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06 अप्रैल 2026

बदलते मौसम के खतरे

प्रकृति मिजाज कब बदल जाये, कहा नहीं जा सकता है. उसके इस बदलते रुख को इस समय बहुत ही नजदीक से महसूस किया जा रहा है. दिल्ली और उत्तर-पश्चिम भारत अचानक से बदले मौसम की चपेट में है और बारिश, ओलावृष्टि, तूफानों का सामना कर रहा है. यह आश्चर्य का विषय है कि जिस समय में इस क्षेत्र में गरम हवाओं का परिचालन होता था, तीव्र गर्मी का एहसास किया जाता था उस समय यहाँ बारिश, ओलावृष्टि हो रही है. मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिमी विक्षोभ में व्यापक बदलाव आने के कारण ऐसा हुआ है. इसके लिए उन्होंने पॉलर जेट स्ट्रीम में गड़बड़ी और पोलर वॉर्टेक्स के बदलते रूप को जिम्मेदार बताया है. पोलर वॉर्टेक्स आर्कटिक के चारों ओर घूमता ठंडा वायुमंडल है. इसके चलते ही ओलावृष्टि में तीव्रता देखने को मिल रही है. मौसम विज्ञानियों के अनुसार गत माह मार्च में पाँच-छह पश्चिमी विक्षोभ आने चाहिए थे लेकिन इनकी संख्या आठ हो गई. वर्तमान माह अप्रैल में अनुमान है कि इनकी संख्या कम से कम तीन हो सकती है.

 


इस बदलते मौसम का कारण कुछ भी क्यों न रहा हो मगर यह जलवायु संकट का एक अत्यंत चिंताजनक और प्रत्यक्ष उदाहरण है. पारम्परिक ऋतु चक्र में परिवर्तन होने से जीवनदायिनी बारिश विनाशकारी भी बन जाती है. इस बेमौसम बारिश का प्रभाव नकारात्मक रूप से सामाजिक, आर्थिक और पारिस्थितिक ढाँचे पर हुआ है. इस असमय वर्षा ने सबसे घातक प्रहार हमारे कृषि ढाँचे पर किया है. तकनीकी विकास के बाद भी भारतीय कृषि आज भी पूरी तरह से प्रकृति के तालमेल पर निर्भर करती है. ऐसे में प्रकृति का जरा सा भी नकारात्मक बदलाव किसानों की महीनों की मेहनत पर पानी फेर देती है. असमय होने वाली इस बारिश, ओलावृष्टि, तूफ़ान ने रबी की फसल को अपनी चपेट में ले लिया है. गेहूँ, सरसों, चने जैसी फसलें मौसम की मार के कारण मिट्टी में मिल चुकी हैं.

 

ऐसी स्थिति का प्रभाव अकेले किसानों पर नहीं पड़ता है बल्कि समग्र रूप में पूरी आर्थिकी इससे प्रभावित होती है, आम जनजीवन को भी इसका प्रभाव सहना पड़ता है. असमय मौसम के बदले इस मिजाज के कारण फसल तो चौपट होती ही है और यदि किसी तरह के प्रयासों से कुछ बचाव कर भी लिया जाये तो न केवल अनाज की मात्रा कम होती है बल्कि दानों की गुणवत्ता में भी कमी आती है. इसका दुष्प्रभाव यह होता है कि किसान को  अपनी फसल का उचित दाम बाजार में नहीं मिल पाता है. ऐसी स्थिति में आपूर्ति की कमी हो जाती है, जिससे शहरी अर्थव्यवस्था, एक गृहिणी की रसोई भी प्रभावित होती है. बाजार में आपूर्ति की कमी के चलते खाद्य मुद्रास्फीति अर्थात महँगाई का भी तेजी से बढ़ना शुरू हो जाता है. वर्तमान दौर में जबकि न केवल वैश्विक समुदाय बल्कि भारतीय समाज भी युद्ध की विभीषिका के कारण से आर्थिकी में हो रहे परिवर्तनों को महसूस कर रहा है, तब बेमौसम की मार से इस आर्थिक तंत्र के बिगड़ने से आम जनमानस पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका है.

 


इस असमय मौसम परिवर्तन ने केवल कृषि को बल्कि स्वास्थ्य को भी प्रभावित किया है. प्रकृति में तापमान के अचानक गिरने से, नमी के बढ़ने से सूक्ष्मजीवों
, वायरस, मच्छरों आदि के पनपने का खतरा बढ़ गया है. ऐसा होने के परिणामस्वरूप सर्दी-खाँसी, बुखार, श्वसन सम्बन्धी समस्याओं के साथ-साथ डेंगू, मलेरिया आदि बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है. मौसमी बदलाव के लिए शारीरिक रूप से तैयार न होने के कारण लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी प्रभावित होती है. इसका सर्वाधिक दुष्प्रभाव बच्चों और बुजुर्गों पर पड़ता है. इनके अलावा इस बदलते मौसम से हमारा पारिस्थितिक तंत्र और जैव विविधता भी प्रभावित होती है. प्रत्येक जीव और वनस्पति का अपना एक जैविक कैलेंडर होता है, जिसमें इस असमय बदलाव के कारण भी बदलाव देखने को मिलता है. असमय बारिश से उनका प्रजनन चक्र प्रभावित होता है, बहुत से पक्षियों के घोंसले नष्ट हो जाते हैं, अनेक दुर्लभ प्रजातियों का  अस्तित्व इस असमय बदलाव के कारण खतरे में पड़ जाता है.

 

मौसम विशेषज्ञ इस बदलाव का कारण भले ही कुछ भी बताएँ मगर यदि ऐसी स्थितियों के मूल में जाया जाये तो ग्लोबल वार्मिंग, मानव-जनित प्रदूषण ही इसके सबसे प्रमुख कारण नजर आते हैं. विकास की अंधी दौड़ में मनुष्य ने जंगलों, नदियों, पहाड़ों, वायुमंडल को नष्ट कर दिया है. इससे पारिस्थितिक तंत्र की नकारात्मकता ने प्रकृति में उथल-पुथल मचा रखी है. कार्बन उत्सर्जन की बढ़ती मात्रा ने धरती का तापमान खराब कर दिया है. समुद्रों, नदियों के पहले से कहीं अधिक गर्म होने के कारण बादलों का निर्माण, उनकी दिशा अनियंत्रित हो गई है. पश्चिमी विक्षोभ और समुद्री चक्रवातों के बदलते पैटर्न ने अपना रौद्र रूप दिखाना शुरू कर दिया है.

 

इस संकट का समाधान मुआवजा, तात्कालिक राहत में नहीं है. इसके लिए दीर्घकालिक नीतियों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाना होगा. प्रकृति से खिलवाड़ करने की मानसिकता से बाहर निकलना होगा. सिंचाई के लिए जल संचयन प्रणालियों को मजबूत करना होगा ताकि बारिश के पानी का सदुपयोग हो सके. तेजी से कंक्रीट के जंगलों में बदलते जा रहे शहरों के नियोजन में भी आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता है ताकि वे जलवायु अनुकूलन क्षमता को धारण कर सकें. यह समझना होगा कि बेमौसम बारिश कोई मौसमी परिघटना नहीं है बल्कि यह प्रकृति की चेतावनी है, जो हमें अपनी जीवनशैली बदलने को सचेत कर रही है. यदि हम अब भी नहीं जागे, पर्यावरण संरक्षण को अपनी प्राथमिकता नहीं बनाया तो ऐसी मौसमी अनिश्चितताएँ हमारी खाद्य सुरक्षा, सामाजिक ढाँचे को हिलाकर रख देंगी.


29 दिसंबर 2020

नकारात्मक है कृषि सुधार कानून विरोधी आन्दोलन

इस समय देश की राजधानी और देश की वर्तमान राजनैतिक स्थिति किसान आन्दोलन की चपेट में है. सामान्य नागरिकों को देश के किसानों और जवानों के सन्दर्भ में किसी तरह का तर्क-वितर्क सुनना पसंद नहीं आता है, इसी कारण से बहुतेरे नागरिक बिना कुछ और विचार किये अपना समर्थन वर्तमान में चल रहे किसान आन्दोलन को देने लगे. किसानों का यह आन्दोलन केंद्र सरकार द्वारा पारित किये गए तीन बिलों, कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक 2020, मूल्य आश्वासन एवं कृषि सेवाओं पर कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) अनुबंध विधेयक 2020 और आवश्यक वस्तु संशोधन बिल आवश्यक वस्तु अधिनियम के विरोध में हो रहा है.


किसी भी सामान्य नागरिक, जिसे राजनीति से कहीं भी खड़े होकर चर्चा कर लेने भर का सम्बन्ध होता है, को इससे कोई सरोकार नहीं होता है कि किसी भी सरकार द्वारा किसी बिल को, किसी भी संशोधन को अकारण अथवा बिना किसी नियम-कानून के नहीं कर दिया जाता है. यदि उक्त किसान सम्बन्धी कानूनों की ही बात की जाये तो यह अकेले किसी एक-दो व्यक्तियों की सोच नहीं, एक-दो मंत्रियों का कार्य नहीं. किसी भी ऐसे कानून को अथवा ऐसे बदलाव को, जिसका असर पूरे देश पर पड़ने वाला होता है उसे एक व्यापक सोच के साथ पूरे नियम-विधान के बाद ही पारित किया जाता है.


यहाँ यदि एक पल को कानूनों का संक्षिप्त रूप देखें तो स्पष्ट समझ आता है कि कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक 2020 के अनुसार किसान मनचाही जगह पर अपनी फसल बेच सकते हैं. इसमें वे बिना किसी समस्या के दूसरे राज्यों में भी फसल बेच और खरीद सकते हैं अर्थात एपीएमसी (APMC) के दायरे से बाहर भी फसलों की खरीद-बिक्री संभव है. इसमें एक लाभ यह है कि की बिक्री पर कोई टैक्स नहीं लगेगा और इसके साथ ही ऑनलाइन बिक्री की भी अनुमति होगी. संभव है कि इस कदम के बाद किसानों को अच्छे दाम मिलने लगें.


इस बिल के साथ पारित मूल्य आश्वासन एवं कृषि सेवाओं पर कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) अनुबंध विधेयक 2020 के द्वारा देशभर में कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग करने सम्बन्धी व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव है. इसके अनुसार यदि फसल खराब होती है तो नुकसान की भरपाई अनुबंध करने वाले पक्ष को करनी होगी. ऐसा माना जा रहा है कि इससे किसानों की आय बढ़ेगी और बिचौलिया राज खत्म होगा. तीसरे कानून के रूप में आवश्यक वस्तु संशोधन बिल आवश्‍यक वस्‍तु अधिनियम में संशोधन किया गया है. यह कानून सन 1955 में बनाया गया था. इसमें संशोधन करते हुए अब खाद्य तेल, तिलहन, दाल, प्याज और आलू जैसे कृषि उत्‍पादों पर से स्टॉक लिमिट (भण्डारण सीमा) हटा दी गई है. राष्‍ट्रीय आपदा, सूखा जैसी अपरिहार्य स्थितियाँ होने की दशा में भण्डारण सीमा निर्धारित की जाएगी.


इन कानूनों को लेकर जिस तरह से विपक्षी दलों द्वारा उकसाने की राजनीति की जा रही है, वह चिंतनीय है. जो लोग वर्तमान कृषि स्वरूप से, बिक्री और भण्डारण की स्थिति से परिचित हैं वे भली-भांति समझ सकते हैं कि इन कानूनों के आने से किसान को हानि कम है जबकि लाभ ज्यादा है. आज भी मंडियों में छोटे और मंझोले किसानों को अपनी फसल का उचित मूल्य मिल ही नहीं पाता है. छोटी जोतों वाले किसान तो मंडियों का मुँह भी नहीं देख पाते हैं. उनकी फसल का मूल्य तो गाँव के महाजन अथवा बड़े किसान द्वारा निर्धारित करके चुका दिया जाता है.


वर्तमान आन्दोलन की आड़ में सक्रिय राजनैतिक दल जनता की कमजोर नब्ज पकड़ कर अपना हित ही साधने का प्रयास कर रहे हैं मगर यह समझना नहीं चाहते कि इसका समाज पर, देश पर क्या असर पड़ने वाला है. यह विचारणीय है कि वर्तमान दौर औद्योगीकरण, वैश्वीकरण का होने के बाद भी कृषि का अपना महत्त्व बना हुआ है. एक अनुमान के अनुसार माना जाता है कि देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है, वहीं लगभग 64 प्रतिशत श्रमिकों को कृषि क्षेत्र में रोजगार प्राप्त है. इसके बाद भी देश की आर्थिक, सामाजिक, प्राकृतिक स्थितियों के साथ-साथ जोतों का छोटा आकार होना, कृषि की मानसून पर निर्भरता, भू-स्वामित्व प्रणाली का दोषपूर्ण होना, वित्त सुविधाओं का अभाव, परम्परागत ढंग से कृषि करना, जनसंख्या का दवाब आदि ऐसी स्थितियाँ हैं जिनके कारण भारतीय कृषि पिछड़ी दशा में है.


विगत कई दशकों में देश में उदारीकरण, औद्योगीकरण के बाद से उद्योगों के विकास के लिए सम्बंधित नियम-कानूनों में व्यापक संशोधन किये गए हैं किन्तु कृषि क्षेत्र में सुधार की तरफ सकारात्मक रूप से ध्यान नहीं दिया गया था. कृषि क्षेत्र में अभी भी किसान अपने उत्पाद को सन 1953 में बने एपीएमसी कानून के तहत बेचने को बाध्य हैं. इसके अंतर्गत किसान अपनी फसल आढ़तियों, जो कहीं न कहीं दलाल के रूप में काम करते हैं, के सहारे बेचने को विवश होते हैं. इस कानून के द्वारा न तो नए व्यापारियों को लाइसेंस मिलता है और न ही नई मंडियों का निर्माण किया जा रहा है. इसके उलट हो ये रहा है कि जो विपणन संस्थाएं आधुनिकीकरण के लिए कार्य करने को बनाई गईं थीं वे बजाय इस क्षेत्र में काम करने के राज्य सरकारों के लिए राजस्व उगाही का माध्यम बन गईं हैं. हालाँकि वर्ष 2003 में इस कानून में संशोधन करके एक मॉडल एपीएमसी कानून बनाया गया, जिसमें निजी तथा कॉरपोरेट सेक्टर को विपणन नेटवर्क बनाने का रास्ता खोला गया. इसके बाद भी राजस्व नुकसान की आशंका के चलते और आढ़तियों की जबरदस्त लोबिंग के कारण देश के अधिसंख्यक राज्यों द्वारा इस कानून को अपनाया नहीं गया है. इस कारण किसान अभी भी अपनी फसल को सीधे उपभोक्ता को बेचने के स्थान पर इन दलालों, मध्यस्थों के हाथों की कठपुतली बने हुए हैं.


देश के लगभग हर राज्य में किसान अपनी समस्याओं से पीडि़त हैं और सरकारी तन्त्र द्वारा उनकी समस्याओं के समाधान की बात तो की जाती है किन्तु किसी प्रकार का समाधान उनके द्वारा होता दिखता नहीं है. अब जबकि कृषि सुधार कानूनों के द्वारा सरकार कुछ सकारात्मकता दिखाने का प्रयास कर रही है तो राजनैतिक दलों द्वारा अनावश्यक रूप से किसानों को उकसाया जा रहा है. यहाँ राजनैतिक दलों को वर्तमान संशोधित कानूनों के परिणामों को देखने का इंतजार करना चाहिए था. यदि वे वाकई किसानों के हितैषी हैं तो कम से कम एक वर्ष में इन सुधारों को अमली रूप में आते देखते. वर्तमान हालातों में आन्दोलन कर देने से, सड़कें जाम कर देने से, राजधानी को बंधक बना लेने से किसानों की समस्याओं का हल नहीं निकलने वाला है. दवाब की राजनीति के द्वारा सरकार को कानून वापस लेने के लिए बाध्य करना भविष्य के लिए कितना घातक होगा, इसे अभी महसूस नहीं किया जा रहा है. किसी भी लोकतान्त्रिक संस्था द्वारा लम्बे विमर्श के बाद बनाये और दोनों सदनों में बहस के पश्चात् पारित कानूनों को वापस लेने के लिए आन्दोलन करना आत्मघाती कदम है. यह भविष्य के लिए नकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करेगा.




(उक्त आलेख 29-12-2020 के समाचार-पत्र बीपीएन टाइम्स के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है.)
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वंदेमातरम्

11 दिसंबर 2020

आन्दोलन की आड़ में अराजकता फ़ैलाने की कोशिश?


ये चित्र इधर सोशल मीडिया पर खूब चर्चा में है. यह दिल्ली में कथित रूप से किसान आन्दोलन के साथ जुड़ा हुआ कटाया जा रहा है. जिस दिन से इस आन्दोलन का आरम्भ हुआ था, उसी दिन से किसानों के नाम पर कभी मोदी को देख लेने की बात कही गई, कभी हिन्दू महिलाओं के लिए अशालीन बयान दिए गए, कभी खालिस्तान समर्थन के नारे, कभी पाकिस्तान के पक्ष में नारे सुनाई दे रहे थे. उसी समय से बराबर हमने कहा था कि ये किसानों का आन्दोलन नहीं बल्कि कृषि-व्यापारियों का आन्दोलन है. बहरहाल, वह चर्चा अलग है. यदि ये चित्र वाकई दिल्ली में चल रहे इसी आन्दोलन से सम्बंधित है तो वाकई चिंता का विषय है. सोचने वाली बात ये है कि किसानों का सम्बन्ध इन अलगाववादी लोगों से कैसे है? कृषि से सम्बंधित कानूनों से जुड़े बिन्दुओं, उनसे जुड़े लाभ-हानि का तख्तियों पर चिपके चित्रों से क्या लेना-देना?


किसानों के आन्दोलन का ऐसी बातों से जुड़ा होने का अर्थ समझ से परे है. किसानों की आड़ लेकर देश में या कहें कि देश की राजधानी में फिर से अराजकता फैलाने की कोशिश की जा रही है. इस पूरे आन्दोलन में जिस तरह का मुस्लिम गठजोड़ देखने को मिला, सिखों का भेष धारण किये हुए मुस्लिम युवक पकड़े गए वह भी अपनी अलग कहानी कहता है. शाहीन बाग़ के बाद भी दिल्ली में उस स्तर की अराजकता शायद ये ताकतें नहीं फैला सकीं थीं जैसी कि वे चाहती थीं, इसलिए अब दोबारा कोशिश की जा रही है. ये सभी को मालूम है कि दिल्ली में होने वाली हलचल समूचे विश्व में देखी-सुनी जाती है. ऐसे में दिल्ली में अराजकता फैलने से सरकार की, प्रशासन की छवि पर नकारात्मक असर भी पड़ता है. किसानों के रूप में बैठे ऐसे कृषि-व्यापारियों, खालिस्तान समर्थकों, पाकिस्तान समर्थकों का उद्देश्य कृषि सम्बन्धी कानून में संशोधन नहीं बल्कि अराजकता के द्वारा देश को, सरकार को बदनाम करना है. इसका प्रमाण इस चित्र के माध्यम से (यदि ये चित्र सही है) लिया जा सकता है.


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वंदेमातरम्

02 फ़रवरी 2019

लोक कल्याणकारी बजट


चुनावी वर्ष में केंद्र सरकार द्वारा अंतरिम बजट के द्वारा एक तरफ जनमानस को खुश करने का काम किया है वहीं विपक्षियों को साफतौर पर चेताया सा है कि अभी उनके तरकश में तीर बकाया हैं. इस बजट में करदाताओं का, वेतनभोगियों का, किसानों का ध्यान तो रखा ही गया है विशेष बात यह रही कि श्रमिक वर्ग का भी ख्याल रखा गया है. अभी तक के बजट में संभवतः ऐसा कम ही देखने को मिला है कि असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए किसी तरह की योजना का प्रावधान किया गया हो. इस बार साठ वर्ष से अधिक आयु के असंगठित कामगारों को पेंशन सुविधा का आरम्भ किया गया है. इस बजट में इनके अलावा और भी ऐसे प्रावधान किये गए हैं जिनको देखते हुए इसे लोककल्याणकारी बजट कहा जा सकता है. आमजनमानस के हितों के साथ-साथ देश की आर्थिक, सामरिक स्थिति के सम्बन्ध में भू पुख्ता कदम उठाये जाने से स्पष्ट होता है कि सरकार ने किसी एक पक्ष की तरफ ही अपना ध्यान नहीं लगाया है.


लोककल्याण की भावना निहित होने के चलते ही अभी तक विपक्षियों द्वारा, विशेषज्ञों द्वारा बजट की उन स्वरों में आलोचना नहीं की जा सकी है, जैसी कि विगत वर्षों में होती रही है. केंद्र में किसी भी सरकार द्वारा बजट का प्रस्तुत करना रहा हो मगर उसके प्रावधानों पर तत्कालीन विपक्ष सदैव हमलावर बना रहता था. संभवतः इस बार ऐसा देखने को मिला है जबकि बजट के द्वारा विपक्षियों को आलोचना करने का, सरकार पर वार करने का अवसर नहीं मिल पाया है. यह इस बजट की विशेषता है कि इसके द्वारा देश के लगभग अस्सी प्रतिशत नागरिकों तक को लाभान्वित करने का प्रयास किया गया है. मझोले-छोटे किसानों, असंगठित मजदूरों, कामगारों आदि के साथ-साथ मध्यमवर्गीय वेतनभोगियों को आयकर छूट सीमा बढ़ाकर लाभ के दायरे में शामिल किया है.  

देश में उदारीकरण का दौर आने के बाद बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आने से सरकारों ने लोककल्याणकारी कदम उठाये जाने की तुलना में व्यापारिक कदम उठाने को ज्यादा महत्त्व दिया था. आयकर छूट सीमा में वृद्धि किये जाने की आशा कई वर्षों से वेतनभोगी व्यक्ति लगाये हुए था मगर ऐसा अबकी बजट में हो सका है. इसके अलावा पीएफ खाताधारकों को दुर्घटना बीमा, बैंक खातों में ब्याज पर टैक्स की सीमा में वृद्धि, ग्रेच्युटी में बढ़ोत्तरी आदि ने मध्यमवर्ग को संतुष्ट किया है. इस बजट को देखकर इसे बड़े उद्योगपतियों का बजट नहीं कहा जा सकता है. जैसा कि पिछले बजट के दौरान विपक्षियों द्वारा कहा जाता था. वर्तमान केंद्र सरकार ने इस बजट के द्वारा बड़े-बड़े उद्योगों के बजाय छोटे-छोटे वर्ग तक पहुँच बनाने की कोशिश की है. इसे भले ही चुनावी दाँव कहा जाये मगर इसके द्वारा मध्यमवर्ग को राहत मिली है. आयकरदाताओं के बीच संतुष्टि का भाव जन्मा है. 

पिछले कुछ समय से केंद्र सरकार ने जिस तरह से सख्ती के साथ कदम उठाते हुए नोटबंदी और जीएसटी को लागू किया, उससे यह तो स्पष्ट हुआ था कि सरकार आने वाले समय में मध्यमवर्ग को लाभान्वित करते हुए राहत देगी. ऐसा इसलिए क्योंकि सरकार का उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा लोगों को कर के दायरे में शामिल करते हुए भी मध्यमवर्ग को कर से राहत प्रदान करवाना है. सरकार समझती है कि जीएसटी के द्वारा कारोबारी अपने ऊपर आने वाला कर जनता के ऊपर स्थानांतरित कर देंगे. इसके चलते वह जनता पर, आमजनमानस पर दोहरा भार डालने के मूड में नहीं दिख रही थी. यही कारण है कि आयकर छूट सीमा को बढ़ाया गया है. विरोध के नाम पर विरोध तो ऐसे भी दिखाई देने लगा है कि छोटे किसानों को दिए जाने वाले वार्षिक 6000 रुपये को भी प्रतिदिन के हिसाब से आकलन करके इसे नाकाफी बताया जाने लगा है. जबकि बजट में स्पष्ट कहा गया है कि यह राशि दो-दो हजार रुपये की तीन किश्तों में दी जाएगी. इसके अलावा वर्तमान बजट को राजकोषीय घाटा बढ़ाने वाला बताया जाने लगा है. यदि विगत वर्षों के राजकोषीय घाटे पर निगाह डालें तो स्पष्ट रूप से समझ आएगा कि वर्ष 2011-12 के बाद से राजकोषीय घाटा लगातार कम ही हुआ है. ऐसे में सरकार खुद अपने स्तर से प्रयास करेगी कि राजकोषीय घाटा वर्ष 2017-18 के 3.5 से बहुत ज्यादा न बढ़े.


फ़िलहाल, विपक्षियों के पास इस बजट की बुराई करने के, आलोचना करने के बिंदु नहीं हैं. किसी भी दृष्टि से इस बजट को बड़े कारोबारियों से प्रभावित बजट नहीं कहा जा सकता है. किसी भी रूप में ऐसी कोई योजना नहीं बनाई गई है जो सिर्फ पूंजीपतियों की सहायता कर रही हो. निसंदेह पहली बार देश के उस छोटे से तबके का ध्यान रखा गया है जो संगठित नहीं है, जिसके पास कोई भविष्यगत संसाधन नहीं हैं, वृद्धावस्था में अपने जीवन सञ्चालन हेतु कोई आर्थिक मदद नहीं है. ऐसे में कोई कुछ भी कहे मगर वर्तमान बजट लोक कल्याणकारी बजट है.

01 फ़रवरी 2019

मध्यम वर्ग को लाभान्वित करेगा यह बजट 2019


वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा अपना अंतिम बजट अंतरिम बजट के रूप में प्रस्तुत किया गया. इस बजट में आम आदमी, किसान, श्रमिकों का विशेष रूप से ध्यान रखा गया है. कुछ विशेष बिन्दुओं को रखते हुए इस बजट पर चर्चा का प्रयास रहेगा.

वेतनभोगियों, कर्मचारियों के लिए -
पाँच लाख रुपये तक की आय के साथ डेढ़ लाख रुपये तक की बचत भी करमुक्त.
स्टैण्डर्ड डिडक्शन 40 हजार रुपये से बढ़ाकर 50 हजार रुपये.
40 हजार रुपये तक के बैंक ब्याज पर टैक्स नहीं. पहले यह सीमा 10 हजार रुपए तक थी.
पीएफ खाताधारकों को 6 लाख रुपये का बीमा किये जाने का प्रावधान.
कर्मचारियों को नई पेंशन स्कीम में सरकार के योगदान को चार प्रतिशत से बढ़ाकर चौदह प्रतिशत किया गया.
21 हजार रुपए प्रतिमाह कमाने वाले कर्मचारियों को 7 हजार रुपए बोनस.
ग्रैच्युटी की सीमा दस लाख रुपये से बढ़ाकर बीस लाख रुपए की गई.

किसानों के लिए -
देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जबकि 22 फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य लागत से कम से कम 50 फीसदी अधिक निर्धारित किया गया है.
छोटे और सीमांत किसानों के लिए प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि नामक योजना को मंजूरी.
दो हेक्टेयर (लगभग 5 एकड़) तक की भूमि वाले किसानों को 6000 रुपए प्रति वर्ष देने का निर्णय. यह रकम दो-दो हजार रुपए की तीन बराबर किश्तों में सीधे किसानों के खाते में जाएगी.
प्राकृतिक आपदा से प्रभावित होने वाले सभी किसानों के लिए ब्याजमाफी योजना शुरू.
इसमें दो प्रतिशत ब्याज और समय पर कर्ज लौटाने वाले किसानों को तीन प्रतिशत अतिरिक्त ब्याज माफी का लाभ मिलेगा. कुल मिलाकर उन्हें ब्याज में पाँच प्रतिशत की छूट मिल सकेगी.
पशुपालन-मछलीपालन के लिए किसान क्रेडिट कार्ड से लिए कर्ज के ब्याज में दो प्रतिशत ब्याज की छूट.

श्रमिकों के लिए -
रेहड़ी-पटरी वाले, रिक्शा चालक, कूड़ा बीनने वाले, खेती कामगार, बीड़ी बनाने वाले जैसे असगंठित क्षेत्र से जुड़े कामगारों को 60 साल की उम्र के बाद तीन हजार रुपए प्रति महीने की पेंशन देने का प्रावधान.
यह योजना 15000 रुपये तक मासिक आय वाले असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए. इसका नाम प्रधानमंत्री श्रम-योगी मानधन वृहद पेंशन योजना रखा जाएगा.
वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत अपने अंतिम बजट, जो अंतरिम बजट है, में माध्यम वर्ग को ज्यादा महत्त्व दिया गया. इस बजट के सम्पूर्ण विश्लेषण के बाद पता चलेगा कि भारतीय अर्थव्यवस्था में यह किस तरह का असर डालेगा किन्तु इस अंतिम बजट से वेतनभोगियों को, किसानों को और श्रमिकों को खुश करने का प्रयास सरकार द्वारा किया गया है. विगत चार वर्षों से अधिक के कार्यकाल में सरकार पर आरोप लगते रहे कि वह किसानों और श्रमिकों के हितों को ध्यान में नहीं रख रही है. वेतनभोगियों, कर्मचारियों के हितों की उपेक्षा का भी आरोप उस पर जब-तब लगता रहा है. इसके साथ-साथ सरकार को चंद गिने-चुने व्यवसायियों की सरकार कहा जाने लगा था.


इस बजट से ऐसी भ्रान्ति दूर होनी चाहिए. वेतनभोगियों से इतर इस बजट में जिस तरह से किसानों और श्रमिकों के लिए योजनाओं को बनाया गया है वह सरकार की दूरदर्शी सोच को प्रकट करता है. छोटे किसानों के लिए वार्षिक सहायता भले ही देखने में छोटी लगे मगर व्यावहारिक रूप में बहुत सहायक सिद्ध होगी. आपदा के समय ब्याज में छूट को सहायता भले माना जाए किन्तु समय पर क़र्ज़ लौटाने वालों को अतिरिक्त ब्याज छूट अब किसानों को सही समय पर कर्ज जमा करने के लिए जरूर प्रोत्साहित करेगा.

इस बजट में तमाम ख़ास बातों में सबसे अधिक प्रशंसनीय श्रमिकों के लिए, असंगठित क्षेत्र के कामगारों के हितार्थ योजना बनाना रहा है. अभी तक इनके प्रति गंभीरता से विचार नहीं किया जा रहा था. अक्सर ये श्रमिक मुसीबत के समय अकेले नजर आते थे. उम्रदराज होने के बाद इनके सामने रोजी-रोटी का, अपने जीवन-निर्वहन का संकट खड़ा हो जाता था. वर्तमान बजट में प्रस्तुत पेंशन योजना निश्चित ही इन्हें लाभान्वित करेगी और भविष्य के प्रति सुरक्षा का वातावरण पैदा करेगी.

यकीनन विरोधियों की नजर में इसे चुनावी वर्ष से सम्बंधित बजट बताया जायेगा किन्तु जिस तरह से बजट में आम आदमी का, मध्यम वर्ग का ध्यान रखा गया है वह भविष्य की अर्थव्यवस्था की पूर्व-पीठिका है. यहाँ यह याद रखने की आवश्यकता है कि जिस समय सरकार ने नोटबंदी जैसा कठोर कदम उठाया था, उसके तुरंत बाद जीएसटी जैसा कदम उठाकर साबित किया था कि वह वोटबैंक के लिए नहीं वरन देश की आर्थिक स्थिति के लिए काम कर रही है, उसी दिन स्पष्ट हुआ था कि आने वाले दिनों में इस सरकार के द्वारा मध्यम वर्ग को राहत प्रदान की जाएगी. और इस बजट से ऐसा ही हुआ है. आयकर छूट के द्वारा ही लगभग 80 प्रतिशत वेतनभोगियों को लाभ मिला है. निश्चित ही यह एक दीर्घकालिक निवेश है, जो सरकार द्वारा किया गया है, बस इसे समझने की आवश्यकता है. करोड़ों लोगों के हितार्थ एक कदम से योजना बनाना निश्चित रूप में भले ही चुनावी दाँव हो मगर यह आने वाले दिनों में भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रति सकारात्मकता जगायेगा. लोगों को आर्थक सशक्तिकरण के प्रति प्रोत्साहित करेगा.

02 जनवरी 2019

समाधान के इंतजार में कृषि

राजनैतिक दल जनता की कमजोर नब्ज पकड़ कर सत्ता तो प्राप्त कर लेते हैं मगर यह समझना नहीं चाहते कि इसका समाज पर, देश पर क्या असर पड़ने वाला है. अभी हाल के संपन्न विधानसभा चुनाव में किसानों की कर्जमाफी के द्वारा सत्ता प्राप्त कर लेना एक अलग बात है किन्तु इसके द्वारा प्रदेश के खजाने पर पड़ने वाले बोझ का आकलन करना किसी ने गंवारा न समझा. इससे पहले उत्तर प्रदेश में भी सत्तासीन होते ही ऐसा कदम उठाया गया था. यदि ये राजनैतिक दल समझते हों कि इस तरह के कदमों से किसानों का अथवा प्रदेश का भला होने वाला है तो यह उनकी भूल है. यहाँ समझना होगा कि ऐसे कदम मुफ्तखोरी को बढ़ावा देते हैं जो देश के आर्थिक हित में कतई नहीं है. इससे उन किसानों में भी नकारात्मकता बढ़ती है जो नियमित रूप से पूरी ईमानदारी से अपना कर्ज अदा करते रहे हैं. राजनैतिक दलों को समझना चाहिए कि किसानों से अथवा कृषि से सम्बंधित समस्या का समाधान कर्जमाफी कतई नहीं है. असल में देश के किसी भी हिस्से के किसानों की अपनी ही अलग समस्या है, जिस पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है.


यह आज भी विचारणीय है कि वर्तमान दौर औद्योगीकरण, वैश्वीकरण का होने के बाद भी कृषि का अपना महत्त्व बना हुआ है. अनेकानेक व्यवसाय, विभिन्न तरह के कारोबार विकसित होने, उन्नत उद्योग-धंधे स्थापित होने के बाद भी कृषि के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है. कृषि का देश की राष्ट्रीय आय, रोजगार, जीवन-निर्वाह, पूँजी-निर्माण, विदेशी व्यापार, उद्योगों आदि में योगदान है. एक अनुमान के अनुसार माना जाता है कि देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है, वहीं लगभग 64 प्रतिशत श्रमिकों को कृषि क्षेत्र में रोजगार प्राप्त है. वैश्विक स्तर पर भी भारतीय कृषि की अपनी ही साख है. चाय, चावल, मूँगफली तथा तम्बाकू ऐसे कृषि उत्पाद हैं जिनके चलते वैश्विक स्तर पर भारत का पहले तीन देशों में कोई न कोई स्थान बना रहता है. ऐसी स्थिति होने के बाद भी भारतीय कृषि पिछड़ेपन की स्थिति से जूझ रही है, यहाँ का कृषक आत्महत्या जैसे कदमों को उठाने पर मजबूर है. देखा जाये तो ऐसी समस्या देश की आर्थिक, सामाजिक, प्राकृतिक स्थितियों के साथ-साथ अन्य कारणों के चलते है. जोतों का छोटा आकार होना, कृषि की मानसून पर निर्भरता, भू-स्वामित्व प्रणाली का दोषपूर्ण होना, वित्त सुविधाओं का अभाव, परम्परागत ढंग से कृषि करना, जनसंख्या का दवाब आदि ऐसी स्थितियाँ हैं जिनके कारण भारतीय कृषि पिछड़ी दशा में है. कृषि की, कृषकों की दशा सुधारने को सतत प्रयास किये जा रहे हैं मगर सटीक बिंदु पर चोट नहीं की जा रही है.

विगत कई दशकों में देश में उदारीकरण, औद्योगीकरण के बाद से उद्योगों के विकास के लिए सम्बंधित नियम-कानूनों में व्यापक संशोधन किये गए हैं किन्तु कृषि क्षेत्र में सुधार की तरफ सकारात्मक रूप से ध्यान नहीं दिया गया. कृषि क्षेत्र में अभी भी किसान अपने उत्पाद को सन 1953 में बने एपीएमसी कानून के तहत बेचने को बाध्य हैं. इसके अंतर्गत किसान अपनी फसल आढ़तियों, जो कहीं न कहीं दलाल के रूप में काम करते हैं, के सहारे बेचने को विवश होते हैं. इस कानून के द्वारा न तो नए व्यापारियों को लाइसेंस मिलता है और न ही नई मंडियों का निर्माण किया जा रहा है. इसके उलट हो ये रहा है कि जो विपणन संस्थाएं आधुनिकीकरण के लिए कार्य करने को बनाई गईं थीं वे बजाय इस क्षेत्र में काम करने के राज्य सरकारों के लिए राजस्व उगाही का माध्यम बन गईं हैं. हालाँकि वर्ष 2003 में इस कानून में संशोधन करके एक मॉडल एपीएमसी कानून बनाया गया, जिसमें निजी तथा कॉरपोरेट सेक्टर को विपणन नेटवर्क बनाने का रास्ता खोला गया. इसके बाद भी राजस्व नुकसान की आशंका के चलते और आढ़तियों की जबरदस्त लोबिंग के कारण देश के अधिसंख्यक राज्यों द्वारा इस कानून को अपनाया नहीं गया है. इस कारण किसान अभी भी अपनी फसल को सीधे उपभोक्ता को बेचने के स्थान पर इन दलालों, मध्यस्थों के हाथों की कठपुतली बने हुए हैं.

देश के लगभग हर राज्य में किसान अपनी समस्याओं से पीडि़त हैं और सरकारी तन्त्र द्वारा उनकी समस्याओं के समाधान की बात तो की जाती है किन्तु किसी प्रकार का समाधान उनके द्वारा होता दिखता नहीं है. कृषि कार्य में अनियमितता, बैंक ऋण की समस्या, बाजार से फसल का सही मूल्य न प्राप्त होना, मजदूरी आदि के अवसरों का लगातार कम होते जाने की अनेकानेक समस्याओं के साथ-साथ सरकार की ओर से किसी तरह की राहत न मिलने, कृषि हेतु पर्याप्त अनुदान न मिलने, बैंक ऋण में रियायत न होने आदि के कारण भी किसान लगातार गरीबी, बदहाली, भुखमरी की मार सह रहे हैं. इन समस्याओं के निस्तारण न होने से, कोई रास्ता न दिखाई देने से वे आत्महत्या जैसा अमानवीय एवं कठोर कदम उठा रहे हैं. इसके बाद भी न तो सरकार का ध्यान किसानों की ओर जा रहा है और न ही किसी राजनैतिक दल ने हताश-निराश किसानों की सहायता के लिए अपने कदम बढ़ाये हैं. 

विद्रूपता ये है कि सरकारें मुआवजे के नाम पर खिलवाड़ करने लगती हैं. सत्ता की खातिर कर्जमाफी जैसा लालच दिखाती हैं. इसके अलावा राज्य सरकारों का अपना-अपना रोना है और आरोपों का ठीकरा केंद्र पर फोड़ दिया जाता है. इस तरह के कदमों से किसानों का भला नहीं होने वाला है. यहाँ विचारणीय है कि यदि इन किसानों की जगह कोई औद्योगिक आपदा आ गई होती तो सरकारों ने न जाने कौन-कौन से राहतकोष खोल दिए होते. आज भले ही कृषि में उद्योगों की तरह मुनाफा नहीं है किन्तु ये बात सबको याद रखनी होगी कि कृषि देशभर को खाद्यसामग्री उपलब्ध करवाती है, उसे उद्योग अथवा मुनाफाखोरी करने का साधन माना भी नहीं जाना चाहिए. इसके बाद भी सरकार से अपेक्षा की जाती है कि वो किसानों को उद्योगपति समझते हुए, कृषि को उद्योग मानते हुए इस बारे में सजगता से काम करे. ऐसा न होने की दशा में ये किसानों के भविष्य के लिए, उनके परिवार के लिए, उनके जीवन के लिए सही नहीं होगा. वर्तमान हालातों में इन बातों पर चर्चा कर लेने से किसानों की समस्याओं का हल नहीं निकलने वाला है. सरकारों को, चाहे वो केंद्र सरकार हो अथवा राज्य सरकारें, मिलजुलकर किसानों के हितार्थ योजनों को महज बनाने की नहीं वरन उन्हें तत्काल प्रभाव से लागू करने की जरूरत है. कर्जमाफी तात्कालिक समाधान तो हो सकता है, दीर्घकालिक नहीं. ऐसे में हम सबको भी नियंत्रित, निष्पक्ष भाव से एक नागरिक समझकर ही किसानों की मदद को आगे आयें. जिस तरह का राजनैतिक परिदृश्य वर्तमान में दिख रहा है उससे नहीं लगता है कि कोई भी सरकार निष्पक्ष रूप से किसानों की सहायता के लिए मुक्त-हस्त से आगे आएगी. इन सबका असर कहीं न कहीं किसानों को  मिलने वाली मदद, मुआवजे पर ही पड़ेगा. कुछ समय राजनीति न करते हुए किसानों के हितार्थ एकजुट हो लिया जाये; सरकार को जगाने के लिए खड़ा हो लिया जाये.


(उक्त आलेख दैनिक जागरण दिनांक 02-01-2019 के राष्ट्रीय संस्करण में सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ है)

19 दिसंबर 2018

कर्जमाफी, मुफ्तखोरी विकास की राह में अवरोधक

किसानों की कर्जमाफी के नाम पर लड़ा गया चुनाव और अंततः उससे सत्ता की भी प्राप्ति हुई. इसके बाद तुरंत ही संकेत दिए गए कि लोकसभा चुनाव में भी किसान कर्जमाफी मुद्दा होगा विपक्ष का. कर्जमाफी विपक्ष का मुद्दा हो या न हो पर कांग्रेस का मुद्दा अवश्य रहेगा, ऐसा तय है. किसान कर्जमाफी या फिर किसी भी तरह की कर्जमाफी कोई समाधान नहीं है. ये योजना प्रोत्साहन या सहायता के बजाय लोगों में काहिलपन को, भ्रष्ट आचरण अपनाने को बढ़ावा देती है. इससे पहले उत्तर प्रदेश में वर्तमान भाजपा सरकार द्वारा ऐसा कदम उठाया गया था. आश्चर्य की बात है कि सभी राजनैतिक दल इसे समझ चुके हैं कि मतदाता, देश के बहुसंख्यक नागरिक मुफ्तखोरी के स्वाद से भली-भांति परिचित हैं. उन्हें किसी भी मुद्दे के बजाय मुफ्तखोरी के द्वारा आकर्षित, प्रभावित किया जा सकता है. कभी मोबाइल के नाम पर, कभी लैपटॉप के नाम पर, कभी दो रुपये किलो अनाज के नाम पर, कभी कर्जमाफी के नाम कर.


इक्कीसवीं सदी में आगे बढ़ने का, विश्वगुरु का दावा करने वाले देश में राजनैतिक दल आज भी सरकार बनाने के लिए लोभ-लालच भरे कदमों का सहारा लेते हैं. असल में किसी भी राजनैतिक दल के पास अपना कोई ऐसा मुद्दा नहीं रह गया है, जिसके द्वारा जनता को प्रभावित किया जा सके. सभी दल विकास की बातें करने, कहने से बहुत दूर निकल चुके हैं. सभी दलों में कार्यकर्ताओं के स्थान पर आयातित, धनाढ्य लोगों को महत्त्व दिया जाने लगा है. राजनैतिक दल भी समझते हैं कि जातिगत, क्षेत्रगत आधार पर वोटों को पाना बहुत ज्यादा आसान हो गया है. ऐसे में वे विकास की कागज बातें तो करते हैं मगर विकास जमीन पर न के बराबर दिख रहा है. अब जबकि कर्जमाफी का रास्ता सफलता की तरफ ले जा रहा है तो संभव है आगामी चुनाव इसी मुद्दे पर लड़े जाएँ. इस तरह की योजना कहीं न कहीं सरकारी खजाने पर बोझ हैं और उन नागरिकों पर भी बोझ हैं जो नियमित रूप से अपना टैक्स जमा कर रहे हैं. दल कोई भी सभी को मुफ्तखोरी, कर्जमाफी जैसे कदमों से बचना चाहिए.

16 अप्रैल 2018

विपणन व्यवस्था सुधारे बिना कृषि विकास संभव नहीं


किसी भी सरकार द्वारा अब कृषि के बजाय औद्योगीकरण की तरफ ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा है. कारोबारियों को तमाम तरह के लाभ देने के साथ-साथ व्यवसाय से सम्बंधित अनेक कार्यक्रम भी समय-समय पर सरकारी स्तर पर किये जाते हैं. इसके बाद भी अनेक तरह के व्यवसाय के बीच, विभिन्न तरह के कारोबार विकसित होने के बाद भी, उन्नत उद्योग-धंधे स्थापित होने के बाद भी कृषि को नकारा नहीं जा सकता है. आज मानसून की अनियमितता के चलते अथवा मौसम के लगातार बनते-बिगड़ते स्वभाव के बाद भी भले ही कृषि का चक्र अनियमित दिखता हो किन्तु इसके बाद भी देश की राष्ट्रीय आय, रोजगार, जीवन-निर्वाह, पूँजी-निर्माण, विदेशी व्यापार, उद्योगों आदि में इसकी सशक्त भूमिका है. देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है, वहीं लगभग 64 प्रतिशत श्रमिकों को कृषि क्षेत्र में रोजगार प्राप्त है. कृषि का सराहनीय योगदान न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था में बना हुआ है वरन सम्पूर्ण विश्व में भी भारतीय कृषि की अपनी ही साख बनी हुई है. चाय, चावल, मूँगफली तथा तम्बाकू ऐसे कृषि उत्पाद हैं जिनके उत्पादन के चलते वैश्विक स्तर पर भारत का पहले तीन देशों में कोई न कोई स्थान बना रहता है. इसके बाद भी भारतीय कृषि पिछड़ेपन की स्थिति से जूझ रही है, यहाँ का कृषक आत्महत्या जैसे कदमों को उठाने पर मजबूर है. देखा जाये तो ऐसी समस्या देश की आर्थिक, सामाजिक, प्राकृतिक स्थितियों के साथ-साथ अन्य कारणों के चलते है. जोतों का छोटा आकार होना, कृषि की मानसून पर निर्भरता, भू-स्वामित्व प्रणाली का दोषपूर्ण होना, वित्त सुविधाओं का अभाव, परम्परागत ढंग से कृषि करना, जनसंख्या का दवाब आदि ऐसी स्थितियाँ हैं जिनके कारण भारतीय कृषि पिछड़ी दशा में है. इन समस्याओं के अतिरिक्त कृषि पदार्थों के विपणन की व्यवस्था मुख्य रूप से कृषि को पिछड़ा बना रही है. देश का बहुसंख्यक किसान कृषि फसल के उचित विपणन न होने के कारण कृषि कार्य में उन्मुक्त रूप से संलिप्त नहीं हो पाता है. 


हमारे देश में कृषि विपणन व्यवस्था में वर्तमान में कई प्रकार के दोष देखने को मिलते हैं. इन दोषों के कारण किसानों को उनकी फसल का सही मूल्य प्राप्त नहीं हो पाता है, इससे वे उत्पादन की दिशा में भी हतोत्साहित होते हैं. विपणन व्यवस्था में ऐसे दोष के रूप में संग्रहण को देखा जा सकता है. ग्रामीण क्षेत्रों में आज उन्नत तकनीक के बाद भी फसल-संग्रहण के लिए मिट्टी के बर्तन, कच्चे कोठों का इस्तेमाल किया जाता है. ऐसे संग्रहण से उपज के सड़ने-गलने, कीटनाशको चूहों आदि से नष्ट होने का खतरा अधिक रहता है. नष्ट हो जाती फसल, जानवरों द्वारा ख़राब कर दी गई फसल के कारण किसान फसलों के संग्रहण को लेकर सदैव चिंतित रहता है और इसी से बचने के लिए वह काफी कम दामों में अपनी फसल का विक्रय कर देता है. संग्रहण के साथ-साथ परिवहन साधनों की अनुपलब्धता अथवा उनका संपन्न न होना भी विपणन व्यवस्था की एक कमी कही जा सकती है. ग्रामीण क्षेत्र में परिवहन व्यवस्था सुलभ न होने के कारण किसान बड़ी मंड़ियों, सहकारी मंडियों तक नहीं पहुँच पाते हैं. फसल के आवागमन सम्बन्धी कठिनाई को देखते हुए वे अपनी फसल को गाँव में ही बेचने को विवश हो जाते हैं. ऐसी कमियों के चलते ग्रामीण इलाकों में मध्यस्थों की, दलालों की संख्या में वृद्धि होने लगती है. मध्यस्थों की बहुत बड़ी संख्या भी विपणन प्रणाली का एक दोष है. किसानों के मंडी में पहुँचने के पूर्व ही तमाम दलाल सक्रिय हो जाते हैं. इससे किसान को कभी-कभी अपनी उपज का लगभग 50 प्रतिशत तक ही दाम मिल पाता है. दलालों की सक्रियता के अतिरिक्त अनियंत्रित मंडियों का संचालन भी विपणन व्यवस्था को प्रभावित करता है. इस प्रकार की मंडियों में कपटपूर्ण नीतियों के चलते किसान लगातार शिकार होते रहते हैं.

दरअसल हमारे देश में उदारीकरण, औद्योगीकरण के बाद से उद्योगों में तो कई तरह से परिवर्तन किये गए, उद्योगों के विकास के लिए सम्बंधित नियम-कानूनों में व्यापक संशोधन किये गए किन्तु कृषि क्षेत्र में सुधार की तरफ सकारात्मक रूप से ध्यान नहीं दिया गया. कृषि क्षेत्र में अभी भी किसान अपने उत्पाद को सन 1953 में बने एपीएमसी कानून के तहत बेचने को बाध्य हैं. इसके अंतर्गत किसान अपनी फसल आढ़तियों, जो कहीं न कहीं दलाल के रूप में काम करते हैं, के सहारे बेचने को विवश होते हैं. इस कानून के द्वारा न तो नए व्यापारियों को लाइसेंस मिलता है और न ही नई मंडियों का निर्माण किया जा रहा है. इसके उलट हो ये रहा है कि जो विपणन संस्थाएं आधुनिकीकरण के लिए कार्य करने को बनाई गईं थीं वे बजाय इस क्षेत्र में काम करने के राज्य सरकारों के लिए राजस्व उगाही का माध्यम बन गईं हैं. हालाँकि वर्ष 2003 में इस कानून में संशोधन करके एक मॉडल एपीएमसी कानून बनाया गया, जिसमें निजी तथा कॉरपोरेट सेक्टर को विपणन नेटवर्क बनाने का रास्ता खोला गया. इसके बाद भी राजस्व नुकसान की आशंका के चलते और आढ़तियों की जबरदस्त लोबिंग के कारण देश के अधिसंख्यक राज्यों द्वारा इस कानून को अपनाया नहीं गया है. इस कारण किसान अभी भी अपनी फसल को सीधे उपभोक्ता को बेचने के स्थान पर इन दलालों, मध्यस्थों के हाथों की कठपुतली बने हुए हैं.


इस तरह की विषम परिस्थितयों के बीच किसानों को मल्टीब्रांड रिटेल के सब्जबाग दिखाये जा रहे हैं, जबकि आवश्यकता इस बात की है कि किसान को उसकी फसल का उचितमूल्य प्राप्त हो. सभी किसान उत्साहजनक रूप से देश के कृषि विकास में सहायक सिद्ध हों तो आवश्यक है कि उनकी फसल के लिए उचित विपणन व्यवस्था का निर्माण किया जाये. इसके लिए सरकार को चाहिए कि वह श्रेणी विभाजन और मानकीकरण के अनुसार फसल के उत्पादन पर जोर दे. मंडियों में पक्के माल-गोदामों का निर्माण करे. आकाशवाणी के द्वारा, दूरदर्शन के द्वारा तथा सरकार अपनी मशीनरी के द्वारा समय-समय पर किसानों को उपज मूल्य की सही-सही जानकारी उपलब्ध करवाने की व्यवस्था करे. इसके साथ-साथ सरकार को चाहिए कि नियंत्रित मंडियों के स्वरूप के साथ-साथ ग्रामीण स्तर पर छोटी-छोटी नियंत्रित मंडियाँ हों जिससे छोटे किसान भी अपनी फसल को सही दाम पर बेच कर उसका उचित मूल्य प्राप्त कर सकें. इस तरह के कुछ उपायों को सकारात्मक रूप से लागू करके सरकारों द्वारा कृषि फसल को बचाया जा सकता है, कृषि उत्पाद का उचित मूल्य कृषकों को प्रदान करवाया जा सकता है, कृषकों को आत्महत्या करने से रोका जा सकता है.



15 जून 2016

विपणन व्यवस्था सुधारे बिना कृषि-विकास नहीं

मानसून के रुष्ट रहने के बाद मौसम विभाग आशा बंधा रहा है कि अबकी बारिश बहुत अच्छी होगी. किसानों को इस बार मानसून से किसी तरह की शिकायत नहीं होगी. हाल-फ़िलहाल विगत दो-चार दिनों से बादलों के रंग-ढंग देखते हुए ऐसी अपेक्षा की जा सकती है. इस अपेक्षा के साथ ही एक तरह का भय भी बना रहता है कि कहीं आशा से अधिक बारिश हो जाये और सूखे की स्थिति के ठीक उलट बाढ़ की, अतिवृष्टि की स्थिति न पैदा हो जाये. बहरहाल, ये स्थितियां मानसून पर निर्भर करती हैं. सूखे की, बाढ़ की, अतिवृष्टि की स्थिति को पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर माना जाता है. इनके अनियमित होने का सीधा असर किसान पर पड़ता है, कृषि पर पड़ता है. ऐसा नहीं है कि बाकी किसी अन्य रोजगार या फिर किसी अन्य व्यवस्था पर सूखे का या बाढ़ का प्रभाव नहीं पड़ता मगर जिस तरह से कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था से सीधे-सीधे सम्बद्ध है, उससे सीधा और स्पष्ट प्रभाव इसी क्षेत्र पर पड़ता है.

वर्तमान में औद्योगीकरण, वैश्वीकरण के दौर में भी भारतीय कृषि का अपना महत्त्व बना हुआ है. अनेक तरह के व्यवसाय होने के बाद भी, उन्नत उद्योग-धंधे स्थापित होने के बाद भी कृषि के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है. देश की राष्ट्रीय आय, रोजगार, जीवन-निर्वाह, पूँजी-निर्माण, विदेशी व्यापार, उद्योगों आदि में इसकी सशक्त भूमिका है. देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है, वहीं लगभग 64 प्रतिशत श्रमिकों को कृषि क्षेत्र में रोजगार प्राप्त है. इसके बाद भी भारतीय कृषि पिछड़ेपन की स्थिति से जूझ रही है, यहाँ का कृषक आत्महत्या जैसे कदमों को उठाने पर मजबूर है. कृषि कार्य के अनेक कारकों के अलावा मूल रूप से कृषि विपणन व्यवस्था का सही न होना भी किसानों की स्थिति को कमजोर बनाता है. सरकारी स्तर पर भी इस तरफ ध्यान नहीं दिया जा रहा है. हाल ही में बुन्देलखण्ड क्षेत्र में बुन्देलखण्ड पैकेज के करोड़ों रुपयों को मंडी स्थल बनाने में फिजूलखर्च कर दिया गया. ग्रामीण अंचलों से दूर बनाई गई नवीन मंडी स्थल तक पहुँचने के साधनों को विकसित नहीं किया गया. गाँव के साहूकार, महाजन, बड़े किसानों के चंगुल को कमजोर नहीं किया गया, ऐसे में छोटे और मंझोले किसान इन्हीं के चंगुल में फँसकर अपनी फसल को कम कीमत में बेचने को मजबूर होते हैं.

विपणन व्यवस्था में कई प्रकार के दोष होने के कारण किसानों को उनकी फसल का सही मूल्य प्राप्त नहीं हो पाता है, इससे वे उत्पादन की दिशा में भी हतोत्साहित होते हैं. विपणन व्यवस्था में ऐसे दोष के रूप में संग्रहण को देखा जा सकता है. ग्रामीण क्षेत्रों में आज उन्नत तकनीक के बाद भी फसल-संग्रहण के लिए मिट्टी के बर्तन, कच्चे कोठों का इस्तेमाल किया जाता है. ऐसे संग्रहण से उपज के सड़ने-गलने, कीटनाशको चूहों आदि से नष्ट होने का खतरा अधिक रहता है. नष्ट हो जाती फसल, जानवरों द्वारा ख़राब कर दी गई फसल के कारण किसान फसलों के संग्रहण को लेकर सदैव चिंतित रहता है और इसी से बचने के लिए वह काफी कम दामों में अपनी फसल का विक्रय कर देता है.

संग्रहण के साथ-साथ परिवहन साधनों की अनुपलब्धता अथवा उनका संपन्न न होना भी विपणन व्यवस्था की एक कमी कही जा सकती है. ग्रामीण क्षेत्र में परिवहन व्यवस्था सुलभ न होने के कारण किसान बड़ी मंड़ियों, सहकारी मंडियों तक नहीं पहुँच पाते हैं. फसल के आवागमन सम्बन्धी कठिनाई को देखते हुए वे अपनी फसल को गाँव में ही बेचने को विवश हो जाते हैं. ऐसी कमियों के चलते ग्रामीण इलाकों में मध्यस्थों की, दलालों की संख्या में वृद्धि होने लगती है. मध्यस्थों की बहुत बड़ी संख्या भी विपणन प्रणाली का एक दोष है. किसानों के मंडी में पहुँचने के पूर्व ही तमाम दलाल सक्रिय हो जाते हैं. दलालों की सक्रियता के अतिरिक्त अनियंत्रित मंडियों का संचालन भी विपणन व्यवस्था को प्रभावित करता है. इस प्रकार की मंडियों में कपटपूर्ण नीतियों के चलते किसान लगातार शिकार होते रहते हैं.

दरअसल हमारे देश में उदारीकरण, औद्योगीकरण के बाद से उद्योगों में तो कई तरह से परिवर्तन किये गए किन्तु कृषि क्षेत्र में सुधार की तरफ सकारात्मक रूप से ध्यान नहीं दिया गया. कृषि क्षेत्र में अभी भी किसान अपने उत्पाद को सन 1953 में बने एपीएमसी कानून के तहत बेचने को बाध्य हैं. इस कानून के द्वारा न तो नए व्यापारियों को लाइसेंस मिलता है और न ही नई मंडियों का निर्माण किया जा रहा है. इसके उलट हो ये रहा है कि जो विपणन संस्थाएं आधुनिकीकरण के लिए कार्य करने को बनाई गईं थीं वे बजाय इस क्षेत्र में काम करने के राज्य सरकारों के लिए राजस्व उगाही का माध्यम बन गईं हैं. हालाँकि वर्ष 2003 में इस कानून में संशोधन करके एक मॉडल एपीएमसी कानून बनाया गया, जिसमें निजी तथा कॉरपोरेट सेक्टर को विपणन नेटवर्क बनाने का रास्ता खोला गया. इसके बाद भी राजस्व नुकसान की आशंका के चलते और आढ़तियों की जबरदस्त लोबिंग के कारण देश के अधिसंख्यक राज्यों द्वारा इस कानून को अपनाया नहीं गया है. इस कारण किसान अभी भी अपनी फसल को सीधे उपभोक्ता को बेचने के स्थान पर इन दलालों, मध्यस्थों के हाथों की कठपुतली बने हुए हैं.


आवश्यकता इस बात की है कि किसान को उसकी फसल का उचितमूल्य प्राप्त हो. सभी किसान उत्साहजनक रूप से देश के कृषि विकास में सहायक सिद्ध हों तो आवश्यक है कि उनकी फसल के लिए उचित विपणन व्यवस्था का निर्माण किया जाये. इसके लिए सरकार को चाहिए कि वह श्रेणी विभाजन और मानकीकरण के अनुसार फसल के उत्पादन पर जोर दे. मंडियों में पक्के माल-गोदामों का निर्माण करे. आकाशवाणी के द्वारा, दूरदर्शन के द्वारा तथा सरकार अपनी मशीनरी के द्वारा समय-समय पर किसानों को उपज मूल्य की सही-सही जानकारी उपलब्ध करवाने की व्यवस्था करे. इसके साथ-साथ सरकार को चाहिए कि नियंत्रित मंडियों के स्वरूप के साथ-साथ ग्रामीण स्तर पर छोटी-छोटी नियंत्रित मंडियाँ हों जिससे छोटे किसान भी अपनी फसल को सही दाम पर बेच कर उसका उचित मूल्य प्राप्त कर सकें. इस तरह के कुछ उपायों को सकारात्मक रूप से लागू करके सरकारों द्वारा कृषि फसल को बचाया जा सकता है, कृषि उत्पाद का उचित मूल्य कृषकों को प्रदान करवाया जा सकता है, कृषकों को आत्महत्या करने से रोका जा सकता है.

29 फ़रवरी 2016

किसानों को बचाने को भी उपाय किये जाएँ

औद्योगीकरण, वैश्वीकरण के दौर में भी भारतीय कृषि का अपना महत्त्व बना हुआ है. अनेक तरह के व्यवसाय होने के बाद भी, विभिन्न तरह के कारोबार विकसित होने के बाद भी, उन्नत उद्योग-धंधे स्थापित होने के बाद भी कृषि के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है. आज मानसून की अनियमितता के चलते अथवा मौसम के लगातार बनते-बिगड़ते स्वभाव के बाद भी भले ही कृषि का चक्र अनियमित दिखता हो किन्तु इसके बाद भी देश की राष्ट्रीय आय, रोजगार, जीवन-निर्वाह, पूँजी-निर्माण, विदेशी व्यापार, उद्योगों आदि में इसकी सशक्त भूमिका है. देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है, वहीं लगभग 64 प्रतिशत श्रमिकों को कृषि क्षेत्र में रोजगार प्राप्त है. कृषि का सराहनीय योगदान न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था में बना हुआ है वरन सम्पूर्ण विश्व में भी भारतीय कृषि की अपनी ही साख बनी हुई है. चाय, चावल, मूँगफली तथा तम्बाकू ऐसे कृषि उत्पाद हैं जिनके उत्पादन के चलते वैश्विक स्तर पर भारत का पहले तीन देशों में कोई न कोई स्थान बना रहता है. इसके बाद भी भारतीय कृषि पिछड़ेपन की स्थिति से जूझ रही है, यहाँ का कृषक आत्महत्या जैसे कदमों को उठाने पर मजबूर है. देखा जाये तो ऐसी समस्या देश की आर्थिक, सामाजिक, प्राकृतिक स्थितियों के साथ-साथ अन्य कारणों के चलते है. जोतों का छोटा आकार होना, कृषि की मानसून पर निर्भरता, भू-स्वामित्व प्रणाली का दोषपूर्ण होना, वित्त सुविधाओं का अभाव, परम्परागत ढंग से कृषि करना, जनसंख्या का दवाब आदि ऐसी स्थितियाँ हैं जिनके कारण भारतीय कृषि पिछड़ी दशा में है. इन समस्याओं के अतिरिक्त कृषि पदार्थों के विपणन की व्यवस्था मुख्य रूप से कृषि को पिछड़ा बना रही है. देश का बहुसंख्यक किसान कृषि फसल के उचित विपणन न होने के कारण कृषि कार्य में उन्मुक्त रूप से संलिप्त नहीं हो पाता है.  

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हमारे देश में कृषि विपणन व्यवस्था में वर्तमान में कई प्रकार के दोष देखने को मिलते हैं. इन दोषों के कारण किसानों को उनकी फसल का सही मूल्य प्राप्त नहीं हो पाता है, इससे वे उत्पादन की दिशा में भी हतोत्साहित होते हैं. विपणन व्यवस्था में ऐसे दोष के रूप में संग्रहण को देखा जा सकता है. ग्रामीण क्षेत्रों में आज उन्नत तकनीक के बाद भी फसल-संग्रहण के लिए मिट्टी के बर्तन, कच्चे कोठों का इस्तेमाल किया जाता है. ऐसे संग्रहण से उपज के सड़ने-गलने, कीटनाशको चूहों आदि से नष्ट होने का खतरा अधिक रहता है. नष्ट हो जाती फसल, जानवरों द्वारा ख़राब कर दी गई फसल के कारण किसान फसलों के संग्रहण को लेकर सदैव चिंतित रहता है और इसी से बचने के लिए वह काफी कम दामों में अपनी फसल का विक्रय कर देता है. संग्रहण के साथ-साथ परिवहन साधनों की अनुपलब्धता अथवा उनका संपन्न न होना भी विपणन व्यवस्था की एक कमी कही जा सकती है. ग्रामीण क्षेत्र में परिवहन व्यवस्था सुलभ न होने के कारण किसान बड़ी मंड़ियों, सहकारी मंडियों तक नहीं पहुँच पाते हैं. फसल के आवागमन सम्बन्धी कठिनाई को देखते हुए वे अपनी फसल को गाँव में ही बेचने को विवश हो जाते हैं. ऐसी कमियों के चलते ग्रामीण इलाकों में मध्यस्थों की, दलालों की संख्या में वृद्धि होने लगती है. मध्यस्थों की बहुत बड़ी संख्या भी विपणन प्रणाली का एक दोष है. किसानों के मंडी में पहुँचने के पूर्व ही तमाम दलाल सक्रिय हो जाते हैं. इससे किसान को कभी-कभी अपनी उपज का लगभग 50 प्रतिशत तक ही दाम मिल पाता है. दलालों की सक्रियता के अतिरिक्त अनियंत्रित मंडियों का संचालन भी विपणन व्यवस्था को प्रभावित करता है. इस प्रकार की मंडियों में कपटपूर्ण नीतियों के चलते किसान लगातार शिकार होते रहते हैं.
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दरअसल हमारे देश में उदारीकरण, औद्योगीकरण के बाद से उद्योगों में तो कई तरह से परिवर्तन किये गए, उद्योगों के विकास के लिए सम्बंधित नियम-कानूनों में व्यापक संशोधन किये गए किन्तु कृषि क्षेत्र में सुधार की तरफ सकारात्मक रूप से ध्यान नहीं दिया गया. कृषि क्षेत्र में अभी भी किसान अपने उत्पाद को सन 1953 में बने एपीएमसी कानून के तहत बेचने को बाध्य हैं. इसके अंतर्गत किसान अपनी फसल आढ़तियों, जो कहीं न कहीं दलाल के रूप में काम करते हैं, के सहारे बेचने को विवश होते हैं. इस कानून के द्वारा न तो नए व्यापारियों को लाइसेंस मिलता है और न ही नई मंडियों का निर्माण किया जा रहा है. इसके उलट हो ये रहा है कि जो विपणन संस्थाएं आधुनिकीकरण के लिए कार्य करने को बनाई गईं थीं वे बजाय इस क्षेत्र में काम करने के राज्य सरकारों के लिए राजस्व उगाही का माध्यम बन गईं हैं. हालाँकि वर्ष 2003 में इस कानून में संशोधन करके एक मॉडल एपीएमसी कानून बनाया गया, जिसमें निजी तथा कॉरपोरेट सेक्टर को विपणन नेटवर्क बनाने का रास्ता खोला गया. इसके बाद भी राजस्व नुकसान की आशंका के चलते और आढ़तियों की जबरदस्त लोबिंग के कारण देश के अधिसंख्यक राज्यों द्वारा इस कानून को अपनाया नहीं गया है. इस कारण किसान अभी भी अपनी फसल को सीधे उपभोक्ता को बेचने के स्थान पर इन दलालों, मध्यस्थों के हाथों की कठपुतली बने हुए हैं.
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इस तरह की विषम परिस्थितयों के बीच किसानों को मल्टीब्रांड रिटेल के सब्जबाग दिखाये जा रहे हैं, जबकि आवश्यकता इस बात की है कि किसान को उसकी फसल का उचितमूल्य प्राप्त हो. सभी किसान उत्साहजनक रूप से देश के कृषि विकास में सहायक सिद्ध हों तो आवश्यक है कि उनकी फसल के लिए उचित विपणन व्यवस्था का निर्माण किया जाये. इसके लिए सरकार को चाहिए कि वह श्रेणी विभाजन और मानकीकरण के अनुसार फसल के उत्पादन पर जोर दे. मंडियों में पक्के माल-गोदामों का निर्माण करे. आकाशवाणी के द्वारा, दूरदर्शन के द्वारा तथा सरकार अपनी मशीनरी के द्वारा समय-समय पर किसानों को उपज मूल्य की सही-सही जानकारी उपलब्ध करवाने की व्यवस्था करे. इसके साथ-साथ सरकार को चाहिए कि नियंत्रित मंडियों के स्वरूप के साथ-साथ ग्रामीण स्तर पर छोटी-छोटी नियंत्रित मंडियाँ हों जिससे छोटे किसान भी अपनी फसल को सही दाम पर बेच कर उसका उचित मूल्य प्राप्त कर सकें. इस तरह के कुछ उपायों को सकारात्मक रूप से लागू करके सरकारों द्वारा कृषि फसल को बचाया जा सकता है, कृषि उत्पाद का उचित मूल्य कृषकों को प्रदान करवाया जा सकता है, कृषकों को आत्महत्या करने से रोका जा सकता है.