श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के दान और चढ़ावे की चोरी सम्बन्धी जो मामला सामने आया
है, उसे लेकर उन श्रद्धालुओं को,
उन हिन्दुओं को नैराश्य भाव के रसातल में
जाने से ख़ुद को बचाना होगा, जो
श्रीराम के प्रति, जन्मभूमि मंदिर
के प्रति गहरी आस्था रखते हैं. गम्भीरता से विचार करियेगा, कालखण्ड, परिस्थिति के बदलते ही मौकापरस्त लोग, स्वार्थी लोग तत्काल बदल जाते हैं. ऐसे में उनका बदलना कोई आश्चर्य की बात नहीं,
जिनके हाथों में मंदिर की सम्पूर्ण व्यवस्था
सौंपी गई. निश्चित ही उन सभी लोगों के लिए ये मामला कष्टप्रद है जिन्होंने निस्वार्थ
भाव से श्रीराम जन्मभूमि के लिए संघर्ष किया था, कष्ट सहे थे, अपना सर्वस्व न्योछावर किया था लेकिन उनको धैर्य नहीं
छोड़ना है, संयम नहीं खोना है,
आस्था से विलग नहीं होना है.
ये समय, ये मामला भारतीय स्वतंत्रता
आंदोलन जैसा प्रतीत हो रहा है. लाखों नौजवानों ने निस्वार्थ भाव से आज़ादी के लिए संघर्ष
किया; हजारों परिवारों ने अपना
सर्वस्व बलिदान कर दिया; जान की
परवाह किए बिना असंख्य लोग मौत को गले लगा गए और हमें आज़ादी दे गए. इसके बाद हुआ क्या?
कुछ विशेष लोग सत्ता पर बैठे; कुछ ख़ास लोगों के हाथ में अधिकार आए;
कुछ लोगों को ताक़त मिली और फिर शुरू हुआ
भ्रष्टाचार का खेल. आज़ादी के बाद मिली सत्ता ऐसे लोगों के लिए राजशाही का माध्यम बनी;
धन-वैभव संकलित करने का साधन बनी;
पीढ़ियों के लिए लाभ की विषय-वस्तु बनी.
इन लोगों ने युवाओं के संघर्ष को भुला दिया; अंग्रेजों से लड़ने वालों को विस्मृत कर दिया. ऐसा ही
कुछ श्रीराम जन्मभूमि मंदिर मामले में हो रहा है.
ध्यान रखो, भले लोगों ने राजनीति
से दूरी बनाई तो अपराधी, बाहुबली
इसमें घुसकर सरकार चलाने लगे. ऐसे ही यदि निस्वार्थ आस्थवान लोग श्रीराम जन्मभूमि मंदिर
से दूर हुए तो यहाँ भी भ्रष्टाचारी, म्लेच्छ सोच के लोग स्थापित हो जाएँगे. जैसे आज देश की हालत के लिए रोना रोया जाता
है, कल को श्रीराम जन्मभूमि मंदिर
के लिए रोया जाएगा.
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