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30 सितंबर 2023

मंजुल मयंक : एक ही दिन का आना-जाना

बुन्देलखण्ड सदैव से अपने रत्नों के लिए प्रसिद्ध रहा है. भले ही ये रत्न साहस, जौहर दिखाने वाले रहे हों या फिर कलम के रहे हों. ऐसे ही एक कलम के धनी रत्न मंजुल मयंक का आज, 30 सितम्बर को जन्मदिन पड़ता है. इसे संयोग ही कहा जायेगा कि इस अद्भुत गीतकार की पुण्यतिथि भी आज, 30 सितम्बर को पड़ती है.




एक से बढ़कर एक कर्णप्रिय, मधुर गीत रचने वाले मंजुल मयंक का जन्म 30 सितम्बर सन 1922 को हुआ था. उनका पूरा नाम गणेश प्रसाद खरे था, मंजुल मयंक उनका उपनाम था. कालांतर में वे इसी नाम से प्रसिद्ध हुए. उनके पिता का नाम श्री महावीर प्रसाद खरे और माता का नाम श्रीमती गोविन्द खरे था. मूलतः इलाहाबाद के रहने वाले महावीर प्रसाद जब नौकरी के लिए बुन्देलखण्ड के हमीरपुर में आये तो फिर यहीं के होकर रह गए. सन 1941 में जब मयंक जी अपनी नौकरी के सिलसिले में बाँदा पहुँचे तो यहाँ उन्हें बेढ़ब बनारसी, श्याम नारायण पाण्डेय, निराला और बच्चन आदि जैसे साहित्यकारों, कवियों को सुनने का अवसर मिला. यहीं पर उनके भीतर का कवि जागृत हुआ और उन्होंने अपनी पहली कविता सिंदूर बिन्दु की रचना की.


सन 1953 में मयंक जी बाँदा से वापस लौट आये और मौदहा आकर शिक्षा क्षेत्र से जुड़ गए. यहीं पर उनका पहला काव्य-संग्रह ‘रूपरागिनी’ प्रकाशित हुआ. तीन वर्ष तक यहाँ सेवा देने के पश्चात् वे सन 1956 में हमीरपुर लौट आये. ‘जनता ही अजन्ता है’ काव्य-संग्रह और ‘तन मन की भाँवरें’ उपन्यास उन्होंने यहीं प्रकाशित करवाए. 30 सितम्बर 2007 को मयंक जी अपने मधुर गीत, अपनी कलम की अमानत बुन्देलखण्ड की धरती पर छोड़कर सदैव के लिए दूर चले गए.


आज उनकी जन्मतिथि और पुण्यतिथि पर उनको सादर नमन  






 

17 जून 2021

रानी लक्ष्मीबाई का अंतिम युद्ध

बुन्देलखण्ड के इतिहास की बारीकियों से परिचित करवाने वाले देवेन्द्र सिंह जी की कलम से...

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१७ जुन,१८५८ महारानी लक्ष्मीबाई का बलिदान दिवस, आज १७ जून है तो आज की पोस्ट उन्हीं को समर्पित करता हुआ ग्वालियर में लड़े गए युद्ध का विवरण.


१७ जून से एक दिन पहले कल यानि १६ जून को रोज अपनी सेना के साथ बहादुरपुर से मोरार की तरफ बढ़ा लेकिन उसके पहले उसने अपनी व्यूहरचना पूरी कर ली थी. संक्षेप में कहूँ तो यह इस प्रकार थी, ग्वालियर के दक्षिण दिशा में मेजर ओर हैद्राबाद कन्टन्जेंट के साथ आ जमा था. उसका कार्य यह था कि ग्वालियर शिवपुरी मार्ग से यदि भारतीय सेना दक्षिण की ओर भागने की कोशिश करे तो उसको रोके. ग्वालियर, लश्कर और मुरार को तीन भागों में बांट कर ग्वालियर के पूर्व-दक्षिण में कोटा की सराय में मुख्य मोर्चा स्थापित किया. ग्वालियर से कोटा की सराय सात मील की दुरी पर थी और लश्कर वहाँ से लगभग चार मील पर था. एक बार कम्पू और लश्कर पर अधिकार हो जाय तो किले के दक्षिण का भाग उनके उनके अधिकार में आने में ज्यादा मुश्किल का सामना नहीं करना पड़ता. रोज ने निश्चय किया कि वह स्वयं मुरार पर अधिकार करेगा और वहीं से कोटा की सराय में विद्यमान स्मिथ को सहयोग करेगा. स्मिथ के ऊपर सबसे महत्वपूर्ण स्थान का भार था.


ग्वालियर में क्रांतिकारी सैनिकों के मोर्चे इस प्रकार थे, तात्या टोपे का मोर्चा कम्पू में, राव साहब पश्चिम में था, बाँदा के नवाब अलीबहादुर को ग्वालियर नगर और किले का भार सौपा गया. १६ जून को हुए युद्ध में क्रांतिकारी सेनाओं की हार हुई और उनको पीछे हटना पड़ा. मुरार पर रोज का अधिकार हो गया. रोज के साथ Sir Robert Hamilton, Agent to the Governor-General in central India और Major Charters MacPherson, the Political Resident of Gwalior भी मुरार में आए. इसके साथ ही ब्रिगेडियर जनरल नेपिअर और महाराजा जयाजीराव सिंधिया भी आगरा से मुरार रोज के कैम्प में आ गये. अंग्रेजों ने सिंधिया से एक विज्ञप्ति जारी करवाई जिसमें ग्वालियर के सैनिकों से जो क्रांतिकरियों की तरफ से लड़ रहे थे, से कहा गया कि अंग्रेजी फ़ौज उनको राजपद फिर से देने के लिए युद्ध कर रही है. अतः वे उनका साथ छोड़ दें, उनके लिए आम माफ़ी की घोषणा की जाती है. ऐसा लगता है कि इस घोषणा का कुछ असर हुआ और फौजियों में कुछ लोग फिर से सिंधिया से मिलने की सोचने लगे.


रानी लक्ष्मीबाई ने फिर एक बार आगे आकर अंग्रेजों की धूर्तता के बारे में उनको समझाया. मेरे गुरु प्रोफेसर बिलास राय मिश्रा ने अपनी पुस्तक The Rising of 1857 in Bundelkhand with Special Reference to Jhansi के पेज न० १११ में लिखा – The Rani, however, once again rose equal to the occasion, she prepared an excellent plan of defence, entrusting to herself the most difficult task defending the eastern side of Gwalior. Accordingly, she made dispositions of her small force on the hills not yet occupied by the British. Her chief officers were Munder, Juhi, Ram Chandra desmukh, Raghunath singh, and Gul mohammad. They did not shut themselves up inside the fort. The fate that had befallen Jhansi was a constant reminder of the futility and danger of getting shut up inside the fort and thereby running the risk of being reduced to submission for want of provisions and other necessaries.


इस प्लान के तहत १६ जून की रात तक रानी ने और नेताओं से सलाह लेकर सब तोपें लगवा दीं. १७ जून को प्रातः सिंधिया की अश्वशाला से रानी के लिए एक नया घोडा लाया गया क्योंकि १६ जून को मुरार के मोर्चे में रानी का घोड़ा घायल हो गया था. उन्होंने हाथ में तलवार और कमर में खंजर बांध कर फौजियों की तरह सफ़ेद पैजामा और लाल कुरता पहना, साथ ही गले में मोतियों की माला डाली. पैरों में नागरा पहन, सिर पर सफ़ेद चंदेरी मुरैठा धारण कर रानी युद्ध के लिए तैयार हो गई.




इधर भोर होते ही स्मिथ की फ़ौज में युद्ध का बिगुल बज गया. स्मिथ ने एक भाग को रिजर्व में छोड़ा और अन्य के साथ आगे बढ़ा. उसका दल ४०० या ५०० कदम आगे बढ़ा था कि क्रांतिकारी सेना के गोलों की बौछार होने लगी. पीछे हट कर उसने अपने घुड़सवार दस्ते को आगे बढ़ाया और पीछे से गोलों की मार शुरू की. घनघोर युद्ध शुरू हो गया. इसी में रानी के एक तोपची ने कैप्टेन हिनेज को लक्ष्य करके एक गोला चलाया मगर दुर्भाग्य से गोला कैप्टेन के घोड़े को लगा और वह बच गया. हिनेज इस घटना से इतना डर गया कि कमान कैप्टेन पोर को दी. युद्ध होते-होते दोपहर हो गई. कोई भी पक्ष न जीतता और न ही हारता लग रहा था.


अब अंग्रेजों की ओर से कर्नल हिक्स और लेफ्टिनेंट रेले ने मोर्चा संभाला लेकिन अभी वे थोडा ही आगे बढ़े थे कि रानी के मोर्चे से चले एक गोले ने रेले और उसके घोड़े के प्राण ले लिए. इस आक्रमण में डाक्टर शेलोक्क भी घायल हो गया. इस मोर्चे पर रानी की जीत लगभग तय लग रही थी. तभी Cornet Goldworthy वीरतापूर्ण कौशल से अंग्रेजों की हारती बाजी को बचाया. उसने और कर्नल ब्लेक ने क्रांतिकारियों के मोर्चे पर खलबली मचा दी. दो घंटे के भयानक युद्ध के बाद भारतियों की तरफ के पार्श्व भाग की सेना पीछे हटने लगी. सारी भारतीय सेना तेजी से फूलबाग के परेड मैदान की तरफ पीछे हटने लगी.


रानी लक्ष्मीबाई ने जब यह देखा तो वह अपने सैनिकों को उत्साहित करते हुए प्राणों की बाजी लगा कर युद्ध करने लगी. दिन के तीन बज चुके थे, युद्ध करते-करते रानी अपने साथियों से बहुत दूर पहुँच गई थी. उसके बॉडीगार्ड भी उससे बहुत दूर थे. रानी के साथ केवल मुन्दर ही थी. इसी समय स्मिथ ने अपनी रिजर्व में रोके हुए ८वीं हुसर्स सैनिकों की टुकड़ी को युद्ध में उतार दिया. ताजादम ये सैनिक एकदम से उन पर टूट पड़े. अब रानी ने प्राण बचाने के लिए सोनरेखा नाले को पार करना चाहा. इसी वक्त मुन्दर को एक गोली लगती है. रानी ने सुना कि पीछे से मुन्दर कह रही थी कि अब वह नहीं भाग सकती. रानी पीछे मुड़ी और मुन्दर को गोली मारने वाले का काम तमाम कर दिया लेकिन तभी एक सैनिक की तलवार का करारा हाथ उन पर पड़ा. उनकी माथे से दाहिनी आँख तक का भाग कट गया. सहसा एक गोली भी उसकी छाती में समा गई. वह घोड़े पर औंधे मुँह गिर पड़ी. इसी समय अंग्रेजी फ़ौज को वापस लौटने का आदेश देने वाला बिगुल बजा और उनके सैनिक पीछे लौट चले. ये सैनिक भी नहीं जानते थे कि उन्होंने किसको मारा है.


रानी के साथियों ने रानी को ढूँढना शुरू किया परन्तु वह कहाँ थी. थोड़ी दूर पर रानी का घोडा मिला. रानी अभी भी उस पर ही लेटी थी. उसकी सांसे चल रही थी. सब उनको लेकर नाले के पार एक कुटिया पर लाए. थोड़ी ही देर में रानी की सांसें थम गईं. तात्या टोपे ने अपने बयान में बतलाया था कि रामचंद्र देशमुख ने रानी की चिता में आग दी थी.


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रानी झाँसी की पुण्यतिथि पर सादर श्रद्धांजलि सहित 

09 जनवरी 2021

ऐतिहासिकता को जीवंत स्वरूप प्रदान करने वाले साहित्यकार

हिन्दी उपन्यासों के वाल्टर स्कॉट कहलाने वाले वृन्दावनलाल वर्मा की आज 131वीं जयंती है. आज ही 9 जनवरी सन 1889 को उनका जन्म झाँसी जिले के मऊरानीपुर में हुआ था. उनका बचपन अपने चाचा के पास ललितपुर में बीता. चाचा के साहित्यिक-सांस्कृतिक रुचि के होने के कारण उनकी भी रुचि पौराणिक तथा ऐतिहासिक कथाओं के प्रति बचपन से ही थी. लेखन प्रवृत्ति बचपन से ही होने के कारण उन्होंने नौंवीं कक्षा में ही तीन छोटे-छोटे नाटक लिखकर इण्डियन प्रेस प्रयाग को भेजे. जहाँ से उनको पुरस्कार स्वरूप 50 रुपये भी प्राप्त हुए. प्रारम्भिक शिक्षा भिन्न-भिन्न स्थानों पर संपन्न करने के बाद उन्होंने बी.ए. और क़ानून की परीक्षा पास की. इसके बाद वे झाँसी में वकालत करने लगे.


पौराणिक और ऐतिहासिक विषयों के प्रति रुचि होने के चलते और लेखन के द्वारा भारतीय इतिहास की सत्यता सबके सामने लाने की उनकी प्रतिज्ञा ने मात्र बीस साल की अल्पायु में सन 1909 में उनसे सेनापति ऊदल नाटक लिखवा लिया. इसके राष्ट्रवादी तेवरों से बौखलाकर अंग्रेज़ सरकार ने इस नाटक पर पाबंदी लगा कर इसकी प्रतियाँ जब्त कर लीं. बचपन में भारतीय समृद्ध इतिहास के प्रति नकारात्मक भाव देखकर वृन्दावन लाल वर्मा देश का वास्तविक इतिहास सबके सामने लाने की प्रतिज्ञा कर चुके थे.  उनकी प्रतिज्ञा अपने आपसे थी, इसी कारण वे इतिहास की सत्यता सामने लाने के लिए लगातार प्रयत्नशील बने रहे. इसी के चलते उन्होंने ऐतिहासिक विषयों की ओर अपना ध्यान केन्द्रित किया. इसके साथ-साथ ऐतिहासिक उपन्यास लिखने की प्रेरणा उनको प्रसिद्द ऐतिहासिक उपन्यासकार वाल्टर स्काट से मिली. गढ़कुंडार जैसे विस्तृत उपन्यास की कथा-वस्तु के बारे में उनका स्वयं का कहना है कि एक शिकार कार्यक्रम के दौरान रात भर उस किले की छवि देखते-देखते ही उन्होंने उसकी एतिहासिकता की कथा को स्वरूप प्रदान कर दिया था. 


उनका ऐतिहासिक उपन्यास लेखन की तरफ प्रवृत्त होना उस समय बहुत ही साहसिक कदम कहा जायेगा क्योंकि उस दौर में प्रेमचंद उपन्यास सम्राट के रूप में अपनी सशक्त उपस्थिति हिन्दी साहित्य में बनाये हुए थे. ऐसे दौर में इतिहास जैसे विषय पर लेखन करना और उसे जनसामान्य के बीच सहज मान्यता प्रदान करवाना सरल नहीं था. वृन्दावन लाल वर्मा जी की सरल और रोचक लेखन-शैली का ही कमाल कहा जायेगा कि उनके पहले ऐतिहासिक उपन्यास ने उन्हें पर्याप्त ख्याति प्रदान करवा दी. उनके पहले ऐतिहासिक उपन्यास गढ़कुंडार को जबरदस्त प्रसिद्धि मिली. इसके बाद तो वृन्दावन लाल वर्मा ने विराटा की पद्मिनी, कचनार, झाँसी की रानी, माधवजी सिंधिया, मुसाहिबजू, भुवन विक्रम, अहिल्याबाई, टूटे कांटे, मृगनयनी आदि सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यास लिखे. उनके उपन्यासों में इतिहास जीवन्त होकर बोलता है. इसके साथ-साथ उन्होंने सामाजिक उपन्यास, नाटक, कहानियाँ भी लिखीं. उनकी आत्मकथा अपनी कहानी भी सुविख्यात है.




भारतीय ऐतिहासिकता को साहित्यिक जगत में जीवंत स्वरूप में प्रदान करने वाले साहित्यकार वृन्दावन लाल वर्मा सन 23 फ़रवरी 1969 में हमसे विदा हो गए. उनकी मृत्यु के 28 साल बाद 9 जनवरी सन 1997 को भारत सरकार ने उन पर एक डाक टिकट जारी किया.

आज उनके जन्मदिन पर उनकी पुण्य स्मृतियों को नमन...


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वंदेमातरम्



29 नवंबर 2020

बुन्देलखण्ड के कुछ समाचार-पत्र

कुछ साल पहले बुन्देलखण्ड में पत्रकारिता से सम्बंधित एक प्रोजेक्ट में सहयोग किया था. उस समय सम्बंधित साहित्य का अध्ययन करने और क्षेत्र के समाचार-पत्रों पर समीक्षात्मक टिप्पणी करने की दृष्टि से कुछ समाचार-पत्रों की प्रतियाँ, कुछ की फोटो-प्रतियाँ हमें देखने को मिली थीं. उनकी फोटोकॉपी हमने करवा कर रख ली थी. आज एक कागज़ खोजते समय वे सारी फोटो-प्रतियाँ देखने को मिल गईं. सोचा आपको भी उनके दर्शन करवाते चलें. 
 



































वंदेमातरम्

04 अगस्त 2020

शौर्य और वीरता का प्रतीक बुन्देलखण्ड का कजली महोत्सव

बुन्देलखण्ड क्षेत्र में पावन पर्व कजली उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है. यहाँ की लोक-परम्परा में शौर्य-त्याग-समर्पण-वीरता का प्रतीक माने जाने वाले कजली का विशेष महत्त्व है. इस क्षेत्र के परम वीर भाइयोंआल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम के साथ-साथ अन्य बुन्देली रण-बाँकुरों की विजय-स्मृतियों को अपने आपमें संजोये हुए कजली मेले का आयोजन आठ सौ से अधिक वर्षों से निरंतर होता आ रहा है. सावन महीने की नौवीं से ही इसका अनुष्ठान शुरू हो जाता था. घर-परिवार की महिलाएँ खेतों से मिट्टी लाकर उसे छौले के दोने (पत्तों का बना पात्र) में भरकर उसमें गेंहूजौ आदि को बो देती थी. नित्य उसमें पानी-दूध को चढ़ाकर उसका पूजन किया जाता थाइसके पीछे उन्नत कृषिउन्नत उपज होने की कामना छिपी रहती थी. सावन की पूर्णिमा को इन पात्रों (दोने) में बोये गए बीजों के नन्हें अंकुरण (कजली) को निकालकर दोनों को तालाब में विसर्जन किया जाता था. बाद में इन्हीं कजलियों का आपस में आदरपूर्वक आदान-प्रदान करके एक दूसरे को शुभकामनायें देते हुए उन्नत उपज की कामना भी की जाती थी. ये परम्परा आज भी चली आ रही है. 

कजली विसर्जन में बिटिया रानी - उरई, माहिल तालाब  (गत वर्ष का चित्र)

बुन्देलखण्ड के महोबा राज्य पर पृथ्वीराज चौहान के साथ एक साजिश रचकर कुछ विरोधियों ने महोबा के अतुलित वीर भाइयों आल्हा-ऊदल को राज्य से निकलवा दिया था. पृथ्वीराज चौहान को जानकारी थी कि आल्हा और ऊदल के न होने के कारण महोबा को जीतना संभव है. पृथ्वीराज चौहान ने महोबा की राजकुमारी के अपहरण की योजना बनाई और तय किया गया कि कजलियों के विसर्जन के समय ही आक्रमण करके राजकुमारी का अपहरण कर लिया जाये. महोबा के राजा परमाल की पुत्री चंद्रावलि अपनी हजारों सहेलियों और महोबा की अन्य दूसरी महिलाओं के साथ प्रतिवर्ष कीरत सागर तालाब में कजलियों का विसर्जन करने जाया करती थी. अपनी विजय को सुनिश्चित करने और राजकुमारी के अपहरण के लिए उसके सेनापति चामुंडा राय और पृथ्वीराज चौहान के पुत्र सूरज सिंह ने महोबा को घेर लिया. जिस समय ये घेरेबंदी हुई उस समय आल्हा-ऊदल कन्नौज में थे. 

राजा परमाल खुद ही आल्हा-ऊदल को राज्य छोड़ने का आदेश दे चुके थेऐसे में सभी लोग जानते थे कि आल्हा-ऊदल के बिना पृथ्वीराज चौहान की सेना को हरा पाना मुश्किल होगा. इस विषम परिस्थिति में महोबा की रानी मल्हना ने आल्हा-ऊदल को महोबा की रक्षा करने के लिए तुरंत वापस आने का सन्देश भिजवाया. सूचना मिलते ही आल्हा-ऊदल अपने चचेरे भाई मलखान के साथ महोबा पहुँच गए. परमाल के पुत्र रंजीत के नेतृत्व में पृथ्वीराज की सेना पर आक्रमण कर दिया गया. इस युद्ध की सूचना मिलते ही राजकुमारी चंद्रावलि का ममेरा भाई अभई (रानी मल्हना के भाई माहिल का पुत्र) उरई से अपने बहादुर साथियों के साथ महोबा पहुँच गया. लगभग 24 घंटे चले इस भीषण युद्ध में आल्हा-ऊदल के अद्भुत पराक्रमवीर अभई के शौर्य के चलते पृथ्वीराज चौहान की सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा. इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान का पुत्र सूरज सिंह भी मारा गया. इसके अलावा राजा परमाल का पुत्र रंजीत सिंह और वीर अभई भी वीरगति को प्राप्त हुए. कहा जाता है कि इसी युद्ध में पृथ्वीराज चौहान ने ऊदल की हत्या छलपूर्वक कर दी थी. जिसके बाद आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान को मारने की शपथ ली किन्तु बाद में अपने गुरु की आज्ञा मानकर संन्यास ग्रहण कर जंगल में तपस्या के लिए चले गए थे.

इस ऐतिहासिक विजय के बाद राजकुमारी चंद्रावलि और उसकी सहेलियों के साथ-साथ राजा परमाल की पत्नी रानी मल्हना नेमहोबा की अन्य महिलाओं ने भी भुजरियों (कजली) का विसर्जन किया. इसी के बाद पूरे महोबा में रक्षाबंधन का पर्व धूमधाम से मनाया गया. तब से ऐसी परम्परा चली आ रही है कि बुन्देलखण्ड में रक्षाबंधन का पर्व भुजरियों का विसर्जन करने के बाद ही मनाया जाता है. इसके बाद ही इस क्षेत्र में बहिनें रक्षाबंधन पर्व के एक दिन बाद भाइयों की कलाई में राखी बाँधती हैं. वीर बुंदेलों के शौर्य को याद रखने के लिए ही कहीं-कहीं सात दिनों तक कजली का मेला आयोजित किया जाता है. यहाँ के लोग आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम को नमन करते हुए बुन्देलखण्ड के वीर रण-बाँकुरों को याद करते हैं.


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26 मई 2020

गर्मी के दिनों का वो शीतल एहसास

गर्मी अब अपना असर दिखाने लगी है. इधर एक-दो दिन से नौतपा भी आरम्भ हो गए हैं. यह एक खगोलीय घटना है जो ज्येष्ठ महीने के शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि से आरम्भ होती है. इस वर्ष यह घटना 25 मई से आरम्भ हुई जबकि सूर्य का प्रवेश कृतिका से रोहिणी नक्षत्र में होगा. खगोल विज्ञान के अनुसार इस दौरान धरती पर सूर्य की किरणें सीधी लम्बवत पड़ती हैं. जिस कारण तापमान अधिक बढ़ जाता है. बुन्देलखण्ड में तो तापमान का वैसे भी चरम स्थिति पर पहुँच जाता है. इस बार गर्मी नौतपा से कुछ दिन पहले से ही अपना असर दिखाने लगी.


गर्मी के दिन शुरू होते ही याद आने लगते हैं वे दिन जबकि घर में न कूलर हुआ करता था. एसी जैसी कोई चीज भी होती है, तब कल्पना में भी नहीं था ऐसा कुछ. उन दिनों आज की तरह घरों में घुसे रहने का चलन भी नहीं था. हाँ, इसे चलन ही कहा जायेगा क्योंकि आज बार-बार कहने के बाद भी घर के लोग ही छतों पर जाना पसंद नहीं करते हैं. उन दिनों शाम का बेसब्री से इंतजार हुआ करता था. दिन भर की गर्मी से बचते हुए शाम के आते ही छतों को पानी से नहला दिया जाता था. उनकी दिन भर की गर्माहट शांत होते ही छत हम सबके लिए बिस्तर भी बनती, खाने की मेज भी बनती, पढ़ने की मेज भी बनती. और तो और बच्चों के लिए खेल का मैदान भी बन जाती थी. रात में पड़ोस के सभी परिवारों का छत पर जुटना, अपनी-अपनी छत पर रहने के बाद भी एकसाथ भोजन करने का एक पारिवारिक एहसास स्वतः ही बन जाता था. किसी के घर से सूखी सब्जी, किसी की छत से अचार का आना, किसी की छत तक आम का पना पहुँच जाना ऐसे होता था जैसे सभी डायनिंग टेबल पर एकसाथ बैठे हों.


ऐसा नहीं कि रात ही ऐसे हँसते-खेलते कटती थी. दोपहर भी बड़ी सुखद लगती थी. आज के जैसी गर्मी तो नहीं होती थी मगर इतनी अवश्य होती थी कि गर्मी समझ आये. तब घर में कूलर नहीं हुआ करता था. खिड़कियों, दरवाजों पर खस की टटियाँ लग जाया करती थीं. कुछ-कुछ समयांतराल में उनको पानी से भिगाना पड़ता था. भीगने के कारण उनसे छनकर आती हवा ठंडक के साथ सुगंध का एहसास भी करवाती थी. पूरा कमरा सुगन्धित ठंडक से भरा रहता था. हम भाइयों के बीच कई बार उसमें पानी के छिड़काव के लिए लड़ाई भी हो जाया करती थी. गर्मी के उन दिनों में हम लोगों के लिए यही एक खेल हुआ करता था.

अब कूलर, एसी की आदत पड़ी हुई है लोगों में. ऐसे में खश के परदे भी यदा-कदा देखने को मिलते हैं. पिछली बार कोई चार-पाँच साल पहले दोपहर में एक व्यक्ति की आवाज़ ने चौंका दिया. वह खस की टटियाँ बनाता था. उसी से परदे की तरह से कुछ बनवा लिए गए थे. जिनके द्वारा कुछ साल उसी खुशबू का, उसी ठंडक का एहसास फिर किया गया. अब फिर इंतजार है. हो सकता है फिर कोई आये और खस की उसी सुहानी खुशबू भरी ठंडक से भर जाए. इंतजार उस रात का भी है जबकि मोहल्ले भर के लोग फिर एकसाथ मिल बाँट कर भोजन कर रहे होंगे.

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12 अक्टूबर 2019

लोकोत्सव से दूर होता समाज : टेसू-झिंझिया


बुन्देलखण्ड के लोक आयोजन में टेसू और झिंझिया का खेल बच्चों द्वारा खेला जाता है. आश्विन शुक्ल अष्टमी से शरद पूर्णिमा तक टेसू तथा नवमी से चतुर्दशी तक झिंझिया खेली जाती है. टेसू का खेल बालकों द्वारा तथा झिंझिया का खेल बालिकाओं द्वारा खेला जाता है. बाँस की तीन डंडियों से बने एक ढाँचे को टेसू कहा जाता है, जिसको रंग-बिरंगे कागजों से सजाया जाता है. इसके सिर पर मुकुट लगाकर और हाथ में ढाल-तलवार लगाकर इसे एक वीर राजा जैसा स्वरूप दिया जाता है. इस खेल में लड़के टेसू के रंग-बिरंगे ढाँचे को लेकर घर-घर जाते हैं और टेसू-गीत गाते हुए धन की माँग करते हैं. बालकों द्वारा गाये जाने वाले ये गीत विनोदी होते हैं और कई बार महज तुकबंदी के रूप में प्रयुक्त होते हैं. अनर्थक, देशज शब्दों का प्रयोग कर इन बालकों का उद्देश्य गीत को लय देना और हास्य प्रदान करके धन की प्राप्ति करना होता है.
टेसू मेरा यहीं खड़ा, खाने को माँगे दही बड़ा,
दही बड़े में पन्नी, टेसू माँगे अठन्नी.

इसी तरह से लड़कियों द्वारा झिंझिया का खेल खेला जाता है. इसके लिए उनके द्वारा मिट्टी का छोटा घड़ा लिया जाता है, जिसमें अनेक छेद किये जाते हैं. इसके अंदर अनाज तथा उसके ऊपर जलता दीपक रख दिया जाता है. इसे ही झिंझिया कहा जाता है. इसमें बालिकाएँ झांझी से झांझी तेरो ब्याह रचाओं गीत गाती हुई नृत्य भी करती हैं. झिंझिया-नृत्य में बालिकाएँ गोलाकार खड़ी हो जाती हैं और केंद्र में एक बालिका नृत्य करती है. वृत्ताकार खड़ी बालिकाएँ तालियों की थाप के द्वारा नृत्य को गति प्रदान करती हैं. इसमें सभी बालिकाओं को बारी-बारी से एक-एक करके केंद्र में आकर नृत्य करना होता है. इस नृत्य की विशेष बात ये होती है कि केंद्र में नृत्य करती बालिका अपने सिर पर रखी हुई झिंझिया का संतुलन बनाये रहती है. यह नृत्य टेसू-झिंझिया विवाह के समय भी होता है जो बालिकाओं की प्रसन्नता को दर्शाता है. इस घड़े को लेकर किशोरियों द्वारा घर-घर जाकर दानस्वरूप धन अथवा या अनाज की माँग करती हैं. कई जगह बालिकाएँ अन्य गीत गाते हुए दान चाहती हैं. इस लोक आयोजन के अंत में शारदीय पूर्णिमा को टेसू और झिंझिया का विवाह संपन्न होता है.

दशहरा के पश्चात् ये दोनों लोक-आयोजन बच्चों द्वारा संपन्न किये जाते दिखाई देते हैं. इधर विगत कई वर्षों से ऐसे आयोजनों में बच्चों की, बालिकाओं की सहभागिता में जबरदस्त कमी आई है. तकनीकी के विकास ने जहाँ लोगों को मोबाइल में कैद करवा दिया है वहीं इस तरह के लोक-पर्वों को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है. सामान्य परिवार के लोग भी अपने बच्चों को ऐसे आयोजनों में सहभागिता करने से रोकते हैं. इधर देखने में आ रहा है कि कुछ बच्चे टेसू लेकर आ रहे हैं, कुछ बच्चियाँ झिंझिया लेकर आ रही हैं मगर उनकी संख्या में कमी आई है. टेसू लेकर आने वालों में अब बच्चों का झुण्ड नहीं वरन एक-दो बच्चों का ही आना होता है. इसी तरह शाम के, रात के साए में चमकने वाली झिंझिया अब लगभग दिन जैसे उजाले में आने लगी है. इसके पीछे बच्चियों की असुरक्षा बहुत मायने रखती है. 

पिछले दो-तीन वर्षों में देखने में आया है कि ऐसे लोक-आयोजनों में अब क्षेत्रवासियों द्वारा रुचि नहीं ली जा रही है. आधुनिकता की चपेट में आने के चलते लोग अपनी संस्कृति, अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं. आर्थिक रूप से विपन्न परिवारों के बच्चे ही ऐसे आयोजनों को करते दिख रहे हैं. टेसू और झिंझिया लेकर निकले बालक-बालिकाओं से इस सम्बन्ध में चर्चा करने पर तमाम ऐसी बातें सामने आईं जो लोगों को ऐसे लोकोत्सवों से दूर कर रही हैं. लोगों के लिए ये लोकोत्सव नहीं वरन आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के खेल हैं. समाज में जो लोग भी खुद को आर्थिक रूप से संपन्न समझने लगे हैं, अब वे अपने बच्चों को ऐसे आयोजनों से दूर रखने लगे हैं. सोचने वाली बात है कि अपनी संस्कृति से अलग होकर हम सभी किस समाज की संकल्पना तैयार करने में लगे हैं?

वर्तमान में भले ही ऐसे आयोजनों को नगरों में स्वीकार्यता नहीं मिल पा रही हो किन्तु बुन्देलखण्ड के ग्रामीण अंचलों और छोटे कस्बों में आज भी ये लोक आयोजन पूरे उत्साह, धूमधाम से मनाये जाते हैं. अपनी संस्कृति को सुरक्षित, संवर्धित करने के लिए आवश्यक है कि नई पीढ़ी को इसकी जानकारी दी जाए और इसके आयोजन के लिए सक्रिय किया जाये, प्रोत्साहित किया जाये. यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो भविष्य में अनेक बुन्देली लोक कलाएँ विलुप्त होकर महज इतिहास बन जाएँगी.

16 अगस्त 2019

बुन्देलखण्ड की संस्कृति में आज भी जीवित है कजली


आधुनिकता का पर्याप्त प्रभाव होने के बाद भी बुन्देलखण्ड क्षेत्र में पावन पर्व कजली उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है. यहाँ की लोक-परम्परा में शौर्य-त्याग-समर्पण-वीरता के प्रतीक मने जाने वाले कजली का विशेष महत्त्व है. इस क्षेत्र के परम वीर भाइयों, आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम के साथ-साथ अन्य बुन्देली रण-बाँकुरों की विजय-स्मृतियों को अपने आपमें संजोये हुए कजली मेले का आयोजन आठ सौ से अधिक वर्षों से निरंतर होता आ रहा है. सावन महीने की नौवीं से ही इसका अनुष्ठान शुरू हो जाता था. घर-परिवार की महिलाएँ खेतों से मिट्टी लाकर उसे छौले के दोने (पत्तों का बना पात्र) में भरकर उसमें गेंहू, जौ आदि को बो देती थी. नित्य उसमें पानी-दूध को चढ़ाकर उसका पूजन किया जाता था, इसके पीछे उन्नत कृषि, उन्नत उपज होने की कामना छिपी रहती थी. सावन की पूर्णिमा को इन पात्रों (दोने) में बोये गए बीजों के नन्हें अंकुरण (कजली) को निकालकर दोनों को तालाब में विसर्जन किया जाता था. बाद में इन्हीं कजलियों का आपस में आदरपूर्वक आदान-प्रदान करके एक दूसरे को शुभकामनायें देते हुए उन्नत उपज की कामना भी की जाती थी. ये परम्परा आज भी चली आ रही है, बस इसमें शौर्य-गाथा के जुड़ जाने से आज इसका विशेष महत्त्व हो गया है.

कजली विसर्जन में बिटिया रानी - उरई, माहिल तालाब 

बुन्देलखण्ड के महोबा राज्य पर पृथ्वीराज चौहान की नजर लगी हुई थी. इसी कारण एक साजिश रचकर कुछ विरोधियों ने महोबा के अतुलित वीर भाइयों आल्हा-ऊदल को राज्य से निकलवा दिया था. पृथ्वीराज चौहान को भान था कि आल्हा और ऊदल के न होने के कारण महोबा की सैन्य क्षमता कमजोर हो गई होगी. ऐसे में अब महोबा को जीतना संभव है. सन 1182 में पृथ्वीराज चौहान ने महोबा पर आक्रमण की एक योजना बनाई. उसने महोबा की राजकुमारी के अपहरण की योजना बनाई और तय किया गया कि कजलियों के विसर्जन के समय ही आक्रमण करके राजकुमारी का अपहरण कर लिया जाये. महोबा के राजा परमाल की पुत्री चंद्रावलि अपनी हजारों सहेलियों और महोबा की अन्य दूसरी महिलाओं के साथ प्रतिवर्ष कीरत सागर तालाब में कजलियों का विसर्जन करने जाया करती थी. अपनी विजय को सुनिश्चित करने और राजकुमारी के अपहरण के लिए उसके सेनापति चामुंडा राय और पृथ्वीराज चौहान के पुत्र सूरज सिंह ने महोबा को घेर लिया. जिस समय ये घेरेबंदी हुई उस समय आल्हा-ऊदल कन्नौज में थे. 

राजा परमाल खुद ही आल्हा-ऊदल को राज्य छोड़ने का आदेश दे चुके थे, ऐसे में उनके लिए कुछ कहने-सुनने की स्थिति ही नहीं थी मगर उनके साथ-साथ सभी लोग जानते थे कि आल्हा-ऊदल के बिना पृथ्वीराज चौहान की सेना को हरा पाना मुश्किल होगा. इस विषम परिस्थिति में महोबा की रानी मल्हना ने आल्हा-ऊदल को महोबा की रक्षा करने के लिए तुरंत वापस आने का सन्देश भिजवाया. सूचना मिलते ही आल्हा-ऊदल अपने चचेरे भाई मलखान के साथ महोबा पहुँच गए. परमाल के पुत्र रंजीत के नेतृत्व में पृथ्वीराज की सेना पर आक्रमण कर दिया गया. इस युद्ध की सूचना मिलते ही राजकुमारी चंद्रावलि का ममेरा भाई अभई (रानी मल्हना के भाई माहिल का पुत्र) उरई से अपने बहादुर साथियों के साथ महोबा पहुँच गया. लगभग 24 घंटे चले इस भीषण युद्ध में आल्हा-ऊदल के अद्भुत पराक्रम, वीर अभई के शौर्य के चलते पृथ्वीराज चौहान की सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा. सेना रणभूमि से भाग गई. इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान का पुत्र सूरज सिंह भी मारा गया. इसके अलावा राजा परमाल का पुत्र रंजीत सिंह और वीर अभई भी वीरगति को प्राप्त हुए. कहा जाता है कि इसी युद्ध में पृथ्वीराज चौहान ने ऊदल की हत्या छलपूर्वक कर दी थी. जिसके बाद आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान को मारने की शपथ ली किन्तु बाद में अपने गुरु की आज्ञा मानकर संन्यास ग्रहण कर जंगल में तपस्या के लिए चले गए थे.

इस ऐतिहासिक विजय के बाद राजकुमारी चंद्रावलि और उसकी सहेलियों के साथ-साथ राजा परमाल की पत्नी रानी मल्हना ने, महोबा की अन्य महिलाओं ने भी भुजरियों (कजली) का विसर्जन किया. इसी के बाद पूरे महोबा में रक्षाबंधन का पर्व धूमधाम से मनाया गया. तब से ऐसी परम्परा चली आ रही है कि बुन्देलखण्ड में रक्षाबंधन का पर्व भुजरियों का विसर्जन करने के बाद ही मनाया जाता है. इसके बाद ही इस क्षेत्र में बहिनें रक्षाबंधन पर्व के एक दिन बाद भाइयों की कलाई में राखी बाँधती हैं. वीर बुंदेलों के शौर्य को याद रखने के लिए ही कहीं-कहीं सात दिनों तक कजली का मेला आयोजित किया जाता है. यहाँ के लोग आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम को नमन करते हुए बुन्देलखण्ड के वीर रण-बाँकुरों को याद करते हैं.

03 अगस्त 2019

मामुलिया के आए लिबउआ, ठुमक चली मेरी मामुलिया

बुन्देलखण्ड क्षेत्र सदैव से अपने ताप के लिए जाना जाता रहा है. यहाँ की भीषण गर्मी, तपती दोपहरिया जैसे सबकुछ आग लगाने को आमादा रहती है. इसी जानलेवा गर्मी के बाद जब बारिश की फुहार लोगों के मन-मष्तिष्क को झंकृत करती है तो सभी लोग मगन हो उठते हैं. बारिश की बूँदें तपते बुन्देलखण्ड की न केवल धरती को वरन जनमानस को भी अपने आगोश में ले लेती है. समाज में रसमय, मधुर एवं प्रेम से सुसज्जित भावबोध का निर्माण होता है और स्वयं प्रकृति मनमोहक वातावरण का सृजन करती है. इसी सुरम्य वातावरण में बुन्देली बालिकाओं का प्रसिद्द लोकोत्सव मामुलिया अथवा महबुलिया का प्रारम्भ होता है. बुन्देली लोक-कला मामुलिया में लोकमानस की कलात्मकता के दर्शन होते हैं. यह जनभावना तथा लोक कला का अनुपम उदाहरण मन जाता है. बुन्देलखण्ड क्षेत्र में यह खेल अविवाहित अथवा क्वांरी कन्याओं द्वारा खेला जाता है. इसका मुख्य उद्देश्य समाज को यह सन्देश देना होता है कि दुखों में भी प्रसन्नता के साथ जीवन व्यतीत किया जा सकता है. 



मामुलिया खेल में कन्यायें एक कांटेदार टहनी को अलंकृत करने का कार्य करती हैं. इसके लिए सबसे पहले एक कँटीली टहनी की स्थापना की जाती है. इसके बाद उसका अलंकरण किया जाता है. अलंकृत करने के दौरान उस टहनी में जितने भी काँटे होते हैं उन सभी काँटों पर अनेक प्रकार के फूल लगाये जाते हैं. इस तरह के पुष्प अलंकरण से वह कँटीली टहनी का एक फूल भरी शाखा के रूप में दिखाई देने लगती है. मनमोहक फूलों के सज जाने से अपने आपमें एक तरह की सुन्दरता आसपास दिखाई देने लगती है. उस कंटीली शाखा को जिसमें कि फूलों का अलंकरण कर दिया जाता है, उसी को मामुलिया कहते हैं. इसके अंलकरण के समय सभी बालिकायें गीत भी गाती जाती हैं. यह पूरा कार्य हिन्दू महीने के अनुसार आश्विन मास (अंग्रेजी महीनों के अनुसार सितम्बर-अक्टूबर) के कृष्ण पक्ष में साफ़-सुथरे स्थान, जिसे कि गोबर से लीप कर चौक से पूरा जाता है, पर संपन्न किया जाता है. इस स्थान पर मामुलिया की स्थापना या कि उसे प्रतिष्ठित करने के बाद हल्दी, अक्षत, पुष्पादि से उसकी पूजा की जाती है. इस तरह का अनुष्ठान पंद्रह दिन तक चलता है. पंद्रह दिन बाद अमावस की शाम को वे कन्यायें गीत मामुलिया के आये लिबउआ, ठुमक चली मोरी मामुलिया गाती हुईं अपने आसपास की नदी, तालाब आदि तक जाती हैं. यहाँ पर गाते-बजाते हुए उस पुष्पयुक्त शाखा का जल में विसर्जन कर दिया जाता है.

देखा जाये तो मामुलिया का लोकोत्सव अथवा खेल अपने आपमें विशुद्ध दार्शनिकता का समावेश किये हुए है. प्रतीकात्मक रूप में फूलों को सुख और काँटों को दुख माना गया है. इन्हीं से जीवन का निर्माण समझा जाता है. यह एक तरह का दर्शन ही है कि हम अपने जीवन को सजाने का कार्य करते रहते हैं और एक दिन उसको विदा कराने का क्षण आ जाता है. जीवन की इस क्षणभंगुरता को एक खेल के माध्यम से सहजता से बचपन में ही समझा दिया जाता है. इसे महज एक खेल नहीं वरन बुन्देलखण्ड में बचपन से ही संस्कारों, संस्कृति की शिक्षा देने का माध्यम समझा जा सकता है.

15 सितंबर 2018

झाँसी रानी का विवाह-स्थल


बुन्देलखण्ड क्षेत्र के कण-कण में ऐतिहासिकता, सांस्कृतिकता, पौराणिकता, दिव्यता, भव्यता समाहित है. झाँसी के गणेश बाजार स्थित महाराष्ट्र गणेश मंदिर में भी इनका समावेश देखने को मिलता है. भगवान गणेश को समर्पित इस मंदिर का अपना ही ऐतिहासिक महत्त्व है. इसी मंदिर में सन 1842 में झाँसी के राजा गंगाधर राव का विवाह रानी लक्ष्मीबाई के साथ संपन्न हुआ था. उस समय रानी लक्ष्मीबाई को मणिकर्णिका के नाम से जाना जाता था. विवाह पश्चात् औपचारिक रूप से उन्हें लक्ष्मीबाई नाम दिया गया. यह मंदिर झाँसी किले के प्रवेश द्वार पर स्थित है. इस कारण इसे किले का, निवासियों का, शहर का रक्षक माना जाता है.


इस मंदिर की वास्तुकला के आधार पर लगाया जाता है कि इसका निर्माण सन 1764 के आसपास हुआ होगा. सन 1857 की क्रांति में रानी लक्ष्मीबाई से बदला लेने के लिए अंग्रेजों ने इस मंदिर को भी ध्वस्त करने का प्रयास किया किन्तु वे इसमें पूरी तरह से सफल न हो सके. इसके बाद भी उन्होंने मंदिर के एक बहुत बड़े भाग को नष्ट कर दिया था. ऐसा बताया जाता है कि कतिपय आर्थिक कारणों से मंदिर को गिरवी रखना पड़ा था. बाद में तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर गोविन्द आत्माराव ढवले के प्रयासों से सन 1917 में इस मंदिर को मुक्त करवाया गया. उसी के बाद इसकी देखरेख के लिए महाराष्ट्र गणेश मंदिर समिति की स्थापना 22 नवम्बर 1917 को की गई. सार्वजनिक प्रयासों और सहायता से मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया और इसकी अनाधिकृत रूप से कब्जाई संपत्ति को वापस लिए गया. दस साल बाद 05 अगस्त 1927 को महाराष्ट्र गणेश समिति को नियमानुसार पंजीकृत करवाया गया. इस सम्बन्ध में एक शिलालेख वहाँ स्थित है.


इस मंदिर के प्रांगण में भगवान श्रीगणेश की प्रतिमा के साथ-साथ रिद्धि एवं सिद्धि की भी प्रतिमाएँ स्थापित हैं. मराठी समुदाय के अलावा आमजनमानस में भी इस मंदिर के प्रति आस्था है. राजा और रानी दोनों के मराठी होने के कारण इस मंदिर को महाराष्ट्र गणेश मंदिर के नाम से जाना गया, आज भी यह मंदिर इसी नाम से आम नागरिकों में जाना जाता है.


मंदिर का अंदरूनी हिस्सा 



रिद्धि, सिद्धि संग विराजे श्रीगणेश 

मंदिर प्रांगण 

प्रवेश द्वार 
एक प्रवेश द्वार ये भी 


27 अगस्त 2018

शौर्य-पराक्रम-बलिदान की प्रतीक है कजली


भुन्जरियों का पावन पर्व कजली बुन्देलखण्ड क्षेत्र में आज भी पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है. बुन्देलखण्ड क्षेत्र, जो विन्ध्य पर्वत श्रेणियों में बसा है, सुरम्य सरोवरों से रचा है, नैसर्गिक सुन्दरता से निखरा है वह सदैव ही अपनी संस्कृति, लोक-तत्त्व, शौर्य, आन-बान-शान के लिए प्रसिद्द रहा है. शौर्य-त्याग-समर्पण-वीरता को यहाँ सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में माना-जाना जाता है. इसके प्रतीक पर्व कजली का आज भी विशेष महत्त्व है. कजली मेला बुन्देलखण्ड क्षेत्र के दो परम वीर भाइयों आल्हा और ऊदल के शौर्य-पराक्रम के साथ-साथ अन्य बुन्देली रण-बाँकुरों की विजय-स्मृतियों को अपने आप में संजोये हुए है. इस मेले का आयोजन विगत आठ सौ से अधिक वर्षों से निरंतर होता आ रहा है. बुन्देलखण्ड में कजली को खेती-किसानी से सम्बद्ध करके भी देखा जाता है. गरमी की लू-लपट से सबकुछ झुलसा देने वाली आग में गर्म-तप्त खेतों को जब सावन की फुहारों से ठंडक मिलती है तो यहाँ का किसान खुद को खेती के लिए तैयार करने लगता है. कजली उत्सव का शुभारम्भ सावन महीने की नौवीं तिथि से ही शुरू हो जाता है. घर की महिलाएँ खेतों से मिट्टी लाकर उसे छौले के दोने (पत्तों का बना पात्र) में भरकर उसमें गेंहू, जौ आदि को बो देती हैं. नित्य उसमें पानी-दूध को चढ़ाकर उसका पूजन किया जाता है, इसके पीछे उन्नत कृषि, उन्नत उपज होने की कामना छिपी रहती है. सावन की पूर्णिमा को इन पात्रों (दोने) में बोये गए बीजों के नन्हें अंकुरण (कजली) को निकालकर इनको तालाब में विसर्जित किया जाता है. इसके बाद इन्हीं कजलियों को आपस में आदरपूर्वक आदान-प्रदान करते हुए एक दूसरे को शुभकामनायें दी जाती हैं तथा उन्नत उपज की कामना भी की जाती है. ये परम्परा आज भी चली आ रही है, बस इसमें शौर्य-गाथा के जुड़ जाने से आज इसका विशेष महत्त्व हो गया है.


ऐतिहासिकता के आधार पर ऐसा कहा जाता है बुन्देलखण्ड के महोबा राज्य पर पृथ्वीराज चौहान की नजर बहुत पहले से लगी हुई थी. महोबा राज्य के विरुद्ध साजिश रचकर कुछ साजिशकर्ताओं ने वहां के अद्भुत वीर भाइयों, आल्हा-ऊदल को महोबा राज्य से निकलवा दिया था. पृथ्वीराज चौहान को भली-भांति ज्ञात था कि महोबा के पराक्रमी आल्हा और ऊदल की कमी में महोबा को जीतना जीतना आसान होगा. महोबा के राजा परमाल की पुत्री चंद्रावलि अपनी हजारों सहेलियों और महोबा की अन्य दूसरी महिलाओं के साथ प्रतिवर्ष कीरत सागर तालाब में कजलियों का विसर्जन करने जाया करती थी. सन 1182 में दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान ने राजकुमारी के अपहरण की योजना बनाई और तय किया गया कि कजलियों के विसर्जन के समय ही आक्रमण करके राजकुमारी का अपहरण कर लिया जाये. अपनी विजय को सुनिश्चित करने और राजकुमारी के अपहरण के लिए उसके सेनापति चामुंडा राय और पृथ्वीराज चौहान के पुत्र सूरज सिंह ने महोबा को घेर लिया. जिस समय ये घेरेबंदी हुई उस समय आल्हा-ऊदल कन्नौज में थे.


महोबा राजा सहित सबको इसका एहसास था कि बिना आल्हा-ऊदल पृथ्वीराज चौहान की सेना को हरा पाना मुश्किल होगा. राजा परमाल खुद ही आल्हा-ऊदल को राज्य छोड़ने का आदेश दे चुके थे, ऐसे में उनके लिए कुछ कहने-सुनने की स्थिति थी ही नहीं. ऐसे विषम समय में महोबा की रानी मल्हना ने आल्हा-ऊदल को महोबा की रक्षा करने के लिए तुरंत वापस आने का सन्देश भिजवाया. सूचना मिलते ही आल्हा-ऊदल अपने चचेरे भाई मलखान के साथ महोबा पहुँच गए. परमाल के पुत्र रंजीत के नेतृत्व में पृथ्वीराज की सेना पर आक्रमण कर दिया गया. इस युद्ध की सूचना मिलते ही राजकुमारी चंद्रावलि का ममेरा भाई अभई (रानी मल्हना के भाई माहिल का पुत्र) उरई से अपने बहादुर साथियों के साथ महोबा पहुँच गया. लगभग 24 घंटे चले इस भीषण युद्ध में आल्हा-ऊदल के अद्भुत पराक्रम, वीर अभई के शौर्य के चलते पृथ्वीराज चौहान की सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा. सेना रणभूमि से भाग गई. इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान का पुत्र सूरज सिंह भी मारा गया. इसके अलावा राजा परमाल का पुत्र रंजीत सिंह और वीर अभई भी वीरगति को प्राप्त हुए. ऐसी किंवदंती है कि वीर अभई सिर कटने के बाद भी कई घंटों युद्ध लड़ता रहा था. कहा जाता है कि इसी युद्ध में पृथ्वीराज चौहान ने ऊदल की हत्या छलपूर्वक कर दी थी. जिसके बाद आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान को मारने की शपथ ली किन्तु बाद में अपने गुरु की आज्ञा मानकर संन्यास ग्रहण कर जंगल में तपस्या के लिए चले गए थे.

ऐतिहासिक विजय को प्राप्त करने के बाद राजकुमारी चंद्रावलि और उसकी सहेलियों के साथ-साथ राजा परमाल की पत्नी रानी मल्हना ने, महोबा की अन्य महिलाओं ने भी भुजरियों (कजली) का विसर्जन किया. इसी के बाद पूरे महोबा में रक्षाबंधन का पर्व धूमधाम से मनाया गया. तब से ऐसी परम्परा चली आ रही है कि बुन्देलखण्ड में रक्षाबंधन का पर्व भुजरियों का विसर्जन करने के बाद ही मनाया जाता है. वीर बुंदेलों के शौर्य को याद रखने के लिए ही कहीं-कहीं सात दिनों तक कजली का मेला आयोजित किया जाता है. यहाँ के लोग आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम को नमन करते हुए बुन्देलखण्ड के वीर रण-बाँकुरों को याद करते हैं.


20 अगस्त 2018

अनाज बैंक का उद्देश्य - कोई भी भूखा न सोये

उत्तर प्रदेश का बुन्देलखण्ड क्षेत्र अनेकानेक प्राकृतिक संपदाओं से संपन्न होने के बाद भी भोजन, पानी की समस्या से परेशान बना रहता है. हालत इस तरह की हो चुकी है कि ग्रामीण अंचलों के बहुतायत गाँवों से युवाओं को पलायन करके शहरी क्षेत्रों की तरफ जाना पड़ रहा है. बारिश की स्थिति विगत कई वर्षों से ऐसी है जिससे सूखे के हालात उत्पन्न होते रहे हैं. खेत के खेत सूखे की चपेट में आ रहे हैं. फसलें खड़े-खड़े बारिश के इंतजार में सूखने लगती हैं. खाद्यान्न की जबरदस्त कमी के चलते बुन्देलखण्ड क्षेत्र के अनेक गाँवों में भुखमरी जैसे हालात पैदा होने लगते हैं. विगत वर्ष कुछ गाँवों से भूख से मौत की खबरें आने के बाद प्रशासनिक लीपापोती शुरू कर दी गई थी. स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि फसलों के अभाव में जानवरों के लिए चारे की भी समस्या उत्पन्न हो जाती है. इसके चलते यहाँ के निवासी अपने पालतू जानवरों को खुला छोड़ देते हैं. जिसके चलते अन्ना समस्या भी बुन्देलखण्ड में विकराल रूप धारण करने लगी है. भूख की स्थिति के कारण ही अनेकानेक अपराधों को प्रश्रय मिलता है. कोई भी व्यक्ति किसी भी स्थिति में बना रह सकता है मगर अपनी भूख के चलते, अपने परिजनों की भूख के चलते, अपने बच्चों की भूख के चलते वह किसी भी तरह के अपराध को करने को प्रवृत्त हो जाता है. भूख ही मनुष्य को अपराध की तरफ ले जाती है, भूख ही उसे मौत की तरफ ले जाती है, भूख ही व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाने लगती है.


अभी हाल में दिल्ली में भूख से तीन बच्चियों की मृत्यु के मामले ने सबको झकझोर कर रख दिया. इस एक घटना से ऐसा लगा जैसे समाज से संवेदना एकदम समाप्त हो चुकी है. दिल्ली जैसी जगह में भूख से तीन-तीन बच्चियों की मृत्यु का होना अपने आपमें शर्मनाक स्थिति है. आखिर समाज को क्या होता जा रहा है? सरकारी कदमों, योजनाओं की खिल्ली हम समाज के लोग आये दिन उड़ाते रहते हैं. इसके उलटे कभी एक कदम बढ़कर हम ही आगे क्यों नहीं आते हैं? यह एक ऐसा सवाल है जो उन तमाम लोगों के मुँह बंद करता है जो सिर्फ और सिर्फ तमाशबीन बने समाज को देखते रहते हैं. समाज के अनेकानेक असंवेदित लोगों के मध्य कुछ लोग ऐसे भी हैं जो भूख के खिलाफ पूरी ईमानदारी से लड़ाई लड़ने में लगे हैं. ऐसे ही लोगों में काशी के डॉ० राजीव श्रीवास्तव हैं जो अनाज बैंक के माध्यम से भूख के खिलाफ जंग छेड़े हुए हैं. उनके अनाज बैंक से प्रेरित होकर बुन्देलखण्ड में भी पहला अनाज बैंक उरई शहर में स्थापित किया गया. इसके द्वारा प्रतिमाह दो बार गरीब, असहाय महिलाओं को अनाज की व्यवस्था की जाती है. अनाज बैंक का उद्देश्य है कि कोई भी भूखा न सोने पाए. इसके लिए सामाजिक स्तर से प्राप्त होने वाली मदद के द्वारा गरीब महिलाओं की मदद की जाती है.


अनाज बैंक के द्वारा सिर्फ गरीब महिलाओं की ही नहीं वरन उनकी भी मदद की जाती है जो परिस्थिजन्य भूख से भी पीड़ित हैं. प्राकृतिक आपदाओं के चलते अपने घरों से विस्थापित लोगों को भोजन की व्यवस्था अनाज बैंक द्वारा की जाती है. अभी हाल ही में उरई के कुछ क्षेत्रों में बारिश का पानी भर जाने के कारण बेघर हुए लगभग तीन सौ लोगों को अनाज बैंक, उरई द्वारा दोनों समय भोजन की व्यवस्था की गई. ऐसे में सवाल उठता है कि कैसे भूख से लोगों की मौत हो जाती है? क्या आज भी समाज किसी संस्था, किसी एक व्यक्ति के भरोसे ही बैठा है? क्या एक-एक परिवार इतना भी सक्षम नहीं कि वह अपने बगल के गरीब, मजबूर परिवार को एक समय का भोजन करवा सके? क्या किसी मोहल्ले में इतनी भी संवेदना शेष नहीं कि वह अपने बीच के एक परिवार को सप्ताह में दो-चार दिन भोजन उपलब्ध करवा सके? काशी से विश्व के पहले अनाज बैंक के रूप में शुरू हुआ अभियान अब बुन्देलखण्ड में भी सफलतापूर्वक संचालित है. अनाज बैंक का उद्देश्य यही है कि समाज में कोई भी भूखा न रहे. समाज के लोगों को, समाज के लोगों द्वारा ही जगाने का, भूख से बचाने का काम अनाज बैंक के द्वारा किया जा रहा है. अपेक्षा यही की जा सकती है कि आने वाले दिनों में कोई मृत्यु भूख के कारण न होने पाए.