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06 दिसंबर 2025

हाथ पहले दिन भी खाली थे, हाथ आज भी खाली हैं

06 दिसम्बर राष्ट्रीय स्तर पर महत्त्वपूर्ण तो है ही, व्यक्तिगत स्तर पर हमारे लिए भी महत्त्वपूर्ण है. बाबरी ढाँचे के ध्वंस से इतर सन 2005 में इसी दिन गांधी महाविद्यालय, उरई में अध्यापन कार्य हेतु अपना पहला कदम रखा था.


आज बीस वर्ष की समाप्ति बाद अपनी इस यात्रा को देखते हैं तो इसमें न संतुष्टि नजर आती है, न उपलब्धि. ऐसा महसूस होता है कि जैसे एक बहुत लम्बा और महत्त्वपूर्ण समय निरर्थक गुजार दिया.


इन बीस वर्षों में अपने जीवन में बहुत सारे उतार-चढ़ाव देखे जो इस कार्यक्षेत्र से सम्बंधित भी रहे और नितांत पारिवारिक भी रहे. दोनों के साथ तालमेल बिठाने का प्रयास करते हुए आगे भले ही बढ़ते रहे मगर कहीं आगे पहुँच न पाए. गम्भीरता से जब अपना ही आकलन करते हैं तो एहसास होता है कि आज भी उसी स्थिति में खड़े हैं जहाँ 06 दिसम्बर 2005 को खड़े हुए थे. 


जिनको वेतन सम्बन्धी आँकड़ा उपलब्धि लगता होगा उनको ये बात हजम नहीं होगी. ये सही है कि नौकरी के पहले दिन और आज के वेतन में बहुत बड़ा अंतर आया है मगर धनोपार्जन को उपलब्धि नहीं कहा जा सकता है. विगत वर्षों में अनेकानेक कारणों से जिस तरह से कार्यक्षेत्र में विसंगतियों से जूझना हुआ है, खुद का सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य से दूर होना हुआ है, लेखन-साहित्य के क्षेत्र से जुड़े रहने के बाद भी अनमना सा रहा है उसने एक तरह की शून्यता ही पैदा की है.


बहरहाल, कहानी बहुत लम्बी और बड़ी है. सारांश महज इतना ही है कि इन बीस वर्षों की अध्यापन यात्रा में मिला कुछ नहीं और खोया बहुत कुछ है; पाया कुछ नहीं पर गँवाया बहुत कुछ है. हाथ पहले दिन भी खाली थे, हाथ आज भी खाली हैं.




25 जुलाई 2023

खुद का जीवन खुद से जिएँ

जीवन को लेकर जिस तरह से बहुत सारे विद्वानों, दार्शनिकों आदि ने अपने-अपने विचार रखे हैं, देखा जाये तो वे जीवन के प्रति दृष्टि को सुलझाने से ज्यादा उलझाते ही हैं. उनके विचारों को पढ़ने-सुनने पर प्रतीत होता है कि जीवन को सिरे से नकारते हुए आगे बढ़ना है. जीवन के सुख-दुःख से नितांत परे होकर बस आगे ही आगे बढ़ते जाना है. संभव है कि उनका अपना अनुभव ऐसा रहा हो जहाँ निरपेक्ष भाव से आगे चलते रहने में ही जीवन का वास्तविक आधार हो.




ऐसे दार्शनिकों, विचारकों, विद्वानों के विचारों से किसी भी तरह का तर्क-वितर्क न करते हुए सभी को अपने अनुभवों के आधार पर ही जीवन को जीते रहने का प्रयास करना चाहिए. यहाँ ऐसा इसलिए कहना हो रहा है क्योंकि समाज में एक-एक व्यक्ति अपने आपमें नितांत व्यक्तिगत इकाई है. एक माता-पिता की सभी संतानें भी गुणों के, चरित्र के, व्यवहार के आधार पर एक जैसी नहीं होती. उनके बीच भी तमाम असमानताएँ स्पष्ट रूप से देखने को मिलती हैं. उनके अपने-अपने जीवन के अपने-अपने अनुभव होते हैं. बहुतायत स्थिति में एक जैसी परिस्थिति में भी उनके बीच के अनुभव अलग-अलग होते हैं. ऐसे में ये कैसे संभव है कि दो अलग-अलग लोगों के जीवन का चाल-चलन एक जैसा हो? उनके जीवन के अनुभव दूसरों के जीवन पर खरे उतरें? उनकी जीवन-शैली कैसे दूसरे की जीवन-शैली बने?


प्रत्येक व्यक्ति का अपना जीवन है, अपनी जीवन-शैली है, अपने अनुभव हैं. ऐसे में उस व्यक्ति के अपने अनुभवों के आधार पर ही उसे अपने जीवन का आकलन करना चाहिए. दूसरे का जीवन, चाहे वह एकदम सामान्य है, सादा है अथवा तड़क-भड़क वाला है उसका अनुसरण दूसरे व्यक्ति के लिए कष्ट का विषय ही बनता है. इस तरह की स्थितियों में व्यक्ति कभी भी संतुलन की, सामंजस्य की स्थिति में नहीं रहता है. 





 

09 मार्च 2023

अनुभव से भी सीखने का प्रयास होना चाहिए

जीवन में मिलते अनुभवों से यदि व्यक्ति सीखने की कोशिश नहीं करता है तो इसका अर्थ है कि वह ज़िन्दगी में सीखने के प्रयासों पर ध्यान नहीं दे रहा है. व्यक्ति का जीवन स्वयं में सीखते रहने की पाठशाला है. यहाँ हर पल कुछ न कुछ नया सीखने को मिलता रहता है. ये आवश्यक नहीं कि व्यक्ति को सभी चीजें उसके शिक्षकों से, पुस्तकों से, शैक्षिक संस्थानों से अथवा पढ़े-लिखे लोगों से ही सीखने को मिलें. बहुत बार ऐसा होता है कि व्यक्ति की उम्र से छोटे लोग भी उसे बहुत कुछ सिखाते हैं. अक्सर देखने में आता है कि अशिक्षित व्यक्ति के माध्यम से बहुत कुछ सीखने को मिलता है. यहाँ एक बात ध्यान रखने की होती है कि ऐसा उसी स्थिति में होता है जबकि व्यक्ति अपनी मनःस्थिति सीखने वाली बनाये हो.




इधर देखने में आ रहा है कि लोगों में सीखने के प्रति ललक का अभाव होता जा रहा है. किसी व्यक्ति को सीखने के प्रति आकर्षित होते बहुत कम देखा जाता है. किसी नए काम को करने के सम्बन्ध में भी किसी व्यक्ति के द्वारा इस तरह का बर्ताव किया जाता है जैसे कि वह उस सम्बन्ध में बहुत कुछ जानता है. सीखने के प्रति इस तरह की नकारात्मकता के कारण ही वर्तमान पीढ़ी किसी नवीन विचार, वस्तु, जानकारी के प्रति बहुत उत्साहित नहीं दिखाई पड़ती है. उसके लिए आज के दौर में कुछ भी ऐसा नहीं है जो नया हो. उसके लिए किसी भी अबूझ का हल इंटरनेट पर, स्मार्ट फोन पर उपलब्ध है. उसके द्वारा इस बात पर कभी विचार ही नहीं किया गया है कि सीखने की प्रक्रिया को कोई भी इंटरनेट, कोई भी स्मार्ट फोन पूरा नहीं कर सकता है. इनके द्वारा सीखने की प्रक्रिया को सरल बनाया जा सकता है, उससे सम्बंधित एक रास्ता दिखाया जा सकता है किन्तु सीखने की प्रक्रिया को जिस तरह से आपसी वैचारिक आदान-प्रदान से, समस्याओं के विमर्श भरे समाधान से प्राप्त किया जा सकता है, वह कहीं और से संभव नहीं है.


इसमें कहीं कोई दोराय नहीं कि वर्तमान दौर में इंटरनेट जानकारियों से समृद्ध है मगर इस बारे में किसी को कोई संदेह नहीं होगा कि समृद्ध जानकारियों के इस दौर में भी उसके पास भ्रामक जानकारी, संदेह, संशय बहुतायत में है. यही भ्रम, संदेह सीखने की किसी भी प्रक्रिया को न केवल अवरुद्ध करता है बल्कि सीखने वाले के मन में भी नकारात्मकता पैदा करता है. इससे निकलने का, बचने का बेहतर तरीका है कि हम सभी भले ही तकनीक का सहारा लें, इंटरनेट को सीखने का माध्यम बनायें, स्मार्ट फोन को माध्यम बनायें मगर अपने आसपास के अनुभवी लोगों से, व्यक्तियों से भी सम्बंधित प्रक्रिया के बारे में राय लेते रहें. अक्सर अनुभव से निकले खजाने इंटरनेट पर नहीं मिलते हैं, किसी स्मार्ट फोन की गैलरी में नहीं पाए जाते हैं. 





 

09 दिसंबर 2020

साझा करें लॉकडाउन के अपने अनुभव

आज बैठे-बैठे लॉकडाउन की चर्चा शुरू हो गई. इसी चर्चा में उन बंद दिनों की तमाम बातें सामने आईं. तमाम लोगों की बातों से निष्कर्ष निकला कि लॉकडाउन के वे दिन सभी के लिए पहली बार आये थे. बच्चे हों या बुजुर्ग सभी के जीवन में ऐसा समय शायद पहले कभी नहीं आया होगा. जिन लोगों ने पाकिस्तान और चीन के साथ होने वाले युद्ध का माहौल भी देखा होगा उनके लिए भी ये समय नया ही होगा. जैसा कि हम अपने अइया-बाबा से उस समय के बारे में सुनते रहे हैं, तब बहुतायत में ब्लैकआउट हुआ करता था मगर लोगों के बाहर निकलने पर प्रतिबन्ध नहीं था. इस बार कोरोना के चलते अवश्य ही ऐसा हुआ.




इस अप्रत्याशित माहौल के बारे में आज चर्चा छिड़ी तो लगा कि उन दिनों के बारे में लिखा जाना चाहिए. जो लोग लिख सकते हैं वे लिखें और जिनको कभी भी लिखने का अवसर न मिला वे भी इस बारे में लिखें. इस रचनाशीलता को भले ही साहित्यिक विधा में शामिल न माना जाये मगर उन दिनों के अनुभव सभी के लिए अलग-अलग रहे हैं. चौबीस घंटे घर के भीतर रहना, सभी तरह के कार्यों का बंद होना, व्यस्तता भरे कदमों का एकदम से खामोश सा हो जाना आदि-आदि सभी के लिए एक जैसा भले रहा हो मगर इन दिनों के अनुभव सभी के लिए अलग रहे होंगे.


इस बारे में एक पहल आज से आरम्भ की है. बाकी लोग कितना साथ देते हैं, ये अलग बात है मगर हम इस यात्रा पर निकल चुके हैं. यदि सब ठीकठाक रहा तो जल्द ही ऑनलाइन भी, ऑफलाइन भी लॉकडाउन समय के अनुभव, उन दिनों की जीवन-चर्या आपके सामने होगी. ये दिन ऐसे गुजरे जैसे कभी गुजरे नहीं और आगे न ही गुजरें ऐसी कामना है. इस कामना के बाद भी डर है कि जिस तरह की जीवन-शैली मनुष्य अपना चुका है, इस कोरोनाकाल के बाद भी बनाये हुए है, उससे लगता नहीं कि उसने कुछ सीखा है. आज नहीं तो कल संभव है कि इस समाज को इससे भी अधिक भयावह स्थिति का सामना करना पड़े. संभव है कि इस लॉकडाउन समय से अधिक गंभीर समय का सामना करना पड़े. हाल-फिलहाल, लगभग पाँच दशक का समय गुजारने के दौरान ऐसी स्थिति देखने को मिली. आगे क्या-क्या देखना होगा, सबकुछ समय के हाथ है.


ऐसी स्थिति के गवाह बनने के बाद सभी से अनुरोध है कि इन दिनों के अपने अनुभवों को अवश्य लिखें. वे हमारे लिए न सही मगर आने वाली पीढ़ी के लिए एक सबक अवश्य बनेंगे.



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वंदेमातरम्

08 दिसंबर 2020

ऐ ज़िन्दगी गले लगा ले - (1950वीं पोस्ट)

अधिकांशतः देखने में आता है कि जब कोई हमारे साथ होता है, हमारी नज़रों के सामने होता है, हमारी पहुँच में होता है तब हमें उसकी कदर नहीं होती है. यह स्थिति व्यक्ति, वस्तु, समय आदि सभी के लिए एकसमान रूप से प्रभावी होती है. हमारे पास जिसकी उपलब्धता होती है, उसकी फ़िक्र हम नहीं करते हैं. ऐसा अपने घर-परिवार के बुजुर्गों के मामले में बहुत होता है. उनके हमारे साथ रहने की स्थिति में हमें उनके अनुभवों का, उनके ज्ञान का, उनके कार्यों का भान होते हुए भी उसके बारे में विचार करने का, उनसे सीखने का जरा भी एहसास नहीं होता है. उम्र, समय, कार्यों, अनुभव आदि से बहुत अधिक सक्षम हमारे बुजुर्ग हमारे लिए एक अनमोल खजाना होते हैं, एक परिपक्व संस्थान की भांति हमारे साथ होते हैं मगर हम अपने में मगन उनसे लाभ नहीं ले पाते हैं.


आधुनिकता, भौतिकता की दौड़ में शामिल होकर बुजुर्गों के प्रति एक तरह का उपेक्षा का भाव समाज में दिखाई देने लगा है. भले ही घर-परिवार में बुजुर्गों को यथोचित सुख-सुविधाओं का ढेर लगा दिया जाये मगर उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलने-जुलने, उनके साथ समय बिताने के मामले में कमी आई है. विचार इसी बात पर किया जाना चाहिए कि घर के बुजुर्ग स्वयं को अकेला न महसूस करें. परिजनों को भी चाहिए कि वे अपने बुजुर्गों के अनुभवों का लाभ अपनी जीवन-शैली को सरल बनाने में, अपने कार्यों को और अधिक प्रभावी बनाने में लेने का प्रयास करें. जीवन में बहुत से पल ऐसे आते हैं जबकि व्यक्ति के सामने असमंजस की स्थिति होती है. ऐसी स्थिति में बहुत बार बुजुर्गों के अनुभव ही सहायक बनते हैं.


आज समय की, समाज की जैसी माँग है उसके अनुसार खुद को आधुनिक बनाना अपराध नहीं, खुद के लिए भौतिकता के संसाधनों का इस्तेमाल करना, उनका जुटाना दोष नहीं है मगर इसमें ध्यान इसका रखा जाना चाहिए कि संसाधनों के जुटाने में कहीं परिवार की असल सम्पदा तो नष्ट नहीं हो रही. घर का वास्तविक खजाना तो बेकार नहीं रहा.





(इस ब्लॉग की 1950वीं पोस्ट)
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वंदेमातरम्

21 अक्टूबर 2020

मुँह में चाँदी की चम्मच का सवाल

इधर बहुत लम्बे समय से विचार बन रहा था कि अपने ब्लॉग पर राजनीतिक, सामाजिक विवादों वाली पोस्ट नहीं लिखेंगे. इस ब्लॉग पर अब अपने जीवन की घटनाओं को, संस्मरणों को लिखेंगे. सामाजिक, राजनैतिक विषयों से सम्बंधित विवादित पोस्टों को लिखने का, उन पर विमर्श करने का कोई अर्थ समझ नहीं आ रहा है. इधर लोग अपने बनाये खाँचों में रहने के आदी होते जा रहे हैं. वे जो कह-कर रहे हैं, वही सही है, शेष गलत है. इस मानसिकता के चलते आपसी विद्वेष बढ़ने के और कुछ नहीं हो रहा है. दो-तीन दिन से अपने संस्मरण लिखने का विचार कर रहे थे मगर कुछ समझ नहीं आ रहा था. आज अचानक अपनी ही एक पुरानी पोस्ट नजर आ गई. उसी को फिर से आप सबके बीच कुछ संशोधनों के साथ लगा रहे हैं.


चाँदी की चम्मच मुँह में लेकर पैदा होना बचपन में इस वाक्य को जब भी पढ़ते, सुनते थे तो सोचा करते थे कि एक बच्चा कैसे इतनी बड़ी चम्मच लेकर पैदा होता होगा? हालांकि उस समय तो बच्चों के पैदा होने की प्रक्रिया ही हम लोगों की समझ से परे थी, कोई आज के बच्चे तो थे नहीं कि सब कुछ टी0वी0 पर, इंटरनेट पर दिखता हो। धीरे-धीरे अक्ल आई और उक्त वाक्य का सही अर्थ समझा। उस छुटपन में भी पिताजी के साथ, कभी अपने बाबाजी के साथ साइकिल पर बैठ कर स्कूल जाते हुए शहर में शान बघारतीं एक दो मोटरगाड़ियों को देखकर, कुछेक स्कूटरों को फरफराते देखकर लालच सा आता।




उन्हीं दिनों एक बड़ी ही रोचक घटना हुई जिसको लेकर आज तक परिवार में सभी हँसी-मजाक कर लेते हैं। हमारे मकान मालिक बहुत बुजुर्ग थे और उनके कोई सन्तान भी नहीं थी। सम्पन्नता के साथ-साथ उनको कंजूसी भी काफी सम्पन्नता में प्राप्त हुई थी। उनके पास उस समय एम्बेसडर कार थी, पूरे मुहल्ले में इकलौती कार। वह कार हम बच्चों के लिए बड़ी ही कौतूहल की वस्तु थी। अपने दोस्तों के साथ स्कूल में इसी बात पर रोब झाड़ लिया करते थे कि हमारे वकील बाबा के पास कार है। (उन मकान मालिक को जो कि एडवोकेट थे, बुजुर्ग होने के कारण हम बच्चे बाबा कहते थे) पता नहीं अपनी वृद्धावस्था के कारण, कंजूसी के कारण या फिर किसी पर भी विश्वास न करने के कारण जब उनको लगने लगा कि अब कार चलाना उनकी अवस्था के अनुरूप नहीं रहा तो उन्होंने उस कार को बेच दिया। बाबा अपनी कार स्वयं ही चलाते थे कभी कोई ड्राइवर नहीं रखा। कार बेच कर एक साइकिल खरीद ली।


इस घटना की घर में, मुहल्ले में बड़ी ही चर्चा हुई कि चचा को कंजूसी बहुत चढ़ी है, वृद्ध हो रहे हैं ऐसे में साइकिल चलायेंगे। अरे! एक ड्राइवर ही रख लेते, पैसे की कौन सी कमी है आदि-आदि बातें हम बच्चों के कानों में पड़ती ही रहतीं। हम छोटी बुद्धि के बालक कुछ समझ में तो आता नहीं था कि आखिर ये चक्कर क्या है? समझ कुछ आता नहीं बस ये ख़राब लगता कि अब कार में घूमने को नहीं मिलेगा।


धन, सपत्ति, पद, प्रतिष्ठा से इतर एक दिन हमने अपनी अम्मा से कहा जैसे वकील बाबा ने अपनी कार बेचकर साइकिल खरीद ली है क्या वैसे पिताजी अपनी साइकिल बेचकर कार नहीं खरीद सकते? अम्मा हँस दीं और प्यार से सिर पर हाथ फेरकर बोलीं अब तुम ही कार खरीदना और हम दोनों को घुमाना।


हम तो भौचक्के से रह गये थे कि जो सवाल हमने पूछा अम्मा ने उसका उत्तर तो दिया नहीं हमारे सिर पर एक काम और बता दिया। अम्मा की बात हमारे दिमाग में घूमती रही, आज भी घूमती है। पिताजी तो हमें छोड़कर चले गए, उनको कार से घुमाने का सपना हमारे लिए एक सपना ही रह गया। हालाँकि हम आज भी कार न ले सके। ऐसी स्थिति जो हमने बचपन में देखी थी और आज समाज में देखते हैं तो बचपन में सुने-पढ़े उस वाक्य का अर्थ समझ आता है। आज कुछ लोगों को देखने पर पता चलता है कि चाँदी की चम्मच मुँह में लेकर पैदा होना किसे कहा जाता है। एक तरफ युवा वर्ग है जो अपनी बेकारी से, घर-परिवार के भरण-पोषण की समस्या से जूझ रहा है और एक तरफ वो युवा वर्ग है जो अपने मुँह में चाँदी का चम्मच लेकर घूम रहा है, अपने बाप-दादा की, अपनी पुश्तैनी संपत्ति पर सिर्फ ऐश कर रहा है। एक तरफ ऐसे युवा हैं जो अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए किसी का वरदहस्त चाहते हैं और दूसरी ओर ऐसा युवा वर्ग है जिसकी चाटुकारिता में बड़े-बड़े अपने को धन्य समझ रहा है। देश के सर्वोच्च पद के लिए एक युवा का नाम उसकी काबिलियत के कारण नहीं मुँह में दबी चाँदी की चम्मच के कारण ही तो आ रहा है।


ऐसे में खुद से ही एक सवाल करते हैं और खामोश रह जाते हैं कि क्या देश का हर बच्चा चाँदी की चम्मच मुँह में दबाकर पैदा नहीं हो सकता है?


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

21 अप्रैल 2020

बने विश्व विजेता कुत्तों के बिस्किट के नाम पर

आजकल सभी फुर्सत में हैं और उसी फुर्सत में वे सभी लोग एक-दूसरे से पूरी तबियत से जुड़ते जा रहे हैं जो दिल से जुड़े हुए हैं. इसी जोड़ लगाने में हमारे हॉस्टल के भाई बड़े काबिल हैं. ग्रुप के माध्यम से दिन भर किसी न किसी की मौज ली जाती है. इसमें छोटे, बड़े किसी को नहीं छोड़ा जाता है पर ध्यान यही रखा जाता है कि मौज के लिए की जा रही किसी भी बात से, मजाक से, घटना से किसी बड़े भाई का अपमान न हो. रिश्तों की आत्मीयता, गरिमा बनाये रखते हुए बीते दिनों की बातें याद करते हुए दिन भर किसी न किसी रूप में हँसी-ठठ्ठा चलता रहता है. 


इसी में कुछ ऐसी बातें भी याद आ जाती हैं जो कहीं कोने में दब-छिप गईं हैं. ऐसी ही एक घटना याद आ रही हॉस्टल के समय की जबकि हम लोगों का सामना गोल आकार के बिस्किट से हुआ था. शायद ये बहुत से लोगों को आश्चर्य लग रहा होगा मगर सच यही है. ये बात वर्ष 1992 की है. उस समय तक पारले के चौकोर बिस्किट से ही हमने अपना स्वाद बनाया हुआ था. संभव है कि उस समय और भी बिस्किट आते हों मगर हमारी किस्मत में वही पारले का बच्चा था. एक शाम हम कुछ मित्र अपनी नियमित दिनचर्या के हिसाब से चाय पीने के लिए निकले. सड़क किनारे कई ट्रक रुके खड़े हुए थे. आगरा-बॉम्बे रूठ वाली ये सड़क ट्रकों के आवागमन से भरी रहती थी.


ट्रक खड़े देखे तो शैतानी सूझ उठी. हॉस्टल की वानर सेना में कुछ एक ज्यादा ही सक्रिय थे, हमारे जैसे, बस इधर-उधर से चढ़ने की जुगाड़ बनाई गई. ये शायद ट्रक में रखे सामान की किस्मत थी कि उसे हम सबके हाथ से सुशोभित होना था, सो एक किनारे से ट्रक पर बंधा हुआ कारपेट खुला था. संभव है कि हमारे ही अन्य भाइयों ने अपनी कलाकारी हमसे पहले दिखा ली हो और उसी का परिणाम ये खुली जगह रही हो. बहरहाल, इन सब बातों पर विचार किये बिना उसी खुले जगह से हाथ घुसाते हुए मुँह घुसाने तक की जगह बनाई. अँधेरे में सफल तीर मारने की अद्भुत क्षमता की धनी हॉस्टल सेना ने ट्रक में रखे गत्ते में तीर मार ही दिया.

कुछ पैकेट पकड़ में आये. रंगीन, चिकने से पैकेट कुछ अलग तरह के लगे. जल्दी-जल्दी कोई पंद्रह बीस पैकेटों को बंद गत्ते से आज़ाद करवाने के साथ ही हम सब दौड़ते हुए वापस हॉस्टल आ गए. जंगल की आग की तरह ये खबर हॉस्टल में फ़ैल गई. हमारी तरह के दो-तीन अलग-अलग ग्रुपों ने भी ट्रक में चढ़कर हमारी ही तरह कई-कई पैकेटों को मुक्ति दिलवाई. आपके संदेह को दूर करते चलें. उन बेचारे पैकेटों को आज़ादी दिलाने में आसानी इस कारण रही क्योंकि ट्रक के ड्राईवर, क्लीनर आदि आसपास के होटल, ढाबों में पेट भरने में लगे थे. वे पेट भरने में लगे थे और हम लोग गत्ते खाली करने में लगे थे. लालच न करते हुए बस दो-तीन राउंड लगाकर कुछेक बचे-खुचे पैकेटों को भी आज़ादी दिलवाई और फिर ख़ामोशी से हॉस्टल में आकर बैठ गए.


कमरा बंद करके, बड़ी ही गोपनीयता से पैकेट खोला तो उसमें से कुछ और पैकेट मुक्ति पा गए. उनको फाड़कर देखा तो गोल बिस्किट पलंग पर दर्शनार्थ बिखर गए. बिस्किट के चिर-परिचित आकार से अलग तरह के बिस्किट निकलते ही मूड ऑफ हो गया. पहली बार गोल बिस्किट देखे तो लगा कि ये हम लोगों के लिए नहीं बल्कि कुत्तों के खाने वाले बिस्किट हैं. जितनी ख़ुशी और जोश के साथ पैकेट थामे हॉस्टल में विजयी मुद्रा में लौटे थे वह गायब हो गई. इसके बाद भी हार न मानी. पैकेट उठाकर पढ़ने की कोशिश की मगर विशुद्ध अंग्रेजी भाषा के चलते सबकुछ दिमाग के ऊपर निकल गया.

अब चूँकि हार मानना तो सीखा नहीं था सो ग्रुप के सीक्रेट को छिपाते हुए कुछ मित्रों को काम दिया गया कि कैसे भी हो कल ही इसका पता लगाया जाये कि ये बिस्किट आदमियों के लिए हैं या जानवरों के लिए. बस अगले दिन का टास्क तय हो गया. दोपहर तक इसमें सफलता भी मिल गई कि ये बिस्किट अभी नए-नए आये हैं और इंसानों के लिए ही हैं. सफलता की एक ख़ुशी पर शाम तक तुषारापात हो गया जब पता चला कि दूसरे ग्रुप के पास हम लोगों से ज्यादा पैकेट हैं. अब क्या किया जाए? जो ग्रुप पूरे हॉस्टल में, कॉलेज में सबसे उत्पाती, सबसे बवाली, सबसे जोशीला, सबसे खुरापाती, सबसे सक्रिय आदि-आदि माना जाता हो, उसी के पास पैकेट कम. ये भी अपने आपमें हार समझ आई. आखिर हमारे रहते कोई और क्यों जीते? वो भी हमारा ही प्रतिद्वंद्वी ग्रुप.

अब इसका भी तोड़ निकालना था क्योंकि हारना नहीं था. बस फिर योजना बनाई गई. अब ये नहीं पता कि हमारी तरह का संशय दूसरे ग्रुप के पास था कि नहीं क्योंकि वे बड़ी चैतन्यता से बिस्किट खाते हुए दिख रहे थे. यही हम लोगों की योजना थी. जिसे ही उनको बिस्किट खाते देखते, हम मित्र हँसकर उनकी मौज लेने लगते. ऐसा दो-तीन बार हुआ तो उन्होंने इसका कारण पूछा. तो उनको बताया कि अबे तुम सब कुत्तों के बिस्किट खा रहे हो. उनको जानकारी थी कि हम लोग भी वे पैकेट निकाल कर लाये हैं मगर हममें से किसी को उन्होंने खाते नहीं देखा. बिस्किट का गोल होना उनको भी अचरज में डाले होगा. हमारे पैकेटों के बारे में उनको बता दिया कि एक दोस्त के घर कुत्ते हैं, उसको दे दिए.

इस पूरी योजना में, उनको समझाने में इतना अधिक विश्वास झलक रहा था कि वे इसे सही मान गए. इसी में उनके बिस्किट के कई पैकेट हम लोगों के हत्थे चढ़ गए. अब हमारा ग्रुप सबसे अधिक पैकेटों के साथ विश्व विजय की अनुभूति कर रहा था. कुछ दिन बाद सभी ने मिलजुल कर उन बिस्किट का स्वाद लिया और उसी स्वाद में दूसरे ग्रुप को बेवकूफ बनाये जाने पर हम सब बहुत दिन तक मौज लेते रहे.  

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

20 अप्रैल 2020

आ गिरे धरती माता की गोद में साइकिल समेत

किसी भी व्यक्ति के लिए पहली बार कोई नया काम करना कितना कठिन होगा कह नहीं सकते किन्तु हमारे लिए पहली बार साइकिल चलाना तो ऐसा था मानो हवाई जहाज चला रहे हों। उस समय कक्षा पाँच में पढ़ा करते थे। साइकिल चलाने का शौक चढ़ा। घर में उस समय पिताजी की साइकिल थी। पिताजी चले जाते थे कचहरी और शाम को आते, तब तक हम भी अपने स्कूल से लौट आते थे। कई बार की हिम्मत भरी कोशिशों के बाद पिताजी से साइकिल चलाने की मंजूरी ले ली। उस समय तक हमने साफ करने की दृष्टि से या फिर अपने बड़े लोगों के साथ बाजार, स्कूल आदि जाने के समय ही साइकिल को हाथ लगाया था। अब साइकिल चलानी तो आती ही नहीं थी तो बस उसे पकड़े पकड़े खाली लुड़काते ही रहे। कई दिनों के बाद साइकिल पर इतना नियंत्रण बना पाये कि वह गिरे नहीं या फिर इधर उधर झुके नहीं।



एक दिन हमारे स्कूल में किसी संस्था या फिर किसी और स्कूल के द्वारा (यह ठीक से याद नहीं) एक टेस्ट का आयोजन किया गया। इस पूरे टेस्ट में हमारे सबसे ज्यादा नम्बर आये थे। हम भी बहुत खुश थे और इसी खुशी में हमने पिताजी से साइकिल चलाने की अनुमति माँगी, जो मिल भी गई। अब क्या था, कई सप्ताह हो गये थे साइकिल को खाली लुड़काते लुड़काते। आज सोचा कि पिताजी भी खुश हैं हमारे रिजल्ट से, हो सकता है कि कुछ न कहें। बस आव देखा न ताव कोशिश करके चढ़ गये साइकिल पर। दो चार पैडल ही मारे होंगे कि साइकिल एक ओर को झुकने लगी।

यदि साइकिल चलानी आती होती तो चला पाते पर नहीं। अब हमारी समझ में नहीं आया कि क्या करें? न तो हैंडल छोड़ा जाये और न ही पैडल चलाना रोका जा रहा था। साइकिल झुकती भी जा रही थी और गति भी पकड़ती जा रही थी। गति और बढ़ती, पैडल और चलते, हैंडल और सँभलता उससे पहले ही वही हुआ जो होना था। हम साइकिल समेत धरती माता की गोद में आ गिरे। तुरन्त खड़े हुए कि कहीं किसी ने देख न लिया हो? कपड़े झाड़कर चुपचाप घर आकर साइकिल आराम से खड़ी कर दी। शाम को बाजार जाते समय पिताजी को उसकी कुछ बिगड़ी हालत देखकर पता चल ही गया। परिणाम पिटाई तो नहीं हुई क्योंकि पहली बार ऐसा हुआ था किन्तु साइकिल चलाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया।

देखा ऐसी रही हमारी पहली साइकिल सवारी बतौर चालक।