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20 फ़रवरी 2025

दिल्ली मुख्यमंत्री शपथ ग्रहण में आम आदमी पार्टी की अनुपस्थिति

आज, 20 फरवरी 2025 को दिल्ली विधानसभा के नव-निर्वाचित मुख्यमंत्री का शपथ ग्रहण समारोह रामलीला मैदान में आयोजित किया गया. पिछले 26 सालों से विपक्षी गलियारे में टहलने वाली भाजपा को उसकी मेहनत और विचारधारा के कारण दिल्ली के मतदाताओं ने इस बार बहुमत के साथ सरकार बनाने का अवसर दिया. भाजपा की तरफ से पहली बार विधायक बनी रेखा गुप्ता ने मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की. इससे पहले वर्ष 2013 के विधानसभा चुनावों में भाजपा कुछ सीटों के अंतर से सरकार बनाने से चूक गई थी. इसी मौके का फायदा उठाकर कांग्रेस ने अन्ना आन्दोलन के दौरान रहे उसके धुर विरोधी आम आदमी पार्टी, अरविन्द केजरीवाल टीम को समर्थन देकर सरकार बनाने का अवसर दे दिया था. इस अवसर का फायदा उठाते हुए आम आदमी पार्टी ने अगले दो चुनावों में प्रचंड बहुमत से सरकार तो बनाई मगर दिल्ली के मतदाताओं के दिल में प्रचंड रूप में अपना स्थान नहीं बना सके.

 



तमाम सारी मुफ्त की योजनाओं, विरोधी दलों पर आरोपों की बौछारों, स्वयं को एकमात्र ईमानदार सिद्ध करने की मानसिकता के बाद भी इस वर्ष के चुनावों में मतदाताओं ने आम आदमी पार्टी को नकारते हुए भाजपा को सरकार बनाने का मौका दिया. आम आदमी पार्टी या कहें कि केजरीवाल के पिछले कार्यकाल जिस तरह से गुजरे उसके अनुसार वे केन्द्र सरकार के प्रताड़ित व्यक्ति जैसे खुद को साबित करने की कोशिश में लगे रहे. अनाप-शनाप बयानबाजी, अनर्गल आरोपों के चलते उनकी और पार्टी की छवि लगातार गिरती रही. ये गिरावट आज मुख्यमंत्री शपथ ग्रहण समारोह के दौरान भी देखने को मिली. आम आदमी पार्टी, अरविन्द केजरीवाल की तरफ से कोई भी इस समारोह में उपथित न हुआ. देखा जाये तो यह राजनैतिक गरिमा की निम्नतम गिरावट है. इससे पूर्व किसी भी शपथ ग्रहण समारोह में विपक्षी दलों के नेताओं का, पूर्व मुख्यमंत्रियों का उपस्थित रहना हुआ करता था.

 

आज की हरकत एक तरह से आम आदमी पार्टी का, अरविन्द केजरीवाल एंड फ्रेंड्स कंपनी का भविष्य भी तय करती सी दिख रही है. लोकतान्त्रिक मूल्यों में, विषयों में जितना महत्त्वपूर्ण कोई नेता होता है, उतना ही महत्त्वपूर्ण एक-एक मतदाता भी होता है. आज की हरकत से कम से कम वे लोग जो वाकई में राजनीति में शुचिता, ईमानदारी, गरिमा आदि देखना पसंद करते हैं, आम आदमी पार्टी से दूर होने की राह चल दिए होंगे. बाकी तो पिछला इतिहास ही आम आदमी पार्टी की कहानी लिखेगा.


08 फ़रवरी 2025

नकारात्मक कार्य-शैली का नतीजा आप की हार

सत्ताईस बरसों तक विपक्षी गलियारे में टहलते रहने के बाद भाजपा को दिल्ली विधानसभा का सत्ता सुख प्राप्त हो गया. 70 सीटों वाली दिल्ली में भाजपा ने 48 सीटों के साथ बहुमत हासिल किया जबकि पिछले बारह सालों से सरकार चला रही आम आदमी पार्टी 22 सीटों में ही सिमट गई. आम आदमी पार्टी का इतनी कम सीटों में सिमट जाना संख्यात्मक रूप से इस कारण आश्चर्यजनक लग रहा है कि अपने पहले चुनाव में ही आम आदमी पार्टी द्वारा चमत्कारिक रूप से 28 सीटें जीत कर अपनी पहचान को साबित किया था. अन्ना आन्दोलन की लहर, लोकपाल बिल बनाये जाने का मुद्दा, भ्रष्टाचार विरोधी छवि के साथ पहले चुनाव के चमत्कारिक प्रदर्शन को अद्भुत प्रदर्शन में बदलते हुए 2015 एवं 2020 के विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी ने क्रमशः 67 एवं 62 सीटों पर विजय हासिल की थी. केन्द्रीय राजनीति में बेहतर प्रदर्शन करने वाली भाजपा को इन दोनों विधानसभा चुनावों में क्रमशः 03 एवं 08 सीटों से संतोष करना पड़ा था, वहीं कांग्रेस इन दोनों चुनावों में अपना खाता ही नहीं खोल सकी. आश्चर्य की बात है कि तत्कालीन लोकसभा चुनावों में भाजपा ने दिल्ली की सभी सात सीटों पर विजय हासिल की थी किन्तु विधानसभा में उसका प्रदर्शन एकदम लचर रहा.

 

आम आदमी पार्टी के पहले चुनाव की सफलता को अन्ना आन्दोलन लहर की सहानुभूति का परिणाम मानने वालों को भले ही चुनाव परिणामों की संख्यात्मकता ने गलत साबित किया हो मगर आम आदमी पार्टी खुद को सही साबित करने में विफल ही रही. यही कारण रहा कि दो बार प्रचंड बहुमत से आम आदमी पार्टी को दिल्ली की सत्ता प्रदान किये जाने के बाद भी अंततः इस बार दिल्ली के मतदाताओं ने उससे किनारा करना ही उचित समझा. वर्तमान 2025 विधानसभा चुनाव परिणामों को आम आदमी पार्टी के समर्थक भले ही सत्ता विरोधी लहर (एंटी इनकम्बेंसी) कह कर खुद को सांत्वना देने का प्रयास करें मगर सत्यता यही है कि पिछले बारह बरसों के अपने कार्यकाल में आम आदमी पार्टी द्वारा अपनी उसी विचारधारा, अपने उन्हीं सिद्धांतों से लगातार दूरी बनाई जाती रही, जिनके सहारे वह सत्ता में आई थी. अपने कार्यों, अपने विचारों, अपनी कार्य-शैली आदि के चलते आम आदमी पार्टी ने और स्वयं अरविन्द केजरीवाल ने जिस तरह से नकारात्मक माहौल बना रखा था, उससे दिल्ली के मतदाताओं में निराशा उत्पन्न हो चुकी थी. यही कारण रहा कि दिल्ली के मतदाताओं ने भाजपा पर, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कार्य-शैली पर भरोसा करते हुए इस बार विधानसभा भाजपा को सौंप दी. दिल्ली के मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग करते हुए अरविन्द केजरीवाल को भी हराया, मनीष सिसौदिया के साथ-साथ सत्येंद्र जैन और सौरभ भारद्वाज को भी बाहर का रास्ता दिखाया. एक दशक से अधिक समय की कार्य प्रणाली, व्यवहार को देखने के बाद मतदाताओं को न मुफ्त की रेवड़ियाँ पसंद आईं और न ही कट्टर ईमानदार वाली कथित छवि ने प्रभावित किया.

 



आम आदमी पार्टी की हार के पीछे भले ही भाजपा की अपनी तैयारी, रणनीति, मोदी का चेहरा समेत अनेक कारक समाहित माने जा सकते हैं, किन्तु आम आदमी पार्टी और उनके शीर्ष नेताओं के कारनामे भी उसकी हार के लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं. यह उसका दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि जो दल भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन से जन्मा हो, जिस राजनैतिक दल के खिलाफ पूरा आन्दोलन छेड़े रहा हो सत्ता में आने के लिए उसी से हाथ मिला लिए. कांग्रेस की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ सैकड़ों पृष्ठों के जो सबूत सार्वजनिक मंच से दिखाए जाते थे, वे अचानक ही गायब हो गए. भ्रष्टाचार विरोध के द्वारा सत्ता में आने के बाद आम आदमी पार्टी के नेता भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाने लगे. खुद को कट्टर ईमानदार कहने वाले अरविन्द केजरीवाल भी इससे बच न सके. उनके सहित मनीष सिसौदिया, सत्येंद्र जैन को भ्रष्टाचार के मामलों में जेल जाना पड़ा.

 

नई तरह की साफ-सुथरी, ईमानदार और वैकल्पिक राजनीति का वादा करने वाले केजरीवाल ने तो सिद्धांतों की, ईमानदारी की उस समय धज्जियाँ उड़ाकर रख दीं जबकि उनको जेल जाना पड़ा. बात-बात पर नैतिकता की दुहाई देने वाले अरविन्द केजरीवाल द्वारा जेल जाने के बाद भी इस्तीफा नहीं दिया गया. इसके बजाय उनके द्वारा जेल से ही सरकार चलाने की ऐसी जिद दिखाई गई जो भारतीय राजनीति में अचम्भित करने वाली घटना थी. भ्रष्टाचार विरोध, नैतिकता की बात करने वाले केजरीवाल ने सत्ता सुख के लिए अनेक राज्यों में उन्हीं दलों, नेताओं के साथ हाथ मिलाया जिनके दामन में भ्रष्टाचार, दंगों, घोटालों आदि के दाग लगे हैं. व्यवस्था परिवर्तन करने, राजनीति का ढंग बदलने की बात करने वाले केजरीवाल और उनके साथी लगातार न केवल भ्रष्टाचार में लिप्त होते चले गए बल्कि काम-काज के मामलों में भी असफल सिद्ध हुए. सरकारी विद्यालयों, चिकित्सालयों, मोहल्ला क्लीनिक, सड़कें, यमुना साफ़-सफाई, बिजली, पानी आदि के मामलों में आम आदमी पार्टी लगातार असफल ही रही. विडम्बना यह रही कि तमाम सारी नाकामियों के बाद भी केजरीवाल द्वारा इनका जिम्मेदार स्वयं को, अपने नेताओं को, अपनी पार्टी को न मानकर दूसरों पर दोषारोपण किया जाता रहा. अलग तरह की राजनीति के नाम पर बिना किसी सबूत के, बिना किसी आधार के बाकी सभी पार्टियों और उनके नेताओं को चोर-बेईमान बताया जाने लगा. इसकी हद तो उस समय हुई जबकि वर्तमान चुनाव से ठीक पहले उन्होंने सीधे-सीधे हरियाणा की भाजपा सरकार पर यमुना के पानी में जहर मिलाने, नागरिकों के नरसंहार की साजिश रचने का अत्यंत गम्भीर आरोप लगा दिया. यह कदम केजरीवाल की गैर-जिम्मेदार राजनीति की सारी सीमाओं का लाँघना था.

 

फिलहाल तो आम आदमी पार्टी और उसके नेताओं के कारनामों की लम्बी सूची है, उनके कांड भी लम्बे-चौड़े हैं, अमानतुल्लाह खान, ताहिर हुसैन पर दंगों के आरोप तय हो चुके हैं, इस वास्तविकता को न केवल आम आदमी पार्टी के नेताओं ने समझा बल्कि दिल्ली के मतदाताओं ने भी समझा. यही कारण रहा कि दिल्ली में चुनावी मौसम के ठीक बीच में आम आदमी पार्टी के सात विधायक पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए. यहाँ पार्टी छोड़ने की परम्परा भी पार्टी के सत्ता में आने के साथ ही शुरू हो गई थी. शांति भूषण, प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, मयंक गांधी, कुमार विश्वास, कैलाश गहलोत आदि ऐसे नाम हैं जो केजरीवाल की कार्यप्रणाली, उनकी मनमानी से असहमति के चलते पार्टी से बाहर हो गए. इन सब बातों का भी असर चुनाव परिणाम पर पड़ा. मतदाताओं में यह धारणा बन चुकी थी कि अब पार्टी में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है.

 

दिल्ली चुनाव में हार के बाद आम आदमी पार्टी के भविष्य पर सवाल उठना बेवजह भी नहीं. क्षेत्रफल की दृष्टि से भले ही दिल्ली छोटा राज्य हो मगर देश की राजधानी होने के कारण वह राजनीति के केन्द्र में रहता है. देश की राजनीति की तरह ही यहाँ की राजनीति भी विचारधारा और पार्टी के मजबूत शीर्षक्रम पर आधारित है. स्पष्ट है कि ऐसी स्थिति आम आदमी पार्टी के पास नहीं है. आम आदमी पार्टी भले ही स्वयं को कट्टर ईमानदारी, अलग तरह की राजनीति करने वाली, व्यवस्था परिवर्तन करने वाली विचारधारा का पोषण करने वाली बताती रही हो मगर सत्यता यही है कि उसकी कोई विचारधारा नहीं है. उसका जन्म किसी विचारधारा के कारण नहीं बल्कि सत्ता में आने के उद्देश्य से ही हुआ है. आम आदमी पार्टी का गठन करते समय केजरीवाल के स्वयं ही कहा था कि मजबूरी में हम लोगों को राजनीति में उतरना पड़ा. हमें राजनीति नहीं आती है. हम इस देश के आम आदमी हैं जो भ्रष्टाचार और महँगाई से दुखी हैं, उन्हें वैकल्पिक राजनीति देने के लिए आए हैं. ऐसे में पार्टी के लिए बिना किसी ठोस विचारधारा के उसके विधायकों का वैचारिक दृष्टिकोण से एकजुट बने रहना भी एक चुनौती होगी. दिल्ली की सत्ता में रहते हुए केजरीवाल को अपने विधायकों को सँभाले रखना मुश्किल हो रहा था, अब विपक्ष में रहते हुए उनको साधे रखना आसान नहीं होगा. विचारधारा शून्यता के साथ-साथ शराब घोटाले और शीशमहल जैसे मुद्दों ने पार्टी की कट्टर ईमानदारी छवि पर भी दाग लगाया है. केजरीवाल, सिसौदिया का हारना अन्य प्रदेशों की इकाइयों पर भी नकारात्मक प्रभाव डालेगा. ऐसे में यदि आम आदमी पार्टी को, केजरीवाल को राजनीति का लम्बा रास्ता तय करना है तो उनको दूसरों पर दोषारोपण करने के स्थान पर अपने गिरेबान में झाँकना होगा. अपने कारनामों पर, अपनी कार्य-शैली पर चिंतन करना होगा. कट्टर ईमानदार, अजेय बने रहने के अहंकारी दम्भ से बाहर निकलना होगा.  


05 फ़रवरी 2025

दिल्ली विधानसभा चुनाव का खेल

दिल्ली विधानसभा चुनाव का मतदान समाप्त होते ही कई एजेंसियों ने अपने एग्जिट पोल जारी किये. कुछ प्रमुख एजेंसियों में से सात ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और दो ने आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार का अनुमान दिखाया है. कांग्रेस को किसी ने गम्भीरता से नहीं लिया है. देखा जाये तो कांग्रेस पिछले चुनाव से ही दिल्ली में हाशिए पर है. वर्तमान चुनावों का अंतिम परिणाम क्या होगा ये मतगणना के बाद ही स्पष्ट होगा किन्तु दिल्ली विधानसभा चुनाव की स्थिति का आकलन करने के लिए कांग्रेस का भी आकलन करना होगा, बिना इसके विधानसभा चुनावों की सही तस्वीर सामने नहीं आएगी. इसके लिए विगत तीन विधानसभा चुनावों का आकलन करना होगा.

 

दिल्ली विधानसभा 2015 और 2019 के चुनावों में जिस तरह से कांग्रेस पूरे परिदृश्य से गायब हुई उसे देख कहा जाने लगा कि कांग्रेस का विकल्प आप है. 2013 में आप ने अन्ना आन्दोलन लहर के साथ पहली बार चुनाव में उतरते ही सबका ध्यान अपनी तरफ खींचा. 70 सीटों वाली विधानसभा में भाजपा 32 सीटों के साथ पहले स्थान पर, आप 28 सीटों के साथ दूसरे और सत्ताधारी कांग्रेस महज 08 सीटों के साथ तीसरे स्थान पर आई. भाजपा विरोधी मानसिकता के कारण कांग्रेस ने आप को समर्थन देकर सरकार बनवाई जबकि अन्ना आन्दोलन से जन्मी आप का सबसे बड़ा विरोधी दल कांग्रेस ही बना था.

 



पहली बार में ही अपनी उपस्थिति को इस रूप में देखकर अरविन्द केजरीवाल को भ्रम हो गया कि वे भ्रष्टाचार के नाम पर कहीं भी, कैसी भी जीत, किसी के खिलाफ प्राप्त कर सकते हैं. विधानसभा में भी उनकी जीत कांग्रेस की सशक्त नेता और दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ थी. इसी सोच के चलते महज 49 दिन की सरकार चलाने के बाद केजरीवाल लोकसभा चुनाव की तरफ मुड़ गए. लोकसभा चुनावों के पश्चात् दिल्ली ने 2015 में दोबारा चुनावों का मुँह देखा. दिल्ली विधानसभा 2015 चुनाव परिणाम सोचने वाले थे कि आप या अरविन्द केजरीवाल ने महज 49 दिन में ऐसे कौन से काम कर डाले थे कि 2013 चुनाव में 28 सीटें जीतने वाली आप ने इन चुनावों में 63 सीटें हासिल कीं? यह भी सोचने वाली बात थी कि जिस भाजपा की स्थिति कांग्रेस या शीला दीक्षित के कार्यकाल में बुरी नहीं रही, उसने महज 49 दिन में ऐसे कौन-कौन से गलत कदम उठाए कि उसे मात्र तीन सीट पर सिमटना पड़ा?

 

इन सभी सवालों का जवाब चुनाव परिणामों में ही छिपा हुआ था, जिसे देखकर भी अनदेखा किया गया. 2013 के चुनाव परिणामों के मुकाबले आप को 2015 में सभी सत्तर सीटों पर अधिक मत प्राप्त हुए. यह महज संयोग नहीं कहा जायेगा कि कांग्रेस को 2013 के चुनाव के मुकाबले 2015 में दो सीटों, मंगोलपुरी और मतिया महल को छोड़ शेष 68 सीटों पर बहुत ही कम मत मिले. यहाँ कांग्रेस के मतों का कम होना उतना आश्चर्यचकित नहीं करता जितना इस बात के लिए करता है कि बहुत सी सीटों पर यह कमी दो से पाँच गुनी तक रही. इस आँकड़े के परिदृश्य में भाजपा ने 2013 के मुकाबले 2015 में महज 17 सीटों पर कम मत प्राप्त किये. इनमें कुछ सीटों पर यह अंतर सौ मतों से भी कम का रहा. क्या इसे महज संयोग कहकर अनदेखा किया जा सकता है?

 

दरअसल ये पूरा खेल मत-स्थानांतरण का था. मतदाताओं का एक दल से दूसरे दल की तरफ, एक प्रत्याशी से दूसरे प्रत्याशी की तरफ स्विंग कर जाना कोई नई घटना नहीं थी मगर समूची विधानसभा के मतदाताओं का स्विंग कर जाना साधारण घटना नहीं थी. भाजपा या कि मोदी विरोधियों ने एहसास कर लिया कि अन्ना आन्दोलन से मिले समर्थन और उसके बाद 2015 में मतों के ट्रांसफर से भाजपा विरोध में आप को कांग्रेस का विकल्प अथवा उसकी टीम बी बनाया जा सकता है. इसी कारण से दिल्ली में मोदी विरोध में, भाजपा विरोध में सभी दल किसी न किसी रूप में एकजुट बने रहे. इन दलों ने खुलकर मोदी का विरोध किया, भाजपा का विरोध किया मगर आपस में एक-दूसरे का विरोध करने से बचते रहे. अरविन्द केजरीवाल के वे सारे सबूत कहीं गायब हो गए जो शीला दीक्षित के खिलाफ मंचों से दिखाए जाते रहे थे. इस खेल में किसी तरह की कमी नहीं आई बल्कि उसे और मजबूती प्रदान की गई. इसमें केन्द्र सरकार के निर्णयों को आधार बनाकर अनावश्यक विरोध किया गया.

 

इसके बाद भी विधानसभा 2019 में आप अपना पिछला कारनामा दोहराने में असफल रही. 2015 के चुनाव के मुकाबले इस बार मात्र 35 सीटों पर ही ज्यादा मत प्राप्त हुए. भाजपा को 201के मुकाबले 57 सीटों पर अधिक मत प्राप्त हुए. कांग्रेस ने कुल 06 सीटों पर अधिक मत प्राप्त किये. इसे भी संयोग कहकर टाला नहीं जा सकता कि 70 सीटों की विधानसभा में कांग्रेस को मात्र 08 सीटों पर पाँच अंकों में मत प्राप्त हुएउनमें भी महज तीन सीटों में वह बीस हजार या उसके आसपास सिमट गई. ये और बात है कि भाजपा इसके बाद भी महज आठ सीटों पर ही विजय हासिल कर सकी. 

 

आप की बढ़ती सीटों के पीछे भाजपा की कार्यप्रणाली, उसके नेतृत्व की स्थितियाँ भी प्रभावी रही होंगी, इससे इंकार नहीं किया जा सकता किन्तु इसकी चर्चा किये बिना, परिणामों के आपसी सह-सम्बन्ध को परखे बिना आप को कांग्रेस का विकल्प बता देना अभी जल्दबाजी होगी. आप विशुद्ध रूप से कांग्रेस की टीम बी के रूप में देखी जा सकती है. ऐसा इसलिए भी क्योंकि जहाँ-जहाँ कांग्रेस चुनावों में पराजित हुई है वहाँ उसके द्वारा ईवीएम पर ऊँगली उठाई गई, केन्द्र सरकार पर आरोप लगाये गए लेकिन दिल्ली के दो विधानसभा चुनावों में शून्य सीटें लाने के बाद भी उसकी तरफ से ऐसा कुछ नहीं किया गया. कांग्रेस का विरोध करके जमीन बनाने वाली आम आदमी पार्टी को पहली बार में ही समर्थन देकर सरकार बनवाना, एक भी सीटें न मिलने के बाद भी ईवीएम पर हो-हल्ला न मचाना, एकाएक कांग्रेस के मतों में जबरदस्त गिरावट आना और उसी अनुपात में आम आदमी पार्टी के मतों का बढ़ना इसे कांग्रेस का विकल्प नहीं बल्कि अवसरवादी राजनीति सिद्ध करता है.

 


23 मई 2024

व्यवस्था परिवर्तन करने का खोखला दावा

देश की राजधानी से भ्रष्टाचार विरोधी एक आन्दोलन उभरता है जो धीरे-धीरे तमाम सारे युवाओं, अनेक बुद्धिजीवियों, समाजसेवियों, गैर-राजनैतिक संगठनों के सहयोग से राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनता है. आन्दोलन के साथ जुड़े लोगों ने देश से भ्रष्टाचार समाप्ति की कामना कर डाली, भ्रष्ट-रिश्वतखोर व्यक्तियों के जेल के पीछे होने की कल्पना कर ली, देश में लोकपाल व्यवस्था होने का सपना बुन डाला. हजारों-हजार लोगों के सपनों, कामनाओं को अपनी सीढ़ी बनाकर राजनैतिक क्षेत्र में जन्मी आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की सत्ता सँभाली. राजनीति को बदलने का दावा करने वाले, व्यवस्था परिवर्तन करने के नारे लगाने वाले जब सत्तासीन हुए तो उनके साथ जुड़े लोगों के साथ-साथ आशान्वित नागरिकों में आशा का संचार हुआ था.

 



ईमानदारी का चोला पहनकर आये लोगों ने, राजनीति को बदलने का दावा करने लोगों ने राजनीति को बदलकर रख दिया. संभवतः देश की राजनीति में ऐसा पहली बार हुआ होगा, पहले राजनैतिक दल के साथ ऐसा हुआ होगा कि उसका मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री दोनों ही पद पर रहते हुए जेल में हैं. ऐसा आबकारी घोटाले मामले के कारण हुआ. राजनीति से, देश से भ्रष्टाचार समाप्त करने का संकल्प लेकर सामने आई आम आदमी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व जेल में है. इसे इस पार्टी की कार्यशैली ही कहा जायेगा कि इसके साथ आन्दोलन-काल में जुड़े लोगों को या तो पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है या फिर वे किसी न किसी तरह के मामलों में जेल में हैं. विगत कई दशकों में राजनीति में माफियाओं के, अपराधियों के घुस आने से गंद तो फैली हुई थी, इन लोगों ने उस गंद को और अधिक मचमचा दिया है. न केवल अपने बयानों से बल्कि अपने कामों से भी सिवाय विवाद पैदा करने के कुछ नहीं किया गया. अभी हालिया काण्ड इसका जीता-जागता उदाहरण है.

 

ये हालिया काण्ड आम आदमी पार्टी की महिला सांसद के साथ मारपीट किये जाने जाने का है. आश्चर्य की बात है कि एक सांसद को मुख्यमंत्री आवास पर पीटे जाने की घटना होती है. आबकारी घोटाले में जेल गए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को चुनाव प्रचार हेतु कुछ दिन के लिए अंतरिम जमानत पर रिहा किया गया. उनके बाहर आने के बाद ही आम आदमी पार्टी की राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल ने आरोप लगाया कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के निजी सचिव विभव कुमार द्वारा उनके साथ मारपीट की गई. यहाँ विशेष बात ये है कि आरोप लगाने वाला व्यक्ति, साजिशकर्ता, घटनास्थल आदि सबकुछ आम आदमी पार्टी से सम्बंधित है मगर राजनैतिक व्यवस्था बदलने आये महानुभावों का कहना है कि ये भाजपा की साजिश है.  

 

मारपीट की इस घटना का अंजाम क्या होगा ये देखने वाली बात है लेकिन आम आदमी पार्टी के विगत तमाम कृत्यों से यह तो स्पष्ट हो चुका है कि इनका मकसद किसी भी रूप में राजनैतिक शुचिता का पालन करना नहीं है. व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर इनको महज सत्ता हासिल करनी थी, जिसे हासिल करके वे मलाई खाने में लगे हैं. राजनीति बदलने के लिए, भ्रष्टाचार मुक्ति के लिए, लोकपाल लाने के लिए इनके द्वारा चलाया गया आन्दोलन अभी बहुत पुराना नहीं हुआ है. देश के नागरिकों की याददाश्त इतनी भी कमजोर नहीं हुई होगी कि वे इसे भूल गए हों. सभी को अच्छी तरह से याद होगा कि आन्दोलन के दौरान केजरीवाल द्वारा मंचों से पानी का मीटर फूँकते हुए, सैकड़ों कागजों का बंडल दिखाते हुए दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को कटघरे में खड़ा किया जाता था; अनेकानेक राजनैतिक व्यक्तियों के, मंत्रियों, सांसदों, विधायकों के नाम लेकर उन पर भ्रष्टाचार का, रिश्वतखोरी का, परिवारवाद का आरोप लगाते हुए उनको जेल में डालने की हुँकार भरी जाती थी; अपने आपको शुचिता का एकमात्र केन्द्र साबित करने के लिए अनेकानेक आदर्शवादी बयान दिए जाते थे मगर असलियत इससे बहुत दूर निकली.

 

राजनीति से भ्रष्टाचार दूर करना तो दूर की बात रही, खुद इनका शीर्ष नेतृत्व भ्रष्टाचार मामलों में संलिप्त नजर आने लगा. व्यवस्था बदलने आये लोगों ने व्यवस्था के नाम पर संविधान का मखौल बनाना शुरू कर दिया. राजनैतिक शुचिता स्थापित करने आई पार्टी का शीर्ष नेतृत्व न केवल बाहर बल्कि सदन में भी कभी प्रधानमंत्री के लिए, कभी एलजी के लिए अपमानजनक शब्दावली का प्रयोग करता दिखाई दिया. राजनैतिक बदलाव करने की असलियत का पता इसी से लगता है कि जब ये लोग अथवा इनके मुखिया अरविन्द केजरीवाल आन्दोलन कर रहे थे तब इनका मुख्य उद्देश्य भ्रष्ट नेताओं को जेल पहुँचाना था. अब यही चुनावी गठबंधन में उनके साथ हाथ मिला बैठे तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर आरोप लगा रहे हैं कि वे सबको जेल भेजना चाहते हैं. समझ से परे है कि जिन-जिन नेताओं का नाम लेकर केजरीवाल उनको जेल भेजना चाहते थे, अब उनको जेल जाने से बचाने में क्यों लगे हुए हैं? जिस कांग्रेस को भ्रष्ट बताकर, दिल्ली की जनता को बदलाव का सपना दिखाकर अपने पहले चुनाव पश्चात् कांग्रेस से ही गठबंधन करके सत्ता में आये थे. यदि उनका उद्देश्य दिल्ली की व्यवस्था को दुरुस्त करना था तो इस्तीफ़ा देकर नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ा होता. आन्दोलन की नागरिक-सहानुभूति के द्वारा वे खुद को मुख्यमंत्री के रास्ते से प्रधानमंत्री पद तक ले जाना चाहते थे.

 

यदि आन्दोलन के परिदृश्य से उपजे आदर्शवादी विचारों, बयानों को दरकिनार करते हुए वास्तविकता का अध्ययन किया जाये तो स्पष्ट रूप से समझ आता है कि अरविन्द केजरीवाल जबरदस्त महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति हैं. यही कारण है कि राजनीति में, सत्ता में बने रहने के लिए उनके द्वारा लगातार उन्हीं बातों, सिद्धांतों, व्यक्तियों से समझौता, गठबंधन किया गया जिनके खिलाफ वे आवाज़ उठाते रहे हैं. स्वाति मालीवाल के आरोपों के बाद केजरीवाल के निजी सचिव विभव कुमार की गिरफ़्तारी भले हो गई हो मगर केजरीवाल की चुप्पी कुछ अलग ही संकेत करती है. फ़िलहाल, राजनीति बदलने आये लोगों ने जनभावनाओं के साथ खेलते हुए वही गंदगी फैला रखी है जो अन्य राजनैतिक दलों द्वारा फैलाई जाती रही है.

 


18 मई 2024

गंद फैलाने में लगे व्यवस्था परिवर्तक

राजनीति को बदलने का दावा करने वाले तमाम तरह के सपने दिखाकर आन्दोलन के रास्ते सक्रिय राजनीति में आये लोगों ने वाकई राजनीति को बदलकर रख दिया है. विगत कई दशकों में राजनीति में माफियाओं के, अपराधियों के घुस आने से गंद तो फैली हुई थी, इन लोगों ने उस गंद को और अधिक मचमचा दिया है. न केवल अपने बयानों से बल्कि अपने कामों से भी सिवाय विवाद पैदा करने के कुछ नहीं किया गया. अभी हालिया काण्ड इसका जीता-जागता उदाहरण है. 


आम आदमी पार्टी की एक महिला सांसद के साथ मारपीट किये जाने की घटना सामने आई. आश्चर्य की बात ही कही जाएगी कि एक सांसद को एक मुख्यमंत्री आवास पर मारपीट किये जाने की घटना होती है. आम आदमी पार्टी की राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल ने आरोप लगाया कि आम आदमी पार्टी के दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के निजी सचिव विभव कुमार द्वारा मारपीट की गई. यहाँ विशेष बात ये है कि ये सभी लोग आम आदमी पार्टी के हैं मगर अब राजनैतिक व्यवस्था बदलने आये महानुभावों का कहना है कि ये सब भाजपा की साजिश है.


मारपीट की इस घटना का अंजाम क्या होगा ये देखने वाली बात है लेकिन आम आदमी पार्टी के विगत तमाम कृत्यों से यह तो स्पष्ट हो चुका है कि इनका मकसद किसी भी रूप में राजनैतिक शुचिता का पालन करना नहीं है. व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर इनको महज सत्ता हासिल करनी थी, जिसे वे हासिल करके मलाई खाने में लगे हैं. व्यवस्था के नाम पर कभी संविधान का मखौल बनाना, कभी प्रधानमंत्री के लिए अपमानजनक शब्दावली प्रयोग करना, जानबूझकर विवादों को जन्म देना इनका मुख्य कार्य बना हुआ है. राजनैतिक बदलाव को करने की असलियत का पता इसी बात से लगता है कि जब ये लोग अथवा इनके मुखिया अरविन्द केजरीवाल आन्दोलन कर रहे थे तब इनका मुख्य उद्देश्य भ्रष्ट विरोधी नेताओं को जेल पहुँचाना था. अब यही चुनावी गठबंधन में उनके साथ हाथ मिला बैठे तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर आरोप लगाने में लगे हैं कि वे सबको जेल भेजना चाहते हैं. समझ से परे है कि जिन-जिन नेताओं का नाम लेकर केजरीवाल उनको जेल भेजना चाहते थे, अब वे उनको जेल जाने से बचाने में क्यों लगे हैं? 





 

22 मार्च 2024

राजनैतिक गलियारे के व्यवस्था परिवर्तक

आखिरकार कई-कई समन को अस्वीकार करने वाले अरविन्द केजरीवाल को ईडी ने अपने चंगुल में ले ही लिया. आबकारी नीति मामले में दिल्ली के मुख्यमंत्री को गिरफ्तार कर लिया गया. आम आदमी पार्टी के इससे पहले कई जनप्रतिनिधि जेल में हैं. मनीष सिसौदिया, संजय सिंह, सतेन्द्र जैन आदि पहले से गिरफ्तार होकर जेल में हैं. अब अरविन्द केजरीवाल गिरफ्तार कर लिए गए हैं और छह दिन की रिमांड पर हैं. संभव है कि वे भी अपने साथियों के बीच जल्द ही दिखाई देंगे. 


अरविन्द केजरीवाल की गिरफ़्तारी ने भी एक तरह का अलग रिकॉर्ड बना दिया है. देश में यह पहला मामला है जबकि किसी मुख्यमंत्री को उसके पद पर रहते हुए गिरफ्तार किया गया है. यहाँ उनकी गिरफ़्तारी से सम्बंधित सवाल-जवाब अथवा विमर्श की तरफ इस पोस्ट को कतई नहीं ले जाना है. आज इस विषय पर पोस्ट लिखने का सन्दर्भ महज इतना है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध शुरू हुए आन्दोलन से, लोकपाल को लाने के संकल्प के साथ जन्मे एक दल ने और उसके नेताओं ने आम आदमी के विश्वास को न केवल तोडा है बल्कि घनघोर तरीके से चकनाचूर भी कर दिया है.




अन्ना आन्दोलन के दौरान जिस तरह से इन नेताओं द्वारा बड़ी-बड़ी बातें की गईं, खुद को ईमानदारी का एकमात्र प्रतिनिधि बताया गया, दूसरे दलों के नेताओं के सैकड़ों-सैकड़ों कागजों में भ्रष्टाचार के सबूत दिखाए गए, खुद को राजनीति की, सत्ता की चकाचौंध से बाहर रखने के जुमले फेंके गए, बच्चों तक की कसमें खाई गईं और अंततः सबके सब ही एक ही रंग में रँगे नजर आये. दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री के खिलाफ खुले मंचों से लहराए जाने वाले कागजात सत्ता में आने के बाद न जाने कहाँ गायब हो गए? जिस कांग्रेस के खिलाफ पूरा आन्दोलन चलाया गया, उसी के साथ मिलकर सरकार बनाई गई. इसके बाद भी इन सबका खुद को व्यवस्था बदलने वाला, नई तरह की राजनीति करने का ढोल पीटना बंद नहीं किया गया.


जो सारे कार्य इन लोगों ने अपने लिए निषिद्ध मान रखे थे, कह रखे थे, वे सारे के सारे अपनाए गए. आम जनमानस को इससे समस्या पैदा होने वाली नहीं थी और न है. आखिर राजनीति के गलियारों में यह कोई नई या अनोखी बात नहीं है. कोई भी दल हो आज बात भले सिद्धांतों की, शुचिता की, ईमानदारी की करता हो मगर काम स्वार्थपरक ही करेगा, सत्तालोलुप रहेगा. आम आदमी पार्टी के कृत्यों से, इनके नेताओं के रंग बदलने से नकारात्मक प्रभाव उन छोटे-छोटे सामाजिक संगठनों पर पड़ा जो वाकई में छोटे से क्षेत्र में ईमानदारी से, कुशलता के साथ कार्य कर रहे थे. आम आदमी पार्टी के कृत्यों से सबसे निचले स्तर के व्यक्ति की ईमानदारी, शुचिता पर, उसके कार्यों पर संदेह किया जाने लगा है. आम जनमानस में एक धारणा गहरे तक बैठ गई कि किसी भी रूप में समाज से भ्रष्टाचार को दूर नहीं किया जा सकता है. कोई कितना भी आन्दोलन करे, कसमें खाए, खुद को ईमानदार बताता घूमे लेकिन यह सब सिर्फ और सिर्फ सत्ता प्राप्ति के लिए, स्वार्थ-पूर्ति के लिए ही किया जाता है.


आन्दोलन से लेकर अद्यतन इनके कृत्यों को देखने के बाद बचपन में किसी कक्षा में पढ़ी डाकू खड्ग सिंह और बाबा भारती की कहानी याद आ गई. 





 

20 फ़रवरी 2020

कांग्रेस का विकल्प नहीं उसकी टीम बी बनकर उभरी है आम आदमी पार्टी


दिल्ली एक बार फिर आम आदमी पार्टी की हो गई. विधानसभा निर्वाचन 2020 के आरम्भ होने के समय से ही इस चुनाव को आआपा के पक्ष में माना जा रहा था. परिणाम भी कमोवेश उसी तरह का आया. चुनाव परिणाम घोषित होते ही विश्लेषकों द्वारा आम आदमी पार्टी को कांग्रेस का विकल्प बताया जाने लगा. असल में वर्तमान चुनाव परिणामों की समीक्षा, विश्लेषण गंभीरता से नहीं किया जा रहा है. इसे सीधे-सीधे आम आदमी पार्टी की एकतरफा जीत बताकर और भाजपा की हानि बता कर प्रसारित किया जा रहा है. ऐसा यदि एक आम समर्थक द्वारा किया जाये, एक भावुक मतदाता के द्वारा किया जाये तो बात समझ आती है कि वह किसी भावना के वशीभूत अपना आक्रोश निकाल रहा है. इसके उलट जब खुद को बौद्धिक कहने वाले लोगों के द्वारा आम आदमी पार्टी की वर्तमान जीत का अथवा विगत विधानसभा की जीत का सतही आकलन किया जाये तो लगता है कि अभी निष्पक्षता की बहुत आवश्यकता है. देश में लोकतंत्र की वकालत भले ही की जाये मगर अभी वैचारिक स्तर पर ही लोकतंत्र स्थापित नहीं हो सका है.

पूरे देश में भाजपा विरोधी माहौल बहुत लम्बे समय से बना हुआ था मगर वर्ष 2014 के बाद से सिर्फ द्विपक्षीय लहर देखने को मिल रही है. इसमें एक भाजपा के पक्ष में और दूसरी भाजपा के विरोध में. यहाँ भाजपा-विरोधियों के पास अपने-अपने विकल्प खुले हुए हैं. ऐसा न केवल मतदाताओं, समर्थकों के साथ हो रहा है वरन दलीय स्वरूप में भी ऐसा देखने को मिल रहा है. दिल्ली विधानसभा चुनावों में भी यही हुआ. यहाँ मतदाताओं की, भाजपा, आम आदमी पार्टी की स्थिति का सही-सही आकलन करने के लिए एक अन्य तीसरे दल कांग्रेस का भी आकलन करना होगा. बिना उसके दिल्ली विधानसभा चुनावों की सही तस्वीर सामने नहीं आ सकेगी. इसके लिए वर्तमान विधानसभा चुनावों से इतर विगत दो विधानसभा चुनावों का भी आकलन करना पड़ेगा.

ऐसा इसलिए क्योंकि कांग्रेस का चुनावी परिणाम सम्बन्धी आकलन, विश्लेषण ही तय करेगा कि आआपा कांग्रेस का विकल्प बनकर उभरी है अथवा उसकी टीम बी बनकर. वर्तमान चुनाव परिणामों से ध्यान हटाकर यदि वर्ष 2013 के विधानसभा चुनावों पर दृष्टि डाली जाये जबकि आम आदमी पार्टी ने अन्ना आन्दोलन की लहर में पहली बार चुनाव मैदान में कदम रखा था. पार्टी ने पहली बार में ही सबका ध्यान अपनी तरफ खींचा. 70 सीटों वाली दिल्ली विधानसभा भाजपा, आआपा और कांग्रेस के बीच ही सिमट गई. इस चुनाव में भाजपा 32 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी जबकि आआपा 28 सीटों के साथ दूसरे और सत्ताधारी कांग्रेस महज 08 सीटों के साथ तीसरे नंबर पर आई. भाजपा विरोधी मानसिकता के कारण कांग्रेस ने आआपा को समर्थन देकर सरकार बनवाई जबकि अन्ना आन्दोलन से जन्मी आआपा का सबसे बड़ा विरोधी दल कांग्रेस ही बना था.


पहली बार में ही अपनी उपस्थिति को इस रूप में देखकर अरविन्द केजरीवाल को भ्रम हो गया कि वे भ्रष्टाचार के नाम पर कहीं भी, कैसी भी जीत, किसी के खिलाफ प्राप्त कर सकते हैं. विधानसभा में भी उनकी जीत कांग्रेस की सशक्त नेता और दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ थी. इसी सोच के चलते महज 49 दिन की सरकार चलाने के बाद केजरीवाल लोकसभा चुनाव की तरफ मुड़ गए. अंततः लोकसभ चुनावों के पश्चात् दिल्ली ने 2015 में दोबारा चुनावों का मुँह देखा. यही वह स्थिति थी जबकि लोकसभा 2014 के बाद से बनी मोदी लहर और मोदी-विरोधी लहर का देशव्यापी रूप देखने को मिला. दिल्ली विधानसभा 2015 चुनाव परिणाम सोचने वाले थे, शोध करने वाले थे मगर किसी ने भी इस तरफ ध्यान नहीं दिया. सोचने वाली बात है कि आआपा या फिर अरविन्द केजरीवाल ने महज 49 दिन में ऐसे कौन से काम कर डाले थे कि महज 28 सीटें जीतने वाली आआपा ने इन चुनावों में 63 सीटें हासिल कीं? यह भी सोचने वाली बात है कि जिस भाजपा की स्थिति कांग्रेस या शीला दीक्षित के कार्यकाल में बुरी नहीं रही, उसने महज 49 दिन में ऐसे कौन-कौन से गलत कदम उठा लिए कि उसे मात्र तीन सीट पर सिमटना पड़ा?

इन सभी सवालों का जवाब चुनाव परिणामों में ही छिपा हुआ था, जिसे देखकर भी इसलिए अनदेखा कर दिया गया क्योंकि भाजपा-विरोधी मानसिकता के आगे और कुछ देखना ही नहीं था. 2013 के चुनाव परिणामों के मुकाबले आआपा को 2015 में सभी सत्तर सीटों पर अधिक मत प्राप्त हुए. यह महज संयोग नहीं कहा जायेगा कि कांग्रेस ने 2013 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले 2015 के चुनावों में दो सीटों, मंगोलपुरी और मतिया महल को छोड़ शेष 68 सीटों पर बहुत ही कम मत प्राप्त किये. यहाँ कांग्रेस के मतों का कम होना उतना आश्चर्यचकित नहीं करता जितना इस बात के लिए करता है कि बहुत से सीटों पर यह कमी दो से पाँच गुनी तक रही है. यदि इस आँकड़े के परिदृश्य में भाजपा की सीटें देखें तो भाजपा ने महज 17 सीटों पर 2013 के मुकाबले 2015 में कम मत हासिल किये. इनमें कुछ सीटों पर यह अंतर सौ मतों से भी कम का रहा. क्या इसे महज एक संयोग कहकर अनदेखा किया जा सकता है?

इस तरह के मतों को देखकर विश्लेषण करने वाला, सांख्यिकी सम्बन्धी आँकड़ों से खेलने वाला कोई भी विद्यार्थी प्रथम दृष्टया ही बता सकता है कि ये पूरा खेल मत-स्थानांतरण का है. मतदाताओं का एक दल से दूसरे दल की तरफ, एक प्रत्याशी से दूसरे प्रत्याशी की तरफ ‘स्विंग’ कर जाना कोई नई घटना नहीं थी मगर समूची विधानसभा के मतदाताओं का ‘स्विंग’ कर जाना साधारण घटना नहीं है. कोई भी साधारण से साधारण विश्लेषक इसे खेल कहने का दुस्साहस कर सकेगा क्योंकि ये मामला 2015 विधानसभा चुनाव तक ही सीमित नहीं रहा. भाजपा या कहें कि मोदी विरोधियों ने अपने कदम से और मतदाताओं के रुझान से इसका एहसास कर लिया कि अन्ना आन्दोलन के समय मिले समर्थन और उसके बाद 2015 में मतों के ट्रांसफर से भाजपा विरोध में आआपा को कांग्रेस का विकल्प अथवा उसकी टीम बी बनाया जा सकता है. इसी कारण से दिल्ली में मोदी विरोध में, भाजपा विरोध में सभी दल किसी न किसी रूप में एकजुट बने रहे. इन दलों ने खुलकर मोदी का विरोध किया, भाजपा का विरोध किया मगर आपस में एक-दूसरे का विरोध करने से बचते रहे.   

इस खेल में किसी भी तरह की कमी नहीं आई बल्कि उसे और मजबूती प्रदान की जाने लगी. इसमें केन्द्र सरकार के निर्णयों को आधार बनाकर अनावश्यक विरोध बनाये रखा गया. समूची दिल्ली में केन्द्र सरकार के विरोध के बहाने मोदी को हराने की कोशिशें चलती रहीं. आम आदमी पार्टी के कामों को खूब बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया जाने लगा. चुनावों में स्थिति कुछ और ही बनती, यदि परदे के पीछे की सांठ-गांठ जमीन पर न उतरती. शाहीन बाग का विरोध इसी का परिणाम कहा जा सकता है. इन सबके बाद भी विधानसभा 2020 के चुनावों में आम आदमी पार्टी जीतने के बाद भी अपना पिछला कारनामा करने में असफल रही. 2015 के चुनाव के मुकाबले इस बार वह मात्र 35 सीटों पर ही ज्यादा मत प्राप्त कर सकी. भाजपा को 2015 के मुकाबले  57 सीटों पर अधिक मत प्राप्त हुए. कांग्रेस ने कुल 06 सीटों पर अधिक मत प्राप्त किये. इसे भी संयोग कहकर टाला नहीं जा सकता कि 70 सीटों की विधानसभा में कांग्रेस को मात्र 08 सीटों पर पाँच अंकों में मत प्राप्त हुए, उनमें भी महज तीन सीटों में वह बीस हजार या उसके आसपास में सिमट गई. ये और बात है कि भाजपा इसके बाद भी महज आठ सीटों पर ही विजय हासिल कर सकी. 

आआपा की बढ़ती सीटों के पीछे भाजपा की कार्यप्रणाली, उसके नेतृत्व की स्थितियां भी प्रभावी होंगी, इससे इंकार नहीं किया जा सकता किन्तु इसकी चर्चा किये बिना, परिणामों के आपसी सह-सम्बन्ध को परखे बिना आआपा को कांग्रेस का विकल्प बता देना अभी जल्दबाजी होगी. आआपा विशुद्ध रूप से कांग्रेस की टीम बी के रूप में देखी जा सकती है. ऐसा इसलिए भी क्योंकि जहाँ-जहाँ कांग्रेस चुनावों में पराजित हुई है वहाँ उसके द्वारा ईवीएम पर ऊँगली उठाई गई, केन्द्र सरकार पर आरोप लगाये गए लेकिन दिल्ली के दो विधानसभा चुनावों में शून्य सीटें लाने के बाद भी उसकी तरफ से ऐसा कुछ नहीं किया गया. कांग्रेस का विरोध करके जमीन बनाने वाली आम आदमी पार्टी को पहली बार में ही समर्थन देकर सरकार बनवाना, एक भी सीटें न मिलने के बाद भी ईवीएम पर हो-हल्ला न मचाना, एकाएक कांग्रेस के मतों में जबरदस्त गिरावट आना और उसी अनुपात में आम आदमी पार्टी के मतों का बढ़ना इसे कांग्रेस का विकल्प नहीं बल्कि अवसरवादी राजनीति सिद्ध करता है.

15 फ़रवरी 2020

कांग्रेस की टीम बी है आआपा?

दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणामों के आने के बाद खूब बमचक मची हुई है. कोई कुछ कह रहा है, कोई कुछ बता रहा है. कुछ लोगों को यह सुनकर बुरा लग रहा है कि आम आदमी पार्टी को हमने कांग्रेस की टीम बी कह दिया. यह सही है. इसे एकबारगी चुनाव में मिले मतों के आधार पर खुद ही देख लीजिये. बहुत सी बातों का जवाब चुनाव परिणामों में ही छिपा हुआ था, जिसे देखकर भी इसलिए अनदेखा कर दिया गया क्योंकि भाजपा-विरोधी मानसिकता के आगे और कुछ देखना ही नहीं था. जिस सच को देखकर भी अनदेखा किया गया यदि वह सामने लाया जाता तो आआपा के कार्यों को आधार मिलना मुश्किल होता.

2013 के चुनाव परिणामों के मुकाबले आआपा को 2015 में सभी सत्तर सीटों पर अधिक मत प्राप्त हुए. यह महज संयोग नहीं कहा जायेगा कि कांग्रेस ने 2013 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले 2015 के चुनावों में दो सीटों, मंगोल पूरी और मतिया महल को छोड़ शेष 68 सीटों पर बहुत ही कम मत प्राप्त किये. यहाँ कांग्रेस के मतों का कम होना उतना आश्चर्यचकित नहीं करता जितना इस बात के लिए करता है कि बहुत से सीटों पर यह कमी दो से पाँच गुनी तक रही है. यदि इस आँकड़े के परिदृश्य में भाजपा की सीटें देखें तो भाजपा ने महज 17 सीटों पर 2013 के मुकाबले 2015 में कम मत हासिल किये अर्थात उसे 53 सीटों पर पिछले चुनाव के मुकाबले अधिक मत मिले. इनमें कुछ सीटों पर यह अंतर सौ मतों से भी कम का रहा. क्या इसे महज एक संयोग कहकर अनदेखा किया जा सकता है?


इस तरह के मतों को देखकर विश्लेषण करने वाला, सांख्यिकी सम्बन्धी आँकड़ों से खेलने वाला कोई भी विद्यार्थी प्रथम दृष्टया ही बता सकता है कि ये पूरा खेल मत-स्थानांतरण का है. कोई भी साधारण से साधारण विश्लेषक इसे खेल कहने का दुस्साहस कर सकेगा क्योंकि ये मामला 2015 विधानसभा चुनाव तक ही सीमित नहीं रहा. भाजपा या कहें कि मोदी विरोधियों ने अपने कदम से और मतदाताओं के रुझान से इसका एहसास कर लिया कि आआपा को अन्ना आन्दोलन के समय मिले समर्थन और उसके बाद 2015 में मतों के ट्रांसफर से भाजपा विरोध में कांग्रेस का विकल्प अथवा उसकी टीम बी बनाया जा सकता है. इसी कारण से दिल्ली में मोदी विरोध में, भाजपा विरोध में सभी दल किसी न किसी रूप में एकजुट बने रहे. इन दलों ने खुलकर मोदी का विरोध किया, भाजपा का विरोध किया मगर आपस में एक-दूसरे का विरोध करने से बचते रहे.  

परदे के पीछे चलने वाले खेल में कमी नहीं आई बल्कि उसे और मजबूती प्रदान की जाने लगी. इसमें केन्द्र सरकार के निर्णयों को आधार बनाकर अनावश्यक विरोध बनाये रखा गया. समूची दिल्ली में केन्द्र सरकार के विरोध के बहाने मोदी को हराने की कोशिशें चलती रहीं. आम आदमी पार्टी के कामों को खूब बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया जाने लगा. चुनावों में स्थिति कुछ और ही बनती, यदि परदे के पीछे की सांठ-गांठ जमीन पर न उतरती. मतदाता किसी न किसी रूप में भाजपा के पक्ष में अपना मन बना चुके थे मगर शाहीन बाग का विरोध कहीं न कहीं मतदाताओं को भाजपा के, मोदी के खिलाफ करने की साजिश रचता नजर आया. इन सबके बाद भी विधानसभा 2020 के चुनावों में आम आदमी पार्टी जीतने के बाद भी अपना पिछला कारनामा करने में असफल रही. 2015 के चुनाव के मुकाबले इस बार वह मात्र 35 पर ही ज्यादा मत प्राप्त कर सकी. भाजपा को 2015 के मुकाबले  57 सीटों पर अधिक मत प्राप्त हुए. कांग्रेस ने कुल 06 सीटों पर अधिक मत प्राप्त किये. इसे भी संयोग कहकर टाला नहीं जा सकता कि 70 सीटों की विधानसभा में कांग्रेस को मात्र 08 सीटों पर पाँच अंकों में मत प्राप्त हुए, उनमें भी महज तीन सीटों में वह बीस हजार या उसके आसपास में सिमट गई. ये और बात है कि भाजपा इसके बाद भी महज आठ सीटों पर ही विजय हासिल कर सकी.

20 जनवरी 2018

खेल तो राजनीति का ही खेला गया

इस बात पर शायद ही कोई विश्वास करे कि आम आदमी पार्टी के बीस विधायकों की सदस्यता को अयोग्य साबित करने में भाजपा या कांग्रेस की तरफ से किसी तरह का षड्यंत्र रचा गया होगा. ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि इन बीस विधायकों की सदस्यता पर सवाल इन दोनों राजनैतिक दलों के बजाय एक युवा अधिवक्ता द्वारा उठाया गया है. राजनीति के मैदान में जमे तमाम सारे दल एक जैसी प्रकृति के हैं और ऐसे में उनसे किसी तरह की स्वच्छता की अपेक्षा करना गलती ही होगी. यही कारण है कि विगत तीन वर्षों के दौरान किसी भी राजनैतिक दल के द्वारा आम आदमी पार्टी के बीस विधायकों के लाभ के पद का मामला नहीं उठाया गया.


इसके साथ ही इस बात पर विश्वास करना भी मुश्किल है कि प्रशासनिक सेवा से राजनीति में उतर आये अरविन्द केजरीवाल को इसका भान नहीं होगा कि उनके द्वारा अपने बीस विधायकों को जिस तरह से संसदीय सचिव बनाया जा रहा है उससे उनकी सदस्यता पर सवाल खड़ा नहीं होगा. लोकपाल बनाये जाने को लेकर रचे गए आन्दोलन के बाद से लेकर सत्ता संभालने तक के सफ़र में अरविन्द केजरीवाल द्वारा लगातार ऐसे कदम उठाये गए जो उनको राजनीति की समझ रखने वाला साबित करने को पर्याप्त हैं. ऐसे में ये समझने वाली बात है कि आखिर राजनीति में स्वच्छता, पारदर्शिता को मुख्य मुद्दा बनाकर उतरी आम आदमी पार्टी की तरफ से ठीक वैसा ही खेल खेला गया जिसके लिए भारतीय राजनीति को वर्तमान में जाना जाने लगा है. बीस विधायकों के मामले के अतिरिक्त हालिया विवादों में राज्यसभा सीटों के तीन आम आदमी पार्टी द्वारा तीन सदस्यों का भेजा जाना भी रहा है. पार्टी के आरम्भिक सदस्यों में और पार्टी से लोकसभा का चुनाव लड़ चुके कुमार विश्वास ने राजसभा सीटों के मामले में अपनी नाराजगी सार्वजनिक रूप से व्यक्त भी की थी.

आम आदमी पार्टी ने अपने पहले ही दिन से किसी भी रूप में आम आदमी के बीच ऐसा विश्वास ज़माने की कोशिश नहीं की है जिससे कि माना जाये कि वह भारतीय राजनीति में दिखाई देने वाली गन्दगी को साफ़ करने उतरी है. व्यवस्था बदलने की बात करने वाली ये पार्टी उसी समय संदिग्ध नजर आई थी जबकि अपनी धुर विरोधी कांग्रेस के साथ गठबंधन कर दिल्ली में सरकार बना बैठी थी. इससे स्पष्ट संकेत मिला कि बाकी दलों की भांति आम आदमी पार्टी भी सत्ता-परिवर्तन का, सत्ता-प्राप्ति का खेल खेलने आई है. इसे उस समय और भी बल मिला था जबकि बिना किसी कारण के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल इस्तीफा देकर लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी के खिलाफ ताल ठोंकने उतर आये. इस तरह के राजनैतिक कदमों के अलावा दिल्ली की रैली में किसान की आत्महत्या का मामला रहा हो, आम आदमी पार्टी के विधायकों का लगातार किसी न किसी विवाद में फँसते जाना हो, जनता की मदद के नाम पर उसका शारीरिक शोषण करना रहा हो, पानी के बिलों को लेकर किये गए वादों से मुकरना रहा हो, विद्युत दरों के मामले में अलग नजरिया बनाना रहा हो या फिर अपनी पार्टी के ही संस्थापक, सहायक वरिष्ठ लोगों को लगातार बाहर का रास्ता दिखाया जाना रहा हो, सभी ने आम आदमी पार्टी की मानसिकता को ज़ाहिर किया है.


स्पष्ट है कि आम आदमी पार्टी भी किसी तरह की राजनैतिक शुचिता के लिए नहीं वरन विशुद्ध राजनैतिक खेल खेलने मैदान में उतरी है. उसके लिए न स्वच्छ राजनीति से मतलब है न ही व्यवस्था के शुद्धिकरण से. उसके लिए एकमात्र उद्देश्य खुद को कैसे भी करके सत्ता में बने रहना है. यही कारण है कि समय-समय पर उसके द्वारा अराजक लोगों का साथ दिया गया, भ्रष्ट लोगों के साथ मंच साझा किया गया, देश को कमजोर करने वालों के समर्थन में उतरा गया. राजनीति की वर्तमान दशा से चिंतित लोगों में आम आदमी पार्टी के जन्म से एक तरह की आशा जगी थी, उनके सामने एक विकल्प उभर कर सामने आया था मगर अब उन सबकी आशाओं पर तुषारापात हो चुका है. आम आदमी पार्टी उसी तरह के चोले में नजर आने लगी है, जिस चोले में शेष दल रँगे नजर आ रहे हैं. ज़ाहिर सी बात है कि आन्दोलन के नाम पर साथ आये लोगों के मनोभावों से खिलवाड़ करके एक-दो बार तो सत्ता का सुख भोगा जा सकता है किन्तु उसके द्वारा लम्बी यात्रा को पूरा नहीं किया जा सकता है. कहा भी गया है कि काठ की हांड़ी बार-बार नहीं चढ़ती और मतदाताओं के लिए भी एक कहावत कही जा सकती है कि दूध का जला, छांछ भी फूंक-फूंक कर पीता है. 

28 अप्रैल 2015

संवेदनहीनता बनी मौत का कारण


जंतर-मंतर पर आम आदमी पार्टी की रैली में एक व्यक्ति की मृत्यु की खबर नेपाल में आये भूकम्प के कारण ठन्डे बक्से में डाल दी गई हैं. संवेदनहीनता का इससे अच्छा उदाहरण और क्या मिलेगा कि एक व्यक्ति पेड़ पर चढ़कर आत्महत्या करने का उपक्रम करने में लगा हो और दूसरी तरफ भीड़ का हिस्सा बने लोग उसका वीडियो बनाने में, फोटो खींचने में मस्त हों. नेता मंच से भाषण दिए जा रहे हों, पुलिस शांति से समूचा तमाशा देखने में लगी हो, ये संवेदनशीलता तो प्रदर्शित नहीं करता है. व्यक्ति ने आत्महत्या की अथवा असावधानी में उसके द्वारा बनाये गए फंदे से उसकी मौत हो गई; किसी दवाब में उसने ऐसा किया या किसी ने ऐसा करने को उकसाया; वो वाकई लाचार-परेशान किसान था अथवा राजनीति में अपने अस्तित्व की तलाश कर रहा था आदि-आदि नजरिये से इस घटना को देखा जा सकता है किन्तु एकमात्र सत्य यही है कि एक व्यक्ति की मौत सैकड़ों लोगों के सामने हो गई, एक राज्य के मुख्यमंत्री के सामने हो गई.

ऐसे में इस मौत का जिम्मेवार किसे माना जायेगा? क्या वह व्यक्ति जिम्मेवार है जो बिना आगा-पीछा सोचे इस तरह का कृत्य करने में लगा था? क्या वो भीड़ जिम्मेवार है जो समूचे घटनाक्रम को एक तमाशे की तरह देख रही थी? या पुलिस प्रशासन जिम्मेवार है जो उस व्यक्ति को बजाय पकड़ने के चुपचाप खड़ा देख रहा था? या फिर कि वो मुख्यमंत्री, वो पार्टी जिम्मेवार है जिसकी रैली में आया व्यक्ति उन्हीं के सामने आत्महत्या जैसा कृत्य करने के लिए पेड़ पर चढ़ जाता है? गंभीरता से इन सवालों को समझने की आवश्यकता है क्योंकि ये एक हादसे में हुई मृत्यु नहीं है, असावधानी में हुई मौत नहीं है वरन कहीं न कहीं समाज में पनप रही संवेदनहीनता की परिचायक है.

इधर विगत कुछ वर्षों से युवाओं में राजनीति के प्रति एक अजब सा आकर्षण पैदा हुआ है. जल्द से जल्द आलाकमान की निगाह में आने की लालसा कुछ भी कर गुजरने को प्रेरित करती है. ऐसा ही कुछ गजेन्द्र के साथ भी हुआ. उसने अपनी राजनैतिक महत्त्वकांक्षा के चलते विगत एक दशक में चार राजनैतिक दलों की यात्रा कर डाली, और तो और विधानसभा चुनाव में हाथ भी आजमाया डाला. संभव हो कि उस व्यक्ति ने अपनी राजनैतिक महत्त्वाकांक्षा को पूरा करने, आलाकमान की निगाह में आने के लिए ऐसा दुस्साहस किया हो और उसके अतिशय उत्साह में हुई एक असावधानी ने उसको मृत्यु के आगोश में पहुँचा दिया.

इसके अतिरिक्त आम आदमी पार्टी के नेताओं की, मंचस्थ मुख्यमंत्री, उप-मुख्यमंत्री सहित अनेक नेताओं की भूमिका को भी कम दोषी नहीं माना जा सकता है. वर्तमान में वे आन्दोलनकारियों का जत्था नहीं वरन दिल्ली की सरकार के रूप में स्थापित हैं. साथ ही वो रैली खुद आम आदमी पार्टी ने बुलाई थी, जिसमें पार्टी के चंद नेता ही नहीं बल्कि खुद मुख्यमंत्री, उप-मुख्यमंत्री भी वहाँ उपस्थित थे. ऐसे में किसी भी व्यक्ति का आत्महत्या करने का ऐलान करते हुए पेड़ पर चढ़ जाना, अपने गमछे का फंदा बनाकर गले में डाल लेना आदि नकारने योग्य स्थितियां नहीं हैं. सरकार होने के नाते, रैली के आयोजक होने के नाते आम आदमी पार्टी की जिम्मेवारी बनती थी कि वो पूरी कड़ाई से उस व्यक्ति को पेड़ से नीचे उतारने के आदेश पुलिस प्रशासन को देते. इसके उलट पार्टी के नेता मंच से महज अपील सी करते रहे और बार-बार केंद्र सरकार, राज्य सरकार के सम्बन्धों का रोना रोते रहे.

ऐसा नहीं है कि जंतर-मंतर पर हुई मृत्यु ही सामाजिक संवेदनहीनता की एकमात्र परिचायक है वरन इससे पूर्व भी अनेक घटनाएँ, दुर्घटनाएं इस तरह की सामने आती रही हैं जिनमें समाज के संवेदनहीन होने के लक्षण स्पष्ट परिलक्षित हुए हैं. सड़क दुर्घटनाओं में, कहीं सुनसान में, अनजान व्यक्ति के साथ होने वाली किसी भी विषम स्थिति में लोगों का उस घटना से बचकर निकलना आम बात बनी हुई है. जंतर-मंतर पर हुई उस मौत को किसी किसान द्वारा की गई आत्महत्या बताने से किसी की लापरवाही पर पर्दा नहीं डाला जा सकता है. भविष्य में ऐसी दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो इसके लिए सभी राजनैतिक दलों को मिलकर काम करने की आवश्यकता है, समाज को संवेदित करने की आवश्यकता है, लोगों को यथोचित राजनैतिक मूल्यों को समझाए जाने की आवश्यकता है. 

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06 मार्च 2015

दलों के दलदल में एक और दल


जैसा कि अंदेशा व्यक्त किया जा रहा था, हुआ भी कुछ वैसा ही. योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण को आम आदमी पार्टी की राजनैतिक मामलों की समिति (पीएसी) से निकाल दिया गया. आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल की अनुपस्थिति में सम्पन्न राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में इन पर अनुशासनहीनता का आरोप लगाकर निकाला गया. इसके साथ ही ये सम्भावना भी व्यक्त की जा रही थी कि केजरीवाल पार्टी के इस अंदरूनी घमासान को रोकने के लिए संयोजक पद से इस्तीफा दे सकते हैं. ऐसा हुआ भी किन्तु उनके इस्तीफे को नामंजूर करते हुए उन्हें संयोजक पद पर बने रहने के संकेत दे दिए गए हैं. ये समूचा घटनाक्रम आश्चर्यचकित करने वाला नहीं लगता क्योंकि जिस दिन से योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण के बगावती स्वर मीडिया के माध्यम से जनता के बीच आने लगे थे, उसी दिन से इस तरह की कार्यवाही की अटकल लगाई जाने लगी थी. मतदान द्वारा इन लोगों को पीएसी से निकाले जाने से ज्यादा आश्चर्य करने वाली बात ये रही कि इस कार्यवाही में ग्यारह के मुकाबले आठ मत योगेन्द्र और प्रशांत के पक्ष में आये. इससे स्पष्ट है कि इनके द्वारा लगाये जा रहे आरोपों अथवा उठाई जाने वाली आपत्तियों पर ये दोनों अकेले नहीं हैं. ऐसे में आने वाले दिनों में सम्भावना इस बात की भी है कि अन्य लोगों पर भी किसी न किसी तरह से अनुशासनात्मक कार्यवाही की जा सकती है. 
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फिलहाल तो ये भविष्य के गर्भ में है किन्तु जिस तरह से अपने जन्म से वर्तमान तक आम आदमी पार्टी अलग तरह से राजनीति करने वाली, राजनैतिक सत्ता परिवर्तन से अधिक व्यवस्था परिवर्तन हेतु कार्य करने के रूप में खुद को प्रसारित-प्रचारित करती रही है, उसके इस दावे को लगातार संशय की दृष्टि से ही देखा जाता रहा है. दिल्ली चुनाव में पहली बार जब आम आदमी पार्टी ने अपनी धुर विरोधी पार्टी कांग्रेस के साथ सत्ता संभाली तो तीव्र विरोध के बाद भी लोगों ने इस दृष्टिकोण से उनके गठबंधन को स्वीकार किया कि व्यवस्था बदलने के लिए आरंभिक दौर में कतिपय निर्णय, कई समझौते करने ही पड़ते हैं. अन्ना आन्दोलन से उपजी संवेदना, सहानुभूति के कारण से बहुतायत में लोगों को इस बात का विश्वास बना रहा कि कांग्रेस के समर्थन से प्राप्त सत्ता का सदुपयोग आम आदमी पार्टी द्वारा अवश्य ही किया जायेगा. इस विश्वास को उस समय ठेस पहुँची जबकि केजरीवाल और उनकी समूची टीम चुनाव पूर्व विरोधी दल कांग्रेस पर लगाये गए आरोपों को विस्मृत सा कर गए, उन पर यू-टर्न मार गए. इसके बाद बजाय व्यवस्था परिवर्तन के आम आदमी पार्टी भी सत्ता के लालच में फँसकर लोकसभा चुनावों में उतर आई, जिसका खामियाजा भी उसे भुगतना पड़ा. हालाँकि बाद में दिल्ली विधानसभा चुनाव में जनता ने उसे प्रचंड बहुमत देकर कार्य करने का, व्यवस्था सुधारने का एक और अवसर प्रदान किया.
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इस अवसर पर भी आम आदमी पार्टी ऐसे कोई काम करती नहीं दिखी, जिसे बाकी राजनैतिक दलों से अलग माना जाता. टिकट वितरण में खरीद-फरोख्त; सत्ता पाने के लिए मुफ्त सेवाओं, वस्तुओं का वादा करना; आम आदमी की पार्टी का दावा करने के बाद भी विशिष्ठ लोगों को टिकट देना; ईमानदारी का दम भरने के बाद भी फर्जी चंदे लेने जैसे आरोपों से दो-चार होना आदि वे बातें रहीं जिसने पार्टी के अलग दिखने को धुंधला किया. ऐसी बातों को आम आदमी पार्टी के नेताओं, कार्यकर्ताओं ने पार्टी की छवि धूमिल करने को विरोधियों की साजिश बताया किन्तु शपथ ग्रहण के बाद से आम आदमी पार्टी की अंदरूनी कलह शनैः-शनैः बाहर आने लगी. पीएसी से निकाले जाने के बाद भले ही योगेन्द्र यादव अथवा प्रशांत भूषण द्वारा खुद को पार्टी का वफादार सिपाही बताया जाए; पार्टी के आदेश का सम्मान करते हुए इसके लिए कार्य करते रहना कहा जाये; पार्टी के लोगों द्वारा भी भले ही उनके विरुद्ध कार्यवाही पर अब लीपापोती की जाए किन्तु विगत कुछ समय से पार्टी के शीर्ष नेताओं में जिस तरह से वार्तालाप चल रहा था, उससे स्पष्ट है कि इनमें आपस में कुछ सही नहीं चल रहा है. आपस में बातचीत, मेल-मुलाकात करने के स्थान पर मीडिया के माध्यम से पत्रों का, संवादों का आदान-प्रदान संबंधों की खटास को दर्शाता है.
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ये आकलन करना कहीं से भी कठिन नहीं है कि आम आदमी पार्टी में व्यवस्था परिवर्तन के स्थान पर सत्ता-लोलुपता बढ़ने लगी. हरियाणा विधानसभा चुनाव न लड़ने का फैसला भले ही पार्टी को इस दृष्टि से आगे लाता हो कि उनमें सत्ता के प्रति लोभ नहीं है किन्तु यही वो बिंदु है जहाँ से अंदरूनी कलह का आरम्भ होता है. योगेन्द्र यादव को हरियाणा का मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करना, कार्यकारिणी द्वारा भी हरियाणा विधानसभा में उतरने के पक्ष में बहुमत देना और फिर अंततः केजरीवाल द्वारा अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए चुनाव से इंकार कर देना कहीं न कहीं विवाद की जड़ बना. इस विवाद को उस खबर ने और हवा दे दी जिसमें केजरीवाल के पर्सनल सेक्रेटरी ने इस मामले में योगेन्द्र यादव के विरुद्ध सबूत एकत्र करने के लिए स्टिंग का सहारा लिया. योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण द्वारा केजरीवाल के व्यवहार, बर्ताव को लेकर उठाये गए सवालों को भले ही गंभीरता से नहीं लिया गया किन्तु उनकी सत्यता को भी पार्टी द्वारा अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि पार्टी के संस्थापक सदस्यों और प्रमुख व्यक्तियों द्वारा पूर्व में केजरीवाल का साथ छोड़कर जाना अपने आपमें बहुत कुछ कहता नज़र आता है. इन तमाम घटनाओं के साथ-साथ आगामी विधानसभा चुनावों में पार्टी के उतरने, न उतरने को लेकर भी जिस तरह से विवाद खड़ा हुआ है उसने भी स्पष्ट धारणा बनाई है कि भले ही केजरीवाल में सत्ता-लोलुपता न हो किन्तु पार्टी के अन्य शीर्ष नेताओं के साथ ऐसा नहीं है. सत्ता के प्रति यही आकर्षण आम आदमी पार्टी को शेष राजनैतिक दलों जैसा बनाता है.
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इन घटनाओं के साथ-साथ पार्टी के अंदरूनी विवाद के पीछे राज्यसभा की तीन सीटों का मिलना भी एक कारण माना जा सकता है. यदि एकबारगी इसे पार्श्व में रख भी दिया जाये तो भी इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि समूचे मामले में केजरीवाल द्वारा सकारात्मक भूमिका का निर्वहन नहीं किया गया है. इसमें कहीं कोई दोराय नहीं कि सम्पूर्ण देश में आम आदमी पार्टी की पहचान अरविन्द केजरीवाल के नाम से ही है और दिल्ली में इतना प्रचंड बहुमत भी केजरीवाल की व्यक्तिगत कार्यक्षमता के साथ-साथ उनके नाम से ही मिला है. इसके बाद भी इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि पार्टी को मजबूती प्रदान करने में, उसके प्रति जनसमर्थन जुटाने में योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण आदि सहित अन्य लोगों का भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है. पूर्व में भी केजरीवाल की कार्यशैली पर ऊँगली उठाकर पार्टी के कई संस्थापक सदस्यों का चले जाना भी पार्टी की आन्तरिक लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को संदेह के घेरे में खड़ा करता है. इस संदेह को वर्तमान घटनाक्रम ने और पुख्ता किया है और उन सभी लोगों के साथ धोखा सा ही किया है जो आम आदमी पार्टी से कुछ अलग करने की आशा लगाये बैठे थे. एक व्यक्ति के इशारे पर चलती पार्टी, होते निर्णय, विरोधी स्वरों को नजरअंदाज़ कर देना, बढ़ते विरोध को दबाने के लिए सदस्यों को निष्कासित करना, आंतरिक लोकपाल को अहमियत न देना, दो-दो पदों पर आसीन होने की मानसिकता आदि दर्शाती है कि आम आदमी पार्टी भी शेष राजनैतिक दलों से पीछे नहीं है. राजनीति को गरियाते हुए राजनीति में कुछ अलग करने की मानसिकता से, सत्ता-परिवर्तन के स्थान पर व्यवस्था-परिवर्तन को उतरी पार्टी भी पार्टियों के दल-दल में वृद्धि करती ही दिखती है. केजरीवाल और उनकी समूची टीम ने पहले आन्दोलन की लहर से राजनैतिक पार्टी बनाकर विशुद्ध आन्दोलनकारियों के साथ छल किया, अब आंतिरक लोकतंत्र का गला घोंटकर उन मतदाताओं के साथ धोखा किया है जिन्होंने मुफ्त वादे की आड़ में किसी परिवर्तन की चाह में आम आदमी पार्टी को प्रचंड बहुमत से पुनः सत्ता सौंपी है.



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ये आलेख जनसंदेश टाइम्स के दिनांक 06-03-2015 के अंक में सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ.