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15 फ़रवरी 2025

मौत की राह जाते बच्चे

सॉरी मम्मी-पापा, मेरा समय ख़त्म, माता रानी ने मुझे अठारह साल के लिए ही भेजा था. आत्महत्या करने के पूर्व लिखे पत्र में अदिति मिश्रा की ये भावनात्मक पंक्ति हृदय को हिला देने वाली है. जेईई परीक्षा में कम अंक आने से चयनित न होने के कारण निराश अदिति ने ऐसा कदम उठाया. समाज में इस तरह का न तो ये पहला मामला है और निश्चित रूप से अंतिम भी नहीं है. देश के विभिन्न हिस्सों से बच्चों के द्वारा परीक्षाओं में असफल रहने पर, कम अंक आने पर आत्महत्या करने की घटनाएँ सामने आती रहती हैं. आत्महत्या एक ऐसा शब्द है जो झकझोरने के अलावा और कोई भाव पैदा नहीं करता. यह एक शब्द नहीं बल्कि अनेकानेक उथल-पुथल भरी भावनाओं का, विचारों का समुच्चय है. इसके अलावा न जाने कितनी त्रासदी, न जाने कितना कष्ट, न जाने कितने आँसू, न जाने कितने सवाल भी इसमें छिपे होते हैं. ये सवाल उस समय और अधिक हृदय विदारक हो जाते हैं जबकि मौत की नींद सोने वाला हमारा भविष्य होता है, कोई नौनिहाल होता है.

 

प्रथम दृष्टया ऐसी घटनाओं में परीक्षा प्रणाली, नंबर गेम, भारी-भरकम पाठ्य-सामग्री आदि जिम्मेदार लगती है किन्तु यदि गम्भीरता से सम्पूर्ण सामाजिक परिदृश्य का अवलोकन किया जाये तो इसके पीछे वर्तमान सामाजिक-पारिवारिक व्यवस्था का यांत्रिक होना नजर आता है. इस यांत्रिक जीवन-शैली ने बचपनशिक्षाघर, परिवार आदि को प्रभावित किया है. ऐसा लगता है जैसे बचपन की भ्रूण हत्या कर दी गई है. हँसते-खेलते बच्चों की जगह बस्तों का बोझ लादेथके-हारेमुरझाये बच्चे दिखाई देते हैं. शरारतोंशैतानियों की जगह उनके चेहरों पर बड़ों-बुजुर्गों जैसी भाव-भंगिमासोच-विचार दिखाई देता है. उन्मुक्त खेलते बच्चों को कमरों में बंद कर दिया गया है और उनके हाथों में लैपटॉपमोबाइल थमा दिए गए हैं. बच्चे स्मार्टफोन की इंटरनेट दुनिया के कारण समय से पहले ही स्मार्ट हो रहे हैं.

 



यांत्रिक जीवन के लिए अनिवार्य बना दिए धन की आपाधापी में अभिभावकों का संलिप्त रहना उनको अपने ही बच्चों से दूर कर रहा है. उनके लिए भौतिकतावादी संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने को बहुतायत अभिभावकों द्वारा अपनी सफलता मान लिया गया है. तकनीक, भौतिकता की उन्नति को विकास का सूचक मानने का दुष्परिणाम यह हुआ कि अभिभावकों की महत्त्वाकांक्षाओं ने अनियमित राह पकड़ ली. इस अंधाधुंध दौड़ में उनके द्वारा बच्चों से न सिर्फ अच्छे अंक लाने की जबरदस्ती की जा रही है वरन दूसरे बच्चों से गलाकाट प्रतियोगिता सी करवाई जा रही है. बच्चों में आपसी सहयोग की, समन्वय की भावना विकसित करने के स्थान पर आपस में चिर-प्रतिद्वंद्विता पैदा की जा रही है. स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के स्थान पर कटुता पैदा की जा रही है. ज्ञान को आपस में बाँटने की जगह उसे अपने में ही कैद करके रखने की मानसिकता विकसित की जा रही है. बच्चों को किसी अन्य विद्यार्थी की असफलता के समय, उसकी आवश्यकता के समय उसकी मदद करने के बजाय उससे दूर रहने, उससे बचने की सलाह दी जा रही है. अपने चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ सफलता प्राप्त करने का शोर, दूसरे से आगे ही आगे बने रहने की होड़, किसी भी कीमत पर सबसे आगे आने और फिर सदैव आगे ही बने रहने का दबाव बच्चों को भीतर से खोखला बना रहा है. यही खोखलापन उनकी असफलता में, असफलता की आशंका में उन्हें सबसे दूर कर देता है. एक पल को विचार करिए कि कुछ अंकों के कारण एक हँसता-खेलता बच्चा सदैव के लिए खामोश हो जाये. विचार करिए उस बच्चे के अन्दर भय का, अविश्वास का वातावरण किस कदर भर गया होगा जो कम अंक आने के भय से दुनिया छोड़ देता है मगर अपने अभिभावक से बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है.

 

किसी भी परिवार के लिए उसके किसी भी सदस्य का चले जाना कष्टकारी होता है. ये कष्ट उस समय और भी विभीषक हो जाता है जबकि ऐसा किसी बच्चे के साथ हुआ हो. बच्चों द्वारा असफलता के भय से, कुछ प्रतिशत अंक कम आने से मौत की राह चले जाना समूची व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करता है. इक्कीसवीं सदी में जहाँ एक तरफ विमर्शों, स्वतंत्रता, फ्री सेक्स, हैप्पी टू ब्लीड, लिव-इन-रिलेशन आदि अतार्किक चर्चाओं में बुद्धिजीवियों से लेकर मीडिया तक निमग्न रहती है वहाँ बच्चों पर लादे जाने वाले अनावश्यक, अप्रत्यक्ष बोझ को दूर करने के लिए कोई चर्चा नहीं होती है. समाज के विभिन्न क्षेत्रों में, विभिन्न विषयों में अपनी सक्रियता दिखा रहे समाजशास्त्री, मनोविज्ञानी इस दिशा में संज्ञाशून्य से दिख रहे हैं. घर से लेकर स्कूल तक, अभिभावकों से लेकर शिक्षक तक सभी अपनी-अपनी मानसिकता का बोझ बच्चों के मन-मष्तिष्क पर लाद रहे हैं. अपने अतृप्त सपनों को, अपने उस कैरियर को जो वे नहीं बना सके, बच्चों के माध्यम से पूरा करने का जोर लगाये हैं. अपने बच्चों को साक्षर, शिक्षित, संस्कारित बनाये जाने से ज्यादा ध्यान इस तरफ है कि वे कैसे अधिक से अधिक अंकों से सफलता प्राप्त करें. वे बच्चों की शिक्षा की बुनियाद को मजबूत करने के स्थान पर उनके मन में अधिकाधिक पैकेज वाली जॉब को पाने का लालच भरने में लगे हैं.

 

ऐसे माहौल में जबकि बच्चे को अपनी परेशानीअपनी निराशाअपनी हताशाअपनी समस्या के निपटारे के लिए कोई रास्ता नहीं दीखता हैकोई अपना नहीं दिखता है तब वह घनघोर रूप से एकाकी महसूस करता हुआ खुद को जीवन समाप्ति की तरफ ले जाता है. अपने बच्चों के बीच बिना बैठेउनके साथ बिना खेलेउनके मनोभावों को बिना बाँटे हम बच्चों को बचाने में लगभग असफल ही रहेंगे. अच्छा हो कि अपना समय हम अपने बच्चों के साथ शेयर करें जिससे हम उनके हँसते-खेलते बचपन में अपना बचपन देख सकें, अपने बच्चों का जीवन सुरक्षित रख सकें.


25 मार्च 2023

भावनात्मकता से दूर होता समाज

आये दिन खबरें आ रही हैं युवाओं की मौत की. बहुत बड़ी संख्या में मौत का शिकार बन रहे युवाओं में बहुत कम ऐसे हैं जो सामान्य जीवन व्यतीत करते हुए मौत की नींद सो गए. समाचारों, जानकारियों के अनुसार बहुत बड़ी संख्या में अवसाद के कारण, किसी बीमारी के कारण, हार्ट अटैक के कारण, आत्महत्या करके युवा मौत का शिकार बन रहे हैं. इन युवाओं की उम्र बहुत अधिक नहीं है. इनमें से बहुत तो किशोरावस्था के होंगे. बहरहाल, इन युवाओं की उम्र कुछ भी रही हो, वह चिंता का विषय हो उससे बड़ी चिंता का विषय उनका असमय चले जाना होना चाहिए. किसी भी युवा की मौत पर कुछ दिन का मातम मना लिया जाता है, उसके कामों के कारण उसे याद कर लिया जाता है और फिर सभी अपने-अपने काम पर लग जाते हैं. इस तरफ ध्यान देने की कोई आवश्यकता महसूस नहीं की जा रही कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में युवाओं की मौत क्यों हो रही है? सभी युवा आत्महत्या नहीं कर रहे हैं मगर बहुत बड़ी संख्या ऐसे युवाओं की है हो हार्ट अटैक का शिकार बने हैं. ये भी सोचने का विषय होना चाहिए कि आखिर ऐसी किस तरह की जीवन शैली समाज में चलन में आती जा रही है कि तीस से चालीस वर्ष तक के युवा भी हृदयाघात का शिकार होने लगे हैं?




वैसे यदि हम सकारात्मकता के साथ अपने आसपास निगाह डालें, अपनी ही दिनचर्या पर विचार करें, अपने संपर्क और लोगों से मेल-मुलाक़ात पर ध्यान दें तो हमें खुद एहसास होगा कि किस तरह से हम सभी लगातार एकाकी जीवन जीने की तरफ बढ़ रहे हैं. दिन-दिन भर सोशल मीडिया पर आभासी संपर्क भले बना रहे मगर व्यक्तिगत रूप से हम लोग आपस में बहुत कम मिल रहे हैं. बातचीत तो लगभग बंद सी ही है. अब बातचीत का सहारा सोशल मीडिया के तमाम मंच बन गए हैं. सुबह-शाम के सन्देश पर उसी के अनुसार स्माइली भेजकर सामने वाले को जवाब भी दे दिया जाता है. जिस औपचारिकता से सन्देश भेजा गया होता है, उसी औपचारिकता से भेजी गई स्माइली को भी स्वीकार कर लिया जाता है. एक पल रुक कर यह भी विचार नहीं किया जाता है कि कम से कम एक बार सामने वाले को फोन लगाकर बात कर ली जाये, उसके हालचाल ले लिए जाएँ.


यह एक सार्वभौम सत्य है कि किसी भी व्यक्ति के मन का, उसकी मानसिकता का, हावभाव का पता मोबाइल पर भेजे जाने वाले, पाए जाने वाले संदेशों से, स्माइली से कदापि नहीं हो सकता है. सन्देश, फोटो, वीडियो या स्माइली आदि किसी भी तरह से व्यक्ति के तात्कालिक मनोभावों को नहीं बता सकते. इसका अंदाजा तो बस आपस में बातचीत के द्वारा हो सकता है. बात करने के लहजे से, सामने वाले के बोलने के अंदाज से समझ में आसानी से आता है कि वह खुश है या दुखी है. बातचीत को हम सभी लोग जैसे समाप्त ही कर चुके हैं. मोबाइल के युग में, इंटरनेट के युग में आज एक ही घर में आपस में बातचीत न के बराबर हो रही है. ऐसे में जाहिर है कोई युवा, किशोर यदि किसी भी तरह की समस्या में घिरा है तो इसकी जानकारी नहीं हो पाती है. वर्तमान दौर में प्रत्येक व्यक्ति को अनेक तरह की समस्याओं से सामना करना पड़ता है. किसी को पढ़ाई की समस्या है तो किसी के सामने कैरियर की दिक्कत है. कोई पारिवारिक समस्याओं से दो-चार हो रहा है तो कोई आर्थिक रूप से तंगहाली से गुजर रहा है. ऐसे में भावनात्मक सहारा, संबल न मिल पाने के कारण युवा, किशोर या तो अवसाद में ग्रसित हो जाते हैं या फिर वे हताशा में कोई गलत कदम उठा लेते हैं.


जीवन सिर्फ जिन्दा रहने के लिए नहीं है वरन खुलकर आनंद लेने के लिए है. हताशा, निराशा, असफलता के दौर तो सबके साथ आते जाते हैं मगर यदि उसको भावनात्मक संबल मिल जाये तो वह इन सबसे सहजता से उबर आता है. अपने युवाओं को, किशोरों को असमय मौत के मुँह में जाने से रोकने के लिए आइये हम सब फिर से उसी दुनिया को बनाने का प्रयास करें जहाँ मोबाइल, इंटरनेट ने हमारे रिश्तों को, संबंधों को, भावनात्मकता को नहीं खाया था. 







 

10 सितंबर 2020

खुद को अकेला समझने ने बनाया आत्महत्या का रास्ता

आत्महत्या, क्या अब ये महज एक शब्द बनकर रह गया है? एक आत्महत्या का अर्थ है एक व्यक्ति का चले जाना. यह ऐसा कदम है जहाँ दुःख भी होता है, क्षोभ भी होता है मगर बहुत सारे अनुत्तरित से सवाल शेष रह जाते हैं. तमाम तरह की अनिश्चितता सामने आ जाती हैं. संभावनाओं-असंभावनाओं के इस दौर में लोगों का अनिश्चय के साये में ज़िन्दगी बिताना और फिर हताशा के चलते मौत के आगोश में चले जाना समझ से परे है. लोगों में अनिश्चय हावी है, हताशा हावी है, निराशा जारी है, इंसान का मरना जारी है, युवाओं का मरना ज़ारी है. इस हावी रहने में, बहुत कुछ जारी रहने में सबसे बुरा है सपनों का मरते जाना, विश्वास का मिटते जाना. यांत्रिक रूप से गतिबद्ध ज़िन्दगी नितांत अकेलेपन के साथ आगे बढ़ती दिखती है किन्तु आगे बढ़ती सी लगती नहीं. इक्कीसवीं सदी को औद्योगीकरण की, भूमंडलीकरण की, वैश्वीकरण की, तकनीक की सदी घोषित कर दिया गया. इसके चलते समाज में अर्थ को महत्त्वपूर्ण माना जाने लगा. लोगों के लिए एकमात्र उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ धनोपार्जन करना बन गया है. इसके लिए जीवन को यंत्रवत सा बना लिया गया है. 

अब विद्रूपता ये कि ये यांत्रिक ज़िन्दगी न केवल धनोपार्जन के लिए वरन बचपन, शिक्षा, घर-परिवार आदि में भी दिखने लगी है. किसी समय मौज-मस्ती, शैतानियों, शरारतों आदि के लिए बचपन को याद किया जाता था किन्तु अब ऐसा लगता है जैसे बचपन की भ्रूण हत्या कर दी गई है. हँसते-खेलते बच्चों की जगह बस्तों का बोझ लादे, थके-हारे से, मुरझाये से बच्चे दिखाई देते हैं. शरारतों, शैतानियों की जगह उनके चेहरों पर बड़ों-बुजुर्गों जैसी भाव-भंगिमा, सोच-विचार दिखाई देता है. नीले आकाश के नीचे उन्मुक्त खेलते, तितली बनकर उड़ते बच्चों को अब कमरों में बंद कर दिया गया है, उड़ान के लिए उनके हाथों में लैपटॉप, मोबाइल थमा दिए गए हैं. किसी समय में दादा-दादी, नाना-नानी के आँचल में छिपकर परियों, वीरों के किस्से-कहानियाँ सुन-सुनकर बड़े होने वाले बच्चे टीवी सीरियल्स के कथित लाइव शो को देखकर बड़े हो रहे हैं, स्मार्टफोन की इंटरनेट दुनिया के कारण समय से पहले ही स्मार्ट हो रहे हैं.



धनोपार्जन की आपाधापी में अभिभावकों का संलिप्त रहना, युवाओं का भागमभाग में जुट जाना, अपनी आँखों के सपनों को जिंदा बनाये रखने के लिए संवेदना को मारकर आगे बढ़ते जाना आदि ऐसा कुछ हुआ जिसने समूचे समाज को उल्टा खड़ा कर दिया. अनियमित होती जीवनशैली, परिवार से दूर रहने की मजबूरी, अधिकाधिक भौतिक संसाधनों की प्राप्ति करना, चकाचौंध भरी जिंदगी को जीने की लालसा ने इंसान को इंसान की जगह मशीन बना दिया. मशीन बनते इस इंसान ने मशीन बनते ही सबसे पहले अपने भीतर की संवेदना को समाप्त कर उसकी जगह एक बाज़ार को जन्म दिया. रिश्ते, नातों, परिवार, बच्चों, दोस्तों आदि को उसने सिर्फ बाज़ार की दृष्टि से देखा. सब जगह उसने हानि-लाभ का समीकरण लगाया और उसी के अनुसार अपने आपको संबंधों-रिश्तों के साँचे में उतारा. इस यांत्रिक जीवन का दुष्परिणाम यह हुआ कि सारे रिश्ते समाप्त से होते दिखे. बच्चों के लिए माता-पिता और माता-पिता के लिए बच्चे नोट छापने की मशीन मात्र बनकर रह गए. रिश्तों का मोल महज संबोधन के लिए होता दिखने लगा. ऐसी स्थिति में अकेलापन बढ़ना स्वाभाविक ही है और वैसा हुआ भी. धन, भौतिक संसाधन, आधुनिकतम उपकरण, तकनीक की भरमार हो गई और इंसान एकदम अकेला हो गया.

इस अकेलेपन को दूर करने के लिए तन्हा इंसान ने सबक न लिया; अपनी तन्हाई को दूर करने के लिए अपनों का सहारा नहीं लिया; अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए इंसानों का सहयोग नहीं लिया क्योंकि विडम्बना ये है कि आधुनिकता के बाज़ार में इंसान दिख ही नहीं रहे हैं. चारों तरफ सिर्फ मशीन ही मशीन हैं, यंत्र ही यंत्र हैं. अकेलेपन का उपाय मोबाइल में, लैपटॉप में, छलकते जाम में, सिगरेट के छल्लों में, नशे के बादलों में, दैहिक आकर्षण में, बिस्तर की सिलवटों में खोजा जा रहा है. सेल्युलाइड के परदे की चकाचौंध को ही अपने जीवन की वास्तविकता मान लिया जा रहा है. आभासी दुनिया के नकलीपन को ही अपने जीवन का असलीपन बना लिया जा रहा है. इससे अकेलापन कम होने की बजाय और बढ़ता जा रहा है. इंसान के भीतर एक तरह का खोखलापन बढ़ता जा रहा है. यही कारण है कि पिता अपनी ही बेटी से कुकृत्य करने में लगा है. भाई-बहिन के बीच शारीरिक सम्बन्ध बन रहे हैं. इंसानी देह महज भोग की वस्तु बनती जा रही है. यौनेच्छा पूर्ति के लिए हवसी बच्चियों, वृद्धाओं, शवों तक को नहीं बख्श रहे हैं. दैहिक संबंधों को मानसिक संबंधों पर वरीयता दी जाने लगी है. 

ऐसी स्थिति में अंत नितांत दुखद होता है. जब आँख खुलती है तो व्यक्ति को अपने चारों तरफ आभासी दुनिया का एहसास होता है, नितांत भ्रम का एहसास होता है, सबकुछ पीछे छूट जाने के दुःख होता है, अपनों के कहीं दूर चले जाने का भाव जगता है. यही सबकुछ व्यक्ति में और अधिक दुःख, हताशा, निराशा का संचार कर देता है. ऐसे में व्यक्ति या तो अवसाद की अवस्था में चला जाता है या फिर आत्महत्या जैसा जघन्य कृत्य कर बैठता है. ज़ाहिर है कि अकेलेपन का इलाज मशीन नहीं, बाज़ार नहीं, तकनीक नहीं वरन अपने लोग हैं, घर-परिवार है. आवश्यकता इस सत्य को समझने की है. यदि ऐसा नहीं होता है तो कारण कुछ भी बताये जाएँ, लोगों में अकेलापन हावी रहेगा, लोगों का मौत के आगोश में चलते चले जाना जारी रहेगा.

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08 जुलाई 2020

एक बार अंतिम युद्ध कर लो, शायद जीत जाओ

फिल्म इंडस्ट्री में एक कलाकार ने आत्महत्या क्या की, ऐसा लगने लगा जैसे देश की पहली आत्महत्या है. कुछ लोग इसे हत्या भी बता रहे. एक पल को इस पर विचार कर लिया जाये, तब भी जिस तरह से समाज की युवा पीढ़ी इस पर अपना दिमाग केन्द्रित किये है, लग रहा है जैसे देश में पहला केस है जो हत्या से संदर्भित है. इसी अवधि में कई और हत्याएँ हो चुकी हैं. पूरे के पूरे परिवार को नृशंस तरीके से मौत के घाट उतार दिया है मगर एक कलाकार के लिए धरती हिला देने वालों के दिमाग पर जरा भी फर्क नहीं पड़ा इन हत्यायों से.


बहरहाल, सभी का अपना-अपना दृष्टिकोण होता है, सभी से अपनी तरह का लगाव होता है, संभव है कि उस कलाकार से भी वैसा लगाव रहा हो. इस एक आत्महत्या की घटना के पहले भी और इसके बाद भी समाज में इधर आत्महत्याओं का एक सिलसिला सा चल पड़ा है. कहीं किसी शिक्षक द्वारा, कहीं किसी पत्रकार द्वारा, कहीं किसी बेरोजगार द्वारा, कहीं किसी परिवार के मुखिया द्वारा ऐसा किये जाने की खबरें आ रही हैं. सबके अलग-अलग हालात रहे होंगे, इससे इंकार नहीं मगर एक सवाल उठता है कि उसके आत्महत्या करने से क्या हालात सुधर गए होंगे? क्या जिन परिस्थितियों से हारकर उसने आत्महत्या की होगी, वे स्थितियाँ अब सही हो गई होंगीं? परिवार को जिस कष्ट में न देख पाने के कारण किसी व्यक्ति ने अपनी जान ले ली क्या अब वे परिजन उस कष्ट से मुक्त हो गए होंगे? यहाँ बस इतना हुआ कि व्यक्ति स्वयं जिस कारण से परेशान रहा होगा वह उनसे मुक्त हो गया. उसके बाद उसके परिजन किस कष्ट से जूझ रहे होंगे, उसे अब कोई चिंता नहीं. उसके बीवी, बच्चे अब किस गली में भीख माँग रहे होंगे, उसे किसी की चिंता नहीं. उसके बूढ़े माँ-बाप किसके सहारे अपना जीवन गुजारेंगे इसके बारे में भी कोई फ़िक्र नहीं.


आत्महत्या करके वह व्यक्ति खुद को सभी कष्टों से मुक्त कर लेता है या कहें कि कायराना हरकत दिखाते हुए दुनिया से, समाज से मुँह छिपा लेता है. अपने आपको कमजोर साबित करते हुए अपनी भी परेशानियों को अपने परिजनों के सिर पर थोप जाता है. हमारी नजरों में यह निश्चित ही कोई वीरतापूर्ण कदम नहीं कहा जायेगा, शेष सबकी अपनी राय. इसी संबंध में हमारा मानना है कि हारने या आत्महत्या के पहले एक बार अंतिम युद्ध कर लो, शायद जीत जाओ.

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14 जून 2020

ज़िन्दगी जीना पड़ती है अन्यथा वह तो सिर्फ गुजरती है

युवा फ़िल्मी कलाकार सुशांत की आत्महत्या ने सोशल मीडिया पर विमर्श का दौर आरम्भ करवा दिया. यह विमर्श उस दौर में आरम्भ हुआ है जबकि हमारा देश प्रतिदिन सैकड़ों मौतों को कोरोना वायरस से होते देख रहा है. यह विमर्श उस देश में शुरू हुआ है जहाँ इस लॉकडाउन के पहले तक हजारों-लाखों की संख्या में एक दिन में दुर्घटना से मौतें हुआ करती थीं. हजारों की संख्या में आत्महत्या के मामले उस दौरान भी आया करते थे. सुशांत की आत्महत्या इसलिए भी विमर्श का आधार बनती है क्योंकि वह रुपहले परदे के कारण समाज में जाना-पहचाना चेहरा था. उस दुनिया से वह व्यक्ति आता था जहाँ पैसा है, प्रसिद्धि है, नाम है, ग्लैमर है और यह सब उस व्यक्ति के पास इस समय मौजूद भी था. ऐसे में उसकी आत्महत्या की खबर ने स्वयं विमर्श का रूप धारण कर लिया.


क्या, क्यों, कैसे में जाने के पहले हम सबको विचार करना पड़ेगा कि हम लोग आत्महत्या जैसे विषय पर विमर्श कर रहे हैं अथवा सिर्फ एक फ़िल्मी कलाकार की मौत पर विमर्श कर रहे हैं? हमें समझना होगा कि हमारे विमर्श के केन्द्र में कौन है? क्या हमारे विमर्श में वे बच्चे हैं जो किसी परीक्षा में कम अंक आने के कारण अथवा कम अंक आने के भय से आत्महत्या कर लेते हैं? क्या इस विमर्श में वे महिलाएँ हैं जो किसी न किसी तरह की हिंसा का शिकार होने के बाद आत्महत्या कर लेती हैं? क्या इस विमर्श में वे परिवार शामिल हैं जो गरीबी, भुखमरी अथवा किसी अन्य कारण से सामूहिक रूप से आत्महत्या कर लेते हैं?


यहाँ इन तमाम सवालों को उठाने का अर्थ किसी भी मौत पर सवाल उठाना नहीं है. हमारी संस्कृति में तो शत्रु तक की मौत पर श्रद्धांजलि दी जाती है, दुःख व्यक्त किया जाता है. यहाँ सवाल हम सबकी मानसिकता का है. हम सब भीड़ में होने के बाद भी अपने साथ वाले को अकेले छोड़ते जा रहे हैं. असलियत यह है कि हम खुद को अकेला बना रहे हैं. हम सभी स्वार्थ की उस मानसिकता में लिपटे हुए हैं जहाँ हमें अपने आसपास अपने अलावा कुछ भी नहीं दिखाई देता है. इसी के चलते व्यक्ति अपने समाज में नहीं बल्कि अपने परिवार में नितांत अकेला होता जा रहा है. इस अकेलेपन से सामान्यतौर पर सामान्य व्यक्ति निकल आता है, ऐसी स्थिति से निपट लेता है मगर समस्या उनको होती है जो तमाम चकाचौंध होने के बाद भी, तमाम शोहरत होने के बाद भी अकेले हैं.

दरअसल यह भी मानवीय स्वभाव में सुपीरियरिटी के साथ मिली-जुली इंफीरियरिटी की भावना होती है. इस भावना के वशीभूत कोई भी व्यक्ति अपने अकेलेपन को बाँटने के लिए सबके बीच में शामिल नहीं हो पाता है. यहाँ सबके साथ घुलने-मिलने में, सामान्य व्यक्ति की तरह धमाचौकड़ी करने में, मौज-मस्ती करने में उसकी सुपीरियरिटी बाधक बनती है. इसी से उपजा अकेलापन उसे अवसाद में ले जाता है, इंफीरियरिटी की तरफ ले जाता है. यह स्थिति व्यक्ति-व्यक्ति के अनुसार अलग भी हो सकती है.

इस युवा की मृत्यु से यदि विमर्श वाकई आत्महत्या जैसे बिंदु के लिए हुआ है तो उस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है. महज विमर्श करके, अपनी-अपनी पोस्ट पर लाइक, शेयर, कमेंट की संख्या की गिनती लगा लेने भर से कोई निष्कर्ष नहीं निकलना है. सबसे पहले तो हमें न केवल अपना अकेलापन दूर करना है बल्कि अपने साथ वालों को भी अकेलेपन से मुक्त करवाना है. हम सबको बिना वजह के अहंकार से मुक्त होने की आवश्यकता है. वर्तमान दौर में हमने एक-दूसरे से बातचीत करना लगभग बंद ही कर दिया है. एक अजब सा अहं हम सबके बीच स्थापित हो चुका है. खुद को दूसरे से श्रेष्ठ समझने की मानसिकता ने हमें भले ही अपने आपमें बहुत ऊपर बैठा रखा हो मगर वास्तविक रूप में ऐसे लोग खोखले हो चुके हैं. यही खोखलापन उनको एक दिन अवसाद की तरफ धकेल देता है.

लोगों से मिलने के लिए घर जाने की स्थिति अब दिखाई नहीं देती है. अपने मित्रों, पड़ोसियों के दुःख-सुख में शामिल होने जैसी मानसिकता अब गायब हो चुकी है. रिश्तों का सम्मान लगातार कम होता जा रहा है. हम तकनीकी रूप से आधुनिक होते जा रहे हैं मगर व्यावहारिक रूप से लगातार पिछड़ते चले जा रहे हैं. हम सबके बीच एक अनजानी सी, अनदेखी सी प्रतिद्वंद्विता चलने लगी है. जहाँ हम जीतना नहीं चाहते बल्कि सामने वाले को हराना चाहते हैं. इस तरह की अबूझ सी स्थिति अन्दर ही अन्दर वैमनष्यता का विकास करती है. इसमें व्यक्ति की जरा सी भी असफलता उसके अन्दर एक तरह का आक्रोश, एक तरह की हार को जन्म देती है. इसी से वह कुंठा, हताशा, निराशा के रास्ते चलता हुआ अवसाद में चला जाता है.

लोगों से अधिक से अधिक मिलिए. खुद को सामान्य ही समझिये. आप किसी भी पद, प्रस्थिति में हैं मगर उसके पहले आप इन्सान हैं. सार्वजनिक रूप से न सही कहीं तो आप खुलकर उसी तरह हँस सकते हैं जैसा कि कभी कॉलेज टाइम में हँसते थे. अपने दोस्तों के साथ कहीं अकेले में तो वही ठहाका लगा सकते हैं जैसा कि आप रोजगार की तलाश में भटकते हुए मित्रों के साथ सड़कों पर लगाते थे. पद, प्रस्थिति आपके कार्यालय के लिए है न कि आपके परिवार के लिए. अपने लोगों को समय देना शुरू करिए, सीखिए. अपने शौक को विकसित करिए. कोई शौक न हो तो किसी शौक को जन्म दीजिए और जुट जाइए. अनावश्यक तनाव से बचने की कोशिश करिए. करके देखिये, दो-चार दिन और महसूस कीजिये फर्क खुद में.

अंत में फिर वही बात कि इस नामचीन आत्महत्या के लिए नहीं वरन देश में होने वाली तमाम आत्महत्याओं के लिए विमर्श करिए. आने वाले दिनों में उनको रोकने के लिए विमर्श करिए. उनमें भी भविष्य की तमाम अपेक्षाएँ छिपी हुईं हैं.

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10 सितंबर 2019

एक कदम बढ़ाकर रोक लो उसे


आत्महत्या एक ऐसा शब्द है जो सिवाय झकझोरने के और कोई भाव पैदा नहीं करता. यह महज एक शब्द नहीं बल्कि अनेकानेक उथल-पुथल भरी भावनाओं का, विचारों का समुच्चय है. यह शब्द मौत की सूचना देता है. किसी व्यक्ति के चले जाने की खबर देता है. सम्बंधित व्यक्ति के परिचितों के दुखी होने का बोध कराता है. इतना ही नहीं है इस एक शब्द में. इसके अलावा न जाने कितनी त्रासदी, न जाने कितना कष्ट, न जाने कितने आंसू, न जाने कितने सवाल भी इसमें छिपे होते हैं. ऐसा नहीं है कि जिसने आत्महत्या की है वह इन सबसे परिचित न था. ऐसा भी नहीं कि जिसने आत्महत्या जैसा कदम उठाया तो उसे मालूम नहीं था कि उसके इस कदम के बाद क्या होगा. ऐसा भी नहीं कि वह इस शब्द की विभीषिका के बारे में जानता नहीं था. सब कुछ जानते-समझते हुए भी कोई व्यक्ति आत्महत्या जैसा जघन्य कदम उठा लेता है. आखिर क्यों? आखिर कैसे? आखिर किसलिए?


ये तमाम सारे सवाल हैं जो व्यक्ति के चले जाने के बाद गूंजते रहते हैं. आत्महत्या जैसा कदम उठा लेने वाले परिजनों को परेशान करते रहते हैं. किसी भी व्यक्ति के चले जाने के बाद उसके आसपास की तमाम कड़ियों को, घटनाओं को आपस में जोड़-घटाकर आत्महत्या के कारणों का, कारकों का पता लगाने की कोशिश की जाती है. संभव है कि कई बार असलियत के करीब पहुँच भी जाया जाता हो और ये भी होता हो कि ऐसा किये जाने के पीछे के कोई कारण सामने न आ पाते हों. संभव है कि आत्महत्या करने वाला व्यक्ति क्षणिक भावावेश में इस तरह के कदम उठाता होगा या फिर यह कदम लम्बे समय से चली आ रही उसकी किसी भी स्थिति की सहनसीमा को पार करने के बाद उठा हो. किसी भी व्यक्ति के द्वारा आत्महत्या किये जाने के कारण, स्थिति, घटना कुछ भी रह सकता है किन्तु जहाँ तक समझ आता है कि सभी का मूल अकेलापन, अत्यधिक मानसिक तनाव, परेशानी आदि ही रहता होगा. इसमें भी मानसिक तनाव और अकेलापन सबसे अधिक प्रभावी होता होगा. इसके पीछे कारण यह है कि आत्महत्या जैसा भाव अचानक से नहीं आता होगा. ऐसा भाव सम्बंधित व्यक्ति के मष्तिष्क में कई बार उभरा होगा. ये और बात है कि परेशानी, तनाव या फिर किसी अन्य कष्ट की अधिकता के चलते वह किसी विशेष अवस्था में ऐसा कदम उठा लेता होगा. 

मूल रूप में आत्महत्या का सम्बन्ध दिमागी भावबोध से जुड़ा हुआ है. घर की स्थिति, सामाजिक स्थिति, खुद की शारीरिक-मानसिक स्थिति, काम का दवाब, किसी परीक्षा में पास होने का तनाव, पारिवारिक कलह या फिर अन्य कोई और स्थिति उस व्यक्ति को लगातार परेशान करती रहती होगी. ऐसे में उसके आसपास का अकेलापन, उसकी समस्या को किसी और के द्वारा न बांटने की स्थिति, उसकी परेशानी को न समझ पाने का कारण भी आत्महत्या की तरफ उसे ले जाता होगा. ऐसे में संभव है शत-प्रतिशत सफलता ऐसे कदमों को रोक पाने में न लगे मगर यदि हम सभी अपने परिजनों, अपने आसपास के लोगों, अपने परिचितों, अपने सहयोगियों के साथ परस्पर सम्बन्ध बनाये रखें, उनके साथ विचारों का आदान-प्रदान करते रहें तो ऐसे कदमों को रोकना संभव है. किसी भी समय में किसी भी व्यक्ति के लिए विचारों का आदान-प्रदान करने के रास्तों का समाप्त हो जाना, अपनी मानसिक समस्या के प्रकटीकरण की स्थिति का लोप हो जाना ही ऐसे कदमों का कारण बनता है. आज भीड़ के बाद भी व्यक्ति नितांत अकेला महसूस करता है. ऐसे में अपने आपको, अपने आसपास के वातावरण को अकेलेपन से मुक्ति दिलाने का प्रयास किया जाना चाहिए. आज वर्ल्ड सुसाइड प्रिवेंशन डे पर ऐसा संकल्प लेकर आत्महत्या रोकने की दिशा में सकारात्मक कदम बढ़ाया जा सकता है.

11 दिसंबर 2018

बढ़ता अकेलापन, बढ़ती आत्महत्या


एक कार्यक्रम में एक विशेषज्ञ युवाओं और किशोरों से सम्बंधित समस्या पर प्रकाश डाल रहे थे. बातचीत के दौरान उन्होंने आत्महत्या के दो बिंदु बताये. उनके द्वारा बताई चंद बातों का सार ये निकलता है कि एक स्थिति  में आत्महत्या करने वाला व्यक्ति इसकी पूरी तैयारी कर चुका होता है, बस वह समय का इंतजार कर रहा होता है. दूसरी स्थिति में आत्महत्या करने वाला ऐसा कदम उठाने का निर्णय एकाएक उठाता है. उसके इस कदम के बारे में उसके आसपास के लोग, उसे साथ के लोग सोच भी नहीं पाते, समझ भी नहीं पाते हैं. यदि उक्त दोनों स्थितियों को सत्य मानते हुए विचार करें कि भले ही आत्महत्या करने वाला व्यक्ति ऐसा कदम सोचविचार कर उठाये अथवा अकस्मात् उठाये दोनों ही स्थितियों में एक इन्सान की मृत्यु हो जाती है. एक व्यक्ति हमेशा के लिए परिवार से चला जाता है. एक व्यक्ति का चले जाना दुःख देता है, मगर तमाम सारे अनुत्तरित से सवाल पैदा कर जाता है.


संभावनाओं के इस दौर में भी समाज में अनिश्चय हावी है, हताशा हावी है, निराशा जारी है, इंसान का मरना जारी है, युवाओं का मरना ज़ारी है. इसमें सबसे बुरा है सपनों का मरते जाना, विश्वास का मिटते जाना. यांत्रिक रूप से गतिबद्ध ज़िन्दगी नितांत अकेलेपन के साथ आगे बढ़ती दिखती है किन्तु आगे बढ़ती सी लगती नहीं. इसके पीछे का कारण समाज में अर्थ को महत्त्वपूर्ण माना जाना भी है. लोगों के लिए एकमात्र उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ धनोपार्जन करना बन गया है. इसके लिए उन्होंने अपने जीवन को मशीन बना लिया गया है. यह यांत्रिक जीवन न केवल धनोपार्जन के लिए वरन बचपन, शिक्षा, घर-परिवार आदि में भी दिखाई देने लगा है. किसी समय मौज-मस्ती, शैतानियों, शरारतों आदि के लिए बचपन को याद किया जाता था किन्तु अब ऐसा लगता है जैसे बचपन की भ्रूण हत्या कर दी गई है. हँसते-खेलते बच्चों की जगह बस्तों का बोझ लादे, थके-हारे से, मुरझाये से बच्चे दिखाई देते हैं. शरारतों, शैतानियों की जगह उनके चेहरों पर बड़ों-बुजुर्गों जैसी भाव-भंगिमा, सोच-विचार दिखाई देता है. नीले आकाश के नीचे उन्मुक्त खेलते, तितली बनकर उड़ते बच्चों को अब कमरों में बंद कर दिया गया है, उड़ान के लिए उनके हाथों में लैपटॉप, मोबाइल थमा दिए गए हैं. किसी समय में दादा-दादी, नाना-नानी के आँचल में छिपकर परियों, वीरों के किस्से-कहानियाँ सुन-सुनकर बड़े होने वाले बच्चे टीवी सीरियल्स के कथित लाइव शो को देखकर बड़े हो रहे हैं, स्मार्टफोन की इंटरनेट दुनिया के कारण समय से पहले ही स्मार्ट हो रहे हैं.

धनोपार्जन की अंधी दौड़ में अभिभावक भी संलिप्त हैं, युवा अनावश्यक सी भागमभाग में जुटे हैं. अनियमित होती जीवनशैली, परिवार से दूर रहने की मजबूरी, अधिकाधिक भौतिक संसाधनों की प्राप्ति करना, चकाचौंध भरी जिंदगी को जीने की लालसा ने इंसान को इंसान की जगह मशीन बना दिया. मशीन बनते इस इंसान ने सबसे पहले अपने भीतर की संवेदना को समाप्त कर उसकी जगह एक बाज़ार को जन्म दे दिया. सब जगह उसने हानि-लाभ का समीकरण लगाया और उसी के अनुसार अपने आपको संबंधों-रिश्तों के साँचे में उतारा. इस यांत्रिक जीवन का दुष्परिणाम यह हुआ कि सारे रिश्ते समाप्त से होते दिखे. बच्चों के लिए माता-पिता और माता-पिता के लिए बच्चे नोट छापने की मशीन मात्र बनकर रह गए. रिश्तों का मोल महज संबोधन के लिए होता दिखने लगा. ऐसी स्थिति में अकेलापन बढ़ना स्वाभाविक ही है और वैसा हुआ भी. धन, भौतिक संसाधन, आधुनिकतम उपकरण, तकनीक की भरमार हो गई और इंसान एकदम अकेला हो गया.

इस अकेलेपन को दूर करने के लिए उसने अपनों का सहारा नहीं लिया; अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए इंसानों का सहयोग नहीं लिया क्योंकि आधुनिकता के बाज़ार में उसे इंसान दिख ही नहीं रहे हैं. चारों तरफ सिर्फ मशीन ही मशीन दिख रही हैं. इससे अकेलापन कम होने की बजे और बढ़ता जा रहा है. इंसान के भीतर एक तरह का खोखलापन बढ़ता जा रहा है. यही सबकुछ व्यक्ति में और अधिक दुःख, हताशा, निराशा का संचार कर देता है. ऐसे में व्यक्ति या तो अवसाद की अवस्था में चला जाता है या फिर आत्महत्या जैसा जघन्य कृत्य कर बैठता है. ज़ाहिर है कि अकेलेपन का इलाज मशीन नहीं, बाज़ार नहीं, तकनीक नहीं वरन अपने लोग हैं, घर-परिवार है. आवश्यकता इस सत्य को समझने की है. यदि ऐसा नहीं होता है तो कारण कुछ भी बताये जाएँ, लोगों में अकेलापन हावी रहेगा, लोगों का मौत के आगोश में चलते चले जाना जारी रहेगा.

18 नवंबर 2017

हत्यारा अनुशासन

हँसते-खेलते-कूदते कब हाईस्कूल पास कर लिया पता ही नहीं चला. बोर्ड परीक्षाओं का हौवा भी हम मित्रों को डरा न सका था. हाईस्कूल की परीक्षाओं की समाप्ति को हँसते-खेलते-कूदते इसलिए कहा क्योंकि किसी भी विषय की परीक्षा समाप्त होते ही तय हो जाता था कि कितनी देर के खेल के मैदान पर पहुँचना है? कहाँ खेलने पहुँचना है? उस समय दयानंद वैदिक महाविद्यालय और सनातन धर्म इंटर कॉलेज के मैदानों पर खेलने वालों का जमावड़ा लगता था. बस ये तय हो जाता कि कहाँ पहुँचना है, क्या खेलना है. हाईस्कूल परीक्षा पास कर लेने की ख़ुशी के साथ इसकी भी ख़ुशी थी कि अब विषय विशेषज्ञ बनने का मौका मिलेगा. जी हाँ, उस समय यही अपने आपमें किसी विशेषज्ञ से कम नहीं था, हम लोगों के लिए कि अब आगे की पढ़ाई विज्ञान वर्ग, कला वर्ग या वाणिज्य वर्ग से होनी है. ये भी उस समय आपस में विमर्श का विषय बना हुआ था, हम दोस्तों के बीच कि विज्ञान विषय की पढ़ाई के लिए कौन गणित का चयन करेगा और कौन जीवविज्ञान की तरफ जायेगा. ऐसा होने, करने के पीछे भी हम लोगों के अपने तर्क रहते थे.

हम सभी मित्रों ने हाईस्कूल में विज्ञान वर्ग को ले रखा था. इस कारण सभी दोस्तों के बीच सहज रूप से ये स्वीकारोक्ति थी और सहमति भी थी कि हम सभी विज्ञान विषय से ही आगे की पढ़ाई करेंगे. इसी सम्भावना और शत-प्रतिशत सहमति के बीच कुछ अचंभित करने जैसा भी हुआ. नए सत्र में कॉलेज खुला. सभी मिले, एक दूसरे के विषयों की जानकारी का आदान-प्रदान हुआ. कोई गणित विषय का चयन कर चुका था, किसी ने जीवविज्ञान को चुना था. हम सभी दोस्तों को ये जानकर आश्चर्य हुआ कि हमारे बीच के ही एक होनहार मित्र राजीव त्रिपाठी ने कला वर्ग में एडमीशन ले लिया था. गर्मियों की पूरी छुट्टियों में लगभग रोज ही उससे मुलाकात होती थी मगर उसने कभी न तो इसका जिक्र किया और न ही अपनी किसी बात से हम लोगों को आभास होने दिया कि वह विज्ञान वर्ग को छोड़कर कला वर्ग से आगे की पढ़ाई करेगा. व्यक्तिगत हमारे लिए आश्चर्य इसलिए भी था क्योंकि वह छोटे से हमारा मित्र था और उसकी तीव्र इच्छा इंजीनियर बनने की थी. अकेले में उसे कई-कई दिन समझाने, कुदेरेने के बाद उसने बताया कि उसके पिताजी की इच्छा उसे प्रशासनिक अधिकारी बनाने की है. उन्होंने ही उसके विषय निर्धारित करके उनके सहारे ही आगे पढ़ने को कहा है. हँसने-मजाक करने वाला, सीधा-साधा, हंसमुख हमारा मित्र राजीव अपने पिता की इच्छा के दवाब में उदास, गुमसुम रहने लगा.

उसके पिता का सख्त अनुशासन हम बचपन से ही देख रहे थे. किसी भी दोस्त का उसके घर जाना लगभग न के बराबर होता था. उसका भी बहुत कम किसी दोस्त के घर जाना होता था. बाहर खेलने की अनुमति भी उसको बहुत कम मिलती थी. यदि कभी उससे मिलने के लिए उसके घर जाना भी होता तो वह अपने कमरे की सड़क पर खुलने वाली खिड़की से बात करता. हम लोग सड़क पर और वह घर के अन्दर से. ऐसे में भी वह अपने पिता की आहट होते ही हम लोगों को वहां से जाने को कहकर खिड़की बंद कर लेता.

समय बीतता रहा. पिता के सख्त अनुशासन और सिविल सेवा में जाने की जिद जैसी सनक में राजीव सिविल सेवा में तो चयनित न हो सका किन्तु अपना दिमागी संतुलन अवश्य खो बैठा. परास्नातक कर लेने के बाद उसे अपने सिविल सेवा में चयनित होने का भ्रम हो गया. हम मित्रों से मिलने पर उसमें कभी सामान्य राजीव नजर आता तो उस सीधे-साधे मासूम से राजीव की जगह कोई घनघोर सख्त प्रशासनिक अधिकारी दिखाई देने लगता. उसकी बातचीत, उसके हावभाव, उसका अंदाज सबकुछ अलहदा लगता. धीरे-धीरे उसकी स्थिति और ख़राब होती रही. कभी कॉलेज के कार्यक्रम में उसके द्वारा की गई उठापटक की खबर सुनाई देती. कभी उसके द्वारा उरई में कई लोगों संग मारपीट किये जाने की घटनाएँ सामने आने लगीं. आये दिन, दिन हो या रात, सूट-बूट में तैयार होकर किसी मीटिंग, बैठक, दौरे के नाम पर उरई की सड़कों पर उसका भटकना आम बात हो गई थी.

एक दिन खबर मिली कि राजीव को किसी दूसरे शहर में किसी मनोरोग चिकित्सालय में भर्ती करा दिया गया है. उसके बाद की उड़ती-उड़ती अनेक खबरों के बीच पुष्ट किन्तु अत्यंत दुखद खबर मिली राजीव के देहांत की. आघात सा लगा, असमय अपने दोस्त का जाना खला. न केवल एक प्रतिभा का क्षरण होना बल्कि एक मासूम व्यक्तित्व का शांत हो जाना व्यथित कर गया. लगा कि उसके पिता का अनुशासन उसका हत्यारा निकला. न सिर्फ उसका हत्यारा बल्कि उसके बड़े दो भाइयों का भी. उसके पिता का अनुशासन इसलिए भी हत्यारा क्योंकि उनकी प्रशासनिक अधिकारी बनाने की सनक के चलते राजीव के दो भाइयों ने आत्महत्या कर ली थी. इससे संदर्भित एक घटना अन्दर तक हिला देती है जबकि उनके शादीशुदा के बेटे ने उरई से कहीं दूर अपने नौकरी करने वाले शहर में आत्महत्या कर ली थी. ऐसे में भी उनके हत्यारे अनुशासन से डरी उनकी पुत्रवधू उनको फोन करके अनुमति माँगती है, अपने दिवंगत पति के कार्यालय के सहकर्मियों संग अपने पति की पार्थिव देह तक जाने की.


उफ़! अनुशासन का अपना महत्त्व है किन्तु उसे हत्यारा तो न बनाया जाये. 

10 फ़रवरी 2017

आत्महत्याओं के पीछे

फिर एक आत्महत्या, फिर एक युवा का चले जाना. दुःख भी होता है, क्षोभ भी होता है मगर बहुत सारे अनुत्तरित से सवाल सामने आ जाते हैं. तमाम तरह की अनिश्चितता सामने आ जाती है. संभावनाओं के इस दौर में भी युवा-शक्ति का अनिश्चय के साये में ज़िन्दगी बिताना और फिर हताशा में मौत के आगोश में चले जाना समझ से परे है. अनिश्चय हावी है, हताशा हावी है, निराशा जारी है, इंसान का मरना जारी है, युवाओं का मरना ज़ारी है. इस हावी रहने में, बहुत कुछ जारी रहने में सबसे बुरा है सपनों का मरते जाना, विश्वास का मिटते जाना. यांत्रिक रूप से गतिबद्ध ज़िन्दगी नितांत अकेलेपन के साथ आगे बढ़ती दिखती है किन्तु आगे बढ़ती सी लगती नहीं. इक्कीसवीं सदी को औद्योगीकरण की, भूमंडलीकरण की, वैश्वीकरण की, तकनीक की सदी घोषित कर दिया गया. इसके चलते समाज में अर्थ को महत्त्वपूर्ण माना जाने लगा. लोगों के लिए एकमात्र उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ धनोपार्जन करना बन गया है. इसके लिए जीवन को यंत्रवत सा बना लिया गया है. अब विद्रूपता ये की ये यांत्रिक ज़िन्दगी न केवल धनोपार्जन के लिए वरन बचपन, शिक्षा, घर-परिवार आदि में भी दिखने लगी है. किसी समय मौज-मस्ती, शैतानियों, शरारतों आदि के लिए बचपन को याद किया जाता था किन्तु अब ऐसा लगता है जैसे बचपन की भ्रूण हत्या कर दी गई है. हँसते-खेलते बच्चों की जगह बस्तों का बोझ लादे, थके-हारे से, मुरझाये से बच्चे दिखाई देते हैं. शरारतों, शैतानियों की जगह उनके चेहरों पर बड़ों-बुजुर्गों जैसी भाव-भंगिमा, सोच-विचार दिखाई देता है. नीले आकाश के नीचे उन्मुक्त खेलते, तितली बनकर उड़ते बच्चों को अब कमरों में बंद कर दिया गया है, उड़ान के लिए उनके हाथों में लैपटॉप, मोबाइल थमा दिए गए हैं. किसी समय में दादा-दादी, नाना-नानी के आँचल में छिपकर परियों, वीरों के किस्से-कहानियाँ सुन-सुनकर बड़े होने वाले बच्चे टीवी सीरियल्स के कथित लाइव शो को देखकर बड़े हो रहे हैं, स्मार्टफोन की इंटरनेट दुनिया के कारण समय से पहले ही स्मार्ट हो रहे हैं. 



धनोपार्जन की आपाधापी में अभिभावकों का संलिप्त रहना, युवाओं का भागमभाग में जुट जाना, अपनी आँखों के सपनों को जिंदा बनाये रखने के लिए संवेदना को मारकर आगे बढ़ते जाना आदि ऐसा कुछ हुआ जिसने समूचे समाज को उल्टा खड़ा कर दिया. अनियमित होती जीवनशैली, परिवार से दूर रहने की मजबूरी, अधिकाधिक भौतिक संसाधनों की प्राप्ति करना, चकाचौंध भरी जिंदगी को जीने की लालसा ने इंसान को इंसान की जगह मशीन बना दिया. मशीन बनते इस इंसान ने मशीन बनते ही सबसे पहले अपने भीतर की संवेदना को समाप्त कर उसकी जगह एक बाज़ार को जन्म दिया. रिश्ते, नातों, परिवार, बच्चों, दोस्तों आदि को उसने सिर्फ बाज़ार की दृष्टि से देखा. सब जगह उसने हानि-लाभ का समीकरण लगाया और उसी के अनुसार अपने आपको संबंधों-रिश्तों के साँचे में उतारा. इस यांत्रिक जीवन का दुष्परिणाम यह हुआ कि सारे रिश्ते समाप्त से होते दिखे. बच्चों के लिए माता-पिता और माता-पिता के लिए बच्चे नोट छापने की मशीन मात्र बनकर रह गए. रिश्तों का मोल महज संबोधन के लिए होता दिखने लगा. ऐसी स्थिति में अकेलापन बढ़ना स्वाभाविक ही है और वैसा हुआ भी. धन, भौतिक संसाधन, आधुनिकतम उपकरण, तकनीक की भरमार हो गई और इंसान एकदम अकेला हो गया.


इस अकेलेपन को दूर करने के लिए तनहा इंसान ने सबक न लिया; अपनी तन्हाई को दूर करने के लिए अपनों का सहारा नहीं लिया; अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए इंसानों का सहयोग नहीं लिया क्योंकि विडम्बना ये है कि आधुनिकता के बाज़ार में इंसान दिख ही नहीं रहे हैं. चारों तरफ सिर्फ मशीन ही मशीन हैं, यंत्र ही यंत्र हैं. अकेलेपन का उपाय मोबाइल में, लैपटॉप में, छलकते जाम में, सिगरेट के छल्लों में, नशे के बादलों में, दैहिक आकर्षण में, बिस्तर की सिलवटों में खोजा जा रहा है. सेल्युलाइड के परदे की चकाचौंध को ही अपने जीवन की वास्तविकता मान लिया जा रहा है. आभासी दुनिया के नकलीपन को ही अपने जीवन का असलीपन बना लिया जा रहा है. इससे अकेलापन कम होने की बजे और बढ़ता जा रहा है. इंसान के भीतर एक तरह का खोखलापन बढ़ता जा रहा है. यही कारण है कि पिता अपनी ही बेटी से कुकृत्य करने में लगा है. भाई-बहिन के बीच शारीरिक सम्बन्ध बन रहे हैं. इंसानी देह महज भोग की वस्तु बनती जा रही है. यौनेच्छा पूर्ति के लिए हवसी बच्चियों, वृद्धाओं, शवों तक को नहीं बख्श रहे हैं. दैहिक संबंधों को मानसिक संबंधों पर वरीयता दी जाने लगी है. ऐसी स्थिति में अंत नितांत दुखद होता है. जब आँख खुलती है तो व्यक्ति को अपने चारों तरफ आभासी दुनिया का एहसास होता है, नितांत भ्रम का एहसास होता है, सबकुछ पीछे छूट जाने के दुःख होता है, अपनों के कहीं दूर चले जाने का भाव जगता है. यही सबकुछ व्यक्ति में और अधिक दुःख, हताशा, निराशा का संचार कर देता है. ऐसे में व्यक्ति या तो अवसाद की अवस्था में चला जाता है या फिर आत्महत्या जैसा जघन्य कृत्य कर बैठता है. ज़ाहिर है कि अकेलेपन का इलाज मशीन नहीं, बाज़ार नहीं, तकनीक नहीं वरन अपने लोग हैं, घर-परिवार है. आवश्यकता इस सत्य को समझने की है. यदि ऐसा नहीं होता है तो कारण कुछ भी बताये जाएँ, लोगों में अकेलापन हावी रहेगा, लोगों का मौत के आगोश में चलते चले जाना जारी रहेगा.

15 जून 2016

विपणन व्यवस्था सुधारे बिना कृषि-विकास नहीं

मानसून के रुष्ट रहने के बाद मौसम विभाग आशा बंधा रहा है कि अबकी बारिश बहुत अच्छी होगी. किसानों को इस बार मानसून से किसी तरह की शिकायत नहीं होगी. हाल-फ़िलहाल विगत दो-चार दिनों से बादलों के रंग-ढंग देखते हुए ऐसी अपेक्षा की जा सकती है. इस अपेक्षा के साथ ही एक तरह का भय भी बना रहता है कि कहीं आशा से अधिक बारिश हो जाये और सूखे की स्थिति के ठीक उलट बाढ़ की, अतिवृष्टि की स्थिति न पैदा हो जाये. बहरहाल, ये स्थितियां मानसून पर निर्भर करती हैं. सूखे की, बाढ़ की, अतिवृष्टि की स्थिति को पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर माना जाता है. इनके अनियमित होने का सीधा असर किसान पर पड़ता है, कृषि पर पड़ता है. ऐसा नहीं है कि बाकी किसी अन्य रोजगार या फिर किसी अन्य व्यवस्था पर सूखे का या बाढ़ का प्रभाव नहीं पड़ता मगर जिस तरह से कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था से सीधे-सीधे सम्बद्ध है, उससे सीधा और स्पष्ट प्रभाव इसी क्षेत्र पर पड़ता है.

वर्तमान में औद्योगीकरण, वैश्वीकरण के दौर में भी भारतीय कृषि का अपना महत्त्व बना हुआ है. अनेक तरह के व्यवसाय होने के बाद भी, उन्नत उद्योग-धंधे स्थापित होने के बाद भी कृषि के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है. देश की राष्ट्रीय आय, रोजगार, जीवन-निर्वाह, पूँजी-निर्माण, विदेशी व्यापार, उद्योगों आदि में इसकी सशक्त भूमिका है. देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है, वहीं लगभग 64 प्रतिशत श्रमिकों को कृषि क्षेत्र में रोजगार प्राप्त है. इसके बाद भी भारतीय कृषि पिछड़ेपन की स्थिति से जूझ रही है, यहाँ का कृषक आत्महत्या जैसे कदमों को उठाने पर मजबूर है. कृषि कार्य के अनेक कारकों के अलावा मूल रूप से कृषि विपणन व्यवस्था का सही न होना भी किसानों की स्थिति को कमजोर बनाता है. सरकारी स्तर पर भी इस तरफ ध्यान नहीं दिया जा रहा है. हाल ही में बुन्देलखण्ड क्षेत्र में बुन्देलखण्ड पैकेज के करोड़ों रुपयों को मंडी स्थल बनाने में फिजूलखर्च कर दिया गया. ग्रामीण अंचलों से दूर बनाई गई नवीन मंडी स्थल तक पहुँचने के साधनों को विकसित नहीं किया गया. गाँव के साहूकार, महाजन, बड़े किसानों के चंगुल को कमजोर नहीं किया गया, ऐसे में छोटे और मंझोले किसान इन्हीं के चंगुल में फँसकर अपनी फसल को कम कीमत में बेचने को मजबूर होते हैं.

विपणन व्यवस्था में कई प्रकार के दोष होने के कारण किसानों को उनकी फसल का सही मूल्य प्राप्त नहीं हो पाता है, इससे वे उत्पादन की दिशा में भी हतोत्साहित होते हैं. विपणन व्यवस्था में ऐसे दोष के रूप में संग्रहण को देखा जा सकता है. ग्रामीण क्षेत्रों में आज उन्नत तकनीक के बाद भी फसल-संग्रहण के लिए मिट्टी के बर्तन, कच्चे कोठों का इस्तेमाल किया जाता है. ऐसे संग्रहण से उपज के सड़ने-गलने, कीटनाशको चूहों आदि से नष्ट होने का खतरा अधिक रहता है. नष्ट हो जाती फसल, जानवरों द्वारा ख़राब कर दी गई फसल के कारण किसान फसलों के संग्रहण को लेकर सदैव चिंतित रहता है और इसी से बचने के लिए वह काफी कम दामों में अपनी फसल का विक्रय कर देता है.

संग्रहण के साथ-साथ परिवहन साधनों की अनुपलब्धता अथवा उनका संपन्न न होना भी विपणन व्यवस्था की एक कमी कही जा सकती है. ग्रामीण क्षेत्र में परिवहन व्यवस्था सुलभ न होने के कारण किसान बड़ी मंड़ियों, सहकारी मंडियों तक नहीं पहुँच पाते हैं. फसल के आवागमन सम्बन्धी कठिनाई को देखते हुए वे अपनी फसल को गाँव में ही बेचने को विवश हो जाते हैं. ऐसी कमियों के चलते ग्रामीण इलाकों में मध्यस्थों की, दलालों की संख्या में वृद्धि होने लगती है. मध्यस्थों की बहुत बड़ी संख्या भी विपणन प्रणाली का एक दोष है. किसानों के मंडी में पहुँचने के पूर्व ही तमाम दलाल सक्रिय हो जाते हैं. दलालों की सक्रियता के अतिरिक्त अनियंत्रित मंडियों का संचालन भी विपणन व्यवस्था को प्रभावित करता है. इस प्रकार की मंडियों में कपटपूर्ण नीतियों के चलते किसान लगातार शिकार होते रहते हैं.

दरअसल हमारे देश में उदारीकरण, औद्योगीकरण के बाद से उद्योगों में तो कई तरह से परिवर्तन किये गए किन्तु कृषि क्षेत्र में सुधार की तरफ सकारात्मक रूप से ध्यान नहीं दिया गया. कृषि क्षेत्र में अभी भी किसान अपने उत्पाद को सन 1953 में बने एपीएमसी कानून के तहत बेचने को बाध्य हैं. इस कानून के द्वारा न तो नए व्यापारियों को लाइसेंस मिलता है और न ही नई मंडियों का निर्माण किया जा रहा है. इसके उलट हो ये रहा है कि जो विपणन संस्थाएं आधुनिकीकरण के लिए कार्य करने को बनाई गईं थीं वे बजाय इस क्षेत्र में काम करने के राज्य सरकारों के लिए राजस्व उगाही का माध्यम बन गईं हैं. हालाँकि वर्ष 2003 में इस कानून में संशोधन करके एक मॉडल एपीएमसी कानून बनाया गया, जिसमें निजी तथा कॉरपोरेट सेक्टर को विपणन नेटवर्क बनाने का रास्ता खोला गया. इसके बाद भी राजस्व नुकसान की आशंका के चलते और आढ़तियों की जबरदस्त लोबिंग के कारण देश के अधिसंख्यक राज्यों द्वारा इस कानून को अपनाया नहीं गया है. इस कारण किसान अभी भी अपनी फसल को सीधे उपभोक्ता को बेचने के स्थान पर इन दलालों, मध्यस्थों के हाथों की कठपुतली बने हुए हैं.


आवश्यकता इस बात की है कि किसान को उसकी फसल का उचितमूल्य प्राप्त हो. सभी किसान उत्साहजनक रूप से देश के कृषि विकास में सहायक सिद्ध हों तो आवश्यक है कि उनकी फसल के लिए उचित विपणन व्यवस्था का निर्माण किया जाये. इसके लिए सरकार को चाहिए कि वह श्रेणी विभाजन और मानकीकरण के अनुसार फसल के उत्पादन पर जोर दे. मंडियों में पक्के माल-गोदामों का निर्माण करे. आकाशवाणी के द्वारा, दूरदर्शन के द्वारा तथा सरकार अपनी मशीनरी के द्वारा समय-समय पर किसानों को उपज मूल्य की सही-सही जानकारी उपलब्ध करवाने की व्यवस्था करे. इसके साथ-साथ सरकार को चाहिए कि नियंत्रित मंडियों के स्वरूप के साथ-साथ ग्रामीण स्तर पर छोटी-छोटी नियंत्रित मंडियाँ हों जिससे छोटे किसान भी अपनी फसल को सही दाम पर बेच कर उसका उचित मूल्य प्राप्त कर सकें. इस तरह के कुछ उपायों को सकारात्मक रूप से लागू करके सरकारों द्वारा कृषि फसल को बचाया जा सकता है, कृषि उत्पाद का उचित मूल्य कृषकों को प्रदान करवाया जा सकता है, कृषकों को आत्महत्या करने से रोका जा सकता है.

25 मई 2016

चहकते बच्चों का खामोश हो जाना

देश भर में संचालित अनेक परीक्षा-संगठनों के परीक्षा परिणाम घोषित किये गए. अनेकानेक बच्चों ने सफलता प्राप्त की. खबरों में बच्चों के चहकने के, परिजनों संग, शिक्षकों संग उनके  चित्र लगातार सुर्ख़ियों में रहे. कोई इंजीनियर, कोई चिकित्सक, कोई प्रशासनिक अधिकारी, कोई वैज्ञानिक बनना चाहता है. हँसते-मुस्कुराते बच्चों के उत्साह को देखकर मन झूम जाता है. देश के उन्नत भविष्य का चित्र आँखों के सामने उभरता है. भावी पीढ़ी के विकासपरक राह पर बढ़ते रहने की आशा जागती है. इसी आशा और उन्नत भविष्य के साए में कुछ काली परछाइयाँ भीतर ही भीतर डरा जाती हैं. सुनहरे भविष्य की तस्वीर में कुछ धुंधलका सा लाती दिख जाती हैं. खुशियों के बीच ये काली परछाइयाँ बच्चों के आत्महत्या कर लेने की हैं. अपने परीक्षा परिणामों के प्रति सशंकित अनेक विद्यार्थियों द्वारा अपने जीवन को समाप्त कर लिया जाता है. किसी ने गले में फंदा डाल लिया तो किसी ने जहर खाकर जान दे दी. हँसते-खेलते बच्चों का यूँ सशंकित होकर असमय चले जाना मन को व्यथित करता है. परीक्षाओं में प्राप्तांकों के कम आने की शंका, कम अंक आने से भविष्य की राह के न मिलने के भय से, प्रवीणता सूची में न आ पाने के कारण अभिभावकों के सपने पूरे न कर पाने की निराशा का बोध बच्चों को मृत्यु की तरफ ले जाता है.

किसी भी परिवार के लिए उसके किसी भी सदस्य का चले जाना कष्टकारी होता है. ये कष्ट उस समय और भी विभीषक हो जाता है जबकि ऐसा किसी बच्चे के साथ हुआ हो. बच्चों द्वारा सिर्फ असफलता के भय से अथवा कुछ प्रतिशत अंक कम आने के चलते मौत की राह चले जाना समूची व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करता है. इक्कीसवीं सदी में जहाँ एक तरफ अधिकारों की, स्वतंत्रता की, फ्री सेक्स की, हैप्पी टू ब्लीड की, लिव-इन-रिलेशन आदि जैसी अतार्किक चर्चाओं में बुद्धिजीवियों से लेकर मीडिया तक निमग्न रहती है वहाँ बच्चों पर लादे जाने वाले अनावश्यक, अप्रत्यक्ष बोझ को दूर करने के लिए किसी तरह की चर्चा नहीं की जाती है. ये सम्पूर्ण समाज के लिए क्षोभ का विषय होना चाहिए कि एक बच्चा जो महज कुछ प्रतिशत कम अंक आने के भय से अथवा कम अंक आने के  कारण मृत्यु का वरण कर लेता है. समाज के विभिन्न क्षेत्रों में, विभिन्न विषयों में अपनी सक्रियता दिखा रहे समाजशास्त्री, मनोविज्ञानी इस दिशा में संज्ञाशून्य से बने नजर आ रहे हैं. घर से लेकर स्कूल तक, अभिभावकों से लेकर शिक्षक तक सभी अपनी-अपनी मानसिकता का बोझ बच्चों में मन-मष्तिष्क पर लाद दे रहे हैं. अपने अतृप्त सपनों को, अपने उस कैरियर को, जो वे नहीं बना सके, बच्चों के माध्यम से पूरा करने पर जोर लगाये हैं. अपने बच्चों को साक्षर, शिक्षित, संस्कारित बनाये जाने से ज्यादा ध्यान इस तरफ है कि वे कैसे अधिक से अधिक अंकों से सफलता प्राप्त करें. वे बच्चों की शिक्षा की बुनियाद को मजबूत करने के स्थान पर उनके मन में अधिकाधिक ‘पैकेज वाली जॉब’ को पाने का लालच भरने में लगे हैं. इस लालच के वशीभूत, अभिभावकों, शिक्षकों के असफल अतीत को अपने भविष्य के द्वारा पूरा करने के चक्कर में बच्चों द्वारा अपना वर्तमान दोषपूर्ण बना लिया जाता है.

समय के साथ जैसे-जैसे तकनीक उन्नत हुई है, जैसे-जैसे विकास की राह प्रशस्त हुई है वैसे-वैसे अभिभावकों की, शिक्षकों की महत्त्वाकांक्षाओं ने भी अनियमित विकास किया है. इस अंधाधुंध विकास की दौड़ में उनके द्वारा बच्चों से न सिर्फ अच्छे अंक लाने की जबरदस्ती की जा रही है वरन दूसरे बाकी बच्चों से गलाकाट प्रतियोगिता सी करवाई जा रही है. बच्चों को आपस में सहयोग की, समन्वय की भावना विकसित करने के स्थान पर आपस में चिर-प्रतिद्वंद्विता पैदा की जा रही है. स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के स्थान पर कटुता पैदा की जा रही है. ज्ञान को आपस में बाँटने की जगह उसे अपने आपमें ही कैद करके रखने की धारणा का विकास किया जा रहा है. बच्चों को किसी अन्य विद्यार्थी की असफलता के समय, उसकी आवश्यकता के समय उसकी मदद करने के बजाय उससे दूर रहने, उससे बचने की सलाह दी जा रही है. समझने की बात है कि सिर्फ और सिर्फ सफलता प्राप्त करने की शर्त के साथ-साथ बच्चों को किस तरह एकाकीपन के चंगुल में बाँधा जा रहा है. अपने चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ सफलता प्राप्त करने का शोर, दूसरे से आगे ही आगे बने रहने की होड़, किसी भी कीमत पर सबसे आगे आने और फिर सदैव आगे ही बने रहने का दबाव बच्चों को भीतर से खोखला बना रहा है. उनका यही खोखलापन उनकी असफलता में या फिर असफलता की आशंका में उन्हें सबसे दूर कर देता है. एक पल को इस स्थिति पर विचार करिए कि महज चंद अंकों के कारण एक हँसता-खेलता बच्चा सदैव के लिए खामोश हो जाये. विचार करिए उस बच्चे के अन्दर भय का, अविश्वास का वातावरण किस कदर भर गया होगा जो कम अंक आने के भय से दुनिया छोड़ देता है मगर परीक्षा परिणाम आने पर सर्वाधिक अंकों से सफलता प्राप्त करता है.


आज तकनीकी विकास के दौर में, ज्ञान की बहुलता के दौर में, उत्कृष्टता दिखाने के दौर में यदि कठिन श्रम, उच्च शिक्षा, अधिकतम अंक मजबूरी बन गए हों तो इस मजबूरी को और मजबूत करने के बजाय उसे दूर करने की आवश्यकता है. बच्चों को विश्वास में लेने की जरूरत है. उनके भीतर से खोखलापन हटाकर आत्मविश्वास भरने की जरूरत है. उन पर अनावश्यक दवाब बनाकर उनके जीवन को असमय समाप्त करने के स्थान पर उनको खिलखिलाते रहने के अवसर प्रदान करने की आवश्यकता है. अंकों की प्रतिस्पर्धा के बजाय उनमें स्वावलंबन की, संगठन की, समन्वय की भावना का विकास करने की जरूरत है. यदि हम आने वाले समय में ऐसा कर पाए तो अवश्य ही विकास की राह प्रशस्त कर पायेंगे, अन्यथा कष्ट तो दिनों-दिन बढ़ते ही जाना है. 

04 अप्रैल 2016

अकेलापन हावी है, मौत जारी है

अनिश्चय हावी है, हताशा हावी है, निराशा जारी है, इंसान का मरना जारी है. इस हावी रहने में, बहुत कुछ जारी रहने में सबसे बुरा है सपनों का मरते जाना, विश्वास का मिटते जाना. यांत्रिक रूप से गतिबद्ध ज़िन्दगी नितांत अकेलेपन के साथ आगे बढ़ती दिखती है किन्तु आगे बढ़ती सी लगती नहीं. इक्कीसवीं सदी को औद्योगीकरण की, भूमंडलीकरण की, वैश्वीकरण की, तकनीक की सदी घोषित कर दिया गया. इसके चलते समाज में अर्थ को महत्त्वपूर्ण माना जाने लगा. लोगों के लिए एकमात्र उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ धनोपार्जन करना बन गया है. इसके लिए जीवन को यंत्रवत सा बना लिया गया है. अब विद्रूपता ये की ये यांत्रिक ज़िन्दगी न केवल धनोपार्जन के लिए वरन बचपन, शिक्षा, घर-परिवार आदि में भी दिखने लगी है. किसी समय मौज-मस्ती, शैतानियों, शरारतों आदि के लिए बचपन को याद किया जाता था किन्तु अब ऐसा लगता है जैसे बचपन की भ्रूण हत्या कर दी गई है. हँसते-खेलते बच्चों की जगह बस्तों का बोझ लादे, थके-हारे से, मुरझाये से बच्चे दिखाई देते हैं. शरारतों, शैतानियों की जगह उनके चेहरों पर बड़ों-बुजुर्गों जैसी भाव-भंगिमा, सोच-विचार दिखाई देता है. नीले आकाश के नीचे उन्मुक्त खेलते, तितली बनकर उड़ते बच्चों को अब कमरों में बंद कर दिया गया है, उड़ान के लिए उनके हाथों में लैपटॉप, मोबाइल थमा दिए गए हैं. किसी समय में दादा-दादी, नाना-नानी के आँचल में छिपकर परियों, वीरों के किस्से-कहानियाँ सुन-सुनकर बड़े होने वाले बच्चे टीवी सीरियल्स के कथित लाइव शो को देखकर बड़े हो रहे हैं, स्मार्टफोन की इंटरनेट दुनिया के कारण समय से पहले ही स्मार्ट हो रहे हैं.



धनोपार्जन की आपाधापी में अभिभावकों का संलिप्त रहना, युवाओं का भागमभाग में जुट जाना, अपनी आँखों के सपनों को जिंदा बनाये रखने के लिए संवेदना को मारकर आगे बढ़ते जाना आदि ऐसा कुछ हुआ जिसने समूचे समाज को उल्टा खड़ा कर दिया. अनियमित होती जीवनशैली, परिवार से दूर रहने की मजबूरी, अधिकाधिक भौतिक संसाधनों की प्राप्ति करना, चकाचौंध भरी जिंदगी को जीने की लालसा ने इंसान को इंसान की जगह मशीन बना दिया. मशीन बनते इस इंसान ने मशीन बनते ही सबसे पहले अपने भीतर की संवेदना को समाप्त कर उसकी जगह एक बाज़ार को जन्म दिया. रिश्ते, नातों, परिवार, बच्चों, दोस्तों आदि को उसने सिर्फ बाज़ार की दृष्टि से देखा. सब जगह उसने हानि-लाभ का समीकरण लगाया और उसी के अनुसार अपने आपको संबंधों-रिश्तों के साँचे में उतारा. इस यांत्रिक जीवन का दुष्परिणाम यह हुआ कि सारे रिश्ते समाप्त से होते दिखे. बच्चों के लिए माता-पिता और माता-पिता के लिए बच्चे नोट छापने की मशीन मात्र बनकर रह गए. रिश्तों का मोल महज संबोधन के लिए होता दिखने लगा. ऐसी स्थिति में अकेलापन बढ़ना स्वाभाविक ही है और वैसा हुआ भी. धन, भौतिक संसाधन, आधुनिकतम उपकरण, तकनीक की भरमार हो गई और इंसान एकदम अकेला हो गया.


इस अकेलेपन को दूर करने के लिए तनहा इंसान ने सबक न लिया; अपनी तन्हाई को दूर करने के लिए अपनों का सहारा नहीं लिया; अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए इंसानों का सहयोग नहीं लिया क्योंकि विडम्बना ये है कि आधुनिकता के बाज़ार में इंसान दिख ही नहीं रहे हैं. चारों तरफ सिर्फ मशीन ही मशीन हैं, यंत्र ही यंत्र हैं. अकेलेपन का उपाय मोबाइल में, लैपटॉप में, छलकते जाम में, सिगरेट के छल्लों में, नशे के बादलों में, दैहिक आकर्षण में, बिस्तर की सिलवटों में खोजा जा रहा है. सेल्युलाइड के परदे की चकाचौंध को ही अपने जीवन की वास्तविकता मान लिया जा रहा है. आभासी दुनिया के नकलीपन को ही अपने जीवन का असलीपन बना लिया जा रहा है. इससे अकेलापन कम होने की बजे और बढ़ता जा रहा है. इंसान के भीतर एक तरह का खोखलापन बढ़ता जा रहा है. यही कारण है कि पिता अपनी ही बेटी से कुकृत्य करने में लगा है. भाई-बहिन के बीच शारीरिक सम्बन्ध बन रहे हैं. इंसानी देह महज भोग की वस्तु बनती जा रही है. यौनेच्छा पूर्ति के लिए हवसी बच्चियों, वृद्धाओं, शवों तक को नहीं बख्श रहे हैं. दैहिक संबंधों को मानसिक संबंधों पर वरीयता दी जाने लगी है. ऐसी स्थिति में अंत नितांत दुखद होता है. जब आँख खुलती है तो व्यक्ति को अपने चारों तरफ आभासी दुनिया का एहसास होता है, नितांत भ्रम का एहसास होता है, सबकुछ पीछे छूट जाने के दुःख होता है, अपनों के कहीं दूर चले जाने का भाव जगता है. यही सबकुछ व्यक्ति में और अधिक दुःख, हताशा, निराशा का संचार कर देता है. ऐसे में व्यक्ति या तो अवसाद की अवस्था में चला जाता है या फिर आत्महत्या जैसा जघन्य कृत्य कर बैठता है. ज़ाहिर है कि अकेलेपन का इलाज मशीन नहीं, बाज़ार नहीं, तकनीक नहीं वरन अपने लोग हैं, घर-परिवार है. आवश्यकता इस सत्य को समझने की है. यदि ऐसा नहीं होता है तो कारण कुछ भी बताये जाएँ, लोगों में अकेलापन हावी रहेगा, लोगों का मौत के आगोश में चलते चले जाना जारी रहेगा.
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29 फ़रवरी 2016

किसानों को बचाने को भी उपाय किये जाएँ

औद्योगीकरण, वैश्वीकरण के दौर में भी भारतीय कृषि का अपना महत्त्व बना हुआ है. अनेक तरह के व्यवसाय होने के बाद भी, विभिन्न तरह के कारोबार विकसित होने के बाद भी, उन्नत उद्योग-धंधे स्थापित होने के बाद भी कृषि के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है. आज मानसून की अनियमितता के चलते अथवा मौसम के लगातार बनते-बिगड़ते स्वभाव के बाद भी भले ही कृषि का चक्र अनियमित दिखता हो किन्तु इसके बाद भी देश की राष्ट्रीय आय, रोजगार, जीवन-निर्वाह, पूँजी-निर्माण, विदेशी व्यापार, उद्योगों आदि में इसकी सशक्त भूमिका है. देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है, वहीं लगभग 64 प्रतिशत श्रमिकों को कृषि क्षेत्र में रोजगार प्राप्त है. कृषि का सराहनीय योगदान न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था में बना हुआ है वरन सम्पूर्ण विश्व में भी भारतीय कृषि की अपनी ही साख बनी हुई है. चाय, चावल, मूँगफली तथा तम्बाकू ऐसे कृषि उत्पाद हैं जिनके उत्पादन के चलते वैश्विक स्तर पर भारत का पहले तीन देशों में कोई न कोई स्थान बना रहता है. इसके बाद भी भारतीय कृषि पिछड़ेपन की स्थिति से जूझ रही है, यहाँ का कृषक आत्महत्या जैसे कदमों को उठाने पर मजबूर है. देखा जाये तो ऐसी समस्या देश की आर्थिक, सामाजिक, प्राकृतिक स्थितियों के साथ-साथ अन्य कारणों के चलते है. जोतों का छोटा आकार होना, कृषि की मानसून पर निर्भरता, भू-स्वामित्व प्रणाली का दोषपूर्ण होना, वित्त सुविधाओं का अभाव, परम्परागत ढंग से कृषि करना, जनसंख्या का दवाब आदि ऐसी स्थितियाँ हैं जिनके कारण भारतीय कृषि पिछड़ी दशा में है. इन समस्याओं के अतिरिक्त कृषि पदार्थों के विपणन की व्यवस्था मुख्य रूप से कृषि को पिछड़ा बना रही है. देश का बहुसंख्यक किसान कृषि फसल के उचित विपणन न होने के कारण कृषि कार्य में उन्मुक्त रूप से संलिप्त नहीं हो पाता है.  

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हमारे देश में कृषि विपणन व्यवस्था में वर्तमान में कई प्रकार के दोष देखने को मिलते हैं. इन दोषों के कारण किसानों को उनकी फसल का सही मूल्य प्राप्त नहीं हो पाता है, इससे वे उत्पादन की दिशा में भी हतोत्साहित होते हैं. विपणन व्यवस्था में ऐसे दोष के रूप में संग्रहण को देखा जा सकता है. ग्रामीण क्षेत्रों में आज उन्नत तकनीक के बाद भी फसल-संग्रहण के लिए मिट्टी के बर्तन, कच्चे कोठों का इस्तेमाल किया जाता है. ऐसे संग्रहण से उपज के सड़ने-गलने, कीटनाशको चूहों आदि से नष्ट होने का खतरा अधिक रहता है. नष्ट हो जाती फसल, जानवरों द्वारा ख़राब कर दी गई फसल के कारण किसान फसलों के संग्रहण को लेकर सदैव चिंतित रहता है और इसी से बचने के लिए वह काफी कम दामों में अपनी फसल का विक्रय कर देता है. संग्रहण के साथ-साथ परिवहन साधनों की अनुपलब्धता अथवा उनका संपन्न न होना भी विपणन व्यवस्था की एक कमी कही जा सकती है. ग्रामीण क्षेत्र में परिवहन व्यवस्था सुलभ न होने के कारण किसान बड़ी मंड़ियों, सहकारी मंडियों तक नहीं पहुँच पाते हैं. फसल के आवागमन सम्बन्धी कठिनाई को देखते हुए वे अपनी फसल को गाँव में ही बेचने को विवश हो जाते हैं. ऐसी कमियों के चलते ग्रामीण इलाकों में मध्यस्थों की, दलालों की संख्या में वृद्धि होने लगती है. मध्यस्थों की बहुत बड़ी संख्या भी विपणन प्रणाली का एक दोष है. किसानों के मंडी में पहुँचने के पूर्व ही तमाम दलाल सक्रिय हो जाते हैं. इससे किसान को कभी-कभी अपनी उपज का लगभग 50 प्रतिशत तक ही दाम मिल पाता है. दलालों की सक्रियता के अतिरिक्त अनियंत्रित मंडियों का संचालन भी विपणन व्यवस्था को प्रभावित करता है. इस प्रकार की मंडियों में कपटपूर्ण नीतियों के चलते किसान लगातार शिकार होते रहते हैं.
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दरअसल हमारे देश में उदारीकरण, औद्योगीकरण के बाद से उद्योगों में तो कई तरह से परिवर्तन किये गए, उद्योगों के विकास के लिए सम्बंधित नियम-कानूनों में व्यापक संशोधन किये गए किन्तु कृषि क्षेत्र में सुधार की तरफ सकारात्मक रूप से ध्यान नहीं दिया गया. कृषि क्षेत्र में अभी भी किसान अपने उत्पाद को सन 1953 में बने एपीएमसी कानून के तहत बेचने को बाध्य हैं. इसके अंतर्गत किसान अपनी फसल आढ़तियों, जो कहीं न कहीं दलाल के रूप में काम करते हैं, के सहारे बेचने को विवश होते हैं. इस कानून के द्वारा न तो नए व्यापारियों को लाइसेंस मिलता है और न ही नई मंडियों का निर्माण किया जा रहा है. इसके उलट हो ये रहा है कि जो विपणन संस्थाएं आधुनिकीकरण के लिए कार्य करने को बनाई गईं थीं वे बजाय इस क्षेत्र में काम करने के राज्य सरकारों के लिए राजस्व उगाही का माध्यम बन गईं हैं. हालाँकि वर्ष 2003 में इस कानून में संशोधन करके एक मॉडल एपीएमसी कानून बनाया गया, जिसमें निजी तथा कॉरपोरेट सेक्टर को विपणन नेटवर्क बनाने का रास्ता खोला गया. इसके बाद भी राजस्व नुकसान की आशंका के चलते और आढ़तियों की जबरदस्त लोबिंग के कारण देश के अधिसंख्यक राज्यों द्वारा इस कानून को अपनाया नहीं गया है. इस कारण किसान अभी भी अपनी फसल को सीधे उपभोक्ता को बेचने के स्थान पर इन दलालों, मध्यस्थों के हाथों की कठपुतली बने हुए हैं.
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इस तरह की विषम परिस्थितयों के बीच किसानों को मल्टीब्रांड रिटेल के सब्जबाग दिखाये जा रहे हैं, जबकि आवश्यकता इस बात की है कि किसान को उसकी फसल का उचितमूल्य प्राप्त हो. सभी किसान उत्साहजनक रूप से देश के कृषि विकास में सहायक सिद्ध हों तो आवश्यक है कि उनकी फसल के लिए उचित विपणन व्यवस्था का निर्माण किया जाये. इसके लिए सरकार को चाहिए कि वह श्रेणी विभाजन और मानकीकरण के अनुसार फसल के उत्पादन पर जोर दे. मंडियों में पक्के माल-गोदामों का निर्माण करे. आकाशवाणी के द्वारा, दूरदर्शन के द्वारा तथा सरकार अपनी मशीनरी के द्वारा समय-समय पर किसानों को उपज मूल्य की सही-सही जानकारी उपलब्ध करवाने की व्यवस्था करे. इसके साथ-साथ सरकार को चाहिए कि नियंत्रित मंडियों के स्वरूप के साथ-साथ ग्रामीण स्तर पर छोटी-छोटी नियंत्रित मंडियाँ हों जिससे छोटे किसान भी अपनी फसल को सही दाम पर बेच कर उसका उचित मूल्य प्राप्त कर सकें. इस तरह के कुछ उपायों को सकारात्मक रूप से लागू करके सरकारों द्वारा कृषि फसल को बचाया जा सकता है, कृषि उत्पाद का उचित मूल्य कृषकों को प्रदान करवाया जा सकता है, कृषकों को आत्महत्या करने से रोका जा सकता है.