06 March 2015

दलों के दलदल में एक और दल


जैसा कि अंदेशा व्यक्त किया जा रहा था, हुआ भी कुछ वैसा ही. योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण को आम आदमी पार्टी की राजनैतिक मामलों की समिति (पीएसी) से निकाल दिया गया. आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल की अनुपस्थिति में सम्पन्न राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में इन पर अनुशासनहीनता का आरोप लगाकर निकाला गया. इसके साथ ही ये सम्भावना भी व्यक्त की जा रही थी कि केजरीवाल पार्टी के इस अंदरूनी घमासान को रोकने के लिए संयोजक पद से इस्तीफा दे सकते हैं. ऐसा हुआ भी किन्तु उनके इस्तीफे को नामंजूर करते हुए उन्हें संयोजक पद पर बने रहने के संकेत दे दिए गए हैं. ये समूचा घटनाक्रम आश्चर्यचकित करने वाला नहीं लगता क्योंकि जिस दिन से योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण के बगावती स्वर मीडिया के माध्यम से जनता के बीच आने लगे थे, उसी दिन से इस तरह की कार्यवाही की अटकल लगाई जाने लगी थी. मतदान द्वारा इन लोगों को पीएसी से निकाले जाने से ज्यादा आश्चर्य करने वाली बात ये रही कि इस कार्यवाही में ग्यारह के मुकाबले आठ मत योगेन्द्र और प्रशांत के पक्ष में आये. इससे स्पष्ट है कि इनके द्वारा लगाये जा रहे आरोपों अथवा उठाई जाने वाली आपत्तियों पर ये दोनों अकेले नहीं हैं. ऐसे में आने वाले दिनों में सम्भावना इस बात की भी है कि अन्य लोगों पर भी किसी न किसी तरह से अनुशासनात्मक कार्यवाही की जा सकती है. 
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फिलहाल तो ये भविष्य के गर्भ में है किन्तु जिस तरह से अपने जन्म से वर्तमान तक आम आदमी पार्टी अलग तरह से राजनीति करने वाली, राजनैतिक सत्ता परिवर्तन से अधिक व्यवस्था परिवर्तन हेतु कार्य करने के रूप में खुद को प्रसारित-प्रचारित करती रही है, उसके इस दावे को लगातार संशय की दृष्टि से ही देखा जाता रहा है. दिल्ली चुनाव में पहली बार जब आम आदमी पार्टी ने अपनी धुर विरोधी पार्टी कांग्रेस के साथ सत्ता संभाली तो तीव्र विरोध के बाद भी लोगों ने इस दृष्टिकोण से उनके गठबंधन को स्वीकार किया कि व्यवस्था बदलने के लिए आरंभिक दौर में कतिपय निर्णय, कई समझौते करने ही पड़ते हैं. अन्ना आन्दोलन से उपजी संवेदना, सहानुभूति के कारण से बहुतायत में लोगों को इस बात का विश्वास बना रहा कि कांग्रेस के समर्थन से प्राप्त सत्ता का सदुपयोग आम आदमी पार्टी द्वारा अवश्य ही किया जायेगा. इस विश्वास को उस समय ठेस पहुँची जबकि केजरीवाल और उनकी समूची टीम चुनाव पूर्व विरोधी दल कांग्रेस पर लगाये गए आरोपों को विस्मृत सा कर गए, उन पर यू-टर्न मार गए. इसके बाद बजाय व्यवस्था परिवर्तन के आम आदमी पार्टी भी सत्ता के लालच में फँसकर लोकसभा चुनावों में उतर आई, जिसका खामियाजा भी उसे भुगतना पड़ा. हालाँकि बाद में दिल्ली विधानसभा चुनाव में जनता ने उसे प्रचंड बहुमत देकर कार्य करने का, व्यवस्था सुधारने का एक और अवसर प्रदान किया.
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इस अवसर पर भी आम आदमी पार्टी ऐसे कोई काम करती नहीं दिखी, जिसे बाकी राजनैतिक दलों से अलग माना जाता. टिकट वितरण में खरीद-फरोख्त; सत्ता पाने के लिए मुफ्त सेवाओं, वस्तुओं का वादा करना; आम आदमी की पार्टी का दावा करने के बाद भी विशिष्ठ लोगों को टिकट देना; ईमानदारी का दम भरने के बाद भी फर्जी चंदे लेने जैसे आरोपों से दो-चार होना आदि वे बातें रहीं जिसने पार्टी के अलग दिखने को धुंधला किया. ऐसी बातों को आम आदमी पार्टी के नेताओं, कार्यकर्ताओं ने पार्टी की छवि धूमिल करने को विरोधियों की साजिश बताया किन्तु शपथ ग्रहण के बाद से आम आदमी पार्टी की अंदरूनी कलह शनैः-शनैः बाहर आने लगी. पीएसी से निकाले जाने के बाद भले ही योगेन्द्र यादव अथवा प्रशांत भूषण द्वारा खुद को पार्टी का वफादार सिपाही बताया जाए; पार्टी के आदेश का सम्मान करते हुए इसके लिए कार्य करते रहना कहा जाये; पार्टी के लोगों द्वारा भी भले ही उनके विरुद्ध कार्यवाही पर अब लीपापोती की जाए किन्तु विगत कुछ समय से पार्टी के शीर्ष नेताओं में जिस तरह से वार्तालाप चल रहा था, उससे स्पष्ट है कि इनमें आपस में कुछ सही नहीं चल रहा है. आपस में बातचीत, मेल-मुलाकात करने के स्थान पर मीडिया के माध्यम से पत्रों का, संवादों का आदान-प्रदान संबंधों की खटास को दर्शाता है.
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ये आकलन करना कहीं से भी कठिन नहीं है कि आम आदमी पार्टी में व्यवस्था परिवर्तन के स्थान पर सत्ता-लोलुपता बढ़ने लगी. हरियाणा विधानसभा चुनाव न लड़ने का फैसला भले ही पार्टी को इस दृष्टि से आगे लाता हो कि उनमें सत्ता के प्रति लोभ नहीं है किन्तु यही वो बिंदु है जहाँ से अंदरूनी कलह का आरम्भ होता है. योगेन्द्र यादव को हरियाणा का मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करना, कार्यकारिणी द्वारा भी हरियाणा विधानसभा में उतरने के पक्ष में बहुमत देना और फिर अंततः केजरीवाल द्वारा अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए चुनाव से इंकार कर देना कहीं न कहीं विवाद की जड़ बना. इस विवाद को उस खबर ने और हवा दे दी जिसमें केजरीवाल के पर्सनल सेक्रेटरी ने इस मामले में योगेन्द्र यादव के विरुद्ध सबूत एकत्र करने के लिए स्टिंग का सहारा लिया. योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण द्वारा केजरीवाल के व्यवहार, बर्ताव को लेकर उठाये गए सवालों को भले ही गंभीरता से नहीं लिया गया किन्तु उनकी सत्यता को भी पार्टी द्वारा अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि पार्टी के संस्थापक सदस्यों और प्रमुख व्यक्तियों द्वारा पूर्व में केजरीवाल का साथ छोड़कर जाना अपने आपमें बहुत कुछ कहता नज़र आता है. इन तमाम घटनाओं के साथ-साथ आगामी विधानसभा चुनावों में पार्टी के उतरने, न उतरने को लेकर भी जिस तरह से विवाद खड़ा हुआ है उसने भी स्पष्ट धारणा बनाई है कि भले ही केजरीवाल में सत्ता-लोलुपता न हो किन्तु पार्टी के अन्य शीर्ष नेताओं के साथ ऐसा नहीं है. सत्ता के प्रति यही आकर्षण आम आदमी पार्टी को शेष राजनैतिक दलों जैसा बनाता है.
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इन घटनाओं के साथ-साथ पार्टी के अंदरूनी विवाद के पीछे राज्यसभा की तीन सीटों का मिलना भी एक कारण माना जा सकता है. यदि एकबारगी इसे पार्श्व में रख भी दिया जाये तो भी इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि समूचे मामले में केजरीवाल द्वारा सकारात्मक भूमिका का निर्वहन नहीं किया गया है. इसमें कहीं कोई दोराय नहीं कि सम्पूर्ण देश में आम आदमी पार्टी की पहचान अरविन्द केजरीवाल के नाम से ही है और दिल्ली में इतना प्रचंड बहुमत भी केजरीवाल की व्यक्तिगत कार्यक्षमता के साथ-साथ उनके नाम से ही मिला है. इसके बाद भी इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि पार्टी को मजबूती प्रदान करने में, उसके प्रति जनसमर्थन जुटाने में योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण आदि सहित अन्य लोगों का भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है. पूर्व में भी केजरीवाल की कार्यशैली पर ऊँगली उठाकर पार्टी के कई संस्थापक सदस्यों का चले जाना भी पार्टी की आन्तरिक लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को संदेह के घेरे में खड़ा करता है. इस संदेह को वर्तमान घटनाक्रम ने और पुख्ता किया है और उन सभी लोगों के साथ धोखा सा ही किया है जो आम आदमी पार्टी से कुछ अलग करने की आशा लगाये बैठे थे. एक व्यक्ति के इशारे पर चलती पार्टी, होते निर्णय, विरोधी स्वरों को नजरअंदाज़ कर देना, बढ़ते विरोध को दबाने के लिए सदस्यों को निष्कासित करना, आंतरिक लोकपाल को अहमियत न देना, दो-दो पदों पर आसीन होने की मानसिकता आदि दर्शाती है कि आम आदमी पार्टी भी शेष राजनैतिक दलों से पीछे नहीं है. राजनीति को गरियाते हुए राजनीति में कुछ अलग करने की मानसिकता से, सत्ता-परिवर्तन के स्थान पर व्यवस्था-परिवर्तन को उतरी पार्टी भी पार्टियों के दल-दल में वृद्धि करती ही दिखती है. केजरीवाल और उनकी समूची टीम ने पहले आन्दोलन की लहर से राजनैतिक पार्टी बनाकर विशुद्ध आन्दोलनकारियों के साथ छल किया, अब आंतिरक लोकतंत्र का गला घोंटकर उन मतदाताओं के साथ धोखा किया है जिन्होंने मुफ्त वादे की आड़ में किसी परिवर्तन की चाह में आम आदमी पार्टी को प्रचंड बहुमत से पुनः सत्ता सौंपी है.

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ये आलेख जनसंदेश टाइम्स के दिनांक 06-03-2014 के अंक में सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ.

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