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13 मई 2025

समाज के दुश्मन से लड़ने को तैयार रहें

पहलगाम में आतंकियों की अप्रत्याशित रूप से धार्मिक पहचान कर हिन्दुओं की हत्याएँ करने के बाद समूचे देश ने केन्द्र सरकार से कठोर कार्यवाही की अपेक्षा की थी. निर्दोषों को मौत की नींद सुलाने के साथ-साथ ‘मोदी को बता देना जैसी चुनौती के बीच जनसामान्य को दृढ़ विश्वास था कि केन्द्र सरकार की तरफ से जबरदस्त जवाबी कदम उठाया जायेगा. प्रत्येक दिन जितनी आशा के साथ आता, उतनी निराशा के साथ चला जाता. उरी और पुलवामा के आतंकी हमलों के बाद सरकार की तरफ से की जा चुकी सैन्य स्ट्राइक के बाद भी इस बार की चुप्पी जनसामान्य के भीतर एक तरह के रोष को जन्म दे रही थी. बहुसंख्यक भारतीय नागरिक पाकिस्तान को, पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों को सिर्फ सबक सिखाने की मंशा नहीं बल्कि उनका सम्पूर्ण विध्वंस करने की चाह रख रहे थे.

 

दरअसल जनता का मनोविज्ञान तुरंत बदला लेने का होता है. उसके लिए रणनीति, कूटनीति आदि का कोई सन्दर्भ नहीं होता है. इसके उलट सरकार के लिए युद्ध का तात्पर्य किसी दूसरे देश पर केवल हमला करना भर नहीं होता है बल्कि अपने देश, सेना, नागरिकों की अत्यल्प क्षति के साथ युद्ध को अपने पक्ष में ले जाना होता है. सरकार की मंशा कुछ इसी तरह की रही होगी कि बिना युद्ध जैसे ट्रैप में फँसे पाकिस्तान को सबक सिखाया जाये. देखा जाये तो दक्षिण एशिया की वर्तमान भू-राजनैतिक स्थितियाँ भारत के पक्ष में नहीं हैं. सभी पड़ोसी देशों में राजनैतिक हलचल मची हुई है. ऐसे में अनिश्चितकालीन अथवा दीर्घकालिक युद्ध वाला माहौल न केवल देश को क्षति पहुँचा सकता है बल्कि चीन को हस्तक्षेप करने का अवसर प्रदान कर सकता है.

 



सरकार ने अपनी नीति, अपनी योजना के अनुसार कार्य करते हुए ऑपरेशन सिन्दूर के द्वारा पाकिस्तान स्थित आतंकी शिविरों, प्रशिक्षण शिविरों पर आधी रात में मिसाइल स्ट्राइक करके उनको ध्वस्त कर दिया. जानकारी होते ही आक्रोशित जनमानस उत्साह, जोश से भर गया. बहुसंख्यक नागरिक वर्ग खुद को इस ऑपरेशन से जुड़ा हुआ महसूस करते हुए पाकिस्तान से निर्णायक मोर्चा खोलने की मंशा बनाने लगा. पाकिस्तान समर्थित आतंकियों के खिलाफ भारत सरकार की सैन्य कार्यवाई से भारतीय जनमानस का जोश अचानक से उस समय शांत कर दिया गया जबकि खबर आई कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के हस्तक्षेप से भारत और पाकिस्तान में युद्ध विराम होने जा रहा है. युद्ध विराम की घोषणा होते ही वो जनमानस जो पाकिस्तान पर कब्ज़ा किये जाने के, उसके कई हिस्सों में टूट जाने के, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के मुक्त हो जाने की बात करते हुए सरकार की शान में कशीदे पढ़ रहा था, वही एकदम से सरकार के विरुद्ध हो गया.

 

बहरहाल, मुद्दा यह नहीं कि सरकार ने आतंक के खिलाफ कार्यवाही देर से क्यों शुरू की? मुद्दा यह भी नहीं कि सम्पूर्ण ध्वंस किये बिना आखिर सरकार ने युद्ध विराम पर सहमति क्यों दी? यहाँ विचार करना होगा कि बहुतायत लोग पाकिस्तान के खिलाफ आर-पार की लड़ाई चाह रहे थे, आतंकियों का सर्वनाश चाह रहे थे उन बहुतायत लोगों के परिवारों से सेना में भर्ती होने वालों की संख्या कितनी है? इस बिन्दु पर आकर माना जा सकता है कि चलिए सभी को सेना में भर्ती नहीं किया जा सकता है; सभी को सैनिक नहीं बनाया जा सकता है; सभी को युद्ध के मैदान में नहीं भेजा जा सकता है. इन्हीं स्थितियों के बीच से एक स्थिति यह निकलती है कि देश के दुश्मन को मिट्टी में मिला देने की हुँकार भरने वाले, आतंकियों का नामोनिशान मिटाने की बात करने वाले लोग समाज के दुश्मन से, समाज के आतातायियों से लड़ने सामने क्यों नहीं आते हैं? महिलाओं-बेटियों के साथ छेड़खानी करने वाले, खुलेआम हत्या करने वाले, चेहरे पर तेजाब फेंक देने वाले, चलती गाड़ी में गैंग-रेप जैसा जघन्य कृत्य करने वाले, सरेआम लूटमार करने वाले भी किसी रूप में आतंकवादियों से कम नहीं हैं. जैसे देश के दुश्मन बड़े रूप में देश को नुकसान पहुँचाते हैं, वैसे ही ये लोग समाज को नुकसान पहुँचाते हैं.

 

ऐसे अपराधियों के मनोबल बढ़ने का कारण कहीं से इनका विरोध नहीं होना है. शांति मार्च निकाल देने, मोमबत्तियाँ जला देने, भाषणबाजी कर लेने से अपराधियों के हौसले पस्त नहीं होते. जनसामान्य की एक आम सोच है कि समाज में क्रांतिकारी तो पैदा हो मगर पड़ोसी के घर में. ऐसी सोच के चलते एक सामान्य नागरिक खुलेआम होते अपराध का सीधा विरोध नहीं करता है. किसी अपराधी का सीधा विरोध न होने से ही वह निरंतर अपराध को अंजाम देता रहता है. सोचिए, जिस तरह से हम किसी भी विरोध से पहले अपने परिजनों का, अपने परिवार का  स्मरण करने लगते हैं, उनके भविष्य के प्रति चिंतातुर होने लगते हैं ठीक वैसे ही सीमा पर तैनात सैनिक का परिवार है, परिजन हैं; वे भी किसी का परिवार हैं, परिजन हैं. उनके दुश्मन देश में सीमा पार घुसकर हमला करने को हम सभी अपना जोश, अपना उत्साह, अपनी वीरता मान लेते हैं मगर असल में यह हमारी वही मानसिकता होती है जिसमें क्रांतिकारी पड़ोस में जन्मा होता है.

 

देश के वीर सैनिक तो सीमा पर दुश्मन के खिलाफ डटे खड़े रहते हैं, अपनी जान की बाजी लगाये रहते हैं. हमें भी समाज के दुश्मनों के खिलाफ, अपने सभ्य नागरिकों के अपराधियों के विरुद्ध सीना तानकर खड़े होने की आवश्यकता है. स्मरण रखना होगा कि युद्ध सिर्फ और सिर्फ युद्ध होता है, वह चाहे देश के दुश्मन के साथ हो या समाज के दुश्मन के साथ. इसमें जानें ही जाती हैं, क्षति होती है, दुश्मन की और अपनी भी. सोचियेगा, क्या आप समाज के दुश्मन से लड़ने को तैयार हैं?


08 मई 2024

रहें सतर्क डिजिटल अरेस्ट से

तकनीकी के फैलते जाते मकड़जाल के बीच रहते हुए उससे सुरक्षित रहना आज बहुत बड़ी चुनौती के रूप में सामने आ रहा है. कम्प्यूटर, मोबाइल, इंटरनेट आदि ने जीवन-शैली को जितना आसान बनाया है उतना ही मुसीबत से भर दिया है. सूचना प्रौद्योगिकी के इस विकास के साथ-साथ होने वाले साइबर अपराधों में वृद्धि से इनकार नहीं किया जा सकता है. यह आज के दौर में सभी को जानकारी है कि इंटरनेट के ज़रिए किए जाने वाले अपराधों को साइबर अपराध अथवा साइबर क्राइम कहते हैं. इस अपराध में कम्प्यूटर, इंटरनेट के माध्यम से वित्तीय धोखाधड़ीबैंक खाते से धन चुरानाहैकिंगअश्लीलता का प्रसार, वायरस का फैलावसॉफ़्टवेयर की चोरीदोषपूर्ण सॉफ़्टवेयर भेजकर कम्प्यूटर को ख़राब करना, किसी अन्य कम्प्यूटर नेटवर्क पर हमलापोर्नोग्राफी को बढ़ावा आदि शामिल रहता है. साइबर अपराध के तमाम सारे प्रकार में आजकल एक और प्रकार ने समाज के बीच फैलना शुरू कर दिया है, इसे साइबर अपराध की भाषा में डिजिटल अरेस्ट कहा जाता है.  

 

संभव है कि इस शब्दावली से आम आदमी परिचित न हो मगर इसके द्वारा जिस तरह का कृत्य किया जा रहा है उससे संभवतः प्रत्येक व्यक्ति का किसी न किसी रूप में सामना अवश्य ही हुआ होगा. न सही आप, आपके मित्र, रिश्तेदार, सहयोगी अथवा आसपास वाले किसी भी व्यक्ति के द्वारा ऐसा अवश्य ही सुनने में आया होगा कि उसको फोन के माध्यम से किसी के गिरफ्तार किये जाने की, उसके किसी पार्सल के गलत होने की, उसके बैंकिंग सम्बन्धी किसी समस्या के उत्पन्न होने की जानकारी दी गई होगी. इस तरह के अपराध में फोन के द्वारा बताया जाता है कि आपका बेटा, बेटी अथवा कोई अन्य रिश्तेदार पुलिस की, सीबीआई की अथवा नारकोटिक्स की हिरासत में है. उसके किसी अवैध गतिविधि में लिप्त पाए जाने की, ड्रग्स अथवा किसी अन्य नशे वाले पदार्थ के साथ पकडे जाने की खबर दूसरी तरफ से दी जाती है. इस तरह के फोन के अलावा अक्सर ऐसा फोन भी आता है जिसमें व्यक्ति के नाम से किसी पार्सल के आने की जानकारी देते हुए बताया जाता है कि उस पार्सल में आपत्तिजनक सामग्री आई हुई है अथवा विदेश से कोई अवैध सामान आया है. ऐसे फोन आने की स्थिति में दूसरी तरफ से बोलने वाला व्यक्ति खुद को पुलिस अथवा किसी प्रशासनिक विभाग का अधिकारी बताता है.

 

आजकल इस तरह के फोन कॉल आना साइबर अपराध में आम बात हो गई है. साइबर अपराध के क्षेत्र में सक्रिय अपराधियों ने इस नए तरीके की ठगी को, अपराध को बहुत बुरी तरह से फैलाया हुआ है. ऐसे मामलों में अपराधियों द्वारा तकनीक का सहारा लेते हुए पुलिस का, सीबीआई का अथवा किसी अन्य प्रशासनिक विभाग का फर्जी वीडियो बनाकर वीडियो कॉल के द्वारा इस तरह से प्रदर्शन किया जाता है मानो फोन सत्य है और किसी आधिकारिक व्यक्ति के द्वारा किया जा रहा है. ऐसे अपराधी सामान्यजन की मानसिकता को भली-भांति जानते-समझते हैं. कोई भी जनसामान्य ऐसे किसी फोन पर तत्काल घबरा जाता है जिसमें उसके किसी नजदीकी के गिरफ्तार होने की सूचना दी जाये. कानूनी पचड़े में पड़ने से घबराने वाला सामान्य व्यक्ति ऐसी किसी भी बात से बहुत दूर रहता है जो उसे किसी अवैध कृत्य में संलिप्त कर दे. इस कारण ऐसे फोन आते ही सामान्य व्यक्ति तत्काल खुद को इस परेशानी से मुक्त करवाने का मार्ग खोजने लगता है. यह मार्ग फोन करने वाला अपराधी ही उसे बताता भी है. ऐसे में फर्जी फोन अथवा वीडियो कॉल के द्वारा सामान्य व्यक्ति अपराधियों के चंगुल में फंसकर ठगी का शिकार हो जाता है. अपने नजदीकी को हिरासत से मुक्त करवाने के लिए अथवा अपने आपको किसी अवैध पार्सल का मालिक साबित न होने देने के लिए वह अपराधियों के बताये तरीके से उनको धनराशि उपलब्ध करवा देता है. 

 

आजकल इस तरह के बढ़ते अपराधों के बाद शासन, प्रशासन ने सक्रियता बढ़ाई और गृह मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले इंडियन साइबर क्राइम कोआर्डिनेशन सेंटर ने धोखाधड़ी से जुडी एक हजार से ज्यादा आईडी को ब्लॉक किया है. यहाँ शासन, प्रशासन के साथ-साथ व्यक्ति को खुद को भी सतर्क रहने की आवश्यकता है. ऐसे किसी भी फोन अथवा वीडियो कॉल आने पर खुद को संयमित रखते हुए सबसे पहले वह इत्मिनान करे कि क्या वाकई उसका कोई नजदीकी रिश्तेदार अथवा परिचित ऐसा कर सकता है जिससे वह हिरासत में आये? इसके साथ-साथ व्यक्ति यह भी ध्यान में रखे कि आजकल इस तरह के कृत्य साइबर अपराधियों द्वारा किये जा रहे हैं. ऐसे में वह तत्काल राष्ट्रीय साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत कर दे अथवा अपने नजदीकी साइबर सेल में जाकर पुलिस को, प्रशासन को इस तरह के फोन आने की जानकारी दे. डिजिटल अरेस्ट से जुड़े मामलों की अधिकता को देखते हुए प्रशासन द्वारा 1930 पर कॉल करके भी जानकारी देने की सुविधा सामान्य नागरिकों को उपलब्ध करवाई जा रही है.

 

शासन, प्रशासन के साथ-साथ हम सबको भी सतर्क रहने की आवश्यकता है. अपनी जानकारियों को, अपने व्यक्तिगत विवरणों को इंटरनेट पर, सोशल मीडिया पर शेयर करने से बचना चाहिए. जहाँ तक संभव हो अपने परिवार की जानकारियाँ भी इंटरनेट पर शेयर करने से बचना चाहिए. छोटे कदम उठाकर बड़ी परेशानी से बचा जा सकता है. 






 

03 अक्टूबर 2023

साइबर अपराध की खामोश दस्तक

वर्तमान में कम्प्यूटर और इंटरनेट के माध्यम से काम बहुत आसान हुआ है. सूचना प्रौद्योगिकी के विकास के साथ-साथ साइबर अपराधों में वृद्धि से इनकार नहीं किया जा सकता है. सामान्य भाषा में इंटरनेट के ज़रिए किए जाने वाले अपराधों को साइबर अपराध अथवा साइबर क्राइम कहते हैं. कोई भी ऐसा आपराधिक, अवैध, अवांछनीय कार्य जो कम्प्यूटर, इंटरनेट अथवा संचार माध्यम से सम्बद्ध है, वह साइबर अपराध है. उदाहरणार्थ यदि कम्प्यूटर, इंटरनेट के माध्यम से वित्तीय धोखाधड़ी, बैंक खाते से धन चुराना, हैकिंग, अश्लीलता का प्रसार, वायरस का फैलाव, सॉफ़्टवेयर की चोरी, दोषपूर्ण सॉफ़्टवेयर भेजकर कम्प्यूटर को ख़राब करना, किसी अन्य कम्प्यूटर नेटवर्क पर हमला, पोर्नोग्राफी को बढ़ावा, आंतरिक सूचनाओं और बौद्धिक संपदा की चोरी आदि को साइबर अपराध कहा जाता है. 


इनके अलावा कुछ साइबर अपराध ऐसे हैं जिनका प्रभाव सरकारों पर, राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पड़ता है. इनमें साइबर जासूसी, साइबर युद्ध, साइबर आतंकवाद आदि आते हैं. साइबर युद्ध अथवा साइबर वारफेयर अन्य देशों के खिलाफ युद्ध के कार्यों को संचालित करने के लिए साइबरस्पेस का उपयोग है. भूमि, महासागर, वायु और अंतरिक्ष के बाद साइबरस्पेस को युद्ध का पाँचवाँ आयाम माना जाता है. आजकल साइबर आतंकवाद को राजनीतिक उद्देश्यों के लिए उपयोग में लाया जाता है. इसके द्वारा आतंकवादी कंप्यूटर नेटवर्क पर हमला कर जनता के बीच बड़े पैमाने पर विनाश या भय को पैदा करके सरकार को निशाना बनाते हैं. इसका उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा पर आक्रमण करना और रणनीतिक महत्व की जानकारी को नष्ट करना है. यह किसी भी देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक है. 




राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2021 में भारत में साइबर अपराध के 52,974 मामले दर्ज किये गए जो वर्ष 2020 (50,035 मामले) की तुलना में 5 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्शाते हैं. सीईआरटीइन (इंडियन कम्प्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम) के आँकड़ों के अनुसार 2022 में भारत में सबसे अधिक साइबर क्राइम के मामले दर्ज किए गए हैं. सीईआरटी साइबर सुरक्षा हमलों से निपटने के लिए केन्द्र सरकार की एक नोडल एजेंसी है जो सूचना प्रौद्यौगिकी मंत्रालय के तहत काम करती है. आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 में ऑनलाइन बैंकिंग धोखाधड़ी के 4047 मामले, ओटीपी जालसाजी के 1093 केस, डेबिट क्रेडिट कार्ड से ठगी की 1194 घटनाएँ और एटीएम से सम्बन्धित 2160 मामले दर्ज किए गए. रिपोर्ट में बताया गया कि सोशल मीड़िया पर फर्जी सूचना के 578 केस, ऑनलाइन परेशान करने या महिलाओं और बच्चों को साइबर धमकी से जुड़े 972 मामले, फर्जी प्रोफाइल के 149 और आँकड़ों की चोरी के 98 मामले जारी किए गए हैं.


भारत सरकार ने साइबर अपराधों से निपटने के लिए सूचना प्रौद्यौगिकी अधिनियम 2000 पारित किया था, साथ ही आईपीसी की धाराओं में भी कुछ प्रावधान किए गए हैं. सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 की कुछ धाराओं में संशोधन भी किया गया है ताकि अपराधियों के विरुद्ध और सहजतापूर्वक कार्यवाही की जा सके. धारा 69ए के तहत पुलिस को अधिकार है कि किसी भी वेबसाइट को ब्लॉक कर सकती है. वर्तमान दौर में प्रत्येक हाथ में मोबाइल है, इंटरनेट है और उसका उपयोग भी बहुत तेजी से हो रहा है, ऐसे में आम जनसामान्य को बहुत अधिक सतर्क, समझदार होने की आवश्यकता है. सामान्य व्यक्ति की एक लापरवाही, एक गलती से साइबर अपराधी को अवसर मिल जाता है और वह किसी भी स्तर का संकट पैदा कर देता है, किसी भी तरह का नुकसान कर देता है. 


व्यक्तियों को अपने सिस्टम को लगातार अपडेट करते रहने की आवश्यकता है. इसके लिए अपने सॉफ्टवेयर और ऑपरेटिंग सिस्टम को नवीनतम स्थिति में बनाये रखा जाना चाहिए. इसके साथ-साथ कंप्यूटर अथवा मोबाइल में एंटी-वायरस का भी उपयोग करना चाहिए. इसके द्वारा अवांछित रूप से वायरस के हमले को रोका जा सकता है. व्यक्ति की जिम्मेवारी बनती है कि वह अपने खातों, सेवाओं से सम्बंधित पासवर्ड मजबूत बनायें. इसके अलावा अपने पासवर्ड को समय-समय पर बदलते भी रहना चाहिए. किसी अनजान ई-मेल को, स्पैम ई-मेल को खोलने से बचना चाहिए. 


नागरिकों के साथ-साथ प्रशासन को भी आवश्यक कदम उठाये जाने चाहिए, जिससे कि नागरिकों के हितों की सुरक्षा हो सके और साइबर अपराधियों के हौसले पस्त हों. इसके लिए ई-वाणिज्य और ई-प्रशासन को बढ़ाने देने के लिए पुलिस एवं उपकरणों को प्रशिक्षित करके इस योग्य बनाया जाये कि वे साइबर अपराध की जाँच कर सकें. पुलिस में कम्प्यूटर के क्षेत्र अधिकारियों एवं कर्मचारियों को प्रशिक्षित करके इस अपराध से निपटने के योग्य बनाना चाहिए. उनको शोषित व्यक्ति के प्रति सहानुभूति दर्शाते हुए दोस्ताना एवं मधुर वार्तालाप बनाये जाने को भी प्रेरित किया जाना चाहिए.


इंटरनेट हमारे दैनिक जीवन का एक अभिन्न अंग बन गया है. यह भी एक तरह का समाज बन गया है जहाँ प्रत्येक मानसिकता के लोग रह रहे हैं. यहाँ भले लोग भी हैं तो आपराधिक प्रवृत्ति के लोग भी हैं. ऐसे में साइबर अपराधियों से बचने के हम सबको ही सतर्क रहने की आवश्यकता है. लापरवाही से बचने की जरूरत है. कुछ सुरक्षात्मक उपायों को अपनाये जाने की आवश्यकता है. यदि प्रशासन एवं आम जनता इस सन्दर्भ में दिए जाते सुझावों पर अमल करती है तो निश्चित ही इन अपराधों और समस्याओं से बचा जा सकेगा.


19 मार्च 2023

राजनीति में दागियों को नकारिये

राजनीति गन्दी हैसंसद डाकुओं, लुटेरों से भर गई हैसंविधान में हमारा विश्वास नहीं जैसे जुमले आये दिन सुनने को मिल जाते हैं. कविता का मंच हो, साहित्य-विमर्श हो या धारावाहिक-फ़िल्मी कार्यक्रम हो सभी में राजनीति को बेकार बताया जाता है. आज राजनीति को गाली देना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता माना जाता हैखुद को जागरूक बुद्धिजीवी समझना होता है. सांसदों, मंत्रियों, विधायकों सहित तमाम राजनैतिक व्यवस्था पर सवालिया निशान लगा देना कहीं न कहीं भविष्य के लिए संकटसूचक है. राजनीति के प्रति इस तरह की बनती अवधारणा नई पीढ़ी के मन-मष्तिष्क को नकारात्मक रूप में प्रभावित कर रही है. उनको लगने लगा है कि देश की वर्तमान दशा की जिम्मेवार एकमात्र रूप से राजनीति है. आने वाली पीढ़ी, जिसके कन्धों पर देश का राजनैतिक अस्तित्व टिका हुआ है, उसको ये समझाया ही नहीं जा रहा है कि कोई भी लोकतान्त्रिक प्रणाली बिना राजनीति के आगे नहीं बढ़ सकती है.

 

एक पल को इस बात पर विचार किया जाये कि यदि एक नियत समय बाद निर्वाचन प्रणाली द्वारा निर्वाचित करने का अधिकार जनता से छीन लिया जाये तो क्या स्थिति बनेगी? सोचकर ही एक तरह का भय पूरे शरीर में तैर जाता है. ये तो भला हो निर्वाचन प्रणाली का कि जिसके माध्यम से एक निश्चित समयावधि पश्चात् जनता अपने प्रतिनिधि का निर्वाचन करके भ्रष्ट प्रतिनिधि को हटा सकती है, उसके स्थान पर किसी दूसरे प्रतिनिधि को निर्वाचित कर सकती है. इसी के साथ इस बात पर भी विचार किया जाये कि वर्तमान में आम जनमानस में जिस तरह से राजनीति के प्रति नफरत का, नकारात्मकता का भाव पैदा किया जा रहा है; देश की किसी भी समस्या के लिए सिर्फ और सिर्फ राजनीति को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है, उससे विधायिका को कमजोर किया जा रहा है या सशक्त बनाया जा रहा है?

 



इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि वर्तमान में जनप्रतिनिधि अपने दायित्वों से मुकरते जा रहे हैं. राजनीति में पदार्पण करने वाला अत्यंत अल्प समय में ही बलशाली होकर सामने आ जाता है. कई-कई अपराधों में लिप्त लोग भी माननीय की श्रेणी में शामिल होकर जनता के समक्ष रोब झाड़ते दिखाई देते हैं. इसके बाद भी सुखद पहलू ये है कि इन लोगों को नकारने का एक अधिकार अभी भी जनता के पास है. यहाँ समझना होगा कि निर्वाचन एक नियत समय पर होना ही है. ऐसे में स्पष्ट है कि जो भी निर्वाचन के लिए सामने आएगा, उसमें से ही किसी एक को निर्वाचित किया जायेगा. आने वाली पीढ़ी के सामने राजनीति के सकारात्मक पक्षों को रखते हुए बताना होगा कि ख़राब राजनीति नहीं है बल्कि अच्छे लोगों के राजनीति से दूर होने के कारण उसमें कतिपय बुरे लोग शामिल हो गए हैं.

 

राजनीति की वर्तमान व्यवस्था को दोष देने के पूर्व यदि हम अपने क्रियाकलापोंअपनी जागरूकता पर निगाह डालें तो हम ही स्वयं में सबसे बड़े दोषी नजर आयेंगे. हमारे देश की संसद और तमाम विधानसभाओं में एक निश्चित समयान्तराल के बाद चुनाव होता है. चुनाव का निर्धारित समय किसी लिहाज से टाला नहीं जा सकता है और सदन की निर्धारित सीटों को अपने निश्चित समय पर भरा ही जाना है. ऐसे में यदि अच्छे लोग उन्हें भरने को आगे नहीं आयेंगे तो जो भी सामने आयेगा वही आने वाले निर्धारित समय के लिए सदन का निर्वाचित सदस्य होगा. ऐसी स्थिति में दोष हमारा ही है कि हमने स्वयं अपने को अच्छा माना भी है और राजनीति से पीछे खींचा भी है. 

 

इसके साथ ही हम सब अपने पारिवारिक क्रियाकलापों पर विचार करें और बतायें कि जिनका सीधे तौर पर राजनीतिक क्षेत्र से सम्बन्ध नहीं है क्या उन्होंने अपने बेटे-बेटी को राजनीति में कैरियर बनाने को प्रोत्साहित किया? अपने बच्चों को राजनीति के क्षेत्र में कभी आदर्श रहे लोगों के बारे में जानकारी दी? क्या कभी अपने बच्चों के मन में राजनीति के अच्छे लोगों के प्रति सकारात्मक बीज बोने का काम किया? नहीं न, असल में हमारे देश की बिडम्बना है कि एक क्लर्कएक चपरासीएक मजदूर अपनी संतान को आईएएस बनाने के सपने देखता है जबकि उसका दूर-दूर तक आईएएस से कोई सम्बन्ध नहीं होता है किन्तु अच्छे-अच्छे बुद्धिजीवियों कोजिनका देश के विकास के प्रति कोई दायित्व हैउन्हें भी अपने बच्चों को राजनीति से दूर करते हुए देखा है. ऐसे में हम गाली किसे और क्यों दे रहे हैं?

 

हमारा प्रयास हो कि हम अपने बच्चों में राजनीति के प्रति जागरूकता पैदा करें. उन्हें समझायें कि इस क्षेत्र को भी कैरियर के रूप में अपनाया जा सकता है. आज की पीढ़ी को समझाने की आवश्यकता है कि सिर्फ मल्टीनेशनल कम्पनियों के लुभावने पैकेज को प्राप्त कर लेना ही शिक्षा का उद्देश्य नहीं होना चाहिएराजनैतिक क्षेत्र में भी शिक्षा का लाभ लिया जा सकता है. यदि हम आने वाले समय में देशहित को ध्यान में रखकर युवाओं को सक्रिय राजनीति में उतार सके तो यकीन मानिये कि आपराधिक तत्वों को जेलों में जगह मिलेगी और देश के समस्त सदन सकारात्मकसक्रियतापूर्णउत्साहीजागरूककर्मठचिन्तशील राजनेताओं से सुशोभित दिखेंगे.

 

इन बिन्दुओं के आलोक में न केवल जनता को बल्कि समस्त राजनैतिक दलों को एकजुट होने की आवश्यकता है. देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था कि और मजबूत करने के लिए आवश्यक है कि सभी अंग समवेत रूप में कार्य करें. राजनीति की गंदगी को दूर करने का प्रयत्न करें न कि भावी पीढ़ी के मन में राजनीति के प्रति नकारात्मक भाव उत्पन्न करें. हम सभी को इस बात को बहुत भली-भांति गाँठ बांधनी होगी कि यदि आज हम खुले मंच से, सार्वजनिक रूप से मंत्रियों, सांसदों, विधायकों आदि को, राजनीति को गरियाने का काम कर लेते हैं तो इसके पीछे हमारी लोकतान्त्रिक शक्ति ही है. राजनीतिज्ञों के भीतर निश्चित समयावधि के बाद जनता के मध्य जाने का डर होता है. सोच कर देखिये कि जिस तरह से हम सब राजनीति को, राजनीतिज्ञों को गरियाने का काम करते हैं यदि कल को जिम्मेवार युवा पीढ़ी इस दिशा में आगे न बढ़ी, देश की राजनीति को संभालने के लिए आगे न आई तो हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहाँ होगी? हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था कहाँ होगी? राजनीति को नहीं उसमें चले आये दागी लोगों को गरियाने का, उनको बाहर निकालने का काम किया जाये.

 

 





 

20 अगस्त 2022

राजनैतिक लाभ के लिए अपराधियों का महिमामंडन

गोधरा काण्ड और उसकी प्रतिक्रिया में उपजे गुजरात दंगे अपने होने के बाद से आज तक लगातार देश में हलचल बनाये हुए हैं. कभी किसी कार्यक्रम के द्वारा, कभी किसी आयोजन के द्वारा, कभी किसी मीडिया सन्दर्भ द्वारा, कभी किसी राजनैतिक दल के द्वारा, कभी किसी व्यक्ति के द्वारा किसी न किसी रूप में इनसे सम्बंधित खबरें समाज में चलती ही रहती हैं. कुछ दिनों से इस विषय पर ख़ामोशी बनी हुई थी, उसी ख़ामोशी में बिलकिस बानो केस के आरोपियों का जेल से रिहा कर दिया जाना एक शोर बनकर उभरा. सन 2002 के गुजरात दंगों के दौरान बिलकिस बानो के साथ हुई वीभत्स घटना के आरोपियों को लंबी कानूनी लड़ाई के बाद सजा हुई थी. अदालत ने सन 2008 में बिलकिस बानो के गुनाहगारों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. सजा सुनाए जाने के 14 साल बाद बिलकिस बानो केस के आरोपी अब खुली हवा में साँस लेने के लिए छोड़ दिए गए हैं. आरोपियों की रिहाई पर दोनों पक्ष अपनी-अपनी दलीलें दे रहे हैं. इस मुद्दे पर कि बिलकिस बानो के आरोपियों का जेल से रिहा किया जाना सही है या गलत ये निर्धारित हो पाता, उससे पहले आरोपियों के स्वागत की खबरें सामने आने लगीं.


यह स्थिति निश्चित ही अस्वीकार्य होनी चाहिए. न्यायालय से घोषित सजायाफ्ता आरोपियों का रिहा होना भले ही एकबारगी नियमों-कानूनों के अंतर्गत आता हो मगर दोषियों का इस तरह से महिमामंडित किया जाना किसी भी रूप में उचित कदम नहीं है. इस घटना को उन आरोपियों के परिजनों के सन्दर्भ में देखते हुए भले ही प्रथम दृष्टया स्वीकार कर लिया जाये मगर जिस तरह से रिहा आरोपियों के स्वागत में कुछ संगठनों का, गैर-परिजनों का, राजनैतिक लोगों का शामिल होना सामने आया है, वह कदापि स्वीकार्य नहीं. देखा जाये तो यह स्थिति किसी एक बिलकिस बानो के आरोपियों के सन्दर्भ में ही सामने नहीं आई है. ऐसी स्थितियाँ आये दिन किसी न किसी रूप में हम सबको देखने को मिलती हैं.




वर्तमान में राजनैतिक क्षेत्र में इस तरह लोगों का आना बहुत तेजी से हो रहा है जो अनेक अपराधों में लिप्त हैं, अनेक गैर-कानूनी कारनामों में सजायाफ्ता हैं. राजनीति में, समाज में ऐसे लोगों को भी खूब आदर दिया जा रहा है जो बड़ी-बड़ी, मँहगी कारों के मालिक हैं; जो कई-कई बन्दूकधारी लोगों के साए में घूमते दिखाई पड़ते हैं. समाज के आम-नागरिक भी ऐसे लोगों के बाहुबल के प्रति सहज भाव से आकर्षित होने लगते हैं. यही आकर्षण उनको राजनीति में जनप्रतिनिधि के रूप में प्रतिष्ठित करवाने लगता है. देखने में भी आता है कि ऐसे बाहुबली लोग समारोहों में, सार्वजनिक आयोजनों में बाकायदा न केवल प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं बल्कि जबरदस्त तरीके से महिमामंडित भी किये जाते हैं. इनके कार्यों का, अपराधों का बखान भी ऐसे किया जाता है, जैसे बहुत बड़े सामाजिक कार्य इनके द्वारा सम्पादित किये गए हों.


इधर देखने में आ रहा है कि जैसे-जैसे समाज विकास के रास्ते तय कर रहा है, वैसे-वैसे राजनीति में नकारात्मकता बढती जा रही है. ऐसा राजनीतिज्ञों के बयानों के, राजनैतिक दलों के कारनामों से, समर्थकों की हरकतों से स्पष्ट दिखता है. शुचिता की बात करने वाले नैतिक रूप से कमजोर दिखाई देते हैं, विकास की चर्चा करने वाले विनाश के कारनामे रचते आ रहे हैं. ऐसा किसी एक पार्टी, किसी एक व्यक्ति का हाल नहीं कमोबेश पूरा राजनैतिक परिदृश्य इसी तरह का बना दिख रहा है. इस समूचे परिदृश्य में राजनैतिक दलों को स्वार्थ दिखाई देता है, अपनी सीट दिखाई देती है, सत्ता दिखाई देती है और यही कारण है कि हर उस व्यक्ति को, संगठन को वरीयता दी जाने लगती है, जिससे इनका स्वार्थ सिद्ध होता नजर आता है, भले ही वे लोग अपराधी ही क्यों न हों. ये स्थितियाँ न केवल विचारधाराओं के मर जाने का द्योतक हैं बल्कि राष्ट्रहित, जनहित के प्रति भी संज्ञाशून्य होने की परिचायक हैं. चंद वोटों की खातिर, सता के लालच में इस तरह के कदम किसी भी रूप में उचित नहीं कहे जा सकते हैं. इस तरह की राजनीति नकारात्मकता को जन्म दे रही है. इस तरह की राजनीति से सत्ता तो हासिल की जा सकती है किन्तु राजनैतिक शुचिता नहीं लाई जा सकती है. इस तरह की राजनीति से दल विशेष के प्रतिनिधियों की संख्या बढ़ाई जा सकती है किन्तु देशहित को नहीं बढ़ाया जा सकता है. काश! हमारे राजनैतिक दल, हमारे राजनेता तथा इन सभी के समर्थक इस सत्य को समझ पाते.


राजनीति में निरन्तर आ रही गिरावट का कारण राजनीति नहीं वरन उसमें शामिल होने वाले लोग हैं. इनके कुकृत्य ही राजनीति को कलंकित कर रहे हैं. राजनीति के बढ़ते अपराधीकरण ने, राजनीति के प्रति होते नकारात्मक प्रचार ने, राजनीति के प्रति अपनी भावी पीढ़ी को प्रेरित न कर पाने ने राजनीति को दो कौड़ी का बना दिया है. उसके द्वारा राजनीति में आती गिरावट पर चिंता व्यक्त की जाती है मगर उसके उसमें सुधार के लिए भावी पीढ़ी को आगे नहीं किया जाता. आज बहुतायत में हालत ये है कि अच्छे लोग राजनीति से, चुनावी मैदान से बाहर हैं और अपराधी किस्म के लोग राजनीति में प्रवेश करते जा रहे हैं. राजनीति में आती जा रही गंदगी सिर्फ बातें करने से, अनावश्यक बहस करने से दूर नहीं होने वाली. यदि इसे साफ़ करना है, राजनीतिक गंदगी को मिटाना है तो राजनीति की बातें नहीं वरन राजनीति करनी होगी. आज के लिए न सहीकल के लिए सही, अपने लिए न सहीअपनी भावी पीढ़ी के लिए लोगों को जागना होगा. अपराधियों के महिमामंडन से बचना होगा. उनके कुकृत्यों के प्रचार-प्रसार से दूर रहना होगा. उनके प्रभाव में आने से बचना होगा. 





 

27 अक्टूबर 2020

वोट बनने की जगह अब नागरिक बनना होगा

समाज में एक नागरिक के रूप में यहाँ के मंत्री भी रहते हैं और एक साधारण सा काम करने वाला भी. इसी नागरिक के रूप में एक प्रशासनिक अधिकारी की पहचान होती है तो एक सामान्य से क्लर्क की. इसी में बहुत बड़ा व्यापारी भी शामिल होता है और इसी में एक अत्यंत गरीब व्यक्ति भी. पद, प्रतिष्ठा, धर्म, जाति के आधार पर किसी की नागरिकता का निर्धारण नहीं होता बल्कि सभी इसी समाज के नागरिक कहे जाते हैं. ये और बात है कि पद, प्रस्थिति, प्रतिष्ठा, धन आदि के द्वारा उसको अलग स्थान दिया जाने लगता है. इसी अलग स्थान दिए जाने की मानसिकता के कारण देश के सभी राजनैतिक दलों ने नागरिकों को अपने हाथों का खिलौना बना दिया है. ये नागरिक अब महज नागरिक न होकर जाति, धर्म, क्षेत्र, राजनैतिक विचारधारा के लोग बना दिए गए हैं.


समाज में किसी भी घटना के बाद हम सभी उसके पहले हुई घटना के सापेक्ष राजनैतिक दलों की प्रतिक्रिया की तुलना करने लगते हैं. एक पल रुक कर सोचिए कि क्या राजनैतिक दलों ने वाकई किसी भी घटना पर प्रभावित पक्ष के लिए संवेदनात्मक रूप से कार्य किया है? इसमें किसी एक दल को दोषी नहीं ठहराया जा रहा है बल्कि सभी दल एकसमान रूप से दोषी हैं. उनके लिए कोई भी घटना महज एक घटना ही नहीं होती वरन एक तरह का मंच होती है, जिसके माध्यम से वे अपने दल के लिए अधिक से अधिक सहानुभूति, अधिक से अधिक मतदाता, अधिक से अधिक वोट का जुगाड़ करने की कोशिश करते हैं. उनके किसी भी घटना के सन्दर्भ में उठने वाले कदमों की हम आलोचना करते हैं और उसी कदम की किसी अन्य घटना के सापेक्ष समर्थन भी करने लगते हैं. असल में एक नागरिक के रूप में हम सभी लोग ही स्थिर नहीं हैं. हमें किसी भी घटना के सापेक्ष खुद भी ज्ञात नहीं होता है कि हम चाहते क्या है? हम चाह क्या रहे हैं?




किसी भी घटना के हो जाने पर एक नागरिक के रूप में हमारी प्रतिक्रिया होने से पहले ही हम सभी खुद को धर्म, जाति, क्षेत्र, राजनैतिक विचारधारा के खाँचे में फिट कर लेते हैं. अब खाँचे में फिट हो जाने के बाद हम सभी की दृष्टि, सोच का दायरा सीमित हो जाता है. इसी सीमित दृष्टि के कारण हम उस घटना के सन्दर्भ में राजनैतिक दलों से किसी तरह की प्रतिक्रिया की अपेक्षा करने लगते हैं. समाज के नागरिक बनने के बजाय आलोचक बनके राजनैतिक दलों की पिछली किसी भी घटना पर उपजी प्रतिक्रिया की तुलना में लग जाते हैं. यही वह बिंदु होता है जहाँ कोई भी अपराधी अपने आपको मजबूत स्थिति में पाता है. वह समझ लेता है कि उसके अपराध का विरोध, उसके कृत्य का विरोध हम एक नागरिक के रूप में कभी करने की स्थिति में नहीं हैं. हम किसी भी अपराधी के कृत्यों के विरोध के लिए भी राजनैतिक दलों का मुँह ताकने लगते हैं.


इसी तरह की मानसिकता ने समाज में नागरिकों को कमजोर किया है और अपराधियों को बढ़ावा दिया है. हम सभी को एक नागरिक के रूप में स्वयं में सक्षम होना चाहिए. समाज में होने वाली किसी भी घटना के सन्दर्भ में हम सभी को एकजुट होकर अपराधियों का विरोध करना चाहिए. यदि समाज के सभी नागरिक एकसमान रूप से एकजुट होकर किसी भी अपराधी के कृत्य का विरोध करने उतर पड़ेंगे तो किसी भी बड़े से बड़े अपराधी की हिम्मत नहीं कि वह अगली बार किसी तरह का अपराध करे. घटना किसी भी प्रदेश में हो, किसी भी व्यक्ति के साथ हो, अपराधी का निशाना बेटी है या बेटा, युवा है या वृद्ध, गरीब है या अमीर इन सबका आकलन करने के बजाय अपराधी का विरोध होना चाहिए. यदि हम सभी एक नागरिक के रूप में एकजुट होकर ऐसा नहीं कर पाते हैं तो अपराधी खुलेआम सड़क पर अपराध करते रहेंगे, राजनैतिक दल हम नागरिकों को अपने वोट में बदलते रहेंगे.


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08 अक्टूबर 2020

साइबर अपराधियों से सतर्क रहने की आवश्यकता

वर्तमान में समाज के लगभग सभी कार्य इंटरनेट के माध्यम से होने लगे हैं. सरकार हो या आम आदमी, सरकारी संगठन हों या फिर निजी संस्थान, व्यापार हो या फिर नौकरी, शिक्षा हो या समाजसेवा सभी क्षेत्र आज इंटरनेट का लाभ उठा रहे हैं. इस लाभ के साथ अनचाहे ही बहुत से नुकसान भी समाज में दिखाई देने लगे हैं. इंटरनेट जहाँ एक तरफ लोगों को लाभान्वित कर रहा है वहीं दूसरी तरफ वह नुकसान भी पहुँचा रहा है. इस तरह के तमाम सारे नुकसान को साइबर क्राइम या फिर साइबर अपराध के नाम से जाना जाता है. सामान्य रूप में इंटरनेट पर किया जाने वाला कोई भी अपराधिक कार्य साइबर अपराध के अंतर्गत आता है. इस तरह के अपराध में हैकिंग तो शामिल है ही साथ ही बैंकिंग धोखाधड़ी, किसी का डाटा, जानकारी का चुराया जाना, किसी तरह की धोखाधड़ी करके किसी दूसरे के एकाउंट, ईमेल आदि को हैक कर लेना भी साइबर अपराध की श्रेणी में शामिल किया गया है.


साइबर अपराध में जिस तरह के कार्यों को मुख्य रूप से शामिल किया गया है, उनमें वित्तीय अपराध, अवैध सामग्रियों को बेचना, अश्लील सामग्री का प्रसार-प्रचार, बौद्धिक संपत्ति की चोरी, जालसाजी, आदि हैं. साइबर अपराध की श्रेणी में मुख्य रूप से हैकिंग को शामिल किया गया है. इसमें कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के जानकार व्यक्ति द्वारा किसी कंप्यूटर को लक्ष्य करके उसके लिए सम्बंधित प्रोगाम का निर्माण किया जाता है. इसके बाद वे उस लक्ष्य कंप्यूटर में अपने प्रोग्राम के द्वारा एंट्री करके उस सम्बंधित कंप्यूटर से डाटा चोरी करते हैं. ऐसे हैकर्स का मुख्य लक्ष्य आर्थिक लाभ उठाना होता है. वे इसके लिए किसी अन्य व्यक्ति के कंप्यूटर में अवैध प्रवेश करके उसके कंप्यूटर से बैंक, क्रेडिट कार्ड, एटीएम आदि की सूचनाएँ हासिल कर लेते हैं. किसी व्यक्ति की आर्थिक सूचनाओं को चोरी करने के साथ-साथ ऐसे लोग बड़े-बड़े संस्थानों में भी सेंध लगाते हैं.




आर्थिक चोरी के साथ-साथ वर्तमान में इंटरनेट पर बहुत बड़ा बाजार पोर्नोग्राफी का है. बहुत सी वेबसाइट इसके लिए वयस्कों से सम्बंधित बने नियम-कानूनों का इस्तेमाल करके अपना कारोबार करती हैं मगर बहुत सी वेबसाइट ऐसी हैं जो बाल यौन सम्बन्धी सामग्री का प्रसार करती हैं. देखा जाये तो वैश्विक स्तर पर बाल यौन सामग्री का सर्वाधिक प्रसार इंटरनेट के माध्यम से हो रहा है.


इंटरनेट पर अश्लील सामग्री अत्यंत सुलभ है. आजकल हर हाथ में मोबाइल होने से औ हर हाथ में इंटरनेट होने से इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री को किसी तक पहुँच बनाना कठिन काम नहीं रह गया है. बच्चे भी अब इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री से दूर नहीं रह पाते हैं. यौन अपराध में लिप्त लोग इसी कारण से यौन अपराध के लिए बच्चों को लक्ष्य करते हैं. इसके लिए वे बच्चों में अश्लील सामग्री, वीडियो, फोटो आदि प्रसारित कर उन्हें बहकाते हैं. ऐसी सामग्री को देखने के बाद बहुत से बच्चे भटक जाते हैं. यही बच्चे इन यौन अपराधियों के द्वारा जबरन यौन अपराध में लिप्त कर दिए जाते हैं.  


इन दो मुख्य अपराधों के अलावा साइबर अपराधी भ्रामक ईमेल भेजने के कार्य करता है, जिससे कि यूजर से निजी सूचना लेकर उसके एकाउंट से चोरी करने का प्रयास किया जाये. ईमेल के द्वारा सम्बंधित यूजर को बताया जाता है वह किसी और वेबसाइट में जाकर अपने बैंक की, अपने आधार कार्ड की, अपने पैन कार्ड की, अपने एटीएम की, अपने अन्य किसी दस्तावेज़ की जानकारी भर कर उसे अपडेट करवा ले. ऐसा करने के पीछे मुख्य उद्देश्य यूजर की समस्त जानकारियों को प्राप्त करना होता है. ऐसा करके साइबर अपराधी सम्बंधित यूजर के साथ धोखाधड़ी कर लेता है. इसके लिए साइबर अपराधी कई बार फोन कॉल करके ओटीपी अथवा अन्य गुप्त कोड को बताने की बात करता है.


अब जबकि इंटरनेट का उपयोग सर्व-सुलभ रूप से किया जाने लगा है और यह उपयोग हमारे दैनिक जीवन की दैनिक क्रियाओं की तरह हो गया है तो हम सबको इसके उपयोग में सावधानी बरतने की भी आवश्यकता है. यहाँ हमें ध्यान रखना होगा कि अपने किसी भी इंटरनेट खाते का पासवर्ड सरल नहीं बनाना चाहिए. हमें अपने खातों का पासवर्ड ऐसा बनाना चाहिए जिसे हैक करना सहज न हो. कभी भी अपने नाम, अपनी जन्मतिथि, अपने मोबाइल नंबर, अपने परिजनों के नाम आदि से सम्बंधित पासवर्ड नहीं बनाना चाहिए. ऐसे पासवर्ड को डिकोड करना आसान होता है.


इसके अलावा किसी को भी फोन पर अपने किसी भी इलेक्ट्रॉनिक कार्ड का ओटीपी, पिन आदि नहीं बताना चाहिए. कई बार साईबर अपराधी स्वयं को सम्बंधित बैंकिंग संस्थान का व्यक्ति बताकर गुप्त कोड की जानकारी कर लेता है. इसके लिए ऐसी किसी भी तरह की कॉल आने पर पुलिस को सूचना दी जानी चाहिए.


इसी तरह से अपने सोशल मीडिया खातों के लिए, अपने बैंक खातों के लिए, अपने व्यापारिक खातों के लिए डबल स्टेप सुरक्षा व्यवस्था को लागू किया जाना चाहिए. इस व्यवस्था में लॉग इन करने पर मोबाइल पर एक गुप्त कोड तत्काल प्राप्त होता है. इस तरह की टू वे वेरिफिकेशन प्रक्रिया अपनाये जाने से भी बहुत हद तक साइबर अपराध को रोका जा सकता है.


इसके अलावा सबसे ऊपर जो बात है, वो ये कि हम सभी को सजग रहने की आवश्यकता है. हम इंटरनेट पर जो भी काम कर रहे हैं, उनसे सम्बंधित सुरक्षा उपायों को, क़दमों को अपनाते हुए ही आगे बढ़ें. किसी भी तरह के इंटरनेट कार्य को करने के पहले यह सुनिश्चित कर लें कि वह सुरक्षित है और साथ ही उस इंटरनेट सम्बन्धी कार्य से हम भी तो अनजाने में कोई साइबर अपराध तो करने नहीं जा रहे. ध्यान रखें कि सावधानी ही बचाव है.


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09 जुलाई 2020

खातिरदारी नहीं सार्वजनिक सजा मिले अपराधियों को

इसे शायद मानवाधिकार का उल्लंघन माना जायेगा मगर हमारा व्यक्तिगत तौर पर मानना है कि दुर्दांत अपराधियों को, आतंकियों को सार्वजनिक रूप से अत्यंत कष्टकारी और दुखद मौत देनी चाहिए. उनको दी जाने वाली सजा इतनी भयावह और दर्दनाक हो कि आने वाले समय में लोग अपराध करने से डरें. फाँसी या फिर आजीवन कारावास किसी भी रूप में कोई सजा नहीं. फाँसी के बाद अपराधी तो सभी तरह के कष्टों से मुक्त हो गया, भुगतता है उसका परिवार. इसी तरह से आजीवन कारावास में अपराधी बड़े ही चैन की नींद लेते हैं. दुर्दांत अपराधियों का और उनके रसूख की जानकारी आज जन-जन को रहती है, ये और बात है कि व्यक्ति अपनी और अपने परिवार की जान की चिंता करते हुए उसे सार्वजनिक रूप से व्यक्त नहीं करता है.



व्यक्तिगत स्तर पर हमारा मानना है कि किसी भी तरह के ऐसे अपराधियों को, जिनका बहुत सारे केस में हाथ है, जिनका आपराधिक इतिहास भी प्रमाण सहित प्रशासन के पास है उनके सम्बन्ध में किसी तरह की रियायत नहीं होनी चाहिए. अपराधियों को जिन्दा बनाये रखना, उनकी खातिरदारी करते रहना किसी भी तरह की अकलमंदी नहीं है. ये कहना कि उनके द्वारा सबूतों को इकठ्ठा कर लिया जायेगा, रसूखदार लोगों पर शिकंजा कस लिया जायेगा, सिर्फ टहलाने की बातें हो सकती हैं. देश में बहुत से अपराधी ऐसे हैं जिनको अभी तक जिन्दा रखा गया है, जिनसे बहुत सारे प्रमाण मिल चुके हैं मगर कोई बताये कि किस रसूखदार के गिरेबान में आज तक पुलिस ने हाथ डाल पाया है? हत्या, अपहरण, बलात्कार सहित ऐसे अनेक मामले हैं जिनमें संरक्षण गृह की बालिकाओं तक के साथ अपराध किया जाता है, किस मामले में आजतक किसी रसूखदार व्यक्ति की गिरफ़्तारी हुई है? किसी एक केस का नाम लेकर बाकी दूसरे केसों को कमजोर बताना यहाँ मकसद नहीं है, यहाँ बस यही बताना है कि सबूतों का इकठ्ठा किया जाना, अपराधियों के बयानों पर रसूखदारों पर शिकंजा कसने की बातें बस जनता को टहलाने के लिए हैं.

एक-दो बार नहीं, अनेक बार ऐसी खबरें सामने आई हैं जबकि रसूखदारों से सम्बन्ध रखने वाले अपराधियों को जेल में वीआईपी सुविधाएँ उपलब्ध करवाई जाती रही हैं. बहुत से अपराधी ऐसे हैं जिनके बारे में साफ़ तौर पर मीडिया में आता रहा है कि वे जेल से भी अपने आपराधिक कृत्यों को सहजता से संचालित करते रहते हैं. आये दिन जेल में मोबाइल का मिलना, अन्य सामानों का मिलना इसी बात की तरफ इशारा करता है. ऐसे में किसी भी दुर्दांत अपराधी को जिन्दा रखते हुए, उसकी खातिरदारी करते हुए किसी न किसी रूप में प्रशासन को ही हतोत्साहित करना है. प्रशासन की अपनी ही जिम्मेवारियाँ कम नहीं हैं, ऐसे में अपराधियों की खातिरदारी करवाने से बचना चाहिए. यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि जिस तरह का तंत्र हमारे समाज में अब स्थापित हो चुका है, वहाँ किसी भी रसूखदार पर हाथ डालना सहज नहीं. ऐसे में अपराधियों से मिलने वाले सबूतों, प्रमाणों का अचार डालने से बेहतर है कि उनको सार्वजनिक रूप से ऐसी सजा दी जाये जिसे देखकर, सुनकर बाकियों के हाथ-पैर काँप जाएँ. न सही पूरी तरह से मगर बहुत हद तक अंकुश लगेगा अपराध पर, ऐसा हमारा व्यक्तिगत रूप से मानना है. हाँ, इसके लिए अपराधियों के मानवाधिकारों की चिंता करना बंद करना होगा.

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01 दिसंबर 2019

मन की, देह की जकड़न तोड़नी होगी


हैदराबाद में चिकित्सक महिला के साथ हुई वीभत्स वारदात के बाद पूरे देश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है. इस बहस के केन्द्र में जहाँ महिलाओं की सुरक्षा है, शासन-प्रशासन की कानून व्यवस्था है वहीं इसके साथ-साथ मजहब विशेष के पुरुषों द्वारा ऐसे जघन्य घटनाक्रम को अंजाम दिए जाने पर भी चर्चाएँ आम हैं. इस्लामिक आतंकवाद की तरह से लव जिहाद समाज में पर्याप्त रूप से चलन में आ चुका है, लगभग उसी तरह से अब देखने में आ रहा है कि सामूहिक बलात्कार और उसके बाद बर्बरता के साथ महिलाओं, बच्चियों की हत्या के पीछे इस्लामिक व्यक्तियों के नाम सामने आ रहे हैं. इसे समझना होगा कि आखिर ये है क्या? क्यों इस तरह की बर्बर घटनाओं के पीछे मजहब विशेष के लोगों के नाम ही दिखाई देते हैं? आतंकवादी घटनाओं के सन्दर्भ में सदैव कहा जाता रहा है कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता है. यह सत्य है कि आतंक का कोई धर्म नहीं होना चाहिए. कुछ लोगों के कारण सम्पूर्ण मजहब को कलंकित नहीं किया जाना चाहिए. इसके बाद भी एक बात सामने निकल कर आती है कि सभी इस्लामिक व्यक्ति आतंकवादी नहीं हैं मगर पकड़े-मारे जाने वाले सभी आतंकी इस्लामिक निकलते हैं. ये क्या है? इसे क्या कहा जाये? कुछ इसी तरह से अब बलात्कार सम्बन्धी मामलों में हो रहा है. इसमें भी बहुतायत में इस्लाम से जुड़े लोग ही अपराधी के रूप में सामने आ रहे हैं. 


बहरहाल, वर्तमान में चर्चा का विषय मजहबी आधार पर ऐसे अपराध को परिभाषित करने से ज्यादा इस पर होना चाहिए कि ऐसे अपराधों को कैसे रोका जाये. जब भी समाज में बलात्कार की चर्चा होती है तो उसके साथ ही महिलाओं के पहनावे की चर्चा की जाने लगती है. उनके समय-असमय बाहर निकलने को लेकर चर्चा की जाने लगती है. उनकी स्वतंत्रता, उनके क्रिया-कलाप पर बहस छिड़ जाती है. ऐसे में चर्चा बलात्कार के कारणों, उसके निवारणों से अलग हट कर पक्ष-विपक्ष में बंट जाती है. एक पक्ष महिलाओं के पहनावे, उसके क्रियाकलापों पर बहस करता है तो दूसरा पक्ष उम्र का सन्दर्भ देते हुए बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाओं को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करने लगता है. यह सही है कि विगत कुछ समय से बलात्कार के, सामूहिक बलात्कार के मामलों में उम्र का सन्दर्भ रह ही नहीं गया है. चंद महीनों की बच्चियाँ भी दुराचार का शिकार हुईं हैं तो वयोवृद्ध महिलायें भी ऐसे व्यक्तियों का शिकार बनी हैं.

यदि समाज वाकई बलात्कार के कारण-निवारण पर चर्चा करने के मूड में हो तो उसे पहनावे, क्रिया-कलाप आदि से बाहर निकल कर उन घटनाओं की तरफ जाना होगा जो किसी भी व्यक्ति के भीतर यौनेच्छा को बढ़ावा देती हैं. क्या कभी इस बात पर गौर किया गया है कि आज किसी उत्पाद की बात हो, किसी गाने की चर्चा हो, किसी म्यूजिक एल्बम का चित्रण हो, किसी कहानी का आना हो, किसी सीरियल का दृश्य हो, किसी फिल्म का सीन हो, कोई विज्ञापन हो सभी में महिलाओं की ऐसी छवि का चित्रण किया जा रहा है जो अश्लील के समकक्ष है. ऐसा महसूस होता है जैसे किसी व्यक्ति के किसी विपरीतलिंगी के साथ यौन सम्बन्ध नहीं हैं तो उसका जीवन अधूरा है. इन दृश्यों को देखकर ऐसा लगता है जैसे जीवन का एकमात्र ध्येय महिला की नग्न देह और उसके साथ यौन खिलवाड़ करना रह गया है. ऐसे में विचार कीजिये कि यौनेच्छा के जागने के बाद उस व्यक्ति का क्या हाल होता होगा जिसके पास अपनी यौनेच्छा को शांत करने का कोई साधन नहीं? क्या कभी इस पर विचार किया गया है कि विगत कुछ समय से सामूहिक बलात्कार के मामले बढ़े हैं, बच्चियों के साथ दुराचार के मामले बढ़े हैं, बलात्कार के बाद हत्या के केस बढ़े हैं. आखिर ऐसा क्यों हुआ? सेक्स सम्बन्धी चित्रण के कारण अपने दिमाग में यौनेच्छा को जन्म देने के बाद व्यक्ति किसी सहज शिकार की तलाश में निकलता है. ऐसे में वे या तो एक समूह के रूप में अपनी वासना को शांत करने का काम करते हैं अथवा वह किसी कमजोर महिला, बच्ची को अपना शिकार बनाता है.

सामान्य रूप से देखने में आता है कि ऐसी किसी भी घटना के बाद उत्तेजना, आक्रोश, गुस्सा अपने चरम पर होता है. सरकार की तरफ से, शासन-प्रशासन की तरफ से अपनी खानापूरी कर ली जाती है और फिर जनाक्रोश शांत हो जाता है. सोशल मीडिया के कारण लोगों को अपनी अभिव्यक्ति का सहज मौका मिल जाता है. बस ऐसे में तमाम सुझाव, तमाम तरीके, तमाम कदम पेश किये जाने लगते हैं. बेटियों को सशक्त बनाये जाने, उनको आत्मरक्षा के गुण सुखाये जाने के, बेटों को संस्कारी बनाये जाने के बड़े-बड़े भाषण दिए जाने लगते हैं. ऐसे विचारों के आने के पीछे सामाजिक ढांचे को एकदम से विस्मृत कर दिया जाता है. जिस समाज में, परिवार में बेटियों को जरा-जरा सी बात पर लगभग भयभीत सा करके रखा गया होता है वहां अपेक्षा की जाती है कि वे चाकू चलायें, अपराधियों के शरीर पर घातक वार करें. जिस समय में लड़कियों में अपनी देह के प्रति एक असुरक्षा भाव होने के साथ-साथ उसका सौन्दर्य-बोध भी छिपा होता है वहां माना जाता है कि वे कोई कठोर निर्णय लेने में सक्षम हैं. जहाँ लड़कियों में जीरो फिगर के प्रति, अपनी त्वचा, देह के सौन्दर्य के प्रति आसक्ति भाव है वहां उनसे दैहिक कठोरता की अपेक्षा की जा रही है. जहाँ लड़कियाँ घर में छिपकलियों, कोक्रोचों, चूहों, अँधेरों से घनघोर तरीके से घबराती हैं वहां विचार किया जा रहा है कि वे दुर्दांत अपराधियों के छक्के छुड़ा देंगी.

असल में ये सब महज काल्पनिकता से भरी बातें हैं. जिस समाज में बेटियों के साथ घर की महिलायें ही उनकी देह से सम्बंधित बातें करने में हिचकती हैं वहां उन बच्चियों को सही-गलत कौन समझाएगा? जहाँ माना जाता है कि बेटियां दैहिक रूप से कोमल, कमजोर हैं वहां उनको दौड़ने, भागने, कूदने, चिल्लाने, वार करने, लड़ने आदि की शिक्षा कौन देगा? समाज से पहले हम सभी को अपने-अपने परिवार में ऐसा माहौल तैयार करना होगा जहाँ बेटे-बेटियों में सिर्फ खान-पान, शिक्षा, पहनावे को लेकर ही विभेद समाप्त न किया जाये बल्कि उनके कार्यों, उनकी जमीनी भागदौड़, उनकी शारीरिक कसावट को लेकर भी विभेद समाप्त किया जाये. बेटों को संस्कारी बनाया जाये या न बनाया जाये मगर अपनी बेटी को इतना सशक्त अवश्य बनाया जाये कि वह लात, घूंसे, हाथों का भरपूर वार सामने वाले अपराधी पर कर सकने में सक्षम हो. बेटियों को सिलाई, संगीत, पाककला की जानकारी हो या न हो मगर उनको आत्मरक्षा के गुण आने चाहिए, उनमें आत्मविश्वास की सशक्तता हो, आत्मबल की तीव्रता हो. यह ध्यान रखना होगा कि समाज में सभी व्यक्ति न ही भले हैं और न ही सभी व्यक्ति बुरे हैं. हर भला व्यक्ति सड़क चलते सबका भला नहीं कर रहा है, उसी तरह अपराधी व्यक्ति सड़क चलते हर व्यक्ति के साथ अपराध नहीं कर रहा है. यहाँ भी अपनी तरह की मनोवैज्ञानिकता है, एक तरह की कुंठा है. इसके सन्दर्भ में समझना होगा कि ऐसे आपराधिक व्यक्तियों की कुंठा का, उसके मौके का शिकार हमारी-आपकी बेटी न बने.


17 जून 2019

सबको बस मौके की तलाश है


समाज में अच्छे बुरे लोगों का अस्तित्व हमेशा से रहा है और हमेशा ही रहेगा. ये कोई आज की बात नहीं वरन जबसे समाज का निर्माण हुआ है तभी से ऐसी स्थिति रही है. किसी एक बुरी घटना के हो जाने पर या फिर बुरी घटनाओं के लगातार होते रहने पर लोगों द्वारा ऐसा माहौल बनाया जाने लगता है जैसे पूरा समाज ही बुरा हो गया है. इस तरह से व्यवहार किया जाने लगता है जैसे सभी बुरे लोग आसपास आकर बस गए हैं. समाज को न रहने लायक बताया जाने लगता है. समाज में अपराधों का बोलबाला ही बताया जाने लगता है. समाज अपराधियों के हाथों से संचालित होना दिखाया जाने लगता है. एक पल को रुककर विचार करिए कि क्या वाकई ऐसा है? क्या वाकई समाज में सिर्फ और सिर्फ बुराई का ही बोलबाला है? क्या समाज का सञ्चालन अब अपराधियों द्वारा हो रहा है? क्या समाज में कहीं भी अच्छाई नहीं दिखाई दे रही है? 


ये सवाल ऐसे हैं, जिनपर यदि गंभीरता से विचार किया जाये तो बहुत कुछ समाधान निकल आएगा. यहाँ हम सभी को कहीं बहुत दूर देखने की जरूरत नहीं. हम सभी को बस अपने आसपास निगाह डालने की आवश्यकता है. गौर करिए, आप सड़क पर चले जा रहे हैं. क्या आपसे साथ चलने वाला हर व्यक्ति आपके साथ या किसी दूसरे के साथ आपराधिक कृत्य कर रहा है? क्या आपके साथ चलने वाला व्यक्ति आपके साथ या किसी दूसरे के साथ भलाई का कार्य कर रहा है? क्या सड़क चलता कोई भी व्यक्ति किसी का सामान लूट कर भाग रहा है? क्या कोई व्यक्ति सभी की आर्थिक मदद करता हुआ आगे बढ़ रहा है? ऐसा तो नहीं हो रहा है. ऐसा हो भी नहीं सकता है. इसके पीछे कारण यह है कि समाज में अच्छे, बुरे दोनों तरह के लोग रहते हैं. समाज का संचालन इन्हीं के द्वारा होता है. बुरी प्रवृत्ति का व्यक्ति सिर्फ बुरा ही करेगा और उसके लिए वह मौके की तलाश में रहता है. ठीक इसी तरह से अच्छा व्यक्ति भी सिर्फ अच्छा ही करेगा और वह भी किसी उचित अवसर की तलाश में रहेगा. अकारण न तो अच्छे काम किये जा रहे हैं और न ही बुरे काम हो रहे हैं. अकारण न तो परोपकार किया जा रहा है और न ही अकारण अपराध किये जा रहे हैं.

01 अगस्त 2018

निर्लज्ज हँसी में छिपते अपराध


जब तक सत्ता के गलियारों से आपराधिक लोगों को संरक्षण मिलता रहेगा, तब तक ये निर्लज्जता बनी रहेगी. संरक्षणगृहों से इस तरह के कुकृत्यों का निकलना कोई पहली बार नहीं हुआ है. इससे पहले भी कई काण्ड इस तरह से सामने आते रहे हैं. हरेक घटना में किसी न किसी रसूखदार का, किसी न किसी सत्ताधारी का संरक्षण दिखता रहा है. हर बार सत्ता की तरफ से कठोर से कठोर कार्यवाही किये जाने की बात कही जाती है, कुश दोषियों की गिरफ़्तारी भी हो जाती है, जाँच करवाए जाने की लीपापोती कर दी जाती है और उसके बाद सबकुछ भूल-भुला लिया जाता है. इस तरह के कृत्य कुछ दिन चर्चा में रहते हैं फिर जनमानस की खोपड़ी से ग़ायब हो जाते हैं. निठारी कांड कितनों को याद है? कितनों को उसके दोषी की सज़ा याद है? कुछ दिन बाद ऐसा ही कुछ यहाँ होगा.


यही कारण है कि गिरफ्तार होने के बाद भी मुजफ्फरपुर का दोषी खुलकर हँस रहा है. समझ नहीं आता कि वह किस पर हँस रहा है? इस व्यवस्था पर हँस रहा है, इस कानून पर हँस रहा है, सत्ता में बैठे लोगों पर हँस रहा है, जनता पर हँस रहा है, उसके खिलाफ कार्यवाही करवाने वालों पर हँस रहा है. वह किसी पर भी हँस रहा हो मगर देखा जाये तो एक वह अकेला ही नहीं हँस रहा है. समाज में जहाँ-जहाँ भी व्यवस्था की खिल्ली उड़ाई गई है वहां-वहां संलिप्त सभी लोग हँस ही रहे हैं. ऐसे लोग व्यवस्था पर हँसते हैं, कानून पर हँसते हैं, अदालत पर हँसते हैं, न्याय पर हँसते हैं, सामाजिक रूप से सक्रिय रहने वालों पर हँसते हैं, शोषितों पर हँसते हैं, न्याय मांगने वालों पर हँसते हैं, सरकार पर हँसते हैं, विपक्ष पर हँसते हैं. इनके हँसने में सिर्फ हँसी नहीं है वरन व्यंग्य है, मखौल है. ये जानते हैं कि कानून इनका कुछ न बिगाड़ सकेगा, सिस्टम इनके साथ कोई कठोर कार्यवाही नहीं कर सकेगा. इनको भली-भांति मालूम है कि कहाँ से कैसे बचना है. ये जानते हैं कि किसके द्वारा सजा से बचा जाना है. इनके हँसने के पीछे एक पूरा का पूरा अतीत है जो इनके साथ ठहाके लगाता है. इनके साथ वे रोता, सिसियाता अतीत है जो व्यवस्था की मार सहता हुआ जिन्दा है मगर लाश जैसा है.

व्यवस्था को, सत्ता को, विपक्ष को, मीडिया को, न्याय को, कानून को किसी भी कीमत पर खरीदने का दम रखने का अहंकार पाले ये लोग ही समाज में विद्रूपता फैलाये रहते हैं. कभी संरक्षण के नाम पर व्याभिचार, कभी शिक्षा के नाम पर व्याभिचार, कभी व्यापार के नाम पर यौन-अपराध, कभी राजनीति के नाम पर जिस्मफरोशी, कभी रोजगार के नाम पर कुकर्म. सभी पर पड़े परदे उठते भी हैं मगर सामने आते चेहरों पर खौफ नहीं दिखता है. खाकी वर्दी के साथ अदालत की तरफ जाते, न्याय के कटघरे की तरफ जाते इन दोषियों की चाल में अहंकार टपकता है. लगता नहीं कि किसी दोषी को पुलिस पकड़ कर ले जा रही है वरन ऐसा प्रतीत होता है मानो किसी विशिष्ट के स्वागत की तैयारी हो रही हो. निर्लज्ज रूप से ऐसे लोग हनते हुए सम्पूर्ण समाज का, शोषितों का मजाक उड़ाते हैं. इस हँसी के पीछे से निकलता उनका विश्वास सिद्ध करता है कि ये लोग महज मोहरे हैं, असल खिलाड़ी कोई और है जो इसके बाद किसी और निर्लज्ज मोहरे को सामने लाकर खेल खेलेगा. वक्त की मार के चलते कभी वह मोहरा भी पिटा तो वह भी इसी तरह की निर्लज्ज हँसी के द्वारा सबका मखौल उड़ाएगा, सबका मजाक बनाएगा.

05 जुलाई 2018

अपराधियों के साथ हम सब भी दोषी हैं


हम सब नागरिक बहुत परेशान हैं. समाज में रोज ही बलात्कार की खबरें आ रही हैं. अब तो बच्चियों के साथ बलात्कार की खबरें आने लगी हैं. इन खबरों को पढ़कर, सोशल मीडिया पर देखकर खून खौल जाता है मगर बस उतनी देर ही खौलता रहता है जितनी देर तक हम सब अपना स्टेटस, कोई फोटो सोशल मीडिया पर शेयर नहीं कर लेते. जैसे ही ये सब किया, दो-चार-दस लाइक, कमेंट मिले बस खून का उबाल ठंडा पड़ जाता है. कुछ लोगों का खून ज्वालामुखी की तरह खौलता है, लावा फेंकता है पर तब तक ही ऐसा होता है जब तक कि वे मोमबत्ती न जला लें, किसी जुलूस में शामिल न हो लें, उसकी सेल्फी खींच कर सोशल मीडिया पर शेयर न कर लें. इतना करने के बाद खून खौलना बंद हो जाता है और खून की रवानी दूसरी दिशा में मुड़ जाती है. अब खून के खौलाव के बाद बने बादल दिमाग में चढ़ जाते हैं और फिर वे किस एक महिला, किसी एक बच्ची को नहीं देखते वरन सम्पूर्ण समाज का प्रतिनिधित्व करने लगते हैं. दिमाग में चढ़े खून के बादल समग्रता में देखने लगते हैं. बस उनके बरसने की देर होती है. आखिर बरसने के लिए भी कोई जगह चाहिए, कोई अवसर चाहिए. इसी अवसर, इसी जगह के मिलते ही दिमाग में चढ़े बादल वैचारिकी के साथ बरस पड़ते हैं. सामाजिक दर्शन के साथ बरस पड़ते हैं.


इस समग्रता में समूचा समाज ख़राब लगने लगता है. समाज रहने लायक नहीं लगता. ये देश रहने लायक नहीं लगता. कुछ लोगों को देश में आपातकाल दिखाई देने लगता है. कुछ लोगों के लिए देश सांप्रदायिक हो जाता है. कुछ समाज में अराजकता का बोलबाला देखते हैं. कुछ हिंसात्मक समाज का स्वरूप देखने लगते हैं. इतना सब कुछ होने के बाद भी ऐसे लोग आराम से जीवन-यापन कर रहे होते हैं. इतनी भयानक स्थिति होने के बाद भी ऐसी सोच वालों का परिवार सुखद रूप में समाज के बीच रह रहा होता है. ऐसी सोच का प्रसार करने वाले ही खुलेआम मॉल में, बाजार में घूमते दिखाई देते हैं. न उनके साथ कोई छेड़छाड़ होती है, न उनका कोई मर्डर करता है, न उनके साथ कोई चोरी-चकारी होती है, न उनके साथ कोई हिंसा होती है, न उनके साथ कोई अराजकता होती है. इतने के बाद भी उनको समाज रहने लायक नहीं लगता है. खबरों में देखने-पढ़ने के बाद सोशल मीडिया पर सक्रियता दिखाने के बाद चैन की नींद सोने वालों के लिए ही ये समाज रहने लायक नहीं रहता है. ऐसे लोग ही इसका दुष्प्रचार करते नजर आते हैं. ऐसे विचारों का प्रसार करने वालों से पूछना चाहिए कि समाज में कितनी बार इनके परिवार को ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा कि जिससे उन्हें लगा हो कि समाज अब रहने लायक नहीं? ऐसे लोगों से जानना चाहिए कि समाज में विपत्ति में फँसे कितने लोगों की इन्होंने मदद की है? इनकी राय इस पर भी प्राप्त करनी चाहिए कि जमीनी रूप से समाज को सुधारने के लिए इन्होंने कितना काम किया?

यहाँ यह कहने का अर्थ कतई नहीं है कि समाज में स्थितियाँ बेहतर हैं, सुखद हैं. यदि ऐसा होता तो हम सब रोज ही बलात्कार जैसी घटनाओं से दो-चार नहीं हो रहे होते. यदि समाज में सबकुछ सुखद ही होता तो बच्चियाँ दुर्दांत अपराधियों की हवस का शिकार नहीं बन रही होती. जिस तरह की आपराधिक घटनाएँ दिख रही हैं, उसके पीछे इसी तरह की मानसिकता के लोग भी जिम्मेवार हैं. अपराधी की मनोवृत्ति अपराध करने की होती है मगर उन व्यक्तियों की मनोवृत्ति कैसी होनी चाहिए जो अपने आपको समाज का जिम्मेवार नागरिक मानते हैं? क्या उनका दायित्व नहीं बनता कि समाज में लगातार आ रही विसंगतियों के खिलाफ खड़े हों? क्या उनका फ़र्ज़ नहीं बनता कि आये दिन आँखों के सामने होने वाली आपराधिक घटनाओं का विरोध उनके द्वारा भी हो? ऐसे लोगों की स्थिति यह है कि विरोध तो दूर मौका पड़ने पर वे यह तक स्वीकारने को तैयार नहीं होते कि वारदात के समय वे वहां मौजूद थे. ऐसे में अपराधियों का हौसला तो बढ़ना ही है. यदि गंभीरता से विचार किया जाये तो आप खुद महसूस करेंगे कि सड़क चलते हर इन्सान हत्या नहीं कर रहा है. सड़क चलता हर व्यक्ति बलात्कार नहीं कर रहा है. सड़क चलता हर इन्सान किसी का सामान नहीं चुरा रहा है. असल में ऐसा करने वाले अवसर की, जगह की, स्थिति की प्रतीक्षा में रहते हैं.

अपराधियों को ऐसी स्थिति, ऐसा अवसर वही लोग उपलब्ध कराते हैं जो इस समाज को अब हिंसात्मक, आपराधिक मान रहे हैं. जमीनी रूप में सजगता दिखाने के बजाय आलोचना करना सबसे ज्यादा आसान होता है. इस कारण से समाज का कथित बुद्धिजीवी वर्ग खुद को कमरे में बंद करके बैठा रहता है और अपराधियों को अवसर उपलब्ध करवाता रहता है. सत्य यह है कि अपराधी जबरदस्त तरीके से डरपोक किस्म का होता है और यही कारण है कि वे एक समूह में चलते हैं. रात के अंधियारे में चलते हैं. कानून से बचते फिरते हैं. इसके साथ-साथ यह और भी बड़ा सत्य है कि खुद को जिम्मेवार मानने वाला, बुद्धिजीवी मानने वाला नागरिक इनसे भी बड़ा डरपोक होता है. उसके एक इसी डरपोकपने के कारण अपराधियों के हौसले बुलंद हैं और इसी कारण समाज में रोज ही आपराधिक घटनाएँ हो रही हैं.

01 जुलाई 2018

बलात्कारियों में डर-भय नहीं कानून का


दिल्ली गैंगरेप के बाद दिल्ली समेत देश के कई भागों में इन बलात्कारियों को फाँसी की सजा देने की माँग जोर पकड़ने लगी थी, ऐसा ही कुछ अब हो रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे बलात्कारियों के लिए फांसी की सजा के निर्धारण से देश में बलात्कारियों में डर व्याप्त हो जायेगा अथवा बलात्कार होने बन्द हो जायेंगे। याद होगा शायद सभी को कि धनञ्जय चटर्जी को बलात्कार के आरोप में ही फाँसी दी गई थी। क्या हुआ उसके बाद? क्या बदला उसके बाद? विगत कुछ माह से लगातार होती आ रही या कहें कि रोज ही होती आ रही बलात्कार की घटनाएँ चिंतित करने वाली हैं, विचलित करने वाली हैं। चिंता इसकी कि अब ऐसा लग रहा है कि समाज में महिलाएं सुरक्षित ही नहीं हैं और विचलित करने वाली घटनाएँ इसलिए क्योंकि बलात्कार की, सामूहिक बलात्कार की घटनाओं में अब बच्चियों को शिकार बनाया जाने लगा है। कभी लगता है कि जनता जाग रही है तो कभी लगता है कि वह एकदम भावशून्य पड़ी हुई है। प्रशासन-शासन की विफलता के बाद उसको चेताने के लिए, जगाने के लिए जनता का जागरूक होना आवश्यक है। इस जागरण में सिर्फ और सिर्फ फाँसी की माँग करना अकेले ही इस समस्या का समाधान नहीं।


बलात्कार के लिए फांसी की सजा की मांग करने के पूर्व हमें उन तमाम सारे कानूनों की ओर भी ध्यान देना होगा जिनके द्वारा किसी अपराध के लिए फांसी की सजा का प्रावधान है। क्या उन तमाम अपराधों में कमी आई है अथवा वे अपराध होना बन्द हो गये है? पूर्वाग्रह दृष्टि न रखने वालों का एक ही जवाब इसके लिए होगा और वो भी न में। तमाम सारे वे अपराध आज भी तेजी से समाज में होते दिख रहे हैं, जिनके लिए सजा के रूप में फांसी की सजा का प्रावधान है। इसके अलावा एक और तथ्य महत्वपूर्ण है कि यदि बलात्कार की सजा के रूप में फांसी को मुख्य रूप से स्वीकार कर लिया गया तो इसके कई दुष्परिणाम महिलाओं के प्रति ही खड़े होने की आशंका है। यह सर्वविदित है कि यदि किसी भी महिला से बलात्कार हुआ तो जाहिर है कि वह महिला किसी न किसी रूप में शारीरिक दृष्टि में उस बलात्कारी पुरुष से कमजोर साबित हुई है। इसके अलावा गैंग रेप के केस में तो जाहिर है कि उस महिला के साथ दुराचार करने वालों की संख्या एक से अधिक रही होगी। ऐसे में यदि बलात्कार की सजा फांसी हो जाती है तो बहुत हद तक सम्भावना है कि सम्बन्धित महिला को दुराचारी लोग जीवित ही न छोड़ें। आखिर उन बलात्कारियों को पहचानने वाला, उनकी शिकायत करने वाला, उनके विरुद्ध गवाही देने वाला यदि कोई होगा तो सिर्फ और सिर्फ वह महिला ही। ऐसे में उन दुराचारियों के द्वारा उसको जीवित छोड़ देने की सम्भावना न्यूनतम होने की आशंका है।

जनता जागरूक होकर सरकार को, प्रशासन को घेरने का काम करे। वह इसके लिए शासन-प्रशासन को विवश कर दे कि वह चुस्त-दुरुस्त होकर काम करे। यदि शासन-प्रशासन अपनी तरफ से चुस्त-दुरुस्त व्यवस्था रखने के लिए तत्पर हो जाये तो परिणाम कुछ हद तक सुखद मिलने की सम्भावना है। यदि जागरूकता लोगों को सजग रहने के लिए दिखाई जाये तो महिलाओं को इस तरह से आये दिन दुराचारियों का शिकार न होना पड़े। यदि एकजुटता की स्थिति को अपराधियों में मन में खौफ पैदा करने के लिए दिखाई जाये तो पल प्रति पल ऐसी वीभत्स घटनाओं से हमें दो-चार नहीं होना पड़ेगा। दिल्ली कांड के बाद कानून बनाया गया मगर क्या हुआ उसका? इसी काण्ड के अपराधियों को अभी तक सजा नहीं दी जा सकी है। और तो और विपक्षी दल, वे चाहे कोई भी हों सब किसी न किसी बहाने सरकार पर हमला बोलने की मंशा बनाये रहते हैं। उनके कदमों से ऐसा लगता है जैसे उन्हें न महिलाओं से मतलब है, न बच्चियों से मतलब है, न ही अपराधियों से। वे सब महज अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेंकने के लिए आग तलाशते रहते हैं। यदि वाकई कानून का, किसी तरह की सजा का कोई डर-भय होता तो दिल्ली कांड के बाद भी देश के कई भागों में गैंगरेप के और मामले सामने नहीं आये होते।



15 अप्रैल 2018

बढ़ती भयावहता और बढ़ती वैमनष्यता


लगता है कुछ लिखने, विचार करने, आपसी संवाद करने का अब कोई अर्थ नहीं रह गया है. समाज में एक तरफ जहाँ भयावहता बढ़ती दिख रही है वहीं उसके साथ-साथ वैमनष्यता भी बढ़ती दिख रही है. एक-दूसरे के साथ संवाद-हीनता की स्थिति तो बढ़ ही रही है, एक-दूसरे पर अविश्वास भी बढ़ता जा रहा है. समाज का व्यक्ति अपने-अपने वर्गों, अपनी-अपनी विचारधारा के अनुसार अपने-अपने तर्कों को गढ़ने में लगा है. ऐसे में किसी समस्या का समाधान खोजने के स्थान पर सामने वाले पर दोषारोपण का कार्य किया जा रहा है. समाज में घटित होने वाली हर छोटी-बड़ी घटना को धर्म, जाति से जोड़कर उसका विश्लेषण किया जाने लगा है. यह वह स्थिति है जिसने व्यक्तियों को आपस में एकजुट होने से रोक रखा है. यही कारण है कि अपराधी हर बार अपराध करने के बाद बच जाता है और फिर अगले अपराध के लिए खुद को सक्रिय करने लगता है. अपराध करने के बाद बार-बार बचते रहना ऐसे अपराधियों के हौसले बुलंद करता है. उनकी बढ़ती ताकत को देखने के बाद भी हम सब ऐसे खामोश हैं जैसे कि उनके कातिल हाथ हमारे घरों तक नहीं पहुंचेंगे. हम ये समझ कर शांत बैठे हैं कि वे हत्यारे हमारी बेटियों, बहिनों को अपना शिकार नहीं बनायेंगे. हम माने बैठे हैं कि हम एक विचारधारा विशेष से आते हैं तो हम सुरक्षित बने रहेंगे. जबकि सत्यता इससे परे है.


इधर विगत कुछ समय से देखने में आ रहा है कि देश भर में एक-एक करके मामलों को, घटनाओं को जाति, धर्म के आधार पर उठाया जाने लगा है. किसी न किसी धर्म, संप्रदाय से सम्बंधित खबरों, घटनाओं को बहुतायत में प्रचारित किया जाता है, बिना ये सोचे-समझे कि इसका समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा. किसी भी घटना को, वारदात को, हिंसा को प्रायोजित तरीके से पेश करने की आदत सी बनती जा रही है. विद्रूपता इसकी है कि ऐसा करने वाले वे लोग हैं जिन्हें समाज का बहुत बड़ा तबका देखता-सुनता-पढ़ता है. ऐसे लोगों के लिए भी बच्चियों की हत्या में, उनके रेप में धर्म, जाति मुख्य रूप से प्रमुख होती है. उनकी रिपोर्ट का आधार भी बच्ची के साथ घटित होने वाली वारदात नहीं वरन उसका धर्म, जाति मायने रखती है. अपराधी की पहचान से ज्यादा उसका धर्म, जाति बताना ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता है. किसी भी वारदात, हिंसा की मूल वजह खोजने के स्थान पर उसको जबरिया सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की जाने लगती है. सोचने वाली बात है कि ऐसा करने का इन लोगों का मंतव्य क्या है? आखिर ऐसा दिखा कर ये लोग समाज में किस तरह का माहौल बनाना चाहते हैं?

स्पष्ट है कि चुनावी वर्ष आरम्भ हो चुका है. ये लोग भी एक तरह के राजनैतिक कार्यकर्त्ता है जो हिंसा, अत्याचार, वैमनष्यता, कटुता आदि के प्रचार के द्वारा अपने-अपने दलों के लिए काम करते हैं. इनकी नारेबाजी भी इसी तरह की होती है. इनके बैनर, पोस्टर भी इसी तरह के होते हैं. ऐसे में नागरिकों को समझने की जरूरत है कि वे इनकी बोली जाने वाली भाषा को कैसे समझ रहे हैं.

13 अप्रैल 2018

अपराध-नियंत्रण हेतु संकुचित मानसिकता से मुक्ति पानी होगी


अब हम सभी लोग वाकई बुद्धिजीवी वर्ग में शामिल हो चुके हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि यही एक वर्ग ऐसा है जो भावनात्मक होकर कभी किसी बात पर विचार नहीं करता है वरन हर एक बात को बुद्धि के तराजू से तौलता है. दिल के बजाय दिमाग का उपयोग करते हुए यह वर्ग सारे पहलुओं पर सिर्फ और सिर्फ गैर-भावनात्मकता से सोचता-विचारता है. हम सब भी आजकल कुछ ऐसा ही करने लगे हैं. कितना भी बड़ा हादसा हो जाये, कितनी भी छोटी बात हो जाये हम सभी सिर्फ और सिर्फ अपनी बंधी-बंधाई विचारधारा से ही सोचने का काम करते हैं. हमारे आसपास चाहे बलात्कार हो चाहे हत्या हो, चाहे हिंसा हो, चाहे किसी महिला को परेशान किया जा रहा हो, चाहे किसी बुजुर्ग को सताया जा रहा हो हम सभी मामलों में अपनी-अपनी विचारधारा के अनुसार विचार करना शुरू कर देते हैं. उस समय प्रताड़ित व्यक्ति हमारे लिए इन्सान नहीं रहता है बल्कि उस समय वह किसी धर्म का होता है, किसी जाति का होता है, किसी दल विशेष का होता है. हम सब उस व्यक्ति को उसी खाँचे में फिट करके उसी के अनुसार उसके साथ घटित घटना का आकलन, विश्लेषण करने लगते हैं. उस समय हमारे दिमाग में, हमारी नजर में उस व्यक्ति के साथ घटित होने वाली घटना की वीभत्सता नहीं होती है वरन एक विशेष खाँचे में उसका फिट होना होता है.


कभी सोचा है कि आखिर ऐसा क्यों होने लगा है? कभी विचार किया है कि ऐसा विगत तीन-चार वर्षों से ही क्यों दिखाई देने लगा है? क्या कभी इस पर विचार किया गया है कि एक सी घटना पर हम सभी दो अलग-अलग विचार कैसे अपना लेते हैं? हमारे लिए उस समय न तो पीड़ित व्यक्ति की उम्र मायने रखती है, न उसका क्षेत्र मायने रखता है, बल्कि इतना याद रहता है कि उसके प्रति वैचारिक आन्दोलन खड़ा करने के क्या लाभ, क्या हानि है. इधर भी कुछ ऐसा होने में लगा है. बच्चियों के साथ बलात्कार हुआ है, बच्चियों की हत्या हुई है मगर उसके बाद भी वे लोग जो खुद को बुद्धिजीवी घोषित किये फिरते हैं, इन वारदातों को भी हिन्दू-मुस्लिम नजरिये से देख रहे हैं. सोचने वाली बात है कि आप एक बच्ची के लिए न्याय मांगते हैं और दूसरी बच्ची को नजरअंदाज कर देते हैं, कैसे? आखिर बुद्धिजीवी कहलाने वाले लोग ऐसा किसे कर लेते हैं कि एक बच्ची के लिए आन्दोलन छेड़ देते हैं और उसी तरह की विभीषिका को झेलने वाली दूसरी बच्ची के प्रति संज्ञाशून्य बन जाते हैं? आखिर पढ़ने-लिखने वाले कैसे एक जैसी दो घटनाओं में अपनी-अपनी विचारधारा को खोज लेते हैं?

समाज में अपराध रोकना बहुत आसान है, बस हम नागरिक आपस में राजनीति करना बंद कर दें. कोई भी अपराधी इतना बलशाली नहीं होता कि वह पूरे समाज को अपने कब्जे में कर सके. देखा जाये तो वह चंद वैचारिक लोगों को अपने काबू में कर लेता है और फिर यही लोग उसके अनुसार काम करना शुरू कर देते हैं. जैसे ही उसे लगता है कि उसका लाभ किसी विषय विशेष से है वह उसी के अनुसार अपनी चालें चलने लगता है. यहाँ पढ़ने-लिखने वाले, खुद को बुद्धिजीवी बताने वाले सहज भाव से उसके साथ चलना शुरू कर देते हैं. यहाँ उन चंद लोगों को नहीं वरन हम सबको सोचने की आवश्यकता है. समझना होगा कि नुकसान हमारा हो रहा है. परिवार हमारे नष्ट हो रहे हैं. सदस्य हमारे प्रताड़ित हो रहे हैं. यदि हम सब संकुचित मानसिकता से मुक्ति नहीं पाते हैं तो फिर कल को प्रताड़ना के कदम हमारे परिवार के भीतर पहुँच सकते हैं. सोचिये क्या तब भी हम सब जाति, धर्म, क्षेत्र, दल जैसी संकुचित मानसिकता में, खाँचे में फँसे रहेंगे?

19 जनवरी 2018

हिंसक होता बचपन

कुछ समय पहले एक आलेख प्रकाशित हुआ था, जिसमें हमने ये बताने का प्रयास किया था कि इन्सान की मूल प्रवृत्ति हिंसक है. आदिमानव से लेकर वर्तमान महामानव बनने तक के सफ़र में इन्सान ने बहुत कुछ छोड़ा, बहुत कुछ अपनाया मगर वो अपनी हिंसक प्रवृत्ति को नहीं छोड़ सका. विकास की अवस्थाओं की नित नई परिकल्पनाओं के बाद भी उसे जब भी अवसर मिला उसने हिंसात्मक आचरण अपनाया है. इसे इस रूप में भी समझा जा सकता है कि किसी भी इन्सान को जन्म से लेकर मृत्यु तक किसी भी तरह के पाठ्यक्रम में हिंसा करना नहीं सिखाया जाता है जबकि प्रत्येक कालखंड में, उम्र के अलग-अलग पड़ाव पर उसे प्यार, स्नेह, अपनत्व, अहिंसा, शांति आदि के पाठ बराबर पढ़ाये, रटाये जाते हैं. आवश्यक नहीं कि कोई इन्सान किसी की हत्या करके ही अपनी हिंसात्मक मनोवृत्ति को दर्शाए, आवश्यक नहीं कि कोई इन्सान किसी के साथ मारपीट करके ही अपनी हिंसात्मक प्रवृत्ति को सामने लाये. उसके हावभाव, उसके बोलचाल, उसकी क्रियाविधि आदि से भी उसके हिंसक होने के प्रमाण मिलते हैं. सड़क चलते किसी वस्तु में पैर की जबरदस्त ठोकर मार देना, बगीचे, पार्क आदि में टहलते समय अनावश्यक रूप से किसी छड़ी, डंडी आदि के द्वारा पेड़ों-पौधों की पत्तियों-फूलों को गिरा देना आदि भी इसी तरह की मनोवृत्ति का परिचायक है.


बहुतायत में इन्सान की हिंसक गतिविधि कुछ समय पूर्व तक एक उम्र विशेष के बाद देखने को मिलती थी. किशोर अवस्था के बाद से लेकर एक लम्बे समय तक किसी भी इन्सान की गतिविधियाँ हिंसात्मक रूप से घटती-बढ़ती देखी जा सकती हैं. इधर वर्तमान परिदृश्य में ऐसा बहुतायत में देखने को मिलने लगा है कि बच्चे भी हिंसात्मक प्रवृत्ति को अपनाते देखे जाने लगे हैं. ऐसा नहीं है कि बच्चों में पहले हिंसात्मक प्रवृत्ति नहीं दिखाई देती थी या फिर वे हिंसात्मक तरीकों को नहीं अपनाते थे मगर अब जिस तरह की हिंसा बच्चों द्वारा दिखाई जा रही है, वह चिंताजनक है. पहले खेलकूद के दौरान, स्कूल में आपसी प्रतिद्वंद्विता के दौरान, किसी भी बात पर खुद को आगे रखने की चेष्टा में एक-दूसरे से झगड़ जाना, एक-दूसरे से लड़ जाना बचपने की आम प्रवृत्ति होती थी. ऐसा न केवल दोस्तों में वरन सगे भाई-बहिनों के बीच भी देखने को मिलता था. ऐसा कभी सुनाई भी नहीं देता था कि कोई बच्चा किस दूसरे बच्चे की हत्या महज इसलिए कर देता है कि उसकी मृत्यु से स्कूल में छुट्टी हो जाएगी. गुड़गाँव के रेयान इंटरनेश्नल स्कूल की यह घटना अभी मन-मष्तिष्क से धूमिल भी न हो सकी थी कि कुछ इसी तरह की वारदात लखनऊ में अंजाम दी गई. यहाँ के एक स्कूल में कक्षा सात में पढ़ने वाली एक छात्रा ने कक्षा एक में पढ़ने वाले एक बच्चे पर इसलिए प्राणघातक हमला किया कि उसकी मृत्यु से स्कूल में छुट्टी हो जाएगी.
ये सिर्फ चिंताजनक स्थिति नहीं है वरन बालमन-मष्तिष्क के शोध करने की स्थिति है कि आखिर उनके दिमाग में इस तरह की हत्यारी हिंसात्मक प्रवृत्ति का जन्म कैसे, कब, क्यों होने लगा है? इस तरह न केवल मनोविज्ञानियों को वरन समाजशास्त्रियों को भी सजग होने की आवश्यकता है. यदि इस तरह की मनोवृत्ति बच्चों में पनपने लगी तो समाज में अपराधियों का जन्म बचपन से ही होने लगेगा, जिसे एकबारगी भले ही शिक्षा या फिर किसी तरह के अनुशासन के द्वारा बढ़ने न दिया जाये पर वो कभी न कभी अपना स्वरूप दिखा ही देगा. वर्तमान में ऐसी घटनाओं के लिए तुरत-फुरत में प्रथम दृष्टया आरोप सोशल मीडिया पर लगा दिया जाता है, इंटरनेट पर लगा दिया जाता है, माता-पिता की व्यस्तता पर लगा दिया जाता है, आधुनिकीकरण पर लगा दिया जाता है. देखा जाये तो ये सब अवस्थाएं मात्र हैं न कि मूल जड़. वर्तमान में जिस तरह से तकनीक का विकास होने के साथ-साथ आमजनमानस की आवश्यकता बन गया है, उस दौर में टीवी, मोबाइल, कंप्यूटर, इंटरनेट आदि को समाप्त कर पाना, नकार देना संभव ही नहीं है. तो क्या माना जाये कि इनके माध्यम से हिंसात्मक प्रवृत्ति बच्चों में पनपने दी जाये?
इन सबसे अलग एकबारगी बच्चों की परवरिश, उनके आसपास का माहौल, परिवार में उनकी सहभागिता, उनके साथ सामान्यरूप में होने वाले व्यवहार, उनके साथ होने वाली बातचीत, बच्चों की दैनिक गतिविधियों, उनकी क्रियाशीलता आदि को भी गौर किया जाना आवश्यक है. वर्तमान जीवनशैली को देखा जाये तो वह कंक्रीट के जंगल में सिमट कर रह गई है. इस जीवनशैली में न तो खेलकूद के मैदान बचे हैं, न ही रिश्तों की बुनियाद. ऐसे में बचपन फुट और मीटर की नाप में सिमट कर रह गया है. खेलने के लिए उसके सामने गैजेट्स हैं, रिश्तों के नाम पर उसके सामने या तो कार्टून्स हैं या फिर कोई पालतू जानवर. आपसी सामंजस्य बनाने से ज्यादा उसे सिखाया जाता है कि उसे उसके साथी से अधिक अंक कैसे लाना है. सहयोग करने की बजाय उसे समझाया जाता है कि उसका समय सबसे ज्यादा कीमती है, जिसे बर्बाद न किया जाये. रिश्तों के प्रति संवेदित होने के बजाय उसे समझाया जाता है कि सारे सम्बन्ध-नाते मतलब के हैं. इस अकेलेपन और गैजेट्स के सहारे अपने बचपन को घुटते देखते बच्चों के भीतर इंसानी मूल प्रवृत्ति पनपने लगती है. यह प्रतिकूल स्थिति और उसकी आक्रामकता लोगों का ध्यान अपने प्रति खींचने के लिए बच्चों से आपराधिक कृत्य करवा बैठती है.

आवश्यकता आज इसकी है कि बच्चों को कमरे से बाहर खेलने-कूदने के लिए भेजा जाये. खेलने-कूदने से उन बच्चों के भीतर पनप रहे आक्रोश, हिंसा, अराजकता को बाहर निकल जाने का अवसर मिलेगा. उनके शैक्षणिक बोझ को कम करके उनके मानसिक विकास की तरफ गौर किया जाये. इससे न केवल वे अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकेंगे वरन अपने आसपास के वातावरण को, मानसिकता को समझने में परिपक्व हो सकेंगे. माता-पिता का अंधाधुंध धन कमाने की दौड़ से बाहर निकल कर अपने नौनिहालों की तरफ ध्यान दिया जाना चाहिए. अभिभावकों को समझना होगा कि उनके बच्चे ही उनकी अनमोल निधि हैं, जिसका विकास पारिवारिक संरचना में सम्मिलित रहकर ही किया जा सकता है. इसके अलावा सहज, सरल जीवनशैली को अपनाकर भी बच्चों को हिंसा से, हिंसात्मक वृत्ति से बचाया जा सकता है.