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26 सितंबर 2025

उम्र का चक्कर ही समाप्त कर दो


 

अरे साहब, जब स्थिति नियंत्रण से बाहर होती समझ आये तो उसे पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए.... ठीक वैसे ही जैसे खिलाड़ी मैदान में गिरने के बाद खुद को एकदम फ्री छोड़ देता है....

कानूनी आयु घटाने का सोचने से बेहतर है कि ये उम्र का चक्कर ही समाप्त कर दो... न उम्र, न सोचा-विचारी, बस सम्बन्ध ही सम्बन्ध....

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दैनिक जागरण, कानपुर

25.09.2025


05 अगस्त 2025

फटकार के बाद भी नहीं रुकेंगे विवादित बोल

सर्वोच्च अदालत ने एक बार फिर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को उनकी टिप्पणी के लिए फटकार लगाई है. राहुल गांधी द्वारा भारत-चीन सेनाओं के बीच हुई झड़प को लेकर टिप्पणी की गई थी कि चीनी सैनिक भारतीय सैनिकों को पीट रहे हैं. इस बयान पर बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन के पूर्व निदेशक उदय शंकर श्रीवास्तव ने राहुल गांधी के खिलाफ आपराधिक मानहानि का केस दर्ज करवाया था. इस मामले में हो रही सुनवाई पर न्यायालय ने कहा कि एक भारतीय विश्व में सबसे वीर भारतीय सेना के विषय में ऐसा कैसे कह सकता है कि वो चीन से पिट रही है. राहुल गांधी के साथ इस तरह की घटना तीसरी बार हुई है जबकि उनको न्यायालय से फटकार मिली है. चीनी सैनिक भारतीय सैनिकों को पीट रहे हैं के बयान के साथ-साथ उनको इस बात के लिए भी फटकारा गया है कि चीन ने भारत की दो हजार वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा कर रखा है. इस बयान पर अदालत ने उनसे सवाल किया कि आखिर उन्हें यह कैसे पता चला कि चीन ने भारत की जमीन पर कब्जा कर लिया है?

 

राहुल गांधी के द्वारा इस तरह का विवादित बयान पहली बार नहीं दिया गया है. पिछली लम्बी समयावधि में उनके द्वारा दिए गए अनेकानेक बयानों को देखकर लगता है कि इस तरह की बयानबाज़ी करना जैसे उनकी आदत बन चुका है. स्मरण रहे कि इससे पहले एक मामले में उनको सजा भी सुनाई गई थी जिसके चलते राहुल गांधी को लोकसभा की सदस्यता भी गँवानी पड़ी थी. राहुल गांधी ने अप्रैल 2019 कर्नाटक में एक चुनावी रैली में कहा था कि ललित मोदी, नीरव मोदी, नरेन्द्र मोदी का सरनेम कॉमन क्यों है? सारे चोरों का सरनेम मोदी क्यों होता है? इस बयान पर समूचे मोदी समुदाय को बदनाम करने का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ भाजपा नेता पूर्णेश मोदी ने आपराधिक मानहानि का केस दर्ज कराया था. इसी मामले में राहुल गांधी को दो साल की सजा सुनाई गई थी, जिसके चलते उनको लोकसभा की सदस्यता छोड़नी पड़ी थी. इसी तरह नवम्बर 2022 में भारत जोड़ो यात्रा के दौरान इस बयान पर कि सावरकर ने अंग्रेजों को माफीनामा लिखकर महात्‍मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल जैसे स्वतंत्रता सेनानियों को धोखा दिया था, राहुल गांधी को वीर सावरकर के खिलाफ आपत्तिजनक बयानबाजी करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की फटकार सुननी पड़ी थी.

 



अपनी बयानबाज़ी के कारण, विवादित बोलों के कारण राहुल गांधी को लगातार न्यायालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, सर्वोच्च न्यायालय से डाँट भी खानी पड़ रही है, इसके बाद भी उनके विवादित बयान देने सम्बन्धी आदत में किसी तरह की कमी नहीं आई है. राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद में कथित दलाली को लेकर की गई गलतबयानी के कारण उनको सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा देकर माफी माँगनी पड़ी थी. राहुल गांधी को समझना चाहिए कि वे वर्तमान में लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं और ऐसे में उनका दायित्व बनता है कि वे जनहित मामलों पर, सरकार की गलत नीतियों पर अपनी बात को संसद में खुलकर रखें. बजाय ऐसा करने के उनके द्वारा कभी संसद के भीतर, कभी संसद के बाहर तो कभी सोशल मीडिया पर अनावश्यक टिप्पणी की जाती है. उनके ऐसा करने में वे दलगत विचारधारा का विरोध करते-करते देश का विरोध करने लगते हैं. अपनी इस बयानबाज़ी में वे सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ खुलकर बोलने की बजाय प्रधानमंत्री के लिए भद्दी, अपमानजनक भाषा-शैली का प्रयोग करने लगते हैं.

 

भारत जोड़ो यात्रा के बाद कांग्रेस और उसके वरिष्ठ नेताओं द्वारा राहुल गांधी को एक परिपक्व नेता के रूप में, जिम्मेदार पदाधिकारी के रूप में प्रतिष्ठित किया जाने लगा था. इसके पीछे की रणनीति उनको प्रधानमंत्री पद के लिए स्वीकार्य बनाना, नरेन्द्र मोदी के सापेक्ष स्थापित करना रहा है. उनके विवादित बयानों के बाद दर्ज मामलों, न्यायालयों के रुख, सर्वोच्च न्यायालय की फटकारों के शुरूआती मामलों के बाद ऐसा समझा गया था कि राहुल गांधी अब सँभलकर बयानबाज़ी करेंगे मगर उनके विवादित बोलों को देखकर लगता है कि उन पर अदालतों के बर्ताव का कोई असर नहीं हुआ है. ऐसी स्थिति में अब यह सम्भावना कम ही है कि सर्वोच्च न्यायालय की वर्तमान फटकार के बाद राहुल गांधी भविष्य में राष्ट्रीय हितों पर बात करना पसंद करेंगे, विवादित बोलों से बचने की कोशिश करेंगे. ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि विगत कई वर्षों के उनके व्यवहार, बर्ताव, भाषा-शैली को देखकर लगता है कि वे अभी भी राजशाही मानसिकता से ग्रसित हैं. उनके द्वारा भले ही अपने भाषण में कहा गया हो कि वे राजा नहीं बनना चाहते, इस तरह की शब्दावली को पसंद नहीं करते मगर उनकी भाषा-शैली, हाव-भाव, बयानबाज़ी किसी भी रूप में राजशाही अंदाज से कम नहीं.

 

पाकिस्तान और चीन को पसंद आने वाले बयान देना, ऑपरेशन सिन्दूर पर सवाल उठाना, डोकलाम विवाद के समय चीनी राजदूत से मिलना, ब्रिटेन और अमेरिका में भारतीय लोकतंत्र का अनादर करना, लोकसभा में चुनाव आयोग पर आरोप लगाते हुए उसे धमकी देना, अमेरिकी राष्ट्रपति के बयानों का समर्थन करते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था को मृत बताना आदि ऐसे मामले हैं जो राहुल गांधी के बयानों की दशा-दिशा निर्धारित करते हैं. अब जबकि सर्वोच्च न्यायालय की फटकार के बाद प्रियंका गांधी सहित उनके अनेक समर्थकों द्वारा न्यायालय की टिप्पणी को निशाना बनाया जा रहा है तब लगता नहीं कि राहुल गांधी के बर्ताव, विशेष रूप से उनकी भाषा-शैली में किसी तरह का बदलाव होगा. संभवतः उन्होंने अपना मन बना रखा है कि वे राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध, प्रधानमंत्री के विरुद्ध विवादित बयानबाज़ी करते ही रहेंगे, इसके लिए भले ही उन पर कानूनी कार्यवाही होती रहे, भले ही न्यायालय से फटकार लगती रहे.

 


27 जुलाई 2020

संबंधों की अदालत के बीच अदालतों के सम्बन्ध

आजतक समझ नहीं सके कि ज़िन्दगी में आवश्यक क्या है, संबंधों का निर्वहन या संबंधों का बनाना? हो सकता है कि संबंधों की संकुचित अवधारणा में बहुत से लोगों के लिए संबंधों का कोई अर्थ ही न रह जाता हो. आज भी बहुत से लोगों के लिए संबंधों का अर्थ रक्त-सम्बन्धियों से नहीं बल्कि पति-पत्नी और बच्चों से लगाया जाता है.  को तैयार हो जाते थे कि वो उनके गाँव का है या फिर उनके ससुराल का है. हमारे सन्दर्भ में देखें तो हमारा  पैतृक गाँव और ननिहाल एक ही जिले में है. पिताजी के वकालत पेशे से जुड़े होने के कारण इन दो जगहों के केस आये दिन देखने को मिलते.


उस समय जबकि हम महज नौ-दस साल के थे, हमें अदालती मामलों की समझ न थी. हमारे लिए गाँव से ननिहाल से आने वाला कोई भी व्यक्ति किसी मेहमान की तरह, रिश्तेदार की तरह ही होता था. सत्तर-अस्सी के दशक में आज जैसी भौतिकता भी हावी न हुई थी. मुकदमा लड़ने वाले घर पर ही रुका करते और हमारी अम्मा उन सभी के भोजन, शयन आदि का ख्याल रखतीं. हम सभी भाई उन  के साथ किस्सों-कहानियों में,बाबा-अइया, नाना-नानी की कहानियों में उलझे रहते. इसी में दिन गुजरते रहते, लोग आते रहते, जाते रहते कोई हमारे चाचा होते कोई मामा, कोई भाई होते तो कोई जीजा मगर पिताजी समभाव रूप से सभी के केस निपटाने की कोशिश करते.

आज हम न्यायिक प्रक्रिया से अलग हैं. पिताजी ने लॉ का कोर्स न करने दिया और हमने उनका सम्मान करते हुए लॉ का कोर्स नहीं किया. इसके बाद भी पता नहीं कैसे गाँव में, ननिहाल में ये खबर है कि हम वकालत किये हैं, यह खबर अप्रत्यक्ष हमारे लिए ही लाभकारी है, इसलिए इसका विरोध नहीं किया. ये और बात है कि प्रशासनिक संबंधों के चलते बहुत से मामले, मसले अपने स्तर पर ही निपटा लिए जाते हैं मगर इसका अर्थ कदापि यह नहीं कि हम वकालत पेशे से सम्बद्ध हैं.

इन बातों को कहने का कोई अर्थ नहीं, ये सब इसलिए लिखा कि कोई भी पढ़ने वाला इस बात को समझे कि आज के दौर में भी संबंधों की अहमियत बहुत अधिक है. आज रक्त-सम्बन्धी भले ही मदद करने को आगे आयें या न आयें मगर एक बार सामाजिक रूप में आप जिससे भी सम्बन्ध बनाते हैं, वह आगे अवश्य ही आता है. ये भी संभव है कि सभी दशाओं में ये नियम काम न करे मगर आपने सम्बन्ध ही हमेशा काम आते हैं, इससे कोई भी इनकार नहीं कर सकेगा.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

23 फ़रवरी 2020

CAA विरोधी उत्पातियों पर सख्ती क्यों नहीं?


CAA पर काफी लम्बे समय से दिल्ली के शाहीन बाग पर कब्ज़ा जमाकर बैठे अनशनकारियों के साथ अदालती वार्तालाप निष्फल ही निकली. इसका कोई सुफल निकलता तो दिखा नहीं बल्कि दिल्ली में अन्यत्र जाफराबाद में भी इसी तरह सड़क जाम करके उत्पात मचाने की खबर सामने आई है. शाहीन बाग़ से पहले भी लगभग सम्पूर्ण देश में CAA के नाप पर मुसलमानों द्वारा, गैर-भाजपाइयों द्वारा उत्पात मचाया जाता रहा है. ऐसा आज भी छुटपुट रूप में यहाँ-वहाँ हो रहा है. सोचने वाली बात है कि आखिर ऐसे लोगों ने देश को क्या धर्मशाला समझ रखा है? ऐसे लोगों ने क्या देश को अपनी उत्पाती फितरत को पूरा करने का मैदान समझ लिया है? इसके साथ-साथ समझ नहीं आ रहा है कि आखिर प्रशासन क्या कर रहा है? अदालत इसके लिए कोई ठोस और सशक्त आदेश क्यों नहीं देती है? उत्पात मचाते लोगों से, एक लम्बे समय से सड़क जाम करके लाखों लोगों के लिए परेशानी पैदा करने वाले लोगों से आखिर वार्ता का औचित्य क्या है? 

इस मसले पर केन्द्र सरकार को, दिल्ली सरकार को कड़े से कड़ा कदम उठाया जाना चाहिए. यदि जल्द ही इस तरह से बनते जा रहे शाहीन बाग, जाफराबाद को हटाया नहीं गया तो ये प्रदर्शन समूचे देश में एक नजीर की तरह पेश किये जायेंगे. ये आने वाले समय के लिए, देश के लिए सुखद संकेत नहीं है.



09 नवंबर 2019

रामलला हम आयेंगे...


26 वर्ष 11 माह 3 दिन की समयावधि बहुत लम्बी होती है. देश की संस्कृति पर एक काले धब्बे की तरह बना ढाँचा, जो बार-बार दर्शाता था एक विदेशी आक्रान्ता के आने और भारतीय संस्कृति के मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की जन्मभूमि पर अपने निशान बना जाना. वर्षों तक हिन्दुओं-मुसलमानों में विवाद की स्थिति बनी रही. दुखद यह रहा कि देश में रहने के बाद भी मुस्लिम समुदाय द्वारा देश की संस्कृति के प्रति सद्भाव व्यक्त न किया गया. यह जानते-समझते हुए भी उस विवादित ढांचे को किसी भारतीय ने नहीं वरन एक विदेशी आक्रान्ता ने हिन्दुओं की आस्था-विश्वास के केंद्र को तोड़कर बनवाया था, कभी राम मंदिर के पक्ष में आवाज़ न उठाई गई. राजनैतिक परिस्थितियाँ ऐसी बनी कि नब्बे के दशक के आरंभिक वर्षों में देश भर में श्री राम जन्मभूमि के प्रति एक तरह की संवेदनात्मक लहर दिखाई देने लगी. परिणाम यह हुआ कि उस जोश ने विवादित ढाँचे को हवा में धूल बनाकर उड़ा दिया. 6 दिसम्बर 1992 के उस दिन के बाद श्री राम जन्मभूमि मामला अदालत में भटकने लगा. लगातार राजनीति का शिकार होकर भी आस्था-विश्वास नहीं डिगा और अंततः लम्बी समयावधि के बाद हिन्दुओं को अपना गौरव पुनः प्राप्त हुआ. आस्था-विश्वास की जीत हुई.

माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा जब आज इस निर्णय को सुनाया जा रहा था, तो उसे टीवी पर देखते समय फ़ैजाबाद यात्रा की एक घटना का स्मरण सहज ही हो आया. उस दिन श्री राम जन्मभूमि पहुँच कर, रामलला के द्वार पहुँच कर भी उनके दर्शन न हो सके थे. विचार आया कि हो सकता है कि उन पुलिस अधिकारियों को हमारी बात याद आई हो आज, जब उन्होंने हमारे कृत्रिम पैर के चलते रामलला के दर्शन न करने दिए थे.श्री राम जन्मभूमि के द्वार पर हम अपने एक मित्र के साथ दर्शनार्थ पहुंचे थे. प्रशासनिक औपचारिकताओं से कभी भी विरोध नहीं किया क्योंकि हमारा मानना है कि ये हम लोगों की सुविधा के लिए ही किया जाता है. उस समय की प्रशासनिक औपचारिकताओं के चलते मोबाइल सहित बहुत सारा सामान अन्दर ले जाना प्रतिबंधित सा. सबकुछ स्वीकारने-मानने के बाद भी हम अपनी छड़ी पर तैयार नहीं हो पा रहे थे. वहां तैनात कुछ पुलिसवालों को अपनी तकलीफ के बारे में बताया, अपने न चल पाने को लेकर समझाया मगर वे अपनी सहमति देने को तैयार नहीं हो रहे थे. छड़ी के बजाय अपने मित्र के कंधे का सहारा लेना एक विकल्प हमारी ही तरफ से रखा गया मगर कृत्रिम पैर का कोई विकल्प हम उनके सामने नहीं दे सके. समझ नहीं आ रहा था कि आखिर घुटने के ऊपर से कटे एक पैर के बाद हम चलकर कैसे जा सकेंगे? 

 काफी देर की झिकझिक के बाद एक अन्य अधिकारी ने मन बनाया पर तब तक हमारा मन इतना खिन्न हो चुका था कि सब कुछ रामलला पर ही छोड़ दिया. सम्बंधित अधिकारी ने अपनी औपचारिकता को निभाते हुए हमारे ऊपर स्थिति को छोड़ते हुए अन्दर जाने के लिए अपने उच्चाधिकारियों से बात करने की बात कही. मन में दर्शन करने की इच्छा जैसे अचानक से मर गई थी. जिस ताजगी, उत्साह के साथ वहां तक पहुंचे थे वह ठंडा पड़ चुका था. प्रशासनिक कार्यालय में बैठे हुए ही हमने सम्बंधित अधिकारी को किसी भी उच्चाधिकारी से बात न करने की बात कहते हुए कहा कि "अब हम तभी आयेंगे, जबकि रामलला चाहेंगे. हम या तो उनको भव्य स्वरूप में देखने आयेंगे या तब जबकि हम हैलीकॉप्टर से उतरेंगे और आप लोग ही हमारी अगवानी करोगे." तब एक कटाक्ष हुआ था कि भाईसाहब, राजनीति हो रही इस पर. ये मुद्दा कभी न सुलझेगा. किसी समय युवा जोश में जब इस आन्दोलन से जुड़े थे तब भी विश्वास था, उस दिन जबकि रामलला के द्वार पर खड़े थे और बिना दर्शन के वापस लौटने को तैयार थे तब भी मन में विश्वास था. मन का विश्वास बना रहा और आज विश्वास की जीत हुई. अब न सही हैलीकॉप्टर से पर भव्य स्वरूप निर्माण के बाद अवश्य ही जा सकेंगे.

उस दिन हमारे मित्र डॉ० डी के सिंह भारी मन से अकेले दर्शन करने चले गये, हमारी जिद से. भारी मन से इसलिए क्योंकि वे अकेले दर्शन को जाना नहीं चाह रहे थे. वैसे भी लगभग आधा घंटे चले प्रकरण के बाद मन से उत्साह ख़त्म हो चुका था. बहरहाल, वे दर्शन करके लौट आये. हम अपनी बात पर विश्वास के साथ अडिग रहे. अब निर्णय रामलला के पक्ष में आया है. मंदिर भी अपनी भव्यता के साथ बनेगा. अब हम उनके साथ जायेंगे, हर्ष से, उत्साह से, भव्य स्वरूप में.

04 नवंबर 2019

कानून से उलझता कानून


सोशल मीडिया पर पुलिस-वकील झड़प के कई वीडियो देखने को मिले. वकीलों का जिस तरह का आक्रोशित स्वरूप दिखा वह अकल्पनीय नहीं कहा जायेगा. ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है जबकि वकीलों और पुलिस में झड़प हुई हो और वकीलों ने कानून को अपने हाथों में लेकर पुलिस वालों के साथ मारपीट की हो. ऐसा वकीलों द्वारा कई बार होता रहा है. ऐसा नहीं है कि पुलिस भी ऐसे मामलों में दूध की धुली हो. उसके द्वारा भी अपनी वर्दी का अहंकार समय-समय पर जनता पर निकलता ही रहता है. इसी अहंकार में कई बार वकील भी चपेटे में आ जाते हैं. असल में दोनों ही अपनी-अपनी वर्दी में कानून का साथ लिए घूमते हैं. एक को अपने आपमें ये अहंकार है कि किसी भी मामले की शिकायत के लिए उसी के पास आया जायेगा. ठीक इसी तरह दूसरे पक्ष को भी इसका अहंकार है कि मामला तो उसी के क्षेत्र में आकर निपटेगा. ऐसी स्थिति में दोनों पक्ष खुद को कानून का पालन करवाने वाले या उसका अमल करवाने नहीं बल्कि खुद को कानून समझते हैं.


हालिया जिस झड़प की चर्चा चारों तरफ फैली है, उसके मूल में पार्किंग है. एक कार को पार्किंग में खड़े करने को लेकर शुरू हुई बहस इस तरह रास्ता पकड़ लेगी, इसका अंदाजा तो उन दोनों को नहीं होगा. एक कार की पार्किंग में काले कोट और खाकी वर्दी की बहद ने देशव्यापी विवाद खड़ा करवा दिया. यहाँ इस घटना से स्पष्ट है कि जब अधिकारों का, शक्ति का आधिक्य व्यक्ति के पास हो जाता है तो वह संतुलन बना पाने में कामयाब नहीं रहता है. देखा जाये तो शक्ति का, कानून का, अधिकारों का आधिक्य पुलिस, वकील दोनों के पास है. दोनों ही किसी रूप में खुद को किसी से कम मानने को तैयार नहीं रहते. ऐसे में इस तरह के उपद्रव आम बात हैं. आज जबकि समाज में किसी भी रूप में शक्ति प्रदर्शन का, सत्ता की सामर्थ्य का, खुद के बाहुबल का प्रदर्शन महत्त्वपूर्ण बनता जा रहा है वैसे में खुद को कानून से ऊपर मान बैठना न तो पुलिस के लिए मुश्किल है, न ही वकीलों के लिए. ऐसे में दोनों पक्षों का टकराना और आपस में लात-जूता करना सहज प्रक्रिया है. यहाँ इस सन्दर्भ में याद रखना चाहिए कि एक ही क्षेत्र से संदर्भित बार-बेंच विवाद को निपटाने की सलाह लगातार दी जाती रहती है मगर शायद ही कहीं ये विवाद सुलझता दिखता हो. ऐसे में पुलिस और वकील दो अलग-अलग क्षेत्र हैं, दो अलग-अलग विधान हैं तब उनमें विवाद का न दिखना अपने आपमें आश्चर्य ही कहा जायेगा. 

बहरहाल, पुलिस जनता की रक्षा के लिए है, कानून को अमली जामा पहनाने के लिए है, कानूनी प्रक्रिया का पालन करवाने के लिए है. इसी तरह वकील उसी कानून की सही व्याख्या करने के लिए, कानून के सही प्रयोग के द्वारा निर्दोष को सजा-मुक्त करवाने और दोषी को सजा दिलवाने के लिए है. इसके बाद भी दोनों पक्ष अपने आपको ही कानून मान बैठते हैं. पुलिस का जनता के साथ किया जाने वाला व्यवहार स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि वे खुद को क्या समझते हैं और उनकी निगाह में जनता की कीमत क्या है. सीधी सी बात है जब तक ये दोनों पक्ष खुद को कानून मान कर चलते रहेंगे या फिर खुद को कानून से ऊपर मानते रहेंगे तब तक ऐसी घटनाएँ सामने आती रहेंगी. कभी वकील पुलिस पर हावी रहेंगे, कभी पुलिस वकील पर हावी रहेगी. इन सबसे अलग सबसे बड़ा सत्य यह है कि इन दोनों के बीच भले ही कोई विवाद न हो मगर ये दोनों हमेशा ही आम जनता पर भारी पड़ते रहेंगे. उस पर कानूनी दांव-पेंच चलाते रहेंगे.

10 जनवरी 2019

अदालती पचड़े में फँसा श्रीराम मंदिर मामला


श्रीराम जन्मभूमि मालिकाना हक़ से सम्बंधित मामला विगत कई वर्षों से भारतीय अदालती प्रक्रिया के चक्कर में फँसा हुआ है. किसी भारतीय फिल्म के एक संवाद, तारीख पे तारीख की भेंट चढ़ता हुआ उच्च न्यायालय पर एक निर्णय पर पहुँचा था लेकिन वहाँ भी गंगा-जमुनी तहजीब की कहानी कहने वालों को वह निर्णय हजम नहीं हुआ. उसके बाद मामला उच्चतम न्यायालय में आ गया. यहाँ भी अदालती संस्कार ज्यों के त्यों देखने को मिले. अभी तक की कार्यवाही में महज इतना तय हो सका था कि उस मामले की सुनवाई कबसे करनी है. सोचने वाली बात है कि अभी यही तय हो पाया है कि सुनवाई की तारीख क्या होगी.


बहरहाल, तारीख पे तारीख गुजरते-गुजरते 10 जनवरी 2019 सर्वोच्च न्यायालय में श्रीराम जन्मभूमि अधिकार का मामला उस जगह आ गया जहाँ सुनवाई होनी थी. यहाँ आने के पहले विगत दिवस के चंद सेकेण्ड बहुत प्रभावी रहे जिनकी कार्यवाही के बाद मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता में पाँच सदस्यीय पीठ का गठन किया गया. इस संवैधानिक पीठ का बनाया जाना अदालती गंभीरता का सूचक जान पड़ा था. लग रहा था कि अब सुनवाई टाली न जाएगी वरन किसी दिशा की तरफ जाएगी. अबकी चर्चा के दौरान मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने कहा कि बेंच में शामिल जस्टिस यू०यू० ललित 1994 में कल्याण सिंह की ओर से अदालत में पेश हुए थे. इस तरह का मामला उठाने के बाद जस्टिस यू०यू० ललित ने खुद को इस मामले से अलग कर लिया है. राजीव धवन द्वारा इसके साथ-साथ पीठ के तीन सदस्यीय से पाँच सदस्यीय किये जाने पर भी सवाल उठाया.

आज जिस तरह का प्रकरण उठाकर मामले को फिर लटकाया गया है उससे साफ़ ज़ाहिर है कि न्यायालय इस मामले को सुलझाने के मूड में दिख नहीं रहा है. हालाँकि ऐसे संकेत पहले भी दिए जा चुके थे जबकि न्याय के मंदिर में कहा जा चुका था कि श्रीराम मंदिर निर्माण का प्रकरण उनकी प्राथमिकता में नहीं है. ऐसा इसलिए क्योंकि मुस्लिम पक्ष के वकील द्वारा उठाया गया मुद्दा ऐसा नहीं था जिसके लिए सुनवाई की तारीख आगे सरकाई जाती. इस बिंदु पर आकर न केवल तारीख टाली गई है वरन अब संवैधानिक पीठ का पुनर्गठन किया जायेगा. न्यायमूर्ति ललित ने स्वयं को इस पीठ से अलग कर लिया है. ऐसे में आवश्यक नहीं कि अगली तारीख पर सुनवाई हो ही जाये क्योंकि मुस्लिम पक्षकार मामले को लटकाने में जितना महत्त्व दे रहे हैं, उतना ही कांग्रेस की तरफ से भी इसे हवा दी जा रही है. देखा जाये तो जनवरी 2019 तक इस मामले को सरकाने की कांग्रेस से सम्बंधित एक वकील साहब की मंशा तो पूरी हो ही गई है.

यदि निष्पक्ष रूप से देखा जाये तो श्रीराम का सवाल महज हिन्दुओं की आस्था का सवाल नहीं वरन इस देश की संस्कृति, परम्परा का भी सवाल है. देखा जाये तो वे भारतीयता के प्रतीक हैं, भारतीय संस्कृति के मर्यादा शिखर-पुरुष हैं. विगत काफी समय से न केवल हिन्दू पक्षकारों की तरफ से वरन मुस्लिम समुदाय की तरफ से तथा बुद्धिजीवियों, राजनेताओं, कलाकारों सहित अन्य क्षेत्रों के व्यक्तित्वों की तरफ से भी बात उठाई जा रही है कि इस मुद्दे को हिन्दू-मुस्लिम का मुद्दा न बनाया जाये. बहुत से नामचीन लोगों द्वारा अपील की जा रही है कि मुस्लिम इसे देश की सांस्कृतिक एकता के लिए श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए हिन्दुओं के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर खड़े हों. इसके बाद भी मुस्लिम पक्ष से कोई सकारात्मक पहल नहीं हो रही है. विद्रूपता इस बात की है कि आये दिन कोई न कोई इस मामले में अनर्गल बयान देकर मुद्दे को विवादित बनाने की चेष्टा करने लगता है. समझने की चेष्टा करनी चाहिए कि यह हिन्दुओं की सहनशीलता का परिचायक है कि वे ख़ामोशी से अदालत के निर्णय का इंतजार कर रहे हैं. इसके बाद भी हिन्दुओं को ही सांप्रदायिक बताया जाने लगता है.

अब अगली तारीख 29 जनवरी निर्धारित की गई है. ऐसे में विचारणीय यह है कि जिस तरह से मुस्लिम पक्षकार वकील की तरफ से न्यायमूर्ति पर महज इसलिए सवाल उठाया गया कि वे किसी समय भाजपा के कल्याण सिंह की तरफ से अदालत में आये थे, क्या न्यायमूर्ति रंजन गोगोई पर उनके पिता का कांग्रेसी मुख्यमंत्री होने के कारण सवाल नहीं उठाया जा सकता? फ़िलहाल अब मामला 29 जनवरी तक सरका दिया गया है, उस दिन का इंतजार है.

18 दिसंबर 2018

सुलगते घावों पर सुकून की चंद बूँदें

34 साल की लम्बी समयावधि के बाद 1984 के नरसंहार का फैसला सुनाया गया. ये उन लोगों के लिए तो ख़ुशी का पल होगा जिन्होंने अपनों को उस हत्याकांड में खोया था. एक व्यक्ति की हत्या के बाद सुनियोजित ढंग से खुद को आलाकमान की निगाह में लाने के लिए खुलेआम कत्लेआम किया गया. अनेकानेक लोग जान से मारे गए, लोग जिन्दा जलाये गए, हजारों की संख्या में घर जला दिए गए. चन्द चश्मदीहों ने हिम्मत जुटाकर आरोपियों को कटघरे में खड़ा किया मगर जब संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति खुद कहे कि बड़ा पेड़ गिरने पर धरती डोलती है तो समझा जा सकता है कि उस मामले में निर्णय आने में इतनी देरी क्यों हो रही थी. इतने वर्षों के बाद उच्च न्यायालय द्वारा यह फैसला आया है, अभी आरोपियों के पास उच्चतम न्यायालय जाने का रास्ता खुला हुआ है. यहाँ सोचा जा सकता है कि एक देशव्यापी नरसंहार का फैसला आने में न्यायालय को इतने साल लग गए तब एक आम आदमी न्याय की आशा में कब तक जिन्दा रहे? 


न्यायालयों की अपनी प्रक्रिया है उससे इंकार नहीं किया जा सकता मगर मामलों को वरीयता के आधार पर सुनवाई के लिए आगे लाने की प्रक्रिया को अमल में लाना होगा. यहाँ किसी आतंकी को फाँसी चढ़ाये जाने के सम्बन्ध में आधी रात से लेकर भोर तक न्यायालय की कार्यवाही चल सकती है किन्तु किसी आम आदमी की जान-माल से सम्बंधित मामले के लिए उसे न्याय के स्थान पर लगातार तारीखें ही मिलती रहती हैं. बहरहाल, अब जबकि 1984 के नरसंहार से सम्बंधित फैसला आ गया है तब इस पर विचार करने की आवश्यकता है कि आखिर ऐसे लोगों को कब तक राजनीति में स्वीकार किया जाता रहेगा? चारा घोटाले में जेल की सजा पाए नेता जी चुनाव लड़ने के अयोग्य हो गए हैं मगर वे अभी भी राजनैतिक दल के मुखिया हो सकते हैं. वे अभी भी चुनाव प्रचार में भाग ले सकते हैं. वे मुख्यमंत्री बनाये जाने सम्बन्धी मामलों में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं. तो फिर उनके चुनाव लड़ने पर ही प्रतिबन्ध काहे लगाया गया है? सिख नरसंहार जैसे जघन्यतम मामले के आरोपी को सजा मिलना पढ़कर सुखद अनुभूति होती है, हुई है मगर यह तब संतोष की अनुभूति करवाएगी जबकि मामले के उच्चतम न्यायालय में जाने के बाद भी आरोपी को जमानत न मिले. काश कि फैसला सुनाते समय जज साहब की आँखों में छलक आये आँसुओं की लाज कोई अन्य न्यायाधीश महोदय रख लें.

04 नवंबर 2018

त्योहारों पर पक्षपाती निर्णय


समय के साथ किस तरह स्थितियाँ बदल जाती हैं या कहें कि बदल दी जाती हैं, इसका एहसास किसी को नहीं होता. एक समय था जबकि हमारा बचपन था तब मैदान बच्चों से भरे रहते थे. शाम को घर बैठे रहना डांट का कारण बनता था. हरहाल में शाम को थोड़ी देर मैदान में जाकर कुछ न कुछ खेलना अनिवार्य हुआ करता था. अब स्थिति इसके ठीक उलट है. अब मैदान एकदम खाली हैं. शाम को घर से बाहर निकलना बच्चों के लिए अनिवार्य नहीं है. अब वे बाहर हाथ-फिर चलाने के बजाय या तो मोबाइल पर उंगलियाँ चलाते हैं या फिर टीवी पर आँखें. इसी तरह हमें अच्छे से याद है कि पहले नियमित रूप से मिलना-जुलना हुआ करता था. सम्बन्ध कभी भी दो पर दो के नहीं रहे वरन पारिवारिक रहे. बिना किसी औपचारिकता के बेधड़क एक-दूसरे के घर आना-जाना हुआ करता था. न केवल आना-जाना वरन खाना-पीना भी. ऐसा एक-दो दिन का हाल नहीं हुआ करता था बल्कि बहुतायत में यही हुआ करता था. अब स्थिति इसके ठीक उलट हो गई है. अब बाहर जाना होता है तो किसी के घर नहीं वरन किसी होटल में, रेस्टोरेंट में. अब यदि किसी के घर जाना होता भी है तो अकेले, पारिवारिक आना-जाना न के बराबर दिखाई देता है. इसमें भी किसी के घर जाने के पहले उसकी अनुमति सी चाहिए होती है. ऐसा इसलिए नहीं कि उसके घर जाने पर उसके न मिलने पर समय की बर्बादी होगी वरन इसलिए कि जिस समय मिलने जाना है उस समय वह अपने किसी टीवी कार्यक्रम को देखे में तो व्यस्त नहीं. किसी लाइव शो को देखने में, किसी मैच में चिल्लाने में, किसी रोने-ढोने वाले सीरियल देखने में तो मगन नहीं.


कुछ ऐसे ही हालात त्योहारों को लेकर सामने आ रहे हैं. उसमें भी विशेष रूप से हिन्दुओं के त्यौहार को लेकर. इस्लाम में ताजिया कितना भी बड़ा बनाया जाने, सड़क पर निकाला जाये कोई दिक्कत नहीं. हाँ, दही-हांडी की ऊँचाई निर्धारित होगी. बकरीद में कितने भी बकरे काट दिए जाएँ कोई प्रदूषण नहीं फैलना उसके खून, खाल, मांस से न पर्यावरणीय संकट उत्पन्न होना है, ऐसा बस उतनी देर में ही होगा जबकि दीपावली के पटाखे फोड़े जायेंगे. हाईवे का निर्माण होना है तो मंदिरों के हटाये जाने पर विकास-कार्य का हवाला दिया जायेगा मगर यदि मामला किसी मस्जिद के, मजार के हटाने का आता है तो वहां मजहबी भावनाएं घायल होने लगती हैं. मंदिर में प्रवेश की बात आती है तो यह सभी का अधिकार होता है मगर यदि बात मस्जिद में प्रवेश की आ जाये तो वहां मजहबी भावनाओं में अदालत हस्तक्षेप नहीं करती. इन विकट स्थितियों के बीच यदि बचपन याद करते हैं तो याद आता है दीपावली का निबंध. जिसमें कि हम पढ़ा करते थे कि दीपावली दीपों, आतिशबाजी, रौशनी का पर्व है. इसके पटाखों के धुंए से कीड़े-मकोड़े-मच्छर आदि मर जाते हैं. अब देख रहे है कि पटाखों के चलाये जाने पर भी कानूनी पकड़ बनाई जाने लगी है.

संभव है कि आज की स्थितियों में इन्सान ने अपने लाभ के लिए पटाखों को पहले के मुकाबले अधिक हानिकारक बना दिया हो मगर क्या पूरे साल में बस एक रात में कुछ घंटे पटाखे चलाना ही प्रदूषण को बढ़ाता है? यदि निष्पक्ष ढंग से देखा जाये तो चौबीस घंटे मकानों, कार्यालयों, बाजारों, दुकानों आदि में चलते एसी, सड़कों पर लाखों की संख्या में दौड़ती एसी कारें, कारखानों से निकलना धुआँ आदि क्या पर्यावरण को संरक्षित कर रहा है? क्या इन सबसे प्रदूषण नहीं फैलता है? ऐसे में महज एक रात में कुछ घंटों को कानूनी शिकंजे में कसने की जो नीति अपनाई जा रही है वह एक दृष्टि से भले ही तार्किक समझ आ रही हो मगर जबकि एक-एक आदमी, निर्णय देने वाले लोग भी उसी सिस्टम का हिस्सा बने हुए हैं जो प्रदूषण फैला रहा है तब आतिशबाजी नियंत्रण सम्बन्धी निर्णय पक्षपातपूर्ण समझ आते हैं. एक तरह की शिगूफेबाजी ही नजर आती है.

कोई भी पर्व, त्यौहार हो सभी के लिए सुखदायी हो, ऐसी कामना है मगर यदि धर्म-मजहब देखकर उनके कृत्यों पर निर्णय दिए जायेंगे तो यह सामाजिक विभेद की स्थिति पैदा करेगा. ऐसे में सुखदायी स्थिति, सौहार्द्र बनना कहीं से भी सहज नहीं समझ आता.

28 सितंबर 2018

महिला हुई यौन स्वतंत्र, पुरुष अपराध मुक्त


विगत दो-तीन दिन से सर्वोच्च न्यायालय ऐतिहासिक निर्णय देने में लगा है. स्त्री-पुरुष के विवाहेतर संबंधों से जुड़ी भारतीय दंड संहिता की धारा 497 पर सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि व्याभिचार अपराध नहीं है. विगत माह, अगस्त में देश की शीर्ष अदालत में इस मामले पर सुनवाई करते हुए कहा था कि व्याभिचार कानून महिलाओं का पक्षधर लगता है लेकिन असल में यह महिला विरोधी है. अदालत का कहना था कि शादीशुदा संबंध में पति-पत्नी दोनों की एक बराबर जिम्मेदारी है. फिर अकेली पत्नी पति से ज्यादा क्यों सहे? इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय में कुछ साल पहले एक अर्जी दाखिल कर कहा गया था कि ये कानून संविधान के अनुच्छेद-14 यानि समानता की भावना के खिलाफ है. अगर किसी अपराध के लिए मर्द के खिलाफ केस दर्ज हो सकता है, तो फिर महिला के खिलाफ क्यों नहीं? इस अर्जी को अदालत ने खारिज कर दिया था.


हाल-फिलहाल व्यभिचार से संबंधित आईपीसी की धारा 497 के बारे में इतना समझिये कि यह धारा किसी विवाहित महिला से शारीरिक सम्बन्ध बनाये जाने से सम्बंधित है. इसमें दो पक्ष हैं. एक- यदि महिला से कोई गैर-पुरुष बिना सहमति सम्बन्ध बनाता है तो शिकायत पश्चात् सम्बन्ध बनाये जाने पुरुष के खिलाफ रेप का केस दर्ज किया जायेगा. दो- यदि विवाहित महिला अपनी सहमति से किसी गैर-मर्द से सम्बन्ध बनाती है तो उस ऐसी स्थिति में उस पुरुष पर तब कार्यवाही हो सकती है जबकि महिला का पति शिकायत कर दे. यहाँ इसका कोई अर्थ नहीं कि महिला की सहमति से सम्बन्ध बने थे. इसमें भी दोषी वह पुरुष रहता है जिसने सम्बन्ध बनाये. अर्थात कोई ऐसी महिला के साथ, जो किसी अन्य पुरुष की पत्नी है और जिसके साथ कोई अन्य पुरुष यह विश्वासपूर्वक जानते हुए कि बिना उसके पति की सहमति या उपेक्षा के वह शारीरिक संबंध बनाता है तो वह बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता. शिकायत होने की स्थिति में वह व्याभिचार के अपराध का दोषी होगा और उसे इसके लिए पाँच वर्ष की कारावास की सजा या आर्थिक दंड अथवा दोनों से दंडित किया जा सकता है. ऐसे मामले में महिला दुष्प्रेरक के रूप में दण्डनीय नहीं होगी.  हालाँकि यह अपराध महिला के पति की सहमति द्वारा समझौता करने योग्य है. इस मामले में पत्नी को अपराध में हिस्सेदार नहीं माना जाएगा. इस धारा को लेकर आधुनिकतावादी, नारीवादी इसलिए खिलाफ थे क्योंकि उनका मानना था कि सहमति से सम्बन्ध बनाये जाने के बाद भी महिला के पति द्वारा शिकायत करना दर्शाता है कि वह महिला उस पुरुष की संपत्ति है.

आज भी भारत के संविधान का ज्यादातर हिस्सा भारत सरकार अधिनियम 1935 से ज्यों का त्यों नकल करके बनाया गया है. इसलिये ज्यादातर कानून अंग्रेजों के द्वारा बनाये हुये हैं और आज भी स्वतंत्र भारत में लागू हैं. भारत की अपराध दंड संहिता यानी आईपीसी लिखने वाले लॉर्ड बैंबिंगटन मैकाले चाहते थे कि विवाह संबंध में अगर पत्नी और किसी अन्य के बीच शारीरिक सम्बन्ध बन जाने की स्थिति में उसे अपराध न माना जाए. आईपीसी बनने से पहले देश में नागरिकों के लिए कोई लिखित कानून नहीं था और परंपरा से न्याय होता था. जब मैकाले के सामने विवाह संबंधी अपराधों को स्पष्ट करने की स्थिति आई, तो यह प्रश्न भी उठाया गया कि पत्नी के साथ किसी बाहरी व्यक्ति के यौन संबंध यानि व्याभिचार को अपराध माना जाए या नहीं? मैकाले ने तत्कालीन भारतीय समाज के अपने अनुभवों के आधार पर यह जान लिया था कि उस समय यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे की पत्नी को भगा ले जाता है अथवा उसके साथ यौन संबंध बनाता है तो ज्यादातर मामलों में पीड़ित पक्ष यानि पति चाहता था कि उसकी पत्नी उसे वापस मिल जाए या फिर उसे इसका आर्थिक मुआवजा मिल जाये. मैकाले ने अनुमान लगा लिया था कि ऐसे प्रकरणों में अपराध जैसी श्रेणी तत्कालीन समाज में स्वीकार्य नहीं थी. परम्पराओं, संस्कृति, सभ्यता, परिवार आदि की दुहाई देकर ऐसे प्रकरणों को भावनात्मकता के आधार पर सुलझाने की कोशिश की जाती थी. इसके बाद भी आईपीसी का निर्धारण होते समय मैकाले का हस्तक्षेप इसमें पूर्ण रूप से नहीं हो सका क्योंकि उसका विचार व्याभिचार को दीवानी मामला बनाया जाना और आर्थिक आधार पर इनका फैसला करने का था. मैकाले अपने विचारों को प्रतिपादित करवाने में असफल रहा और व्याभिचार को आईपीसी में अपराध मान लिया गया और इसके साथ ही भारतीय कानूनों में धारा 497 जुड़ गई.

सर्वोच्च नयायालय के फैसले का स्वागत करते हुए राष्ट्रीय महिला आयोग ने कहा कि यह सभी महिलाओं के हित में होने के साथ-साथ, लैंगिक तटस्थता वाला फैसला भी है. यहाँ भले ही इस धारा को समाप्त करने सम्बन्धी फैसला आया है मगर इसके परिणामों को भारतीय समाज के परिदृश्य में देखने की आवश्यकता है. विगत कई वर्षों से लिव-इन-रिलेशन के चलन में आने के बाद से विवाह संस्था कमजोर होती दिखाई दे रही है. इसके बाद समलैंगिक संबंधों के हितों की रक्षा की खातिर धारा 377 की समाप्ति ने विवाह संस्था के साथ-साथ परिवार की नींव को हिलाया है. ऐसे संक्रमणकाल में अदालत के इस फैसले से स्त्री, पुरुष दोनों ही दो अलग-अलग बिन्दुओं पर प्रभावित दिख रहे हैं. अब स्त्री (पत्नी) किसी पुरुष (पति) की संपत्ति के तौर पर नहीं दिख रही है. इसके साथ ही पुरुषों को इस रूप में राहत मिली है कि व्याभिचार कानून के नाम पर अब सिर्फ उन्हें ही अपराधी नहीं माना जा सकता है. इसके बाद भी कहीं न कहीं ये फैसला समाज में व्याभिचार को ही बढ़ावा देगा. समाज में आज भी बहुतेरे नारीवादी मंचों से महिलाओं के शोषण की बात उठती है, उनके पक्ष में आवाज़ उठाई जाती है. एकाधिक बार ऐसी भी खबरें सामने आईं हैं जहाँ कि पति को अपनी ही पत्नी से वेश्यावृत्ति करवाए जाने का, देह-व्यापार करवाए जाने का अपराधी माना गया. ऐसे में इस फैसले से शोषित पत्नी की दशा और ख़राब होने का खतरा नहीं है? आधुनिकता की दौड़ में अंधे होकर दौड़ रहे समाज में इस फैसले का भी स्वागत हुआ है. इसके परिणाम आने में अभी समय लगेगा. तब तक सब खुद को आधुनिक, समान समझ कर गर्व कर ही सकते हैं.

07 अगस्त 2018

सुखद परिणाम तो नहीं देगा यह संशोधन


अंततः केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को पलटते हुए एससी/एसटी एक्ट में संशोधन विधेयक लोकसभा में पारित करवा ही दिया. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किसी दलित व्यक्ति द्वारा शिकायत के बाद तत्काल सवर्ण की गिरफ़्तारी पर रोक लगाने का आदेश दिया था. अदालत के इस आदेश को गैर-भाजपाई दलों ने, दलित संगठनों ने मोदी का, केंद्र सरकार का आदेश साबित करते हुए केंद्र सरकार पर अनावश्यक दबाव बना डाला. केंद्र की सत्ताधारी भाजपा के अन्दर भी इस आदेश के प्रति असंतोष दिखाई दिया. अदालत के आदेश को नकारात्मक रूप में समाज में प्रस्तुत किया गया. ऐसे दर्शाया गया जैसे इस अधिनियम को समाप्त ही कर दिया गया है. इसके बाद तो खुलेआम और गुपचुप ढंग से सरकार के खिलाफ लामबंदी की जाने लगी. आगामी चुनाव को देखते हुए केंद्र सरकार ने हथियार डालते हुए दलितों की रक्षा करने का मन बनाया.


इस अधिनियम में संशोधन के बाद इसका कितना उपयोग, दुरुपयोग दलित कर पायेंगे, इस अधिनियम के चलते कितने सवर्ण फंसेंगे, कितने बचेंगे ये तो बाद की बात है मगर यह तय है कि नब्बे के दशक में आरक्षण के लागू होने के बाद बनी सवर्ण-दलित की खाई को एक बार फिर गहरा कर दिया गया है. जातिगत भावना से समाज में विभेद की, भेदभाव की बात करने वाले भी इस संशोधन बिल की वकालत करते देखे जा रहे हैं. विगत कई वर्षों की जातिगत राजनीति देखने-समझने के बाद एक बात तो स्पष्ट है कि इस देश से जातिगत स्थिति कभी समाप्त होने वाली नहीं है. दलित वर्ग के बहुतेरे लोगों में भले ही आरक्षण के सहारे आगे बढ़ने की मानसिकता का विकास न हुआ हो मगर अपने नाम के साथ किसी सवर्ण की उपजाति लगाने का लोभ संवरण नहीं होता है. इसी तरह सवर्ण वर्ग के बहुत से लोगों में भले ही दलितों के प्रति सकारात्मक भावना का विकास न हुआ हो मगर आरक्षण की मलाई चाटने के लिए वे खुद को अन्य पिछड़ा वर्ग अथवा दलित वर्ग में शामिल करवाने को तैयार हैं. इस तरह की स्थिति के बीच अब इस संशोधन बिल के बाद की स्थितियाँ विकट नहीं तो कम से कम सुखदायी नहीं होने वाली.

राजनैतिक दल इसका अपने चुनावी समीकरणों के उपयोग करेंगे और वहीं दलित वर्ग के बहुतेरे ईर्ष्यालु, विद्वेषपूर्ण मानसिकता वाले लोग इसका दुरुपयोग सवर्णों को जबरन फँसाने में करेंगे. राजनैतिक दलों में भाजपा जहाँ इसी संशोधन बिल के द्वारा दलित वोटों को एपीआई तरफ खींचने की कोशिश करेगी वहीं, गैर-भाजपाई दल इसके द्वारा दलित वोटों को अपनी तरफ यह दिखाकर लाने का प्रयास करेंगे कि उनके दबाव के कारण ही यह संशोधन बिल सामने आ सका. भाजपा-विरोधी दल संगठित रूप से अदालत के फैसले को सरकार की मंशा बताने में सफलता प्राप्त कर ही चुके हैं, ऐसे में उनके लिए इस संशोधन बिल का राजनैतिक लाभ और ज्यादा ले पाना आसान हो गया है. यदि ऐसा होता है तो यह कदम भाजपा के लिए आत्मघाती सिद्ध होगा. इसके अलावा समाज में विद्वेष बढ़ने के भी आसार नजर आते हैं. अदालत के आदेश के बाद जिस तरह से दलित संगठनों ने, भाजपा-विरोधी दलों ने भारत बंद के दौरान हिंसात्मक प्रदर्शन किये थे, वे सिवाय विद्वेष की भावना के और कुछ नहीं थे. अनुसूचित जाति/जनजाति अधिनियम के दुरुपयोग के एक नहीं अनेक उदाहरण हैं जिनके कारण ही सर्वोच्च न्यायालय को तत्काल गिरफ़्तारी न करने का आदेश पारित करना पड़ा था. बहरहाल, केंद्र सरकार ने अपना चुनावी दाँव खेल दिया है. लोकसभा में जितनी सहजता से यह बिल पारित हो गया, उतनी ही सहजता से यह राज्यसभा में पारित हो जायेगा. महामहिम राष्ट्रपति की तरफ से भी इसके रोके जाने की कोई आशंका नहीं है. इसके लागू होने के बाद देखना यह है कि कौन किस स्तर तक जाकर इसका उपयोग वास्तविक रूप में करता है.

03 अगस्त 2018

सवर्ण राजनीति की मुख्यधारा की माँग नहीं

उच्चतम न्यायालय द्वारा एससी-एसटी एक्ट के सम्बन्ध में दिए गए निर्णय के खिलाफ जाते हुए सरकार संशोधन विधेयक वर्तमान सत्र में ला रही है. इसकी तैयारी के बीच पिछड़ा वर्ग आयोग को भी संवैधानिक दर्जा दे दिया गया है. दलितों-पिछड़ों के लिए उठाये जाते इन कदमों के बीच आरक्षण सम्बन्धी तमाम सारे और भी कदम इस दौरान उठाये जाते रहे हैं. शिक्षा, नौकरी के साथ-साथ पदोन्नति में भी आरक्षण यथावत रखा गया है. केंद्र सरकार के दलितों-पिछड़ों को लेकर किये जा रहे तमाम सारे कार्यों में से शायद ही किसी का इतना विरोध हुआ जो जितना कि एससी-एसटी एक्ट में संशोधन को लेकर हो रहा है. यह स्थिति तब है जबकि इस एक्ट में कोई आमूल-चूल परिवर्तन करने के बजाय उच्चतम न्यायालय द्वारा महज इतनी व्यवस्था की गई थी कि आरोपी सवर्ण की गिरफ़्तारी बिना जाँच के नहीं होगी. इस आदेश को मोदी सरकार की मंशा बताते हुए विपक्षियों ने उपद्रवी माहौल बना डाला. इसका नकारात्मक असर यह हुआ कि केंद्र सरकार संशोधन बिल लाने को तैयार हो गई.


न्यायालय के आदेश के खिलाफ जाकर केंद्र सरकार का इस तरह से संशोधन विधेयक लाने के मूल में विशुद्ध राजनीति है. यह कोई छिपा हुआ एजेंडा नहीं है वरन केंद्र सरकार के कदमों से बराबर सिद्ध होता रहा है कि वह किसी भी रूप में सवर्णों को मददकारी हो या न हो मगर दलितों-पिछड़ों के लिए मददगार अवश्य रहेगी. देश के सवर्णों को सरकार के इस कदम से आपत्ति या निराशा जैसा कुछ नहीं लगना चाहिए क्योंकि सिर्फ यही सरकार नहीं वरन देश की सभी सरकारों का एकमात्र उद्देश्य ऐसे कदमों से दलितों-पिछड़ों का वोट प्राप्त करना है. यदि गंभीरता से देखा जाये तो दलित-पिछड़े किसी भी राजनैतिक दल के लिए आज मुख्यधारा के लोग हैं. सवर्ण अपने आपको किसी भी रूप में मुख्यधारा में न माने, राजनीति के लिए खुद को अहम् न माने. आज न सरकारों को और न ही विपक्ष को सवर्णों की, उनके वोट की आवश्यकता है. यदि सामाजिक प्रस्थिति के रूप में इस बिंदु पर निगाह डाली जाये तो नब्बे के दशक से राजनीति की मुख्यधारा से सवर्णों का पतन किया जाना आरम्भ हो गया था. हिन्दू धर्म की छुआछूत की भावना को, विभेद की भावना को समस्त राजनैतिक दलों द्वारा बुरी तरह से अपने पक्ष में दोहन किया गया. यही कारण है कि जाति का विरोध करने वाले इन राजनैतिक दलों द्वारा जाति-विहीन समाज की बात भले ही की जाती हो मगर समाज से जाति दूर करने की बात नहीं की जाती है. इसी का दुष्परिणाम यह हुआ कि राजनीति में जातिगत आधार पर न केवल राजनैतिक दलों का गठन हुआ वरन वे सत्ता में भी काबिज होने लगे.

यहाँ आकर सवर्णों को समझना होगा कि वे अब राजनीति की मुख्यधारा की माँग नहीं हैं. अर्थशास्त्र का माँग और आपूर्ति का नियम सिर्फ अर्थशास्त्र में ही लागू नहीं होता बल्कि समाज के प्रत्येक हिस्से में लागू होता है. आज देश की राजनीति की माँग दलित हैं, पिछड़े हैं तो सत्ता पक्ष द्वारा, विपक्ष द्वारा, राजनैतिक दलों द्वारा उनकी माँग को स्वीकार किया जा रहा है. सवर्णों को यह समझने की भूल नहीं करनी चाहिए कि वे किसी भी रूप में प्रभावकारी मतदाता हैं. कायदे से देखा जाये तो सवर्ण आज भी निपट कबीलों में बंटा हुआ है. अतीत की छोटी-छोटी रियासतों की तरह वह आज भी छोटे-छोटे से वर्गों में विभक्त है. यही कारण है कि उसके पक्ष में एक आदेश के साथ किसी भी राजनैतिक दल के सवर्ण जनप्रतिनिधि भी आकर नहीं खड़े हुए. देश में वर्तमान में हो रही राजनीति की चाल को समझने की आवश्यकता है. यहाँ सभी राजनैतिक दलों का एकमात्र उद्देश्य सत्ता की प्राप्ति होता है, वह कैसे हो यह उसका विचार-बिंदु होता है. उन्हें न सवर्णों के हितार्थ कोई कदम उठाना है और न ही दलितों-पिछड़ों के हितार्थ. सत्ता की खातिर उन्हें कब कौन सा कदम उठाना पड़ सकता है, ये उन्हें खुद नहीं मालूम होता है.  

25 जून 2018

आपातकाल : भारतीय इतिहास का काला अध्याय


25 जून, भारतीय सन्दर्भों में, भारतीय राजनैतिक परिदृश्य में यह मात्र एक तारीख भर नहीं है. इस तारीख का अपना ही एक इतिहास है, जिसे आज काले अध्याय के रूप में देखा-जाना जाता है. 25 जून 1975 की रात्रि को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने आपातकाल की नींव रखी. अगले दिन सुबह-सुबह रेडियो के द्वारा देश में आपातकाल की घोषणा हो गई. सुबह छह बजे इंदिरा गाँधी ने सभी मंत्रियों को बैठक के लिए बुलाया. बैठक के तुरंत बाद ही इंदिरा गाँधी ने रेडियो पर अपने भाषण के द्वारा आपातकाल लगाये जाने की जानकारी देश को दी. उस समय फ़ख़रुद्दीन अली अहमद देश के राष्‍ट्रपति थे. कैबिनेट की बैठक में आपातकाल के प्रस्‍ताव को स्वीकृति मिल चुकी थी. उस पर अंतिम मुहर राष्‍ट्रपति को लगानी थी. इंदिरा और सिद्धार्थ शंकर ने राष्‍ट्रपति भवन पहुँच राष्‍ट्रपति को देश के हालात के बारे में अवगत कराया और आपातकाल की उपयोगिता बताई. इसके बाद राष्ट्रपति ने इंदिरा गांधी के कहने पर भारतीय संविधान की धारा 352 के तहत आपातकाल की घोषणा कर दी. यह अपने आपमें विचित्र स्थिति है कि आपातकाल की घोषणा रेडियो पर पहले कर दी गई बाद में उस पर राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर किए थे. आपातकाल के बाद देश भर में गिरफ़्तारियों का दौर शुरू हुआ. खास बात यह रही कि महज तीन नेताओं की गिरफ़्तारी की इजाजत नहीं दी गई थी. ये तीन नेता तमिलनाडु के कामराज, बिहार के जयप्रकाश नारायण के साथी गंगासरन सिन्हा और पुणे के एसएम जोशी थे.


आपातकाल लगाये जाने के पीछे उच्च न्यायालय, इलाहाबाद का एक आदेश था. 12 जून 1975 को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी का चुनाव निरस्त कर उन पर छह साल तक चुनाव न लड़ने का प्रतिबंध लगा दिया. उन पर वोटरों को घूस देना, सरकारी मशनरी का गलत इस्तेमाल करने जैसे चौदह आरोप लगे थे. यह मामला राज नारायण ने 1971 में रायबरेली में इंदिरा गांधी से हारने के बाद दर्ज कराया था. इस फैसले के बाद इंदिरा गाँधी ने इस्तीफा देने से इन्कार करते हुए फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी. उच्चतम न्यायालय ने भी उच्च न्यायालय के इस आदेश को बरकरार रखा. यह आदेश 24 जून 1975 को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश कृष्ण अय्यर ने दिया. इसके बाद इंदिरा गाँधी ने आपातकाल का सहारा लेकर राजनैतिक विरोधियों को नियंत्रण में लेने का प्रयास किया. स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह सबसे विवादस्पद काल था. आपातकाल में चुनाव स्थगित हो गए थे. नागरिक अधिकारों को समाप्त करके मनमानी की गई. इंदिरा गांधी के राजनीतिक विरोधियों को कैद कर लिया गया. प्रेस को प्रतिबंधित कर दिया गया था. उनके बेटे संजय गांधी के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर नसबंदी अभियान चलाया गया. जयप्रकाश नारायण ने इसे भारतीय इतिहास की सर्वाधिक काली अवधि कहा था. 


आपातकाल लागू करने के बाद इंदिरा गाँधी के राजनैतिक विरोधी और अधिक सक्रिय हो गए. विरोध की लगातार बढ़ती तीव्रता के कारण लगभग दो साल बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग कर चुनाव कराने की सिफारिश कर दी. चुनाव में आपातकाल लागू करने का फ़ैसला कांग्रेस के लिए घातक साबित हुआ. इंदिरा गांधी अपने गढ़ रायबरेली से चुनाव हार गईं. संसद में कांग्रेस 153 पर सिमट गई और केंद्र में किसी ग़ैर कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ. जनता पार्टी भारी बहुमत से सत्ता में आई और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने. कांग्रेस को उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में एक भी सीट नहीं मिली. नई सरकार ने आपातकाल के दौरान लिए गए फ़ैसलों की जाँच के लिए शाह आयोग का गठन किया. अपने अंदरूनी मतभेदों के कारण 1979 में जनता सरकार गिर गई. उप प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई लेकिन यह सरकार सिर्फ़ पाँच महीने तक ही चल सकी. इस सरकार में चौधरी चरण सिंह एक दिन के लिए भी संसद न जा सके. उनके नाम कभी संसद नहीं जाने वाले प्रधानमंत्री का रिकॉर्ड दर्ज हो गया.

वैसे देखा जाये तो देश में आंतरिक अशांति का खतरा होने पर, किसी बाहरी देश के आक्रमण होने पर अथवा वित्तीय संकट की स्थिति दिखाई देने पर आपातकाल लगाया जा सकता है. देश ने 1962 में चीन के साथ एवं 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान आपातकाल का सहा था. 25 जून 1975 की मध्यरात्रि से 21 मार्च 1977 के बीच का आपातकाल विशुद्ध राजनैतिक हथकंडा था, जिसे आंतरिक अशांति के नाम पर अनुच्छेद 352 के अंतर्गत लगाया गया था.

14 जनवरी 2018

विशेष के मायने तय करने होंगे अब

माननीय न्यायाधीशों का मीडिया के द्वारा देश के सामने आ जाना अपने आपमें आश्चर्यजनक है. इसको ऐसे किसी रूप में नहीं देखा जाना चाहिए कि चार न्यायाधीशों के मीडिया में दिए गए वक्तव्य से कोई तूफ़ान आ गया हो. इसे ऐसे भी नहीं समझना चाहिए कि ये किसी भी तरह से लोकतंत्र पर तमाचा है. किसी भी तरह के आकलन के पहले न्यायालयीन व्यवस्था को जानने-समझने की जरूरत है. और विडम्बना ये है कि बिना कुछ जाने-समझे हम सभी लोग किसी भी घटना के सन्दर्भ में अपने-अपने खाँचे में उसे फिट करने लगते हैं.


न्यायालयीन प्रक्रिया में पारदर्शिता से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण निष्पक्षता को बनाये रखने के लिए एक तरफ की घोषित-अघोषित व्यवस्था की गई है कि न्यायाधीश किसी तरह से खुद को सार्वजनिक नहीं करेंगे. इसके अंतर्गत उनका समारोहों, कार्यक्रमों, प्रेस वार्ता आदि को लेकर किंचित नियम से बना दिए गए हैं. न्याय की, न्यायालय की, न्यायाधीशों की गरिमा बनी रहे इसके लिए उनके प्रति असम्मान दिखाए जाने को भी अत्यंत गंभीर अपराध सा माना गया है. न्याय प्रक्रिया के प्रति भले ही एक तरह का सम्मान-भाव समाज के सामने दिखाया जाता रहा हो किन्तु विगत कई वर्षों की न्यायिक प्रक्रिया के चलते आमजन का न्यायालयीन व्यवस्था से मोह भंग सा हुआ है. इसी मोह-भंग का परिणाम है कि बहुतेरे मामलों में जनता ने कानून को हाथ में लेकर खुद ही न्याय करना शुरू कर दिया है. न्यायालयों के प्रति, न्यायाधीशों के प्रति, अधिवक्ताओं के प्रति कतिपय कानूनी प्रक्रिया के दांव-पेंच में उलझने से बचने के लिए आमजन खुलेआम उसके प्रति अशिष्टता नहीं दिखा पा रहा है. ऐसा भले हो किन्तु सम्पूर्ण व्यवस्था के प्रति रोष तो है ही.

कहीं न कहीं ऐसा कुछ न्यायालयीन व्यवस्था में संलग्न लोगों में भी होता होगा. ऐसा संभव ही नहीं कि अपने भीतर की व्यवस्था, अव्यवस्था से परिचित न्यायाधीश नहीं होंगे. ऐसा भी संभव नहीं कि बरसों-बरस न्याय की आस में भटकती जनता के आक्रोश, रोष का भान माननीय न्यायाधीशों को नहीं होगा. जिस तरह से न्यायालय से बाहर अपने मनोनकूल वातावरण देखे जाने की व्यवस्था बना ली गई है, संभव है कि उसके भीतर कुछ इसी तरह की व्यवस्था बनने लगी हो. मनोनकूल व्यवस्था के चलते महत्त्वपूर्ण केस इधर से उधर हस्तांतरित किये जाने लगे हों, जैसा कि संकेत दिए गए. इस स्थिति के कारण उसी तरह की हताशा इन माननीयों में प्रकट होना ज़ाहिर है जैसी कि आमजन में अपने न्याय का रास्ता देखते-देखते पनपने लगती है. संभव है कि लगातार कई-कई मामलों में हस्तांतरण की गति देखने के बाद इनका मानसिक संतुलन उस संयम का परिचय न दे सका हो जैसा कि इनसे अपेक्षा की जाती है. इसके चलते वे माननीयजन कतिपय बयान देते नजर आये. समझने वाली बात है कि उनका किसी भी तरह का कोई सार्वजनिक जीवन नहीं दिखाई देता है. अपने कार्यकाल के दौरान वे माननीयजन सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण कारागार सी स्थिति गुजार रहे होते हैं, जहाँ तमाम तरह की औपचारिकताओं की भरमार होती है. इनके मध्य संभव है कि अपने मन की अकुलाहट को अपने किसी बहुत ख़ास (विशेष) के सामने रखने की कोशिश में उसकी सलाह पर वे लोग मीडिया के सामने उतर आये.


आखिर 'देश में लोकतंत्र खतरे में है' के द्वारा किसी विशेष को नुकसान पहुँचाना और किसी विशेष को सहायता पहुँचाना अवश्य ही रहा होगा. कौन नुकसान में रहेगा, कौन फायदे में रहेगा इसका आकलन होना शेष है किन्तु मीडिया के सामने आकर न्यायाधीशों ने देशव्यापी एक नई बहस अवश्य ही आरम्भ करवा दी है. सामान्यजन जैसे उनके कदम से अब इस पर भी विचार किया जाना अपेक्षित है कि आखिर उनके विशेष स्थान, विशेष महत्त्व के क्या मायने हैं?

23 दिसंबर 2015

कानून पर्याप्त नहीं अपराध रोकने को


अंततः किशोर न्याय कानून को राज्यसभा से मंजूरी मिल ही गई, अब इसे राष्ट्रपति की मंजूरी मिलना बाकी है. इस मंजूरी के बाद ये विधेयक पूर्ण रूप से कानून बनकर सामने आएगा. इस कानूनी विधेयक के अनुसार सोलह से अठारह वर्ष तक के किशोर अपराधियों पर भी वयस्क अपराधियों की तरह मुकदमा चलाये जाने का प्रावधान किया गया है. इसके साथ ही विधेयक में ऐसी व्यवस्था की गई है कि किसी भी किशोर अपराधी को फाँसी अथवा उम्रकैद नहीं दी जा सकेगी. इस कानून के अनुसार अधिकतम सात वर्ष से दस वर्ष तक की सजा दी जा सकेगी. संसद में बहस के दौरान इस तरह से दर्शाया गया कि इस कानून के अमल में आने के बाद नाबालिग अथवा किशोर अपराधियों में भय का माहौल बनेगा, वे अपराध करने से डरने लगेंगे. किशोर न्याय कानून किस तरह से किशोर अपराधियों को भयभीत करेगा, किस तरह समाज में किशोरवय के लोगों को अपराध करने से रोकेगा ये तो आने वाला समय बताएगा. दिल्ली में हुए जघन्य रेप कांड के बाद जिस तरह से नाबालिग अपराधियों पर मुकदमा चलाये जाने, उन्को भी वयस्कों की तरह सजा दिए जाने की माँग उठी थी, उस माँग को तीव्रता पुनः उसी अपराधी के छूट जाने के बाद मिली. पीड़ित लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार के बाद उसके गुप्तांग में सरिया गुसेड़ कर सड़क पर फेंक दिए जाने जैसा ह्रदयविदारक अपराध करने वाले अपराधी को महज तीन साल की सजा देकर इसलिए बरी कर दिया जाता है क्योंकि अपराध करने के समय वो नाबालिग था. ये अपने आपमें विद्रूप है कि एक व्यक्ति जो बलात्कार करने में सक्षम है, किसी भी महिला से शारीरिक सम्बन्ध बनाने में सक्षम है, किसी की हत्या करने की मानसिकता रखता है उसे उम्र के आधार पर नाबालिग होने के कारण सजा से वंचित रखा जाता है.
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यदि हाल-फ़िलहाल में सिर्फ बलात्कार को ही आधार बनाया जाये तो समाज में किशोर बलात्कारियों से अधिक संख्या वयस्क बलात्कारियों की है. लगभग रोज ही किसी न किसी महिला को वयस्क उम्र के व्यक्ति द्वारा अपनी हवस का शिकार बनाया जाता है. और ऐसा तब हो रहा है जबकि बलात्कारियों को सजा देने के लिए कानून बना हुआ है. कानून बने होने के बाद भी, बलात्कार के मामलों में सजा होने के बाद भी समाज में ऐसे अपराधों को रोका नहीं जा सका है; अपराधियों के मन में कानून का खौफ पैदा नहीं किया जा सका है; लोगों को कानून का भय दिखाकर अपराध से दूर रहने को सजग नहीं किया जा सका है. ऐसे में किस आधार पर कहा जा सकता है कि किशोर न्याय कानून बनने के बाद किशोरवय के अपराधियों में डर जागेगा? किस आधार पर कहा जा सकता है कि किशोर इस कानून के आने के बाद खुद को अपराध करने से रोक सकेंगे? यहाँ एक बात समझनी होगी कि महज कानून बना देने से किसी अपराधी मानसिकता वाले को  अपराध करने से रोका नहीं जा सकता है. हाँ, इस कानून के आने के बाद इतना अवश्य होगा कि नाबालिग अपराधियों (16 वर्ष से 18 वर्ष तक की उम्र वाले) पर वयस्कों की भांति मुकदमा चलाया जा सकता है. कहा जा सकता है कि ये कानून ऐसे अपराधियों पर मुकदमा चलाये जाने की कानूनी अनुमति प्रदान करता है. इसके बाद भी सवाल खड़ा होता है कि 14-15 वर्ष तक की उम्र वाला कोई किशोर यदि दिल्ली कांड जैसा जघन्य अपराध करता है तो उसे किस कानून के द्वारा दण्डित किया जा सकेगा? क्या उसके लिए फिर से संसद के द्वारा नए कानून को लाना पड़ेगा? या फिर कानून के अभाव में ऐसा अपराधी एकबार फिर रिहा कर दिया जायेगा?
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कानूनी दृष्टि से किसी के साथ भेदभाव का होने पाए या फिर अपराध रोकने की दृष्टि से अपराधी की मानसिकता, उसकी उम्र को आधार भले ही बनाया जाये किन्तु उसके साथ-साथ उस अपराध की जघन्यता को भी ध्यान में रखा जाये. कोई व्यक्ति जो अपराध को वीभत्स स्थिति तक अंजाम देता हो उसे महज उम्र के आधार पर, उसकी मानसिकता के आधार पर रिहा करना कहाँ तक न्यायसंगत है? जघन्य अपराध की मामूली सी सजा देकर समाज में आपराधिक मानसिकता के लोगों के बीच कौन सा सन्देश प्रेषित किया जायेगा, ये समझ से परे है. आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों में किस तरह से ये कानून भय पैदा करेगा, उन्हें अपराध करने से रोकेगा, कहना मुश्किल है. कानून का काम आवश्यक रूप से समाज में अपराधियों में भय पैदा करना और नागरिकों को निर्भय होकर जीवन-यापन करने देने का होता है. मगर जब आपराधिक मानसिकता का कोई व्यक्ति इन्हीं कानूनों का सहारा लेकर अपराध करने लगे तो समाज में निर्भय जीवन-यापन की कल्पना करना संभव नहीं है. इस नए कानून का स्वागत किया जाना चाहिए किन्तु साथ ही कानून को, न्यायालयों को अपने आपमें इतनी छूट लेनी होगी कि वो अपराधी के जघन्य कृत्य के आधार पर भी कानून से इतर समाजहित में कोई निर्णय ले सके. यदि ऐसा नहीं किया जा सकता तो संभव है कि अन्य कानूनों की भांति किशोर न्याय कानून भी कानूनी किताबों में, दस्तावेजों में सुशोभित होता रहेगा.

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10 दिसंबर 2015

पारिवारिक चाटुकारिता में लिप्त राजनीति


लोकतान्त्रिक व्यवस्था होने के बाद भी देश में राजशाही के लक्षण नियमित रूप से देखने को मिलते हैं. इसका ताजातरीन उदाहरण सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी को न्यायालय में उपस्थित होने के आदेश मिलने के बाद दिखाई दिया. नेशनल हेराल्ड मामले को लेकर नयायालय के आदेश के बाद संसद से लेकर सड़क तक जिस तरह से कांग्रेसियों ने अपना प्रदर्शन किया है वो चाटुकारिता का जीता-जागता उदाहरण है. यदि एक पल को नेशनल हेराल्ड मामले पर नजर डाली जाये तो वित्तीय अनियमितता का समझ आता भी है. एक कंपनी का अधिग्रहण, कंपनी के शेयरों का हस्तांतरण, कांग्रेस द्वारा कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व की एक नई कंपनी को ऋण उपलब्ध करवाया जाना आदि ऐसा कुछ है जो संदेह उत्पन्न करता है. ऐसे में यदि शीर्ष नेतृत्व पर संदेह के बादल दिख रहे हों और न्यायालय द्वारा उनकी उपस्थिति के पश्चात् मामले को स्पष्ट करने का अवसर दिया जा रहा है, तो किसी को क्या आपत्ति होनी चाहिए? सोनिया गाँधी को संभवतः स्मरण नहीं होगा अब कि वे जिन इंदिरा गाँधी की बहू होने का दंभ भरा बयान देकर ‘किसी से न डरने वाली’ धौंस जैसी शब्दावली का प्रयोग कर रही हैं, वे इंदिरा गाँधी भी न्यायालय में उपस्थित होती रही थी.
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सोनिया, राहुल के उपस्थिति के आदेश के बाद से जिस तरह से संसद से लेकर सड़क तक प्रदर्शन किये गए वे शर्मनाक कहे जा सकते हैं. पिछले संसद सत्र में जिस तरह का रवैया कांग्रेसी सांसदों का, उनके उपाध्यक्ष का रहा वो वर्तमान सत्र में भी यथावत कायम है. विपक्ष का काम करना कांग्रेस का राजधर्म हो सकता है मगर यहाँ जिस तरह से कार्य किया जा रहा है वो राजधर्म कम और परिवारधर्म ज्यादा लग रहा है. ये समझने की बात है कि किसी मामले में सत्य-असत्य की जाँच के लिए यदि न्यायालय ने सम्मन भेज दिया है तो इस पर इतना बवाल मचने की आवश्यकता क्या है? अभी सोनिया, राहुल पर न तो आरोपों का निर्धारण हुआ है और न ही सजा हुई है. इसके अलावा न्यायालय में उपस्थिति मात्र को लेकर जो हंगामा किया जा रहा है, उसके लिए प्रदर्शन करते लोग बताएँ कि ये दोनों लोग किस संवैधानिक पद पर आसीन हैं कि इन्हें न्यायालय में उपस्थित होने के आदेश से किसी तरह से संविधान की मर्यादा का हनन हुआ है? सोनिया और राहुल महज सांसद हैं और किसी भी सांसद के न्यायालय में उपस्थित होने से किसी राष्ट्रीय शर्म की स्थिति नहीं बनती है. इसके उलट राष्ट्रीय शर्म इस बात पर है कि देश के दो सांसदों को न्यायालय में उपस्थिति मात्र के आदेश से समूची संसद को बंधक सा बना लिया गया है.
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दरअसल कांग्रेस वर्तमान लोकसभा में अपनी सर्वाधिक दुर्गति वाली स्थिति में है और उसके पास कोई ऐसा मुद्दा भी नहीं है, जिसके आधार पर केन्द्र सरकार को बदनाम किया जा सके. ऐसे में देश भर में फैले समूचे कांग्रेसी समर्थकों द्वारा अपने प्रदर्शन से, बयानबाजियों से ऐसा दिखाने का प्रयास किया जा रहा है कि ये सब राजनैतिक षड्यंत्र रचकर किया जा रहा है. स्पष्ट है कि कांग्रेसी शीर्ष नेतृत्व के साथ-साथ उनके समूचे तंत्र में राजशाही के कीटाणु पर्याप्त रूप से पनप चुके हैं. वे अभी भी इस बात को पचा नहीं पा रहे हैं कि आधी सदी से अधिक समय तक देश की सत्ता सँभालने वाली पार्टी, एक परिवार के सदस्य अब महज सांसद के रूप में विराजमान हैं. इसी दंभ के चलते इन लोगों के लिए न्यायालय के प्रति कोई सम्मान नहीं है. एक परिवार के प्रति अपनी चाटुकारिता दर्शाने वालों से कैसे अपेक्षा की जा सकती है कि वे देश के लोकतंत्र को सुरक्षित रखने को प्रतिबद्ध रहेंगे? जिनके मन-मष्तिष्क में सिर्फ राजशाही जैसी स्थिति हो, जिनके मन में न्यायालय के प्रति सम्मान न हो, संवैधानिक मर्यादा न हो, संसद के प्रति आदरभाव न हो, देश की मान-मर्यादा का ख्याल न हो, जनता के धन के दुरुपयोग किये जाने का भय न हो, उनसे किसी तरह की सकारात्मकता की उम्मीद रखना बेमानी है.

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