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09 जून 2025

मानसिकता के संक्रमणकाल में समाज

हत्या तो हत्या है और जिसने भी की है उसे सजा मिलनी ही चाहिए. यह केवल किसी क्रिया की प्रतिक्रिया देना मात्र नहीं होता बल्कि एक हँसते-खेलते इन्सान को हमेशा के लिए शांत कर देना होता है. एक परिवार को ज़िन्दगी भर के लिए न भरने वाला घाव देना होता है. समाज के बीच खुद हत्यारे के परिवार को भी शर्मिंदगी से जीवन गुजारने की सजा देना होता है. अभी हाल के चर्चित राजा-सोनम रघुवंशी मामले में इंदौर के इस नवदम्पत्ति जोड़े के अचानक से गायब हो जाने की खबर के बाद पति राजा का शव मिलना और पत्नी सोनम का गायब होना शासन-प्रशासन पर, मेघालय के पर्यटन पर, पर्यटकों की सुरक्षा पर सवालिया निशान लगा रहा था. राजा की लाश मिलने के सत्रह दिन बाद अचानक से सोनम पुलिस को मिली. उसकी गिरफ्तारी हुई अथवा उसने आत्मसमर्पण किया, ये बाद की बात है. उसी के ऊपर अपने पति की हत्या करवाने का शक जताया जा रहा है,  हत्या उसी ने की या करवाई इस बारे में अंतिम सत्य तो बाद में पता चलेगा मगर जिस तरह से लोगों की प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं, उससे ऐसा लग रहा है जैसे समाज, परिवार, विवाह संस्था रसातल में पहुँचने ही वाले हैं. मीडिया, सोशल मीडिया में इस तरह से बयानबाजी हो रही है मानो पति-पत्नी संबंधों में हत्या जैसा ये पहला और आश्चर्यजनक मामला हो.

 



इस एक घटना के साथ कुछ महीने पहले हुए नीले ड्रम कांड को, पॉलीथीन में पति के टुकड़े भरने वाले कांड को जोड़ा जा रहा है. पुरुष समाज को, पतियों को एकदम से डर के साये में देखा जाने लगा है. ऐसा लगने लगा है जैसे कि हर पत्नी हत्यारिन हो और हर पति तलवार-चाकू की नोंक पर. सोचिएगा एक पल को कि इस घटना से सारा समाज सदमे में क्यों है? क्या इसलिए कि पत्नियाँ अब पतियों की हत्या करने-करवाने लगीं? क्या इसलिए कि महिलाओं ने इस हत्याकारी क्षेत्र में पुरुषों/पतियों के एकाधिकार पर अतिक्रमण करना शुरू कर दिया? क्या इसलिए कि पत्नी के रूप में एक महिला का इस तरह का स्वरूप समाज ने इक्कीसवीं सदी में भी नहीं सोचा था? कहीं इसलिए तो सदमे जैसी स्थिति नहीं कि एक सेक्स सिम्बल के रूप में, एक उत्पाद के रूप में, विज्ञापन के लिए नग्न-अर्धनग्न अवस्था में सुलभ रूप में समझ आने वाली आधुनिक महिला अब साजिश रचती, हत्या करती-करवाती नजर आने लगी है? इस छवि में भी आश्चर्य कैसा, सदमा कैसा? टीवी के माध्यम से ऐसी स्त्रियाँ पहले ही आपके घर में, आपके बेडरूम में, आपके बच्चों के बीच स्थापित हो चुकी हैं. इन तथाकथित आधुनिक जीवन-शैली जीने वाली महिलाओं को करोड़ों-अरबों रुपयों का व्यापार करने के साथ-साथ साजिश रचते भी दिखाया जाता है. परिवार में विखंडन करवाती इस धारावाहिक स्त्री को बाहर हत्या करते, हत्या की साजिश रचते भी दिखाया जा रहा है. आखिर इस क्रिया की प्रतिक्रिया तो होनी ही है.

 

यदि समाज इस कारण सदमे में है कि एक महिला सामान्य भाव से, बिना किसी घबराहट-भय के एक हत्याकांड में शामिल है तो गौर करिएगा, ससुराल में एक बहू-पत्नी की हत्या में पति रूपी पुरुष के साथ सास, जेठानी, ननद जैसी स्त्रियाँ भी शामिल रही हैं. एक महिला को जलाते समय, उसका गला घोंटते समय जब एक महिला के रूप में उनके हाथ नहीं काँपे तो फिर सोनम के हत्यारी होने की आशंका पर इतनी हलचल क्यों? वैसे यहाँ याद रखने वाली एक बात ये भी है कि इसी देश में बरसों तक जन्मी-अजन्मी बेटियों को मौत की नींद में सुलाने वाले हाथों में ज्यादातर हाथ महिलाओं के ही रहे हैं. हाँ, एक सत्य ये अवश्य है कि पिछले कुछ सालों में ख़ुद महिलाओं ने ही महिलाओं के पक्ष में बने क़ानूनों का जिस तरह दुरुपयोग किया है, उससे आज जागरूक, कर्तव्यनिष्ठ, पारिवारिक-सामाजिक दायित्व-बोध को समझने वाली महिलाओं ने भी ऐसी महिलाओं का खुलकर विरोध करना शुरू कर दिया है.

 

समाज की बहुतायत महिलाओं का ऐसी हत्यारी महिलाओं के विरोध में खड़े होने का कारण समाज में व्याप्त सकारात्मकता का होना है. देखा जाये तो समाज कई-कई मानसिकता वालों से, अनेक प्रकार की मनोदशा वालों से मिलकर संचालित होता है. समाज में दोनों तरह के स्त्री और पुरुष हैं. हत्यारी मानसिकता स्त्री और पुरुष दोनों में है, संस्कारी मानसिकता भी दोनों में है. ऐसा नहीं है कि समाज के सभी स्त्री और पुरुष समाज का भला करते घूम रहे हों, उनमें कोई बुराई न हो और ऐसा भी नहीं है कि समाज में स्त्री-पुरुष सिर्फ हत्या, साजिश ही करने में लगे हों. स्व-मानसिक स्थिति के चलते इन्सान अपने क़दमों को उठाता है और घटना को अंजाम देता है. ये और बात है कि इंटरनेट की, रील की, आधुनिकता की चकाचौंध में रची-बसी दुनिया ने संस्कारों को, संस्कृति को, जीवन-मूल्यों को, परिवार को, समाज को, यहाँ के व्यवस्थित ताने-बाने को तिलांजलि दे दी है. संबंधों का, रिश्तों का कोई मोल अब जैसे दिखता ही नहीं है. आधुनिकता के चक्कर में सिर्फ और सिर्फ विखंडन, ध्वंस, परित्याग आदि ही देखने को मिल रहा है. ऐसी मानसिकता के बीच भी यदि सामाजिक संरचना की, पारिवारिक ढाँचे की, विवाह संस्था की परवाह करने वाले लोग हैं, महिलाएँ हैं, पुरुष हैं तो निश्चित रूप से परिदृश्य अभी पूरी तरह से काला नहीं हुआ है, पूरी तरह से अंधकारमय नहीं हुआ है. रौशनी की एक सम्भावना अभी भी है. अब इस सम्भावना में रील की इस आभासी दुनिया में झूमते मम्मी-पापा-बच्चों को तय करना होगा कि वे किस तरह की मानसिकता के इंसान बनना चाहते हैं. किस तरह की मानसिकता का समाज बनाना चाहते हैं.

 


18 जून 2024

सौवीं बार रक्तदान

अबकी बार, सौवीं बार


प्रतिवर्ष चार बार रक्तदान का स्वयं से किया गया वादा अभी तक निरंतरता, नियमितता के साथ निभाया जा रहा है.


मार्च, जून, सितम्बर, दिसम्बर में स्वयं से जुड़ी कुछ विशेष तारीखों पर रक्तदान करना होता है. विगत कुछ वर्षों से नियति के चलते 10 जून को रक्तदान करने की नियमितता में कतिपय कारणों से अवरोध आया लेकिन रक्तदान में अनियमितता नहीं आने देना था.


इसी कारण से रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस, 18 जून 2024 को रक्तदान का शतक पूरा किया. यह रक्तदान रानी झाँसी के साथ-साथ हमारी पारिवरिक सदस्य श्वेता को समर्पित.






31 दिसंबर 2023

वर्ष का दुखद अंत... कष्टकारी आरम्भ

दिसम्बर का अंतिम दिन पूरी तरह से समाप्त भी नहीं हो पाता है कि लोगों के द्वारा नए वर्ष के शुभकामना संदेशों का आना शुरू हो जाता है. इधर जबसे सोशल मीडिया मंचों की बाढ़ आई है, उस पर लोगों का अधिकाधिक समय गुजरना शुरू हुआ है तबसे फोन के द्वारा बधाई, शुभकामना देने का चलन कम से कमतर हो गया है. फोन आने भले कम हो गए हों मगर संदेशों का सैलाब आकर मोबाइल के अन्दर तबाही सी मचा जाता है. फोन के द्वारा और मैसेज के द्वारा बधाई संदेशों के आने में बहुत बड़ा अंतर होता है. इस अंतर का समझ में आना उस समय और भी गहराई से महसूस होता है जबकि यहाँ भी औपचारिक और अनौपचारिक संबंधों जैसी स्थिति बनी हो.




हर हाथ में मोबाइल की स्थिति में और सामाजिक क्षेत्र में सक्रियता की स्थिति ने सभी को एक-दूसरे से जोड़ रखा है. ये और बात है कि इस जुड़ाव को कौन कितना शिद्दत से महसूस कर रहा है.अक्सर ऐसे लोग, जिनसे कि बहुत आत्मीय सम्बन्ध भी नहीं होते हैं वे फोन के द्वारा बातचीत करके खुद को आपका सबसे ख़ास बताने को आतुर रहते हैं. इसी तरह वे लोग जिनको ये एहसास होता है कि आपके जीवन में उनका क्या महत्त्व है वे दो-चार शब्दों के साथ ही अपनी बात को समाप्त करते हुए रिश्तों की गंभीरता को बनाये रखते हैं.


इसी गंभीरता और अगम्भीरता के दर्शन कुछ वर्ष पहले हुए थे जबकि नए साल का स्वागत हम अपने परिजन को विदाई देते हुए कर रहे थे. यह अजब सी असामान्य सी स्थिति थी. एक तरफ रिश्ते की मर्यादा, गंभीरता तो दूसरी तरफ सामाजिकता का निर्वहन. अजब सी असमंजस वाली स्थिति थी. समझ में नहीं आ रहा था कि किस तरह से खुद में समन्वय बनाया जाये. असमय बारिश भरे मौसम में अपने आँसुओं को बारिश की बूँदों के साथ मिलाते-बहते हुए एक तरफ पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन किया जा रहा था, दूसरी तरफ औपचारिकता में बंधे रिश्ते के कारण अगले ही पल सामाजिकता का भी निर्वहन करना पड़ रहा था. प्रयागराज की पावन धरती पर श्वसुर साहब की अंतिम यात्रा से लेकर उनके अंतिम संस्कार तक खुद को संयमित रखते हुए परिवार को दिलासा देने का काम भी हो रहा था वहीं दूसरी तरफ नए वर्ष की शुभकामनाओं, बधाइयों को भी सहेजने का काम किया जा रहा था.


समय बहुत कुछ दिखाता है, सिखाता है बशर्ते हम लोग उससे सीखना चाहें. उस वर्ष के जाते हुए दिन ने और आने वाले दिन ने एकसाथ बहुत कुछ सिखाया. 

आदरणीय श्वसुर साहब को सादर श्रद्धांजलि..




 

21 जुलाई 2022

मोबाइल का उपयोग और व्यक्ति का अकेलापन

आज लगभग हर हाथ मोबाइल से और सभी मोबाइल इंटरनेट सुविधा से सुसज्जित हैं. हम सभी अपने आसपास ऐसे लोगों को अवश्य ही देखते होंगे जो लगातार मोबाइल को ही निहारते रहते हैं. मोबाइल की स्क्रीन पर अपनी उंगलियाँ घुमाते रहते हैं. जबरदस्त व्यस्तता से भरे दिखाई पड़ने वाले ऐसे लोग वास्तविकता में अन्दर से किस कदर अकेलेपन से घिर चुके होते हैं, न उनको इसका भान होता है और न ही हम सब उसे समझ पाते हैं. इस अकेलेपन को न समझ पाने का एक बहुत बड़ा कारण यह भी होता है क्योंकि हम सब भी कहीं न कहीं इसी तरह की स्थिति का शिकार होते हैं.


निश्चित ही तकनीकी दौर में बिना तकनीक के आगे बढ़ना संभव नहीं है. इंटरनेट और स्मार्ट फोन ने यकीकन काम को गति दी है, सुविधाजनक बनाया है मगर इस गति और सुविधा ने व्यक्तियों को अकेला कर दिया है या कहें कि उनमें अकेलापन भर दिया है. ये चौंकने वाली बात नहीं है, बस इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है, अपने आसपास जो घटनाएँ हो रही हैं उनका विश्लेषण करने की आवश्यकता है. हम सभी को वो दौर याद होगा जबकि हमें डाटा की बहुत अधिक कीमत चुकानी पड़ती थी. उन दिनों में भी काम हुआ करते थे, नेट का उपयोग हुआ करता था मगर उसमें एक तरह की सीमितता थी. उस समय डाटा के उपयोग में मन-मष्तिष्क में एक तरह की किफ़ायत करने का भी भान हुआ करता था. उन दिनों के उलट आज देखें तो असीमित रूप में हम सबको डाटा मिला हुआ है मगर इसका कितना सदुपयोग किया जा रहा है या कहें कि हो रहा है ये सोचने वाली बात है.


लगभग मुफ्त के भाव मिलते डाटा ने और इंटरनेट की दुनिया में उपलब्ध अनेकानेक सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ने जैसे हम सबके आसपास एक तरह का कल्पनालोक बना दिया है. सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म की जबरदस्त उपलब्धता से व्यक्ति अपने आसपास की वास्तविक दुनिया से दूर होता गया और स्क्रीन पर दिखाई पड़ती दुनिया के करीब आता गया. इसी का दुष्परिणाम व्यक्तियों के अकेले होने के रूप में सामने आ रहा है. इसकी परिणति अवसाद, निराशा, कुंठा, अपराध, नशे की प्रवृत्ति आदि के रूप में दिखती हुई आत्महत्या तक जा पहुँची है. इसे कोई बनाई हुई आभासी स्थिति न कहिये बल्कि महसूस कीजिये.




हम, आप सभी सुबह-सुबह मोबाइल पर आते अनेकानेक सुप्रभात अथवा दार्शनिक संदेशों से दो-चार होते हैं. अक्सर इन संदेशों के प्रत्युत्तर में या तो सन्देश ही भेज दिया जाता है अथवा किसी इमोजी को भेज दिया जाता है. सन्देश भेजने वाले ने अपने दायित्व का निर्वहन कर लिया और उस सन्देश के प्रत्युत्तर में हम, आप ने अपने कर्तव्य का निर्वाह कर लिया. ये क्रम सामान्य दिनों में ही नहीं अपितु विशेष दिनों, अवसरों पर भी बना रहता है. जन्मदिन, वर्षगाँठ, पर, त्यौहार अथवा किसी भी ख़ुशी या ग़म के अवसर पर अब फोन करके बात करने जैसी स्थिति न के बराबर दिखाई पड़ती है. अब घनिष्ट यार-दोस्तों में भी देर-देर रात तक चैट करने की प्रवृत्ति पनप चुकी है. परिजनों के बीच, मित्रों के बीच, सहयोगियों के बीच, शहर-मोहल्ले के परिचितों के बीच आज एक तरह का अबोलापन सा बना हुआ है. कहने को पूरे दिन चैट होती है मगर बातचीत हुए महीनों बीत जाते हैं.


इस स्थिति को सहज समझना ही नादानी है और समाज में अकेलापन भर रही है. कोई भी व्यक्ति हो वह अपनी लगातार की दिनचर्या में कभी परेशान भी होता है, कभी खुश भी रहता है. कभी उसे अपने कार्यक्षेत्र में कोई उलझन आती है तो कभी वह पारिवारिक समस्या से जूझता है. किसी समय में आपस में बातचीत से ऐसी समस्याओं, परेशानियों का हल निकल आया करता था, यदि हल न भी निकलता था तो अपनी बात कह लेने से, सामने वाले से सांत्वना के दो बोल मिल जाने से भी मन हल्का हो जाया करता था. अब मैसेज के द्वारा न तो सामने वाले की मनोस्थिति समझ आ रही है और न ही उसकी ख़ुशी, ग़म के बारे में समझना हो पा रहा है.


अपने आसपास भीड़ होने, देखने के बाद भी व्यक्ति नितांत अकेला अपने मोबाइल की स्क्रीन में ही केन्द्रित है. सोशल मीडिया, इंटरनेट के अनकहे से सम्मोहन में व्यक्ति सबकुछ भुला बैठा है. होना यह चाहिए कि जिस तरह से आये दिन युवाओं में, किशोरों में अवसाद, हताशा, निराशा, नाराजगी, चिडचिडापन, आक्रोश आदि देखने को मिलने लगा है, उसके समाधान के लिए प्रयास किये जाएँ. परिवार में, सहयोगियों में आपस में बातचीत के पुराने दौर वापस लाये जाएँ. संपर्क बनाये रखने से ज्यादा आवश्यक है कि आपस में सम्बन्ध बनाये जाएँ. शाम को निश्चित रूप से सभी को मोबाइल, सोशल मीडिया, इंटरनेट से बाहर निकल एक-दूसरे से मिलने-जुलने को अनिवार्य बनायें. युवाओं और किशोरों को इंटरनेट की आभासी रील वाली दुनिया से वास्तविक संबंधों, रिश्तों वाली दुनिया की सैर करवाएं. मोबाइल का उपयोग अत्यंत आवश्यक होने की दशा में ही करने के प्रयास किये जाने चाहिए.


यह सत्य है कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में तकनीकी बहाव को रोका नहीं जा सकता है, उससे बचा भी नहीं जा सकता है मगर अपने व्यवहार से, मानसिकता से उस पर नियंत्रण अवश्य लगाया जा सकता है. जिस तरह प्राकृतिक रूप से सर्दी, गर्मी, बरसात को रोका नहीं जा सकता परन्तु उनसे बचने के उपाय अवश्य किये जा सकते हैं, कुछ ऐसा ही हम सबको मोबाइल, इंटरनेट, सोशल मीडिया के उपयोग को लेकर करना होगा. स्क्रीन की भीड़ भरी आभासी दुनिया में अकेलेपन का शिकार होने से बचने के लिए अपने आसपास की वास्तविक दुनिया से पहले की तरह सम्बन्ध बनाने होंगे.


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16 दिसंबर 2021

खुशियों को खोजा जा रहा है

प्रत्येक वर्ष ऐसा होता है कि उसमें दुःख भी मिलते हैं और सुख भी मिलते हैं. ऐसा सभी के साथ ही होता है. सुख-दुःख का अपना ही साथ है. शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा होगा जो कह सकता होगा कि उसे किसी वर्ष में सिर्फ और सिर्फ सुख ही मिला है. इसी तरह शायद ही कोई होगा जिसे किसी वर्ष में सिर्फ दुःख ही दुःख मिले हों. सुख और दुःख के मिलने का अनुपात कुछ भी हो सकता है, उसकी तीव्रता कुछ भी हो सकती है.


इस वर्ष का आगमन बहुत ही बुरी खबर से हुआ. उस खबर को बुरा ही नहीं कहा जायेगा बल्कि वह एक ऐसा ज़ख्म है जिसे आजीवन भरना नहीं है. उस खबर के बाद से बहुत से पल ऐसे आये जिनके साथ कुछ न कुछ ख़ुशी जैसी स्थिति आई मगर पूरे वर्ष भर की या कहें कि जीवन भर की खुशियों को उस एक बुरी खबर के बराबर भी खड़ा नहीं कर सकते हैं. आखिर कैसे जीवन भर की ख़ुशी छोटे भाई की मृत्यु पर भारी बैठ जाएगी?


फ़िलहाल तो बस खुशियों को खोजा जा रहा है, कब तक खोजा जाता रहेगा पता नहीं. हाँ, कुछ छोटे-छोटे कार्यों को करके, कुछ कार्यों में सहयोगी बनकर मन को बहला लिया जा रहा है. कुछ यही कर रहे हैं प्रतिमाह नर नारायण सेवा में सहयोग देकर. 








16.12.2021
 

01 सितंबर 2021

सकारात्मक, सार्थक कार्यों का आकलन समाज करता ही है


 

कभी-कभी अपने बारे में लिखा हुआ पढ़ना सुखद लगता है. वैसे तो शायद ही कोई ऐसा होगा जिसे अपनी तारीफ सुनना पसंद नहीं होगा मगर जब खुद के सकारात्मक कामों के बारे में, वास्तविक कार्यों के बारे में, धरातल पर किये गए कामों के बारे में चर्चा की जाये, उनकी तारीफ की जाये तो ख़ुशी वाकई बहुत ज्यादा होती है. 


अक्सर हम सभी लोग अपने किये जा रहे कामों की प्रशंसा न मिलने पर, उसका कोई तत्काल प्रतिफल निकलता न देखकर निराशा जैसी स्थिति में पहुँच जाते हैं. ऐसा होना नहीं चाहिए. संभवतः ऐसा मानव स्वभाव होने के कारण होता होगा किन्तु हमें ध्यान रखना चाहिए कि यदि हम लोग ईमानदारी के साथ काम कर रहे हैं, निस्वार्थ रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं तो समाज हम सबके कामों का प्रतिफल सकारात्मक रूप से देता ही देता है. ऐसा इसलिए क्योंकि हम सभी कोई भी काम करें, समाज की निगाह उस पर रहती है. समाज अपनी तरह से उन कामों का आकलन करता रहता है. ये और बात है कि हमें लगता रहे कि समाज हमारे कामों को देख-समझ नहीं रहा है. 


इसलिए निस्वार्थ भाव से, ईमानदारी के साथ सकारात्मक, सार्थक कार्य किये जाते रहने चाहिए. समाज किसी न किसी दिन, किसी न किसी रूप में उसका सकारात्मक प्रतिफल देता ही देता है. 


दैनिक जागरण, कानपुर के जालौन संस्करण में प्रकाशित 


12 मार्च 2021

सामाजिक क्षेत्र के पिस्सू

किसी भी व्यक्ति का जीवन विविध क्षेत्रों से गुजरता हुआ पल्लवित, पुष्पित होता रहता है. इन क्षेत्रों में जहाँ प्राथमिक वरीयता में उसका पारिवारिक क्षेत्र आता है इसके बाद सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, साहित्यिक, राजनैतिक आदि क्षेत्रों में उसके जीवन का गुजरना होता है. जीवन के इन क्षेत्रों से गुजरते हुए व्यक्ति बहुत कुछ सीखता भी है और बहुत कुछ सिखाता भी है. पारिवारिक क्षेत्र का सम्बन्ध नितांत व्यक्तिगत होता है और इसमें अत्यंत निकटवर्ती लोगों को ही प्रवेश मिलता है. इसके उलट शेष क्षेत्रों की गतिविधियाँ सार्वजनिक ही कही जा सकती हैं. राजनीति हो, समाजसेवा हो, साहित्य गतिविधि हो सभी में व्यक्ति का सार्वजनिक जीवन उभर कर सामने आता है.


ऐसी स्थिति में भी बहुतायत रूप में सामाजिक क्षेत्र में किसी भी व्यक्ति की सक्रियता उसके व्यक्तित्व का वास्तविक स्वरूप का परिचायक बनती है. कहा जा सकता है कि सामाजिक क्षेत्र की गतिविधियाँ व्यक्ति के वास्तविक स्वरूप, चरित्र को उद्घाटित करती हैं. सामाजिक क्षेत्र के अनुभवों से सहज रूप में देखने में आया है कि पारिवारिक क्षेत्र को जिम्मेवारी के भाव से सँवार दिया गया है और इस क्षेत्र को जीवन के किसी भी अन्य दूसरे क्षेत्रों में सबसे ज्यादा पावन माना-समझा गया है. सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय लोगों को अत्यंत सम्मान के भाव से देखा जाता है. उनके बारे में ऐसी धारणा बनी होती है कि वे लोग अपने जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा निस्वार्थ भाव से दूसरे के लिए व्यतीत कर रहे हैं. समाज में आने वाली अनेक आपदाओं के समय में ऐसे सामाजिक लोगों कि सक्रियता ने अनेक बार उनको देवतुल्य भी माना है.


मानव के विकास के क्रम में जहाँ उसका शैक्षिक विकास हुआ, आर्थिक विकास हुआ, तकनीकी विकास हुआ वहीं कुछ क्षेत्रों में विकास का उलटा स्वरूप देखने को मिला. सामाजिक क्षेत्र में इसका बहुत ज्यादा असर देखने को मिला. अब इस क्षेत्र में ऐसे लोग बहुतायत में सक्रिय होते जा रहे हैं जिनका समाजसेवा से अथवा सामाजिक क्रियाकलापों से कोई लेना-देना नहीं. ऐसे लोग सामाजिक क्षेत्र के उन लोगों से एकदम अलग होते हैं जो निस्वार्थ भाव से काम करने में विश्वास करते हैं. ऐसे नए उभरते सामाजिक लोगों का एकमात्र उद्देश्य, सामाजिकता का अर्थ किसी भी तरह से मंच, माइक और सम्मान प्राप्त कर लेना है. सामाजिक क्षेत्र में समय के गुजरते रहने के साथ-साथ ऐसे लोगों का कारवां बढ़ता ही रहा है. ऐसे नए उभरते सामाजिक लोगों द्वाराजोड़-तोड़ करके मंच हासिल करना, सम्मान प्राप्त करना और ऐसा न हो पाने की दशा में कलह मचा देना, आयोजकों के चरित्र तक पर उँगली उठा देना ऐसे लोगों का सामान्य स्वभाव बनता जा रहा है. यही कारण है कि सामाजिक क्षेत्र में अब वास्तविक सामाजिक लोगों की मानसिकता में व्यापक परिवर्तन होता जा रहा है.


ये नए उभरते हुए सामाजिक या कहें कि असामाजिक प्राणी न केवल मंच को अपने कब्जे में करने की कोशिश करते हैं बल्कि कार्यक्रम आरम्भ होने के पहले ही ये तथाकथित सामाजिक लोग आयोजकों को निर्देशित करते हैं कि उनको फलां के पहले बोलने को बुलाया जाये. उनको सम्मान दिया जाये तो फलां के पहले. ऐसे लोगों की कोशिश यह भी रहती कि दूसरे को सम्मान मिलने ही न पाए.


समय व्यतीत करते जाने के साथ-साथ ऐसे लोग खुद को ताकतवर भी बनाते जाते हैं. स्थानीय होने के कारण ऐसे लोग ऐसे लोग मंच के लिए, मंच की कुर्सियों पर बैठने के लिए, सम्मान, पुरस्कार जबरिया माँग कर हड़पने की कोशिश में लगे रहते हैं. स्थानीय स्तर पर नाम होने के बाद भी ऐसे लोग अपने उपद्रवी स्वभाव, जबरन कब्ज़ा करने की मानसिकता के चलते एकाधिक बार बिना बुलाये, बिना आमंत्रित किये मंचासीन होते देखे गए हैं. बहुत बार सम्मान, पुरस्कार के लिए जोड़-तोड़ करते, डराते-धमकाते भी देखे गए हैं. यह समझ से परे है कि आखिर मंच की तृष्णा क्यों? आखिर हर मंच से सम्मान पाने की लालसा क्यों? आखिर बिना काम किये खुद को प्रतिस्थापित करने की कुंठित मनोभावना क्यों? आखिर सम्मान न मिलने पर, मंचासीन न किये जाने पर आयोजक के चरित्र को कटघरे में खड़ा कर देने की कुत्सित सोच क्यों?


जहाँ तक अनुभव की, सामाजिकता की बात है तो सामाजिक क्षेत्र भी किसी वृक्ष की तरह से होता है, जहाँ पुराने पत्तों को डाली से स्थान छोड़ना होगा और नए पत्तों के खिलने को जगह देनी होगी. सामाजिक क्षेत्र किसी परिपक्वता की माँग करता है जहाँ आपको अपनी जगह स्वयं बनानी पड़ती है. अतीत के अपने कुछ कामों, अपने नाम, मीडिया में अपने परिचय, परिवार के रसूख के बल पर आखिर कब तक नए लोगों से प्रतिस्पर्द्धा की जाती रहेगी? मंच पर जगह, लोगों के दिलों में सम्मान स्वतः पैदा होता है. किसी हनक के चलते, अपने उपद्रवी स्वभाव के चलते, कार्यक्रम में व्यवधान पैदा करने की मानसिकता रखने के चलते सिर्फ बदनामी ही पायी जा सकती है. संभव है कि ऐसे लोगों के स्वभाव के चलते आयोजक ऐसे लोगों को मंच प्रदान कर दे, माइक दे दे, सम्मान भी प्रदान कर दे मगर ऐसे लोग समाज में, नागरिकों में, प्रशासन में, मीडिया में स्थायी रूप से जगह नहीं बना पाते हैं. क्षणिक प्रतिष्ठा की चाह में, क्षणिक प्रचार की चाह में ऐसे लोग सिर्फ बदनामी ही पाते हैं. बिना किसी श्रम के, बिना किसी उल्लेखनीय कार्य के मंच, माइक, मंचासीन होने, सम्मान पाने की लालसा ऐसे लोगों के कमजोर व्यक्तित्व का ही परिचायक होता है. देखा जाये तो ऐसे लोग सामाजिक क्षेत्र के व्यक्तित्व नहीं बल्कि पिस्सू होते हैं जो सामाजिक क्षेत्र में उभरते हुए वास्तविक सामाजिक व्यक्तित्वों का लहू पी रहे होते हैं.

 


उक्त लेख बीपीएन टाइम्स, दिनांक - 12.03.2021 के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है.

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वंदेमातरम्

12 अगस्त 2020

लिव इन रिलेशन की सामाजिकता

समाज का बहुसंख्यक वर्ग वर्तमान में वैवाहिक संबंधों के प्रति नकारात्मकता दिखा रहा है. पति-पत्नी के आपसी संबंधों में लगातार बिखराव की स्थिति आ रही है. वैवाहिक संबंधों से वितृष्णा दिखाकर वर्तमान युवा और स्वच्छंद पीढ़ी एक नए रिश्ते को समाज में स्थापित कर चुकी है. यह नई संकल्पना लिव-इन-रिलेशन के नाम से जानी जा रही है. इन लोगों को विषय की गंभीरतासमाज पर उसका प्रभावउसकी दीर्घकालिकता का कोई अर्थ नहीं होता उन्हें तो सिर्फ और सिर्फ अपनी बात सिद्ध करना होता है. इस समय युवा वर्ग कैरियर बनाने की जद्दोजहद में लगा हुआ है ऐसे में उसके लिए विवाह से ज्यादा महत्त्वपूर्ण कार्य अपने कैरियर में सफलता प्राप्त करना होता हैअधिकाधिक धनार्जन करना होता हैऐशो-आराम के समस्त संसाधनों को प्राप्त कर लेना होता है. इस आपाधापी के चलते युवाओं में विवाह संस्था के प्रति विश्वास समाप्त सा होता जा रहा है. ऐसी स्थिति में बिना किसी प्रतिबन्धबिना किसी जिम्मेवारीस्वतंत्र भाव से जीने की संकल्पनाअकल्पनीय स्वतंत्रता के बीच शारीरिक संबंधों की स्वीकार्यता ने ही लिव-इन-रिलेशन को जन्म दिया. इस तरह के सम्बन्ध नितांत दैहिक आकर्षण और उसकी माँग और आपूर्ति जैसे क़दमों की देन हैं और ऐसे सम्बन्ध यदि दीर्घकालिकपूर्णकालिक नहीं हैं तो इनका सर्वाधिक नुकसान महिलाओं को ही उठाना पड़ता है.



इस मानसिकता का सर्वाधिक लाभ बाजार ने उठाया है. बाजार में जहाँ एक तरफ महिलाओं सम्बन्धी गर्भ-निरोधक साधनों कीगर्भ रोकने के उपायों की भरमार है वहीं दूसरी तरह गर्भपातों कीबिन-व्याही माताओं कीकूड़े के ढेर पर मिलते नवजातों की संख्या में भी अतिशय वृद्धि हुई है. ये समूची स्थितियाँ सिर्फ और सिर्फ महिलाओं को प्रभावित करती हैं. यदि लिव-इन-रिलेशन जैसे सम्बन्ध आपसी सामंजस्य से विवाह संस्था से बचने के लिए हैंशारीरिक संबंधों की निर्बाध स्वीकार्यता के लिए हैअल्पकालिक दैहिक सुख के लिए है तो सहजता से कहा जा सकता है कि ऐसे सम्बन्ध असामाजिकता को ही बढ़ायेंगे. लिव-इन-रिलेशन जैसे संबंधों में किसी भी समय पर लड़के द्वारा लड़की को छोड़ देने, किसी और लड़की के साथ लिव-इन में चले जाने, इस रिलेशन में रहने वाली लड़की के गर्भवती होने, कई-कई शारीरिक संबंधों से होने वाले यौन-रोगों आदि दुष्परिणाम भी सामने आने की आशंका बनी रहती है.

सामाजिक संरचना में विवाह संस्था यौन-संबंधों की स्वीकार्यता मात्र के लिए नहीं है अपितु सृष्टि के विकास की अवस्था में सहगामी कदम भी है. इसके द्वारा जहाँ पारिवारिक संरचना का विकास होता है वहीं सामाजिकता भी अपना विकास करती है. ऐसे में लिव-इन-रिलेशन की सामाजिक-कानूनी मान्यता-स्वीकार्यता के पूर्व खुले मंच से इस पर बहस होखुले दिल-दिमाग से इसके समस्त पहलुओं पर चर्चा होसकारात्मक दृष्टि से इसके नैतिक-अनैतिक रूप का आकलन हो. ऐसा करना न सिर्फ वर्तमान के लिए वरन भविष्य के लिए भी उचित कदम होगा.

10 अप्रैल 2020

सामंजस्य के अभाव में बर्बाद होती राहत सामग्री

लॉकडाउन के शुरू होते ही सभी जगह समाजसेवियों की भीड़ सी उमड़ आई है. दैनिक आवश्यकता की वस्तुओं के अलावा सभी कुछ बंद होने के कारण बहुत से लोगों की आजीविका पर असर पड़ा है. प्रतिदिन काम करने, कमाई करने वालों के सामने निश्चित ही खाने का संकट आया है. ऐसे में जबकि लोगों का बाजार निकलना बंद है, रोजगार के साधन बंद हैं, आय के स्त्रोत बंद हैं तब ऐसे लोगों के सामने निश्चित ही राशन की, भोजन की समस्या उत्पन्न होनी ही थी. ऐसे विषम समय में सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले आगे आये. ऐसे सभी लोग साधुवाद के पात्र हैं जिन्होंने घर में बने रहने से बेहतर बाहर निकल कर लोगों की सेवा, सहायता करना समझा. प्रतिदिन ऐसे लोगों की टोलियाँ शहर की सड़कों पर निकल कर लोगों की सहायता करने में लगी हुई हैं. जरूरतमंदों को राशन उपलब्ध करवा रही हैं. राशन उपलब्ध करवाने का काम प्रशासन द्वारा भी किया जा रहा है. इसके साथ-साथ समाजसेवी भी तन्मयता से इस कार्य में लगे हैं.


महामारी के इस दौर में एक तरफ समाजसेवियों द्वारा सहायता की जा रही है वह सराहनीय है मगर इसके साथ-साथ यह एक तरह की समस्या भी उत्पन्न कर रही है. बहुत से लोग बिना किसी तालमेल के, बिना किसी सामंजस्य के, बिना किसी निर्देशन के काम करने में लगे हुए हैं. इससे सहायता के साथ-साथ यह हो रहा है कि एक-एक परिवार को कई-कई बार सहायता मिल जा रही है और कुछ परिवार ऐसे हैं जहाँ सहायता सामग्री पहुँच ही नहीं पा रही है. इससे सम्बंधित अब तमाम वीडियो और फोटो सामने आने लगी हैं, जिसमें स्पष्ट रूप से दिख रहा है कि सहायता सामग्री, भोजन सामग्री नालियों में, कूड़े के ढेर पर पड़ी हुई है. कहीं-कहीं सामग्री के बाजार में बेचे जाने की खबरें भी सामने आई हैं. इसके अलावा ऐसे भी परिवार पकड़ में आये हैं जिनके पास पर्याप्त भोजन सामग्री, राशन होने के बाद भी वे सहायता सामग्री लेते जा रहे हैं.

यहाँ देखा जाये तो दोनों पक्ष दोषी नजर आते हैं. एक तरफ सभी को ऐसा लगने लगा है जैसे यदि इस समय सहायता के लिए बाहर न निकले तो उनके समाजसेवी होने पर खतरा आ जायेगा. ऐसा लग रहा है जैसे देश में पहली बार ऐसा संकट आया है जबकि गरीब मुश्किल में है. ऐसा लग रहा है जैसे सभी बस सहायता करने के, भोजन सामग्री देने के ही पक्ष में हैं. इसी तरह जो वर्ग, परिवार मुश्किल में है वह भी अपनी लालसा को, तृष्णा को रोक नहीं पा रहा है. वह एक जगह से सामग्री पाने के बाद भी खुद को दूसरी जगह से राशन लेने के लिए खड़ा कर देता है. ऐसे में सामग्री का आधिक्य होना ही है. जहाँ एक तरफ समाजसेवियों का आपसी समन्वय वितरण व्यवस्था में झोल पैदा कर रहा है वहीं दूसरी तरफ जरूरतमंद सामग्री की अधिकता देखकर भविष्य के लिए जमाखोरी की तरफ बढ़ रहा है.  यह स्थिति किसी के लिए भी सुखद नहीं है. इससे सामग्री बर्बाद हो रही है, लोगों के पास आवश्यकता से अधिक सामग्री पहुँच रही है, सभी जरूरतमंदों के पास सामग्री यथोचित रूप में नहीं पहुँच पा रही है.

ऐसे में भले कह दिया जाये कि यहाँ प्रशसन को ध्यान रखना चाहिए था मगर सोचिये कि प्रशासन कहाँ-कहाँ ध्यान दे? क्या एक शहर के सभी सामाजिक सेवियों की जिम्मेवारी नहीं बनती थी कि वे आपस में समन्वय बनाकर राहत सामग्री का वितरण करते? क्या यह भी उचित कदम नहीं होता कि प्रशासन की मदद करने के लिए सभी लोग एक जगह पर सारी सामग्री का एकत्रण करके उसे सूचीबद्ध करके वितरण करते? क्या ऐसा गलत होता कि जिस व्यक्ति, परिवार के पास एक बार सामग्री पहुँच जाती, उसके पास दोबारा न पहुँचे ऐसी कोई व्यवस्था कर ली जाती, ऐसा चाहे आधार कार्ड के द्वारा होता या राशन कार्ड के द्वारा? फ़िलहाल तो अभी समाजसेवियों की भीड़ सड़कों पर है और बहुत सी राहत सामग्री नालियों, कूड़े के ढेरों पर मिल रही है. अभी भी संभलने की आवश्यकता है.

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31 मार्च 2020

माल्थस का जनसंख्या सिद्धांत और प्राकृतिक आपदा में सह-सम्बन्ध

सकल विश्व वर्तमान में एक चीनी वायरस, कोरोना की चपेट में आया हुआ है. यद्यपि इस सम्बन्ध में यूरोप की कुछ प्रयोगशालाओं द्वारा इसके प्राकृतिक वायरस होने की बात कही गई है तथापि इस थ्योरी पर कोई विश्वास नहीं कर रहा है. इस अविश्वास का कारण स्वयं चीन है. बहरहाल, अभी इस पर चर्चा नहीं. आज हम चर्चा करते हैं जनसंख्या सिद्धांत की. जनसंख्या का सम्बन्ध सदैव से उपलब्ध संसाधनों से रहा है. जनसंख्या और संसाधन के बीच यह सम्बन्ध स्थापित करने के लिए अनेकानेक सिद्धांत प्लेटो के समय से सामने आते रहे हैं. इन सिद्धांतों में दो तरह के सिद्धांत सामने आये. पहला, प्राकृतिक सिद्धांत और दूसरा, सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धांत. जिस जनसंख्या सिद्धांत को सर्वाधिक महत्त्व मिला, उसे थॉमस राबर्ट माल्थस द्वारा प्रतिपादित किया गया था. इसे प्राकृतिक सिद्धांत में शामिल किया जाता है.


माल्थस ब्रिटेन के निवासी थे तथा इतिहास तथा अर्थशास्त्र विषय के ज्ञाता थे. इन्होंने अपने एक निबंध प्रिंसिपल ऑफ़ पापुलेशन (Principle of Population) में एक तरफ जनसंख्या की वृद्धि एवं जनसांख्यिकीय परिवर्तनों (demographic changes) का तथा दूसरी तरफ सांस्कृतिक एवं आर्थिक परिवर्तनों का उल्लेख किया. यह निबंध वर्ष 1798 में प्रकाशित भी हुआ था. माल्थस ने अपने निबंध में संसाधन शब्द के स्थान पर जीविकोपार्जन के साधन का प्रयोग किया था. उन्होंने विचार दिया कि मानव में जनसंख्या बढ़ाने की क्षमता बहुत अधिक है और इसकी तुलना में पृथ्वी में मानव के लिए जीविकोपार्जन के साधन जुटाने की क्षमता कम है. उनके अनुसार जनसंख्या वृद्धि गुणोत्तर श्रेणी या ज्यामितीय रूप (Geometrical Progression) में होती है अर्थात जनसंख्या 1, 2, 4, 8, 16, 32, 64, 128, 256... की दर से बढ़ती है. इसके उलट जीविकोपार्जन के साधन समान्तर श्रेणी या अंकगणितीय रूप (Arithmetic Progression) में अर्थात 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9... की दर से बढ़ते हैं. 

वे अपने सिद्धांत में मानते थे कि प्रत्येक 25 वर्षों के बाद जनसंख्या दुगनी हो जाती है. इस स्थिति के अनुसार वे आकलन करके बताते हैं कि दो सौ वर्षों में जनसंख्या और संसाधनों में 256 तथा 9 का अनुपात हो जाता है अर्थात दो सौ वर्षों में जनसंख्या में 256 इकाइयों की वृद्धि होती है जबकि संसाधनों में मात्र 9 इकाइयों की. यदि यह बिना नियंत्रण के आगे बढ़ता रहे तो यह अंतर लगभग अनिश्चित हो जायेगा. इस तरह की स्थिति के कारण जनसंख्या इतनी अधिक हो जाएगी कि उसका भरण-पोषण लगभग असंभव हो जायेगा. इसके चलते भुखमरी, कुपोषण सहित अन्य समस्याओं का जन्म होता है.

ऐसी आनुपातिक स्थिति के चलते माल्थस का मानना था अतः उत्पादन चाहे कितना भी बढ़ जाए, जनसंख्या की वृद्धि दर उससे सदा ही अधिक रहेगी. उन्होंने जनसंख्या एवं संसाधनों की अनुपात की तीन अवस्थाओं को बताया.

1- जब संसाधन उपलब्ध जनसंख्या की तुलना में अधिक हो.
2- जब संसाधन और जनसंख्या दोनों लगभग समान हो.
3- जब संसाधन के तुलना में जनसंख्या अधिक हो.

पहली और दूसरी स्थिति में जनसँख्या के कम अथवा समान होने के कारण जनसंख्या संबंधी समस्याओं की पहचान नहीं हो पाती लेकिन तीसरी स्थिति में, जबकि जनसंख्या संसाधनों से अधिक होती है तब जनसंख्या वृद्धि एक भयावह चुनौती के रूप में सामने आती है. इस स्थिति में जनसंख्या तथा संसाधनों के बीच की खाई अधिक बढ़ जाती है. परिणामस्वरूप पूरा समाज अमीर और गरीब में विभाजित हो जाता है. इसी के चलते पूंजीवादी व्यवस्था स्थापित हो जाती है. इस अवस्था में खाद्यान्न संकट वृहद स्तर पर उत्पन्न होता है और जनसंख्या के लिए खाद्यान्न की समस्या प्रमुख हो जाती है. संसाधनों पर अधिक दबाव की स्थिति में भुखमरी, महामारी, युद्ध और प्राकृतिक आपदा की स्थिति उत्पन्न होने लगती है. ऐसी स्थिति के कारण हुई मौतों के पश्चात् जनसंख्या में कमी आती है अर्थात जनसंख्या प्रकृति द्वारा नियंत्रित हो जाती है और पहली अथवा दूसरी  अवस्था में जाने लगती है. 


उनका स्पष्ट मत था कि जनसंख्या को यदि नियंत्रित न करके जनसंख्या और संसाधनों में संतुलन स्थापित नहीं किया जाता है तो प्रकृति स्वतः ही संतुलन स्थापित लेती है. जनसंख्या नियंत्रण के इन कारणों को माल्थस ने सकारात्मक उपाय कहा है. इसके साथ-साथ माल्थस ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए इन सकारात्मक उपायों के अतिरिक्त भी नियंत्रण के प्रभावी उपाय किए जाने पर जोर दिया. उनका कहना था कि यदि मनुष्य स्वयं ही ब्रह्मचर्य का पालन, आत्मसंयम, देर से विवाह और विवाह के बाद भी आत्मसंयम जैसे नैतिक उपायों पर जोर दे तो न ही जनाधिक्य की स्थिति उत्पन्न होगी और न ही जनसंख्या विस्फोट की स्थिति होगी.

यदि उक्त सिद्धांत के परिप्रेक्ष्य में विगत एक दशक की प्राकृतिक घटनाओं पर ही नजर डालें तो समझ आएगा कि लगभग समूचा विश्व अपने आपमें किसी न किसी प्राकृतिक आपदा की चपेट में लगातार आता रहा है. जंगलों की आग, सूनामी जैसी स्थिति, बाढ़, भूस्खलन, ज्वालामुखी विस्फोट, सार्स, इबोला, मर्स आदि महामारियाँ, चक्रवाती तूफ़ान आदि-आदि ऐसी प्राकृतिक आपदाएँ हैं जिनके द्वारा संभव है कि प्रकृति समय-समय पर जनसंख्या और संसाधनों में संतुलन स्थापित कर रही हो. वर्तमान में कोरोना वायरस को इसी रूप में देखा जा सकता है. इसकी पहचान होने के समय मौसम के प्रभावी होने की बात करते हुए कहा जा रहा था कि कोरोना वायरस गर्म क्षेत्रों में ज्यादा समय तक जिन्दा नहीं रहता है. यदि एकबारगी इसे सच मान लें तो हम सभी देख रहे हैं कि आज, मार्च की समाप्ति के बाद भी देश में गर्मी नहीं पड़ी है. लगभग हर दूसरे-चौथे दिन यहाँ बारिश होने के चलते मौसम ठंडा हो जा रहा है. कहीं यह प्रकृति द्वारा संतुलन बनाने का प्रयास तो नहीं?

कुछ भी हो मगर यह सत्य है कि जब-जब जनसंख्या उपलब्ध संसाधनों से अधिक होगी तो अराजकता की स्थिति आएगी. सामानों, उत्पादों के लिए लूट मचेगी. सक्षम लोगों तक इनकी उपलब्धता हो सकेगी जो इससे वंचित रहेंगे वे भुखमरी, कुपोषण आदि का शिकार होंगे. स्पष्ट है कि प्रकृति स्वतः ही संतुलन स्थापित कर लेगी. वर्तमान कोरोना परिदृश्य में, भले ही यह चीन द्वारा निर्मित वायरस है, हम सभी को जनसँख्या नियंत्रण के उपायों पर गम्भीर होना ही होगा. यदि ऐसा नहीं कर सके तो आने वाला समय लगातार ऐसी ही किसी न किसी महामारी का, विभीषिका का शिकार बनता रहेगा.

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31 जनवरी 2020

बिटिया की मित्रता से बढ़ा सामाजिकता निर्वहन का दायरा


समय रफ़्तार से निकलता है ये बात बहुत लम्बे समय से जानते आये हैं. ऐसा बताया भी जाता रहा है कि समय किसी के लिए नहीं रुकता है, बस भागता ही रहता है. ऐसा विगत काफी समय से देख भी रहे हैं जबकि समय कुछ ज्यादा ही रफ़्तार पकड़ता जा रहा है. अब देखिये, ऐसा लग रहा है जैसे अभी बहुत सारे लोग नए साल की शुभकामनायें देकर मुड़ भी न पाए हैं और ये एक महीना समाप्त हो भी गया. इतनी रफ़्तार भी अच्छी नहीं समय की. उसे समझना चाहिए कि इन्सान उसकी इसी रफ़्तार को पकड़ने के लिए, उसकी बराबरी करने के लिए पैदल यात्रा से पहिये के आविष्कार पर आया. इसके बाद जानवरों से चलने वाली गाड़ियाँ, उसके बाद साइकिल, कार, बस, ट्रेन, हवाई जहाज से होता हुआ जेट प्लेन तक में यात्रा करने लगा है. अब तो वह जैसे समय को पीछे छोड़ने के मूड में है और इसी के चलते अन्तरिक्ष विमानों में उसकी यात्रा के चरण आरम्भ हो गए हैं. ये और बात है कि इन विमानों का उपयोग एक देश से दूसरे देश के बीच नहीं किया जाना है मगर क्या यही कम है कि जिन ग्रहों, उपग्रहों को अभी तक बस देखा जाता रहा है, अब उन पर जाने का विचार भी सफल होता दिखने लगा है.


समय का परिवर्तन सदैव-सदैव से होता रहा है. इसी परिवर्तन ने समाज को अनेक आविष्कारों से, खोजों से परिचित करवाया. अनेक नवीन और आश्चर्यजनक उत्पादों के द्वारा उनका लाभ दिलवाया. इसी क्रम में समाज में समय ने संबंधों में भी परिवर्तन करवाए हैं. सामाजिकता में भी परिवर्तन उसी तेजी से दिखाए हैं. समय ने अपनी गति बदली या तीव्र की है तो उसी तीव्रता से उसने संबंधों में, सामाजिकता में भी गति प्रदान की है. ऐसा महसूस स्वयं में उस समय हुआ जबकि एक वैवाहिक समारोह में जाने का या कहें कि ले जाये जाने का अवसर मिला. वैवाहिक समारोह वाले किसी भी परिवार से हमारा कोई परिचय नहीं. वर, वधु से भी भी हमारा कोई सम्बन्ध नहीं, कोई परिचय नहीं. उनके किसी परिजन का भी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष सम्बन्ध हमसे नहीं, कोई जान-पहचान नहीं. इसके बाद भी शादी समारोह में शामिल होना पड़ा और उसके पीछे का मूल कारण बनी हमारी बिटिया रानी. कक्षा छः में पढ़ने वाली हमारी बिटिया की सहेली की बड़ी बहिन की शादी का पावन अवसर था. उस बिटिया ने अपने ग्रुप की सभी सहेलियों को विवाह समारोह में आमंत्रित किया था. बिटिया रानी उसी दिन से पगलाई घूम रही थीं. उसे भी आनंद महसूस हो रहा था कि किसी शादी का कार्ड उसके नाम से भी घर में आया है.

एक-दो बार बिटिया को समझाया मगर बाद में लगा कि समय का ये परिवर्तन सामाजिक ही है जो अपने दायरे लगातार बढ़ाता है. किसी ने किसी रूप में हमने भी अपने परिवार के सामाजिक दायरे को बढ़ाया ही है. आज उस दायरे को बढ़ाने का काम समय ने बिटिया के हाथों में दे दिया है. यूँ तो सामाजिक कार्यों में उसकी सहभागिता को हम बहुत पहले से बनाये हुए थे मगर इस तरह के सामाजिक निर्वहन का उसका यह पहला अवसर रहा. इस तीव्र परिवर्तन पर आश्चर्य इसलिए भी हुआ क्योंकि अपने समय में हमें याद नहीं पड़ता कि इंटरमीडिएट तक हम किसी मित्र के द्वारा विवाह समारोह के लिए आमंत्रित किये गए हों या किसी मित्र के यहाँ विवाह समारोह में शामिल हुए हों. बहरहाल, बिटिया रानी को वैवाहिक कार्यक्रम में लेकर जाना हुआ. यथास्थिति उसी की मर्जी से रुकना हुआ ताकि उसे विवाह समारोह में पूर्णतः शामिल होने का एहसास रहे. समय की यह गति हमें जितनी परिवर्तनकारी लगी उतनी ही आश्चर्यजनक भी. अपने ही शहर में निवास बनाये रहने के कारण आज भी हमें अपने पारिवारिक सदस्यों के संबंधों की सामाजिकता का भी निर्वहन करना पड़ता है. ऐसे में लगा कि अब बिटिया रानी के संबंधों के दायरे में आकर उसके संबंधों का निर्वहन हाल-फिलहाल तो हमें ही करना होगा, जो उनके मित्रों के जन्मदिन से एक कदम आगे आकर उनके परिजनों के वैवाहिक कार्यक्रमों के रूप में हमारे सामने आयेंगे.

संबंधों के सामाजिक परिवर्तन में पारिवारिक संबंधों में भी परिवर्तन अपनी इसी गति ने करवाए हैं. हम तो तीस वर्ष की उम्र तक अपने पिताजी से बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे और आज अभिभावकों-संतानों के सम्बन्ध मित्रवत बनते दिख रहे हैं. सामाजिकता की भावी स्थिति में ये सम्बन्ध कितने सुखद होंगे ये भविष्य के गर्भ में है. फिलहाल तो समय अपनी गति को लगातार बढ़ाता जा रहा है, ये हम लोगों के लिए अनिवार्य जैसी स्थिति है कि हम भी अपनी गति को बढ़ाते हुए उसके साथ कदमताल करते रहें. अन्यथा की स्थिति में पिछड़ने में पल भर भी न लगेगा.


01 नवंबर 2019

अनाज बैंक खुद को समाज से जोड़ने की पहल है


ये विचार करना और लाना अपने आपमें ही बहुत मुश्किल होता है कि कोई व्यक्ति कैसे सैकड़ों व्यक्तियों के भोजन की व्यवस्था अपनी आय से करता होगा. ये अपने आपमें सोच पाना भी दुष्कर है कि कोई व्यक्ति अपनी पूरी मासिक आय को बच्चों के पालन-पोषण में व्यय कर देता है. ये शायद आपकी कल्पना के बाहर हो कि कोई व्यक्ति सात सौ से अधिक बच्चों का पिता हो, वो भी आधिकारिक रूप से दस्तावेजों में. पर ऐसा सब कुछ सत्य है और इसी दुनिया में सत्य है, आज के घनघोर कहे जाने वाले कलियुग में सत्य है. बीएचयू के नाम से वैश्विक ख्याति प्राप्त विश्वविद्यालय के इतिहार विभाग के प्राध्यापक डॉ० राजीव श्रीवास्तव ऐसा ही काम कर रहे हैं. उनके द्वारा विगत लगभग तीस वर्षों से सामाजिक कार्यों का लेखा-जोखा यहाँ एक पोस्ट में नहीं दिया जा सकता मगर उनके बारे में इतना समझा जा सकता है कि उस एक व्यक्ति ने पिछले तीन दशकों में सामाजिक सेवा में अलग मानक स्थापित किये हैं. उन्हें समझने के लिए, जानने के लिए वाराणसी के इन्द्रेश नगर में जाना होगा, जहा सुभाष भवन आप सबकी वाट जोह रहा है.



बहरहाल, यदि राजीव जी के बारे में लिखने बैठे तो न तो समय शेष रहेगा न इस पोस्ट में जगह, सो जिस उद्देश्य के लिए आज की पोस्ट लेकर आये हैं, उसे साकार किया जाये. आज की पोस्ट का मंतव्य था राजीव जी के कार्यों से प्रेरित होकर किस तरह उरई में अनाज बैंक का शुभारम्भ किया गया और उसके द्वारा लगभग एक सैकड़ा महिलाओं को सहायता उपलब्ध करवाई गई. उरई के सनातन धर्म महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ० अमिता सिंह के परिवार में कुछ ऐसा घटित हुआ कि उन्होंने अपने सामाजिक कार्यों को, अपने पारिवारिक दायरे को और विस्तार देने का विचार किया. उनकी छोटी बहिन के असामयिक निधन के पश्चात् चंद दिनों तक वे संभवतः ऊहापोह की स्थिति में रही किन्तु कालांतर में अपने परिवार की सामाजिक प्रस्तिथि को देखते हुए वे अपने मूल स्वरूप में लौट आईं. डॉ० अमिता सिंह का परिवार लम्बे समय से किसी न किसी रूप में सामाजिक कार्यों के साथ जुड़ा हुआ था. पारिवारिक आधार पर उनके लिए अनाज बैंक की ईमारत को खड़ा करना सहज लगा. इसी सोच के साथ वे अनाज बैंक की एक शाखा उरई में संचालित करने में सफल रहीं. डॉ० अमिता सिंह के द्वारा उरई में अनाज बैंक की महज शाखा ही स्थापित न हुई वरन बुन्देलखण्ड जैसे क्षेत्र में भूख से लड़ने का एक आन्दोलन भी आरम्भ हुआ. इस आन्दोलन ने न केवल जालौन में बल्कि सम्पूर्ण बुन्देलखण्ड में भूख के खिलाफ एक अभियान आरम्भ हुआ. इसी का परिणाम रहा कि बुन्देलखण्ड के पहले अनाज बैंक की स्थापना हुई उरई में, अनाज बैंक के क्षेत्रीय कार्यालय के रूप में. 



अनाज बैंक, उरई की स्थापना के बाद से अद्यतन उसके उद्देश्य ‘कोई भी भूखा न सोये’ को वरीयता दी गई. समाज से जुड़े लोगों के किसी भी तरह के पारिवारिक आयोजनों में अनाज बैंक की लाभार्थी महिलाओं को जोड़ा गया, उन्हें एक परिवार की तरह मानते-स्वीकारते हुए धार्मिक आयोजनों में, पारिवारिक आयोजनों  में सहभागी बनाया गया. महिलाओं को सामान्य दिनों में अनाज वितरण के साथ-साथ धार्मिक आयोजनों में, विशेष पर्वों-त्योहारों में अतिरिक्त खाद्य-पदार्थों की व्यवस्था अनाज बैंक, उरई शाखा द्वारा की गई. महिलाओ की चिकित्सा, उनके आर्थिक सशक्तिकरण की व्यवस्था, बालिकाओं की शिक्षा आदि के सम्बन्ध में भी उरई शाखा द्वारा प्रयास किये जाते रहे. विगत दो वर्षों में एक सैकड़ा से अधिक महिलाएँ लाभान्वित रहीं, साथ ही उनमें से अधिसंख्यक महिलाओं को रोजगार की उपलब्धता भी करवाई गई. आज एक नवम्बर को अनाज बैंक, उरई के दो वर्ष पूरे होने पर तथा दीदी अनिला राणावत की पुण्यतिथि के तीन साल हो जाने पर लाभार्थी महिलाओं को अनाज वितरण के साथ-साथ भोजन भी करवाया गया. इसके पीछे महज यही सोच थी कि समूचा समाज एक परिवार है. ऐसे में किसी एक सदस्य के जाने के साथ-साथ अनेक सदस्यों का जुड़ना होता है. शायद अनिला दीदी के प्रति यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि उन्होंने अपने स्वरूप में अनेक महिलाओं को हम सभो से जोड़ दिया.

आज उनकी पुण्यतिथि पर उनको सादर श्रद्धांजलि.





25 जनवरी 2019

स्व-प्रचार बिना समाजसेवा


ऐसे बच्चों को जिनकी नाक बह रही हो, कपड़े मैले-कुचैले हों, खुद भी धूल से सने हों, उनकी अवस्था देखकर लगता हो कि कई दिन से नहाये नहीं हैं, हम भी, आप भी अपने किसी कार्यक्रम में आमंत्रित नहीं करते हैं.


ऐसे बच्चे कभी गलती से हम लोगों द्वारा आयोजित भोज में दिख जाते हैं तो हम उनके ऊपर एहसान सा करते हुए किसी नौकर के द्वारा भोजन पहुँचवा देते हैं. उन्हें अपने भोज में साथ बिठाकर भोजन नहीं करवाते हैं.


'सुभाष भवन' के उद्घाटन के अवसर पर आँखें खोलने वाला दृश्य आँखों के सामने गुजर रहा था. ऐसे बच्चे जिनको हम आमतौर पर देखना पसंद नहीं करते, उनसे बात करना पसंद नहीं करते. वे सभी साथ बैठकर भोज का आनंद ले रहे थे.


जो बच्चे अपनी अवस्था के कारण भोजन करने में असमर्थता व्यक्त कर रहे थे, उन्हें विशाल भारत संस्थान के बच्चे अपने हाथों से भोजन करवा रहे थे.


राजीव जी आप वाकई अनुकरणीय कार्य कर रहे हैं. आपके कार्यों को देखते हुए आज से हम अपने साथ 'सामाजिक कार्यकर्त्ता' जैसा विशेषण लगाना, लगवाना बंद करवाते हैं. हम सब कहीं न कहीं स्व-प्रचार का काम कर रहे हैं. आपको और आपके साथ जुड़े सभी लोगों को हार्दिक वंदन.

24 दिसंबर 2018

सार्थक पहल की भ्रूण हत्या

ऐसा लगता है जैसे विषय से भटकना हम सबकी आदत में शामिल है. विषयांतर कर देना, मूल मुद्दे से इतर बात करने लगना न केवल आम आदमी की आदत में शामिल है वरन बड़े-बड़े बुद्धिजीवी तक इससे पीड़ित हैं. आए दिन होने वाले सेमिनार, अकादमिक कार्यक्रमों में ऐसे लोगों की सहभागिता देखने को मिलती है. अनेक कार्यक्रमों में, गोष्ठियों में इनके वक्तव्यों को सुनने का अवसर मिलता है. अनेकानेक अवसरों में से कोई एक-आध अवसर ऐसा होगा जिसमें कोई वक़्ता अथवा कार्यक्रम संयोजक अपने उद्देश्य से भटका न हो. यही भटकाव समूचे कार्यक्रम, आयोजन की प्रतिष्ठा, उसके उद्देश्य पर चोट कर देता है. अपने तमाम पुराने अनुभवों को एकबार फिर उसी रूप में देखा. एक बहुत ही सार्थक आयोजन, अत्यंत सारगर्भित विषय सहभागिता करने वालों के भटकाव के कारण अपनी मूल भावना के साथ इंसाफ़ न कर सका. इसमें कुछ हद तक संयोजक को भी शामिल किया जा सकता है.

अवसर था जेंडर संवाद के आयोजन का. महज़ दो शब्दों के इस शीर्षक के पीछे की गम्भीरता को समझने के लिए जिस समझ की आवश्यकता चाहिए थी वह सम्बंधित आयोजन क्षेत्र में तो व्याप्त ही नहीं थी, सहभागियों में भी अधिकांश इसके प्रति संज्ञा-शून्य की स्थिति में रहे. तीन दिवसीय इस आयोजन के द्वारा महिलाओं की स्वतंत्रता, सम्मान, अधिकार की चर्चा होनी थी जो वक्ताओं के अपने व्यक्तिगत अनुभवों से गुज़रती हुई स्त्री-पुरुष अंतर्विरोध, उनके आपसी संघर्षों, महिला वर्ग के इतिहास, समाज की पूर्वकालिक मान्यताओं पर ही केंद्रित बनी रही. जेंडर फ़्रीडम के रूप में संचालित साइकिल यात्रा के साये में चर्चा स्त्री-पुरुष सम्बंधों, महिलाओं की शारीरिक स्थिति, माहवारी पर आकर टिकती रही. समझ नहीं आया कि तमाम वक़्ता जेंडर की नवीन परिभाषा तय करने की ज़िद सी क्यों पकड़े रहे? स्त्री को ज़बरन स्त्री-विषयक अलंकरणों से लादने का विरोध होना चाहिए पर उसका वास्तविक स्वरूप सुदूर ग्रामीण अंचल की महिलाओं तक कैसे और किस रूप में पहुँचेगा, यह स्पष्ट नहीं किया जा सका.

जेंडर को समाज द्वारा और सेक्स को प्रकृति द्वारा बनाए जाने को स्थापित करते हुए सेक्स को प्राकृतिक लैंगिक और जेंडर जो समाजिक लैंगिक के रूप स्वीकारा गया. समझना और समझाना होगा कि जेंडर के जिस हिन्दी अनुवाद लिंग को पुरुष सत्ता का पर्याय बताते हुए उसका बहिष्कार करने की बात अनेक वक्ताओं, आयोजक ने की, उसी को सामाजिक लैंगिक या सामाजिक लिंग के रूप में स्वीकार कर किस नवीन अवधारणा को स्वीकार किया जा रहा है? जेंडर के हिन्दी अनुवाद लिंग को नकारते हुए सामाजिक लिंग को स्वीकार करने से क्या पुरुषवादी सत्ता का लोप हो जाएगा? क्या ऐसा कर देने भर से महिलाओं को जेंडर फ़्रीडम मिल जाएगा? क्या इस परिभाषा का, शब्दावली का उपयोग महिलाओं को सशक्त बना देगा? इस बारे में आयोजक से लेकर वक्ताओं तक द्वारा मौन बनाए रखा गया.

जेंडर शब्द के अलावा चर्चा का बिंदु माहवारी शब्द भी बना रहा. घूम-फिर कर माहवारी पर चर्चा को मोड़ देने का औचित्य समझ से परे रहा. यहाँ विचारणीय यह है कि माहवारी के दिनों में महिलाओं को अपवित्र मानने जैसी किसी भी मान्यता का विरोध किया जाना चाहिए पर इसके साथ इस पर भी विचार किया जाना चाहिए कि इस विषय पर घरों में आम चर्चा किस रूप में हो. देश की अत्याधुनिक महिलाओं द्वारा हैप्पी टू ब्लीड का आयोजन किया जाना भी एक सत्य है तो माहवारी पर चुप्पी धारण कर जाना भी एक सत्य है. अभी अनेकानेक क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ इस विषय पर चर्चा को उचित नहीं माना जाता. सामान्य शिष्टाचार में आज भी ऐसा सोचना कल्पना से परे लगता है जबकि बाप-बेटी आपस में माहवारी पर चर्चा करें. यह भी मुश्किल सा ही है कि भाई-बहिन माहवारी पर चर्चा करें. इन दिनों में महिलाओं की कठिनाई, उसकी शारीरिक समस्या, कष्ट, उनके निराकरण, उन दिनों में साफ़-सफ़ाई की सामान्य चर्चा कई बार के चरणों के बाद होना सम्भव दिखती है. एकाधिक स्थितियों में ही सम्भव है कि कोई पति अपनी पत्नी की इन दिनों की शारीरिक पीड़ा को न समझता होगा. शहरी क्षेत्रों में इन दिनों में आपसी समन्वय, सहयोग देखने को मिलता है, हाँ ग्रामीण अंचलों में सभी इस विषय में जागरूकता लाने की आवश्यकता है. जेंडर फ़्रीडम और माहवारी की चर्चा का यहाँ उद्देश्य और सार्थकता को स्पष्ट करने के यहाँ भी पूर्वाग्रहयुक्त विमर्श होता रहा.

बेटियों को कैसे सशक्त बनाया जाए, उनको कैसे स्वाभिमानी बनाया जाए, उनको अपने अधिकारों के लिए कैसे सजग किया जाए, अपने प्रति होने वाले अत्याचार के विरुद्ध कैसे लड़ा जाए आदि बिंदुओं पर किसी तरह की चर्चा सामने नहीं आई. जेंडर संवाद के द्वारा जेंडर समानता स्थापित किए जाने की भावना का लोप दिखाई दिया. समाज के लोगों तक कैसे संदेश जाए कि किसी भी बेटी पर अत्याचार समूचे समाज पर तमाचा है, व्यवस्था पर तमाचा है यह परिभाषित नहीं किया गया. आयोजन स्थल की समस्याओं का ज़िक्र करने के बाद भी वहीं के स्त्री-विषयक मूल मुद्दों को विस्मृत कर देना भी आयोजक की, वक्ताओं की भूल रही. राइड फ़ोर जेंडर फ़्रीडम के साथ शुरू यात्रा जेंडर संवाद के द्वारा एक नई राह का निर्माण कर सकती थी पर अफ़सोस ऐसा होता हाल-फ़िलहाल तो नहीं दिखा. समुचित व्यवस्थित निर्देशन के अभाव में इसे एक सार्थक पहल की भ्रूण हत्या कहा जा सकता है. एक विचार, एक यात्रा पूर्णतः पल्लवित-पुष्पित होने के पहले ही उसी रूप में खड़ी दिखाई देने लगी, जहाँ से आरम्भ हुई थी. कदाचित यह सम्पूर्ण आयोजन में व्याप्त भटकाव का परिणाम कहा जाएगा. 

21 दिसंबर 2018

जेंडर संवाद के साथ परिवर्तन की राह

हम इस समय बिहार के शिवहर जिले में हैं. इसी जिले के उत्साही युवा राकेश कुमार सिंह 15 मार्च 2014 से पूरे देश में एक विशेष उद्देश्य को लेकर साइकिल यात्रा पर निकले हैं. समाज में बेटियों के साथ होने वाले भेदभाव, उनके साथ होते असमानता के व्यवहार, उनके साथ होती हिंसा के विरोध में लोगों को जागरूक करना उनका विशेष उद्देश्य है. बेटियों को लक्ष्मी मानने वाले समाज में ही बेटियों की गर्भ में हत्या कर दी जा रही है. नवरात्रि में देवी के समकक्ष मानी जाने वाली बेटियाँ आए दिन दोयम दर्जे का व्यवहार सहती हैं. बेटियों के ख़िलाफ़ बने माहौल को तोड़ने के लिए, उनको सजग, सचेत करने के लिए राकेश की साइकिल यात्रा एक मुक़ाम पर पहुँच कर लोगों से संवाद की नवीन यात्रा का सूत्रपात करने जा रही है.


राकेश ने अपनी साइकिल यात्रा के दौरान बीस से अधिक राज्यों में सत्ताईस हज़ार किलोमीटर की दूरी नापते हुए दस लाख से ज़्यादा लोगों से जेंडर संवाद स्थापित किया. अपने उन अनुभवों और लोगों के विचारों के आपसी संवाद हेतु अपने गृह जनपद शिवहर में 22-24 दिसम्बर 2018 तक जेंडर संवाद नामक कार्यक्रम का आयोजन राकेश द्वारा किया जा रहा है. इसमें देश भर से बुद्धिजीवी, साहित्यकार, कलाकार, रंगकर्मी, मीडियाकर्मी आदि उपस्थित हो रहे हैं. गांधी भवन, शिवहर अगले तीन दिनों तक वैचारिक क्रांति का साक्षात्कार करेगा. देखना यह है कि राकेश की लगभग पाँच साल की साइकिल यात्रा और उसके बाद की संवाद की नयी पारी जेंडर समानता के क्या आयाम स्थापित करती है? समाज में क्या परिवर्तन करती है? 

13 अक्टूबर 2018

विश्व के पहले अनाज बैंक ने पूरे किये निस्वार्थ सेवा के तीन वर्ष

आज 13 अक्तूबर को विश्व के पहला अनाज बैंक ने अपनी सर्वश्रेष्ठ सेवा के तीन वर्ष पूरे किये. इस बैंक का उद्देश्य है कि कोई भूखा न सोये. इसकी पूर्ति के लिए अनाज बैंक टीम का एक-एक सदस्य लगातार सक्रिय है. वाराणसी से आरम्भ हुए अनाज बैंक ने धीरे-धीरे अपना विस्तार किया. बुन्देलखण्ड क्षेत्र में भूख की समस्या को देखते हुए केन्द्रीय टीम ने उरई नगर में इसी एक शाखा का आरम्भ किया. बुन्देलखण्ड के पहले अनाज बैंक के रूप में उरई शाखा ने पारदर्शी, ईमानदार कार्य की सतत प्रक्रिया बनाये रखी. इसका परिणाम ये हुआ कि अनाज बैंक के कार्यों से प्रेरित होकर इस अवसर पर नगर के कुछ गणमान्य लोग खाताधारक के रूप में जुड़े. एक भूखे परिवार और उनके बच्चों का पेट भरने में आप भी अनाज बैंक टीम का हिस्सा बने हैं, उनको साधुवाद, उनका आभार. 
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डॉ० ए०के० सक्सेना, प्राचार्य, गाँधी महाविद्यालय, उरई 
श्री गौरव चौहान द्वारा डॉ० ऋचा सिंह राठौड़, सहायक प्राध्यापक, रक्षा अध्ययन विभाग, गाँधी महाविद्यालय, उरई
डॉ० विनीत चतुर्वेदी, सहायक प्राध्यापक, समाजशास्त्र, कालपी कॉलेज, कालपी
डॉ० विश्वप्रभा त्रिपाठी, मनोविज्ञान विभाग, गाँधी महाविद्यालय, उरई
डॉ० कंचन, सहायक प्राध्यापक, मनोविज्ञान विभाग, गाँधी महाविद्यालय, उरई
डॉ० ममता, संस्कृत विभाग, गाँधी महाविद्यालय, उरई


सदस्यता फॉर्म भरते डॉ० विनीत चतुर्वेदी 

डॉ० विनीत चतुर्वेदी के साथ डॉ० अमिता सिंह, धर्मेन्द्र कुमार 

जमाकर्ता फॉर्म देते डॉ० ए० के० सक्सेना, प्राचार्य गाँधी महाविद्यालय, उरई 

डॉ० ऋचा सिंह राठौड़, सहायक प्राध्यापक, गाँधी महाविद्यालय, उरई 

बांये से - डॉ० सुनीता गुप्ता, डॉ० विश्वप्रभा त्रिपाठी, डॉ० कंचन, डॉ० ममता
गाँधी महाविद्यालय, उरई