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22 दिसंबर 2021

प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाना होगा

आए दिन हम लोग देखते हैं कि बहुत से लोग निराशा में, अवसाद में अपना जीवन व्यतीत कर रहे होते हैं। ऐसा लगता है जैसे उनके सामने जीवन का कोई लक्ष्य नहीं है। यह स्वाभाविक सी बात है कि कई बार मन के काम न होने पर, लक्ष्य की पूर्ति न होने पर अथवा लगातार असफलता मिलने से मन में निराशा के भाव उत्पन्न होने लगते हैं। निराशा के इस दौर से बाहर निकलने का काम भी मनुष्य के हाथ में है। दरअसल तमाम सारी भौतिकतावादी स्थितियों के पीछे भागने के कारण से इंसान ने खुश रहना, छोटी छोटी बात में खुशियां तलाशना बंद कर दिया। उसके लिए जीवन का उद्देश्य धनोपार्जन, परिवार का भरण पोषण, नौकरी करना आदि रह गया है। यदि देखा जाए तो जीवन में यह उद्देश्य बहुत छोटे हैं।


व्यक्तियों को चाहिए कि वे जीवन के इन बने बनाए कारणों से अलग प्रकृति के साथ अपना तारतम्य और सामंजस्य स्थापित करके देखें। प्रकृति बहुत सी बातों की शिक्षा देती है और परेशानी में भी आगे बढ़ने का रास्ता दिखाती है। वर्तमान में व्यक्ति की परेशानी का बहुत बड़ा कारण उसका प्रकृति से दूर हो जाना है। जरा-जरा से फ़्लैट हों या फिर बड़े-बड़े मकान, अब बहुत सी जगहों पर प्राकृतिक पौधों का होना कम दिखाई देता है। इसके पीछे मुख्य कारण प्रकृति के इस अंग की देखभाल करना, उसी सेवा करना है। अब व्यक्ति अपने घर में आये हुए किसी बाहरी व्यक्ति को पानी पिलाने से बचना चाहता है, ऐसे में वह पेड़-पौधों को कैसे पानी दे सकता है? इस तरह की स्वार्थपरक सोच के कारण ही व्यक्ति पल-पल प्रकृति से दूर होता जा रहा है। 


प्रकृति से दूरी व्यक्तियों में तनाव पैदा कर रही है। प्रकृति से दूर होने के कारण इंसान उसके विविध रूपों से परिचय प्राप्त नहीं कर पा रहा है। उसे प्रकृति के साथ तालमेल बिठाना खुद को कमतर समझने जैसा लगने लगा है। इंसान को प्रकृति के साथ अपने सम्बन्ध को, रिश्ते को समझना होगा। उसके विविध रूपों के साथ खुद को जोड़ना होगा। उसके मनोरम दृश्यों को आत्मसात करते हुए खुद को खुशहाली के रास्ते पर ले जाना होगा।

04 जून 2020

समाजोपयोगी हो सकती है यह व्यवस्था

अनलॉक के दौरान बाजार में भीड़ अब अपने पुराने रूप में आती दिख रही है. उरई में शाम पाँच बजे तक बाजार खोलने की अनुमति है. जैसा कि ऊपर से आदेश हैं, उसके अनुसार रात नौ बजे तक नागरिकों के आवागमन पर प्रतिबन्ध नहीं है. एक आवश्यक काम से शाम को सात बजे के बाद निकलना हुआ. उस समय बाजार पूरी तरह से बंद हो चुका था. इक्का-दुक्का दवाओं की दुकानें खुली हुईं थीं. दुकानें बंद करने के नियम का पालन था अथवा प्रशासन का भय कि छोटी-छोटी सी दुकानें भी बंद थीं. ठिलिया वाले भी नहीं दिखाई दे रहे थे. चाय-पान की गुमटियाँ भी बंद मिलीं. सुनसान रास्तों पर चंद वाहनों की लाइट थी, सड़क के खम्बों पर जगमगाती रौशनी थी और शांत सा माहौल. लगा नहीं कि उरई के उसी बाजार में हम चले जा रहे हैं, जहाँ रात को नौ-दस बजे तक बस शोर-शराबा बना रहता था. दुकानों का बंद होना होते-होते भी देर रात कर ली जाया करती थी. गाड़ियों का शोर, हॉर्न का अनावश्यक बजना, तेज रफ़्तार से लोगों को डरातीं बाइक्स तब उरई की सड़कों की पहचान बनी थीं.


अब जो स्थिति दिखाई दे रही है वह किसी छोटे से कसबे से देर रात निकलने का एहसास करवा रही थी. एहसास ऐसा भी हो रहा था जैसा कि भोर में टहलने के लिए निकलते समय हुआ करता था. हलकी-हलकी ठंडी हवा, खम्बों, घरों, दुकानों से झांकती रौशनी और इक्का-दुक्का वाहनों के इंजन की आवाज़. न लोगों की भागदौड़, न अंधाधुंध रफ़्तार, न धक्का-मुक्की, न शोर, न धुआँ, न प्रदूषण बस एक चरम शांति, एक मधुर सा एहसास. लगा कि ऐसा नियम हमेशा के लिए बना दिया जाना चाहिए. किसी भी शहर को सुबह आठ-नौ बजे से शाम छह-सात बजे तक के लिए ही खोलना चाहिए. इससे न केवल कई तरह का प्रदूषण दूर होगा बल्कि समाज में फैली बहुत सी अराजकता अपने आप समाप्त हो जाएगी.



जब जल्दी बाजार बंद होगा तो ज़ाहिर सी बात है कि दुकानदारों को जल्द ही अपने घर पहुँचने का समय मिला करेगा. इससे देर रात पहुँचने के कारण अस्त-व्यस्त होने वाली उनकी दिनचर्या भी नियंत्रित हो सकेगी. बहुत से व्यापारिक परिवारों के बच्चों में इसकी समस्या देखने को मिलती है कि वे अपने पिता, भाई अथवा अन्य पुरुष परिजनों से समय से नहीं मिल पाते हैं. कई बार व्यापारिक अवसरों पर बच्चों को भी अपने परिजनों की सहायता के लिए दुकान पर जाना पड़ जाता है. इस तरह की स्थितियों पर बहुत हद तक लगाम लग सकती है.

इसके साथ-साथ जल्दी दुकान बंद होने के कारण लूट-पाट, छीना-झपटी जैसी घटनाओं पर भी अंकुश लगने की सम्भावना है. लगभग सभी दुकानदार, व्यापारी रात को अपनी-अपनी दुकान बंद करने के बाद बहुत सारा धन, दिन भर की आय अपने साथ लेकर ही घर जाते हैं. कई-कई दुकानदार देर तक दुकान खोले रहते हैं. ऐसे में अँधेरे में अकेले जाने वाले दुकानदारों पर, देर तक खुली दुकानों पर अराजक तत्त्वों का हमला भी हो जाया करता है. उनके साथ लूटपाट हो जाती है. जल्दी बाजार बंद होने से इस पर भी नियंत्रण लग सकता है.

इसी तरह यदि बाजार जल्द बंद होगा तो देर रात तक जलने वाली लाइट को भी रोका जा सकता है. इससे विद्युत ऊर्जा की खपत पर नियंत्रण होने से ऊर्जा की बचत की जा सकती है. लाइट चले जाने की स्थिति में जेनरेटर चलने की स्थिति में होने वाले प्रदूषण को भी रोका जा सकता है.

इनके अलावा बहुत से बिंदु ऐसे हैं जो समाजोपयोगी सिद्ध हो सकते हैं. इस तरह के निर्णय को लागू करने के लिए सरकार से ज्यादा सहयोग नागरिकों का, व्यापारियों का चाहिए है. इसके लिए बहुत से ऐसे व्यावसायिक कार्यों का हवाला दिया जा सकता है जो रात को ही संचालित होते हैं. यदि वाकई ऐसा होता है तो ऐसे व्यापारिक कृत्यों को कुछ निश्चित शर्तों के साथ रात में निश्चित अवधि तक के लिए खोलने की अनुमति दी जा सकती है. देखा जाये तो अभी भी कुछ ऐसा ही हो रहा है. बाजार को शाम पाँच बजे बंद करने का नियम है मगर शराब की दुकानों को रात नौ बजे तक खोलने की अनुमति मिली है. वर्तमान की भयावहता और उसके सन्दर्भ में लगाई गई बंदी के बाद प्रकृति में आये सकारात्मक बदलाव को देखते हुए भविष्य की मजबूत इमारत के लिए ऐसे निर्णयों का पालन किया जाना अनिवार्य होना चाहिए. नागरिकों और व्यापारियों को भी इसके लिए अपनी सहमति देनी चाहिए.  

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

08 अप्रैल 2020

मानवीय जगत के लिए लाभकारी लॉकडाउन

लॉकडाउन का समय चल रहा है और लोग फुर्सत का समय भी सिर्फ चीनी वायरस कोरोना की चर्चा में बिता दे रहे हैं. या कहें कि अपना अमूल्य समय इस फिजूल विषय पर बर्बाद कर रहे हैं. इस इक्कीस दिन के लॉकडाउन के चौदह दिन बीत गए यानि कि दो हफ्ते और इन दो हफ़्तों में इसका असर हमारे ऊपर क्या हुआ, इस पर शायद ही किसी ने विचार किया होगा. यदि लॉकडाउन मात्र इन्हीं इक्कीस दिनों का ही रहा तो उससे संक्रमण रोकने में हम कितने सफल होंगे ये बात अलग होगी मगर हम व्यक्तिगत रूप से कितने सफल हो चुके होंगे, इसका आकलन अभी किया ही नहीं गया होगा. इधर देश की, राज्यों की अर्थव्यवस्था का आकलन कर लिया गया होगा. निस्संदेह इसमें जबरदस्त तरीके से गिरावट के बिंदु देखने को मिलेंगे. आर्थिक स्थिति का संतुलन अपने आपमें आवश्यक है और उससे कहीं अधिक संतुलन बनाये रखने वाला विषय है प्रकृति, मानवीय स्वास्थ्य, संवेदनाएं.



इन चौदह दिनों में आपने गौर किया होगा कि हमारे आसपास की हवा बहुत सुखद महसूस होने लगी है. आपने अनुभव किया होगा कि आसपास का प्राकृतिक वातावरण कुछ अलग सा दिखने लगा है. आपके आसपास बहने वाली नदियों की रंगत में भी सुधार आता नजर आया होगा. इस प्राकृतिक स्वरूप में सकारात्मक परिवर्तन के अलावा आपको अपने और अपने बच्चों के स्वास्थ्य में भी परिवर्तन नजर आया होगा. अभी के चौदह दिनों और इसके बाद के सात दिनों के लॉकडाउन से आपके शरीर को और आपके बच्चों के शरीर को किसी भी तरह से जंक फ़ूड की प्राप्ति नहीं हो सकी होगी. (यहाँ उन अपवादों की चर्चा नहीं जिनके घर में ऐसे सामान उपस्थित रहते हैं.) स्वयं देखिये, आप या आपका बच्चा बाजार नहीं जा रहा. ऐसे में मोमोज, पिज्जा, बर्गर आदि जैसी खाद्य वस्तुओं से सबकी दूरी बनी हुई है. इसने निश्चित ही आपके शरीर से नकारात्मक रसायनों को दूर ही रखा होगा.


इसके साथ-साथ एक और विशेष बात देखने में आ रही है वह यह कि सभी की जीवन-शैली अत्यल्प वस्तुओं के द्वारा पूरी की जा रही है. न मॉल की सैर की जा रही है, न फिल्मों का शौक पूरा किया जा रहा है, न ही अनावश्यक कारें दौड़ाई जा रही हैं. इससे जहाँ एक तरफ अपव्यय पर रोक लगी है वहीं दूसरी तरफ प्रदूषण पर भी अंकुश लगा है. इन सुखद अनुभूतियों के साथ-साथ सड़क दुर्घटनाओं में अचानक से गिरावट आई है. इसी तरह बीमारों की भीड़ भी अब चिकित्सालयों में नहीं दिखाई दे रही है. यहाँ विचार करना होगा कि भले ही सभी जगह के ओपीडी बंद करवा दिए हों मगर कहीं भी आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं को बंद नहीं किया गया है. इसके बाद भी किसी चिकित्सालय में आपातकालीन सेवाओं में भी भगदड़ नहीं मची है. इसका सीधा सा अर्थ है कि बीमार लोगों की संख्या में भी गिरावट आई है.

इसे क्या माना-समझा जाये? क्या इसे स्वीकार लिया जाये कि जीवन-शैली को भौतिकतावाद से दूर रखने में ही हम सभी का लाभ है? क्या ये माना जाये कि सादा जीवन हम सभी के लिए लाभप्रद है? क्या ये मान लिया जाये कि ऐसा कदम के द्वारा एक तरफ हम प्रकृति को स्वच्छ करेंगे साथ ही खुद को भी स्वस्थ रखेंगे? कुछ भी हो मगर सत्य यह है कि जीवन को कम से कम संसाधनों में गुजारना कतई मुश्किल नहीं बस उसके लिए भौतिकतावादी संस्कृति से, दिखावे से, आडम्बर से, कथित आधुनिकता से दूर रहने की आवश्यकता है.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

06 मार्च 2019

कालखंड के विधान न मानना ही कष्ट का कारण

आसपास नजर दौड़ाओ तो परेशान लोगों की बहुतायत संख्या दिखाई पड़ती है. कोई अपनी बीमारी से परेशान है. कोई अपने परिजनों की बीमारी से परेशान है. कोई नौकरी न मिलने से परेशान हो रहा है. कोई अपने व्यवसाय में लाभ न होने को लेकर परेशान है. कोई बच्चों के विवाह के लिए परेशान है. कोई संतान न होने के कारण परेशान है. कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में परेशान लोग दिखाई दे ही जायेंगे. ऐसे परेशान लोगों का विश्लेष्णात्मक अध्ययन किया जाये तो जानकारी मिलेगी कि ऐसे लोग ज्यादा परेशान हैं जो सात्विक प्रवृत्ति के हैं, जिनका ईश्वर पर, ईश्वरीय सत्ता पर विश्वास है. जिनके दिन का एक बहुत बड़ा भाग भगवान की भक्ति में बीतता है. जिनके घूमने-फिरने का बहुत बड़ा समय धार्मिक स्थलों की यात्राओं में व्यतीत होता है. जिनकी आय का एक बहुत बड़ा हिस्सा धार्मिक कृत्यों को संपन्न करने में व्यय होता है. ऐसे परेशान लोगों का अध्ययन करने पर ज्ञात होगा कि ऐसे लोगों ने अपने जीवन में शायद ही किसी के लिए बुरा सोचा हो. शायद ही इन्होने अपने कृत्यों में कभी कुकृत्य जैसा कोई आचरण किया हो. इसके बाद भी सर्वाधिक कष्ट ऐसे लोगों के हिस्से में ही आते हैं. आखिर क्या कारण है इसका? क्या कारण हो सकता है, ऐसा होने के पीछे? 



संभव है कि इसे हँसी में निकाल दिया जाये क्योंकि इसके पीछे कोई वैज्ञानिक आधार नहीं. संभव है कि इसे नास्तिकता भरा कदम बताया जाये क्योंकि इसके पीछे किसी तरह की धार्मिकता का आधार काम नहीं करता है. इसके बाद भी हमारा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि किसी भी व्यक्ति के कार्यों के पीछे, उसके सफल-असफल होने के पीछे, उसकी ख़ुशी-दुःख के पीछे सम्बंधित कालखंड, समय, परिस्थिति का बहुत बड़ा हाथ होता है. बिना इसके किसी भी व्यक्ति का विकास-गति प्राप्त करना संभव नहीं दिखता है. यदि एक पल को इसे सत्य मान लिया जाये तो साफ़ है कि इस कलियुग में उसी व्यक्ति को कष्ट अधिक मिलने हैं जो कलियुग के अनुसार अपने कृत्यों का सञ्चालन नहीं करेगा. जो भी व्यक्ति कलियुग के नियमों-कानूनों का अनुपालन नहीं करेगा उसे कष्ट भोगने होंगे. भगवान जैसी शक्ति यदि वाकई है तो वह हमेशा उसी को दंड देने का काम करती है जो उसके बने-बनाये विधानों का अनुपालन नहीं करता है. ऐसे में सुखी रहने के लिए व्यक्ति को कलियुग के विधानों का अनुपालन करना अनिवार्य है. यदि वह ऐसा नहीं करता है तो कष्ट का भागी बनता है.

इसे महज मजाक का विषय न माना जाये वरन अपने आसपास भी देखा जाये तो बहुत हद तक सत्यता दिखाई पड़ने लगेगी. ऐसे लोगों को बहुत कम कष्ट में देखा होगा जो किसी न किसी तरह के दंद-फंद का काम करते हैं. झूठ बोलने वालों को, भ्रष्टाचार करने वालों को, रिश्वतखोरी करने वालों को कष्ट से ज्यादा सुख भोगते देखा जाता है. आये दिन सड़क दुर्घटना की खबरें पढ़ते हैं, तमाम निर्दोषों के , मासूमों के मारे जाने की खबरें सामने आती हैं मगर शायद ही कभी एक-दो दुर्घटनाएं ऐसी सामने आती हों जिनमें कोई अत्याचारी मारा गया हो, कोई दुर्दांत मारा गया हो. ऐसे में क्या ये माना जाये कि सभी को अत्याचार करना चाहिए? सभी को भ्रष्ट हो जाना चाहिए? सभी को कुकृत्य करने शुरू कर देने चाहिए? एक पल को इसके बारे में हाँ कहना अवश्य ही अचंभित करेगा किन्तु यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाये तो जब तक संतृप्तता की स्थिति नहीं आती तब तक सम्बंधित विषय में प्रक्रिया चलती रहती है. कुछ ऐसा ही समाज में अपराधों को लेकर हो रहा है. जब तक समाज में कुछ बुरे लोग होंगे, कुछ भले लोग होंगे तब तक अपराध की प्रक्रिया चलती रहेगी. या तो समाज में सभी लोग भले बन जाएँ या फिर सभी लोग बुरे बन जाएँ तो संतृप्तता की स्थिति आने से सुधार दिखाई देने लगेगा. ऐसा भी नहीं कि बिना हत्या किये किसी के काम न बनेंगे. ऐसा भी नहीं कि यदि रिश्वत नहीं ली जाएगी तो काम नहीं बनेगा. यह भी नहीं कि अपराध नहीं किया जायेगा तो समाज नहीं चलेगा. यह सब होगा मगर जब शक्ति-संतुलन की स्थिति समाज में बनती है तो अपराध कम होते हैं या कहें कि न के बराबर होते हैं. इसी शक्ति-संतुलन की आज आवश्यकता है और वह तभी हो सकेगा जब कि इन्सान खुद को भगवान भक्ति से बाहर निकाले. ईश्वरीय शक्ति यदि एक तरफ इन्सान को ताकत देती है तो उसे कमजोर भी बनाती है. यही कमजोरी किसी भी भले इन्सान को हमेशा परेशानी में रखती है, दुखी रखती है.

ऐसा कहने का अर्थ कदापि यह नहीं कि इन्सान सिर्फ और सिर्फ अत्याचार करने पे उतर आये, पूरी तरह से कुकृत्य करने लगे. ऐसा कहने का आशय महज इतना है कि इंसानों को अपने समय, शक्ति, ऊर्जा को अनावश्यक रूप से कथित भगवन-भक्ति में खर्च करके सार्थक कार्यों की तरफ लगाना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि ईश्वर भी इन्सान की बनाई कृति है जो उसने अपने गुण-दोषों के विवेचन के लिए स्थापित की है. यहाँ ईश्वर के सम्बन्ध में एक बात ध्यान रखना चाहिए कि भगवान की भक्ति करने के द्वारा इन्सान सिर्फ वही चीजें माँगता है जिनको पूरा करना कहीं न कहीं उसी इन्सान के हाथों में होता है. कोई भी इन्सान अपनी परेशानियाँ का निस्तारण चाहता है. वह परीक्षा में पास होना चाहता है, नौकरी चाहता है, संतान चाहता है, बीमारी से मुक्ति चाहता है, व्यापार में लाभ चाहता है, विवाह चाहता है, तरक्की चाहता है. इनके लिए वह प्रयास भी करता रहता है और भगवान की भक्ति भी करता रहता है. ऐसे में उसकी कामना पूरी होने का श्रेय वह भगवान को देता हुआ उसके प्रति कृतज्ञ रहता है. क्या कभी किसी इन्सान ने अपने चार हाथ हो जाने की कामना भगवान से की है? क्या किसी इन्सान ने भरी दोपहरी में रात हो जाने की माँग भगवान से की है? क्या किसी इन्सान ने गर्मी के मौसम में सर्दी की आकांक्षा भगवान से की है? सार्वजनिक रूप से ऐसा कोई नहीं दिखता, पर एक पल को ऐसा माँगा भी जाये भगवान से तो क्या वह पूरा हो जायेगा? कितनी भी कठिन तपस्या हो, यज्ञ-हवन किये जाएँ मगर ऐसा हो पाना संभव नहीं क्योंकि यह एक तरह की प्राकृतिक प्रक्रिया है. इसी तरह की प्राकृतिक प्रक्रिया से भटकने के कारण इन्सान दुखों का अनुभव करता है. ऐसे में इन्सान को अपने कृत्यों पर भरोसा करते हुए आगे बढ़ने कि आवश्यकता है. भगवान भक्ति कलियुग में इन्सान को राक्षस बनाएगी, दुष्ट साबित करेगी, अत्याचारी साबित करेगी. ऐसा इसलिए क्योंकि ऐसा करते रहने के कारण इन्सान अपने कार्यों के प्रति सजग-सचेत-सक्रिय नहीं रहता है.
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(यह आलेख पूर्वाग्रही, आँख बंद करके भगवान भक्ति करने वाले न पढ़ें.)

13 अगस्त 2018

कृत्रिमता में वास्तविक आनंद तलाशता इंसान

जंगल काटकर कंक्रीट के जंगल खड़े कर देने वाला इन्सान अब सुकून पाने के लिए जंगलों की तरफ ही दौड़ रहा है. नगरों की आपाधापी भरे जीवन में कुछ पल सुकून के पाने के लिए वह जंगलों की तरफ जा रहा है. इसके लिए वह जंगलों में अपने सुख-सुविधा के इंतजाम भी करने में लगा हुआ है. इसके लिए उसने कहीं रेस्टोरेंट बना रखे हैं, कहीं होटल बना दिए हैं, कहीं कुछ और इंतजाम के द्वारा आपाधापी को भुलाने की कोशिश करने में लगा है. इसी तरह देखने में आ रहा है कि ग्राम्य जीवन को लगभग समाप्त कर चुका व्यक्ति अपने शहरी जीवन में ग्रामीण जीवन का पुट देने का काम कर रहा है. शहरों में बन रहे आवासों में आधुनिकता का शौक़ीन इन्सान ग्राम्य जीवन की झलकियों को लगाकर अपने शौक को पूरा करने में लगा है. कहीं वह अपने मकानों के नाम में हट का इस्तेमाल कर रहा है. कहीं वह लालटेन, झोपड़ी जैसी डिजायन के द्वारा शहरों में ग्रामीण जीवन को साकार करने की कोशिश कर रहा है. वैसे यह शौक कम है और उसी को पाने की ललक ज्यादा है जो उसे अब प्राप्त नहीं है.


यह किसी से भी छिपा नहीं है और न ही किसी के द्वारा झुठलाया जा सकता है कि इन्सान के लिए प्राकृतिक वातावरण सदैव से ही लाभदायक रहा है. वनों, जंगलों, प्राकृतिक वनस्पतियों, पेड़-पौधों, नदियों, पहाड़ों, झरनों आदि ने न केवल वातावरण को संतुलित रखा है वरन इंसानों को भी लाभान्वित किया है. प्रकृति की तरफ से समय-समय पर मिलते लाभ की अंधाधुंध और असीमित लालसा ने इन्सान को प्रकृति के प्रति क्रूर बना दिया. उसके द्वारा प्राकृतिक सम्पदा का दोहन ही नहीं किया गया बल्कि उसे क्रूरतम तरीके से नष्ट भी किया गया. अब जबकि इंसानी जीवन पर सभी तरफ से खतरा दिखाई देने लगा है, उसके जीवन में प्राकृतिक सम्पदा की कमी बराबर होने लगी है, प्राकृतिक नजारों के लिए उसे इधर से उधर भटकना पड़ रहा है तब इन्सान ने कृत्रिम रूप से इनकी उपलब्धता बनानी शुरू कर दी है. यह अपने आपमें हास्यास्पद ही है कि पहले प्रकृति को नष्ट करने के बाद इन्सान अब उसकी प्रतिकृति से प्राकृतिक आनंद लेने की कोशिश कर रहा है.


यह अपने आपमें सत्य है कि वास्तविकता जैसा आनंद कभी भी आभासी में, उसके प्रतिरूप में मिल नहीं सकता है. यही कारण है कि आज इन्सान ने तकनीक के द्वारा, संपत्ति के द्वारा, संसाधनों के द्वारा भले ही अपने घरों में, अपने आसपास, मैदानों में, पार्कों में, रेस्टोरेंट में, होटल में कृत्रिम जंगल बना लिए हों, आभासी झोपड़ियों का निर्माण कर लिया हो, नकली झरने, नदियाँ बहानी शुरू कर दी हों मगर उनसे वह आनंद की अनुभूति नहीं कर पा रहा है. यही कारण है कि वह प्रकृति का वास्तविक आनंद लेने के लिए अब वास्तविक जंगलों की तरफ, वास्तविक पहाड़ों की तरफ, वास्तविक झरनों-नदियों की तरफ भागने लगा है. उसे अब शायद समझ आ रहा होगा कि उसने द्वारा अंधाधुंध लालच में उठाये गए विनाशक कदमों का खामियाजा न केवल उसे बल्कि उसकी आने वाली पीढ़ी को भी उठाना पड़ रहा है. अपनी आगे वाली, आने वाली पीढ़ी की खातिर यदि आज का इन्सान अपने विनाशक कदमों पर अंकुश लगा ले तो संभव है कि आने वाला समय कुछ हद तक प्राकृतिक हो जाये.  

09 मार्च 2017

हैवलॉक में नैसर्गिक सौन्दर्यानुभूति : अंडमान-निकोबार यात्रा

पोर्ट ब्लेयर में दो दिन की घूमा-फिरी के बाद समुद्र किनारे सजे-सजाये खड़े तीन जहाजों के अद्भुत दृश्य को आत्मसात करते हुए देर रात तक बिटिया रानी के जन्मदिन की पार्टी और फिर सुबह-सुबह हैवलॉक द्वीप को चल देना. अंडमान-निकोबार में जल्दी सूर्योदय होने के कारण सुबह छह बजने से पहले ही तेज धूप हम सबका स्वागत करने को तैयार हो चुकी थी. छोटे भाई के दो मित्र अपने परिवार सहित हमारा इंतज़ार करते मिले. औपचारिकतायें जल्दी-जल्दी निपटाने के साथ ही हम सब शिप में अपनी निर्धारित सीट पर जा बैठे. नियत समय पर शिप ने समुद्र के सीने पर डोलना शुरू किया. आरम्भिक कुछ मिनटों की यात्रा को शिप के नियमों के अन्तर्गत अपनी जगह पर बैठे-बैठे करने के बाद यात्रियों को डैक पर आने की अनुमति दे दी गई. हमारी और परिवार की पहली समुद्री यात्रा होने के कारण एक अलग तरह का रोमांच भी था. हालाँकि इससे पूर्व कन्याकुमारी में विवेकानन्द रॉक पर पहुँचने के लिए फैरी की यात्रा की जा चुकी थी मगर वो कुछ मिनट की ही यात्रा था. उसके ठीक उलट पोर्ट ब्लेयर से हैवलॉक दो घंटे से अधिक की यात्रा थी. 


डैक पर आने की अनुमति मिलते ही हम अपना कैमरा संभाल डैक पर आ पहुँचे. हिलते-डुलते, उछलते-लहराते शिप की यात्रा में कुछ समय तो अपने दिमाग का संतुलन बनाने में लग गया. चक्कर आता सा समझ आ रहा था. कई यात्रियों को जी मिचलाते, उलटी करते भी देखा मगर ये बात हम तीनों लोगों के साथ अच्छी रही कि किसी को उलटी जैसी समस्या नहीं हुई. यद्यपि बिटिया रानी को कुछ उलटी जैसा हुआ मगर वो भी एक-दो बार के बाद सामान्य हो गई. सूरज की किरणें भिन्न-भिन्न तरीके से समुद्री लहरों का श्रृंगार करने में लगी थीं. शिप अपनी पूरी ताकत से विशाल समुद्र का सीना चीरकर उत्साह से आगे बढ़ा जा रहा था. जहाज के तल समुद्री जल को चीरते हुए दूधिया फेन बनाते हुए अनगिनत मनमोहक छवियों का निर्माण करने में लगा था. 




पूरे रास्ते जहाज के रास्ते छोटी-छोटी मछलियाँ, जिनमें डॉल्फिन भी शामिल थी, उछलकूद मचाते हुए इधर से उधर कूद-फांद करने में लगी थीं. दो घंटे से अधिक की यात्रा डैक किनारे खड़े-खड़े, समुद्री लहरों को कैमरे में कैद करते-करते कब हैवलॉक आ गया पता ही नहीं चला. इस दौरान जहाज पर बजते संगीत के बीच यात्रियों की मस्ती, नाच-गाना भी होता रहा. नवयुगल थिरकते हुए अपना आनंद बटोर रहे थे तो बुजुर्ग भी किसी से पीछे नहीं थे. सब मस्ती के मूड में एक परिवार सा लग रहे थे. न कोई छेड़छाड़, न कोई अभद्रता, न कोई अश्लीलता ऐसा लग रहा था जैसे सब अपने परिवार के बीच नाच-गाना-मस्ती कर रहे हों. 


हर्षोल्लास, मस्ती के माहौल में हैवलॉक आने की सूचना मिली. सब अपनी-अपनी जगह फिर बैठ गए. हैवलॉक उतने के बाद नैसर्गिक प्राकृतिक सुन्दरता चारों तरफ बिखरी दिखी. चंद किमी के दायरे में समुद्र किनारे बसी अत्यंत छोटे से मनमोहक हैवलॉक में राधानगर, कालापत्थर और एलिफेंटा सहित कुल तीन बीच वहाँ के सौन्दर्य को पर्यटकों के सामने बिखेरते हैं. समुद्री जल इस कदर साफ़ और नीला है कि उसकी गहराई में छिपे सौन्दर्य को भी सहजता से निहारा जा सकता है. 



शाम को राधानगर बीच पर पहुँचकर देखा कि सैकड़ों की संख्या में लोग समुद्री लहरों के साथ खेलते-कूदते आनंद उठा रहे हैं. इनमें से बहुतायत में नवयुगल थे जो आसपास की दुनिया से बेखबर सिर्फ अपने में निमग्न थे. मनमोहक सूर्यास्त के बाद वापस होटल लौटना हुआ. एक अजब सी अनुभूति के बाद महसूस हुआ कि समुद्र कितना भयावह होता है और कितना मनमोहक भी, बस उसकी स्थिति का अंतर होता है.





अगले दिन वैसे तो एलिफेंटा बीच जाने का निर्धारित कार्यक्रम था मगर सबने अपने-अपने कारणों से वहाँ जाने से इंकार कर दिया. चाय-नाश्ते आदि से निपटने के बाद हम सपरिवार कालापत्थर बीच को चल दिए. सामने विशाल समुद्र और उसके किनारे एक तरफ विशाल काली शिलाखंड, उसके काले छोटे-छोटे पत्थर उस बीच को कालापत्थर बीच के नाम से प्रसिद्धि दिलाये हुए थे. राधानगर बीच के मुकाबले यहाँ पर्यटकों की संख्या बहुत कम दिखी. इस बीच पर घोंघे, सीपी, शंख आदि जीवों का किनारे रेत पर रेंगना अद्भुत लगा. इसके अलावा छोटे-छोटे केंकड़े भी बड़ी तेजी से इधर से उधर भागते दिख रहे थे. ऐसा दृश्य कहीं और देखने को मिला नहीं था, इसके अलावा इनको कहीं और देखा भी नहीं था. नई तरह के जीवों को देखने का कौतूहल तो था ही साथ ही एक अदृश्य भय भी काम कर रहा था. 





तीसरे दिन हैवलॉक से वापसी का समय निर्धारित था. एकदम शांत, निर्मल, स्वच्छ हैवलॉक से इतनी जल्दी जाने का मन भी नहीं हो रहा था मगर जाना भी था. वापसी शिप का समय दोपहर बाद तीन बजे निर्धारित था. होटल छोड़ने के पूर्व कुछ देर हैवलॉक टहलकर वहाँ के बारे में कुछ और जानकारी एकत्र करने निकल पड़े. लगभग पच्चीस-तीस दुकानों का बाज़ार और बाजार के ठीक बीच एक छोटी सी मगर सजी हुई सब्जीमंडी, इतना सा बहुत छोटा सा बाजार वहाँ की जरूरतें पूरी करता था. यहाँ की जरूरत का सामान पोर्ट ब्लेयर से ही आता है और यहाँ के लोग भी अपनी अतिरिक्त जरूरतों के लिए पोर्ट ब्लेयर ही जाते हैं. 



पूरे हैवलॉक में ऑटो, कार, बस खूब हैं मगर एक भी दुकान इनको सुधारने की नहीं है. किसी भी तरह की मरम्मत, रिपेयरिंग के लिए इनको पोर्ट ब्लेयर जाना होता है. एक तरफ से बहुत अधिक किराया होने के कारण बस, कार, ऑटो वाले गीली अवस्था में किसी यात्री को बिठाते नहीं हैं. इसका कारण खारा पानी होने के कारण उनके वाहन का जल्द ख़राब होना रहता है.

दिन में अपनी चहलकदमी के बीच बाजार के कई दुकानदारों से बातचीत की. वहाँ के एक स्कूल में जाकर उनके प्रिंसिपल से मुलाकात की. उन्होंने सहर्ष, प्रसन्न भाव से हम सबका स्वागत किया. हैवलॉक के बारे में, वहाँ की शिक्षा व्यवस्था के बारे में जानकारी दी. प्राथमिक स्तर से लेकर इंटरमीडिएट तक के कुल सात विद्यालय वहाँ स्थित हैं. इनमें हिन्दी, अंग्रेजी और बंगला माध्यम से शिक्षा दी जाती है. उन्हीं से पता चला कि वर्तमान में हैवलॉक में लगभग आठ हजार के आसपास आबादी है, जिसमें से वहाँ के मूल निवासी लगभग दो ढाई हजार होंगे. शेष सभी व्यापारी, नौकरी आदि के सिलसिले में बाहर से आये हुए हैं. धर्म सम्बन्धी जानकारी ज्ञात करने पर पता चला कि वहाँ हिन्दू, मुस्लिम, बंगाली, मलयालम, तमिल आदि निवासी हैं. शिव और दुर्गा को पूजने वाले अधिक हैं और हैवलॉक में पाँच मंदिर हैं. जिनमें एक दुर्गा जी का और एक शिव जी का मंदिर है, जो वहीं बाजार में स्थित सब्जीमंडी के किनारे बने हैं. उन्हीं के साथ श्री हरि मंदिर भी है. शेष दो मंदिर राधानगर बीच जाते समय स्थित हैं.




निर्धारित समय पर शिप हैवलॉक से वापस पोर्ट ब्लेयर को चल पड़ा. आते समय शिप मेम्बर्स से संपर्क बना लेने के कारण डैक से शुरू हुई यात्रा डैक पर ही समाप्त की. दिल के साफ नागरिकों के दिल में सहज स्थापना के कारण पूरी यात्रा हँसते-बतियाते बीत गई. 


जाते समय जहाँ सूरज चढ़ते रूप में समुद्री लहरों संग खेल रहा था वहीं वापसी के समय उसका लौटता हुआ स्वरूप दिखाई दे रहा था. रंग बदलता सूरज अपने साथ-साथ लहरों के रंग को भी बदल दे रहा था. समुद्री भयावहता कहीं दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही थी. छोटी-छोटी मछलियों की अटखेलियाँ, लहरों का उछलना-कूदना, समुद्री जल का दूध सा सफ़ेद फेन बनाकर साथ-साथ भागना, जहाज का अथाह समुद्र के ऊपर पूरी मस्ती से भागना सबकुछ अद्भुत और रोमांचक लग रहा था. इन सबके बीच हैवलॉक की यादों को दिल में संजोकर, वहाँ के नयनाभिराम दृश्यों को कैमरे में कैद करके वापस पोर्ट ब्लेयर लौट आये.