राममंदिर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
राममंदिर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

03 जुलाई 2026

आस्था और श्रीराम जन्मभूमि मंदिर

श्रीराम मंदिर की चढ़ावा चोरी की घटना के बाद से जिसकी भी श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में आस्था में कमी आई है वे सब हमारी नजर में व्यक्तिगत विचार में चोर ही हैं, संकुचित मानसिकता के हैं. असल में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर से वे दिल से कभी जुड़े ही नहीं थे. यदि एक चढ़ावा चोरी की घटना के बाद से मंदिर में आस्था कम अथवा न रखने वालों के खुद के घर में ही कोई भाई-बेटा-बहिन-बेटी चोर-नशेड़ी निकल जाये तो ऐसे लोग क्या करेंगे?

 

पाँच-दस व्यक्तियों (जो अपने ही अम्मा-पिताजी की औलाद होते हैं) में से किसी एक के चोर निकल आने पर क्या ऐसे लोग उस घर को छोड़ देंगे? क्या परिवार के शेष व्यक्तियों पर भी संदेह कर लेंगे? घर के मालिक (दादा-दादी, बाप-अम्मा) को ही कटघरे में खड़ा कर देंगे? असल में यहाँ (श्रीराम मंदिर में) बात घर की नहीं है न, इसलिए सबको ज्ञान आ रहा है. अपने घर के नशेबाज, जुआरी, हत्यारे व्यक्ति में भी ऐसे लोगों को निर्दोष व्यक्ति ही नजर आता है. ऐसे दोगले लोगों के कारण ही अब वे लोग उछल रहे हैं जिन्होंने कभी भी श्रीराम के अस्तित्व को नहीं स्वीकारा, कभी मंदिर के पक्ष में कोई बात नहीं की.


25 जून 2026

श्रीराम मंदिर के प्रति आस्था का सवाल

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के दान और चढ़ावे की चोरी सम्बन्धी जो मामला सामने आया है, उसे लेकर उन श्रद्धालुओं को, उन हिन्दुओं को नैराश्य भाव के रसातल में जाने से ख़ुद को बचाना होगा, जो श्रीराम के प्रति, जन्मभूमि मंदिर के प्रति गहरी आस्था रखते हैं. गम्भीरता से विचार करियेगा, कालखण्ड, परिस्थिति के बदलते ही मौकापरस्त लोग, स्वार्थी लोग तत्काल बदल जाते हैं. ऐसे में उनका बदलना कोई आश्चर्य की बात नहीं, जिनके हाथों में मंदिर की सम्पूर्ण व्यवस्था सौंपी गई. निश्चित ही उन सभी लोगों के लिए ये मामला कष्टप्रद है जिन्होंने निस्वार्थ भाव से श्रीराम जन्मभूमि के लिए संघर्ष किया था, कष्ट सहे थे, अपना सर्वस्व न्योछावर किया था लेकिन उनको धैर्य नहीं छोड़ना है, संयम नहीं खोना है, आस्था से विलग नहीं होना है.

 

ये समय, ये मामला भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन जैसा प्रतीत हो रहा है. लाखों नौजवानों ने निस्वार्थ भाव से आज़ादी के लिए संघर्ष किया; हजारों परिवारों ने अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया; जान की परवाह किए बिना असंख्य लोग मौत को गले लगा गए और हमें आज़ादी दे गए. इसके बाद हुआ क्या? कुछ विशेष लोग सत्ता पर बैठे; कुछ ख़ास लोगों के हाथ में अधिकार आए; कुछ लोगों को ताक़त मिली और फिर शुरू हुआ भ्रष्टाचार का खेल. आज़ादी के बाद मिली सत्ता ऐसे लोगों के लिए राजशाही का माध्यम बनी; धन-वैभव संकलित करने का साधन बनी; पीढ़ियों के लिए लाभ की विषय-वस्तु बनी. इन लोगों ने युवाओं के संघर्ष को भुला दिया; अंग्रेजों से लड़ने वालों को विस्मृत कर दिया. ऐसा ही कुछ श्रीराम जन्मभूमि मंदिर मामले में हो रहा है.

 

ध्यान रखो, भले लोगों ने राजनीति से दूरी बनाई तो अपराधी, बाहुबली इसमें घुसकर सरकार चलाने लगे. ऐसे ही यदि निस्वार्थ आस्थवान लोग श्रीराम जन्मभूमि मंदिर से दूर हुए तो यहाँ भी भ्रष्टाचारी, म्लेच्छ सोच के लोग स्थापित हो जाएँगे. जैसे आज देश की हालत के लिए रोना रोया जाता है, कल को श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के लिए रोया जाएगा.


18 फ़रवरी 2026

धार्मिक विरासत का विकास मॉडल - अयोध्या

जय श्रीराम और रामलला हम आयेंगे, मंदिर वहीं बनायेंगे जैसे नारों के बीच श्रीराम जन्मभूमि मंदिर विरोधी श्रीराम मंदिर निर्माण को सवालों के घेरे में खड़ा करते थे. उनका मानना था कि मंदिर निर्माण से आर्थिक रूप से कोई लाभ नहीं होने वाला. विरोधियों द्वारा मंदिर के स्थान पर चिकित्सालय बनवाए जाने के, विद्यालय बनवाए जाने के सुझाव दिए जाते. न्यायिक प्रक्रिया पश्चात् श्रीराम मंदिर निर्माण का रास्ता खुला और मंदिर निर्माण होने के साथ-साथ प्राण प्रतिष्ठा भी सम्पन्न हुई. अब जबकि अयोध्या में श्रीराम मंदिर दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की संख्या में लगातार वृद्धि देखने को मिल रही है, अयोध्या में बढ़ते पर्यटकों की संख्या अपनी ही अलग कहानी कह रही है तब भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) लखनऊ से श्रीराम मंदिर अर्थव्यवस्था मॉडल को अकादमिक मान्यता प्राप्त हुई है. संस्थान की एक अध्ययन रिपोर्ट ने श्रीराम मंदिर निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा पश्चात् अयोध्या में आई व्यापक आर्थिक सक्रियता, निवेश प्रवाह और रोजगार सृजन पर प्रकाश डाला है. अयोध्या का आर्थिक पुनर्जागरण शीर्षक से प्रकाशित अध्ययन रिपोर्ट में बताया गया कि अयोध्या की अर्थव्यवस्था में ऐतिहासिक उछाल आया है.

 



आईआईएम लखनऊ ने अपनी अध्ययन रिपोर्ट में मंदिर निर्माण से पहले और उसके बाद की आर्थिक परिस्थितियों का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया है. रिपोर्ट में बताया गया है कि मंदिर निर्माण से पहले अयोध्या की पहचान हिन्दुओं के एक पवित्र तीर्थस्थान के रूप में ही बनी हुई थी. मंदिर निर्माण के पहले यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं, पर्यटकों की वार्षिक संख्या लगभग 1.7 लाख के आसपास थी. अयोध्या के स्थानीय बाजारों का सञ्चालन भी बहुत छोटे स्तर पर होता था, जिसके चलते यहाँ की आर्थिक गतिविधियाँ भी संकुचित थीं. मंदिर निर्माण के बाद यहाँ लगभग छह हजार सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) स्थापित हुए. अयोध्या के स्थानीय हस्तशिल्प, धार्मिक स्मृति-चिह्न और मूर्तियों की माँग में उछाल से कारीगरों और स्थानीय उत्पादकों को प्रत्यक्ष लाभ मिला है. छोटे दुकानदारों और रेहड़ी-पटरी व्यवसायियों की दैनिक आय 500 रुपये से बढ़कर 2500 रुपये तक पहुँच गई. यहाँ की बढ़ती आर्थिक गतिविधियों ने पिछले वर्ष लगभग 400 करोड़ रुपये का जीएसटी योगदान दिया है.

 

किसी भी स्थान के पर्यटन को लेकर वहाँ की यातायात व्यवस्था, रुकने के स्थानों आदि का गुणवत्तापूर्ण होना बहुत अधिक महत्त्व रखता है. मंदिर निर्माण से पूर्व राष्ट्रीय स्तर के होटलों से सम्बंधित व्यावसायियों की उपस्थिति लगभग नगण्य थी. यातायात की सुविधाएँ भी सीमित रूप में देखने को मिलती थीं. मंदिर निर्माण पश्चात् आधुनिक रेलवे स्टेशन, चौड़ी सड़कों, नदी तट सौंदर्यीकरण और स्मार्ट सिटी परियोजनाओं ने अयोध्या को नवीन स्वरूप प्रदान किया है. इन परियोजनाओं ने अयोध्या को नवीनतम स्वरूप प्रदान करने के साथ-साथ निर्माण, परिवहन और सेवा क्षेत्र में रोजगार उत्पन्न करके स्थानीय युवाओं को काम के अवसर भी प्रदान किये. श्रीराम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद अयोध्या में सेवा-भाव, आतिथ्य सत्कार, निर्माण, परिवहन और सेवा क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में तेजी से विस्तार हुआ है. इससे यहाँ की आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि होने से पर्यटन आधारित राजस्व 20,000 से 25,000 करोड़ रुपये तक पहुँचने का अनुमान है. अध्ययन के अनुसार अयोध्या में प्रतिदिन दो लाख से अधिक श्रद्धालुओं के आगमन के परिणामस्वरूप 150 से अधिक नए होटल और होमस्टे अस्तित्व में आये हैं. यहाँ पर्यटन से जुड़ी संभावनाओं को देखते हुए देश के प्रतिष्ठित होटल व्यावसायियों ने अयोध्या में अपनी योजनाओं को विस्तारित किया है. अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि अगले चार-पाँच वर्षों में पर्यटन, परिवहन, होटल, खान-पान और आतिथ्य क्षेत्रों में लगभग 1.2 लाख प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार सृजन सम्भव है.

 

इसी के साथ महर्षि वाल्मीकि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा संचालन से देश के विभिन्न महानगरों से सीधी हवाई सम्पर्क स्थापित होने से भी श्रद्धालुओं और पर्यटकों की संख्या में वृद्धि हुई. आईआईएम के अध्ययन के अनुसार जनवरी 2024 में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा पश्चात् पहले छह महीनों में 11 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं का आगमन अयोध्या में हुआ. इस स्थिति के चलते अयोध्या के स्थानीय बाजार, परिवहन और आतिथ्य क्षेत्र में नई ऊर्जा का संचार देखने को मिला. ऐसी सम्भावना दर्शायी गई है कि अब अयोध्या में वार्षिक स्तर पर 5 से 6 करोड़ लोगों का आना हो सकता है. पर्यटकों, आगंतुकों की अनुमानित संख्या अयोध्या को देश के प्रमुख धार्मिक-पर्यटन केंद्रों की अग्रिम पंक्ति में ला खड़ा करती है. वर्तमान में अयोध्या में लगभग 85000 करोड़ रुपये की पुनर्विकास परियोजनाएँ विभिन्न चरणों में प्रगति पर हैं. इनका प्रभाव केवल आधारभूत ढाँचे तक ही नहीं बल्कि निवेश और सेवा क्षेत्र तक विस्तीर्ण है. सतत शहरी विकास को बढ़ावा देने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों और सौर ऊर्जा को प्रोत्साहित किया जा रहा है. अयोध्या को मॉडल सोलर सिटी के रूप में विकसित करने की दिशा में भी कदम बढ़ाए जा रहे हैं.

 

प्रवासी भारतीयों, देशी-विदेशी शोधकर्ताओं, वैश्विक श्रद्धालुओं का अयोध्या के प्रति आकर्षित होना सिद्ध करता है कि अयोध्या ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक केन्द्र के रूप में नई पहचान प्राप्त की है. अध्ययन के अनुसार धार्मिक विरासत आधारित विकास मॉडल यदि सुव्यवस्थित निवेश, प्रशासनिक समन्वय और दीर्घकालिक दृष्टि के साथ लागू किया जाए तो वह स्थानीय अर्थव्यवस्था में व्यापक और संरचनात्मक परिवर्तन कर सकता है. अयोध्या का अनुभव दर्शाता है कि सांस्कृतिक और धार्मिक परियोजनाओं के योजनाबद्ध क्रियान्वयन से पर्यटन, रोजगार और निजी निवेश से बहुस्तरीय आर्थिक वृद्धि का आधार निर्मित किया जा सकता है. यहाँ की आधारभूत संरचना, पर्यटन सुविधाओं और निवेश माहौल में व्यापक बदलाव देखने को मिला है जिसने इस तीर्थनगरी को विकास की मुख्यधारा में शामिल कर दिया है.

 

 


07 जून 2024

राक्षस अभी जिंदा हैं

हम लोग 1990-92 में विद्यार्थी हुआ करते थे. बाद के कालखण्ड में लोग मौज लेते थे कि रामलला हम आयेंगे, तारीख नहीं बताएँगे.... उस समय मन के किसी कोने में खुद से संशय करते थे कि क्या वाकई राममंदिर नहीं बन सकेगा?


कालांतर में मोदी जी के आने के बाद लगा कि राममंदिर बन जायेगा, बना भी. अपने आपमें गर्व की अनुभूति हुई. लगा कि उन राक्षसों को मुँहतोड़ जवाब मिला है जो राममंदिर निर्माण के विरुद्ध थे, जिन्होंने निहत्थे कारसेवकों पर गोलियाँ चलवाई हैं.


अब इस चुनाव परिणाम के बाद समझ आ रहा है कि राक्षसों का अस्तित्व अभी जिंदा है. श्रीराम का मंदिर बना है मगर उनकी वनवास से वापसी नहीं हुई है. कारसेवकों के हत्यारे फिर जीवन पा गए.


इस कष्ट को वही समझ सकते हैं जिन्होंने बाबरी ध्वंस के समय के कष्ट को सहा है. बाकियों के लिए ये राजनीति की गणित मात्र है.

20 जनवरी 2024

सांस्कृतिक वैभव की प्रतिष्ठा

श्रीराम के साथ मीडिया, सोशल मीडिया पूरी तरह से एकाकार हो चुका है. प्रत्येक प्राणी, एक-एक मंच राममय दिख रहे हैं. जो रामभक्त हैं वे उनका जयगान कर रहे हैं, जो इसके विरोधी हैं वे भी रामनाम जप रहे हैं. रामनाम की पावनता, उसकी दिव्यता, भव्यता आज सम्पूर्ण विश्व में प्रकीर्णित हो रही है. जन्मभूमि स्थल पर ही श्रीराममंदिर का निर्माण निश्चित ही गौरवान्वित करने वाला है.




22 जनवरी को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा, घर-घर दीपोत्सव के सम्मोहन में जन-जन सम्मोहित है, आह्लादित है. अभिभूत होते इस गौरवशाली क्षण में आँखें बार-बार नम होती हैं. इसका कारण एक तरफ़ जहाँ अपने सांस्कृतिक वैभव को प्रतिष्ठित होते देखना है वहीं दूसरी तरफ़ नब्बे के दौर में इस प्रतिष्ठा के लिए प्राण-प्रण से ओत-प्रोत नागरिकों का संघर्ष भी देखा है.


संघर्ष से वैभव की इस कठोर यात्रा में चटकती धूप के बाद मिली शीतल छाँव निश्चित ही उन सभी बलिदानियों की आत्मा को शांति पहुँचा रही होगी, जो इस जन्मभूमि के लिए नींव का पत्थर बन श्रीराममंदिर की विशालता को धारण कर चुके हैं.

उन सभी को बारम्बार नमन. जय श्रीराम.




 

13 जनवरी 2024

आमंत्रण के बाद भी अनामंत्रित

भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के दो बड़े पुराने कलाकार किसी ज़माने में बहुत जबर दोस्त हुआ करते थे. उनसे जुड़ी एक घटना श्रीराम जन्मभूमि मंदिर से संदर्भित समझ में आई तो यहाँ उसका उल्लेख कर रहे हैं.


उन दो कलाकारों ने एक साथ मुम्बई में आकर अपने सपनों को सच करने के लिए मेहनत करना शुरू किया. शुरूआती दौर में दोनों एकदूसरे के संघर्ष में साथ रहे, एकदूसरे की सफलता-असफलता में साथ दिया. कालांतर में दोनों कलाकार अपने-अपने स्तर पर प्रसिद्धि पाते रहे. इसी यात्रा में उन दो कलाकारों के बीच कभी किसी कारण से झगड़ा हो गया. उनका झगड़ा सिर्फ झगड़े तक न रहा, उससे आगे बढ़ता हुआ वो उनके बीच मनमुटाव तक भी पहुँच गया. यह इतना बढ़ा कि सामान्य रूप में, सार्वजनिक रूप में उन दोनों की आपस में बातचीत भी बंद हो गई. बहरहाल, इस मनमुटाव का असली रूप तब सामने आया जबकि उन दोनों कलाकारों में से एक कलाकार की बेटी की शादी होनी थी.

 

उन दो कलाकारों में एक ने सिर्फ प्रसिद्धि ही पाई तो दूसरे को महानायक के रूप में जाना गया. अब जब महानायक की बेटी की शादी का अवसर आया तो उस महानायक कलाकार ने दूसरे पूर्व-मित्र कलाकार को भी निमंत्रण भेजा. बस यहीं आकर इस पोस्ट की असली यात्रा शुरू होती है. जिस महानायक कलाकार की बेटी का विवाह था, उस कलाकार के पिता प्रसिद्ध कवि थे. ऐसा बताया जाता है कि उन्होंने सोलह पृष्ठ का निमंत्रण पत्र बनाया. प्रत्येक पृष्ठ पर कार्यक्रम का, रीति-रिवाज का विवरण और उसी के अनुसार एक कविता. कहने का अर्थ कि सोलह पृष्ठ का निमंत्रण पत्र काव्यात्मक रूप में तैयार किया गया था. महानायक कलाकार दोस्त ने दूसरे कलाकार दोस्त को वो निमंत्रण पत्र दिया. यहाँ उस निमंत्रण पत्र में जो खास बात थी वो ये कि उस कलाकार को जिसे-जिसे बुलाना था, उसके निमंत्रण पत्र में तारीख थी, समय था, स्थान था.... मगर जिसे नहीं बुलाना था उसे बस सोलह पृष्ठ का निमंत्रण पत्र ही था. खाली निमंत्रण पत्र, काव्यात्मक शैली, सोलह पृष्ठ मगर उसमें न तारीख, न समय, न स्थान अर्थात ऐसा कोई चिन्ह नहीं जिसके सहारे कार्यक्रम स्थल तक पहुँचा जा सके. बिना समय, बिना तिथि, बिना जगह वाला ऐसा निमंत्रण एक कलाकार ने अपने दूसरे कलाकार दोस्त को दिया.

 

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के समय इस घटना का याद आना महज इस कारण हुआ कि उस महानायक कलाकार द्वारा तिथि, स्थान आदि का जिक्र न करने के पीछे की मंशा थी कि कुछ लोग न आ सकें मगर इसके उलट श्रीराम जन्मभूमि मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण तो तिथि, समय, स्थान के साथ दिया जा रहा है, इसके बाद भी कुछ लोग नहीं आ रहे हैं. ये बात समझ से परे है कि ये लोग, जो अयोध्या नहीं जा रहे हैं वे श्रीराम के विरोधी हैं या फिर भाजपा के?


06 दिसंबर 2021

अध्यापन कार्य और ऐतिहासिक तिथियों का जुड़ना

आज छह दिसम्बर है, किसी के लिए शौर्य दिवस किसी के लिए काला दिवस. इस दिन को यदि बाबरी ढाँचा विध्वंस से जोड़कर देखा जाये तो और भी तमाम सारे अर्थ सामने आ सकते हैं. इस दिन का बाबरी ढाँचा ध्वंस से जोड़कर देखने से हमारा भी सन्दर्भ बना हुआ है. किसी समय कॉलेज टाइम में की गई गतिविधियों, रामलला हम आयेंगे, मंदिर वहीं बनायेंगे के घोष के बीच यह दिन बहुत कुछ याद दिला जाता है. इधर एक बात और बताते चलें कि अदालत का फैसला राममंदिर निर्माण के पक्ष में आने के बाद से सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर इस दिन हमारी स्वीकार्यता बनी रही अन्यथा की स्थिति में पहले इस दिन किसी भी रूप में राममंदिर निर्माण की, बाबरी ढाँचा ध्वंस की पोस्ट डालते ही हम पर प्रतिबन्ध लगा दिए जाते थे. कहीं दो दिन पोस्ट न कर पाने का प्रतिबन्ध, कहीं कोई फोटो न लगा पाने का प्रतिबन्ध, कहीं एकाउंट ही लॉग इन न कर पाने का प्रतिबन्ध.


बहरहाल, हमारे लिए व्यक्तिगत रूप से छह दिसम्बर का दिन यदि राममंदिर निर्माण से जुड़ा होने के कारण गर्व का एहसास कराता है वहीं हमारी आजीविका से जुड़ा होने के कारण भी एक अलग तरह की अनुभूति देता है. वर्ष 2005 की कुछ अत्यंत दुखद घटनाओं के बाद उस साल का समापन एक सुखद घटना से हुआ था. वह सुखद घटना थी हमारा मानदेय प्रवक्ता के रूप में चयनित होने को लेकर. मानदेय प्रवक्ता पर चयन होने के बाद छह दिसम्बर को ही हमने गांधी महाविद्यालय, उरई में हिन्दी विभाग में कार्य करना शुरू किया था. आज जब कैलेण्डर देखते हैं तो सोलह वर्ष की बाली उमरिया बीती हुई दिखाई देती है.


सोलह साल के लम्बे कार्यानुभव में बहुत सी खट्टी-मीठीं बातें हमारे अनुभव के पिटारे में बंद हैं. वे बातें हँसाती कम, रुलाती ज्यादा हैं. फिलहाल तो मानदेय प्रवक्ता से बाहर निकल कर अब विनियमित हो गए हैं. विनियमितीकरण के बाद फिर से एक नए सिरे से महाविद्यालय ने नियुक्ति पत्र दिया, नए रूप में नियुक्ति की गई. इस बार भी तिथि ऐतिहासिक ही रही. अबकी 08 मार्च को स्थायी शिक्षक के रूप में सहायक प्राध्यापक पद पर कार्यभार ग्रहण किया. अब स्थायी शिक्षकों के रूप में महाविद्यालय ने, विश्वविद्यालय ने, सरकार से स्वीकार कर लिया है. इसके बाद भी संघर्ष बहुत से मोर्चों पर अभी ज़ारी है. संघर्ष भरे जीवन में एक संघर्ष इस अध्यापन क्षेत्र का भी.


10 अगस्त 2020

हिन्दुओं के साथ विश्वासघात की तैयारी

श्रीराम मंदिर निर्माण सम्बन्धी शिला पूजन के आसपास का माहौल ऐसा बना कि देश के न सही मगर उत्तर प्रदेश के प्रमुख दलों ने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिए हैं. उत्तर प्रदेश के अलावा उसके पड़ोसी राज्य के पार्टी कार्यालय में भी कुछ अलग सा माहौल दिखाई दिया. इसके क्या कारण हैं? क्या इसे वोटों का ध्रुवीकरण कहा जा सकता है? अभी यदि उत्तर प्रदेश के पड़ोसी राज्य की बात न करके उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहाँ के दो प्रमुख दलों ने जैसे वोटों का ध्रुवीकरण करने का मन बना लिया है. इसमें एक तरफ सपा दिखाई दे रही है तो दूसरी तरफ बसपा है. दोनों की तरफ से हिन्दुओं के वोटों का ध्रुवीकरण करने के लिए ब्राह्मण वोट साधने की कोशिश की जाने लगी है. इस कोशिश में एक तरफ मूर्ति बनाने का लालच फेंक दिया गया है.



इस लालच के सन्दर्भ को अभी हाल के विकास दुबे एनकाउन्टर मामले से जोड़ा जा सकता है. विगत दिनों कई पुलिस कर्मियों की हत्या करके फरार हुए कुख्यात अपराधी विकास दुबे की बड़े ही नाटकीय अंदाज में गिरफ़्तारी (कुछ लोग इसे उसका आत्मसमर्पण भी कहते हैं) के बाद मध्य प्रदेश से उत्तर प्रदेश लाते समय गाडी के पलटने, उसके भागने के चलते पुलिस वालों के साथ हुई कार्यवाही में उसका एनकाउन्टर हो गया. इसके बाद प्रदेश भर के बहुत से ब्राह्मण संगठनों, व्यक्तियों ने हंगामा काट दिया. ऐसा लगा जैसे ब्राह्मण वर्ग का कोई बहुत बड़ा नाम समाप्त हो गया हो. ऐसा लगा जैसे प्रदेश का कोई प्रथम पूज्य व्यक्तित्व सदा-सदा के लिए लोप हो गया हो. इसी का लाभ लेते हुए सपा, बसपा ने अपने कार्ड फेंटने शुरू कर दिए हैं.

यहाँ ध्यान रखने वाली बात ये है कि ब्राह्मणों के नाम पर हिन्दू वोटों को चुग्गा फेंकने वाले एक दल ने किसी समय में तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार, जैसा सम्मानजनक नारा दिया था. इसी में जुड़े दूसरे दल ने कारसेवकों का स्वागत बन्दूक की गोलियों से किया था. इसके बारे में डेढ़ दशक से अधिक समय बाद भी जब इस दल के मुखिया से सवाल किया गया तो उनका कहना था कि वे किसी भी कीमत पर मुसलमानों का विश्वास नहीं खोना चाहते थे. सोचने वाली बात है कि एक तरफ तिलक, तराजू और तलवार को चार जूते लगाये जाने की बात हो रही हो, दूसरी तरफ ब्राह्मणों को साधने की बात हो रही है. इसी तरह एक दल ने मुसलमानों का विश्वास नहीं खोना चाहा था मगर अब वही दल हिन्दुओं का विश्वास जीतना चाहता है. यहाँ हिन्दुओं को सोचना होगा कि उनके लिए ये दल कैसा और क्या काम करेंगे? बाकी सत्य तो सामने आ ही जाना है.

.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

09 अगस्त 2020

कहीं फिर नारा न लगाना पड़ जाये

एक बात गाँठ बाँध लो, जहाँ बाँध पाओ. चुटिया में, धोती में या कहीं और. यदि वे खुलकर कह रहे हैं कि मंदिर गिरा देंगे तो इसके निहितार्थ समझो.


वे कह रह तो मतलब है कि करने की दम रख रहे, करने को अपने लोगों को एकजुट होने का आव्हान कर रहे और तुम सब क्या कर रहे

तुम सब किसी न किसी का इंतजार करने में लगे हो. चाहे वो आडवाणी जी हों, कल्याण सिंह हों, न्यायालय हो, मोदी-योगी हों. तुम्हारे करे-बूते कुछ नहीं.

ध्यान रखना यदि तुम सबकी इसी अति-सक्रियता में प्रदेश में सरकार बदल गई तो... तो फिर नारा लगाना,
रामलला हम आयेंगे, मंदिर वहीं बनायेंगे.


.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

06 अगस्त 2020

राम हमारे आराध्य हैं, वे हाथ पकड़ें या हम, क्या चिंता

इस पोस्ट से अपने आपको वे संदर्भित करें जो किसी न किसी तरह से खुद को राजनीति में या राजनैतिक विचारों से जुड़ा मानते हैं.



ये चित्र कल, शिला पूजन के बाद से लगातार चर्चा में है. रामभक्तों को इस चित्र से कोई समस्या नहीं. समस्या उन्हें है जिनके आराध्य राम नहीं बल्कि 'रासो' नामधारी हैं (ये रासो काव्य नहीं, प्राचीन हिन्दी काव्य का). इस चित्र के दो पहलू हैं. एक में माना जा सकता है कि मोदी जी श्रीराम का हाथ पकड़ मंदिर की तरफ ले जा रहे हैं. यदि यही है तो इसमें बुरा क्या है? हम सभी सनातनी मानते हैं कि बालरूप भगवान का रूप है फिर बालरूप भगवान का हाथ पकड़ने में क्या समस्या? हर माँ-बाप अपने बच्चे का हाथ पकड़ता है.

इसके साथ यह कि अयोध्या का यह मंदिर रामलला का मंदिर है, सियाराम का नहीं. गैर-रामभक्त इसका अर्थ क्या समझेंगे. उनके आराध्य बाई हैं, बाबा हैं. लला का मतलब बच्चा से ही लगाया जाता है. ऐसे में रामलला का मतलब राम के बालरूप से है. कोई अभिभावक अपने लला को अकेला कैसे छोड़ दे?

अब इसके उलट सत्य यह है कि रामलला मोदी जी का हाथ पकड़े हैं यह अंधे चाटुकारों को नहीं दिखेगा. उनको अपनी जीभ दिखती है और उनकी चाटने वाली जगह, सो चाटते रहते हैं आँखें बंद किये. रामलला मोदी जी का हाथ पकड़ें मंदिर की तरफ जा रहे हैं तो गलत क्या है? भगवान ही है जो हमारा हाथ पकड़ राह दिखाता है. चाटुकारों के बाप ने ताला खुलवाया तो था फिर क्या हुआ, रामलला टेंट में आ गए. अब उनको लगा कि मोदी जी को राह दिखाई जाये तो रामलला खुद आये और मोदी जी का हाथ पकड़ मंदिर तक ले जा रहे हैं.

अंतिम बात, रामभक्तों के अलावा बाकी लोगों के आराध्य श्रीराम नहीं हैं तो फिर उनको काहे चिनचिनी मची है कि कौन किसका हाथ पकड़ें है. तुम लोग अपने आराध्यों का पकड़ें रहो, हाथ. हम अपने आराध्य का पकड़ें हैं, हाथ या उनको अपना हाथ पकड़ाए हैं.

तुम गैर-रामभक्तो अपनी चिनचिनी वहीं मिटाओ, यहाँ कोशिश करोगे तो मुँह पर खाओगे... एक लड्डू कल के शिलापूजन का.... खाते जाओ बे....!!

.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

05 अगस्त 2020

वर्षों की तपस्या का सुफल प्राप्त हुआ

आज, 05 अगस्त 2020, एक ऐतिहासिक तिथि. एक ऐसी तिथि जिस दिन वर्षों पुराना सपना सच हुआ. यह सपना एक हमारी आँखों ने नहीं बल्कि करोड़ों-करोड़ों आँखों ने देखा था. अनेक जाने-अनजाने लोगों ने अपनी ज़िन्दगी खपा दी, अपने प्राण गँवा दिए. जी हाँ, श्री राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण ऐसा ही सपना रहा है. आज प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा शिला पूजन किया गया. अयोध्या में श्री राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया का शुभारम्भ हुआ. 






हर्षोल्लास, गर्व के इस क्षण को दीपोत्सव के साथ मनाया गया, अनुभूत किया गया. आज बस इतना ही. 












जय श्री राम

.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

21 जुलाई 2020

रामलला हम आ रहे, अबकी मंदिर ही बना रहे

इधर लगातार खबरें आ रही हैं कि पाँच अगस्त को अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की आधारशिला रखी जानी है. इस खबर में कितनी सत्यता है, कितनी नहीं ये तो खबर प्रसारित करने वाले जानें मगर दिल को बहुत शांति मिली इस खबर के बाद. पिछले कई दशकों में अपने ही देश में अपने ही आराध्य को लेकर जिस तरह की जलालत झेलनी पड़ी है, वह असहनीय रही. इस खबर के बाद याद आ रहा है वह दौर जबकि किसी भी व्यक्ति के लिए अपना कैरियर बनाने का समय होता है. उस दौर में हमारे समय के लोगों को एक तरफ आरक्षण सम्बन्धी कानून की मार से जूझना पड़ा साथ में अपने मर्यादा पुरुषोत्तम की मर्यादा को बचाने के लिए लड़ना पड़ा.



उन दिनों को याद करते हुए आँखों में बार-बार नमी आ जाती है जबकि उन दिनों के अपने मित्रों के, अपने कार्यों को याद करते हैं. ये ईश्वर का आशीर्वाद कहा जायेगा कि हम लोग श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण देखने के लिए जीवित हैं, बहुत से कारसेवक ऐसे हैं जो किसी और के नेत्रों से इस दृश्य को देख रहे होंगे. उन दिनों जैसे जूनून सिर पर हावी था. कारसेवकों की सूची बनानी हो, लोगों को अयोध्या के सम्बन्ध में जागरूक करना हो, श्रीराम जन्मभूमि के बारे में जानकारी देना हो सब ऐसे होता था जैसे ये जीवन के लिए अनिवार्य हो. ऐसा नहीं कि सभी साथी इसी में अपने आपको झोंक दिए हों मगर कुछ साथी ऐसे थे जिनके लिए यही एकमात्र काम था. न भविष्य की चिंता, न कैरियर की चिंता, न नौकरी की चिंता बस दिमाग में एक ही बात रहती कि कैसे भी अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि का सपना सच करवाना है.

हमारे हॉस्टल के बहुत से साथियों ने अपना सक्रिय योगदान इसमें दिया. बहुत से लोग दिन-रात एक करके इसी में लगे हुए थे. छोटे-छोटे ग्रुप बनकर सपने को सच करवाने के लिए लगे हुए थे. उस समय बस एक सपना सच हुआ कि एक विवादित ढाँचा गिरा. उसके बाद सपनों भरी आँखों ने और अधिक सपने सजा लिए. अबकी उन सपनों में मंदिर का निर्माण था. सपने समय के साथ सच होते हैं, ऐसा सुना था मगर आज देख लिया. तमाम कानूनी दांवपेंच, अवरोध दूर होते रहे और अब खबर आने लगी श्रीराम मंदिर निर्माण की. इन्हीं आँखों ने विवादित ढाँचा गिरते देखा था, यही आँखें श्रीराम मंदिर निर्माण भी देखेंगी.

जय श्रीराम


.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

05 फ़रवरी 2020

श्रीराम मंदिर निर्माण हेतु ट्रस्ट की घोषणा


रामजन्मभूमि मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के पश्चात् सभी की दृष्टि राममंदिर ट्रस्ट निर्माण की ओर लगी हुई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर ट्रस्ट बनाने की घोषणा की। इस ट्रस्ट को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के नाम से जाना जायेगा। गृहमंत्री अमित शाह ने बाद में बताया कि इस ट्रस्ट में 15 ट्रस्टी होंगे जिसमें एक दलित समाज का सदस्य होगा। केंद्र सरकार ने ट्रस्ट में प्रयागराज के ज्योतिष पीठाधीश्वर स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती को शामिल किया गया है। इसके अलावा ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़े को भी स्थान दिया गया है, लेकिन अखाड़े के महंत दिनेंद्र दास को ट्रस्ट की मीटिंग में वोटिंग का अधिकार नहीं होगा।


ये होंगे ट्रस्टी

1. के पाराशरण:
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील के. परासरन ट्रस्ट के अध्यक्ष होंगे। उन्होंने रामलला विराजमान की ओर से अयोध्या मामले में लंबे समय तक पैरवी की। 92 वर्षीय परासन ने सुप्रीम कोर्ट में खड़े होकर बहस की जबकि उन्हें कुर्सी पर बैठने अनुमति दी गई थी। वह रामसेतु समुद्रम परियोजना पर भी मुकदमा लड़ चुके हैं। उन्हें पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। सबरीमाला मामले में भगवान अयप्पा के वकील रहे परासरन को भारतीय इतिहास, वेद पुराण और धर्म के साथ ही संविधान का व्यापक ज्ञान है। राम मंदिर मामले के दौरान उन्होंने स्कंध पुराण के श्लोकों का जिक्र करके राम मंदिर का अस्तित्व साबित करने की कोशिश की। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी सरकार में अटॉर्नी जनरल रहे।

2. जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वतीजी महाराज (प्रयागराज):
बद्रीनाथ स्थित ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य। हालांकि, इनके शंकराचार्य बनाए जाने पर विवाद भी रहा। ज्योतिष मठ की शंकराचार्य की पदवी को लेकर द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने हाईकोर्ट में केस दाखिल किया था।

3. जगतगुरु मध्वाचार्य स्वामी विश्व प्रसन्नतीर्थ जी महाराज:
कर्नाटक के उडुपी स्थित पेजावर मठ के 33वें पीठाधीश्वर हैं। दिसंबर 2019 में पेजावर मठ के पीठाधीश्वर स्वामी विश्वेशतीर्थ के निधन के बाद पदवी संभाली।

4. युगपुरुष परमानंद जी महाराज:
अखंड आश्रम हरिद्वार के प्रमुख। वेदांत पर 150 से ज्यादा किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। इन्होंने साल 2000 में संयुक्त राष्ट्र में आध्यात्मिक नेताओं के शिखर सम्मेलन को संबोधित किया था।

5. स्वामी गोविंद देव गिरि जी महाराज:
महाराष्ट्र के अहमद नगर में 1950 में जन्म हुआ। रामायण, श्रीमद्भगवद्गीता, महाभारत और अन्य पौराणिक ग्रंथों का देश-विदेश में प्रवचन करते हैं। स्वामी गोविंद देव महाराष्ट्र के विख्यात आध्यात्मिक गुरु पांडुरंग शास्त्री अठावले के शिष्य हैं।

6. विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्रा:
अयोध्या राजपरिवार के वंशज। रामायण मेला संरक्षक समिति के सदस्य और समाजसेवी। 2009 में बसपा के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा, हारे। इसके बाद कभी राजनीति में नहीं आए।

7. डॉ. अनिल मिश्र, होम्पयोपैथिक डॉक्टर:
मूलरूप से अंबेडकरनगर निवासी अनिल अयोध्या के प्रसिद्ध होम्योपैथी डॉक्टर हैं। वे होम्योपैथी मेडिसिन बोर्ड के रजिस्ट्रार हैं। मिश्रा ने 1992 में राम मंदिर आंदोलन में पूर्व सांसद विनय कटियार के साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अभी संघ के अवध प्रांत के प्रांत कार्यवाह भी हैं।

8. श्री कामेश्वर चौपाल, पटना (एससी सदस्य):
संघ ने कामेश्वर को पहले कारसेवक का दर्जा दिया है। उन्होंने 1989 में राम मंदिर में शिलान्यास की पहली ईंट रखी थी। राम मंदिर आंदोलन में सक्रिय भूमिका और दलित होने के नाते उन्हें यह मौका दिया गया। 1991 में रामविलास पासवान के खिलाफ लोकसभा चुनाव लड़ा।

9. बोर्ड ऑफ ट्रस्टी द्वारा नामित एक ट्रस्टी, जो हिंदू धर्म का हो।

10. बोर्ड ऑफ ट्रस्टी द्वारा नामित एक ट्रस्टी, जो हिंदू धर्म का हो।

11. महंत दिनेंद्र दास:
अयोध्या के निर्मोही अखाड़े के अयोध्या बैठक के प्रमुख। ट्रस्ट की बैठकों में उन्हें वोटिंग का अधिकार नहीं होगा।

12. केंद्र सरकार द्वारा नामित एक प्रतिनिधि, जो हिंदू धर्म का होगा और केंद्र सरकार के अंतर्गत भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) का अफसर होगा। यह व्यक्ति भारत सरकार के संयुक्त सचिव के पद से नीचे नहीं होगा। यह एक पदेन सदस्य होगा।

13. राज्य सरकार द्वारा नामित एक प्रतिनिधि, जो हिंदू धर्म का होगा और उत्तर प्रदेश सरकार के अंतर्गत भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) का अफसर होगा। यह व्यक्ति राज्य सरकार के सचिव के पद से नीचे नहीं होगा। यह एक पदेन सदस्य होगा।

14. अयोध्या जिले के कलेक्टर पदेन ट्रस्टी होंगे। वे हिंदू धर्म को मानने वाले होंगे। अगर किसी कारण से मौजूदा कलेक्टर हिंदू धर्म के नहीं हैं, तो अयोध्या के एडिशनल कलेक्टर (हिंदू धर्म) पदेन सदस्य होंगे।

15. राम मंदिर विकास और प्रशासन से जुड़े मामलों के चेयरमैन की नियुक्ति ट्रस्टियों का बोर्ड करेगा। उनका हिंदू होना जरूरी है।

जो ट्रस्टी हैं उनकी ओर से (क्रम दो से आठ तक के) 15 दिन में सहमति मिल जानी चाहिए। ट्रस्टी नंबर एक इस दौरान ट्रस्ट स्थापित कर अपनी सहमति दे चुका होगा। उसे सीरियल नंबर दो से सीरियल नंबर आठ तक के सदस्यों की तरफ से ट्रस्ट बनने के 15 दिन के अंदर सहमति ले लेनी होगी।

10 जनवरी 2019

अदालती पचड़े में फँसा श्रीराम मंदिर मामला


श्रीराम जन्मभूमि मालिकाना हक़ से सम्बंधित मामला विगत कई वर्षों से भारतीय अदालती प्रक्रिया के चक्कर में फँसा हुआ है. किसी भारतीय फिल्म के एक संवाद, तारीख पे तारीख की भेंट चढ़ता हुआ उच्च न्यायालय पर एक निर्णय पर पहुँचा था लेकिन वहाँ भी गंगा-जमुनी तहजीब की कहानी कहने वालों को वह निर्णय हजम नहीं हुआ. उसके बाद मामला उच्चतम न्यायालय में आ गया. यहाँ भी अदालती संस्कार ज्यों के त्यों देखने को मिले. अभी तक की कार्यवाही में महज इतना तय हो सका था कि उस मामले की सुनवाई कबसे करनी है. सोचने वाली बात है कि अभी यही तय हो पाया है कि सुनवाई की तारीख क्या होगी.


बहरहाल, तारीख पे तारीख गुजरते-गुजरते 10 जनवरी 2019 सर्वोच्च न्यायालय में श्रीराम जन्मभूमि अधिकार का मामला उस जगह आ गया जहाँ सुनवाई होनी थी. यहाँ आने के पहले विगत दिवस के चंद सेकेण्ड बहुत प्रभावी रहे जिनकी कार्यवाही के बाद मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता में पाँच सदस्यीय पीठ का गठन किया गया. इस संवैधानिक पीठ का बनाया जाना अदालती गंभीरता का सूचक जान पड़ा था. लग रहा था कि अब सुनवाई टाली न जाएगी वरन किसी दिशा की तरफ जाएगी. अबकी चर्चा के दौरान मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने कहा कि बेंच में शामिल जस्टिस यू०यू० ललित 1994 में कल्याण सिंह की ओर से अदालत में पेश हुए थे. इस तरह का मामला उठाने के बाद जस्टिस यू०यू० ललित ने खुद को इस मामले से अलग कर लिया है. राजीव धवन द्वारा इसके साथ-साथ पीठ के तीन सदस्यीय से पाँच सदस्यीय किये जाने पर भी सवाल उठाया.

आज जिस तरह का प्रकरण उठाकर मामले को फिर लटकाया गया है उससे साफ़ ज़ाहिर है कि न्यायालय इस मामले को सुलझाने के मूड में दिख नहीं रहा है. हालाँकि ऐसे संकेत पहले भी दिए जा चुके थे जबकि न्याय के मंदिर में कहा जा चुका था कि श्रीराम मंदिर निर्माण का प्रकरण उनकी प्राथमिकता में नहीं है. ऐसा इसलिए क्योंकि मुस्लिम पक्ष के वकील द्वारा उठाया गया मुद्दा ऐसा नहीं था जिसके लिए सुनवाई की तारीख आगे सरकाई जाती. इस बिंदु पर आकर न केवल तारीख टाली गई है वरन अब संवैधानिक पीठ का पुनर्गठन किया जायेगा. न्यायमूर्ति ललित ने स्वयं को इस पीठ से अलग कर लिया है. ऐसे में आवश्यक नहीं कि अगली तारीख पर सुनवाई हो ही जाये क्योंकि मुस्लिम पक्षकार मामले को लटकाने में जितना महत्त्व दे रहे हैं, उतना ही कांग्रेस की तरफ से भी इसे हवा दी जा रही है. देखा जाये तो जनवरी 2019 तक इस मामले को सरकाने की कांग्रेस से सम्बंधित एक वकील साहब की मंशा तो पूरी हो ही गई है.

यदि निष्पक्ष रूप से देखा जाये तो श्रीराम का सवाल महज हिन्दुओं की आस्था का सवाल नहीं वरन इस देश की संस्कृति, परम्परा का भी सवाल है. देखा जाये तो वे भारतीयता के प्रतीक हैं, भारतीय संस्कृति के मर्यादा शिखर-पुरुष हैं. विगत काफी समय से न केवल हिन्दू पक्षकारों की तरफ से वरन मुस्लिम समुदाय की तरफ से तथा बुद्धिजीवियों, राजनेताओं, कलाकारों सहित अन्य क्षेत्रों के व्यक्तित्वों की तरफ से भी बात उठाई जा रही है कि इस मुद्दे को हिन्दू-मुस्लिम का मुद्दा न बनाया जाये. बहुत से नामचीन लोगों द्वारा अपील की जा रही है कि मुस्लिम इसे देश की सांस्कृतिक एकता के लिए श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए हिन्दुओं के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर खड़े हों. इसके बाद भी मुस्लिम पक्ष से कोई सकारात्मक पहल नहीं हो रही है. विद्रूपता इस बात की है कि आये दिन कोई न कोई इस मामले में अनर्गल बयान देकर मुद्दे को विवादित बनाने की चेष्टा करने लगता है. समझने की चेष्टा करनी चाहिए कि यह हिन्दुओं की सहनशीलता का परिचायक है कि वे ख़ामोशी से अदालत के निर्णय का इंतजार कर रहे हैं. इसके बाद भी हिन्दुओं को ही सांप्रदायिक बताया जाने लगता है.

अब अगली तारीख 29 जनवरी निर्धारित की गई है. ऐसे में विचारणीय यह है कि जिस तरह से मुस्लिम पक्षकार वकील की तरफ से न्यायमूर्ति पर महज इसलिए सवाल उठाया गया कि वे किसी समय भाजपा के कल्याण सिंह की तरफ से अदालत में आये थे, क्या न्यायमूर्ति रंजन गोगोई पर उनके पिता का कांग्रेसी मुख्यमंत्री होने के कारण सवाल नहीं उठाया जा सकता? फ़िलहाल अब मामला 29 जनवरी तक सरका दिया गया है, उस दिन का इंतजार है.

06 दिसंबर 2018

सांस्कृतिक विरासत के प्रति जनभावना

कुछ दिन पहले अयोध्या की गलियों में गूँज रहे जय श्रीराम के नारों में जोश वैसा ही था जैसा कि उस दिन था. उस दिन गूँज रहे नारों में अपने सांस्कृतिक प्रतीकों को मुक्त करवाए जाने का आह्वान किया जा रहा था. इन सबके बाद भी उस दिन उन्माद नहीं था. उस दिन सिर्फ भीड़ नहीं थी. उस दिन आक्रोश नहीं था. ऐसा इसलिए क्योंकि उस दिन किसी तरह की अराजकता नहीं थी. विशाल जनसमूह बिना किसी नियंत्रण के स्वतः नियंत्रित था. ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है कि इतनी बड़ा जनसैलाब स्वतः नियंत्रित बना रहे. इसीलिए उस दिन के जनसमुदाय को भीड़ नहीं माना जा सकता क्योंकि भीड़ तो अनियंत्रित हो जाती है. उस दिन आक्रोश भी नहीं था लोगों के नारों में, उद्घोष में क्योंकि किसी तरह की हिंसा वहां नहीं थी. किसी तरह की हिंसा करने का विचार भी मन में एक पल को नहीं पनपा था. उस दिन जनसमूह था, जोश था, नारे थे और इन सबके साथ थी भक्ति, श्रद्धा, सम्मान. लोगों के दिल में थी सांस्कृतिक भावना. सारा जनसमुदाय अपने मन में अपने आराध्य के प्रति श्रद्धाभाव लिए था.


एकसाथ हजारों-हजार लोगों का एकत्र हो जाना. बिना किसी नेतृत्व के, बिना किसी सञ्चालन के भी सबके सब भगवा ध्वज के निर्देशन में थे. सबके सब स्व-भाव से संचालित चल रहे थे. बरसों-बरस से अपने अन्य आराध्यों के विरुद्ध चल रही साजिश को देखने के बाद का जागरण था उस दिन. बरसों-बरस से एक समुदाय विशेष के प्रति चली आ रही तुष्टिकरण की नीति के खिलाफ एक आवाज़ थी उस दिन. उस दिन की भीड़ दो वर्ष पहले शहीद हुए भाइयों के सम्मान में भी थी. वही जगह थी, वही गलियाँ थीं, वही रास्ते थे मगर वे कुछ लोग नहीं थे, जो तुष्टिकरण के लिए, एक मजहब विशेष के विश्वास को पूरा करने के लिए चली गोलियों का शिकार हो गए थे. उस दिन एकत्र भीड़ में दो साल पहले की गोलियों के खिलाफ आक्रोश भी था. दो साल पहले उपस्थित जनसमुदाय ने किसी सरकार के खिलाफ हिंसात्मक आन्दोलन न किया था मगर तुष्टिकरण के लिए गोलियों का सहारा लिया गया था. दो साल बाद एकत्र जनसैलाब किसी सरकार के खिलाफ कोई उपद्रव नहीं कर रहा था. उस जनसमुदाय ने किसी हिंसा का सहारा नहीं लिया. उस भक्ति-भाव से भरे जनमानस ने किसी समुदाय विशेष के प्रति हिंसा का भाव नहीं दिखाया. न उस दिन दिखाई दिया था, न तब जबकि कारसेवक गोलियों का शिकार हुए थे. वे सब उन्मुक्त भाव से सनातन काल से चले आ रहे अपने सांस्कृतिक प्रतीक से दासता से मुक्ति चाहते थे. सरकार से बारम्बार अपील थी, सांस्कृतिक प्रतीकों को गुलामी के निशानों से मुक्त किये जाने की. उनके मन में हिंसा नहीं, नफरत नहीं वरन खुद को मुक्त कर लेने का भाव था. अपने आराध्य को दूसरे के प्रतीक चिन्ह से बाहर निकाल लाने का बोध था.


जोश, जनभावना, जयघोष का संगठित स्वरूप उस दिन दिखाई दिया. भगवा ध्वज के केसरिया रंग में सराबोर, जय श्री राम के उद्घोष से धरती-आकाश को एक करते हुए जब धूल का गुबार हटा तो सामने सबकुछ साफ़ था. सांस्कृतिक विरासत पर कब्ज़ा किये बैठी प्रतिच्छाया कहीं दूर-दूर तक नहीं थी. जनसैलाब जिस नियंत्रित रूप से आगे बढ़ा, उसी नियंत्रित रूप से वापस आने लगा. सांस्कृतिक प्रतीकों की मुक्ति का जयघोष अपना असर दिखा चुका था. पावन सरयू नदी की लहरें उन्मुक्तता से वैसी ही हिलोरें मारती नजर आने लगीं. उसने स्वयं में अपना पुराना स्वरूप अपने आसपास निर्मित होते देखा. विध्वंस पश्चात् सनातन मानक पर निर्मित ढाँचा अपने आसपास न देखकर पावन किनारों ने अपने क्रीड़ास्थल को पुनः-पुनः उसी सनातनकालीन स्थिति में महसूस किया. जनसमुदाय के आराध्य, पावन नदी में कभी किल्लोल करने वाले उसके बाल राम, कभी अयोध्या की गलियों, मैदानों में विचरण करने वाले उसके किशोर राम, वनवास के बाद नगरवासियों के ह्रदय में स्थापित उसके राजा राम स्वतंत्र आकाश में अपनी सत्ता का विस्तार पा चुके थे. राजनैतिक दंभ पाले लोग और तुष्टिकरण करते लोगों के लिए भले ही राम लला खुले आसमान के नीचे टेंट में विराजमान हो गए हों मगर अब वे किसी गुलामी के प्रतीक की तालाबंदी में नहीं थे. गुलामी के, विध्वंस के, विवाद के ढाँचे से बाहर निकल वे अब अपने देश के, अपने भक्तों के, अपने मन के प्रतीक में विराजित थे. जो राम जन-जन को सहारा देते हों, रोटी, कपड़ा, मकान का प्रबंध करते हों वे स्वतः ही किसी दिन जनमानस को जागृत करेंगे और पुनः श्रद्धाभाव लिए एकत्र होने वाला जनसमुदाय सांस्कृतिक प्रतीक के निर्माण में जुट जायेगा. 

04 दिसंबर 2018

धर्म सभा से उपजी जनभावनाओं के सहारे...


याचना नहीं अब रण होगा, मंदिर वहीं बनायेंगे जैसे जोशीले नारों के बीच संपन्न संतों की धर्म सभा से राम जन्मभूमि मुद्दे पर फिर राजनैतिक करवट के आसार दिखाई दिए. विश्व हिन्दू परिषद्, शिवसेना सहित अन्य हिंदूवादी संगठनों के कार्यकर्ताओं की भारी भीड़ सहित संतों का जमावड़ा अयोध्या मुद्दे पर राजनैतिक दलों में हलचल पैदा कर गया. धर्म सभा के नाम पर हुए इस कार्यक्रम से एक तरफ राम मंदिर निर्माण के प्रति सकारात्मक भाव दिखाई दिया तो दूसरी तरफ इस आयोजन को विशुद्ध राजनीति बताने वालों की भी कमी नहीं थी. यहाँ स्मरण रखना होगा कि सन 2010 में प्रदेश उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने निर्णय देते हुए अयोध्या स्थित विवादित भूमि को राम जन्मभूमि घोषित किया था. न्यायालय की पीठ ने बहुमत से निर्णय दिया था कि विवादित भूमि जिसे राम जन्मभूमि माना जाता रहा है, उसे हिन्दू गुटों को दे दिया जाए और इस स्थल से रामलला की प्रतिमा को हटाया नहीं जाए. चूँकि इस भूमि के कुछ भाग पर मुसलमान नमाज पढ़ने के कारण एक तिहाई हिस्सा मुसलमान गुटों दे दिया जाए. इस निर्णय के पक्ष में हिन्दू-मुस्लिम, दोनों ही नहीं दिखे और निर्णय को अस्वीकार करते हुए दोनों गुट सर्वोच्च न्यायालय चले गए.


सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के ठीक पहले शिया वक्फ बोर्ड के याचिका दायर कर खुद को भी पक्षकार मानने का दावा किया. इस पूरे प्रकरण में भाजपा कहीं नहीं दिखाई देती है. इसके बाद भी सत्य यही है कि अयोध्या मुद्दे का, राम जन्मभूमि विवाद का सर्वाधिक लाभ भाजपा द्वारा उठाया गया. सन 1990 में लालकृष्ण आडवाणी द्वारा की गई कार सेवा को छोड़ दिया जाये तो किसी भी समय भाजपा ने खुलकर अयोध्या मुद्दे पर अपना कदम नहीं उठाया है. भाजपा भली-भांति जानती-समझती है कि 1992 के बाबरी ढाँचे के ध्वंस के बाद और फिर गुजरात में गोधरा काण्ड की प्रतिक्रिया से उपजे दंगों के पश्चात् अधिसंख्यक मुसलमानों ने भाजपा को अपना शत्रु ही समझ लिया है. समाज को हिन्दू, मुस्लिम में बाँटने का आरोप उसके ऊपर लगातार लगाया जाता रहा है. देश भर में कहीं भी संपन्न होने वाले चुनावों के समय उसी को सांप्रदायिक घोषित किया जाने लगता है. इन स्थितियों के बाद भी विगत लोकसभा में बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता प्राप्त कर लेने पर भाजपा स्वयं को बड़े संतुलित रूप में जनमानस में स्थापित करने के विचार में है. ऐसे में राम जन्मभूमि मुद्दे पर उसके द्वारा अत्यंत संयम से काम लिया जा रहा है.

आज़ादी के बाद से ही विवादित रही इस भूमि पर लम्बी चुप्पी के बाद उस समय हलचल आरम्भ हुई जबकि सन 1984 में विश्व हिंदू परिषद ने विवादित ढांचे का ताला खोलने के अभियान के साथ-साथ राम जन्मभूमि को स्वतंत्र कराने और विशाल मंदिर निर्माण हेतु भी अभियान शुरू किया. इसके लिए उसके द्वारा एक समिति का भी गठन किया गया. इस अभियान की तीव्रता को देखते हुए फरवरी 1986 में फैजाबाद के तत्कालीन जिला न्यायाधीश ने विवादित स्थल पर हिन्दुओं को पूजा करने की अनुमति प्रदान की. पूजा करने की अनुमति, ताला खोले जाने की प्रक्रिया से नाराज मुस्लिमों ने बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन किया. इसके बाद सब कुछ शांति से चल रहा था कि सन 1989 इस विषय को आंदोलित करने आ गया. नवंबर में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने विवादित ढांचे के नजदीक शिलान्यास की इजाजत दी. मंदिर के सम्बन्ध में कांग्रेस सरकार का उक्त कदम मुस्लिमों के साथ-साथ हिन्दू वोटों पर भी सेंधमारी करना थी. उस समय यह एहसास भाजपा को नहीं रहा होगा कि राम जन्मभूमि के नाम पर एकाएक यह मुद्दा उसके हाथ लग जायेगा. सन 1992 में राम जन्मभूमि आन्दोलन के दौरान विवादित ढाँचे को गिराए जाने सम्बन्धी कोई नीति भाजपा की तरफ से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सामने नहीं आई थी. दरअसल इस प्रतिक्रिया को जय श्री राम के उद्घोष के साथ जन्मा उत्साह तथा सन 1990 में हुए गोलीबारी में कारसेवकों की मृत्यु से उपजा आक्रोश कहा जा सकता है, जिसे विश्व हिन्दू परिषद् और शिवसेना जैसे संगठनों के नौजवानों ने विवादित ढाँचे को गिराकर समाप्त किया.

सन 1984 के खुले नरसंहार के बाद भी कांग्रेस को उतनी जलालत नहीं झेलनी पड़ी जितनी कि भाजपा आज तक सहती आ रही है. ऐसे में जबकि केंद्र की सत्ता उसके पास है, प्रदेश में प्रचंड बहुमत के साथ उसकी वापसी हुई है, तब वह ऐसा कोई भी कदम नहीं उठाना चाहती है जो उसके सबका साथ, सबका विकास की अवधारणा को कमजोर करे. इसी कारण भाजपा का लगातार प्रयास मुस्लिम मतदाताओं को अपनी तरफ आकर्षित करने का रहा है. उनकी दृष्टि में खुद को उदार, सहयोगी की भूमिका में दिखने का रहा है. धर्म सभा के द्वारा भले ही विश्व हिन्दू परिषद् ने, शिवसेना ने अपनी ताकत का एहसास कराने का प्रयास किया है मगर इस ताकत, इस भीड़ के द्वारा भाजपा निश्चित ही राजनैतिक समीकरण फिट बैठाना चाहेगी. विगत सालों में गैर-भाजपाई दलों ने हिन्दुओं को आकर्षित करने का प्रयास किया है. उनको भी समझ आ रहा है कि एकमात्र मुस्लिम वोटों के द्वारा सत्ता हासिल नहीं की जा सकती है. इसी तरह भाजपा भी इस तथ्य को समझती है कि उसके लिए सत्ता का रास्ता हिन्दू वोटों से ही निकलता है. 

संभव है कि भाजपा का थिंक टैंक इसे समझ रहा हो और वह इसकी भरपाई धार्मिक भावनाओं के द्वारा करना चाहता हो. ऐसे में विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा अयोध्या में बुलाई गई धर्म सभा और आगामी माह में संतों की होने वाली धर्म संसद को भाजपा के लिए संजीवनी माना जा सकता है. जनमानस की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए एससी/एसटी एक्ट में संशोधन कर सदन में विधेयक लाने वाली केंद्र सरकार राम मंदिर निर्माण पर भी विधेयक की तैयारी कर सकती है. इसके पीछे भले ही वह अयोध्या में जुटी भीड़ को आधार बनाये क्योंकि इस भीड़ को सिर्फ हिन्दूवादी चेहरा नाम दिया गया. इस भीड़ में कोई जाति, कोई वर्ग अलग से अपना प्रतिनिधित्व करते दिखाई नहीं दे रहा था. विश्व हिन्दू परिषद् अपना काम कर चुकी है, धार्मिक मनोभावना रखने वाली जनता ने अपनी सशक्त और उत्साही उपस्थिति अयोध्या में दिखा दी है अब बाकी बचा हुआ काम केंद्र सरकार के रूप में भाजपा को करना है. लोकसभा चुनावों की आहट सुनाई दे रही है और भाजपा इसके पार्श्व से आती हिन्दू भावनाओं का शोर भी सुन रही होगी. 

29 अक्टूबर 2018

राम मंदिर, केंद्र सरकार और अदालत


अयोध्या फिर राजनीति का शिकार हुआ. राम मंदिर फिर अदालत के कारण एक अलग रंग में रँगा नजर आया. अदालत के एक आदेश के बाद इसकी सुनवाई अगले वर्ष तक के लिए सरक गई. इस आदेश के बाद भले ही केंद्र सरकार को राहत महसूस हुई हो मगर लाखों-करोड़ों श्रद्धालुओं में निराशा की लहर फ़ैल गई होगी. हालाँकि अदालत में आज सुनवाई किसी और मुद्दे के सन्दर्भ में होनी थी मगर आमजन में यही धारणा बना दी गई थी कि अदालत में राम मंदिर निर्माण पर फैसला होने वाला है. यहाँ सोचने-समझने वाली बात ये है कि सर्वोच्च न्यायालय को मंदिर निर्माण पर फैसला नहीं सुनाना है. अदालत का निर्णय मंदिर निर्माण से इतर अयोध्या में जमीन के स्वामित्व पर आना है. उच्चतम न्यायालय को उच्च न्यायालय के निर्णय के सन्दर्भ में अपना निर्णय देना है, जहाँ तय किया जायेगा कि सम्बंधित जमीन पर स्वामित्व किसका और कितना है.



06 दिसंबर 2017

सांस्कृतिक विरासत के प्रति जनभावना

उस दिन महज उन्माद नहीं था. उस दिन सिर्फ भीड़ नहीं थी. उस दिन आक्रोश नहीं था. यह इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि उन्माद अराजक हो जाता है. भीड़ अनियंत्रित हो जाती है. आक्रोश हिंसात्मक हो जाता है. उस दिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. ऐसा कुछ था भी नहीं. जनसमूह था. जोश था. नारे थे. तो इन सबके साथ थी भक्ति. लोगों के दिल में थी सांस्कृतिक भावना. सारा जनसमुदाय अपने मन में अपने आराध्य के प्रति श्रद्धाभाव लिए था. एकसाथ हजारों-हजार लोगों का एकत्र हो जाना. बिना किसी नेतृत्व के, बिना किसी सञ्चालन के भी सबके सब भगवा ध्वज के निर्देशन में थे. सबके सब स्व-भाव से संचालित चल रहे थे. बरसों-बरस से अपने अन्य आराध्यों के विरुद्ध चल रही साजिश को देखने के बाद का जागरण था उस दिन. बरसों-बरस से एक समुदाय विशेष के प्रति चली आ रही तुष्टिकरण की नीति के खिलाफ एक आवाज़ थी उस दिन. उस आवाज़ ने किसी सरकार के खिलाफ कोई उपद्रव नहीं किया. उस जनसमुदाय ने किसी हिंसा का सहारा नहीं लिया. उस भक्ति-भाव से भरे जनमानस ने किसी समुदाय विशेष के प्रति हिंसा का भाव नहीं दिखाया. वे सब उन्मुक्त भाव से सनातन काल से चले आ रहे अपने सांस्कृतिक प्रतीक से दासता का निशान मिटाना चाहते थे. उनके मन में हिंसा नहीं, नफरत नहीं वरन खुद को मुक्त कर लेने का भाव था. अपने आराध्य को दूसरे के प्रतीक चिन्ह से बाहर निकाल लाने का बोध था.


जोश, जनभावना, जयघोष का संगठित स्वरूप उस दिन दिखाई दिया. भगवा ध्वज के केसरिया रंग में सराबोर, जय श्री राम के उद्घोष से धरती-आकाश को एक करते हुए जब धूल का गुबार हटा तो सामने सबकुछ साफ़ था. सांस्कृतिक विरासत पर कब्ज़ा किये बैठी प्रतिच्छाया कहीं दूर-दूर तक नहीं थी. जनसैलाब जिस नियंत्रित रूप से आगे बढ़ा, उसी नियंत्रित रूप से वापस आने लगा. सांस्कृतिक प्रतीकों की मुक्ति का जयघोष अपना असर दिखा चुका था. पावन सरयू नदी की लहरें उन्मुक्तता से वैसी ही हिलोरें मारती नजर आने लगीं. उसने स्वयं में अपना पुराना स्वरूप अपने आसपास निर्मित होते देखा. विध्वंस पश्चात् सनातन मानक पर निर्मित ढाँचा अपने आसपास न देखकर पावन किनारों ने अपने क्रीड़ास्थल को पुनः-पुनः उसी सनातनकालीन स्थिति में महसूस किया. जनसमुदाय के आराध्य, पावन नदी में कभी किल्लोल करने वाले उसके बाल राम, कभी अयोध्या की गलियों, मैदानों में विचरण करने वाले उसके किशोर राम, वनवास के बाद नगरवासियों के ह्रदय में स्थापित उसके राजा राम स्वतंत्र आकाश में अपनी सत्ता का विस्तार पा चुके थे. गुलामी के, विध्वंस के, विवाद के ढाँचे से बाहर निकल वे अब अपने देश के, अपने भक्तों के, अपने मन के प्रतीक में विराजित थे.  


कितनी विडम्बना है इस देश के सांस्कृतिक प्रतीक चिन्हों की कि उन्हें अपने होने का सबूत देना पड़ता है. भगवान श्रीराम की जन्मभूमि उनकी अपनी होकर भी उनकी अपनी नहीं हो पा रही थी. सबूतों, गवाहों, बयानों, अदालतों के मानव-निर्मित सत्य वास्तविक सत्य को झुठलाने का कार्य करने में लगे थे. देश में रहकर, देश का दाना-पानी अपने उदर में प्रविष्ट करने वाले ही देश की सांस्कृतिक विरासत को नकारने का काम करने में लगे हैं. देश में जन्मे लोग ही सांस्कृतिक प्रतीकों की बात करने वालों पर गोलियाँ चलवा रहे हैं. देश के सांस्कृतिक पुरुष के समकक्ष विदेशी आक्रान्ता को खड़ा करने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है. जिन आक्रान्ताओं ने देश में विध्वंस, अत्याचार, हिंसा करने के अलावा और कुछ न किया उनकी तरफदारी करने वाले इसी देश के लोग दिख रहे हैं. समय उनकी भी कहानी लिखेगा जो सांस्कृतिक विरासतों को नकारने के नाम पर अपने ही अस्तित्व को नकारने में लगे हैं. किसी विशेष के लिए तुष्टिकरण के नाम पर वैमनष्यता फैलाये हुए हैं. इन सबके बीच दिन तो आते-जाते रहेंगे. विवादों के परिणाम भी जनसमुदाय के द्वारा निकाले जाते रहेंगे. आज नहीं तो कल सांस्कृतिक विरासत के चिन्ह अपनी भव्यता को प्राप्त कर ही लेंगे.