक बंगाली नेता दोनों नहीं चाहते थे कि नेताजी के बारे में रहस्यों से परदा हटे. उन्होंने कड़ी मेहनत से लिखी क़िताबों में ताइवान सरकार के हवाले से दावा किया है कि 15 अगस्त से 05 सितंबर 1945 के दौरान कोई विमान हादसा नहीं हुआ था.

ऐसी चर्चाएँ बराबर बनी रहीं कि नेता जी रूस चले गए जहाँ से बाद में उनको भारत आने का सुरक्षित रास्ता प्रदान किया गया. भारत में उनके प्रवास की सर्वाधिक चर्चा फ़ैजाबाद के गुमनामी बाबा के रूप में रही हैं. यद्यपि बहुत से लोगों का मानना है कि नेता जी का व्यक्तित्व जिस तरह का था वैसे में संभव नहीं कि वे गुमनामी में अपना जीवन व्यतीत कर देते. इसके बाद भी सम्बंधित व्यक्ति को लेकर लोगों में विश्वास बना हुआ है कि गुमनामी बाबा और कोई नहीं बल्कि नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ही थे. इसके पीछे लोग कई कारण गिनाते हैं. लोगों का कहना है कि अपने आसपास गोपनीयता बनाकर रहने वाला यह व्यक्ति कौन था? अगर यह व्यक्ति एक साधारण संत था तब वह फर्राटेदार अंग्रेजी और जर्मन कैसे बोलता था? उनके पास दुनिया भर के नामचीन अखबार, पत्रिकाएं, साहित्य, सिगार कहाँ से आती थी? यदि वह व्यक्ति नेता जी नहीं तो उसके पास नेताजी से जुड़ी चीजें कैसे आईं? गुमनामी बाबा का अंतिम संस्कार सैन्य संरक्षित क्षेत्र में क्यों हुआ? उनकी मृत्यु के बाद पूरा प्रशासनिक अमला, लोकल इंटेलीजेंस यूनिट समेत दूसरे लोग क्यों सक्रिय रहे? जब लोगों ने और समाचार पत्रों ने उनके नेता जी होने का दावा किया तो प्रशासन ने इसका खंडन क्यों नहीं किया? ऐसे बहुत से सवाल हैं जो नेता जी के रहस्य को और गहरा देते हैं. गुमनामी बाबा के निधन के बाद उनके नेताजी होने की बातें फैलने लगीं तो नेताजी की भतीजी ललिता बोस कोलकाता से फैजाबाद आईं. वे गुमनामी बाबा के कमरे से बरामद सामान देखकर यह कहते हुए फफक पड़ी थीं कि यह सब कुछ उनके चाचा का ही है. इसके बाद स्थानीय लोगों ने आन्दोलन करना शुरू कर दिया.

गुमनामी बाबा के सामानों से मिला नेता जी का चित्र 

लम्बे समय तक चले सामाजिक और न्यायिक प्रयासों के बाद मामले की सुनवाई करते हुए 31 जनवरी, 2013 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया था कि गुमनामी बाबा के सामान को संग्रहालय में रखा जाए ताकि आम लोग उन्हें देख सकें. 

लखनऊ बेंच ने अपने फैसले में स्पष्ट तौर पर कहा था-
1945 में एक प्लेन क्रैश में मारे गए नेताजी की मृत्यु के संदर्भ में विभिन्न इतिहासकारों और पत्रकारों की खोजबीन को खंगालने के बाद निष्कर्ष निकला है कि प्लेन क्रैश में नेताजी की मृत्यु हुई या नहीं, इस बारे में निश्चित राय कायम नहीं की जा सकती, पर यह तथ्य निर्विवाद और सर्वविदित है कि नेताजी स्वतंत्रता संग्राम के एक ऐसे सेनानी थे जिन्होंने आजादी की लड़ाई में सभी के दिल में आजादी का जज्बा भर दिया था.
ऐसे महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की स्मृति या उनकी धरोहर आने वाली नस्लों के लिए प्रेरणादायक है. अगर फैजाबाद में रहने वाले गुमनामी बाबा, जिनके बारे में लोगों का विश्वास था कि वे नेताजी सुभाषचंद्र बोस हैं और उनके पास आने-जाने वाले लोगों व उनके कमरे में मिली तमाम वस्तुओं से इस बात का तनिक भी आभास होता है कि लोग गुमनामी बाबा को नेताजी के रूप में मानते थे तो ऐसे व्यक्ति की धरोहर को राष्ट्र की धरोहर के रूप में सुरक्षित रखा जाना चाहिए. 

नेता जी की मृत्यु की जांच से सम्बंधित बने आयोगों की अपनी-अपनी रिपोर्ट्स रही हैं. जिस तरह का रहस्य, जिस तरह की गोपनीयता नेता जी की मृत्यु को लेकर बनाई जाती रही है, वैसी ही गुमनामी बाबा के निधन और उनके अंतिम संस्कार को लेकर बनाई गई. यह सब इस रहस्य को और गहरा करता है. अंतिम सत्य क्या है यह तो उसी सत्य को भोगने वाला ही जानता है मगर एक सत्य यह है कि जनमानस को विश्वास है कि नेता जी की मृत्यु आज के दिन बताई जाने वाली तथाकथित विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी. उनकी मौत का रहस्य अभी भी रहस्य है. जब तक यह रहस्य उजागर नहीं होता तब तक उनकी मौत को स्वीकारना नेता जी के अस्तित्व को, उनकी विराटता को नकारना ही होगा. आज के दिन वे विलुप्त हुए हैं, मृत नहीं और यह भी अपने आपमें परम सत्य है कि विलुप्त होने वाले मरते नहीं वरन अमरत्व को प्राप्त कर जाते हैं. महाकाल बन जाते हैं.
जय हिन्द

16 अगस्त 2019

स्वतंत्रता और सुरक्षा का संयोग

स्वतंत्रता दिवस की और पावन पर्व रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ.

इस वर्ष का सावन माह अपने आपमें अभूतपूर्व घटनाओं का गवाह रहा है. इस अभूतपूर्व स्थिति में इए सुखद और पावन संयोग ही कहा जायेगा कि स्वतंत्रता का महोत्सव और भाई-बहिनों के स्नेह का पर्व एक दिन ही मनाया जा रहा है. इसी को किसी न किसी रूप में हम सभी संयोग कहते हैं, सितारों की चाल कहते हैं, सौभाग्य कहते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि यदि हम सावन माह की गतिविधियों को देखें तो देशहित में कई सारे निर्णय संपन्न हुए.


देश के वैज्ञानिकों की सफल यात्रा चंद्रयान के रूप में आरम्भ हुई. इस यात्रा की कमान देश की मातृशक्ति के हाथ में थी, यह भी अपने आपमें गौरवशाली क्षण था. इस अभियान के द्वारा जो कदम अन्तरिक्ष क्षेत्र में भारतीय वैज्ञानिकता रखने जा रही है, वैसा आज तक किसी भी देश द्वारा उठाया नहीं गया है.


चंद्रयान से शुरू वैज्ञानिक सफलता यात्रा अभी आरम्भ ही  हुई थी, देशवासी अभी इस उमंग की सराबोर से उबरे भी न थे कि एक कदम सामाजिक भेदभाव दूर करने के लिए उठाया गया. तीन तलाक की समाप्ति भले ही एक समुदाय विशेष से संदर्भित हो मगर इसके समाप्त होने से देश की मातृशक्ति को समानता का अधिकार प्रदान किया गया, उनके व्यक्तित्त्व को एक इन्सान समझने की परिभाषा से अलंकृत किया गया.


इसके ठीक एक सप्ताह बाद ही एक देश, एक संविधान के विधान को स्पष्ट स्वरूप प्रदान किया गया. किसी समय राजनैतिक प्रतिस्थितियों के चलते उठाया गया कदम कालांतर में न केवल राजनैतिक विभेद का कारक बना बल्कि देश के भूभाग को भी एक तरह से अलग-थलग किये रहा. धारा 370 की समाप्ति के साथ ही दो राज्यों का निर्माण होने ने राजनैतिक सजगता की दिशा में कदम बढ़ाया तो देश को वास्तविक रूप में कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक होने का सन्देश दिया. यह भी देश की स्वतंत्रता के प्रति सार्थकता कही जा सकती है.


इन घटनाओं का होना शायद पूर्व-निर्धारित रहा होगा, शायद एक संयोग रहा होगा कि स्वतंत्रता दिवस और रक्षाबंधन एकसाथ, एक दिन मनाने का अवसर मिला. इसको एक सन्देश के रूप में देखने की आवश्यकता है. रक्षाबंधन को महज भाई-बहिन के पवित्र प्रेम के रूप में, सुरक्षा के रूप में देखने से इतर अब व्यापकता में देखने की आवश्यकता है. सरकारी स्तर पर स्वतंत्रता के सच्चे अर्थ स्पष्ट करते हुए वैज्ञानिकता को स्थापित किया, सामाजिकता को मान्यता दी और राष्ट्रीयता को एकता प्रदान की. अब हम सभी नागरिकों की जिम्मेवारी बनती है कि इस स्वतंत्रता को सुरक्षा प्रदान करें. अपने कार्यों से, अपनी जिम्मेवारियों से, अपने कर्तव्यों से देश को, समाज को, नागरिकों को सफलता की राह प्रदान करें, सुरक्षा की भावना का विकास करें, उनको आज़ादी का भान बना रहने दें.


आशा है कि हम सभी स्वतंत्रता दिवस और रक्षाबंधन के एकसाथ मनाये जाने के सन्देश को समझेंगे, इसमें अन्तर्निहित भावना को आपस में मिलकर और पुष्ट करेंगे. यदि हम ऐसा कर पाते हैं तो निश्चित ही हम सभी स्वतंत्रता का महोत्सव को सही आयाम प्रदान करेंगे, रक्षाबंधन की पवित्रता को अक्षुण्य रख सकेंगे. इसी पावन भावना के साथ आइये एक कदम समानता, भाईचारे, स्नेह, सुरक्षित स्वतंत्रता की ओर बढ़ाएं.

जय हिन्द

28 मई 2019

आज़ादी के वीर बाँकुरे को नमन


अंग्रेज़ी सत्ता के विरुद्ध भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले विनायक दामोदर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को नासिक के भगूर गाँव में हुआ था. वे बीसवीं शताब्दी के सबसे बड़े हिन्दूवादी थे. उन्हें हिन्दू शब्द से बेहद लगाव था. वे कहते थे कि उन्हें स्वातन्त्रय वीर की जगह हिन्दू संगठक कहा जाए. उन्होंने जीवन भर हिन्दू, हिन्दी, हिन्दुस्तान के लिए कार्य किया. उनको अखिल भारत हिन्दू महासभा का छह बार राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया.
उन्हें आजीवन काला पानी की दोहरी सज़ा मिली थी. वे सन 1911 से सन 1921 तक अंडमान की सेल्यूलर जेल में रहे. सन 1921 में स्वदेश लौटने के बाद उन्हें फिर कला पानी की सजा सुनाई गई. सन 1937 में उन्हें मुक्त कर दिया गया था. उन्होंने सन 1947 में भारत विभाजन का विरोध किया. बाद में सन 1948 में महात्मा गांधी की हत्या में उनका हाथ होने का संदेह किया गया. अपने देशप्रेम के ज़ज्बे के चलते वे किसी आरोप से घबराये नहीं और कालांतर में अदालत ने उन्हें तमाम आरोपों से बरी किया. 


उनकी मृत्यु 26 फ़रवरी 1966 में मुम्बई में हुई. उनके निधन पर तत्कालीन भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया. उनके ही सम्मान में पोर्ट ब्लेयर के हवाई अड्डे का नाम वीर सावरकर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा रखा गया.

आइये इसके साथ-साथ वीर सावरकर के बारे में कुछ तथ्य जान लें, शायद आपको भी जानकारी हो.

> वे भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने लंदन में अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांतिकारी आंदोलन संगठित किया था.
> वे भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सन् 1905 के बंग-भंग के बाद सन् 1906 में 'स्वदेशी' का नारा देकर विदेशी कपड़ों की होली जलाई थी.
> वे भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्हें अपने विचारों और अंग्रेजी साम्राज्य के प्रति शपथ ने लेने के कारण बैरिस्टर की डिग्री खोई.
> वे पहले भारतीय थे जिन्होंने पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की.
> वे भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सन् 1857 की लड़ाई को भारत का स्वाधीनता संग्राम बताया और लगभग एक हज़ार पृष्ठों का इतिहास लिखा.
> वे दुनिया के एकमात्र लेखक हैं जिनकी किताब को प्रकाशित होने के पहले ही ब्रिटिश सरकारों ने प्रतिबंधित कर दिया था.
> वे दुनिया के पहले राजनीतिक कैदी थे, जिनका मामला हेग के अंतराष्ट्रीय न्यायालय में चला था.
> वे पहले भारतीय राजनीतिक कैदी थे, जिन्होंने एक अछूत को मंदिर का पुजारी बनाया था.
> उन्होंने ही पहला भारतीय झंडा बनाया था, जिसे जर्मनी में 1907 की अंतर्राष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस में मैडम कामा ने फहराया था.
> वे एकमात्र व्यक्ति रहे जिन्हें दो बार कालापानी की सजा हुई.
> वे पहले कवि थे, जिन्होंने काग़ज़-कलम के बिना जेल की दीवारों पर पत्थर के टुकड़ों से कवितायें लिखीं. कहा जाता है उन्होंने अपनी रची दस हज़ार से भी अधिक पंक्तियों को प्राचीन वैदिक साधना के अनुरूप वर्षों स्मृति में सुरक्षित रखा, जब तक वे देशवासियों तक नहीं पहुँची.
> वे प्रथम क्रान्तिकारी थे, जिन पर स्वतंत्र भारत की सरकार ने झूठा मुकदमा चलाया और बाद में निर्दोष साबित होने पर माफी मांगी.


03 मई 2019

आज़ाद प्रेस की मानसिकता


कितना हास्यास्पद लगता है, आज़ाद प्रेस के होने के दौर में भी आज, 3 मई को अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस (World Press Freedom Day) मनाया जाना. किसी तरह के हास्य से पहले जानकारी दे दी जाये कि इसे मनाने का निर्णय 1991 में यूनेस्को और संयुक्त राष्ट्र के जनसूचना विभाग ने मिलकर किया था. इस निर्णय के पूर्व नामीबिया में हुए एक सम्मेलन में इस बात पर जोर दिया गया कि प्रेस की आज़ादी को जनसंचार की आज़ादी के रूप में देखा जाना चाहिए. इसके बाद प्रस्ताव पारित होने के बाद प्रतिवर्ष 3 मई को अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जाने लगा. अब बात की जाये हास्य की, आज़ादी उस देश में माँगी जा रही है जहाँ कि आज़ादी पहले से है. किसी देश में देखा गया है कि वहाँ के प्रधानमंत्री को हत्यारा, कातिल, खून का सौदागर कहा जाये? नहीं सुना होगा न. इसके अलावा भारत में प्रेस का काम भाजपा-विरोधी होना, हिन्दू-विरोधी होना है. यदि ऐसा न होता तो देश की मीडिया आज इस तरह से कम न कर रही होती. बहरहाल, आज दिन है प्रेस की स्वतंत्रता का तो कुछ उसी पर.


यह दिवस प्रेस की स्वतंत्रता का मूल्यांकन, उसकी स्वतंत्रता की रक्षा तथा प्रेस में सेवारत रहते हुए दिवंगत हुए संवाददाताओं को श्रद्धांजलि देने का भी दिन है. इसके बाद भी देखा जाये तो प्रेस अपने इसी दायित्व का निर्वहन भी सही ढंग से नहीं कर रहा है. अपनी आज़ादी का उचित दायित्व निर्वहन तो अलग वह अपने अंग रहे लोगों को श्रद्धांजलि देने का काम भी उचित ढंग से नहीं कर रहा है. कम से कम आज के दिन तो खबरों में झूठ बोलने से, उनको टीआरपी के झमेले में पड़ने से परहेज करना चाहिए था. अनावश्यक विचारों, बयानों के प्रसारण से बचा जाना चाहिए था. जनहित सम्बन्धी खबरों के स्थान पर मिर्च-मसालेदार खबरों के प्रसारण से परहेज किया जाना चाहिए था, मगर ऐसा होता नहीं दिखता. आज यह भले ही कहा जाये कि प्रेस जनता का आइना है, मगर असलियत यह है कि प्रेस ने जनता को गुमराह करने का काम किया है. यही कारण है कि आज़ादी की माँग के साथ-साथ प्रेस पर नियंत्रण रखने के लिए कुछ नियम और संगठन बने हुए हैं. ये समय-समय पर प्रेस को अपने दायरे में रहकर काम करते रहने की याद दिलाते रहते हैं. सत्यता तो यह है कि प्रेस की आज़ादी को छीनना एक तरह से देश की आज़ादी को छीनने जैसा ही है. वर्तमान में चीन, जापान, जर्मनी, पाकिस्तान जैसे देशों में प्रेस को पूर्णत: आज़ादी नहीं है. यहां प्रेस पर सरकार का सीधा नियंत्रण है. इस दृष्टि से भारत में प्रेस की स्थिति अत्यंत सशक्त है. 

इसके बाद भी यहाँ भी प्रेस में बहुतेरे लोग अपनी हनक दिखाने के लिए प्रविष्ट होने लगे हैं. इनका उद्देश्य जन-जागरूकता फैलाने के बजाय अपनी धाक जमाना ही अधिक होता है. अपनी गाड़ियों में प्रेस लिखे लोग प्रत्येक शहर में मिल जायेंगे. ऐसे लोग भी मिल जायेंगे जिनके द्वारा किसी समाचार-पत्र, पत्रिका का प्रकाशन उसी स्थिति में होता है, उन्हीं दिनों में होता है जबकि उससे संदर्भित विज्ञापन मिलना होता है. इन्हीं विज्ञापन के द्वारा वे न केवल प्रशासन पर अपनी हनक दिखाते हैं बल्कि अपनी रोजी-रोटी की जुगाड़ भी करते हैं. ऐसे लोग अपने आपको स्थापित करने लिए मीडिया का रास्ता चुनते हैं. ऐसे लोगों से प्रेस को बचने की आवश्यकता है. उसे समझना होगा कि प्रेस की आज़ादी का अर्थ किसी सन्दर्भ में किसी भी तरह की खबर का प्रसारण कर देना नहीं है. प्रेस को इस बात का संज्ञान लेना होगा कि किसी पूर्वाग्रह के साथ खबरों का, विचारों का प्रसारण न हो. यदि ऐसा होता है तो यह प्रेस की अक्षमता ही है, साथ ही समाज के लिए अहितकर भी है.

30 दिसंबर 2018

पहली अंतरिम सरकार के मुखिया द्वारा राष्ट्र ध्वज फहराना


व्यावहारिक रूप से हमने भले ही आज़ादी सन 1947 में पाई हो मगर हम एक तरह से  30 दिसंबर 1943 को ही आजाद हो गए थे. यह दिन शायद बहुत से देशवासियों को स्मरण भी न हो मगर सत्य यही है कि इसी दिन इस देश के एक क्रांतिकारी बेटे ने स्वतंत्र भारत के रूप में राष्ट्र ध्वज फहराया था. देश के जन-जन में बसे महान स्वतंत्रता सेनानी और आजाद हिंद फौज के संस्थापक नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने सबसे पहले अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के पोर्ट ब्लेयर में राष्ट्र ध्वज फहराया था. नेताजी देश की तत्कालीन पहली अंतरिम सरकार के मुखिया के रूप में राष्ट्रध्वज के वाहक बने थे.


इसके बाद कतिपय स्थितियाँ ऐसी बनी कि नेताजी की सेना अपने उद्देश्य में पूरी तरह से सफल न हो सकी. खुद नेता जी के अस्तित्व को लेकर सवाल अभी तक खड़े होते रहे. ऐसे ही अनेक कारणों-कारकों के बीच 15 अगस्त 1947 को भारत से अंग्रेजी शासन का अंत हुआ. देश की बागडोर हमारे राजनेताओं के हाथों में आ गई. हम सभी देशवासी इस दिन को पूरी श्रद्धा और देशभक्ति के साथ मनाते हैं.  अपने उन अनेकानेक वीर सपूतों को याद करते हैं जिनकी कुर्बानी से हमें आजादी मिली. इसके बाद भी कहीं न कहीं हम सभी नेता जी के योगदान को विस्मृत कर देते हैं. अंग्रेजों की कैद से निकल कर विदेश जाना और वहाँ पहुँच कर तमाम देशों के सहयोग से आज़ाद हिन्द फ़ौज का गठन करना अपने आपमें अभूतपूर्व कार्य था. एक-दो नहीं वरन एशिया के अनेक देशों के सहयोग से नेताजी ने आजाद हिंद फौज का गठन किया. सन 1942 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजी सेना के साथ जापानी सेना का युद्ध चल रहा था. जापानी पूरे उत्साह के साथ नेताजी की आजाद हिंद सेना का सहयोग कर रहे थे. अंग्रेजों से लड़ते हुए जापानी सेना 1942 में अंडमान-निकोबार द्वीप समूह तक आ पहुंची और 23 मार्च 1942 को जापानी सेना ने अंडमान के द्वीपों पर कब्जा कर वहां से अंग्रेजी सेना को खदेड़ दिया. 25 अक्टूबर 1943 को नेताजी ने भी अंग्रेजी सरकार के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी थी. तब तक नेताजी सुभाषचंद्र बोस अंतरिम आजाद हिंद सरकार का गठन कर चुके थे. जापानियों के साथ नेताजी के संबंध बहुत ही घनिष्ठ बन चुके थे. अंडमान-निकोबार पर जापानियों का कब्जा हो चुका था. ऐसा सन्देश मिलते ही नेताजी ने अंडमान-निकोबार द्वीपों का दौरा करने का निश्चय किया. 

नेताजी से प्रभावित होकर तत्कालीन जापानी प्रधानमंत्री हिदेकी तोजो ने 07 नवंबर 1943 को अंडमान-निकोबार द्वीपों को नेताजी की अंतरिम सरकार को सौंप दिया. इसके बाद नेताजी ने 30 दिसंबर 1943 को पहली बार अंडमान-निकोबार की धरती पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया. उन्होंने ने केवल राष्ट्रीय ध्वज फहराया बल्कि इन द्वीपों का नाम शहीद और स्वराज रखा. आज भी पोर्ट ब्लेयर के जिमखाना मैदान को अब नेताजी स्टेडियम के नाम से जाना जाता है, यहाँ पर तिरंगा फहराने के बाद नेताजी ने वहां के क्रांतिकारियों, आजाद हिंद फौज के सिपाहियों तथा जनता को संबोधित करते हुए कहा था कि हिंदुस्तान की आजादी की जो गाथा अंडमान की भूमि से शुरू हुई है वह दिल्ली में वायसराय के घर पर तिरंगा फहराने के बाद ही रुकेगी.  वर्तमान में भारत सरकार द्वारा एक स्मारक का निर्माण उसी जगह पर किया गया है जहाँ कि नेताजी ने तिरंगा फहराया था. इस स्थान पर प्रतिवर्ष 30 दिसंबर को स्थानीय प्रशासन द्वारा अनेक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है. पोर्ट ब्लेयर जैसे छोटे से शहर में इस मौके पर हजारों की भीड़ का जुटना इसका परिचायक है कि अंडमान-निकोबार के निवासी सारे नेताजी को बहुत आदर के साथ याद करते हैं.

17 नवंबर 2018

पंजाब केसरी को सादर नमन


आज की तारीख का भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन में विशेष महत्त्व है. आज, 17 नवम्बर को देश के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय का निधन हुआ था. उनका निधन सामान्य स्थितियों में नहीं हुआ था और इसी कारण आज की तिथि विशेष रूप से स्मरणीय होनी चाहिए. वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में गरम दल के तीन प्रमुख नेताओं लाल-बाल-पाल में से एक थे. सन् 1928 में साइमन कमीशन के विरुद्ध एक प्रदर्शन में हुए लाठीचार्ज में बुरी तरह से घायल हो गये थे. उन्होंने उसी समय कहा था कि मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश सरकार के ताबूत में एक-एक कील का काम करेगी. 17 नवम्बर 1928 को इसी लाठीचार्ज में आई चोटों के कारण इनका निधन हो गया. इनकी मृत्यु से सारा देश उत्तेजित हो उठा. चंद्रशेखर आज़ाद, भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव व अन्य क्रांतिकारियों ने लालाजी की मौत का बदला लेने का निर्णय किया. इन जाँबाज देशभक्तों ने लालाजी की मौत के ठीक एक महीने बाद 17 दिसंबर 1928 को ब्रिटिश पुलिस के अफ़सर सांडर्स को गोली से उड़ा दिया. लालाजी की मौत के बदले सांडर्स की हत्या के मामले में ही राजगुरु, सुखदेव और भगतसिंह को फाँसी की सज़ा सुनाई गई थी.


लाला लाजपत राय का जन्म 28 जनवरी 1865 को पंजाब के मोगा जिले में हुआ था. बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल के साथ इस त्रिमूर्ति को लाल-बाल-पाल के नाम से जाना जाता था. इन्हीं तीनों नेताओं ने सबसे पहले भारत में पूर्ण स्वतन्त्रता की माँग की थी. बाद में समूचा देश इनके साथ हो गया. लाला हंसराज के साथ दयानन्द एंग्लो वैदिक विद्यालयों का प्रसार किया जिन्हें आजकल डीएवी के नाम से जाना जाता है. इन्होंने पंजाब नैशनल बैंक और लक्ष्मी बीमा कम्पनी की स्थापना भी की थी. हिन्दी के लिए भी आपके कार्य अतुलनीय रहे. लोग आपको सम्मान से पंजाब केसरी नाम से भी पुकारते हैं. आपकी पुण्यतिथि पर सादर नमन. 


21 अक्टूबर 2018

देश की पहली सरकार की स्मृति और नेता जी सुभाष चन्द्र बोस


21 अक्टूबर का दिन देश के लिए ऐतिहासिक दिन है. इसे महज इसलिए याद नहीं किया जाना चाहिए कि इस दिन देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराया. यह आज़ाद देश में पहली बार है जबकि 21 अक्टूबर को किसी प्रधानमंत्री ने लाल किले पर तिरंगा फहराया. आज का दिन इसलिए गर्व का दिन है क्योंकि आज आज़ाद हिन्द सरकार की 75वीं वर्षगाँठ है. यह उन लोगों के लिए अवश्य ही कौतूहल भरी बात होगी जिन्हें देश का इतिहास नहीं मालूम. नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने भारत को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से 21 अक्टूबर 1943 को नेता जी के द्वारा आज़ाद हिन्द सरकार की स्थापना की गई.


कोलकाता में अपने घर पर ही नजरबन्द किये गए नेता जी 18 जनवरी 1941 को गायब होकर काबुल होते हुए जर्मनी पहुँच गए. वहां पहुँच उन्होंने हिटलर से मुलाकात की. वहीं सरदार अजीत सिंह ने उन्हें आज़ाद हिन्द लश्कर के बारे में बताकर इसे और व्यापक रूप देने को कहा. इसके साथ-साथ जापान में रासबिहारी बोस द्वारा बनाये आजाद हिन्द संघ का 1942 में एक सम्मेलन हुआ. इसमें रासबिहारी बोस ने जापान शासन की सहमति से नेताजी को आमन्त्रित किया. मई 1943 में जापान आकर नेताजी ने प्रधानमन्त्री जनरल तोजो से भेंट कर अंग्रेज़ों से युद्ध की अपनी योजना पर चर्चा की. नेताजी ने एक समारोह में 60,000 लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा- यह सेना न केवल भारत को स्वतन्त्रता प्रदान करेगी, अपितु स्वतन्त्र भारत की सेना का भी निर्माण करेगी. हमारी विजय तब पूर्ण होगी, जब हम ब्रिटिश साम्राज्य को दिल्ली के लाल क़िले में दफना देंगे. आज से हमारा परस्पर अभिवादन जय हिन्द और हमारा नारा दिल्ली चलो होगा. उन्होंने 4 जुलाई 1943 को तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा का उद्घोष किया. इसके बाद 21 अक्टूबर 1943 ई० को नेता जी ने सिंगापुर में अस्थायी भारत सरकार आज़ाद हिन्द सरकार की स्थापना की. सुभाषचन्द्र बोस इस सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तथा सेनाध्यक्ष तीनों बने. वित्त विभाग एस० सी० चटर्जी को, प्रचार विभाग एस० ए० अय्यर को तथा महिला संगठन लक्ष्मी स्वामीनाथन को सौंपा गया. 

आज़ाद हिन्द फ़ौज का प्रतीक चिह्न झंडे पर दहाड़ता हुए बाघ का चित्र था. क़दम-क़दम बढाए जा, खुशी के गीत गाए जा इस संगठन का वह गीत बना, जिसे गुनगुना कर संगठन के सेनानी जोश और उत्साह से भर उठते थे. नेता जी द्वारा अस्थायी सरकार का गठन कर लेना जितना महत्त्वपूर्ण था उतना महत्त्वपूर्ण उस सरकार को अन्य देशों द्वारा मान्यता देना भी रहा. जर्मनी, जापान तथा उनके समर्थक अनेक देशों द्वारा आज़ाद हिन्द सरकार को मान्यता प्रदान की गई. सिंगापुर और रंगून में आज़ाद हिन्द फ़ौज का मुख्यालय बनाया गया. कालांतर में आज़ाद हिन्द फ़ौज और सरकार का अंतिम परिणाम वह नहीं रहा जो नेता जी ने सोच रखा था. बावजूद इसके उनकी सेना और सरकार की जबरदस्त उपस्थिति के चलते भी अंग्रेजो में खलबली मच गई थी. जिसके चलते उन्हें देश से भागने का विचार करना पड़ा. आज़ाद भारत का ध्वज नेता जी लाल किले पर लहराता हुआ देखना चाहते थे. संदिग्ध परिस्थितियों के चलते भले ही वे प्रत्यक्ष में इस सपने को पूरा नहीं कर सके किन्तु उनके सपने को आज़ाद भारत के प्रधानमंत्री द्वारा पूरा किया गया. यह नेता जी और उनके कर्तव्यनिष्ठ सेनानियों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है. यह तथ्य अपने आपमें सत्य है कि आज़ाद भारत का पहला प्रधानमन्त्री, राष्ट्रपति कोई और है मगर इस तथ्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि अंग्रेजों की गुलामी के बीच पूरी हनक के साथ देश की सरकार स्थापित कर उसके पहले राष्ट्रपति और प्रधानमन्त्री के रूप में नेता जी सुभाष चन्द्र बोस को याद किया जायेगा.


आज, 21 अक्टूबर 2018 से एक नई परम्परा का सूत्रपात हुआ है. न केवल हमें बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी इस दिन के बारे में, नेता जी के बारे में, अस्थायी सरकार गठन के बारे में, आज़ाद हिन्द फ़ौज के बारे में, फ़ौज के सेनानियों के बारे में जानकारी होनी चाहिए.  

15 अगस्त 2018

सच्ची सलामी के इंतजार में है तिरंगा


स्वतंत्र भारत की पहली आधी रात को जब लाल किले से सबका प्रिय तिरंगा फहराया था, तब हवा हमारी थी, पानी हमारा था, जमीं हमारी थी, आसमान हमारा था। सब कुछ हमारा था पर वहाँ उपस्थित जन-जन की आँखों में नमी थी। पहली बार स्वतन्त्र हवा में लहराते हुए अपने प्यारे तिरंगे को सलामी देने के लिए उठे हाथों में एक कम्पन अवश्य था मगर उन सभी की आत्मा में दृढ़ता थी। स्वभाव में अभिमान था। स्वर में प्रसन्नता थी। सिर गर्व से ऊँचा उठा था। समय बदलता गया, परिदृश्य बदलते रहे किन्तु तिरंगा हमेशा फहरता रहा, हर वर्ष फहराया जाता रहा। सलामी हर बार दी जाती रही किन्तु अहम् हर बार मरता रहा। गर्व से भरा सिर हर बार झुकता रहा। आत्मा की दृढ़ता हर बार कम होती रही। यह एहसास साल दर साल कम होता रहा। सलामी को उठते हाथों का कम्पन हर बार बढ़ता रहा। आँखों की नमी आँसुओं में बदल गई। पहली बार जब हाथ काँपे थे तो वे हमारे स्वाभिमान का परिचायक बने थे। अब यही कम्पन हमारे नैतिक चरित्र, चारित्रिक पतन को दिखा रहा है। पहली बार आँखों से बहते आँसू खुशी के थे मगर अब लाचारी, बेबसी, हताशा, भय, आतंक, अविश्वास आदि के हैं। सामने लहराता हमारा प्यारा तिरंगा हमसे हमारी स्वतन्त्रता का अर्थ पूछता है। हमसे हमारे शहीदों के सपनों का मर्म पूछता है।


शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पे मरने वालों का यही बाकी निशां होगा कुछ ऐसा सोचकर ही हमारे वीर-बाँकुरों ने आजादी के लिए हँसते-हँसते अपने प्राण न्यौछावर कर दिये थे। इस महान सोच के बाद ही हमें प्राप्त हुई खुलकर हँसने की स्वतन्त्रता, खुलकर घूमने की आजादी, अपना स्वरूप तय करने की आजादी। हम आजाद तो हुए किन्तु विचारों की खोखली दुनिया को लेकर। राष्ट्रवाद जैसी अवधारणा अब हमें प्रभावित नहीं करती वरन् इसमें भी हमें साम्प्रदायिकता का बोध होने लगा है। ये सब एकाएक नहीं हो गया है, दरअसल स्वतन्त्र भारत के वक्ष पर एक ऐसी पीढ़ी ने जन्म ले लिया, जिसके लिए गुलामी एक कथा की भाँति है, शहीदों की शहादत उसके लिए गल्प की तरह है, आजादी के मतवालों की कुर्बानियाँ महज एक इत्तेफाक। ऐसी पीढ़ी के लिए आजादी का अर्थ स्वच्छन्दता, उच्शृंखलता आदि बना हुआ है; आजादी के गीत, राष्ट्रगीत, वन्देमातरम् इनके लिए आउटडेटेड हो गये हैं। इक्कीसवीं सदी में खड़े हमारे आजाद देश के पास आज भी स्थिरता का अभाव सा दिखाई देता है। कभी हम अपने पड़ोसी देशों की कृत्सित नीतियों का शिकार बनते हैं, कभी हमें सीमापार से हो रहे आतंकी हमलों से बचना पड़ता है तो कभी यह आग हमारे ही घरों में लगी दिखाई देती है। हम मंगल ग्रह पर पानी और जीवन की आशा में करोड़ों रुपये का अभियान चलाकर वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय के सामने सीना ठोंकते हैं तो शिक्षा के नाम पर वैश्विक जगत में अभी भी बहुत पीछे होने के कारण शर्मिन्दा होते हैं। 

अपनी संस्कृति के साथ विश्व की तमाम संस्कृतियों का समावेश कर हम सांस्कृतिक प्रचारक-विचारक के रूप में विख्यात होते हैं तो अपने देश की महिलाओं की गरिमा, उनकी जान की सुरक्षा न कर पाने के चलते शर्म से सिर झुका बैठते हैं। हमें अभी भी बालिका शिक्षा के लिए लोगों को जागरूक करना पड़ रहा है। अभी भी बेटियों को बचाने की गुहार लगानी पड़ रही है उसके बाद भी बालिका संरक्षण गृहों से यातनाओं की, दुष्कर्म की खबरें आ रही हैं। महिला सशक्तिकरण के आँकड़े दिखाए जा रहे हैं किन्तु एक लड़ाई तीन तलाक और हलाला के लिए भी लड़ी जा रही है। हमने औद्योगीकरण, उपभोक्तावादी संस्कृति के नाम पर हाथों में मोबाइल तो थमा दिये किन्तु शिक्षा के लिए हर हाथ को पुस्तकें, पेन्सिलें नहीं पकड़ा पाये। बच्चे अभी भी किताबों की जगह कूड़ा बीनने वाले झोले पकड़े दिखाई पड़ते हैं। मजदूरी करते दिखाई पड़ते हैं। हाथों में औजार थामे नजर आते । अभिजात्य वर्ग एवं पश्चिमीकरण की नकल में हमने हर हाथ को सस्ते दरों पर बीयर तो उपलब्ध करवा दी किन्तु बहुतायत में अपनी जनता को पीने का स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं करवा पाये।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या फिर कोई हल नहीं इस समस्या का? है, मगर उसके लिए सत्ताधारियों के इंतजार के बजाय नागरिकों को ही आगे आना होगा। आपसी विभेद को समाप्त करना होगा। वैमनष्यता के चलते व्यक्ति अपना ही विकास नहीं कर सकता है तो वह समाज का, अपने परिवार का विकास कैसे करेगा? बच्चे हमारे भविष्य का आधार हैं, यदि वे ही अशिक्षित, भूखे, अस्वस्थ रहेंगे तो विकास की अवधारणा बेमानी है। याद रखना होगा कि जिन्हें सत्ता चाहिए वो हमारा ही उपयोग करके सत्ता प्राप्त कर लेते हैं तो क्या हम स्वयं के लिए अपना उपयोग कर अपना और अपने राष्ट्र का विकास नहीं कर सकते हैं? नागरिक किसी भी धर्म के हों, किसी भी जाति के हों, किसी भी क्षेत्र के हों किन्तु देश हमारा है और हम देश के, इस सोच के द्वारा हम विकास की, एकता की राह पर आगे बढ़ सकते हैं। यदि ऐसा हम कर पाते हैं तो हम अपने प्यारे तिरंगे को सच्ची सलामी दे सकेंगे और एक बार फिर हमारा सिर उसके सामने गर्व से भरा होगा, दृढ़ता से हमारे हाथ उठे होंगे, जयहिन्द, वन्देमातरम् का घोष हमारे कंठों से निकलकर समूचे आसमान में गूँज उठेगा।

09 अगस्त 2018

काकोरी कांड की स्मृति

आज, अगस्त काकोरी काण्ड दिवस के रूप में याद किया जाता है. भारतीय स्वाधीनता संग्राम में काकोरी कांड ऐसी घटना है जिसने अंग्रेजी शासन को हिला कर रख दिया था. यह घटना भारत के वीर क्रांतिकारियों द्वारा अंग्रेजी सरकार के खिलाफ युद्ध जैसा विगुल था जिसे खिसियाये अंग्रेजों ने काकोरी डकैती का नाम दे दिया था. आज़ादी के मस्तानों - आजादबिस्मिलअशफाकराजेंद्र लाहिड़ीरोशन सिंह सहित दस क्रांतिकारियों द्वारा 9 अगस्त 1925 को लखनऊ से कुछ दूर स्थित काकोरी में ट्रेन से जा रहे अंग्रेजी खजाने को लूट लिया. क्रांतिकारी इस धन का उपयोग हथियार खरीदने तथा आजादी के आंदोलन के लिए करना चाहते थे. काकोरी कांड से अंग्रेजी सरकार बुरी तरह तिलमिला उठी और उसने क्रांतिकारियों के खिलाफ अपनी बर्बरता को और तेज कर दिया. 


क्रांतिकारियों के बीच रह रहे कुछ गद्दारों के चलते चंद्रशेखर आजाद को छोड़कर इस घटना में शामिल शेष सभी क्रांतिकारी पकडे़ गए. रामप्रसाद बिस्मिलअशफाक उल्लाराजेंद्र लाहिड़ी और रोशन सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई. अंग्रेजों में क्रांतिकारियों को फाँसी की सजा सुना देने के बाद भी इतना खौफ था कि राजेंद्र लाहिड़ी की फांसी की सजा 19 दिसंबर 1927 को निर्धारित की गई थी लेकिन उनको इससे दो दिन पहले 17 दिसंबर को ही गोंडा जेल में फांसी दे दी गई. 19 दिसंबर 1927 को रामप्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर जेल में तथा अशफाक उल्ला को फैजाबाद जेल में फांसी दी गई. आज़ादी के परवाने वीर क्रांतिकारियों के चेहरे पर किसी तरह का डरभय नहीं था. वे हंसते-हंसतेभारत माता की जय-जयकार करते हुए फांसी के फंदे को चूम गए. अंग्रेजी सरकार ने क्रांतिकारियों को फाँसी की सजा सुनाकर भले ही उनको मौत की नींद सुला दिया था किन्तु उनके इस निर्णय की बहुत निंदा हुई. इसके पीछे कारण यह था कि डकैती जैसे मामले में फांसी की सजा सुनाना अपने आप में एक अनोखी घटना थी. 

सभी जांबाज क्रांतिकारियों को सादर नमन

19 जून 2018

रानी झाँसी का अंतिम युद्ध


17 जून को महारानी लक्ष्मीबाई का बलिदान के रूप में याद किया जाता है. वे अंग्रेजों को अपनी झाँसी न देने की जिद में अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करती रहीं. इसी संघर्ष में वे अंग्रेजों के विरुद्ध अपने अंतिम युद्ध में 17 जून 1858 को ग्वालियर में शहीद हो गईं. 16 जून को अंग्रेज अधिकारी रोज अपनी सेना के साथ बहादुरपुर से मुरार की तरफ बढ़ा. रोज ने निश्चय किया की वह स्वयं मुरार पर अधिकार करेगा और वहीं से कोटा की सरायं में विद्यमान स्मिथ को सहयोग करेगा. ग्वालियर में क्रान्तिकारी सैनिक भी अपने-अपने मोर्चे पर तैनात थे. तात्या टोपे कम्पू में, राव साहब पश्चिम में, नवाब अलीबहादुर ग्वालियर नगर और किले की देखरेख में लगाये गए. 16 जून को हुए युद्ध में क्रान्तिकारी सेनाओं की हार हुई और उनको पीछे हटना पड़ा. मुरार पर रोज का अधिकार हो गया. इसके साथ ही ब्रिगेडियर जनरल नेपिअर और महाराजा जयाजीराव सिंधिया भी आगरा से मुरार आ गये. अंग्रेजों ने सिंधिया से एक विज्ञप्ति जारी करवाई जिसमें ग्वालियर के सैनिकों से, जो क्रांतिकारियों की तरफ से लड़ रहे थे, कहा गया कि अंग्रेजी फ़ौज उनको राजपद देने के लिए युद्ध कर रही है. अतः वे क्रांतिकारियों का साथ छोड़ दें, उनके लिए आम माफ़ी की घोषणा की जाती है. इस घोषणा का कुछ न कुछ असर अवश्य  हुआ क्योंकि क्रांतिकारी फौजियों में कुछ लोग फिर से सिंधिया से मिलने की सोचने लगे. रानी लक्ष्मीबाई ने खुद आगे आकर उनको अंग्रेजों की धूर्तता के बारे में समझाया.


अगली सुबह, यानि कि 17 जून को रानी झाँसी के लिए सिंधिया की अश्वशाला से एक नया घोडा लाया गया क्योंकि एक दिन पहले मुरार के युद्ध में रानी का घोडा घायल हो गया था. रानी ने हाथ में तलवार और कमर में खंजर बांध कर फौजियों की तरह सफ़ेद पैजामा और लाल कुरता पहना, साथ ही गले में मोतियों की माला डाली. पैरों में नागरा पहन सिर पर सफ़ेद चंदेरी मुरैठा धारण कर रानी युद्ध के लिए तैयार हो गई. सुबह होते ही स्मिथ की फ़ौज में युद्ध का बिगुल बज गया. स्मिथ ने एक भाग को रिजर्व में छोड़ा और अन्य के साथ आगे बढ़ा. उसका दल कुछ कदम आगे बढ़ा ही था कि क्रान्तिकारी सेना की तरफ से गोलों की बौछार होने लगी. स्मिथ ने पीछे हट कर अपने घुड़सवार दस्ते को आगे बढ़ाया और उसके पीछे से गोलों की मार शुरू की. घनघोर युद्ध शुरू हो गया. युद्ध होते-होते दोपहर हो गई, कोई भी पक्ष न जीतता और न ही हारता लग रहा था. अब अंग्रेजों की ओर से कर्नल हिक्स और लेफ्टिनेंट रेले ने मोर्चा संभाला लेकिन अभी वे थोडा ही आगे बढ़े थे कि रानी के मोर्चे से चले एक गोले ने रेले और उसके घोड़े के प्राण ले लिए. इस मोर्चे पर रानी की जीत लगभग तय लग रही थी. तभी कार्नेट गोल्डवर्थी ने वीरतापूर्ण कौशल से अंग्रेजों की हारती बाजी को बचाया. उसने और कर्नल ब्लेक ने क्रांतिकारियों के मोर्चे में खलबली मचा दी. दो घंटे के भयानक युद्ध के बाद क्रांतिकारियों की पार्श्व भाग की सेना पीछे हटने लगी. सारी सेना तेजी से फूलबाग के परेड मैदान की तरफ पीछे हटने लगी.

रानी लक्ष्मीबाई ने जब यह देखा तो वह अपने सैनिकों को उत्साहित करते हुए प्राणों की बाजी लगा कर युद्ध करने लगी. दिन के तीन बज चुके थे युद्ध करते-करते रानी अपने साथियों से बहुत दूर पहुँच गई थी। उनके अंगरक्षक भी उनसे बहुत दूरी पर थे. रानी के साथ केवल मुन्दर ही थी. इसी समय स्मिथ ने रिजर्व में रोकी हुई अपनी टुकड़ी को युद्ध में उतार दिया. ताजादम ये सैनिक एकदम से क्रांतिकारियों पर टूट पड़े. अब रानी ने प्राण बचाने के लिए सोनरेखा नाले को पार करना चाहा. इसी वक्त मुन्दर को एक गोली लगी. रानी ने सुना कि पीछे से मुन्दर कह रही थी कि अब वह नहीं भाग सकती तो रानी ने पीछे मुड़कर मुन्दर को गोली मारने वाले का काम तमाम कर दिया. तभी एक सैनिक की तलवार का करारा वार रानी पर पड़ा. उनके माथे से दाहिनी आँख तक का भाग कट गया. उसी समय एक गोली भी उनकी छाती में जा लगी. वह घोड़े पर गिर पड़ी. एक सैनिक उनको लेकर पास बनी कुटिया की तरफ भागा. अंग्रेजों ने समझा कि उन्होंने अंतिम सैनिक को मार दिया है. वे नहीं जानते थे कि घोड़े पर अचेतावस्था में गिरने वाली कोई और नहीं रानी झाँसी है.

रानी के शेष साथियों, जो उनको पास बनी कुटिया तक ले गए थे, ने देखा कि रानी की सांसे चल रही थी. कुटिया के साधू ने रानी के लिए अंतिम प्रार्थना करनी शुरू कर दी. रानी की एक आँख चोट के कारण बंद थी. उन्होंने बहुत मुश्किल से अपनी दूसरी आँख खोली. उनके मुंह से रुक-रुक कर अपने बेटे के लिए शब्द निकल रहे थे,...दामोदर... मैं उसे तुम्हारी... देखरेख में छोड़ती हूँ... उसे छावनी ले जाओ... दौड़ो उसे ले जाओ. ऐसा कहने के साथ उन्होंने अपने गले से मोतियों का हार निकालने की कोशिश की लेकिन वो ऐसा नहीं कर पाई और फिर बेहोश हो गईं. साधू ने उनके गले से हार उतार कर उनके एक अंगरक्षक के हाथ में रखते हुए कहा इसे रखो... दामोदर के लिए. उसी समय रानी की साँसे तेज़ी से चलने लगी. अचानक जैसे उनमें फिर से जान आ गई. वो बोलीं, अंग्रेज़ों को मेरा शरीर नहीं मिलना चाहिए. इतना कहकर उनका सिर एक ओर लुड़क गया. उनकी साँसों में एक झटका आया और फिर सब कुछ शांत हो गया. झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अपने प्राण त्याग दिए. वहाँ मौजूद रानी के साथियों, साधू और रामचंद्र देशमुख ने रानी के पार्थिव शरीर पर उसी कुटिया को रखकर आग लगा दी. अंग्रेज जान नहीं सके कि आज के युद्ध में रानी लक्ष्मी युद्ध भूमि में लड़ते हुए मारी गई हैं.

इस लड़ाई में लड़ रहे कैप्टन क्लेमेंट वॉकर हेनीज ने बाद में रानी के अंतिम क्षणों का वर्णन करते हुए लिखा, हमारा विरोध ख़त्म हो चुका था. सिर्फ़ कुछ सैनिकों से घिरी और हथियारों से लैस एक महिला अपने सैनिकों में कुछ जान फूंकने की कोशिश कर रही थी. बार-बार वो इशारों और तेज़ आवाज़ से हार रहे सैनिकों का मनोबल बढ़ाने का प्रयास करती थी, लेकिन उसका कुछ ख़ास असर नहीं पड़ रहा था. कुछ ही मिनटों में हमने उस महिला पर भी काबू पा लिया. हमारे एक सैनिक की कटार का तेज़ वार उसके सिर पर पड़ा और सब कुछ समाप्त हो गया. बाद में पता चला कि वो महिला और कोई नहीं स्वयं झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई थी.


++
इतिहासकार देवेन्द्र सिंह जी की मूल पोस्ट से