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09 जून 2026

पत्रों की अनमोल धरोहर

कुछ चीजें अचानक ही सामने आती हैं और तब उनकी ऐतिहासिकता का, उनके अनमोल होने का भान होता है.



चित्र में प्रदर्शित डाक लिफाफा हरेक के लिए महत्त्व का नहीं है. घर के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया में वर्षों से बंद सामान को खोला-टटोला गया कि यदि किसी काम का समझ आएगा तो रखा जायेगा
, अन्यथा कबाड़ी के हवाले किया जायेगा. इसी क्रम में हमारे बाबा जी से सम्बंधित बहुत सारे पत्र मिले; परिजनों के पत्र, उनके मित्रों के पत्र. इसी में एक पत्र यह भी मिला. 1934 में लिखे इस पत्र के समय बाबा जी कक्षा दस में थे. उरई में राजकीय पुस्तकालय के बगल में जो पुरानी इमारत है, उस समय वहीं  राजकीय विद्यालय चला करता था. कालांतर में यही राजकीय संस्था जीआईसी के पुराने भवन में संचालित होने लगी थी. यहाँ हमारे परिवार की तीन पीढ़ियों को पढ़ने का अवसर मिला, बाबा जी, उसके बाद हमारे चाचा जी और मामा जी, तथा उसके बाद हम और हमसे छोटा भाई.


इस पत्र को बाबा जी के किसी मित्र ने कोंच से भेजा था और इस लिफाफे में जो पत्र है, उसमें उन्होंने अपनी मानसिक व्यथा का वर्णन एक कहानी के रूप में किया है. बाबा जी को उसे भेजने के पीछे उनके मित्र का उद्देश्य उनकी व्यथा को पढ़ना-समझना और उस कहानी को संशोधित करना था. पठन-पाठन-लेखन की आनुवंशिक परम्परा बाबा जी से शुरू होकर पिताजी से चलती हुई हमारे बाद की पीढ़ी अर्थात् हमारी बेटियों तक पहुँच गई है.



17 सितंबर 2025

हमारा लेखन और बाबा जी की सीख

 कुछ सीखें, बातें ज़िन्दगी भर काम आती हैं. ऐसा कुछ है हमारे साथ बाबा जी की बातों को लेकर. उनका अपने साथ सुबह की सैर पर हम तीनों भाइयों को ले जाना और पूरे रास्ते किसी न किसी कहानी, किसी न किसी दृष्टान्त के माध्यम से जीवन की सच्चाई को समझाना, जीवन में आने वाली समस्याओं से निपटने की सलाह देना. 


अपने बाबा जी के साथ अक्सर अपने लेखन सम्बन्धी चर्चा कर लिया करते थे. बचपने का अपरिपक्व लेखन बाबा जी की अनुभवी आँखों के सामने से गुजरता रहता, इसी कारण वे लेखन की गम्भीरता को देख भी रहे थे. सुबह की अपनी यात्रा के दौरान एक दिन बाबा जी ने हमारे लिखे किसी लेख की चर्चा करते हुए उस लेख के एकदम विपरीत बिन्दुओं पर विमर्श शुरू किया. बाबा जी के कुछ प्रश्नों का उत्तर तो हम दे सके, कुछ में अटक गए. ऐसे में बाबा जी ने हमारे लेख की प्रशंसा करते हुए कहा कि तुम लिखने लगे हो, ऐसे में किसी भी मुद्दे को, विषय को दोनों पक्षों की तरफ से देखो. जरूरी नहीं कि दोनों पक्षों को शामिल करते हुए लिखा जाये मगर दिमाग में दोनों पक्ष रहने चाहिए. 


इसके अलावा और भी बहुत सी बातें बाबा जी द्वारा लेखन के सम्बन्ध में बताई गईं, जो आज भी हमारे लिए मार्गदर्शन का काम करती हैं. बचपने से पड़ी लेखन की आदत आज भी बनी हुई है, बाबा जी द्वारा दोनों पक्षों को विचार करने की बात आज भी कंठस्थ है और इसी का परिणाम है कि किसी भी मुद्दे पर, किसी भी विषय पर बाल की खाल निकालने की हद तक चले जाते हैं. 


आज हमारे बाबा जी की पुण्यतिथि है. उनको सादर चरण स्पर्श... सादर श्रद्धांजलि. 




17 सितंबर 2023

बाबा जी की शिक्षाओं ने रखा विवादों से दूर

साइंस कॉलेज, ग्वालियर में बी.एस-सी. में प्रवेश लेने के लिए जाने का दिन निश्चित हो गया था. जाने के कोई पाँच-छह दिन पहले अचानक से मन में आया कि गाँव जाकर बाबा-अइया से मिल आया जाये. घर पर पिताजी से गाँव जाने की अनुमति लेकर अगले दिन गाँव के लिए निकल पड़े. इससे पहले भी बहुत बार गाँव जाना हुआ था मगर निपट अकेले गाँव जाने का यह पहला मौका था. उस समय फोन, मोबाइल की व्यवस्था आज के जैसी नहीं थी कि अपने आने की जानकारी बाबा तक पहुँचा पाते, सो अचानक से हमें देखकर बाबा और अइया का चौंकना स्वाभाविक था. जमींदार परिवार से होने के बाद भी बाबा जी ने अपने छात्र जीवन में बहुत संघर्ष किया था, खुद को अपने बलबूते स्थापित किया था, सो वे हम भाइयों को आत्मनिर्भर होने के लिए प्रेरित करते रहते थे. बाबा जी को बहुत ख़ुशी हुई कि हम ग्वालियर जाने के पहले उनके पास गाँव आये, वो भी अकेले. 




तीन दिन बड़े ही ख़ुशी से गुजर गए. कहते हैं न कि ब्याज मूलधन से ज्यादा प्यारा होता है, बस कुछ यही स्थिति हमारी भी थी. अइया ने तमाम सारे पकवान, व्यंजन बनाये, बाबा जी से खूब सारी बातें हुईं. जिस दिन हमारा गाँव से उरई आने का तय हुआ, उस दिन चलने से कुछ देर पहले बाबा जी ने कहा कि चलते-चलते जरा पैर की उँगलियाँ चटका दो. बाबा जी जब उरई में हम लोगों के साथ होते तो दिन में कई-कई बार पैर की उँगलियाँ हम भाइयों से चटकवाया करते थे. पैर के पंजे को हलके हाथों से कुछ देर दबाने के बाद उँगलियों के चटकाने का नंबर आता था, उतनी देर में बाबा जी खूब सारी बातें बताया करते, कभी अपनी नौकरी की, कभी अपने बचपन की, कभी अपनी पढ़ाई की. हम लोगों को भी खूब मजा आता था सो दिन में कई-कई बार खुद ही बाबा जी से उँगलियों को चटकाने के लिए पूछ लिया करते थे.


पैर के पंजे दबाने के समय बाबा जी ने हमेशा की तरह बहुत सी बातें बताईं. उसी में उन्होंने कहा कि अब तुम उच्च शिक्षा के लिए बाहर जा रहे हो. अच्छा लगा कि बाहर जाते समय तुमको अपना गाँव याद रहा, यहाँ आने का मन बनाया. बाबा जी बोले कि हमारी एक बात हमेशा याद रखना कि अपने जीवन को बनाने के लिए ही तुम घर से बाहर जा रहे हो, जीवन को बर्बाद करने के लिए वापस आने की जरूरत नहीं. पहले तो हमारी समझ में नहीं आया कि बाबा जी आखिर किस बात के लिए कह रहे हैं. जब हमने अपनी शंका सामने रखी तो उन्होंने कहा कि ऐसा इसलिए कहा क्योंकि संपत्ति का मोह बहुत बुरा होता है. गाँव के ये मकान, खेत-खलिहान आदि न तुम्हारे पिताजी लेकर आये, न हम लेकर आये, न हमारे बाप-दादा लेकर आये थे. ये पुश्तैनी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को अपने आप मिलते रहे हैं. इनके लिए गाँव आकर फौजदारी करने की जरूरत नहीं. तुम्हारे पिताजी, चाचा लोगों को पढ़ा-लिखाकर बाहर इसीलिए निकाला कि अपना जीवन सुधार सकें. तुम लोग भी ऐसा करना. दुर्भाग्य से कभी कोई ऐसा करे कि वो गाँव की संपत्ति पर कब्ज़ा कर ले तो स्वाभिमान के साथ उससे कानूनी लड़ाई लड़ना, खून-खच्चर करने की जरूरत नहीं. अच्छी शिक्षा, ज्ञान की जो संपत्ति तुम लोग बनाओगे उसे कोई नहीं कब्ज़ा सकेगा और उसके बल पर तुम लोग कहीं भी इससे ज्यादा संपत्ति हासिल कर लोगे. चूँकि बाबा जी ने स्वयं लम्बी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद गाँव में अपने हिस्से की संपत्ति को हासिल किया था. उन्होंने गाँव में और अपनी पुलिस की नौकरी के दौरान उन्होंने संपत्ति के विवादों, लड़ाई-झगड़ों के दुष्परिणामों को करीब से देखा था, इस कारण वे अपने अनुभवों को हमसे बताते हुए भविष्य के लिए हमें जागरूक कर रहे थे.      


उस दिन तो बहुत सी बातें समझ में भी नहीं आईं मगर उनको दिल-दिमाग में गहरे से बैठा लिया था. समय का चक्र ऐसा घूमा कि उसके बाद बाबा जी से बहुत ज्यादा मिलना नहीं हो सका. जितना भी मिलना हुआ, बाबा जी ने उसमें इस तरह की कोई बात नहीं की. ये घटना जुलाई-अगस्त 1990 की थी और एक साल बीतते-बीतते 1991 की आज की तारीख में बाबा जी हम सबसे बहुत दूर चले गए. बाबा जी के बाद भी गाँव की पैतृक संपत्ति से सम्बंधित किसी भी मामले में हमारा सीधा हस्तक्षेप नहीं रहा किन्तु हमारे पिताजी के वर्ष 2005 में चले जाने के बाद गाँव की इस छिपी हुई वास्तविकता से सामना हुआ. एक-एक इंच जमीन को कब्जाने का लालच देखा, खेतों पर गिद्ध दृष्टि लगाये लोगों को देखा. ये तो बाबा जी की शिक्षाओं का, उनके आशीर्वाद का सुफल कहा जायेगा कि बहुत सी विषम स्थितियों से आराम से निकल आये.


आज बाबा जी हम सबसे दूर हुए 32 वर्ष हो गए हैं, दो दिन बाद हम भी 50 का आँकड़ा छू लेंगे किन्तु अभी भी गाँव की पैतृक संपत्ति को बिना किसी विवाद के, बिना किसी लड़ाई-झगड़े के सुरक्षित रखे हुए हैं. यही कामना करते हैं कि ज़िन्दगी भर बाबा जी की, अइया की शिक्षाओं का पालन कर सकें, उनके दिखाए रास्ते पर चल सकें.


आज बाबा जी की पुण्यतिथि पर उनको सादर नमन. 






 

24 जून 2021

हाल्ट, हुकुम सर देयर, फंडर फ़ो

हाल्ट, हुकुम सर देयर. फंडर फ़ो. इस वाक्य से आपमें से संभव है कि बहुत से लोगों का पाला पड़ा हो और बहुत से लोगों का नहीं भी पड़ा होगा. बहुत से लोगों से ऐसे वाक्य का सामना प्रत्यक्ष रूप से किया होगा और बहुत से लोग ऐसे होंगे जिन्होंने ऐसे लोगों की जुबानी ही इस वाक्य से परिचय पाया होगा. हम भी उन्हीं लोगों में से हैं जिन्होंने इस वाक्य का परिचय अपने बाबा जी से प्राप्त किया है.


वैसे बहुत से लोग तो अभी तक कई बार पढ़ चुके होंगे इसे और इसके भीतर की टाइपिंग मिस्टेक खोजने में लगे होंगे. बहुत से लोगों ने तो टाइपिंग मिस्टेक निकाल कर इसे सही भी पढ़ लिया होगा. अब पता नहीं उन्होंने क्या गलती निकाली होगी और उसको सही करके क्या पढ़ा होगा? ये तो परदे के पीछे की बात है मगर जो लोग भी इस वाक्य से परिचित हैं वे अवश्य ही मन ही मन में या फिर खुलकर मुस्कुरा रहे होंगे.


असल में ऐसा वाक्य सुरक्षा प्रहरियों द्वारा किसी समय बोला जाता था. हमारे बाबा जी पुलिस में हुआ करते थे. उनकी पुलिस विभाग में सेवाएँ अंग्रेजी राज्य के समय से ही शुरू हो गईं थीं. उस समय के बारे में, सुरक्षात्मक कदमों के बारे में बताते समय ऐसे वाक्य से हम लोगों का परिचय करवाया था. यह वाक्य असल में ऐसा नहीं हुआ करता था बल्कि जो पहरेदार, सुरक्षाकर्मी अपनी ड्यूटी में तैनात हुआ करते थे उनके द्वारा मूल वाक्य को कुछ इस रूप में बोला जाता था.




इस वाक्य का मूल वाक्य भी आपके बीच रखेंगे पहले इसके बोले जाने का कारण तो पढ़ लीजिये. सुरक्षा बलों की तैनाती की जगह पर, कार्यालय, घरों आदि की सुरक्षा में तैनात कर्मियों द्वारा यह वाक्य उस समय जोर से बोला जाता था जब कोई उनकी निर्धारित सीमा के भीतर प्रवेश कर जाता था. इस वाक्य के द्वारा वे सामने से आने वाले की, सीमा रेखा में घुस आने वाले की पहचान करते थे कि वह दोस्त है अथवा दुश्मन. अब आप सोचेंगे कि एक जरा से वाक्य से कोई कैसे पहचान सकता था कि अन्दर आने वाला दोस्त है या दुश्मन. जी हाँ, सही सोचा आपने. असल में सुरक्षा कर्मियों को किसी भी संदिग्ध व्यक्ति के अपनी सीमा रेखा में घुस आने वाले को गोली मार देने तक के आदेश हुआ करते थे. इसलिए जैसे ही कोई संदिग्ध व्यक्ति इन सुरक्षा कर्मियों को अपनी सीमा में घुसता दिखाई देता था तो वे जोर से बोलते थे, हाल्ट हुकुम सर देयर. फंडर फ़ो. ऐसा वे तीन बार जोर-जोर से बोला करते थे. उसमें जवाब मिल जाने पर तो ठीक अन्यथा की स्थिति में वे सुरक्षा कर्मी उस संदिग्ध पर गोली भी चला देते थे.


यह वाक्य सुरक्षा कर्मियों के अल्प शिक्षित होने, ग्रामीण अंचलों से होने के कारण इस तरह बोला जाने लगा था. मूल वाक्य इस तरह का नहीं हुआ करता था. हॉल्ट, हू कम्स देयर, फ्रेंड ऑर फ़ो?  के द्वारा सामने आने वाले से जानकारी ली जाती थी कि वह दोस्त है या दुश्मन. सामने वाला भी पहली बार में ही अपना जवाब दे दिया करता था.


बाबा जी बताया करते थे कि कई बार दुश्मन की तरफ से अचानक से हमला हो जाया करता था. सुरक्षा कर्मियों को बोलने का, पूछने का मौका ही नहीं मिल पाता था कि हाल्ट. हुकुम सर देयर, फंडर फ़ो? और वे इसे बोलने, पूछने के पहले ही दुश्मन के हमले का शिकार हो जाया करते थे. कुछ इसी तरह का दुश्मन अबकी हमारे बीच है, जो हमारी सुरक्षा व्यवस्था को पूछने का अवसर ही नहीं दे रहा है कि हू कम्स देयर, फ्रेंड ऑर फ़ो? वह तो बस सीधे हमला कर दे रहा है. हमारी इम्युनिटी को, हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बुरी तरह से प्रभावित कर दे रहा है.


जी हाँ, सही समझे आप, कोरोना अबकी ऐसा ही दुश्मन बनके आया है जिसने पूछने का मौका ही नहीं दिया. अभी भी मौका है संभलने का, अपने सुरक्षा तंत्र को सजग बनाने का. अपनी क्षमता को मजबूत कीजिये, अपनी इम्युनिटी पॉवर को बढ़ाइए और किसी भी दुश्मन के हमला करने से पहले, उसके सीमा रेखा में घुसने के पहले ही सुरक्षा तंत्र को पूछने दीजिये, हाल्ट, हुकुम सर देयर.....


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17 सितंबर 2020

वो मासूमियत भरे कोमल दिन

Early to bed and early to rise makes and man healthy, wealthy and wise. ये लाइन हमारे बाबा जी अक्सर हम भाइयों को सुनाया करते थे. जल्दी सोने की आदत उस समय हुआ करती थी और जल्दी जागने की भी. कारण ये कि  पढ़ाई का बहुत बोझ जैसा कोई माहौल नहीं था. जो थोड़ा-बहुत काम मिला करता था वह बहुत जल्दी समाप्त हो जाया करता था. उसके बाद खूब जमकर मैदान पर खेलना हुआ करता था. जमकर शारीरिक अभ्यास होने के कारण जल्दी ही नींद के आगोश में चले जाया करते थे. सोने के बाद ये आराम नहीं कि सुबह देरी तक सोते ही रहना है. बाबा जी ने आदत डलवाई थी सुबह घूमने की, इसी कारण सुबह जागना भी खूब जल्दी हो जाया करता था.


बाबा जी के साथ सुबह-सुबह टहलने का क्रम वर्ष 1990 तक चला. उसके बाद हमारा उच्च शिक्षा के लिए ग्वालियर जाना हुआ और अगले वर्ष आज ही के दिन बाबा जी का अनंत यात्रा को जाना हुआ. हॉस्टल में रहने के कारण जल्दी सोने की आदत तो बदलने लगी मगर सुबह जल्दी उठने और घूमने की आदत नहीं बदली. कॉलेज के मैदान पर सुबह-सुबह जाकर कई-कई चक्कर लगाया करते थे. उसके पीछे सुबह उठने की आदत के साथ-साथ एथलेटिक्स में भाग लेना भी था.


समय बदलता रहा, हम भी बदलते चले गए और आदतें भी बदल गईं. अब देर रात तक जागना होने लगा है. सुबह नींद आज भी जल्दी खुल जाती है मगर अब न एथलेटिक्स है, न सुबह कुछ याद करने का चक्कर, न पढ़ाई करने की स्थिति सो जागते हुए घड़ी के और आगे सरकने का इंतजार करते रहते हैं. देर रात से ही आज की तारीख दिमाग में घूम रही थी, उस दिन की घटना किसी फिल्म की तरह घूम रही थी. सुबह उठकर बचपन की दिनचर्या याद आने लगी. दौड़ते-दौड़ते अजनारी गाँव तक जाना, लौटते समय रेलवे क्रासिंग पर बनी गुमटी में बैठकर निकलने वाली ट्रेन के डिब्बे गिनना, सिक्कों को चुम्बक बनाने के लिए पटरियों पर रखना और ट्रेन निकल जाने के बाद उनको ढूँढना आदि-आदि याद आता रहा, चेहरे पर मुस्कान लाता रहा. बुजुर्गों का साथ रहना बच्चों को कितना-कितना सिखा जाता है, यह वही समझ सकता जिसने उन पलों का आनंद लिया हो.


बाबा जी को उनकी पुण्यतिथि पर सादर नमन.


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01 सितंबर 2020

बाबा जी, आप सदैव साथ हैं हमारे

अपनों को खोने का दुःख सदैव रहता है. उम्र भर उनकी कमी महसूस होती है. यह कमी उस समय और तीव्रता से महसूस होती है जबकि उनकी पुण्यतिथि हो. यह क्षण उस समय और कष्टकारी हो जाता है जबकि ऐसी तिथि दो बार आपकी नज़रों के सामने से गुजरे. इसमें भी एक तिथि ऐसी हो जिसका सम्बन्ध आपकी संस्कृति से, आपके धार्मिक कृत्य से हो. यदि किसी भी तिथि को हिन्दी और अंग्रेजी महीनों के अनुसार देखा जाये तो सभी का दो बार आना स्वाभाविक है. इसमें अंग्रेजी महीने वाली तारीख तो अपने नियत समय, नियत महीने पर ही आती है. इसके उलट हिन्दी महीनों के अनुसार आने वाली तिथि प्रतिवर्ष आगे-पीछे होती रहती है. इस कारण से हम सभी अपने महत्त्वपूर्ण दिवसों को अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार याद किये रहते हैं. हिन्दी महीनों की तिथि बहुत से लोगों को याद भी नहीं रहती है.



ऐसा लगभग सभी के साथ है, खुद हमारे साथ भी. हिन्दी महीनों के कैलेण्डर की तिथि हमें उसी स्थिति में याद रहती है जबकि वह सामाजिक रूप से कुछ विशेष हो. कुछ ऐसा ही हमारे साथ भी कुछ विशेष तिथियों को लेकर है. उन्हीं में एक विशेष तिथि है बुढ़वा मंगल की. उस दिन भी यही मंगलवार था मगर तारीख 01  सितम्बर नहीं थी, उस दिन 17 सितम्बर थी. यह दिन पिछले 29 सालों में लगातार साथ रहा है. यह दिन अंग्रेजी महीने की तारीख आने पर तो तो याद आता ही है, हिन्दी महीनों के अनुसार भी यह स्मृति में छाया रहता है. सन 1991 में सितम्बर माह की 17 तारीख थी और दिन मंगलवार था, बुढ़वा मंगल जबकि हमारे बाबा जी हम सबको अकेला छोड़कर अनंत यात्रा को चले गए थे.

उस दिन बाबा जी से नहीं बल्कि उनकी मृत देह से ही हम सबका परिचय हुआ था. वे हम सबको दैहिक रूप में छोड़कर भले ही चले गए हों मगर अपनी शिक्षाओं के रूप में हमारे साथ सदैव रहेंगे. उन्होंने हम लोगों को सदैव जीवन के विविध पक्षों के बारे में जानकारी दी, शिक्षा दी. जीवन के विविध पक्षों के बारे में बाबा जी के द्वारा दी गई शिक्षाओं का महत्त्व अब समझ आता है जबकि हमें जीवन के बारे में समझने की आवश्यकता महसूस होती है. जीवन के प्रति, ज़िन्दगी के प्रति हमारी सकारात्मक सोच के पीछे निश्चित रूप से बाबा जी के जीवन-दर्शन का ही योगदान कहा जायेगा.

बाबा जी की पुण्यतिथि पर उनको सादर श्रद्धांजलि.

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03 अगस्त 2020

संबंधों के साथ खेल, सही सही है, गलत गलत है

सम्बन्ध का निर्वहन सबसे कठिन होता है, इसे सुना था मगर ज़िन्दगी में जान भी गए. कुछ स्थितियाँ ऐसी होती हैं जबकि समय से पहले कुछ अनुभव मिल जाया करते हैं. जनपद मुख्यालय में निवास स्थान होने के कारण गाँव से, ननिहाल से किसी भी समस्या से सम्बंधित लोगों के आने का एकमात्र माध्यम पिताजी हुआ करते थे. ऐसा इसलिए भी होता था क्योंकि वे वकालत से सम्बद्ध थे. पता नहीं आज वकीलों के बारे में आम राय क्या है मगर किसी समय वकीलों को बहुत ही सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था. उस दौर में जबकि सरकारी नौकरियाँ बहुत ही सहज थीं, पिताजी को कई-कई अच्छी सरकारी नौकरियों से बाबा जी ने महज इसीलिए रोक रखा था कि वे पारिवारिक मुकदमों को देख सकें, उनका निस्तारण कर सकें. कई बार बाबा जी से इस सन्दर्भ में बात होती तो बाबा गर्व के साथ बताते कि हमारे पिताजी का किस-किस नौकरी के लिए चयन हुआ मगर घर की स्थिति के कारण नहीं भेजा. उसके आगे वे कहते कि वकील साहब कहने में जिस साहब का भाव उभरता है वह डीएम के लिए साहब कहने में भी नहीं उभरता है. आज इस वाक्य का सत्य क्या है, ये तो आज के लोग जानें मगर हमने बाबा जी के इस वाक्य की सत्यता अपनी आँखों देखी है.



बहरहाल, संबंधों की सत्यता आज जैसी दिखती है, उस दौर में नहीं दिखती है. हमने कभी भी पिताजी के मुँह से इस सम्बन्ध में नकारात्मक टिप्पणी नहीं सुनी. पिताजी तो चलो अपने परिवार के लिए यह त्याग कर रहे थे, हमने आज तक अम्मा के मुँह से ऐसी स्थिति के लिए कभी नाराजगी नहीं देखी, नकारात्मक टिप्पणी नहीं देखी. पारिवारिक माहौल का प्रभाव ही कहा जायेगा कि हम संबंधों का ख्याल रखने की भरसक कोशिश करते हैं. हमारी कोशिश होती है कि किसी को भी हमारी तरफ से परेशानी का अनुभव न हो. हमसे जितनी संभव हो मदद उसे मिल जाये. ऐसा हम न केवल अपने परिचितों के साथ करते हैं बल्कि अपरिचितों के साथ भी ऐसा व्यवहार रहता है.

हमारे इसी व्यवहार के कारण कई बार हमें अपने घर में डांट भी पड़ी. स्वाभाविक है, कोई माता-पिता अपने पुत्र के लिए किसी स्थायित्व की बात पर विचार कर रहे हों, उनके मन में किसी बड़ी योजना की रूपरेखा बनी हुई हो और उनका वह पुत्र अनर्गल कार्य करते फिर रहा हो, तो नाराजगी स्वाभाविक है. हम अपनी योजनाओं के साथ आगे बढ़ते रहे, परिवार की अपनी योजनायें बनी रहीं. इन्हीं तमाम सारी योजनाओं में मित्रों की, परिचितों की योजनाओं ने भी अपना पाला संभाल लिया. कुछ को हम पूरा कर सके, कुछ में हम असफल रहे. बस यही हमारी ज़िन्दगी का सबसे ख़राब पहलू बनकर सामने आया. जहाँ हम सफल रहे वहाँ तो किसी ने क्रेडिट न दिया मगर जहाँ हम असफल रह गए वहाँ सभी ने हम पर दोषारोपण करना शुरू कर दिया. पता नहीं असल सत्य क्या है?

हमारे कुछ ख़ास मित्र, हमारे परिजन भी हमारी इस कार्यशैली से नाराज हैं. उनके वक्तव्य, उनके विचार हमारे प्रति इस तरह नकारात्मक बन चुके हैं कि कई बार तो हमें खुद में ऐसा आभास होता है कि कहीं हम वाकई नकारात्मक सोच वाले व्यक्ति तो नहीं बनते जा रहे? बहरहाल, वे लोग बताते नहीं कि हम कहाँ गलत हैं और हमें समझ आता नहीं कि हम कहाँ गलत हैं. फ़िलहाल तो दोनों तरफ से गलत-गलत खेला जा रहा है, कौन सही है ये तो समय बताएगा.

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17 सितंबर 2019

बाबा जी के आशीर्वाद से निखरता आत्मबल


अपने गाँव बचपन से ही जाना होता रहता था. गर्मियों की छुट्टियाँ कई बार गाँव में ही बिताई गईं. इसके अलावा चाचा लोगों के साथ भी अक्सर गाँव जाना होता रहता था. हमारे गाँव जाने के क्रम में कोई न कोई साथ रहता था मगर उस बार अकेले जाना हो रहा था. बिना किसी कार्यक्रम के, बिना किसी पूर्व-निर्धारित योजना के. स्नातक की पढ़ाई के लिए हमारा ग्वालियर जाना निर्धारित हो गया था. जाने का दिन भी लगभग तय हो गया था. अचानक बैठे-बैठे दिमाग में आया कि ग्वालियर जाने के पहले अईया-बाबा से मिल आया जाये. उस समय अईया-बाबा गाँव में ही हुआ करते थे. उनका उरई आना दशहरे-दीपावली के आसपास होता था. इसके बाद होली के बाद खेती वगैरह के काम से गाँव चले जाया करते थे.

बहुत छोटे से लगातार अईया-बाबा के संपर्क में रहने के कारण लगाव भी था. बहरहाल, उस दिन दोपहर बाद घर पहुँच नीचे से जैसे ही आवाज़ लगाई, अईया ख़ुशी से चहक उठीं. बाबा भी आश्चर्य में पड़ गए कि हम अचानक कैसे आ गए, वो भी अकेले. आश्चर्य होने का कारण ये और था कि हम अकेले आये थे बिना किसी सूचना के. उस समय आज की तरह मोबाइल तो थे नहीं, फोन भी नहीं थे कि खबर कर दी जाती हमारे आने की. उस समय खबरों के आदान-प्रदान का स्त्रोत पत्र हुआ करते थे या फिर गाँव से आने-जाने वाले लोग. इसके साथ-साथ आश्चर्य का एक कारण हमारा नितांत अकेले आना भी था. परिवार में किसी समय लम्बे समय तक चलने वाली जमींदारी और गाँव क्षेत्र की अपनी अलग ही स्थितियों के चलते बाबा इस तरह की स्थितियों से बचाया करते थे. आज भी हम लोगों की ये स्थिति है कि गाँव आने-जाने के दौरान निश्चित समय, रास्ता कभी न बताया जाता है. 

दो-तीन गाँव में रुकना हुआ. उन दो-तीन दिनों में बाबा से बहुत सी बातें हुईं. वैसे तो बाबा का साथ हम भाइयों को बहुत छोटे से मिला, जिसके कारण उनके द्वारा बहुत सी जानकारियाँ, शिक्षाएँ हमें मिलती रहीं. जीवन जीने के ढंग, समस्याओं से निकलने के रास्ते, परेशानियों से बचने के तरीके, खुद पर नियंत्रण रखने की स्थिति, अनुशासन में रहने का मन्त्र, सामाजिक रूप से खुद को स्थापित करने की कार्यशैली आदि पर उनके द्वारा बड़े ही रोचक ढंग से लगातार हम लोगों को बताया जाता रहता.

गाँव में अपने अल्प-प्रवास के दौरान बाबा जी ने कई बातें समझाईं, घर से बाहर अकेले रहने के दौरान आने वाली समस्याओं, उनसे निपटने के तरीके आदि भी समझाए, बिना घबराए, संयम से काम लेटे हुए आगे बढ़ने के रास्ते भी बताए. बाबा जी स्वयं बहुत कम आयु में ही पढ़ने के लिए घर से बाहर निकल आये थे. अपनी पढ़ाई के दौरा उन्होंने स्वयं बहुत संघर्ष किया था. इसका जिक्र वे कई बार हम लोगों के सामने किया करते थे और उदाहरण के लिए समझाया भी करते थे. उनके पढ़ाई के दौरान के संघर्ष को महज ऐसे समझा जा सकता है कि तत्कालीन स्थितियों में एक जमींदार परिवार के बेटे को पढ़ने के लिए बिठूर से उन्नाव ट्रक चलाना पड़ता था. बाबा जी अक्सर उस समय का बना हुआ ड्राइविंग लाइसेंस दिखाया करते थे. असल में बाबा जी के बड़े भाई नहीं चाहते थे कि बाबा जी आगे की पढ़ाई करें. उनका कहना था कि मैट्रिक तक की पढ़ाई ठीक है अब घर वापस आकर खेती और अन्य कामों में सहयोग करें. ऐसे में बाबा जी अपनी जिद से कानपुर में पढ़ाई कर रहे थे. बड़े बाबा जी घर से प्रतिमाह भेजी जाने वाली सामग्री में सबकुछ भेजते, बस रुपये नहीं भेजते थे. ऐसे में धन की कमी को बाबा जी अपने एक मित्र की ट्रांसपोर्ट कंपनी का ट्रक चलाकर पूरा किया करते मगर उन्होंने कभी घर में इसकी शिकायत न की.

उन्हीं बातों के दौरान बाबा जी की एक बात आज तक जैसे कंठस्थ है. उस बात ने या कहें कि जीवन की सबसे बड़ी सीख ने हमें व्यक्तिगत स्तर पर पारिवारिक तनाव, संघर्ष से बचाए रखा है. पिताजी के देहावसान और अपनी दुर्घटना के बाद की स्थितियों में भी यदि मनोबल कमजोर न हुआ तो बाबा जी की नसीहतों के चलते.

गाँव से वापस लौटने वाले दिन के ठीक पहले दोपहर में खाना खाने के बाद बाबा जी के पैर की उंगलियाँ चटका रहे थे. बाबा ने कहा कि स्नातक की पढ़ाई करने जा रहे हो, आगे भी खूब पढ़ना. शिक्षा ही एकमात्र ऐसी पूँजी है जिसके द्वारा संसार की किसी भी स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है. गाँव, खेती, जमीन, मकान आदि की चर्चा करते हुए उन्होंने समझाया कि हमेशा एक बात याद रखना कि गाँव की जमीन, मकान, खेत न हम लेकर आये थे, न तुम्हारे पिताजी. ये सब हमारे पुरखों के द्वारा कई पीढ़ियों से अगली पीढ़ी को स्वतः मिलता रहा है. ऐसे में इन्हें लेकर कभी लड़ाई नहीं करना. बाबा जी का कहना था कि गाँव की लड़ाई, मुक़दमेबाजी से दूर रखने के लिए तुम्हारे पिताजी-चाचा लोगों को बाहर निकाला है, तुम लोग इसके लिए लौटकर गाँव न आना. मुक़दमेबाजी, लड़ाई, पुलिस आदि झगड़ों से दूर ही रहना. दुर्भाग्य से कभी ऐसा हो भी जाये कि कोई गाँव की जमीन, घर, खेत आदि पर कब्ज़ा कर ले तो अपने अधिकारों का पूरा उपयोग करो. अपनी संपत्ति को वापस लेने के लिए संघर्ष करो मगर इसके लिए खून-खराबा करने की, फौजदारी करने की आवश्यकता नहीं है. वापस गाँव लौटने की जरूरत नहीं है. शिक्षा तुमको इससे ज्यादा सम्मान, इससे ज्यादा संपत्ति प्रदान करवाएगी. पुरखों की इस संपत्ति की रक्षा करना तुम सबका दायित्व है मगर इसके लिए अपने भविष्य को, अपने परिवार को, आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बिगाड़ देना समझदारी नहीं होगी.   

और भी बहुत सी बातें बाबा जी द्वारा बहुत गंभीरता से कही गईं. असल में हमारे बाबा जी स्वयं इस स्थिति के भुक्तभोगी रहे थे. अपनी सरकारी नौकरी को वे छोड़कर गाँव के घर, जमीन, खेत के लिए वापस गाँव आये थे. मुकदमेबाजी, आपसी तनाव, झगड़ों के बीच उन्होंने समय की, पढ़ाई की महत्ता को समझा-जाना था. उस समय तो बाबा जी की उन बातों सा न तो हम सन्दर्भ पकड़ पा रहे थे और न ही उनका आकलन कर पा रहे थे कि ऐसा क्यों बताया-समझाया जा रहा. बाबा जी उसके बाद बस एक वर्ष और हमारे बीच रहे, शायद वे समय की सीख देना चाह रहे थे. और यह संयोग ही कहा जायेगा कि कभी गाँव अकेले न जाने वाले हम उस दिन अचानक बिना किसी कार्यक्रम के बाबा-अईया के पास पहुँच गए.

लगभग तीन दशक का समय हो गया बाबा जी को हम लोगों से दूर गए हुए. कम नहीं होता इतना समय, इसके बाद भी लगता है जैसे उनका जाना कल की ही बात हो. उस दिन का समूचा घटनाक्रम आज भी ज्यों का त्यों दिल-दिमाग में छाया हुआ है. उनकी बहुत सी बातें आज भी हम गाँठ बाँधे हैं. उनकी शिक्षाओं ने, उनकी नसीहतों ने कभी हमें परेशान न होने दिया, कभी हमें समस्या में न पड़ने दिया, कभी आत्मविश्वास न डिगने दिया. आज बाबा जी की पुण्यतिथि पर उनको सादर नमन.


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आज, 17 सितम्बर बाबा जी की पुण्यतिथि पर 

17 सितंबर 2017

बाबा जी की शिक्षाओं ने सदैव आगे बढ़ाया है

ये हम तीनों भाइयों का सौभाग्य रहा कि हमें अपने बाबा-अइया के साथ रहने का, उनकी सेवा करने का, उनसे बहुत कुछ सीखने का अवसर मिला. गाँव की कृषिगत जिम्मेवारियों से निवृत्त होकर बाबा-अईया हम लोगों के पास आ जाते. उनके आने पर हम तीनों भाइयों को कुछ बेहतरीन लाभ मिलने लगते. जैसे कि पिताजी की डांट-मार से मुक्ति मिल जाती. हम लोगों की शैतानियाँ निखरने लगती. बाबा-अईया अपने स्नेहिल संरक्षण में यदि हम लोगों की शैतानियों को पंख लगने देते तो इसके साथ ही वे हमारे बौद्धिक ज्ञान, व्यक्तित्व विकास, शारीरिक विकास, चारित्रिक विकास को भी पल्लवित-पुष्पित करते. सुबह घूमने की आदत, पैदल चलने की आदत, मेहनत करने की आदत, समयबद्ध कार्य करने की आदत, अनुशासन में रहने की आदत, पढ़ने की आदत, लिखने की आदत, कागजातों को क्रमबद्ध सुरक्षित रखने की आदत, वैचारिक विमर्श करने की आदत, किसी भी स्थिति को सभी बिन्दुओं पर परखने की आदत आदि का बीजारोपण बाबा जी के द्वारा ही किया गया.

हम तीनों भाइयों को सुबह-सुबह उठाकर अपने साथ ले जाना, रास्ते में तमाम ज्ञानवर्द्धक जानकारियां देना, हमें स्कूल छोड़ने और लेने जाने के दौरान बाजार की, तत्कालीन राजनीति की, अपने समय की अनेक बातों को बताते हुए उनका विश्लेषण करना उनके द्वारा होता रहता. बाबा जी द्वारा दी गई शिक्षाओं को, उनके द्वारा दी गई जानकारियों को, उनके सिद्धांतों को यदि लिखने बैठा जाये तो बहुत कुछ या कहें कि न समाप्त होने वाला अध्याय लिखा जा सकता है. वे हमारी लिखने की आदत देखकर अकसर हमें समझाते रहते थे कि किसी भी घटना पर, किसी भी बिन्दु पर कभी एकपक्षीय होकर मत सोचो, एकपक्षीय होकर कभी विचार न करो. उसके जितने भी पहलू हो सकते हैं, सभी पर विचार करो, कोई न मिले तो उन सभी बिन्दुओं पर खुद से तर्क-वितर्क करो. किसी भी घटना के, विषय के सभी पक्षों पर जब तुम समान रूप से विमर्श करने की स्थिति में होगे तो उस घटना, विषय विशेष पर कभी गलत नहीं होगे. वे ऐसे लोगों से तर्क-वितर्क न करने की सलाह देते थे जो नितांत कुतर्की होते हैं. ऐसे लोगों के बारे में बाबा जी का मत था कि ये खुद तो भ्रमित रहते ही हैं सामने वाले को भी भ्रमित करते हैं. आज भी उनके शब्द हमें अक्षरशः याद हैं. और यही कारण है कि आज भी किसी भी घटना के सन्दर्भ में उससे बनने वाले सभी बिन्दुओं पर हमारा तर्क-वितर्क होता रहता है. अकसर हमारे मित्रों को लगता है कि हम भटकाने-भटकने की कोशिश कर रहे हैं, विषय से इतर बात कर रहे हैं मगर हमें स्वयं पता होता है कि ऐसा हम क्यों कर रहे हैं, इसके पीछे का मूल कारण क्या है. यही कारण है कि आज भी हम किसी भी विषय पर उससे जुड़े सभी संभावित बिन्दुओं पर एकसमान रूप से विचार कर लेते हैं. इस वैचारिक शक्ति ने हमारी लेखन-क्षमता को मजबूती ही दी है.

वे समाज के चालचलन के बारे में, लोगों के कृत्यों के बारे में, लोगों के व्यवहार के बारे में भी समझाते रहते थे. लोगों की सहायता करने को, असहायों की मदद करने को वे लगातार प्रेरित भी करते रहते थे. इस सन्दर्भ में उनकी एक बात सदैव हमारे आसपास घूमती रहती है. उनका कहना था कि तुमसे जितना बन पड़े दूसरों के लिए भला करो, बिना ये जाने-समझे कि वो तुम्हारा परिचित है या अपरिचित; बिना ये सोचे कि भविष्य में वो तुम्हारे काम आएगा या नहीं; बिना इसका विचार किये कि तुमको उस कार्य से लाभ हो रहा या नहीं. दूसरों को परेशानी में, समस्या में देखो तो उसकी निसंकोच मदद करो. इसके साथ ही ये बात याद रखो कि तुम भले ही सबका भला करते रहो मगर किसी को अपने प्रति बुरा सोचने न दो, करने न दो. यदि ऐसा होता है तो वह आगे चलकर तुम्हारे लिए परेशानी पैदा कर सकता है. इसका इलाज यही है उसका ऐसा इलाज करो कि फिर वो किसी का भी बुरा करने तो क्या बुरा सोचने लायक भी न रह जाए.

इसके अलावा उनकी एक सीख आज भी हमें किसी भी तरह की परेशानी में नहीं आने देती. कितनी भी बड़ी समस्या हो हमें परेशान नहीं करती. वे कहा करते थे कि कितनी भी बड़ी समस्या हो उसका हल बहुत छोटी सी घटना में खोजना चाहिए. उनका मानना था कि कोई भी घटना बड़ी नहीं होती, हमारी मानसिकता, हमारा परेशान होना, हमारा अफरातरफी मचाना ही समस्या को बड़ा बना देता है. ऐसे में आत्मसंयम, मानसिक नियंत्रण, सजगता से समस्या का हल निकाला जा सकता है.

आज उनको हम लोगों से दूर गए छब्बीस वर्ष हो गए हैं. उनकी शिक्षाओं ने, उनकी जानकारियों ने हमारा हर कदम पर साथ दिया है. बड़ी से बड़ी घटना रही हो या फिर छोटी से छोटी समस्या, सबको हमने हँसते हुए ही दूर किया है. उनके आशीर्वाद का ही सुफल है कि बहुत सी नकारात्मक ताकतों की कोशिशों के बाद भी हम अपनी राह सहजता से बढ़े जा रहे हैं, आगे भी बढ़ते रहेंगे.  

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आज, 17 सितम्बर, उनकी पुण्यतिथि पर बाबा जी को याद करते हुए...

13 सितंबर 2016

रुला जाता है बुढ़वा मंगल

उस दिन बुढ़वा मंगल था. स्थानीय अवकाश होने के कारण विद्यालय, कार्यालय, कचहरी आदि में छुट्टी थी. पिताजी भी घर पर ही थे. छोटा भाई हर्षेन्द्र अपने कुछ मित्रों के साथ उरई के पास बने संकट मोचन मंदिर गया हुआ था. हम भी अपनी छुट्टी के चलते ग्वालियर नहीं गए थे. मंदिर वगैरह जाने का, बुढ़वा मंगल को होने वाला दंगल देखने का ऐसा कोई विशेष शौक न तो हमारा था और न ही हमारे मित्रों का. ऐसे में दोपहर को घर में ही आराम से पड़े थे. बात सन 1991 की है, तब हाथ में न तो मोबाइल होता था, न मेज पर कंप्यूटर और न ही इंटरनेट जैसा कुछ. सो किताबों से अपनी दोस्ती को सहज रूप से आगे बढ़ा रहे थे.

तभी किसी ने दरवाजे को बहुत जोर-जोर से पीटना शुरू किया. साथ में वो व्यक्ति पिताजी का नाम लेता जा रहा था. दरवाजा पीटने की स्थिति से लग रहा था कि उसे बहुत जल्दी है. हम शायद जोर से चिल्ला बैठते मगर उसके द्वारा पिताजी का नाम बार-बार, चिल्ला-चिल्ला कर लेते जाने से लगा कि कोई ऐसा है जो उम्र में पिताजी से बड़ा है. जल्दी से उठकर दरवाजा खोला तो सामने गाँव के द्वारिका ददा हैरान-परेशान से खड़े थे. इतनी देर में अन्दर से पिताजी भी बाहर आ गए. “चाचा की तबियत बहुत ख़राब है.” ददा के मुँह से इतना ही निकला.

“कहाँ हैं?” के सवाल पर उनके हाथ का इशारा पास के डॉक्टर देवेन्द्र के क्लीनिक की तरफ गया. हमने बिना कुछ आगे सुने, उस तरफ पूरी ताकत से दौड़ लगा दी. बमुश्किल सौ मीटर की दूरी पर बने उनके क्लीनिक के सामने एक जीप खड़ी थी और गाँव के कुछ लोग. हमने जल्दी से जीप के पीछे वाले हिस्से में चढ़कर देखा, बाबा चादर ओढ़े लेते हुए थे.

“बाबा, बाबा” हमारी आवाज पर कोई हरकत नहीं हुई. तब तक पिताजी, अम्मा भी आ गए. डॉक्टर देवेन्द्र ने जीप में अन्दर जाकर बाबा को देखा और नकारात्मक मुद्रा में सिर हिला दिया.

“डॉक्टर साहब, ऐसा नहीं हो सकता, जरा फिर से देख लीजिये.” अम्मा जी का रोआंसा सा स्वर उभरा. पिताजी, हमारी और गाँव के बाकी लोगों की आँखों में पानी भर आया. डॉक्टर साहब ने दोबारा जाकर जाँच की और जीप से उतर कर फिर वही जवाब दिया.

एक झटके में लगा जैसे समूचा परिवार ख़तम हो गया. अइया गाँव में ही थीं. रोने-बिलखने के बीच बाबा की पार्थिव देह को गाँव ले जाने की ही सलाह पिताजी को दी गई. मोहल्ले के कुछ लोगों को खबर दी गई. समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या किया जाये. तब दूरसंचार सुविधा भी आज के जैसी अत्याधुनिक नहीं थी. तीनों चाचा लोग दूर थे, उनको कैसे खबर दी जाए, पिताजी इस सोच में थे. टेलीफोन से, तार से, जाकर जैसे भी हो उनको खबर दी जाए, इसकी जिम्मेवारी मोहल्ले के लोगों ने ले ली.

17 सितम्बर 1991, दिन मंगलवार, बुढ़वा मंगलवार, हम लोग उसी जीप में बैठकर बाबा की देह को लेकर गाँव चल दिए. वे बाबा जो उसी सुबह तक लगभग 75-76 वर्ष की उम्र में पूरी तरह स्वस्थ, तंदरुस्त, सक्रिय थे और अचानक हम सबको छोड़कर चले गए. काम करने के दौरान सुबह दीवार से सिर टकरा जाने, गाँव के नजदीक के कस्बे माधौगढ़ में प्राथमिक उपचार के बाद उरई लाया गया. जहाँ वे बिना किसी तरह की सेवा करवाए इस निस्सार संसार में हम सबको अकेला कर गए.


जमींदार परिवार का होने के बाद भी बाबा जी ने अपने समय में बहुत कठिनाइयों का सामना किया. पढ़ाई के समय भी संघर्ष किया. आज़ादी की लड़ाई में खुलकर भाग भले न लिया हो पर आन्दोलनों में भागीदारी की. एकबार स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का प्रमाण-पत्र बनने का मौका आया तो ये कहकर मना कर दिया कि ऐसा कोई काम उन्होंने नहीं किया कि उन्हें सेनानी कहा जाये. बाबा जी से बहुत कुछ सीखने को मिला. मेहनत, आत्मविश्वास, कर्मठता, निर्भयता, जोश, जीवटता, सकारात्मक सोच आदि-आदि गुणों का जो क्षणांश भी हममें मिलता है वो उनकी ही देन है. आज 25 वर्ष हो गए उनको हमसे दूर हुए मगर ऐसा लगता है जैसे वो बुरा वक्त कल की ही बात हो. बुढ़वा मंगल हर बार रुला जाता है.