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04 जुलाई 2021

हरहाल में खुश रहने की कला ही जीवन है

हमारी सकारात्मकता हमें लगातार आगे बढ़ने को प्रेरित करती है। ऐसी ही एक प्रेरणा देने वाली कहानी सोशल मीडिया के माध्यम से पढ़ने को मिली। इसे पढ़ कर लगा कि ज़िन्दगी में परेशानियाँ, कठिनाइयाँ भले ही कितनी ही बनीं रहें पर यदि व्यक्ति सकारात्मक रूप से उनको देखे तो उनके पीछे से भी खुश रहने का अवसर निकल आता है। आप भी पढ़ें उस कहानी को और प्रयास करें प्रसन्न रहने का।


कहानी कुछ इस तरह है कि एक महिला की आदत थी कि वह रात को सोने से पहले अपनी दिन भर की खुशियों को एक काग़ज़ पर लिख लिया करती थी।


हर रात वह कुछ न कुछ सकारात्मक ही लिखती थी। उसके विभिन्न रातों में लिखे गये नोट्स, जो सकारात्मक हैं, कुछ इस तरह से हैं। 

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मैं खुश हूँ कि मेरा पति पूरी रात ज़ोरदार खर्राटे लेता है। इससे एहसास भरता है कि वह ज़िंदा है और मेरे पास ही है। भले ही उसकी खर्राटो की आवाज़ मुझें सोने नहीं देती पर उसके मेरे पास होने का एहसास मुझे खुशी देता है। ये भगवान का शुक्र है मेरे प्रति।


मैं खुश हूँ कि मेरा बेटा सुबह सवेरे इस बात पर झगड़ता है कि रात भर मच्छर सोने नहीं देते। इसका अर्थ है कि वह रात घर पर गुज़ारता है, आवारागर्दी नहीं करता है। इस पर भी भगवान का शुक्र है। 


मैं खुश हूँ कि हर महीना बिजली, गैस, पेट्रोल, पानी वगैरह का अच्छा खासा टैक्स देना पड़ता है। स्पष्ट है कि ये सब चीजें मेरे पास, मेरे इस्तेमाल में हैं। अगर ये ना होतीं तो ज़िन्दगी मुश्किल हो सकती। इस पर भी भगवान का शुक्र है।


मैं खुश हूँ कि दिन ख़त्म होने तक मेरा थकान से बुरा हाल हो जाता है। मतलब साफ है कि मेरे अंदर दिनभर सख़्त काम करने की ताक़त और हिम्मत सिर्फ ऊपर वाले के आशीर्वाद से है।


मैं खुश हूँ कि हर रोज अपने घर का झाड़ू पोंछा करना पड़ता है और दरवाज़े-खिड़कियों को साफ करना पड़ता है। इस पर भी ईश्वर का शुक्र है कि मेरे पास घर तो है। जिनके पास छत नहीं उनका क्या हाल होता होगा? इस पर भी भगवान का शुक्र है।


मैं खुश हूँ कि कभी कभार थोड़ी बीमार हो जाती हूँ। यह बताता है कि मैं ज़्यादातर सेहतमंद ही रहती हूँ। इसके लिए भी भगवान का शुक्र है।


मैं खुश हूँ कि हर साल दिवाली पर उपहार देने में पर्स ख़ाली हो जाता है। यह दर्शाता है कि मेरे पास चाहने वाले मेरे अज़ीज़ रिश्तेदार, दोस्त हैं जिन्हें मैं उपहार दे सकूँ। अगर ये ना हों तो ज़िन्दगी कितनी बे रौनक हो जाती। इस पर भी भगवान का शुक्र है।


मैं खुश हूँ कि हर रोज अलार्म की आवाज़ पर उठ जाती हूँ। स्पष्ट है कि मुझे हर रोज़ एक नई सुबह देखना नसीब होती है। ज़ाहिर है ये भी भगवान का ही करम है।

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हमारा मानना है कि जीने के इस फॉर्मूले पर चलते हुए हम सभी को अपनी और अपने से जुड़े सभी लोगों की ज़िंदगी संतोषपूर्ण बनानी चाहिए। छोटी-छोटी परेशानियों में खुशियों की तलाश करके जीवन की गति बनाए रखनी चाहिए। किसी भी परेशानी, समस्या, दुख में घिरे रहकर खुद को दुखी, परेशान रखना उचित कदम नहीं। 

खुश रहने का अंदाज़ औऱ हरहाल में खुश रहने की कला ही जीवन है।

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04 जनवरी 2021

खुद को खुद के साथ जोड़ कर देखिए, खुशी मिलेगी

पुराना गया और नया आ गया। इस नये के आने पर जो खुशी चेहरे पर दिख रही थी वह आज चौथे दिन ही गायब है। ऐसा क्यों? वैसे खुशी इन चार दिनों में ही गायब नहीं हुई बल्कि वह तो बहुत दिनों से गायब है। सही है न? अब विचार करिए पीछे गुजार चुके दिनों को और खुद देखिए कि जीवन के पल को खुश रहकर गुजारा या बोझ समझ कर। असल में बहुतेरे लोगों को इसका भान ही नहीं कि जीवन क्या है और इसे बिताना कैसे है। लोगों के लिए जीवन का मतलब पैदा होना, पढ़ना, कमाना, शादी, घर, बीवी, बच्चे और फिर उनकी तथा उनके बच्चों की 'लाइफ सेटेल' करते-करते मर जाना। 

हो सकता है कि बुरा सा लग रहा हो पढ़ कर परन्तु सत्य तो यही है। सबकुछ सही से करने की आपाधापी में लोग खुद को कब भुला बैठते हैं पता ही नहीं चलता। जीवन में निरुद्देश्य घूमना, पुराने दोस्तों के साथ रात-रात भर बिना काम की बातों में उलझे रहना, परिवार की परेशानी को कुछ घंटों के लिए भुला कर बस अपने आपमें खोए रहना कितने लोग करते हैं? इधर-उधर न देखिए, खुद को देखिए। अपने शौक की बड़ी सी पोटली में से कब एक कतरा शौक निकाल कर उसे पूरा किया है? कमाते रहना, उसी के लिए खपना और फिर एक ऐसे जीवन को सुखमय बनाने के लिए, जिसके अगले पल का भरोसा नहीं, धन-संग्रह करते रहना खुद को मारना ही है।

बुरी तरह दौड़ती-भागती ज़िन्दगी में कुछ पल अपने लिए निकालते कर देखिए, आनन्द मिलेगा। जरूरी नहीं कि देश-दुनिया की सैर की जाए, अपना कोई भी वाहन लेकर शहर के बाहर के खेत, मैदान तक एक चक्कर लगा लीजिए, फिर देखिए। हाँ, इन नितांत निजी पलों में आपके साथ बस आप ही हों, न आपका परिवार, न आपकी नौकरी, न आपकी समस्या। करके देखिए, खुद को खुद के साथ जोड़ कर देखिए, खुशी मात्र चार दिन की नहीं लगेगी। तब लगेगा कि खुशी तो हमेशा साथ थी बस स्वयं ही देख-समझ न पाए। 




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वंदेमातरम्

06 अगस्त 2014

न भुलाएँ भारतीय संस्कृति

भारतीय सांस्कृतिक परम्परा में पर्वों-त्योहारों का विशेष ही महत्त्व है. हमें अवसर चाहिए होता है और हम पूर्ण मनोयोग से इनके आयोजन में जुट जाते हैं. इधर चंद दिनों में हर्ष-उल्लास से भरे पर्व निकले; भारतीय भूमि पर विदेश से आयातित दिवस भी गुजरे. हम भारतीयों ने सभी पर्व-उत्सवों-दिवसों को सहजता से स्वीकार किया है किन्तु वर्तमान में देखने को मिल रहा है कि हम जिस उत्साह से विदेशी-आयातित दिवसों, त्योहारों का स्वागत करते हैं, उसी उत्साह से भारतीय पर्वों-त्योहारों को नहीं मना रहे हैं. फ्रेंडशिप डे आया सर्वत्र चर्चा रही, उसी के ठीक पहले नागपंचमी गुजरी दो-चार लोगों ने परम्परा का पालन किया. प्रेम का पर्व माने जाने वाले वेलेंटाइन डे पर बहार छाई रहती है पर भारतीय प्रेम-पर्व ‘बसंत पंचमी’ हम विस्मृत कर जाते हैं, जैसे अभी-अभी हमने हरियाली तीज को विस्मृत किया, तुलसी जयंती को विस्मृत किया.
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भारतीयता से, भारतीय संस्कृति से, सभ्यता से, भाषा से, बोली से अलग होकर हम किस तरह का विकास चाहते हैं, अब ये निर्धारण करने का समय आ गया है. ज्ञान-विज्ञान के नाम पर हिन्दी को हाशिये पर लगाया जा रहा है; धार्मिक तुष्टिकरण की नीति के चलते धार्मिक ग्रंथों को, वैदिक ग्रंथों को दूर किया जा रहा है; भारतीय संस्कृति का वाहक मानी जाने वाली रामचरित मानस को भी रेशमी कपड़े में लपेट आम भारतीय की पहुँच से दूर कर दिया गया. हम सभी को विचारना होगा कि ऐसा कब तब तक चलेगा? ऐसा कैसे चलेगा? अपनी जड़ों से कट कर हम कहाँ विकास कर पाएंगे? अपनी संस्कृति से अलग रहकर हम क्या सीख पायेंगे? अपनी भाषा को विस्मृत कर हम कौन सा ज्ञान ले पाएंगे? काश हम जागने-समझने की स्थिति में आयें.... तो संभव है कि हम वास्तविक विकास कर पायें. आशा, आकांक्षा, विश्वास को मन में लिए आगे बढ़ना है, खुद को गढ़ना है... समाज को गढ़ना है... देश को गढ़ना है. 
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12 अक्टूबर 2013

गुब्बारों के फूटने में सुनाई दी बच्चे की हँसी




इसका कुछ भी नाम हो सकता है, कोई भी जाति हो सकती है, कोई भी धर्म हो सकता है. इस जैसे और भी बच्चे हो सकते हैं....हो सकते हैं क्या, ऐसी बहुत से बच्चे हैं जो अपना बचपन भूलकर पेट की आग शांत करने का जुगाड़ करने में लगे हैं. गुब्बारे बेचने का एक मन को छूने वाला आग्रह साथ ही घर जाने की आतुरता. किसी भी बच्चे का पेट के लिए काम करते दिखना अपने आपमें दुखद होता है किन्तु यदि काम हल्का-फुल्का सा होता है तो ये सुकून मिलता है कि कम से कम ये भीख तो नहीं माँग रहा, किसी की जेब तो नहीं काट रहा, कहीं चोरी-चकारी तो नहीं कर रहा है.
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तस्वीर लेते समय रात का आठ बजने को आया था और इस बच्चे को अभी लगभग पाँच-छह किमी दूर अपने गाँव जाना था. उरई शहर के पास के एक गाँव का निवासी वहीं के विद्यालय में कक्षा छह का विद्यार्थी ये बच्चा फोटो लिए जाने की बात से पुलक उठा. एक पल को भूल गया कि उसने गुब्बारे लेने का आग्रह किया था...पर पेट की आग कहाँ कुछ भूलने देती है, उसकी एक पल की ख़ुशी के पीछे प्रश्नवाचक शब्द निकले ‘और गुब्बारे’....उसको आश्वस्त किया तो उसके चेहरे पर फिरसे मुस्कान तैर गई.
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दो फोटो लेने के दरमियान उसने अपने बारे में बताया. विद्यालय जाना और फिर लौटकर गुब्बारे लेकर उरई आ जाना. दिनभर में कोई ३५-४० गुब्बारे बेचने के बाद रात को गाँव वापस पहुँच कर कुछ लिख-पढ़ लेना. कक्षा छह के विद्यार्थी को अनुशासित रूप में विद्यालय-परिवार, अध्ययन-व्यवसाय, घर-बाज़ार के साथ तालमेल बनाये देखना अपने आपमें अचरज में डाल गया. एकबारगी मन में आया कि इसकी मदद कुछ पैसे देकर की जाये..फिर लगा कि जो बच्चा खुद को कहीं न कहीं भीख माँगने से अलग रखे हुए है, उसे धन की मदद भिक्षावृत्ति को प्रेरित तो नहीं कर देगी? साथ ही लगा कि जो बच्चा पूरे अनुशासित रूप में अपना संतुलन बनाकर आगे बढ़ रहा है, कहीं उसकी खुद्दारी, उसकी राह में व्यवधान उत्पन्न तो नहीं करेगा.
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इस दो-चार मिनट की उलझन के बाद जितना संभव हो सकता था, गुब्बारे लिए. गाड़ी-सामान के साथ हाथों की सीमित संख्या ने भी गुब्बारे खरीद पर अंकुश लगाया. बच्चा अपनी अतुलित प्रसन्नता के साथ गुब्बारे तोड़-तोड़ देता जा रहा था और हम उनको संभालने में लगे हुए थे. बाज़ार से घर तक की यात्रा में कुछ गुब्बारे देवी माता की झांकियां देख लौट रहे बच्चों में बंट गए तो कुछ गुब्बारे भीड़ की, हवा की चपेट में आकर फूट गए. फट-फट की आवाज़ लोगों में क्या सन्देश दे रही होगी ये तो पता नहीं पर हमें कहीं न कहीं उस ध्वनि में बच्चे की हँसी सुनाई दे रही थी. घर के बच्चे भी चहक-चहक कर बचे हुए कुछ गुब्बारों को फोड़ने-उड़ाने में लग गए.

17 अगस्त 2010

दुनिया वाकई गोल है और एक विश्वग्राम के रूप में स्थापित है




कल दोपहर 3 बजे के आसपास एक फोन हमारे मोबाइल पर आया। किसी ऐसे व्यक्ति का फोन था जिसका नम्बर हमारे मोबाइल में नहीं था। नम्बर भी कुछ जाना पहचाना नहीं लगा।

फोन आया, स्क्रीन पर एक नम्बर उभरा। उस कॉल को रिसीव किया। (अब आप लोग थोड़ा सा उसी रूप में वार्तालाप को पढ़ें, जैसी कि हुई।)

हमने कहा-हाँ जी।
उधर से-कुमारेन्द्र सिंह सेंगर बोल रहे हैं?
हम-हाँ जी, बोल रहे हैं।
उधर से-अच्छा, अभी भी चिन्टू के नाम से पुकारे जाते हो? (चिन्टू हमारे घर में बुलाया जाने वाला नाम है, इसी नाम से कॉलेज के दौरान हमारे मित्रों और अध्यापकों ने भी हमें बुलाना शुरू कर दिया था। शायद कुमारेन्द्र से आसान होने के कारण)
हम-हाँ।
उधर से-अबे! कब तक अपने को चिन्टू कहलवाते रहोगे?
हम-आखिर-आखिर तक।
उधर से-अच्छा, अब तो तुम डॉक्टर हो गये हो?
हम-हाँ।
उधर से-किसके?
हम-किताबों के।
उधर से-हाँ बे, सही है। स्टैटिक्स पढ़कर तो किताबों के ही डॉक्टर बनोगे। बायो ली होती तो इंसानों के बनते।

(वार्तालाप बहुत लम्बा चला। आपको ज्यादा नहीं)


(चित्र गूगल छवियों से साभार)

और भी बातें हुईं। उधर से हमारे बारे में जानकारी ली जाती रही और बीच-बीच में मित्रों के बीच में प्यार-मुहब्बत में चलने वाली गालियों का दौर भी चलता रहा। उसने अपना नाम नहीं बताया और हमने भी नहीं पूछा। इसका कारण यह था कि उसके चिन्टू कहते ही हमें एकदम आभास हुआ कि हमारा बहुत पुराना दोस्त आलोकनाथ बोल रहा है। अपने ऊपर पूरी आश्वस्ति होने के बाद भी सामने वाले के सामने खुद को गलत साबित न होने देने के कारण से उसका नाम लेकर कुछ भी नहीं कहा।

बीच-बीच में हँसी के दौर भी होते, गालियों के, साथ में पढ़ने वाली लड़कियों का नाम लेकर छेड़ने का पल भी आया कुल मिला कर बातचीत में उसने नाम नहीं बताया पर हमें पक्का यकीन हो गया था कि यह आलोकनाथ ही है।

थोड़ी देर के बाद (लगभग 10 मिनट की बातचीत के बाद) उसने कहा, क्यों बे, इतनी देर हो गई, तो पूछा कि कौन बोल रहे हो और ही जानने की इच्छा की। तब हमने कहा कि यदि गलत नहीं हैं तो तुम आलोकनाथ हो।

उधर से आश्चर्य भरी प्रतिक्रिया हुई, अबे चिन्टू तुम्हारी इसी अदा पर मर गये। यदि बगल वाले को बता दें कि तुमने क्या कहा तो वह उछल पड़ेगा। (आलोकनाथ के बगल वाला भी हमारे साथ पढ़ा हुआ हमारा मित्र राजेश भाटिया था, जिससे हमारा सम्पर्क फेसबुक पर मात्र आठ दिनों पहले हुआ था।)

आलोकनाथ के यह जताते ही कि वह आलोकनाथ ही है हमारे आँसू बहने लगे। आँखें नम और जुबान तो मानो आगे कुछ भी कहने को तैयार नहीं। उधर से आलोकनाथ आश्चर्य में कुछ न कुछ बोले जा रहा था और हमारे साथ के कुछ और मित्रों के बारे में बताता जा रहा था, इधर हम खुद को सँभालने में लगे थे।

आलोक से लगभग 15 साल के बाद बातचीत हो रही थी। हम स्नातक की पढाई के दौरान एक साथ होस्टल में रहा करते थे। राजेश भाटिया ने भी इतने वर्षों के बाद हमें फेसबुक के द्वारा खोज लिया था। इंटरनेट की सुविधा का लाभ लेने के बाद लगभग रोज ही अपने पुराने मित्रों को ऑरकुट अथवा फेसबुक पर खोजने का काम करते रहते हैं। कुछ से मुलाकात हुई और कुछ इसी तरह से टकरा गये। आलोकनाथ को फेसबुक अथवा आफरकुट पर न पाकर लगता था कि अब उससे दोबारा मुलाकात नहीं हो पायेगी।

बहरहाल आलोक मिल गया, राजेश भी मिला कुछ और साथियों के बारे में इन्हीं से पता चला। अब लगता है कि तकनीकी सुविधा से समूचे विश्व का एक विश्वग्राम के रूप में स्थापित हो जाना गलत नहीं है। इसके अलावा यह भी गलत नहीं है कि दुनिया गोल है किसी किसी दिन फिर मिलना हो ही जाता है।

किसी के लिए सही हो अथवा नहीं पर हमारे लिए तो ये दोनों बातें सही ही साबित हुईं हैं।


28 फ़रवरी 2010

हुसैन की मानसिक विकृति से मुक्त हुआ देश और देवी-देवता

चलो, अब देश के हिन्दू देवी-देवताओं को राहत मिलने की उम्मीद होगी? भले ही राहत पूरी तौर पर न हो किन्तु इस बात पर तो राहत है कि अब भारतीय नागरिकता लिए हुए कोई भारतीय उनके अश्लील चित्र नहीं बनायेगा। अब यदि वह इस तरह के चित्र बनाएगा तो हम उसे विदेशी कहेंगे।

खबर आई कि एम0एफ0हुसैन कतर की नागरिकता ले रहे हैं, अगले ही दिन खबर मिली कि उन्हें कतर की नागरिकता मिली। सच्चाई कितनी है ये तो सरकारी तन्त्र ही जाने किन्तु यदि सही है तो चलो एक ऐसे व्यक्ति से, जो कलाकार होने का दम भरता है किन्तु विकृत मानसिकता से ग्रस्त है, देश को छुटकारा मिल गया।

हमारे एक-दो मित्र ऐसे हैं जो हमारे इस तरह के विचारों को इस कारण पसंद नहीं करते कि हम लेखकों की श्रेणी में आते हैं, हम महाविद्यालय में पढ़ाने जाते हैं, हम कुछ हद तक मीडिया से सम्बन्ध रखते हैं। (कुल मिलाकर तथाकथित बुद्धिजीवी..........हमारी नजर में बुद्धिभोगी) उन मित्रों से हमारी इसी बात पर बहस होती है कि अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता में व्यक्ति को दूसरे का धर्म, दूसरे का परिवार, दूसरे की इज्जत ही क्यों दिखाई देती है? अपनी इज्जत के नाम पर वह कभी अपनी इस स्वतन्त्रता का प्रयोग क्यों नहीं करता?

फिदा हुसैन को भारत का पिकासो कहा जाता है, होंगे किन्तु क्या बस इसी एक दो शब्दों के आधार पर उनके किसी भी अमर्यादित कृत्य को माफ किया जा सकता है?

यहाँ सवाल कदापि हिन्दू-मुस्लिम का नहीं है सवाल है मानसिकता का। हुसैन नाम है जो मुसलमानों के लिए पाक शब्द है, और कलाकार हुसैन की मानसिकता को देखो, उतनी ही नापाक। देवी-देवताओं की अश्लील तस्वीर बनाने वाल हुसैन ने कभी अपने परिवार की महिलाओं की वैसी अश्लील तस्वीर बनाई? क्या ये सभी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता में शामिल नहीं हैं?

इस समाचार के सत्यता की पुष्टि होने के बाद तो देश के तमाम सारे कलाकार और लाल झंडे में लिपटे संगठन अपना विरोध करेंगे। हो सकता है सबसे पहले शबाना आजमी और जावेद अख्तर जैसों का विरोध प्रदर्शन करना शुरू हो जाये जो छोटे से छोटे मुद्दों को भी अन्तरराष्ट्रीय विवाद का विषय बनाने में महारत हासिल कर चुके हैं।

बहरहाल, राहत है, देश से बाहर तसलीमा भी हैं अब हुसैन भी होंगे। हमें प्रसन्नता इस कारण नहीं कि ये दोनों देश के बाहर है, प्रसन्नता इस कारण से है कि भारत को शरणस्थली समझने की, डस्टबिन समझने की, आरामगाह समझने की भूल इस तरह के लोगों को छोड़नी होगी जो कहीं भी विवाद पैदा करने के बाद भारत की सरकार और जनता पर बोझ बन जाते रहे हैं।

देर आयद, दुरुस्त आयद की तर्ज पर हुसैन का कतर की नागरिकता लेने का निर्णय स्वागत योग्य है। हम सभी को इस तरह के लोगों का स्वागत और अभिनन्दन करना चाहिए।

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क्षमा करिएगा, ऐसे लोगों का चित्र हम अपने ब्लाग पर नहीं लगा सकते। इस बारे में लिख ही दे रहे हैं, इनके लिए यही बहुत बड़ी बात है। इनका यही सम्मान है कि हमने इनके लिए कुछ लिखा.......भले ही कुछ भी लिखा हो।

28 अक्टूबर 2008

इस दीपावली पर करें एक संकल्प

आज दीपावली है, घरों में रंग-बिरंगी रोशनी है, बच्चे खुशी से चहक रहे हैं, बड़े घर में होने वाली पूजा आदि के लिए सामानों की खरीददारी में लगे हैं, घर की महिलायें दीपावली को सुखद, पावन बनाने के लिए प्रयासरत हैं. कुल मिला कर सभी लोग किसी न किसी रूप में व्यस्त हैं. आप-हम भी व्यस्त हैं पर क्या इस व्यस्तता के बीच एक-दो पल को समय निकल कर दीपावली की सार्थकता के बारे में विचार करेंगे?
विचार बस इतना है कि इस दीवाली पर भी हजारों-हजार रुपये के पटाखे फोड़ दिए जायेंगे, अन्य दूसरे तरह की आतिशवाजी में भी पैसे को खर्च किया जायेगा, लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने के नाम पर कुछ लोग जुए में हजारों रुपये की हारा-जीती करेंगे. आपको क्या लगता है ये सब होना चाहिए?........अरे साहब होना ही चाहिए, आख़िर वर्ष-वर्ष का त्यौहार है.......पार्टी, मस्ती, हंगामा, धमाल सब कुछ जो भी हो सकता है वो होना चाहिए।
बिल्कुल सही, आख़िर खुशी का त्यौहार है, खुशी मनाई भी जानी चाहिए पर आतिशबाजी को फोड़ते हुए एक पल को रुक कर सोचिये कि क्या उसको इस समय खुशी मिल रही होगी जिसने अपने बेटे को किसी जातिवाद, क्षेत्रवाद के जहर के कारण खोया है?
  • क्या उस व्यक्ति को खुशी मिल रही होगी जिसके घर में पिछले तीन-चार वर्षों से खाने को कुछ भी हुआ नही है?
  • क्या वे लोग इस त्यौहार को खुशी से मना सकते हैं जिन्हों ने आतंकवाद के धमाके में अपने परिवारीजनों को खोया है?
  • क्या वे लोग खुशी का अनुभव कर सकते है जिन्हों ने किसी न किसी दूषित वातावरण के कारण अपने आपको या अपने ख़ास को बीमार बना दिया है?
  • क्या वो इस समय खुशी मनायेगा जिसका कोई अपना किसी की लापरवाही के कारण मौत का शिकार हो गया है?
ज़रा सोचिये............अरे....अरे.......अरे.......आप तो वाकई इतना सोचने लगे? इतना भी सोचने की जरूरत नहीं क्योंकि इतना सोचने के बाद भी कुछ नहीं होता...........सिवाय सोचने के. यदि वाकई आप इन लोगों के लिए कुछ (कुछ भी) करना चाहते हैं, अपनी खुशियों का सही आनंद उठाना चाहते हैं तो इस दीपावली पर एक छोटा सा संकल्प कर लीजिये और उसको हर वर्ष निभाइए। फ़िर देखिये आपके त्यौहार, आपके उमंग, आपकी खुशी की मात्रा और कितनी अधिक बढ़ जाती है.
  • बस करिए ये कि आप संकल्प करिए हर वर्ष दीपावली के दिन एक पौधा लगाने का।
  • आप तमाम तरह की मिठाई खाते-खिलाते हैं, अनेक व्यंजन आप और आपके महमान खाते हैं प्रतिवर्ष किसी भी भूखे को भरपेट भोजन कराइए.
  • हजारों रुपये की आतिशबाजी को फोड़ने के साथ-साथ कुछ थोड़ी सी आतिशबाजी उस बच्चे-बच्ची को भी दे दे जिसका कोई नहीं है तो आपको अपनी आतिशबाजी में और भी रंग नजर आयेंगे।
  • देवी-देवता किसी भी तरह से जुआ खेलने से प्रसन्न नहीं होते, आप भी जुआ न खेलें, भले ही आप हमेशा जीतते हों बस ये करें कि जितना भी जीतने कि गुंजाईश हो उतने रुपये से किसी गरीब छात्र-छात्रा की स्कूल फीस भर दे, उनको पुस्तक आदि खरीदवा दे, आप पर वाकई लक्ष्मी जी मेहरबान हो जायेंगी।
और भी बहुत कुछ है जो आप कर सकते हैं बस थोड़ा सा इस तरफ़ भी सोचिये. अपनी खुशी को कम न करिए, अपनी आतिशबाजी को कम न करिए, अपने दीयों की रोशनी को कम न करिए पर साथ में उनका भी ख्याल रखिये जो ये सब नहीं कर सकते. करके देखिये ऐसा, वाकई बहुत आनद आएगा.
आप सबको आपके परिवार सहित दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें
ऊपर अपने मन की बात कुछ बस यूँ ही लिख दी है आपको अच्छा लगे तो अवश्य संकल्प करिए अन्यथा आप पटाखे तो फोड़ ही रहे हैं, लोग उनकी धमक और रोशनी तो देख ही रहे हैं................