.
19 जुलाई 2015
समलैंगिक विकृति की तरफ बढ़ती पीढ़ी
.
12 जुलाई 2015
स्वतंत्रता, सेक्स, जीवन, जीवन-मूल्य
31 मार्च 2011
अब समलैंगिकों के आदर्श बनेगे गाँधी जी
अभी हाल ही में एक पुस्तक प्रकाशित हुई जिसमें महात्मा गांधी के समलैंगिक सम्बन्धों को लेकर किसी प्रकार की टिप्पणी की गई है। इसके बाद से लगभग सारे देश में एक तरह का विवाद सा पैदा हो गया है। हालांकि हमने न तो इस पुस्तक को देखा है और न ही पढ़ा है, गांधी जी पर की गई टिप्पणी को भी किताब के माध्यम से नहीं पढ़ा है। जो भी, जितना भी पढ़ने में आया है वह या तो इंटरनेट पर, ब्लॉग पर या फिर समाचार-पत्रों के द्वारा।
हमने चूंकि इस बारे में पढ़ भी नहीं रखा है, न तो पुस्तक में दी गई टिप्पणी के बारे में और न ही महात्मा गांधी के बारे में। इस कारण से हम यह तो नहीं कह सकते कि गांधी जी समलैंगिक थे अथवा नहीं किन्तु इसके संदर्भ में कुछ बातों को स्पष्ट अवश्य ही कर सकते हैं।
गांधी जी को समलैंगिक बताने वाले लेखक को प्रसिद्धि चाहिए थी अथवा उसके पास कोई सबूत हैं, जैसे कि असांजे के पास, विकीलीक्स के पास होते हैं। सबूत होंगे तो उन्हें पेश करना चाहिए था और यदि सबूत नहीं हैं तो लेखक को इस तरह के विवाद की स्थिति पैदा नहीं करनी चाहिए। अब अपने विचारों की दिशा उस ओर मोड़ना चाहेंगे जहां कहा जा रहा है कि गांधी जी पर अपमानजनक टिप्पणी की गई है।
इस सम्बन्ध में उन सभी लोगों को जो लोग इस प्रकार की टिप्पणी को गांधी जी का अपमान मान रहे हैं उन्हें स्पष्ट करना होगा कि किस बात का अपमान किया गया? गांधी जी को समलैंगिक बताने का अथवा देर से बता कर एक तथ्य छुपा कर गांधी जी के व्यक्तित्व को कम आंकने का? इसके अलावा समलिंगी सम्बन्धों की गलत वकालत करने का अथवा गलत व्यक्ति से सम्बन्ध को जोड़ने का? यहां गांधी और समलैंगिक सम्बन्धों का विरोध करते समय एक बात को अब याद रखना होगा कि अब हमारा देश भी वो देश है जहां समलैंगिक सम्बन्धों को कानूनी मान्यता प्राप्त है। इसका अर्थ है कि समलैंगिक सम्बन्ध अब शर्मसार करने वाले नहीं हैं, इस देश में।
इस बात से कौन इंकार करेगा कि अदालत के समलैंगिक सम्बन्धों को मान्यता देने का विरोध हुआ तो इस तरह के सम्बन्धों के पक्षधर लोगों ने दलील दी या कहें कि कुतर्क किया कि इस तरह की मान्यता मिलने से उन जोड़ों को शर्मसार नहीं होना पड़ेगा जो समलैंगिक हैं। यदि अदालत का फैसला समलैंगिक सम्बन्धों को अपमान और शर्म से निजात दिलाता है तो गांधी का अपमान कैसे हो गया? ये तो उन जोड़ों के लिए आदर्श की स्थिति होगी जो समलैंगिक सम्बन्धों को वैद्य ठहराने के लिए किसी बड़े व्यक्ति का नाम खोजते फिर रहे थे।
गांधी के ब्रहमचर्य का भी पर्याप्त मजाक बनाया जाता रहा है इस देश में और इसके पीछे स्वयं उन्हीं की कहानी काम करती रही है। पत्नी से शारीरिक सम्बन्ध को बनाने की आकुलता ही उन्हें अन्तिम समय में अपने पिता से दूर ले गई। ब्रहमचर्य का पालन करने के बाद भी उनके चार बेटे हुए। ब्रहमचर्य का धारण उन्होंने किस उम्र में किया यह सभी को पता है, बहरहाल विवाद का विषय यह नहीं है। गांधी पर हाल ही में आई टिप्प्णी को लेकर विवाद बाद में मचाया जाये पहले तय कर लिया जाये कि समलैंगिक सम्बन्ध समाज में स्वीकार्यता की स्थिति में हैं अथवा नहीं। यदि ज्ञात हो जाये कि फलां युवा जोड़े समलैंगिक हैं तो कानूनन उनके साथ कैसा बर्ताव किया जायेगा, सम्मान का अथवा अपमान का? यदि वे कानूनन सम्मानित अवस्था में हैं तो गांधी अपमानित नहीं किये गये, हां लेखक पर अब सबूतों को सामने लाने का दवाब डालना होगा।
अदालती निर्णय के बाद यदि युवाओं के समलैंगिक होने पर उनका अपमान नहीं होता, किसी को समलैंगिक बताना उसका अपमान नहीं है तो गांधी भी अपमानित नहीं हुए हैं। एक ही विषय पर दो अलग-अलग प्रस्थिति वाले लोगों को अलग-अलग चश्मे से नहीं देखना चाहिए। समलैंगिक सम्बन्धों को कानूनी मान्यता प्रदान करवाने की लम्बी लड़ाई लड़ने वाली ‘नाज फाउण्डेशन’ इस मुद्दे पर कहां है? उनसे उनका एक आदर्श व्यक्तित्व छीना जा रहा है। सवाल एक और कि समाजशास्त्री, कानूनविद्, दर्शनशास्त्री, शिक्षा विचारक, विभिन्न दर्शनों के प्रतिपादक गांधी जी क्या जानते थे कि 21 वीं सदी में उनके देश में समलैंगिक सम्बन्धों को कानूनी मान्यता मिल जायेगी? आखिर महान व्यक्तित्व भविष्यदृष्टा होते हैं और हो सकता है कि इसी भविष्यदृष्टा होने के कारण वे भी.......!!!
15 सितंबर 2009
फ़िर तो आपसी सहमती के नाम पर ये भी स्वीकार्य हों

आप मार्गदर्शन करें कि ये कृत्य भी किसी दिन आपसी सहमति के नाम पर गैर-कानूनी नहीं रहेंगे?
1- गर्भ में पल रहे शिशु का लिंग परीक्षण? ध्यान दें हम अभी सिर्फ लिंग परीक्षण की बात कर रहे हैं।
2- बाल विवाह, यह भी दो परिवारों की आपसी सहमति से होता हो तो?
3- रिश्वत का लेन-देन, यह भी तो दो व्यक्तियों की आपसी सहमति पर आधारित है?
4- पहली पत्नी के रहते दूसरा विवाह? इसमें भी दो की आपसी सहमति हो?
5- मानव अंगों की खरीद फरोख्त, खून बेचने वाले लोगों का कृत्य? यदि इसमें भी आपसी सहमति सिद्ध हो जाये?
और भी बहुत से कृत्य हैं और देखिये सभी में वयस्कों का समावेश है, वयस्कों की सहमति है। अब यदि इनके गैर-कानूनी होने के बाद इनके बुरे प्रभाव, स्वास्थ्य पर प्रभाव, समाज पर प्रभाव, परिवार पर प्रभाव जैसे कारण गिनाये जायें तो समलैंगिकता से कौन सा स्वस्थ संदेश गया है? समलैंगिक सम्बन्ध से क्या स्वास्थ्य उत्तम और काया निरोगी रहती है?
इस पोस्ट को बड़ा नहीं करेंगे। बस सवालों के जवाब की अपेक्षा है।
10 जुलाई 2009
जमाने में और भी ग़म हैं समलैंगिकता के सिवाय
एक निर्णय, समलैंगिकता पर और देश भर में बहस का माहौल। इसके साथ एक और तस्वीर, वह ये कि आज बारिश में भीगते एक बूढ़े को देखा। काँपता बदन, किसी तरह से एक फटे अंगोछे से ढाँकने का असफल प्रयास कर रहा था।
मंदिरों और मस्जिदों के सामने हाथ फैलाये छोटे-छोटे मासूम बच्चों को देखा। एक-एक रोटी के लिए, ये बच्चे वाकई जरूरतमंद थे, वे नहीं जो किसी मार के डर से भीख माँग रहे हों।
आज समाचार देखा कि अस्पताल में अभी भी डायरिया से बच्चे दम तोड़ रहे हैं। डाक्टरों के पास समय नहीं, दवाइयों का टोटा है।
आपने भी सुनी होंगी कुछ इसी तरह की खबरें।
कहीं किसी के लुटने की, कहीं किसी के साथ बलात्कार की, कहीं किसी दहेज हत्या की, कहीं किसी आत्महत्या की।
कहीं कोई जूझ रहा होगा रोटी, पानी, घर, बिजली की समस्या से। कोई जूझ रहा होगा अपने रोजगार के लिए। कोई लड़ रहा है भ्रष्टाचार से। कोई असाध्य बीमारी से जूझ रहा है। किसी के सामने भूख की समस्या है।
देखा जाये तो ये ऐसी समस्याएँ हैं जिनका समाधान चुनावी घोषणा-पत्रों में होता है। अब हम इन समस्याओं से ऊपर उठकर दूसरे प्रकार की समस्याओं को सुलझाने में लगे हैं। उनमें से एक समस्या समलैंगिकता को कानूनी समर्थन दे देने की है।
चलिए समस्या से निपटा जाये...जी हाँ अभी इसी समस्या से निपटा जाये क्योंकि बाकी समस्यायें तो आदमी के पैदा होने से मरने तक बनी ही रहतीं हैं।
08 जुलाई 2009
समलैंगिक गीत - कली कली से, भौंरे भौंरों पर मंडराते मिलेंगे
कली कली से, भौंरे भौंरों पर मँडराते मिलें गे। ।
चोरी-चोरी जो प्यार के गीत गाते थे,
आँखों-आँखों में ही बस गुनगुनाते थे।
खुल्लम खुल्ला होगी अब इजहारे-मुहब्बत,
प्रेम-प्यार की नित नई इबारत लिखें गे॥
बाप बेटियों के सोयें चादर तान के,
आयाम देखो उनकी स्वच्छन्द उड़ान के।
क्यों घबराते हो उनके रिश्तों को लेकर,
नहीं इससे उनके पैर भारी मिलें गे॥
शर्म की बात करते हो नादान हो,
होगा क्या सोच कर क्यों परेशान हो?
बेलौस होकर मदमस्त रहेंगे जोड़े,
कूड़े के ढेर पर नहीं नवजात मिलें गे॥
अभी तक पड़े थे हाशिये पर जो,
करते हैं याद उन वेद-पुराणों को,
बात कुछ हजम नहीं होती मेरे यार,
‘पॉप कल्चर’ वाले क्या वेद-पुराण पढ़ें गे॥
--------------------
ये कविता मात्र व्यंग्य है। इसमें कविता का मीटर तलाशने वाले कृपया अपनी मगजमारी न करें। कविता के नाम पर कविता कहने का आरोप न लगायें। बस पढ़ें और यदि मजा आया हो तो मजा लें।
05 जुलाई 2009
समलैंगिक साथी - अब खोजो रिश्तों के नए नाम
अभी सुबह-सुबह एक समाचार पढ़ा कि दिल्ली के एक प्रोफेसर साहब अदालत के समलैंगिकों के समर्थन में दिये गये आदेश से बड़े खुश हैं। अब वे अपने लड़के के लिए किसी लड़की की नहीं बल्कि एक लड़के की ही तलाश करने लगे हैं। उनको अभी तक डर लग रहा था अब वह डर मिट गया है।
समाचार पढ़ा, दिमाग में एक कीड़ा कुलबुलाया। वैसे इस विषय पर तो समूचे देश में गर्मागरम बहस चल रही है इस कारण अभी हम बहस के मूड में नहीं हैं। हम सोच रहे हैं कि समाज में समलैंगिकों के सम्बन्धों को आने वाले समय में सहजता से स्वीकार लिया गया तो हमें बहुत से नये रिश्तों को सम्बोधित करने वाले शब्दों को खोजना होगा।
शब्द निर्माण की प्रक्रिया भी सहजता से चलती रहती है। अब इन सम्बन्धों को लेकर भी नये शब्दों का निर्माण करना होगा। घर के किसी ‘क’ लड़के ने अपने किसी मित्र ‘ख’ लड़के को ही अपना जीवन साथी बनाया तो वह ‘ख’ व्यक्ति उस घर का क्या होगा। बहू या दामाद या कुछ और? (वैसे दामाद का तो सवाल ही नहीं होता क्योंकि वह तो लड़की का पति होता है।) अपने परिचितों को उन घरों के लोग ‘क’ एवं ‘ख’ शख्स को किस रिश्ते के सम्बोधन से मिलवाया करेंगे?
‘क’ लड़के को चाचा, भैया, मामा आदि पुकारने वाले उसके जीवन साथी ‘ख’ शख्स को किस प्रकार सम्बोधित करेंगे?
इसी तरह किसी घर की ‘अ’ बिटिया अपनी महिला मित्र ‘ब’ को अपना जीवन साथी बनाती है तो उसका रिश्ता उसके घर वाले किस रूप में पुकारेंगे? ‘अ’ को मौसी कहने वाले बच्चे ‘ब’ को क्या मौसा कहेंगे? ‘अ’ को बुआ कहने वाले क्या ‘ब’ को फूफा कहेंगे?
रिश्तों को पुकारने की समस्या तो है ही साथ ही दूसरी समस्या एक और आयेगी। वह होगी बहू, दामाद का निर्धारण करने की, ससुराल जाने की, विदाई की।
कोई इसे भले ही पुरातनपंथी कहे पर सत्य यह है कि बेटे की शादी के बाद बहू विदा होकर अपने ससुराल आती है। बिटिया को घर से बारात लेकर आये दामाद के साथ विदा किया जाता है। मान भी लिया जाये कि दोनों नौकरीपेशा हैं फिर भी भले ही एक दिन के लिए ही सही, इस परम्परा का निर्वाह होता है।
अब हमारे दिमाग में समस्या उपजी कि दो लड़को का आपस में जीवन साथी के रूप में स्वीकारे जाने पर कौन सा परिवार किसको विदा करेगा और कौन विदा करवा कर दूसरे लड़के को अपने घर ले जायेगा? यही स्थिति दो लड़कियों को लेकर भी होगी। बहू की मुँह दिखाई, अन्य दूसरी नेग रस्में कैसे निपटाई जायेंगीं? (चलिये रस्मों को लेकर तो सोचा जा सकता है कि हम आधुनिक हो गये हैं, इन्हें छोड़ा भी जा सकता है।)
हम तो समाचार पढ़ कर ही सोच में पड़ गये कि बेचारे प्रोफेसर साहब अपने लड़के के लिए लड़का तो खोजने लगे, माना मिल भी जायेगा पर दूसरे लड़के के घर वाले भी तो लड़का खोज रहे होंगे, ऐसे में कौन बारात लायेगा? कौन विदा करवा कर दूसरे लड़के को अपने घर ले जायेगा?
उफ! हम क्यों बेकार में मगजमारी कर रहे हैं? जिनकी समस्या है वही निपटेंगे। हम सोच रहे हैं कि नये रिश्तों के नये नामकरण के लिए शब्द खोजने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाये। पता नहीं हमारा दिया कौन सा शब्द चलन में आ जाये और हम भी प्रसिद्ध हो जायें।
कोई कुछ भी कहे, समलैंगिक सम्बन्धों की वकालत उन सभी लोगों को अनिवार्य रूप से करनी चाहिए जो जनसंख्या नियंत्रण और कन्या भ्रूण हत्या निवारण के लिए काम कर रहे हैं। इस नये सम्बन्ध से जनसंख्या रुकेगी और बच्चे ही नहीं होंगे तो कन्या भ्रूण हत्या होने का सवाल ही नहीं। हाँ, दहेज की समस्या और दहेज के लिए प्रताड़ना के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता और महिला हिंसा...........पता नहीं?
चलिए इसमें कुछ तो अच्छा है.........। जय हो.........
03 जुलाई 2009
समलैंगिकता कानूनी - भविष्य कैसा होगा?
समलैंगिकता पर अदालत का आदेश आया तो देश में उत्साह और आक्रोश का मंजर व्याप्त हो गया। समझ नहीं आया कि इस मुद्दे पर कहा क्या जाये? यह वाकई मानव की विजय है जिससे उसको समानता का अवसर मिला या फिर यह हमारी मानसिकता के बीमार होने का परिचायक है?
अदालत ने कहा कि संविधान के समानता के अनुच्छेद के कारण इस प्रकार का आदेश देने का बल मिला; आदमी की भावनाओं को महत्व दिया। हमारे राजनेताओं ने और फिल्मी हस्तियों ने भी इसका समर्थन करते हुए समलैंगिकों को बधाई दे डाली। उन लोगों का यहाँ तक कहना था कि आधुनिकता के माहौल में हमें बदलना होगा।
चलिए मान लिया जाये
कि सेक्स के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। समलैंगिक गतिविधियों से एड्स रुकेगा या नहीं, अन्य बीमारियाँ होंगीं या नहीं, अपराधबोध कम होगा या नहीं यह तो बाद की बात है पर देखा जाये तो आधुनिक होने का दम्भ और बढ़ जायेगा।
सभी की अपनी मर्जी है कि वह अपनी शारीरिक संतुष्टि का रास्ता स्वयं चुने पर क्या अप्राकृतिक रास्ता चुनने की अनुमति दी जानी चाहिए? हमारे देश में विवाह को सिर्फ शारीरिक संतुष्टि के लिए ही नहीं स्वीकारा गया। विवाह के पीछे का मकसद सेक्स और संतानोत्पत्ति रहा है। आज दो व्यक्तियों (समलैंगिकों) के मध्य का प्यार सेक्स आधारित ही है। क्या इससे विवाह और परिवार की अवधारणा खण्डित नहीं होती है? 
इसके अलावा जो लोग इस निर्णय की वकालत यह कहते हुए घूम रहे हैं कि हमें व्यक्तियों की भावनाओं का ख्याल भी रखना चाहिए; संविधान में भी समानता का अधिकार दिया गया है; किसी के साथ कानूनी डंडा हमेशा प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए वगैरह...वगैरह। वे लोग आज के समाज की स्थिति देख कर थोड़ा इस ओर भी सोचें।
आज हम देखते हैं कि आधुनिकता में अंधे होकर बाप बेटी से, श्वसुर बहू से, भाई बहिन से, लड़का अपनी माँ, मौसी, चाची, मामी जैसे पवित्र सम्बन्धों, रिश्तो से भी सेक्स की भूख मिटा रहा है। कल को (आज से दस-बीस वर्ष बाद) यदि इसी मानसिकता के लोग ज्यादा हो गये तथा समाज में इस तरह की घटनायें और भी तेजी से बढ़ने लगीं तब उसके बाद की स्थिति की कल्पना कीजिए।
ये लोग भी सड़को पर इन्हीं समलैंगिकों की तरह आन्दोलन करेंगे कि बाप की शादी बेटी से, भाई की शादी बहिन से होने दी जाये; माँ, मौसी, चाची, मामी आदि सम्बन्धों को परिवार के लड़को, बेटों, के साथ रहने दिया जाये; श्वसुर को बहू का पति घोषित किया जाये। तब निश्चय ही अदालत वर्ष 2009 के कल के अपने फैसले की नजीर पेश करते हुए यही फैसला देगी कि सभी की समानता का ख्याल रखते हुए ऐसा गैरकानूनी नहीं है। किसी को भी किसी के साथ सेक्स सम्बन्ध बनाने की, किसी को किसी के साथ रहने की आजादी है। 
आधुनिकता में पले-बढ़े हम इस निर्णय पर भी सड़को पर जश्न मनायेंगे। अपनी जीत साबित करेंगे। इस निर्णय पर आज वाकई विचार करने की जरूरत है।

