लोकोत्सव लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
लोकोत्सव लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

12 अक्टूबर 2019

लोकोत्सव से दूर होता समाज : टेसू-झिंझिया


बुन्देलखण्ड के लोक आयोजन में टेसू और झिंझिया का खेल बच्चों द्वारा खेला जाता है. आश्विन शुक्ल अष्टमी से शरद पूर्णिमा तक टेसू तथा नवमी से चतुर्दशी तक झिंझिया खेली जाती है. टेसू का खेल बालकों द्वारा तथा झिंझिया का खेल बालिकाओं द्वारा खेला जाता है. बाँस की तीन डंडियों से बने एक ढाँचे को टेसू कहा जाता है, जिसको रंग-बिरंगे कागजों से सजाया जाता है. इसके सिर पर मुकुट लगाकर और हाथ में ढाल-तलवार लगाकर इसे एक वीर राजा जैसा स्वरूप दिया जाता है. इस खेल में लड़के टेसू के रंग-बिरंगे ढाँचे को लेकर घर-घर जाते हैं और टेसू-गीत गाते हुए धन की माँग करते हैं. बालकों द्वारा गाये जाने वाले ये गीत विनोदी होते हैं और कई बार महज तुकबंदी के रूप में प्रयुक्त होते हैं. अनर्थक, देशज शब्दों का प्रयोग कर इन बालकों का उद्देश्य गीत को लय देना और हास्य प्रदान करके धन की प्राप्ति करना होता है.
टेसू मेरा यहीं खड़ा, खाने को माँगे दही बड़ा,
दही बड़े में पन्नी, टेसू माँगे अठन्नी.

इसी तरह से लड़कियों द्वारा झिंझिया का खेल खेला जाता है. इसके लिए उनके द्वारा मिट्टी का छोटा घड़ा लिया जाता है, जिसमें अनेक छेद किये जाते हैं. इसके अंदर अनाज तथा उसके ऊपर जलता दीपक रख दिया जाता है. इसे ही झिंझिया कहा जाता है. इसमें बालिकाएँ झांझी से झांझी तेरो ब्याह रचाओं गीत गाती हुई नृत्य भी करती हैं. झिंझिया-नृत्य में बालिकाएँ गोलाकार खड़ी हो जाती हैं और केंद्र में एक बालिका नृत्य करती है. वृत्ताकार खड़ी बालिकाएँ तालियों की थाप के द्वारा नृत्य को गति प्रदान करती हैं. इसमें सभी बालिकाओं को बारी-बारी से एक-एक करके केंद्र में आकर नृत्य करना होता है. इस नृत्य की विशेष बात ये होती है कि केंद्र में नृत्य करती बालिका अपने सिर पर रखी हुई झिंझिया का संतुलन बनाये रहती है. यह नृत्य टेसू-झिंझिया विवाह के समय भी होता है जो बालिकाओं की प्रसन्नता को दर्शाता है. इस घड़े को लेकर किशोरियों द्वारा घर-घर जाकर दानस्वरूप धन अथवा या अनाज की माँग करती हैं. कई जगह बालिकाएँ अन्य गीत गाते हुए दान चाहती हैं. इस लोक आयोजन के अंत में शारदीय पूर्णिमा को टेसू और झिंझिया का विवाह संपन्न होता है.

दशहरा के पश्चात् ये दोनों लोक-आयोजन बच्चों द्वारा संपन्न किये जाते दिखाई देते हैं. इधर विगत कई वर्षों से ऐसे आयोजनों में बच्चों की, बालिकाओं की सहभागिता में जबरदस्त कमी आई है. तकनीकी के विकास ने जहाँ लोगों को मोबाइल में कैद करवा दिया है वहीं इस तरह के लोक-पर्वों को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है. सामान्य परिवार के लोग भी अपने बच्चों को ऐसे आयोजनों में सहभागिता करने से रोकते हैं. इधर देखने में आ रहा है कि कुछ बच्चे टेसू लेकर आ रहे हैं, कुछ बच्चियाँ झिंझिया लेकर आ रही हैं मगर उनकी संख्या में कमी आई है. टेसू लेकर आने वालों में अब बच्चों का झुण्ड नहीं वरन एक-दो बच्चों का ही आना होता है. इसी तरह शाम के, रात के साए में चमकने वाली झिंझिया अब लगभग दिन जैसे उजाले में आने लगी है. इसके पीछे बच्चियों की असुरक्षा बहुत मायने रखती है. 

पिछले दो-तीन वर्षों में देखने में आया है कि ऐसे लोक-आयोजनों में अब क्षेत्रवासियों द्वारा रुचि नहीं ली जा रही है. आधुनिकता की चपेट में आने के चलते लोग अपनी संस्कृति, अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं. आर्थिक रूप से विपन्न परिवारों के बच्चे ही ऐसे आयोजनों को करते दिख रहे हैं. टेसू और झिंझिया लेकर निकले बालक-बालिकाओं से इस सम्बन्ध में चर्चा करने पर तमाम ऐसी बातें सामने आईं जो लोगों को ऐसे लोकोत्सवों से दूर कर रही हैं. लोगों के लिए ये लोकोत्सव नहीं वरन आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के खेल हैं. समाज में जो लोग भी खुद को आर्थिक रूप से संपन्न समझने लगे हैं, अब वे अपने बच्चों को ऐसे आयोजनों से दूर रखने लगे हैं. सोचने वाली बात है कि अपनी संस्कृति से अलग होकर हम सभी किस समाज की संकल्पना तैयार करने में लगे हैं?

वर्तमान में भले ही ऐसे आयोजनों को नगरों में स्वीकार्यता नहीं मिल पा रही हो किन्तु बुन्देलखण्ड के ग्रामीण अंचलों और छोटे कस्बों में आज भी ये लोक आयोजन पूरे उत्साह, धूमधाम से मनाये जाते हैं. अपनी संस्कृति को सुरक्षित, संवर्धित करने के लिए आवश्यक है कि नई पीढ़ी को इसकी जानकारी दी जाए और इसके आयोजन के लिए सक्रिय किया जाये, प्रोत्साहित किया जाये. यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो भविष्य में अनेक बुन्देली लोक कलाएँ विलुप्त होकर महज इतिहास बन जाएँगी.

16 अगस्त 2019

बुन्देलखण्ड की संस्कृति में आज भी जीवित है कजली


आधुनिकता का पर्याप्त प्रभाव होने के बाद भी बुन्देलखण्ड क्षेत्र में पावन पर्व कजली उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है. यहाँ की लोक-परम्परा में शौर्य-त्याग-समर्पण-वीरता के प्रतीक मने जाने वाले कजली का विशेष महत्त्व है. इस क्षेत्र के परम वीर भाइयों, आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम के साथ-साथ अन्य बुन्देली रण-बाँकुरों की विजय-स्मृतियों को अपने आपमें संजोये हुए कजली मेले का आयोजन आठ सौ से अधिक वर्षों से निरंतर होता आ रहा है. सावन महीने की नौवीं से ही इसका अनुष्ठान शुरू हो जाता था. घर-परिवार की महिलाएँ खेतों से मिट्टी लाकर उसे छौले के दोने (पत्तों का बना पात्र) में भरकर उसमें गेंहू, जौ आदि को बो देती थी. नित्य उसमें पानी-दूध को चढ़ाकर उसका पूजन किया जाता था, इसके पीछे उन्नत कृषि, उन्नत उपज होने की कामना छिपी रहती थी. सावन की पूर्णिमा को इन पात्रों (दोने) में बोये गए बीजों के नन्हें अंकुरण (कजली) को निकालकर दोनों को तालाब में विसर्जन किया जाता था. बाद में इन्हीं कजलियों का आपस में आदरपूर्वक आदान-प्रदान करके एक दूसरे को शुभकामनायें देते हुए उन्नत उपज की कामना भी की जाती थी. ये परम्परा आज भी चली आ रही है, बस इसमें शौर्य-गाथा के जुड़ जाने से आज इसका विशेष महत्त्व हो गया है.

कजली विसर्जन में बिटिया रानी - उरई, माहिल तालाब 

बुन्देलखण्ड के महोबा राज्य पर पृथ्वीराज चौहान की नजर लगी हुई थी. इसी कारण एक साजिश रचकर कुछ विरोधियों ने महोबा के अतुलित वीर भाइयों आल्हा-ऊदल को राज्य से निकलवा दिया था. पृथ्वीराज चौहान को भान था कि आल्हा और ऊदल के न होने के कारण महोबा की सैन्य क्षमता कमजोर हो गई होगी. ऐसे में अब महोबा को जीतना संभव है. सन 1182 में पृथ्वीराज चौहान ने महोबा पर आक्रमण की एक योजना बनाई. उसने महोबा की राजकुमारी के अपहरण की योजना बनाई और तय किया गया कि कजलियों के विसर्जन के समय ही आक्रमण करके राजकुमारी का अपहरण कर लिया जाये. महोबा के राजा परमाल की पुत्री चंद्रावलि अपनी हजारों सहेलियों और महोबा की अन्य दूसरी महिलाओं के साथ प्रतिवर्ष कीरत सागर तालाब में कजलियों का विसर्जन करने जाया करती थी. अपनी विजय को सुनिश्चित करने और राजकुमारी के अपहरण के लिए उसके सेनापति चामुंडा राय और पृथ्वीराज चौहान के पुत्र सूरज सिंह ने महोबा को घेर लिया. जिस समय ये घेरेबंदी हुई उस समय आल्हा-ऊदल कन्नौज में थे. 

राजा परमाल खुद ही आल्हा-ऊदल को राज्य छोड़ने का आदेश दे चुके थे, ऐसे में उनके लिए कुछ कहने-सुनने की स्थिति ही नहीं थी मगर उनके साथ-साथ सभी लोग जानते थे कि आल्हा-ऊदल के बिना पृथ्वीराज चौहान की सेना को हरा पाना मुश्किल होगा. इस विषम परिस्थिति में महोबा की रानी मल्हना ने आल्हा-ऊदल को महोबा की रक्षा करने के लिए तुरंत वापस आने का सन्देश भिजवाया. सूचना मिलते ही आल्हा-ऊदल अपने चचेरे भाई मलखान के साथ महोबा पहुँच गए. परमाल के पुत्र रंजीत के नेतृत्व में पृथ्वीराज की सेना पर आक्रमण कर दिया गया. इस युद्ध की सूचना मिलते ही राजकुमारी चंद्रावलि का ममेरा भाई अभई (रानी मल्हना के भाई माहिल का पुत्र) उरई से अपने बहादुर साथियों के साथ महोबा पहुँच गया. लगभग 24 घंटे चले इस भीषण युद्ध में आल्हा-ऊदल के अद्भुत पराक्रम, वीर अभई के शौर्य के चलते पृथ्वीराज चौहान की सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा. सेना रणभूमि से भाग गई. इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान का पुत्र सूरज सिंह भी मारा गया. इसके अलावा राजा परमाल का पुत्र रंजीत सिंह और वीर अभई भी वीरगति को प्राप्त हुए. कहा जाता है कि इसी युद्ध में पृथ्वीराज चौहान ने ऊदल की हत्या छलपूर्वक कर दी थी. जिसके बाद आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान को मारने की शपथ ली किन्तु बाद में अपने गुरु की आज्ञा मानकर संन्यास ग्रहण कर जंगल में तपस्या के लिए चले गए थे.

इस ऐतिहासिक विजय के बाद राजकुमारी चंद्रावलि और उसकी सहेलियों के साथ-साथ राजा परमाल की पत्नी रानी मल्हना ने, महोबा की अन्य महिलाओं ने भी भुजरियों (कजली) का विसर्जन किया. इसी के बाद पूरे महोबा में रक्षाबंधन का पर्व धूमधाम से मनाया गया. तब से ऐसी परम्परा चली आ रही है कि बुन्देलखण्ड में रक्षाबंधन का पर्व भुजरियों का विसर्जन करने के बाद ही मनाया जाता है. इसके बाद ही इस क्षेत्र में बहिनें रक्षाबंधन पर्व के एक दिन बाद भाइयों की कलाई में राखी बाँधती हैं. वीर बुंदेलों के शौर्य को याद रखने के लिए ही कहीं-कहीं सात दिनों तक कजली का मेला आयोजित किया जाता है. यहाँ के लोग आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम को नमन करते हुए बुन्देलखण्ड के वीर रण-बाँकुरों को याद करते हैं.

03 अगस्त 2019

मामुलिया के आए लिबउआ, ठुमक चली मेरी मामुलिया

बुन्देलखण्ड क्षेत्र सदैव से अपने ताप के लिए जाना जाता रहा है. यहाँ की भीषण गर्मी, तपती दोपहरिया जैसे सबकुछ आग लगाने को आमादा रहती है. इसी जानलेवा गर्मी के बाद जब बारिश की फुहार लोगों के मन-मष्तिष्क को झंकृत करती है तो सभी लोग मगन हो उठते हैं. बारिश की बूँदें तपते बुन्देलखण्ड की न केवल धरती को वरन जनमानस को भी अपने आगोश में ले लेती है. समाज में रसमय, मधुर एवं प्रेम से सुसज्जित भावबोध का निर्माण होता है और स्वयं प्रकृति मनमोहक वातावरण का सृजन करती है. इसी सुरम्य वातावरण में बुन्देली बालिकाओं का प्रसिद्द लोकोत्सव मामुलिया अथवा महबुलिया का प्रारम्भ होता है. बुन्देली लोक-कला मामुलिया में लोकमानस की कलात्मकता के दर्शन होते हैं. यह जनभावना तथा लोक कला का अनुपम उदाहरण मन जाता है. बुन्देलखण्ड क्षेत्र में यह खेल अविवाहित अथवा क्वांरी कन्याओं द्वारा खेला जाता है. इसका मुख्य उद्देश्य समाज को यह सन्देश देना होता है कि दुखों में भी प्रसन्नता के साथ जीवन व्यतीत किया जा सकता है. 



मामुलिया खेल में कन्यायें एक कांटेदार टहनी को अलंकृत करने का कार्य करती हैं. इसके लिए सबसे पहले एक कँटीली टहनी की स्थापना की जाती है. इसके बाद उसका अलंकरण किया जाता है. अलंकृत करने के दौरान उस टहनी में जितने भी काँटे होते हैं उन सभी काँटों पर अनेक प्रकार के फूल लगाये जाते हैं. इस तरह के पुष्प अलंकरण से वह कँटीली टहनी का एक फूल भरी शाखा के रूप में दिखाई देने लगती है. मनमोहक फूलों के सज जाने से अपने आपमें एक तरह की सुन्दरता आसपास दिखाई देने लगती है. उस कंटीली शाखा को जिसमें कि फूलों का अलंकरण कर दिया जाता है, उसी को मामुलिया कहते हैं. इसके अंलकरण के समय सभी बालिकायें गीत भी गाती जाती हैं. यह पूरा कार्य हिन्दू महीने के अनुसार आश्विन मास (अंग्रेजी महीनों के अनुसार सितम्बर-अक्टूबर) के कृष्ण पक्ष में साफ़-सुथरे स्थान, जिसे कि गोबर से लीप कर चौक से पूरा जाता है, पर संपन्न किया जाता है. इस स्थान पर मामुलिया की स्थापना या कि उसे प्रतिष्ठित करने के बाद हल्दी, अक्षत, पुष्पादि से उसकी पूजा की जाती है. इस तरह का अनुष्ठान पंद्रह दिन तक चलता है. पंद्रह दिन बाद अमावस की शाम को वे कन्यायें गीत मामुलिया के आये लिबउआ, ठुमक चली मोरी मामुलिया गाती हुईं अपने आसपास की नदी, तालाब आदि तक जाती हैं. यहाँ पर गाते-बजाते हुए उस पुष्पयुक्त शाखा का जल में विसर्जन कर दिया जाता है.

देखा जाये तो मामुलिया का लोकोत्सव अथवा खेल अपने आपमें विशुद्ध दार्शनिकता का समावेश किये हुए है. प्रतीकात्मक रूप में फूलों को सुख और काँटों को दुख माना गया है. इन्हीं से जीवन का निर्माण समझा जाता है. यह एक तरह का दर्शन ही है कि हम अपने जीवन को सजाने का कार्य करते रहते हैं और एक दिन उसको विदा कराने का क्षण आ जाता है. जीवन की इस क्षणभंगुरता को एक खेल के माध्यम से सहजता से बचपन में ही समझा दिया जाता है. इसे महज एक खेल नहीं वरन बुन्देलखण्ड में बचपन से ही संस्कारों, संस्कृति की शिक्षा देने का माध्यम समझा जा सकता है.

27 जुलाई 2019

कहाँ गए सावन के वो झूले


सावन का मौसम अपने आपमें अनेक तरह की रागात्मक क्रियाएं छिपाए रहता है. रक्षाबंधन का पावन पर्व, पेड़ों पर डाले गए झूले, उनमें पेंग भरते हर उम्र के लोग, गीत गाते हुए महिलाओं का झूलों के सहारे आसमान को धरती पर उतार लाने की कोशिश. सामान्य बातचीत में जब भी सावन का जिक्र होता है तो उसके साथ सहज ही झूलों की चर्चा होने लगती है. झूलों की चर्चा होने पर उसके साथ महिलाओं का जुड़ा होना पाया जाता है. ऐसा शायद कोई दृष्टान्त सामने आया हो जबकि सावन के झूलों की बात चल रही हो और उसमें पुरुषों की चर्चा की जा रही हो. ऐसा माना जाता रहा है कि झूला झूलने का काम सिर्फ महिलाओं का है. अब ऐसा मानने वाले लोग भी कम दिखने लगे हैं. इसका कारण स्त्री-पुरुष समानता नहीं वरन झूलों का न के बराबर दिखाई देना है. पहले झूले बहुतायत में दिखाई देते थे. शायद ही कोई बड़ा, घना पेड़ बिना झूले के रहता हो. अब ऐसा कुछ दिखाई नहीं देता. अब ऐसे पेड़ भी बहुत कम दिखते हैं और झूले भी न के बराबर दिखते हैं. हाँ, पार्कों में अवश्य ही ऐसे झूले दिखते हैं. उनमें बच्चों का पेंग भरते देखना सुखद लगता है. भले ही पेड़ की कमी यहाँ दिखती हो मगर झूले का असल स्वाद यहाँ अवश्य ही मिलता है.

बरगद का पेड़ (यही जगह कहलाती है बरगदिया तरे)

हमें अपना बचपन और उसके बाद की स्थिति भली-भांति याद है जबकि खूब झूला झूला जाता था. उस समय जहाँ हम लोग रहते थे वहाँ पर एक बड़ा बरगद का पेड़ हुआ करता था. जिसकी छाँव में हम बच्चे अपनी शरारतें करते और बड़े लोग अपनी चर्चाएँ. उस जगह को बरगदिया तरे कह कर पुकारा जाता था. सभी लोग उस जगह को इसी नाम से आज भी पहचानते हैं. उसी बरगद के पेड़ पर झूला डल जाया करता था फिर क्या दिन क्या रात, क्या सुबह क्या शाम, क्या बच्चे क्या बड़े, क्या महिलाएं क्या पुरुष सभी लोग झूला झूलते नजर आते थे. दो-दो, चार-चार के अलावा कई बार आठ-आठ लोग एकसाथ झूला झूलते नजर आते. किसी दिन खूब मजबूत लम्बा सा बांस लेकर बाँधा जाता और उसी के अनुपात में मोटी रस्सी. बस फिर क्या एक-एक करके झूला झूलने वालों की संख्या बढ़ती रहती, पेंग भी बढ़ती रहती. किसी-किसी दिन डंडे की जगह बड़ा सा तख्ता बाँध दिया जाता. फिर क्या, कुछ लोग एक तरफ मुंह करके बैठते, कुछ लोग दूसरी तरफ मुंह करके. कभी-कभी शरारत का आलम ये रहता कि झूले को बजे झुलाने के, पेंग बढाने के उसी को गोल-गोल घुमाया जाता रहता. जिस-जिस बच्चे को गोल-गोल घूमने से समस्या होती वह चक्कर खाता हुआ इधर से उधर डोलता नजर आता. 


अपने घर के पास के झूले के साथ-साथ ननिहाल में भी झूले का खूब आनंद उठाया है. एक बार का किस्सा तो बहुत अच्छे से याद है जबकि घर के बाहर लगे नीम के पेड़ पर झूला डाला गया. उस झूले में बजे डंडे के चारपाई का इस्तेमाल किया गया. इसका कारण ये कि हमने इच्छा जताई कि लेट कर झूला झूलना है. फिर क्या था, ननिहाल में सबके अत्यंत प्रिय होने के कारण मामा लोगों ने आनन-फानन डंडे की जगह चारपाई बाँध दी. अब लेटे-लेटे झूले का आनंद किया गया. कॉलेज टाइम में भी झूला झूलने का आनंद लिया. मेले में, प्रदर्शनी में आज भी झूला झूलने का आनंद लेते हैं. अब ये बात और है कि ये झूले पेड़ के बजाय जमीन पर खड़े होते हैं और बिजली के सहारे से गोल-गोल चक्कर लगवाते हैं. इन झूलों में रफ़्तार का मजा भले आये मगर न तो पेंग बढ़ाकर आसमान छूने जैसा रोमांच आता है, न ही महिलाओं के लोकगीतों की मधुर स्वर-लहरियाँ सुनाई देती हैं, न ही बच्चों की शरारतें देखने को मिलती हैं. अब तो रफ़्तार, तकनीक के चलते शोर, चीख-पुकार, चिल्ला-चोट ही सुनाई देती है. आज भी आने-जाने के दौरान, घूमने के दौरान कहीं भी पेड़ पर पड़ा झूला दिख जाता है तो बिना झूले मन मानता नहीं है. कभी-कभी इस मन को घर के जाल पर बेटी के लिए लगाए जाते झूले में झूल कर भी समझा लिया जाता है.

27 अगस्त 2018

शौर्य-पराक्रम-बलिदान की प्रतीक है कजली


भुन्जरियों का पावन पर्व कजली बुन्देलखण्ड क्षेत्र में आज भी पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है. बुन्देलखण्ड क्षेत्र, जो विन्ध्य पर्वत श्रेणियों में बसा है, सुरम्य सरोवरों से रचा है, नैसर्गिक सुन्दरता से निखरा है वह सदैव ही अपनी संस्कृति, लोक-तत्त्व, शौर्य, आन-बान-शान के लिए प्रसिद्द रहा है. शौर्य-त्याग-समर्पण-वीरता को यहाँ सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में माना-जाना जाता है. इसके प्रतीक पर्व कजली का आज भी विशेष महत्त्व है. कजली मेला बुन्देलखण्ड क्षेत्र के दो परम वीर भाइयों आल्हा और ऊदल के शौर्य-पराक्रम के साथ-साथ अन्य बुन्देली रण-बाँकुरों की विजय-स्मृतियों को अपने आप में संजोये हुए है. इस मेले का आयोजन विगत आठ सौ से अधिक वर्षों से निरंतर होता आ रहा है. बुन्देलखण्ड में कजली को खेती-किसानी से सम्बद्ध करके भी देखा जाता है. गरमी की लू-लपट से सबकुछ झुलसा देने वाली आग में गर्म-तप्त खेतों को जब सावन की फुहारों से ठंडक मिलती है तो यहाँ का किसान खुद को खेती के लिए तैयार करने लगता है. कजली उत्सव का शुभारम्भ सावन महीने की नौवीं तिथि से ही शुरू हो जाता है. घर की महिलाएँ खेतों से मिट्टी लाकर उसे छौले के दोने (पत्तों का बना पात्र) में भरकर उसमें गेंहू, जौ आदि को बो देती हैं. नित्य उसमें पानी-दूध को चढ़ाकर उसका पूजन किया जाता है, इसके पीछे उन्नत कृषि, उन्नत उपज होने की कामना छिपी रहती है. सावन की पूर्णिमा को इन पात्रों (दोने) में बोये गए बीजों के नन्हें अंकुरण (कजली) को निकालकर इनको तालाब में विसर्जित किया जाता है. इसके बाद इन्हीं कजलियों को आपस में आदरपूर्वक आदान-प्रदान करते हुए एक दूसरे को शुभकामनायें दी जाती हैं तथा उन्नत उपज की कामना भी की जाती है. ये परम्परा आज भी चली आ रही है, बस इसमें शौर्य-गाथा के जुड़ जाने से आज इसका विशेष महत्त्व हो गया है.


ऐतिहासिकता के आधार पर ऐसा कहा जाता है बुन्देलखण्ड के महोबा राज्य पर पृथ्वीराज चौहान की नजर बहुत पहले से लगी हुई थी. महोबा राज्य के विरुद्ध साजिश रचकर कुछ साजिशकर्ताओं ने वहां के अद्भुत वीर भाइयों, आल्हा-ऊदल को महोबा राज्य से निकलवा दिया था. पृथ्वीराज चौहान को भली-भांति ज्ञात था कि महोबा के पराक्रमी आल्हा और ऊदल की कमी में महोबा को जीतना जीतना आसान होगा. महोबा के राजा परमाल की पुत्री चंद्रावलि अपनी हजारों सहेलियों और महोबा की अन्य दूसरी महिलाओं के साथ प्रतिवर्ष कीरत सागर तालाब में कजलियों का विसर्जन करने जाया करती थी. सन 1182 में दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान ने राजकुमारी के अपहरण की योजना बनाई और तय किया गया कि कजलियों के विसर्जन के समय ही आक्रमण करके राजकुमारी का अपहरण कर लिया जाये. अपनी विजय को सुनिश्चित करने और राजकुमारी के अपहरण के लिए उसके सेनापति चामुंडा राय और पृथ्वीराज चौहान के पुत्र सूरज सिंह ने महोबा को घेर लिया. जिस समय ये घेरेबंदी हुई उस समय आल्हा-ऊदल कन्नौज में थे.


महोबा राजा सहित सबको इसका एहसास था कि बिना आल्हा-ऊदल पृथ्वीराज चौहान की सेना को हरा पाना मुश्किल होगा. राजा परमाल खुद ही आल्हा-ऊदल को राज्य छोड़ने का आदेश दे चुके थे, ऐसे में उनके लिए कुछ कहने-सुनने की स्थिति थी ही नहीं. ऐसे विषम समय में महोबा की रानी मल्हना ने आल्हा-ऊदल को महोबा की रक्षा करने के लिए तुरंत वापस आने का सन्देश भिजवाया. सूचना मिलते ही आल्हा-ऊदल अपने चचेरे भाई मलखान के साथ महोबा पहुँच गए. परमाल के पुत्र रंजीत के नेतृत्व में पृथ्वीराज की सेना पर आक्रमण कर दिया गया. इस युद्ध की सूचना मिलते ही राजकुमारी चंद्रावलि का ममेरा भाई अभई (रानी मल्हना के भाई माहिल का पुत्र) उरई से अपने बहादुर साथियों के साथ महोबा पहुँच गया. लगभग 24 घंटे चले इस भीषण युद्ध में आल्हा-ऊदल के अद्भुत पराक्रम, वीर अभई के शौर्य के चलते पृथ्वीराज चौहान की सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा. सेना रणभूमि से भाग गई. इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान का पुत्र सूरज सिंह भी मारा गया. इसके अलावा राजा परमाल का पुत्र रंजीत सिंह और वीर अभई भी वीरगति को प्राप्त हुए. ऐसी किंवदंती है कि वीर अभई सिर कटने के बाद भी कई घंटों युद्ध लड़ता रहा था. कहा जाता है कि इसी युद्ध में पृथ्वीराज चौहान ने ऊदल की हत्या छलपूर्वक कर दी थी. जिसके बाद आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान को मारने की शपथ ली किन्तु बाद में अपने गुरु की आज्ञा मानकर संन्यास ग्रहण कर जंगल में तपस्या के लिए चले गए थे.

ऐतिहासिक विजय को प्राप्त करने के बाद राजकुमारी चंद्रावलि और उसकी सहेलियों के साथ-साथ राजा परमाल की पत्नी रानी मल्हना ने, महोबा की अन्य महिलाओं ने भी भुजरियों (कजली) का विसर्जन किया. इसी के बाद पूरे महोबा में रक्षाबंधन का पर्व धूमधाम से मनाया गया. तब से ऐसी परम्परा चली आ रही है कि बुन्देलखण्ड में रक्षाबंधन का पर्व भुजरियों का विसर्जन करने के बाद ही मनाया जाता है. वीर बुंदेलों के शौर्य को याद रखने के लिए ही कहीं-कहीं सात दिनों तक कजली का मेला आयोजित किया जाता है. यहाँ के लोग आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम को नमन करते हुए बुन्देलखण्ड के वीर रण-बाँकुरों को याद करते हैं.


03 अक्टूबर 2017

बुन्देलखण्ड लोकोत्सव है टेसू-झिंझिया

बुन्देलखण्ड क्षेत्र सदैव से पर्वों-त्योहारों से सराबोर रहा है. यहाँ भांति-भांति के अनुष्ठान आये दिन संपन्न होते रहते हैं. मेलों, पर्वों, त्योहारों से यहाँ की संस्कृति के दर्शन भी भली-भांति होते रहते हैं. इसी तरह के आयोजनों में टेसू-झिंझिया का विवाह भी शामिल है. इस आयोजन में किशोर वय के युवक-युवतियाँ भाग लेते हैं और बड़े ही उत्साह के साथ इसे संपन्न करते हैं. आश्विन माह में मनाये जाने वाले इस त्यौहार में युवक और युवतियाँ अपने-अपने अलग-अलग समूह बनाकर उत्सव मनाते हैं और फिर शरद पूर्णिमा को, जिसे बुन्देलखण्ड में टिसुआरी पूनों के नाम से जाना जाता है, दोनों समूह मिलकर टेसू और झिंझिया का विवाह रचाते हैं.

टेसू
इस उत्सव को आश्विन माह में मनाया जाता है. इसे किशोर वय के युवकों द्वारा मनाया जाता है. इसमें बांस की खपच्चियों के ढाँचे को चमकीले कागज से सजाकर पुरुष आकृति बनाते हैं जिसे टेसू कहा जाता है. इस पुतले को राजसी वस्त्रावरण प्रदान किया जाता है. तीर-कमान, तलवार-ढाल आदि के अलावा सर पर मुकुट या साफा बंधा होता है जो टेसू के राजा होने का संकेत करता है. ऐसी किंवदंती है कि टेसू महाभारत काल के बब्रुवाहन का प्रतीक है जिसे मरणोपरांत शमी वृक्ष पर रखे अपने सिर के द्वारा महाभारत युद्ध देखने का वरदान मिला हुआ था. बाँस की तीन खपच्चियों का ढाँचा उसी शमी वृक्ष का और सिर बब्रुवाहन का प्रतीक समझा जाता है.

टेसू के रूप में सजे पुतले को लेकर युवा घर-घर, बाजार-बाजार जाते हैं और गीत गाकर उसके बदले में अनाज या कुछ धन की माँग करते हैं. इनके द्वारा गाये गीत के माध्यम से पता चलता है कि टेसू वीर योद्धा था. टेसू आये बानवीर, हाथ लिए सोने का तीर. एक तीर से मार दिया, राजा से व्यवहार किया  गाते हुए लड़के शरद पूर्णिमा की रात्रि तक कुछ न कुछ माँगते/एकत्र करते रहते हैं. बालकों द्वारा बड़े ही विनोदात्मक तरीके से गीतों को गया जाता है जिससे उनके इस उत्सव में एक तरह की रोचकता बनी रहती है. कई बार तो लड़के आशु कवित्व के रूप में कुछ भी उलटे-पुल्टे शब्दों को जोड़कर गायन करते रहते हैं. किसी घर, दुकान आदि से कुछ भी न मिलने पर इनके द्वारा टेसू अगड़ करें, टेसू बगड़ करें. टेसू लैई के टरें या फिर टेसू मेरा यहीं खड़ा, खाने को मांगे दही-बड़ा. दही-बड़ा में पहिया, टेसू मांगे दस रुपईया आदि गाकर मनोरंजक रूप में कुछ न कुछ प्राप्त कर लिया जाता है. बाद में शरद पूर्णिमा की रात को इन्हीं लड़कों द्वारा बड़ी ही धूमधाम से टेसू की बारात निकाली जाती है.

झिंझिया
यह उत्सव बुन्देलखण्ड की किशोरियों द्वारा मनाया जाता है. ये भी आश्विन माह में मनाया जाने वाला उत्सव है. इसमें मिट्टी के छोटे से घड़े में अनेक छेद होते हैं. इस मटकी की में कुछ अनाज रखकर उसमें जलता हुआ दीपक रख दिया जाता है. छेदों से बाहर निकलती दीपक की रौशनी अत्यंत मनमोहक लगती है. बालिकाएँ इस जगमगाती मटकी को अपने सिर पर रखकर समूह में घर-घर जाकर नेग स्वरूप कुछ न कुछ माँगती हैं. ये किशोरियाँ भी झिंझिया गीत गाती हैं, नृत्य करती हैं और ये भी शरद पूर्णिमा को संचित धन से झिंझिया का विवाह टेसू से संपन्न करवाती हैं.

शरद पूर्णिमा की रात्रि को टेसू-झिंझिया विवाह के समय बालिकाएँ सामूहिक रूप से नृत्य करती हैं. इस नृत्य की प्रकृति बहुत कुछ गुजरात के गरबा नृत्य के जैसी होती है. झिंझिया-नृत्य में बालिकाएँ गोलाकार खड़ी हो जाती हैं और केंद्र में एक बालिका नृत्य करती है. वृत्ताकार खड़ी बालिकाएँ तालियों की थाप के द्वारा नृत्य को गति प्रदान करती हैं. इसमें सभी बालिकाओं को बारी-बारी से एक-एक करके केंद्र में आकर नृत्य करना होता है. इस नृत्य की विशेष बात ये होती है कि केंद्र में नृत्य करती बालिका अपने सिर पर रखी हुई झिंझिया का संतुलन बनाये रहती है. यह नृत्य टेसू-झिंझिया विवाह के समय बालिकाओं में प्रसन्नता को दर्शाता है.

टेसू-झिंझिया विवाह से एक किंवदंती और भी जुड़ी हुई है कि सुआटा नामक एक राक्षस कुंवारी कन्याओं को परेशान करता था, उनका अपहरण कर लेता था और जबरन अपनी पूजा करवाता था. उसी राक्षस ने झिंझिया नामक राजकुमारी को भी बंदी बना लिया था. टेसू नामक राजकुमार ने शरद पूर्णिमा को ही सुआटा राक्षस का वध करके झिंझिया को मुक्त करवाया तथा उससे विवाह रचाया था. बुन्देलखण्ड में बालिकाएँ किसी दीवार पर गोबर से सुआटा राक्षस की आकृति बनाती हैं जिसका वध टेसू द्वारा किया जाता है और तत्पश्चात टेसू और झिंझिया का विवाह संपन्न होता है.


आधुनिकता के इस दौर में आज भले ही इस उत्सव को व्यापकता से न मनाया जा रहा हो किन्तु बुन्देलखण्ड की आंचलिकता में अभी भी इसके प्रति उत्साह देखने को मिलता है. छोटे-छोटे कस्बों, गाँवों में युवकों-युवतियों में इसके प्रति रुझान देखने को मिलता है. इस कारण ही लुप्त हो चुके अनेक पर्वों, त्योहारों के मध्य टेसू-झिंझिया का विवाह आज भी अपने आपको जीवित रखे हुए है. लोक-कलाओं, लोक-पर्वों, लोक-उत्सवों, लोक-साहित्य, लोक-गीतों के सम्वर्धन के लिए आवश्यक है कि लुप्त होती लोक-कलाओं का, लोक-पर्वों का, लोक-उत्सवों का, लोक-साहित्य का, लोक-गीतों का संरक्षण किया जाये. उनको लोकप्रियता प्रदान की जाये. 

09 अगस्त 2017

बुन्देलखण्ड का लोकपर्व - कजली

बुन्देलखण्ड क्षेत्र में आज भी भुन्जरियों का पावन पर्व कजली पूरे उत्साह और श्रद्धा से मनाया जाता है. विन्ध्य पर्वत श्रेणियों में बसा, सुरम्य सरोवरों से रचा, नैसर्गिक सुन्दरता से निखरा बुन्देलखण्ड क्षेत्र सदैव से अपनी ऐतिहासिकता, संस्कृति, लोक-तत्त्व, शौर्य-ओज, आन-बान-शान की अद्भुत छटा के लिए प्रसिद्द रहा है. यहाँ की लोक-परम्परा में शौर्य-त्याग-समर्पण-वीरता के प्रतीक मने जाने वाले कजली का विशेष महत्त्व है. इस क्षेत्र के परम वीर भाइयों, आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम के साथ-साथ अन्य बुन्देली रण-बाँकुरों की विजय-स्मृतियों को अपने आपमें संजोये हुए कजली मेले का आयोजन आठ सौ से अधिक वर्षों से निरंतर होता आ रहा है. किसी समय में बुन्देलखण्ड में कजली को खेती-किसानी से सम्बद्ध करके देखा जाता था. ग्रीष्म की लू-लपट से अपने आपको झुलसा देने वाली गरमी से गर्म-तप्त खेतों को जब सावन की फुहारों से ठंडक मिलती थी तो यहाँ का किसान अपने आपको खेती के लिए तैयार करने लगता था. सावन महीने की नौवीं से ही इसका अनुष्ठान शुरू हो जाता था. घर-परिवार की महिलाएँ खेतों से मिट्टी लाकर उसे छौले के दोने (पत्तों का बना पात्र) में भरकर उसमें गेंहू, जौ आदि को बो देती थी. नित्य उसमें पानी-दूध को चढ़ाकर उसका पूजन किया जाता था, इसके पीछे उन्नत कृषि, उन्नत उपज होने की कामना छिपी रहती थी. सावन की पूर्णिमा को इन पात्रों (दोने) में बोये गए बीजों के नन्हें अंकुरण (कजली) को निकालकर दोनों को तालाब में विसर्जन किया जाता था. बाद में इन्हीं कजलियों का आपस में आदरपूर्वक आदान-प्रदान करके एक दूसरे को शुभकामनायें देते हुए उन्नत उपज की कामना भी की जाती थी. ये परम्परा आज भी चली आ रही है, बस इसमें शौर्य-गाथा के जुड़ जाने से आज इसका विशेष महत्त्व हो गया है.


बुन्देलखण्ड के महोबा राज्य पर पृथ्वीराज चौहान की नजर बहुत पहले से लगी हुई थी. महोबा राज्य के विरुद्ध साजिश रचकर कुछ साजिशकर्ताओं ने वहां के अद्भुत वीर भाइयों, आल्हा-ऊदल को महोबा राज्य से निकलवा दिया था. पृथ्वीराज चौहान को भली-भांति ज्ञात था कि महोबा के पराक्रमी आल्हा और ऊदल की कमी में महोबा को जीतना जीतना आसान होगा. महोबा के राजा परमाल की पुत्री चंद्रावलि अपनी हजारों सहेलियों और महोबा की अन्य दूसरी महिलाओं के साथ प्रतिवर्ष कीरत सागर तालाब में कजलियों का विसर्जन करने जाया करती थी. सन 1182 में दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान ने राजकुमारी के अपहरण की योजना बनाई और तय किया गया कि कजलियों के विसर्जन के समय ही आक्रमण करके राजकुमारी का अपहरण कर लिया जाये. अपनी विजय को सुनिश्चित करने और राजकुमारी के अपहरण के लिए उसके सेनापति चामुंडा राय और पृथ्वीराज चौहान के पुत्र सूरज सिंह ने महोबा को घेर लिया. जिस समय ये घेरेबंदी हुई उस समय आल्हा-ऊदल कन्नौज में थे.
महोबा राजा सहित सबको इसका एहसास था कि बिना आल्हा-ऊदल पृथ्वीराज चौहान की सेना को हरा पाना मुश्किल होगा. राजा परमाल खुद ही आल्हा-ऊदल को राज्य छोड़ने का आदेश दे चुके थे, ऐसे में उनके लिए कुछ कहने-सुनने की स्थिति थी ही नहीं. ऐसे विषम समय में महोबा की रानी मल्हना ने आल्हा-ऊदल को महोबा की रक्षा करने के लिए तुरंत वापस आने का सन्देश भिजवाया. सूचना मिलते ही आल्हा-ऊदल अपने चचेरे भाई मलखान के साथ महोबा पहुँच गए. परमाल के पुत्र रंजीत के नेतृत्व में पृथ्वीराज की सेना पर आक्रमण कर दिया गया. इस युद्ध की सूचना मिलते ही राजकुमारी चंद्रावलि का ममेरा भाई अभई (रानी मल्हना के भाई माहिल का पुत्र) उरई से अपने बहादुर साथियों के साथ महोबा पहुँच गया.

लगभग 24 घंटे चले इस भीषण युद्ध में आल्हा-ऊदल के अद्भुत पराक्रम, वीर अभई के शौर्य के चलते पृथ्वीराज चौहान की सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा. सेना रणभूमि से भाग गई. इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान का पुत्र सूरज सिंह भी मारा गया. इसके अलावा राजा परमाल का पुत्र रंजीत सिंह और वीर अभई भी वीरगति को प्राप्त हुए. ऐसी किंवदंती है कि वीर अभई सिर कटने के बाद भी कई घंटों युद्ध लड़ता रहा था. कहा जाता है कि इसी युद्ध में पृथ्वीराज चौहान ने ऊदल की हत्या छलपूर्वक कर दी थी. जिसके बाद आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान को मारने की शपथ ली किन्तु बाद में अपने गुरु की आज्ञा मानकर संन्यास ग्रहण कर जंगल में तपस्या के लिए चले गए थे.


ऐतिहासिक विजय को प्राप्त करने के बाद राजकुमारी चंद्रावलि और उसकी सहेलियों के साथ-साथ राजा परमाल की पत्नी रानी मल्हना ने, महोबा की अन्य महिलाओं ने भी भुजरियों (कजली) का विसर्जन किया. इसी के बाद पूरे महोबा में रक्षाबंधन का पर्व धूमधाम से मनाया गया. तब से ऐसी परम्परा चली आ रही है कि बुन्देलखण्ड में रक्षाबंधन का पर्व भुजरियों का विसर्जन करने के बाद ही मनाया जाता है. वीर बुंदेलों के शौर्य को याद रखने के लिए ही कहीं-कहीं सात दिनों तक कजली का मेला आयोजित किया जाता है. यहाँ के लोग आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम को नमन करते हुए बुन्देलखण्ड के वीर रण-बाँकुरों को याद करते हैं. 

19 अगस्त 2016

कजली महोत्सव से जुडी शौर्यगाथा

विन्ध्य पर्वत श्रणियों के बीच बसे, सुरम्य सरोवरों से रचे-बसे, नैसर्गिक सुन्दरता से निखरे बुन्देलखण्ड में ऐतिहासिकता, संस्कृति, लोक-तत्त्व, शौर्य-ओज, आन-बाण-शान की अद्भुत छटा के दर्शन होते ही रहते हैं. यहाँ की लोक-परम्परा में कजली का अपना ही विशेष महत्त्व है. महोबा के राजा परमाल के शासन में आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम के साथ-साथ अन्य बुन्देली रण-बाँकुरों की विजय की स्मृतियों को संजोये रखने के लिए कजली मेले का आयोजन आठ सौ से अधिक वर्षों से निरंतर होता आ रहा है. किसी समय में बुन्देलखण्ड में कजली लोक-पर्व को खेती-किसानी से सम्बद्ध करके देखा जाता था. जब यहाँ के गर्म-तप्त खेतों को सावन की फुहारों से ठंडक मिल जाती थी तो किसान वर्ग अपने आपको खेती के लिए तैयार करने लगता था. सावन के महीने की नौवीं से ही इसका अनुष्ठान शुरू हो जाता था. घर-परिवार की महिलाएँ खेतों से मिट्टी लाकर उसे छौले के दोने (पत्तों का बना पात्र) में भरकर उसमें गेंहू, जौ आदि को बो देती थी. नित्य उसमें पानी-दूध को चढ़ाकर उसका पूजन किया जाता था, इसके पीछे उन्नत कृषि, उन्नत उपज होने की कामना छिपी रहती थी. सावन की पूर्णिमा को इन पात्रों (दोने) में बोये गए बीजों के नन्हें अंकुरण (कजली) को निकालकर दोनों को तालाब में विसर्जन किया जाता था. बाद में इन्हीं कजलियों का आपस में आदरपूर्वक आदान-प्रदान करके एक दूसरे को शुभकामनायें देते हुए उन्नत उपज की कामना भी की जाती थी. ये परम्परा आज भी चली आ रही है, बस इसमें शौर्य-गाथा के जुड़ जाने से आज इसका विशेष महत्त्व हो गया है. 


 महोबा के राजा परमाल की पुत्री चंद्रावलि अपनी हजारों सहेलियों और महोबा की अन्य दूसरी महिलाओं के साथ प्रतिवर्ष कीरत सागर तालाब में कजलियों को सिराने (विसर्जन करने) जाया करती थी. सन ११८२ में दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान ने राजकुमारी के अपहरण की योजना बनाई और तय किया गया कि कजलियों के विसर्जन के समय ही आक्रमण करके राजकुमारी का अपहरण कर लिया जाये. पृथ्वीराज चौहान को भली-भांति ज्ञात था कि महोबा के पराक्रमी आल्हा और ऊदल एक साजिश का शिकार होकर महोबा से निकाले जा चुके हैं और महोबा को उनकी कमी में जीतना आसान होगा. अपनी विजय को सुनिश्चित करने और राजकुमारी के अपहरण के लिए उसके सेनापति चामुंडा राय और पृथ्वीराज चौहान के पुत्र सूरज सिंह ने महोबा को घेर लिया. उस समय महोबा शासन के वीर-बाँकुरे आल्हा और ऊदल कन्नौज में थे. रानी मल्हना ने उनको महोबा की रक्षा करने के लिए तुरंत वापस आने का सन्देश भिजवाया. सूचना मिलते ही आल्हा-ऊदल अपने चचेरे भाई मलखान के साथ महोबा पहुँच गए. परमाल के पुत्र रंजीत के नेतृत्व में पृथ्वीराज की सेना पर आक्रमण कर दिया गया. इस युद्ध की सूचना मिलते ही राजकुमारी चंद्रावलि का ममेरा भाई अभई (रानी मल्हना के भाई माहिल का पुत्र) उरई से अपने बहादुर साथियों के साथ महोबा पहुँच गया. लगभग २४ घंटे चले इस भीषण युद्ध में आल्हा-ऊदल के अद्भुत पराक्रम, वीर अभई के शौर्य के चलते पृथ्वीराज चौहान की सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा. सेना रणभूमि से भाग गई, इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान का पुत्र सूरज सिंह भी मारा गया. इसके अलावा राजा परमाल का पुत्र रंजीत सिंह और वीर अभई भी वीरगति को प्राप्त हुए. ऐसी किंवदंती है कि वीर अभई सिर कटने के बाद भी कई घंटों युद्ध लड़ता रहा था.

ऐतिहासिक विजय को प्राप्त करने के बाद राजकुमारी चंद्रावलि और उसकी सहेलियों के साथ-साथ राजा परमाल की पत्नी रानी मल्हना ने, महोबा की अन्य महिलाओं ने भी भुजरियों (कजली) का विसर्जन किया. इसी के बाद पूरे महोबा में रक्षाबंधन का पर्व धूमधाम से मनाया गया. तब से ऐसी परम्परा चली आ रही है कि बुन्देलखण्ड में रक्षाबंधन का पर्व भुजरियों का विसर्जन करने के बाद ही मनाया जाता है. इसी कारण से आज भी इस क्षेत्र में बहिनें रक्षाबंधन पर्व के एक दिन बाद भाइयों की कलाई में राखी बाँधती हैं. वीर बुंदेलों के शौर्य को याद रखने के लिए ही कहीं-कहीं सात दिनों तक कजली का मेला आयोजित किया जाता है. यहाँ के लोग आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम को नमन करते हुए बुन्देलखण्ड के वीर रण-बाँकुरों को याद करते हैं.


20 अक्टूबर 2015

विलुप्त होता बुन्देली लोकोत्सव : टेसू-झिंझिया

बुन्देलखण्ड क्षेत्र अपने आन-बान-शान के लिए जितना प्रसिद्द है उतनी ही प्रसिद्धि उसको यहाँ की लोकसंस्कृति के कारण प्राप्त है. यहाँ की लोककलाओं, लोकपर्वों, लोकविधाओं आदि में अनेकानेक गतिविधियाँ संचालित होती हैं. लोक को अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानने के कारण ही यहाँ जन्मे लाला हरदौल अपने व्यक्तित्व, कृतित्व के कारण लोकदेवता के रूप में प्रतिष्ठित हैं. लोक को महत्त्व देने के कारण ही यहाँ मामुलिया, टेसू, झिंझिया, नौरता, सुआटा आदि के साथ-साथ अन्य कई लोकपर्वों का आयोजन होता रहता है. इसी लोक परम्परा में टेसू भी शामिल है जो किसी एक वीर पुरुष को परिभाषित करता है. इस वीर पुरुष को याद करते हुए एक गीत गाया जाता है जिसे स्थानीय भाषा में टेसू गीत कहा जाता है. हालाँकि टेसू के बारे में प्रमाणिक रूप से किसी धर्मग्रन्थ में अथवा किसी ऐतिहासिक ग्रन्थ में उल्लेख नहीं मिलता है. वाचिक परंपरा के कारण टेसू एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होता आ रहा है.  

             भारतीय संस्कृति की अपनी विशेषता ये रही है कि यहाँ धार्मिक आयोजनों, अनुष्ठानों के द्वारा किसी न किसी तरह की सीख सबको देने का प्रयास किया जाता है. लोक संस्कृति में भी इसी तरह के संस्कार देखने को मिलते हैं. बुन्देलखण्ड क्षेत्र में आयोजित किये जाने वाला टेसू लोकपर्व हो, झिंझिया हो, सुआटा हो अथवा मामुलिया, सभी में बच्चों की सहभागिता रहती है. ऐसे आयोजनों के द्वारा बच्चों में सहयोग की भावना का विकास होता है, समन्वय की भावना जन्मती है और खेल-खेल में अपनी लोक संस्कृति को जानने-समझने का अवसर भी मिलता है. टेसू, झिंझिया, सुआटा, नौरता, मामुलिया आदि का आयोजन की अपनी ही विशेषता है. ये सारे लोक आयोजन एक-दूसरे से सम्बद्ध हैं, जो लगभग एक माह तक आयोजित होते रहते हैं. ये आयोजन भाद्रपद पूर्णिमा से अश्विन पूर्णिमा , जिसे शारदीय पूर्णिमा भी कहा जाता है, तक पाँच चरणों में संपन्न किया जाता है. बुन्देलखण्ड में किशोर-किशोरियों द्वारा इस क्रियात्मक विधान का अपना महत्त्व माना जाता है. मामुलिया से आरम्भ होकर ये आयोजन  नौरता, टेसू, झिंझिया से गुजरता हुआ अंत में टेसू द्वारा सुआटा को मारकर झिंझिया से विवाह करने पर समाप्त होता है.

मामुलिया किशोरियों का खेल है जिसे भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर कृष्ण आमावस्या तक खेला जाता है. इस लोक आयोजन को दो भागों में किशोरियों, लड़कियों द्वारा पूरा किया जाता है. उनके द्वारा किसी दीवार पर पूर्वाभिमुख किये हुए एक आयाताकार आलेख बनाया जाता है. इसको बाहरी साज-सज्जा के साथ अंदर ऊपर की ओर दोनों कोने में सूर्य तथा चन्द्र द्वारा अलंकृत किया जाता है. सांयकाल किशोरी बालिकायें झुण्ड बनाकर एकत्र होती हैं और किसी काँटेदार टहनी को फूलों से सजा गीत गाती हुई गली-गली घूमती हैं. इसी टहनी को मामुलिया कहा जाता है, जिसे सूर्यास्त के बाद किसी जलाशय में विसर्जित कर दिया जाता है. ऐसा करने के बाद बालिकाएँ स्व-निर्मित आयताकार आलेख के पास एकत्र होती हैं. इस आलेख पर गोबर की थाप्पियाँ चिपकाना, लोकगीत, भजन आदि गाना इन लड़कियों द्वारा किया जाता है. ऐसा प्रतिदिन किया जाता है.

इसके बाद आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से अष्टमी तक नवरात्रि के आयोजन में एक खेल नौरता का आयोजन किया जाता है. इसके अंतर्गत सुआटा नामक राक्षस की प्रतिमा को गोबर से बनाया जाता है. इस प्रतिमा को रंगों, कौड़ियों आदि से अलंकृत किया जाता है. बुन्देलखण्ड क्षेत्र में ऐसी किंवदन्ती है कि यही सुआटा राक्षस लड़कियों, किशोरियों को परेशान करता था. इसी के द्वारा झिंझिया राजकुमारी का अपहरण कर लिया गया था. बाद में वीर राजकुमार टेसू सुआटा को मार डालता है तथा झिंझिया को मुक्त कर उससे विवाह करता है. इसी के साथ मान्यता है कि सुआटा को अविवाहित बालिकाओं द्वारा खेला जाता है और जो लडकियाँ इसे खेलती है उन्हें विवाहोपरान्त इससे मुक्ति लेनी होती है. इसके लिए भी एक लोक आयोजन संपन्न किया जाता है. इसमें विवाह के बाद सर्वप्रथम पड़ने वाले इस लोकपर्व में नवमी के दिन सुआटा उजाया जाता है.

इस लोक आयोजन में मामुलिया, सुआटा के पश्चात टेसू और झिंझिया का खेल होता है. टेसू आश्विन शुक्ल अष्टमी से शरद पूर्णिमा तक तथा नवमी से चतुर्दशी तक झिंझिया खेली जाती है. टेसू का खेल बालकों द्वारा तथा झिंझिया का खेल बालिकाओं द्वारा खेला जाता है. टेसू बाँस की तीन डंडियों से बना एक ढाँचा होता है, जिसे रंग-बिरंगे कागजों से ढँक दिया जाता है, सिर पर मुकुट और हाथ में ढाल-तलवार से इसको सजाया जाता है.  टेसू के खेल में लड़के उस रंग-बिरंगे ढाँचे को लेकर घर-घर जाते हैं और टेसू-गीत गाते हुए धन की माँग करते हैं. बालकों द्वारा गाये जाने वाले ये गीत विनोदी होते हैं और कई बार महज तुकबंदी के रूप में प्रयुक्त होते हैं. अनर्थक, देशज शब्दों का प्रयोग कर इन बालकों का उद्देश्य गीत को लय देना और हास्य प्रदान करके धन की प्राप्ति करना होता है.
मेरा टेसू यहीं अड़ा, खाने को माँगे दही बड़ा,
दही बड़े में पन्नी, टेसू माँगे अठन्नी.
इस तरह से अनेक निरर्थक बातों-गीतों के द्वारा बालकों का टेसू आयोजन चलता रहता है.

लड़कियों द्वारा झिंझिया के स्वरूप हेतु मिट्टी का छोटा घड़ा लिया जाता है, जिसमें अनेक छेद किये जाते हैं. इसके अंदर अनाज तथा उसके ऊपर जलता दीपक रख दिया जाता है. इसे ही झिंझिया कहा जाता है. इसमें बालिकाएँ ‘झांझी से झांझी तेरो ब्याह रचाओं’ गीत गाती हुई नृत्य भी करती हैं. झिंझिया-नृत्य में बालिकाएँ गोलाकार खड़ी हो जाती हैं और केंद्र में एक बालिका नृत्य करती है. वृत्ताकार खड़ी बालिकाएँ तालियों की थाप के द्वारा नृत्य को गति प्रदान करती हैं. इसमें सभी बालिकाओं को बारी-बारी से एक-एक करके केंद्र में आकर नृत्य करना होता है. इस नृत्य की विशेष बात ये होती है कि केंद्र में नृत्य करती बालिका अपने सिर पर रखी हुई झिंझिया का संतुलन बनाये रहती है. यह नृत्य टेसू-झिंझिया विवाह के समय भी होता है जो बालिकाओं की प्रसन्नता को दर्शाता है. इस घड़े को लेकर किशोरियों द्वारा घर-घर जाकर दानस्वरूप धन अथवा या अनाज की माँग करती हैं. कई जगह बालिकाएँ अन्य गीत गाते हुए दान चाहती हैं-


इस लोक आयोजन के अंत में शारदीय पूर्णिमा को टेसू और झिंझिया का विवाह संपन्न होता है. उससे पहले लड़कियों द्वारा पूर्वाभिमुख दीवार पर बनाये आलेख और सुआटा राक्षस की प्रतिमा को बालकों द्वारा खंडित किया जाता है. उसके अंग-प्रत्यंगों को निकाल कर इधर-उधर फेंक दिया जाता है, जो इस बात का सूचक होता है कि टेसू वीर द्वारा सुआटा राक्षस का अंत कर झिंझिया को मुक्त करा लिया गया है. इसके पश्चात पूरे धूमधाम से लड़के-लडकियाँ मिलकर टेसू और झिंझिया का विवाह करवाते हैं. इस लोक आयोजन में विशेष बात ये होती है कि इसमें अमीर-गरीब का भेद नहीं होता है. इस खेल में सभी घरों के लड़के-लडकियाँ शामिल होकर एकसाथ खेलते हैं और धन या अनाज माँगने की प्रक्रिया किसी तरह की भिक्षा न होकर अधिकार जैसा होता है. बुन्देलखण्ड के ग्रामीण अंचलों और छोटे कस्बों में आज भी ये लोक आयोजन पूरे उत्साह, धूमधाम से मनाया जाता है. हालाँकि वर्तमान में ऐसे आयोजनों को नगरों में स्वीकार्यता नहीं मिल पा रही है. सामाजिक सौहार्द्र बिगड़ने, आपस में अविश्वास बढ़ने, भेदभाव का माहौल बनने के कारण अब ऐसे आयोजनों में बालक-बालिकाओं को शामिल होने से रोका जाता है. अपनी संस्कृति को सुरक्षित, संवर्धित करने के लिए आवश्यक है कि नई पीढ़ी को इसकी जानकारी दी जाए और इसके आयोजन के लिए सक्रिय किया जाये, प्रोत्साहित किया जाये. यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो भविष्य में अनेक बुन्देली लोक कलाएँ विलुप्त होकर महज इतिहास बन जाएँगी. 
.