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07 जुलाई 2026

मन में घुसती अश्लीलता

जिस तरह से अश्लीलता, सेक्स, नंगपन, कामुकता आदि को ग्लोरिफाई करके मोबाइल के माध्यम से रील्स बनाकर, लाइव शो के रूप में, गीत-संगीत-कार्यक्रम के द्वारा लोगों के दिमाग में घुसाया जा रहा है, उस पर रोक लगाने की आवश्यकता है. चौबीस घंटे नग्न/अर्धनग्न देह, यौन-सम्बन्धों में लिपटे दृश्य, अश्लीलता में रचे संवाद, कामुकता में रचे हाव-भाव के निर्बाध प्रदर्शन, प्रसारण के दुष्परिणाम की को अभी हम लोग गम्भीरता से समझ नहीं रहे हैं. फुटकर-फुटकर में सामने आती कुछ घटनाओं पर रोना रो लेते हैं, कुछ विरोध प्रदर्शन कर लेते हैं, कुछ अपराधियों की ठुकाई कर लेते हैं और अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं.

 

समाज में फैलता जा रहा लिजलिजापन धीरे-धीरे हमारे परिवारों में, हमारे दिल-दिमाग में भी फैलता जा रहा है. किसी बेटी, महिला के साथ होने वाली किसी अमानुषिक घटना पर अपना रोष प्रकट कर लेते हैं, कुछ कठोर विचाराभिव्यक्ति कर लेते हैं और फिर वापस उसी लिजलिजेपन में लोट लगाने लगते हैं. लगभग मुफ्त के भाव से मिलते इंटरनेट से मुफ्त में मिलती कामुकता, नग्न देह, सेक्स को रोके जाने के लिए हम सबको जागना होगा. यदि आज ऐसा करने को न उठे तो कल को दरिंदगी वाली घटना का शिकार.......?????????

 

समझे??

 


26 सितंबर 2025

उम्र का चक्कर ही समाप्त कर दो


 

अरे साहब, जब स्थिति नियंत्रण से बाहर होती समझ आये तो उसे पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए.... ठीक वैसे ही जैसे खिलाड़ी मैदान में गिरने के बाद खुद को एकदम फ्री छोड़ देता है....

कानूनी आयु घटाने का सोचने से बेहतर है कि ये उम्र का चक्कर ही समाप्त कर दो... न उम्र, न सोचा-विचारी, बस सम्बन्ध ही सम्बन्ध....

++

दैनिक जागरण, कानपुर

25.09.2025


08 जुलाई 2025

इसे दोस्ती नहीं कहते यारो!

फ्रेंड्स विद बेनिफिट्स, इस आधुनिक शब्दावली से आप परिचित हैं? संभवतः नहीं ही होंगे किन्तु युवा वर्ग इससे अवश्य ही परिचित होगा. दरअसल विगत वर्षों में समाज ने जिस तेजी से विकास किया है, नवीनतम तकनीकी को अपनाया है उसी तेजी से उसने आधुनिक जीवनशैली को अपनाया है, उनके परिदृश्य में अपना विकास किया है. इस विकास को अपनाने में सर्वाधिक सक्रियता युवाओं ने, विशेष रूप से विषमलिंगी युवा जोड़ों ने दिखाई है. जिसके चलते समाज की प्रचलित, बंधी-बंधाई सी परिभाषाओं, शब्दावलियों से अलग इस तरह की नवीन अवधारणाओं जन्म होता रहता है. इस तरह की नवीन जीवनशैली ने, नवीन रिश्तों ने तमाम सारे सामाजिक, पारिवारिक बंधनों को, मान्यताओं को नकारते हुए अपनी ही मान्यताएँ, अपने ही जीवन-मूल्य स्थापित किये हैं.

 

इन नवीन परिभाषाओं, मान्यताओं ने न केवल ज़िन्दगी जीने का अंदाज़ बदला है बल्कि रिश्तों का, संबंधों का स्वरूप भी परिवर्तित किया है. इस तरह की मान्यताओं को संस्कृति, सभ्यता, जीवन-मूल्य आदि के सापेक्ष देखने के स्थान पर तात्कालिक आवश्यकता, क्षणिक सामाजिक अवधारणा के रूप में देखा जाना चाहिए. फ्रेंड्स विद बेनिफिट्स में दोस्ती का सन्दर्भ दो विषमलिंगियों के आपस में मिलने से है. यह एक ऐसा रिश्ता है जिसमें दो विषमलिंगी बिना किसी प्रतिबद्धता के, शारीरिक रूप से अंतरंग होते हैं. यहाँ आपसी सम्बन्ध का नाम दोस्ती होता है मगर यह दोस्ती उस रूप में नहीं होती जो प्रतिबद्धता की बात करे. एक-दूसरे के प्रति समर्पण, विश्वास का भाव रखे. इस हाथ दे, उस हाथ ले वाली बात यहाँ लागू होती है और यहीं से आरम्भ होती है बेनिफिट्स वाली अवधारणा. यहाँ रिश्तों की बुनियाद आपसी शर्तों के आधार पर काम करती है जहाँ भावनाओं का कोई मोल नहीं. वर्तमान आर्थिक, भोगवादी मानसिकता में जहाँ अकेलापन हैकाम का असीमित बोझ हैकार्य-स्वरूप में अनियमितता है वहाँ इस तरह के सम्बन्ध बड़ी ही आसानी से बनते देखे जाते हैं. सहजता से कुछ भी कहीं भी मिल जाने की स्थिति ने इस प्रकार के रिश्तों को और भी तवज्जो दी है. किसी के सामने कोई जिम्मेदारी वाला भाव नहीं. माँग और आपूर्ति का सिद्धान्त यहाँ पूरी तरह से लागू होता है.

 



ऐसे रिश्तों की गहराई में जाकर देखना होगा कि हम जिस समाज की कल्पना कर रहे हैं वह किस प्रकार के रिश्तों से बनता हैयह सार्वभौम सत्य है कि आज के युग में परिवारों के टूटने का चलन तेजी से बढ़ा है. लड़के और लड़कियों में कार्य करने कीघर से बाहर रह कर कैरियर बनाने की मानसिकता में अन्य जरूरतों के साथ-साथ शरीर ने भी अपनी जरूरत के अनुसार रिश्तों को स्वीकारना सीखा है. फ्रेंड्स विद बेनिफिट्स को वह युवा वर्ग, जिसकी ये जरूरत है स्वीकार चुका है क्योंकि समाज का यह वर्ग आज प्रत्येक कार्य के ऊपर सेक्स को महत्व दे रहा है. इनकी स्वच्छंद सोच पर उनके अभिभावकों का नियंत्रणसमाज का नियंत्रण दकियानूसी समझा जाने लगा है. जल्द से जल्द अपने आपको सफलता के मुकाम पर ले जानेआधुनिकता के नाम पर कुछ भी करने को स्वतंत्रता मान लेने की मानसिकता ने युवाओं को एक प्रकार की अंधी दौड़ में शामिल करवा दिया है. इस दौड़ में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पैकेजवैश्वीकरण की रंगीन मानसिकताबाँहों में विपरीतलिंगी साथी, सड़क पर बेतहाशा दौड़ते वाहनधन का अंधाधुंध दुरुपयोग आदि उत्प्रेरक की भूमिका निभा रहे हैं.

 

युवा वर्ग जिसे समूचा विश्व मुट्ठी में बंद दिखता हैएक क्लिक पर समूची दुनिया उन्हें अपने सामने खड़ी दिखाई पड़ती हैऐसे में वह अपने को किसी से भी कमतर नहीं समझता है. इसमें युवा कहाँ जाकर स्वयं को नियंत्रित करेगा; आर्थिक प्राथमिकता के दौर में नैतिक पतन को कौन सँभालेगा, कहा नहीं जा सकता. आज का युवा पूरी तरह से स्वतंत्रता पाने को लालायित है. अपनी स्वतंत्र अभिव्यक्ति, भले ही किसी भी तरह से हो, करने के लिए उत्साहित है. स्वतंत्रता के नाम पर, अभिव्यक्ति के नाम पर उच्छृंखलता, उन्मुक्तता को ज़िन्दगी का मूल समझ कर युवा कभी वन नाईट स्टैंड की, कभी लिव-इन रिलेशन की, कभी लिविंग टुगेदर की, कभी फ्रेंड्स विद बेनिफिट्स की मरीचिका में भटकता रहता है. यहाँ इस तरह के संबंधों को, ऐसी दोस्ती को महत्त्व देने वाले युवा जोड़ों को संबंधों की, रिश्तों की भावना को समझना होगा. ऐसे सम्बन्ध क्षणिक संतुष्टि देते भले प्रतीत हों मगर अपनत्व के अभाव में इनके पार्श्व में संतुष्टि नहीं होती है, गम्भीरता नहीं होती है.

 

ऐसे रिश्ते को प्राथमिकता देने वाले युवा जोड़ों को दोस्ती का, दोस्त का, शारीरिक सम्बन्धों का अर्थ और सन्दर्भ समझना होगा. यदि दो विषमलिंगी दोस्ती करना चाहते हैं तो उसके लिए आवश्यक है कि वे इस तरह के रिश्ते को पूरी गरिमा के साथ समझें. दोस्ती का तात्पर्य उन दोनों लोगों के लिए क्या है, इस समझ और स्वीकृति के साथ रिश्ते को आगे बढ़ाना चाहिए. दो विषमलिंगी मित्रों को यह समझना होगा दोस्तों के बीच अंतरंगता का अर्थ सिर्फ शारीरिक संबंध ही नहीं हैं. मित्र की इच्छाओं, उसकी आवश्यकताओं को जानना-पहचानना भी महत्वपूर्ण है और इसके लिए खुला संवाद, भावनात्मक समर्थन, निस्वार्थ सहयोग प्रदान करना भी एक तरह की अंतरंगता है. दोस्ती, प्यार, शारीरिक सम्बन्ध आदि के मायने समझते हुए दोस्ती को, दोस्त को फ़िल्मी फूहड़पन से बचाए जाने की आवश्यकता है. दोस्ती को लाभ के लिए न करें, दोस्त लाभ के लिए न बनाएँ अर्थात दोस्ती में स्वार्थ या व्यक्तिगत लाभ के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए. यह एक अनमोल रिश्ता है जो बिना किसी शर्त के विश्वास, प्यार और सहयोग पर आधारित होना चाहिए. ध्यान रखें, दोस्त मुश्किल समय में साथ देने वाले होते हैं. प्रोत्साहित करने वाले, बेहतर इंसान बनाने वाले होते हैं. फ्रेंड्स विद बेनिफिट्स कुछ भी हो सकते हों मगर फ्रेंड नहीं हो सकते.


09 जून 2025

मानसिकता के संक्रमणकाल में समाज

हत्या तो हत्या है और जिसने भी की है उसे सजा मिलनी ही चाहिए. यह केवल किसी क्रिया की प्रतिक्रिया देना मात्र नहीं होता बल्कि एक हँसते-खेलते इन्सान को हमेशा के लिए शांत कर देना होता है. एक परिवार को ज़िन्दगी भर के लिए न भरने वाला घाव देना होता है. समाज के बीच खुद हत्यारे के परिवार को भी शर्मिंदगी से जीवन गुजारने की सजा देना होता है. अभी हाल के चर्चित राजा-सोनम रघुवंशी मामले में इंदौर के इस नवदम्पत्ति जोड़े के अचानक से गायब हो जाने की खबर के बाद पति राजा का शव मिलना और पत्नी सोनम का गायब होना शासन-प्रशासन पर, मेघालय के पर्यटन पर, पर्यटकों की सुरक्षा पर सवालिया निशान लगा रहा था. राजा की लाश मिलने के सत्रह दिन बाद अचानक से सोनम पुलिस को मिली. उसकी गिरफ्तारी हुई अथवा उसने आत्मसमर्पण किया, ये बाद की बात है. उसी के ऊपर अपने पति की हत्या करवाने का शक जताया जा रहा है,  हत्या उसी ने की या करवाई इस बारे में अंतिम सत्य तो बाद में पता चलेगा मगर जिस तरह से लोगों की प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं, उससे ऐसा लग रहा है जैसे समाज, परिवार, विवाह संस्था रसातल में पहुँचने ही वाले हैं. मीडिया, सोशल मीडिया में इस तरह से बयानबाजी हो रही है मानो पति-पत्नी संबंधों में हत्या जैसा ये पहला और आश्चर्यजनक मामला हो.

 



इस एक घटना के साथ कुछ महीने पहले हुए नीले ड्रम कांड को, पॉलीथीन में पति के टुकड़े भरने वाले कांड को जोड़ा जा रहा है. पुरुष समाज को, पतियों को एकदम से डर के साये में देखा जाने लगा है. ऐसा लगने लगा है जैसे कि हर पत्नी हत्यारिन हो और हर पति तलवार-चाकू की नोंक पर. सोचिएगा एक पल को कि इस घटना से सारा समाज सदमे में क्यों है? क्या इसलिए कि पत्नियाँ अब पतियों की हत्या करने-करवाने लगीं? क्या इसलिए कि महिलाओं ने इस हत्याकारी क्षेत्र में पुरुषों/पतियों के एकाधिकार पर अतिक्रमण करना शुरू कर दिया? क्या इसलिए कि पत्नी के रूप में एक महिला का इस तरह का स्वरूप समाज ने इक्कीसवीं सदी में भी नहीं सोचा था? कहीं इसलिए तो सदमे जैसी स्थिति नहीं कि एक सेक्स सिम्बल के रूप में, एक उत्पाद के रूप में, विज्ञापन के लिए नग्न-अर्धनग्न अवस्था में सुलभ रूप में समझ आने वाली आधुनिक महिला अब साजिश रचती, हत्या करती-करवाती नजर आने लगी है? इस छवि में भी आश्चर्य कैसा, सदमा कैसा? टीवी के माध्यम से ऐसी स्त्रियाँ पहले ही आपके घर में, आपके बेडरूम में, आपके बच्चों के बीच स्थापित हो चुकी हैं. इन तथाकथित आधुनिक जीवन-शैली जीने वाली महिलाओं को करोड़ों-अरबों रुपयों का व्यापार करने के साथ-साथ साजिश रचते भी दिखाया जाता है. परिवार में विखंडन करवाती इस धारावाहिक स्त्री को बाहर हत्या करते, हत्या की साजिश रचते भी दिखाया जा रहा है. आखिर इस क्रिया की प्रतिक्रिया तो होनी ही है.

 

यदि समाज इस कारण सदमे में है कि एक महिला सामान्य भाव से, बिना किसी घबराहट-भय के एक हत्याकांड में शामिल है तो गौर करिएगा, ससुराल में एक बहू-पत्नी की हत्या में पति रूपी पुरुष के साथ सास, जेठानी, ननद जैसी स्त्रियाँ भी शामिल रही हैं. एक महिला को जलाते समय, उसका गला घोंटते समय जब एक महिला के रूप में उनके हाथ नहीं काँपे तो फिर सोनम के हत्यारी होने की आशंका पर इतनी हलचल क्यों? वैसे यहाँ याद रखने वाली एक बात ये भी है कि इसी देश में बरसों तक जन्मी-अजन्मी बेटियों को मौत की नींद में सुलाने वाले हाथों में ज्यादातर हाथ महिलाओं के ही रहे हैं. हाँ, एक सत्य ये अवश्य है कि पिछले कुछ सालों में ख़ुद महिलाओं ने ही महिलाओं के पक्ष में बने क़ानूनों का जिस तरह दुरुपयोग किया है, उससे आज जागरूक, कर्तव्यनिष्ठ, पारिवारिक-सामाजिक दायित्व-बोध को समझने वाली महिलाओं ने भी ऐसी महिलाओं का खुलकर विरोध करना शुरू कर दिया है.

 

समाज की बहुतायत महिलाओं का ऐसी हत्यारी महिलाओं के विरोध में खड़े होने का कारण समाज में व्याप्त सकारात्मकता का होना है. देखा जाये तो समाज कई-कई मानसिकता वालों से, अनेक प्रकार की मनोदशा वालों से मिलकर संचालित होता है. समाज में दोनों तरह के स्त्री और पुरुष हैं. हत्यारी मानसिकता स्त्री और पुरुष दोनों में है, संस्कारी मानसिकता भी दोनों में है. ऐसा नहीं है कि समाज के सभी स्त्री और पुरुष समाज का भला करते घूम रहे हों, उनमें कोई बुराई न हो और ऐसा भी नहीं है कि समाज में स्त्री-पुरुष सिर्फ हत्या, साजिश ही करने में लगे हों. स्व-मानसिक स्थिति के चलते इन्सान अपने क़दमों को उठाता है और घटना को अंजाम देता है. ये और बात है कि इंटरनेट की, रील की, आधुनिकता की चकाचौंध में रची-बसी दुनिया ने संस्कारों को, संस्कृति को, जीवन-मूल्यों को, परिवार को, समाज को, यहाँ के व्यवस्थित ताने-बाने को तिलांजलि दे दी है. संबंधों का, रिश्तों का कोई मोल अब जैसे दिखता ही नहीं है. आधुनिकता के चक्कर में सिर्फ और सिर्फ विखंडन, ध्वंस, परित्याग आदि ही देखने को मिल रहा है. ऐसी मानसिकता के बीच भी यदि सामाजिक संरचना की, पारिवारिक ढाँचे की, विवाह संस्था की परवाह करने वाले लोग हैं, महिलाएँ हैं, पुरुष हैं तो निश्चित रूप से परिदृश्य अभी पूरी तरह से काला नहीं हुआ है, पूरी तरह से अंधकारमय नहीं हुआ है. रौशनी की एक सम्भावना अभी भी है. अब इस सम्भावना में रील की इस आभासी दुनिया में झूमते मम्मी-पापा-बच्चों को तय करना होगा कि वे किस तरह की मानसिकता के इंसान बनना चाहते हैं. किस तरह की मानसिकता का समाज बनाना चाहते हैं.

 


19 सितंबर 2022

कुंठित यौनेच्छा या स्वतंत्रता

समाज में किसी भी व्यक्ति द्वारा जो भी कृत्य किया जाता है वह किसी न किसी रूप में उसके द्वारा सोचा-विचारी की स्थिति के बाद ही होता है. कभी यदि कोई कदम अचानक से उठ भी जाता है तो उसके पीछे भी अचेतन में बैठी भावना या फिर तात्कालिक घटनाक्रम प्रमुख होता है. यही कारण है कि प्रत्येक कार्य के पीछे का कारण ही उस कार्य की दिशा तय करता है. अभी हाल में ही स्नान करती छात्राओं के वीडियो शेयर करने का जो मामला सामने आया, उसके पीछे भी कोई न कोई कारण अवश्य रहा होगा, ये और बात है कि अभी तक इस मामले की तह तक नहीं पहुँचा जा सका है. उस घटना का अंतिम और मुख्य उद्देश्य क्या होगा, ये तो यथासंभव जाँच के बाद ही सामने आएगा किन्तु समाज में जिस तरह से नग्नता को, सेक्स को पोषित-पल्लवित किया जा रहा है, उससे एक उद्देश्य यौनिक कुंठा से सम्बंधित भी समझ आता है.  


ये अपने आपमें एक परम सत्य है कि सेक्स किसी भी जीव की नैसर्गिक आवश्यकता है. न केवल इंसानों में वरन जानवरों में भी इसको देखा गया है, यहाँ तक कि पेड़-पौधों में भी आपस में निषेचन क्रिया संपन्न होती है, जो एक तरह से सेक्स का ही स्वरूप है. बहरहाल, जिस तरह से मानव समाज के विकास की स्थितियाँ बन रही हैं, विकसित हो रही हैं, उनके साथ-साथ सेक्स सम्बन्धी समस्याओं में, दुराचार की घटनाओं में भी वृद्धि देखने को मिली है. वर्तमान में हालात ये हैं कि किसी भी तरह का कार्यक्रम हो, किसी भी तरह का विज्ञापन हो, किसी भी तरह की फिल्म या धारावाहिक हो सभी में सेक्स को, शारीरिक संबंधों को प्रमुखता से दिखाया जाता है. किसी दौर में ऐसी बातों को फिल्माने में किसी न किसी संकेत का, रूपक का सहारा लिया जाता था मगर अब स्वाभाविकता का नाम लेकर ऐसे दृश्यों का खुलेआम फिल्मांकन होता है. बच्चों के टीवी कार्यक्रमों में बच्चों को भौंड़ी, कामुक मुद्राओं में थिरकते देखा जाता है. उनको द्विअर्थी संवादों में प्रदर्शन करते देखा जा सकता है. अनेकानेक उत्पाद ऐसे हैं जिनको देखकर ऐसा ही लगता है कि उस उत्पाद का निर्माण एकमात्र इसी उद्देश्य से किया गया है कि विपरीतलिंगियों में आकर्षण पैदा हो जाये, उनके बीच शारीरिक सम्बन्ध बन जाये. अब तो इनसे भी एक कदम आगे बढ़कर सोशल मीडिया में शार्ट वीडियो, रील्स आदि के माध्यम से अश्लीलता, नग्नता, कामुक मुद्राओं को हर हाथ में देखा जा रहा है. किसी भी तरह की आपत्ति पर इनको स्वतंत्रता के नाम का आवरण ओढ़ाया जाने लगता है.




आखिरकार यहाँ समझना ही होगा कि स्वतंत्रता है क्या? जीवनशैली आखिर किस तरह से संचालित की जाये? इसे भी समझने की जरूरत है कि कहीं जीवनशैली की स्वतंत्रता के नाम पर, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर व्यक्ति सेक्स संबंधों में स्वतंत्रता तो नहीं चाह रहा है? कहीं स्वतंत्रता के नाम पर सेक्स को समाज में कथित तौर पर स्थापित करने की साजिश तो नहीं? सेक्स को लेकर, शारीरिक संबंधों को लेकर, विपरीतलिंग को लेकर समाज में जिस तरह से अवधारणा निर्मित की जा रही है, उसे देखते हुए लगता है जैसे इंसान के जीवन का मूलमंत्र सिर्फ और सिर्फ सेक्स रह गया है. दृश्य-श्रव्य माध्यमों में प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों, विज्ञापनों में भी सेक्स का प्रस्तुतीकरण इस तरह से किया जाता है जैसे बिना इसके इंसान का जीवन अधूरा है. समस्या यहीं आकर आरम्भ होती है क्योंकि प्रस्तुतीकरण के नाम पर फूहड़ता का प्रदर्शन ज्यादा किया जाता है; दैहिक संतुष्टि के नाम पर जबरन सम्बन्ध बनाये जाने की कोशिश की जाती है; प्यार के नाम पर एकतरफा अतिक्रमण किया जाता है; स्वतंत्रता के नाम पर रिश्तों का, मर्यादा का दोहन किया जाता है. सोचना होगा कि कल को वे मानसिक विकृत लोग, जो दैहिक पूर्ति के लिए जानवरों तक को नहीं बख्शते हैं, अपने अप्राकृतिक यौन-संबंधों को जायज ठहराने के लिए सडकों पर उतर आयें, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर, जीवनशैली चुनने की स्वतंत्रता के नाम पर किसी भी जानवर के साथ को कानूनी स्वरूप दिए जाने की माँग करने लगें तो क्या ऐसे लोगों की मांगों को स्वीकारना होगा?


जिस तरह से इक्कीसवीं शताब्दी के नाम पर उत्पादों, विचारों, खबरों, कार्यक्रमों, भावनाओं का प्रचार-प्रसार किया गया है उसमें इंसान की वैयक्तिक भावनाओं को ज्यादा महत्त्व प्रदान किया गया है. उसके लिए सामूहिकता, सामाजिकता, सहयोगात्मकता आदि को दोयम दर्जे का सिद्ध करके बताया गया है, व्यक्ति की नितांत निजी स्वतंत्रता को प्रमुखता प्रदान की गई है, ये कहीं न कहीं सामाजिक विखंडन जैसी स्थिति है. पाश्चात्य जीवनशैली को आधार बनाकर जिस तरह से भारतीय जीवनशैली में दरार पैदा की गई है वह भविष्य के लिए घातक है. इसके दुष्परिणाम हमें आज, अभी देखने को मिल रहे हैं. जिस उम्र में बच्चों को अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए वे रोमांस में घिरे हुए हैं; जिस क्षण का उपयोग उन्हें अपना कैरियर बनाने के लिए करना चाहिए उन क्षणों को वे शारीरिक सुख प्राप्त करने में व्यतीत कर रहे हैं; जो समय उनको ज्ञानार्जन के लिए मिला है उस समय में वे अविवाहित मातृत्व से निपटने के उपाय खोज रहे हैं. जिस मोबाइल को संचार का, जानकारी का केन्द्र होना चाहिए था उसके द्वारा अश्लीलता का, कामुकता का प्रदर्शन किया जा रहा है.


हमारे देश की पीढ़ी सेक्स, समलैंगिकता, अविवाहित मातृत्व, विवाहपूर्व शारीरिक सम्बन्ध, सुरक्षित सेक्स आदि की मीमांसा, चिंतन करने में लगा हुआ है. संभव है कि ऐसे लोगों के सामने भारतीय संस्कृति का कोई व्यापक अथवा सकारात्मक अर्थ ही न हो क्योंकि इस पीढ़ी ने मुख्य रूप से दैहिक सम्बन्धों की चर्चा अपने आसपास होते देखी है. यहाँ आकर समझना होगा कि सेक्स, शारीरिक सम्बन्धों के मामले में नितांत खुला जीवन जीने वाले पाश्चात्य देशवासी भी कहीं न कहीं संयमित भारतीय जीवनशैली के प्रति आकर्षित हो रहे हैं. सेक्स को, दैहिक तृष्णा को एकमात्र उद्देश्य मानकर आगे बढ़ती पीढ़ी न केवल सामाजिकता का ध्वंस कर रही है बल्कि स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ भुलाकर समाज में एक दूसरे तरह की गुलामी को जन्म दे रही है. काश! स्वतंत्रता के नाम पर अधिकारों को समझा जाए न कि अनाधिकार चेष्टा को; काश! वैयक्तिक जीवनशैली के नाम पर रिश्तों की मर्यादा को जाना जाए न कि उनके अमर्यादित किये जाने को; काश! निजी जिंदगी के गुजारने के नाम पर पारिवारिक सौहार्द्र को समझा जाए न कि जीवन-मूल्यों के ध्वंस को; काश! जीवन को जीवन की सार्थकता के नाम पर समझा जाये न कि कुंठित सेक्स भावना के नाम पर. काश....!!!

 





 

17 अप्रैल 2022

नग्न बदलाव की तरफ भागता समाज

समाज के लिए सेक्स हमेशा से एक ऐसा विषय रहा है जिस पर गम्भीर चर्चा से ज्यादा विवादपूर्ण चर्चा ही हुई है. इस विवाद के पीछे का कारण मूल रूप से स्त्री-पुरुष के बीच एक विभेदात्मक रेखा का खिंचा हुआ होना है. इधर देखने में आ रहा है कि इक्कीसवीं सदी के पूर्व से ही समाज में आधुनिकता के नाम पर ऐसे विषयों को उठाया जाने लगा था जो किसी रूप में भारतीय समाज में गोपनीय माने जाते रहे. वैश्वीकरण के दौर से बाहर निकल कर समाज ने जैसे ही इक्कीसवीं सदी में अपना कदम रखा, वैसे ही आधुनिकता की परिभाषा बदल गई. कपड़ों का सलीका बदल गया, रहन-सहन का तरीका बदल गया. बदलाव के इस दौर ने पति-पत्नी के बीच भी अपनी पहुँच बनाकर उनके संबंधों को बजाय सुधारने के बिगाड़ने का ही काम किया.


चर्चाओं का दौर लगातार बना हुआ है और देखना है कि समाज की यह गति कहाँ जाकर रुकती है. बस ध्यान रह रखना होगा कि यह गति सबको नग्नावस्था में लाकर न छोड़े.


13 अक्टूबर 2021

विषयों के बदलते रास्ते

जिस तेज़ी से समाज में परिवर्तन दिखाई दे रहा है, उसी तेज़ी से यहाँ की चर्चाओं में भी परिवर्तन हो रहा है. सामान्य रूप से ऐसा लगता है जैसे समाज और यहाँ के चंद जागरूक नागरिक सामाजिक बदलाव लाने को सचेत हैं. वे इसी सचेतन दशा में इन चर्चाओं को आगे लाते रहते हैं. वैसे समाज में कहीं भी किसी बदलाव के लिए चर्चाओं का होना ज़रूरी है. समाज में ही क्या कहीं भी किसी तरह के परिवर्तन के लिए चर्चा होती ही है. घर में कोई काम होना है तो चर्चा तय है. किसी की पढ़ाई का मामला हो, किसी की शादी का मामला हो, किसी की ख़रीददारी होनी हो, किसी के रोज़गार का विषय हो सभी में चर्चा का होना मुख्य है. होना भी चाहिए क्योंकि चर्चा करने से सम्बंधित विषय पर उपयुक्त राय मिल जाती है या फिर सही राह दिख जाती है. वैसे भी समवेत चर्चा से निकले निर्णयों के आधार पर ठोस परिणाम मिलने की अपेक्षा रहती है. इस अपेक्षा पर वे चर्चाएँ ही खरी उतरती हैं जिनमें कुछ सार्थकता होती है. इधर कुछ समय से बदलाव के दौर से गुज़रता समाज अतिशय चर्चाबाज़ हो गया है. चंद सार्थक चर्चाओं के चारों तरफ़ निरर्थक चर्चाओं की भीड़ लगी हुई है. सबकी अपनी चर्चाएँ हैं, सबके अपने मंतव्य हैं. 

 

चर्चाओं के चलते दौर लगातार परिवर्तित होकर स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की तरफ़ मुड़ जाते हैं. वैसे इधर चर्चाओं में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की अधिकता देखने को मिल रही है. चर्चा ही क्या दैनिक क्रियाकलाप भी इसी के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गए हैं. स्त्री ने ये किया, उस महिला ने वो पहना, फ़लाँ लड़की का फ़लाँ लड़के के साथ चक्कर है, वो आदमी उस महिला को घूर रहा है, फ़लाँ लड़का रोज़ नई लड़की को घुमा रहा है, उस व्यक्ति ने उस महिला को छुआ, वो उसे देख मुस्कुराई, उसने उसे अजीब नज़रों से देखा आदि-आदि विषय तो रोज़ चर्चा में रहते ही हैं. इनके अलावा भी कुछ क्रांतिकारी विषय चर्चा में आने लगे हैं. इनके मूल में समाजिक बदलाव की बात कही जाती है, किसी गोपन विषय पर अगोपन होने की मंशा व्यक्त की जाती है, व्यक्तिगत विषयों पर खुली बहस करवाने की बात की जाती है. सोशल मीडिया पर एक हैशटैग आंदोलन शुरू होता है और फिर सब खुलकर चर्चाओं में शामिल होने लगते हैं. फिर चर्चा काम प्रदर्शन शुरू होने लगता है. कौन कितनी अश्लीलता से खुलकर सामने आ सकता है, इसकी होड़ लग जाती है. कौन कितना अशालीन लिख सकता है, इस पर ज़ोर दिया जाने लगता है. किसके विषयों में, भावाभिव्यक्ति में कामुकता अधिक समाहित हो सकती है, इसको प्रमुखता दी जाने लगती है. महिला-पुरुष सम्बन्धों के सार्थक, सकारात्मक विस्तार के लिए शुरू होने वाली चर्चाएँ देह-विमर्श के रूप में बदलने लगती हैं. किसके दाग़ अच्छे हैं, किसकी दैहिक संतुष्टि अधिक है, कौन कितने मिनट टिक सकता है आदि चर्चा के विषय बनने लगते हैं. 

 

स्त्री हो या पुरुष, उसके सम्बन्धों को जब तक देह की तराज़ू पर तौला जाता रहेगा तब तक खुला विमर्श कामुकता, अश्लीलता की कहानी ही लिखता रहेगा. जिस तरह स्त्री देह की समस्या को लेकर खुली चर्चा की वकालत की जा रही है, उससे क्या लगता है कि सारी समस्या सुलझ जाएगी? क्या लगता है कि आज के तकनीकी, इंटरनेट युग में लोगों को माहवरी, उसकी समस्या, स्त्री की परेशानी के बारे में जानकारी न होगी? क्या लगता है कि ऐसे लोग पैड के बारे में न जानते होंगे? क्या लगता है कि खुली चर्चा से सभी एक-दूसरे की मदद करने लगेंगे उन पाँच दिनों में? क्या खुली चर्चा की सार्थकता तब होगी जब पारिवारिक मर्यादा को भूल लोग आपस में उन दिनों की चर्चा करने लगेंगे? आधुनिकता के कथित आवरण को ओढ़कर हम सोचने लगे हैं कि खुले दिमाग़ और विचार के हो गए हैं. जहाँ आज भी परीक्षा ड्यूटी के दौरान किसी पुरुष शिक्षक द्वारा लड़की के हाथों  नक़ल  पर्ची छीनना छेड़खानी माना जाता हो, बाज़ार में किसी सहायता के लिए महिला  पुकारना या उसकी तरफ़ मदद का हाथ बढ़ाना फ़्लर्ट करना समझा जाता है, ज़हम महिला को देखना भी अपराध की श्रेणी में आता हो वहाँ ख़ुद महिलाओं से उनके पीरियड्स पर, पैड पर, उसके दाग़ पर खुली चर्चा की अपेक्षा करना समझा जा सकता है. ऐसे लोगों से, जो इस तरह के विषयों पर खुली चर्चा का दम भरते हैं, एक सवाल कि किसी ऐसी युवती जो अपने काम करने में सक्षम नहीं है, किसी परिस्थिति में उसके पिता, भाई द्वारा इसके पैड को बदलना-पहनाना सम्भव है

 

चर्चाएँ हों, खुलकर हों, इन्हीं विषयों पर हों पर उनके उद्देश्य को भटकाया न जाए, भटकने न दिया जाए. और ऐसा हाल-फ़िलहाल सम्भव नहीं दिखता है. 


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01 दिसंबर 2020

एड्स दिवस पर शुभकामना किसके लिए

आज विश्व एड्स दिवस पर बस इतनी सी बात कि यदि हम अपनी जीवन-शैली संयमित रखेंगे तो इस बीमारी से बचे रहेंगे. एक बात याद रखिए कि निरोध (कंडोम) का सबसे पहला उपयोग परिवार नियोजन के लिए किया गया था न कि एड्स की रोकथाम के लिए. इसे तो बाद में लोगों की यौन सम्बन्ध बनाने की अनियंत्रित चेष्टा के कारण एड्स रोकथाम के लिए अपनाना पड़ा. समझिये इसे कि एक ऐसा साधन जिसे परिवार नियोजन के रूप में अपनाया गया हो उसे बाद में असुरक्षित यौन संबंधों से सुरक्षित रहने के लिए अपनाए जाने के लिए बताया जाने लगा हो तो समाज किस दिशा में जा रहा है. यह समाज की नहीं बल्कि हम सबकी मानसिक, सामाजिक, संस्कारित गिरावट का सूचक है.

आज विश्व एड्स दिवस है, इस अवसर पर क्या बधाई, क्या शुभकामना दी जाए कि एड्स से बचे रहें या फिर ये कि निरोध के इस्तेमाल के साथ सुरक्षित यौन सम्बन्ध अपनाएँ? आप सभी समझदार हैं, समझिये और आगे बढ़िए. 


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वंदेमातरम्

24 नवंबर 2018

विवाहेतर संबंधों को कानूनी मान्यता के बाद भी...


पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने क्रांतिकारी निर्णय देते हुए दो धाराओं की दिशा बदल दी. एक से समलैंगिक सम्बन्ध बनाने वालों को राहत मिली और दूसरी धारा से विवाहेतर सम्बन्ध बनाने वालों को. अदालत द्वारा धारा 370 और धारा 497 की दिशा बदली गई उसके बाद समाज की दिशा बदले या न बदले मगर कानून की, पुलिस की दिशा अवश्य बदलनी चाहिए. यहाँ चर्चा इन निर्णयों के बाद भी सामने आने वाली कुछ खबरों के सन्दर्भ में है, जिसमें हाल-फिलहाल धारा 497 को शामिल किया गया है. लगभग दो माह होने को आये हैं जबकि विवाहेतर संबंधों के बनाये जाने को कानूनी मान्यता मिलने के बाद भी कई घटनाएँ सामने आईं हैं जहाँ कि दो बालिग स्त्री-पुरुष के द्वारा आपसी सहमति से सम्बन्ध बनाये जाने के बाद भी उन्हें पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया. अदालत द्वारा जबकि इस सम्बन्ध में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि यह कानून एक तरह से महिलाओं के साथ भेदभाव करता है. उसका ऐसा कहना किसी और सन्दर्भ में हो सकता है मगर जबकि कानूनी रूप से स्त्री और पुरुष दोनों को आपसी सहमति से शारीरिक सम्बन्ध बनाने की छूट मिल गई है तब ऐसा करने वालों को पुलिस द्वारा गिरफ्तार करना क्या अदालत के आदेश का अपमान नहीं? 


लेखक कानून का जानकार नहीं, इसलिए ऐसा सवाल दिमाग में आना स्वाभाविक है. ऐसा सवाल इसलिए भी जेहन में उपजा क्योंकि किसी शिकायत पर पुलिस प्रशासन का किसी के घर पहुँच कर, किसी होटल पहुँच कर छापामारी करने, बालिग स्त्री-पुरुष को गिरफ्तार करने की खबरें नियमित रूप से सुनाई पड़ रही हैं. सवाल यह भी उपजता है कि यदि कोई बालिग स्त्री-पुरुष आपसी सहमति से अपने घर में, किसी होटल में शारीरिक सम्बन्ध बनाते हैं और इसके प्रमाण मिलते हैं कि उनके द्वारा किसी रूप में वेश्यावृत्ति नहीं की जा रही है, होटल प्रबंधक, मालिक द्वारा किसी तरह से वेश्यावृत्ति की संलिप्तता नहीं है तो फिर ऐसे बालिग स्त्री-पुरुष को गिरफ्तार क्यों किया जाता है? यह भी एक तथ्य है कि वे दोनों किसी सार्वजनिक स्थान पर शारीरिक सम्बन्ध नहीं बना रहे होते हैं तब क्या उनको गिरफ्तार किया जा सकता है? यदि आपसी सहमति से सम्बन्ध बनाना अब गैर-कानूनी नहीं तो फिर क्या इस सम्बन्ध में पुलिस प्रशासन को सचेत नहीं किया गया है? जबकि यह सर्वविदित है कि कानून का पालन करवाना पुलिस का ही काम है.

इस विषय पर इसलिए भी चर्चा आवश्यक है क्योंकि ऐसे ही बहुत सारे विषय हैं जिनके कारण समाज में विसंगति देखने को मिलती है. ऐसे तमाम मुद्दे हैं जिनको लेकर कानून कुछ कहता है और पुलिस प्रशासन कुछ और करता है. इस तरह का दोहरा व्यवहार, बर्ताव भी समाज में न्यायालय की उस सोच को बाधित करता है, जिसके द्वारा उसके द्वारा हाल ही में दो-दो धाराओं की दिशा बदली गई.

08 अक्टूबर 2018

सोशल मीडिया की उन्मुक्तता


मीडिया के साथ जुड़ाव बचपन से ही रहा है. पिताजी के मित्र समाचार-पत्र दैनिक एलार्म का प्रकाशन उरई से करते थे. उनके साथ पारिवारिक संबंधों के कारण पत्रकारिता को बहुत करीब से देखने का अवसर बचपन से ही मिला है. इसी तरह प्रिंट लाइन में जनपद जालौन में अपनी सबसे अलग स्थान रखने वाले श्री राजाराम गुप्ता जी से भी पारिवारिक सम्बन्ध होने के कारण इस क्षेत्र की बारीकियों को भी बहुत करीब से देखने-समझने का अवसर बचपन से ही मिला. हमारे अभी तक के अभिन्नतम मित्रों में से एक अश्विनी कुमार गुप्ता ‘बबलू’ जो श्री राजाराम गुप्ता जी के नाती हैं, और हम बचपन से अभी तक एक-दूसरे के साये की तरह एक-दूसरे के साथ हैं. स्नातक करने के बाद अपने लेखन शौक के कारण खुद भी मीडिया के संपर्क में आये. प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से संपर्क हुआ, सम्बन्ध बने. इस मीडिया से संपर्क विस्तार के बाद जब सोशल मीडिया में प्रवेश किया तो पता नहीं था कि उसमें जितनी राहें हैं वे सारी भूलभुलैया की तरह काम करती हैं. जरा सा भटके नहीं कि फिर उसी में खो गए. सोशल मीडिया की राह पर चलना शुरू किया ब्लॉग के माध्यम से जो चलते-चलते कब फेसबुक, व्हाट्सएप्प, ट्विटर आदि तक पहुँच गया, पता ही नहीं चला. 


वैचारिक आदान-प्रदान के लिए सर्वोत्तम मंच समझकर यहाँ अपनी उपस्थिति कुछ ज्यादा ही बना ली. इस उपस्थिति के अपने ही परिणाम निकले. बहुत से लोग बौद्धिक विमर्श में सहायक बने, उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला. कुछ लोग सामाजिकता में वृद्धि करते दिखे तो उनसे भी सीखा गया. कुछ लोगों का कार्य पूर्वाग्रह से भरकर सिर्फ वैमनष्यता ही फैलाता दिखा तो कुछ दिन उनसे तर्क-वितर्क की स्थिति के बाद लगा कि ऐसे लोगों से बहस का कोई सार नहीं. सो ऐसे लोगों से किनारा करना ज्यादा उचित समझ आया. और भी तमाम तरह की प्रजातियाँ सोशल मीडिया पर मिलीं. इन्हीं में से एक प्रजाति ऐसी मिली जिसका काम इनबॉक्स में आकर हाय, हैलो करना, दो-चार बार के बाद उससे भी कई कदम आगे जाकर प्यार का इजहार करना, शारीरिक सम्बन्ध बनाने की चाह व्यक्त करना, न्यूड फोटो भेजना शुरू हो जाता. इस तरह के कृत्य करने के बाद भी इनका दम ये भरना रहता कि हमसे प्रेम करती हैं, दिल की गहराइयों से प्रेम करती हैं, हमारे प्यार में सबकुछ कर गुजर जायेंगी. हालाँकि कई बार शंका होती इनके फर्जी होने की तथापि कई प्रोफाइल सही भी पायी गईं. तब लगा कि सोशल मीडिया के प्रति लोगों के, विशेष रूप से युवाओं के आकर्षण ने विचारों की अभिव्यक्ति को कितनी स्वतंत्रता दे दी है. विचारों में भी ख़ास तौर से सेक्स सम्बन्धी अभिव्यक्ति को, नग्नता प्रदर्शित करने सम्बन्धी अभिव्यक्ति को. सेक्स की इस उन्मुक्त अभिव्यक्ति के साथ ये युवा पीढ़ी किस स्वतंत्रता की पोषक बनेगी, पता नहीं.

30 सितंबर 2018

ह्युमन पप्स कम्युनिटी : विकृत यौन मानसिकता का दुष्परिणाम


इस लेख को पढ़ने के पहले इसके साथ संलग्न चित्र अवश्य देखें. एक चित्र में एक महिला के साथ बैठा हुआ कुत्ता दिख रहा है. दूसरे चित्र में एक व्यक्ति जानवरों की तरह से सड़क पर चल रहा है, जबकि वह कपड़े पहने हुए है.

चित्र एक 

चित्र दो 

पहली तस्वीर में दिखाई देने वाला कुत्ता असल में कुत्ता नहीं है बल्कि एक आदमी है. यह इस तरह की ड्रेस में इसलिए है क्योंकि इसे लगता है कि वो सेक्सुअली एक कुत्ता है. वह चाहता है कि उसके साथ एक कुत्ते की तरह ही व्यवहार किया जाये. ऐसी मानसिकता से ग्रसित लोगों के लिए ऐसी ड्रेस वे कम्पनियाँ बना रही हैं जो सेक्स टॉयज़ बना रही हैं. वे इस तरह की ड्रेस की बहुत ऊंची कीमत भी वसूलती हैं. इसके पीछे अभी मेडिकल साइंस का पूर्ण विकास न कर पाना भी है. स्त्री-पुरुष को आपस में बदल देने वाली मेडिकल साइंस अभी तक ऐसा कोई अविष्कार नहीं कर सकी है जिससे कि इंसान को कुत्ता अथवा किसी अन्य जानवर में परिवर्तित किया जा सके. परिणामस्वरूप कम्पनियाँ इन मानसिक कुत्तों को ड्रेस ही बेच रही है. ऐसे लोग अपने आपको ह्यूमन पप्स कहते हैं. सम्पूर्ण विश्व में फैली LGBT कम्युनिटी की तरह यह भी एक तरह की कम्युनिटी है. LGBT का तात्पर्य यहाँ Lesbian, Gay, Bisexual और Transgender से है. LGBT कम्युनिटी की तरह एक ह्यूमन पप्स कम्युनिटी भी दुनिया में मौजूद है.

ये कम्युनिटी शुरू में छुपी हुई थी, लेकिन अब इससे हज़ारों लोग जुड़े हुए हैं. आपको जानकार शायद आश्चर्य हो कि ब्रिटेन के एंटवर्प शहर में मिस्टर पपी यूरोप की प्रतियोगिता आयोजित की जाती है. इनके अपने प्राइड क्लब हैं, ये अपनी इस स्थिति का आनंद लेते हैं और अपनी शर्तों पर जीनव जीने का दावा करते हैं. ब्रिटेन के एक चैनल channel4 पर 2016 में एक डॉक्युमेंट्री प्रसारित की गई थी और ह्यूमन पप्स की जिंदगी को लोगों के सामने लाया था. जहां उस समय भी कुछ लोगों को ये बहुत अजीब लगा था और कुछ ने इसका सपोर्ट किया था. सीक्रेट लाइफ ऑफ ह्यूमन पप्स डॉक्युमेंट्री में पहली बार ह्यूमन पप्स को ढंग से दिखाया गया था. जहां इसे पहले सिर्फ सेक्स एडिक्शन से जोड़कर देखा जाता था वहीं इस डॉक्युमेंट्री के बाद ये समझ आया कि इस तरह के लोगों को वाकई पूरी तरह से कुत्ता बनकर रहना पसंद है. किसी समय किसी इन्सान द्वारा शौकिया तौर पर शुरू की गई यह पप्स कम्युनिटी के सदस्यों की संख्या आज लाखों में पहुंच गई है. ऐसे मानसिक कुत्तों के तमाम सारे क्लब भी बने हुए हैं. वैश्विक स्तर पर ये अनेक शहरों में इकट्ठा होकर अपने अंदर के कुत्ते का गर्वीला आयोजन करते हैं. इस आयोजन में ये इंसानी-कुत्ते अपने अधिकारों की मांग करते हैं. इनकी माँग रहती है कि सम्पूर्ण विश्व इन्हें उसी सम्मान से स्वीकार करे जैसे आम लोगों को स्वीकार करती है.

इसी कम्युनिटी की तरह और भी दूसरी तरह की कम्युनिटी पाई जाती हैं, जिसे ज़ूफाइल्स कहा जाता है. ये वो लोग हैं जिन्हें इंसानों से शारीरिक आकर्षण नहीं होता है. इस कम्युनिटी में शामिल लोग सिर्फ जानवरों से सह-सम्बन्ध बनाते हैं. जानवरों से शारीरिक सम्बन्ध बनाने वालों को इस कम्युनिटी में अलग-अलग नामों से पहचाना जाता है. जैसे कुत्तों के साथ यौन सम्बन्ध बनाने वालों को साइनोफाइल्स, घोड़ों से साथ सम्बन्ध बनाने वालों को इक्विनोफाइल्स, सुअर के साथ सम्बन्ध बनाने वालों को पोर्किनोफाइल्स कहा जाता है. इसी तरह खुद को लड़की की तस्वीर में देखकर उत्तेजित होने वालों को ऑटोगाइनेफाइल्स कहा जाता है, खुद को किसी जानवर के यौन जीवन में मानने वालों को ऑटोज़ूफाइल्स, पेड़ो से सेक्स करना पसंद करने वालों को डेंड्रोफाइल्स और कीड़ों को अपने ऊपर फैलाकर यौन सुख का अनुभव लेने वालों को फॉर्मिकोफाइल्स कहा जाता है. ये सब अपने आपको सामान्य और आम लोगों की तरह बताते हैं. वर्तमान में इनकी संख्या 15 लाख से 20 लाख तक पहुंच चुकी है और अब ये अपने आयोजनों, आन्दोलनों के द्वारा अपने अधिकारों की माँग करने लगे हैं.

आधुनिकता के वशीभूत कुछ लोगों के लिए भले ही ये आश्चर्य न हो मगर सत्य यह है कि बहुत से देशों में यह वैधानिक है और बहुत से देशों में इस तरह के संबंधों को प्रतिबंधित किया गया है. जिन देशों में इसे प्रतिबंधित किया गया है वहां इसे लेकर बहुत नाराज़गी है. वे इसे भेदभाव बताते हैं और इसे समाप्त करने की बात करते हैं. देखा जाये तो सबके अपने-अपने तर्क हैं. इनका कहना है कि समलैंगिकों की संख्या ज्यादा रही इसके चलते उनकी मांगों को स्वीकार किया गया और बहुत से देशों ने समलैंगिक संबंधों को मान्यता दे दी. वे अभी संख्या में कम हैं जिसके चलते वे अभी खुली प्राइड परेड भी नहीं कर पाते हैं. ऐसी स्थिति में आकर समझ नहीं आता है कि समाज किस दिशा में जा रहा है? शिक्षा, तकनीकी के विस्तार के साथ-साथ किस तरह की मानसिकता का विकास होता जा रहा है? इसे विकास कहा जाये या मानवीय विकार की स्थिति, समझ से परे है. जीवन की सत्यता यह है कि इसकी प्रत्येक यौनिक गतिविधि का मकसद जीवन का विस्तार करना ही है. इसके बाद भी आज के तथाकथित समाजसेवी, मानवाधिकारवादी विकृति को गर्व के साथ सार्वजनिक करने से नहीं चूकते हैं. इसको समानता का अधिकार दिलाने के लिए वे लगातार आन्दोलन कर रहे हैं. 

इस तरह की असामान्य सेक्स प्रवृत्ति को मनोविज्ञान की भाषा में पैराफीलिया कहा जाता है. यहाँ खुद को विपरीत सेक्स मानने वाले समलैंगिक हों या फिर अपने आपको जानवर समझने वाले ऑटोज़ूफाइल्स, ये सब अपने आपमें असामान्य मानसिक विकृतियां ही हैं. इसके बाद भी समाज में समलैंगिकता को सामान्य व्यवहार समझा जाता है, माना जाता है. और तो और अब तो उसे क़ानूनी मान्यता मिल गई है. संभव है कि आने वाले दिनों में ह्युमन पप्स कम्युनिटी भी अपने अधिकारों और समानता के लिए आन्दोलन करे, न्यायालय में याचिका दायर करे और माननीय एक निर्णय सुनाते हुए कह दें आज से ह्युमन पप्स कम्युनिटी के सभी सदस्यों को सामाजिक स्वीकार्यता मिलती है. ऐसे सम्बन्ध गैर-आपराधिक हैं.

28 सितंबर 2018

महिला हुई यौन स्वतंत्र, पुरुष अपराध मुक्त


विगत दो-तीन दिन से सर्वोच्च न्यायालय ऐतिहासिक निर्णय देने में लगा है. स्त्री-पुरुष के विवाहेतर संबंधों से जुड़ी भारतीय दंड संहिता की धारा 497 पर सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि व्याभिचार अपराध नहीं है. विगत माह, अगस्त में देश की शीर्ष अदालत में इस मामले पर सुनवाई करते हुए कहा था कि व्याभिचार कानून महिलाओं का पक्षधर लगता है लेकिन असल में यह महिला विरोधी है. अदालत का कहना था कि शादीशुदा संबंध में पति-पत्नी दोनों की एक बराबर जिम्मेदारी है. फिर अकेली पत्नी पति से ज्यादा क्यों सहे? इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय में कुछ साल पहले एक अर्जी दाखिल कर कहा गया था कि ये कानून संविधान के अनुच्छेद-14 यानि समानता की भावना के खिलाफ है. अगर किसी अपराध के लिए मर्द के खिलाफ केस दर्ज हो सकता है, तो फिर महिला के खिलाफ क्यों नहीं? इस अर्जी को अदालत ने खारिज कर दिया था.


हाल-फिलहाल व्यभिचार से संबंधित आईपीसी की धारा 497 के बारे में इतना समझिये कि यह धारा किसी विवाहित महिला से शारीरिक सम्बन्ध बनाये जाने से सम्बंधित है. इसमें दो पक्ष हैं. एक- यदि महिला से कोई गैर-पुरुष बिना सहमति सम्बन्ध बनाता है तो शिकायत पश्चात् सम्बन्ध बनाये जाने पुरुष के खिलाफ रेप का केस दर्ज किया जायेगा. दो- यदि विवाहित महिला अपनी सहमति से किसी गैर-मर्द से सम्बन्ध बनाती है तो उस ऐसी स्थिति में उस पुरुष पर तब कार्यवाही हो सकती है जबकि महिला का पति शिकायत कर दे. यहाँ इसका कोई अर्थ नहीं कि महिला की सहमति से सम्बन्ध बने थे. इसमें भी दोषी वह पुरुष रहता है जिसने सम्बन्ध बनाये. अर्थात कोई ऐसी महिला के साथ, जो किसी अन्य पुरुष की पत्नी है और जिसके साथ कोई अन्य पुरुष यह विश्वासपूर्वक जानते हुए कि बिना उसके पति की सहमति या उपेक्षा के वह शारीरिक संबंध बनाता है तो वह बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता. शिकायत होने की स्थिति में वह व्याभिचार के अपराध का दोषी होगा और उसे इसके लिए पाँच वर्ष की कारावास की सजा या आर्थिक दंड अथवा दोनों से दंडित किया जा सकता है. ऐसे मामले में महिला दुष्प्रेरक के रूप में दण्डनीय नहीं होगी.  हालाँकि यह अपराध महिला के पति की सहमति द्वारा समझौता करने योग्य है. इस मामले में पत्नी को अपराध में हिस्सेदार नहीं माना जाएगा. इस धारा को लेकर आधुनिकतावादी, नारीवादी इसलिए खिलाफ थे क्योंकि उनका मानना था कि सहमति से सम्बन्ध बनाये जाने के बाद भी महिला के पति द्वारा शिकायत करना दर्शाता है कि वह महिला उस पुरुष की संपत्ति है.

आज भी भारत के संविधान का ज्यादातर हिस्सा भारत सरकार अधिनियम 1935 से ज्यों का त्यों नकल करके बनाया गया है. इसलिये ज्यादातर कानून अंग्रेजों के द्वारा बनाये हुये हैं और आज भी स्वतंत्र भारत में लागू हैं. भारत की अपराध दंड संहिता यानी आईपीसी लिखने वाले लॉर्ड बैंबिंगटन मैकाले चाहते थे कि विवाह संबंध में अगर पत्नी और किसी अन्य के बीच शारीरिक सम्बन्ध बन जाने की स्थिति में उसे अपराध न माना जाए. आईपीसी बनने से पहले देश में नागरिकों के लिए कोई लिखित कानून नहीं था और परंपरा से न्याय होता था. जब मैकाले के सामने विवाह संबंधी अपराधों को स्पष्ट करने की स्थिति आई, तो यह प्रश्न भी उठाया गया कि पत्नी के साथ किसी बाहरी व्यक्ति के यौन संबंध यानि व्याभिचार को अपराध माना जाए या नहीं? मैकाले ने तत्कालीन भारतीय समाज के अपने अनुभवों के आधार पर यह जान लिया था कि उस समय यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे की पत्नी को भगा ले जाता है अथवा उसके साथ यौन संबंध बनाता है तो ज्यादातर मामलों में पीड़ित पक्ष यानि पति चाहता था कि उसकी पत्नी उसे वापस मिल जाए या फिर उसे इसका आर्थिक मुआवजा मिल जाये. मैकाले ने अनुमान लगा लिया था कि ऐसे प्रकरणों में अपराध जैसी श्रेणी तत्कालीन समाज में स्वीकार्य नहीं थी. परम्पराओं, संस्कृति, सभ्यता, परिवार आदि की दुहाई देकर ऐसे प्रकरणों को भावनात्मकता के आधार पर सुलझाने की कोशिश की जाती थी. इसके बाद भी आईपीसी का निर्धारण होते समय मैकाले का हस्तक्षेप इसमें पूर्ण रूप से नहीं हो सका क्योंकि उसका विचार व्याभिचार को दीवानी मामला बनाया जाना और आर्थिक आधार पर इनका फैसला करने का था. मैकाले अपने विचारों को प्रतिपादित करवाने में असफल रहा और व्याभिचार को आईपीसी में अपराध मान लिया गया और इसके साथ ही भारतीय कानूनों में धारा 497 जुड़ गई.

सर्वोच्च नयायालय के फैसले का स्वागत करते हुए राष्ट्रीय महिला आयोग ने कहा कि यह सभी महिलाओं के हित में होने के साथ-साथ, लैंगिक तटस्थता वाला फैसला भी है. यहाँ भले ही इस धारा को समाप्त करने सम्बन्धी फैसला आया है मगर इसके परिणामों को भारतीय समाज के परिदृश्य में देखने की आवश्यकता है. विगत कई वर्षों से लिव-इन-रिलेशन के चलन में आने के बाद से विवाह संस्था कमजोर होती दिखाई दे रही है. इसके बाद समलैंगिक संबंधों के हितों की रक्षा की खातिर धारा 377 की समाप्ति ने विवाह संस्था के साथ-साथ परिवार की नींव को हिलाया है. ऐसे संक्रमणकाल में अदालत के इस फैसले से स्त्री, पुरुष दोनों ही दो अलग-अलग बिन्दुओं पर प्रभावित दिख रहे हैं. अब स्त्री (पत्नी) किसी पुरुष (पति) की संपत्ति के तौर पर नहीं दिख रही है. इसके साथ ही पुरुषों को इस रूप में राहत मिली है कि व्याभिचार कानून के नाम पर अब सिर्फ उन्हें ही अपराधी नहीं माना जा सकता है. इसके बाद भी कहीं न कहीं ये फैसला समाज में व्याभिचार को ही बढ़ावा देगा. समाज में आज भी बहुतेरे नारीवादी मंचों से महिलाओं के शोषण की बात उठती है, उनके पक्ष में आवाज़ उठाई जाती है. एकाधिक बार ऐसी भी खबरें सामने आईं हैं जहाँ कि पति को अपनी ही पत्नी से वेश्यावृत्ति करवाए जाने का, देह-व्यापार करवाए जाने का अपराधी माना गया. ऐसे में इस फैसले से शोषित पत्नी की दशा और ख़राब होने का खतरा नहीं है? आधुनिकता की दौड़ में अंधे होकर दौड़ रहे समाज में इस फैसले का भी स्वागत हुआ है. इसके परिणाम आने में अभी समय लगेगा. तब तक सब खुद को आधुनिक, समान समझ कर गर्व कर ही सकते हैं.

04 फ़रवरी 2018

हैप्पी टू ब्लीड से पैडमैन तक

पता नहीं देश ज़्यादा जल्दी में है या कुछ देशवासी? वैसे कुछ की बजाय सभी किसी न किसी जल्दी में हैं. किसी को धन कमाने की जल्दी, किसी को अपने काम में तरक़्क़ी करने की जल्दी, किसी को सबकुछ पा लेने की जल्दी, किसी को सबकुछ सुधार देने की जल्दी, किसी को दोष मढ़ देने की जल्दी. इस जल्दी-जल्दी के खेल में बहुतेरे तो हड़बड़ी के शिकार हुए जा रहे हैं. इस हड़बड़ी में समय को समय से पहले खींचे ला रहे हैं. इस हड़बड़ी में उनको भान नहीं कि वे कर क्या रहे हैं? कह क्या रहे हैं? जल्दबाज़ी का खेल बिना सोचे-समझे खेला जा रहा है. इस खेल में अपने पक्ष को ही प्रामाणिक मानने को एक तरह की धौंस दी जा रही है और उसके लिए क्या सही, क्या ग़लत इस तरफ़ विचार भी नहीं किया जा रहा है. 

जल्दबाज़ी में ख़ुद को यथोचित स्थापित करने की लालसा ने समाज में बराबर स्त्री-सम्बंधी मुद्दों को स्त्रियों, पुरुषों द्वारा उठाया जाता रहा है. समाज में स्त्रियों को लेकर एक तरह की धारणा यही बनी हुई है कि वो कमज़ोर है, पुरुष के अधीन है, शोषित है. इन सबके साथ-साथ यहाँ तक माना जा रहा है कि स्त्रियों पर किसी भी तरह के धार्मिक, पारिवारिक, सामाजिक कृत्यों पर लगने वाले प्रतिबंधों को पुरुषों द्वारा लगाया गया है. घर में, घर बाहर किसी भी स्त्रीगत स्थिति का एकमात्र ज़िम्मेवार सिर्फ़ पुरुष को माना-समझा गया. इन्हीं विचारों के चलते कुछ समय पूर्व सोशल मीडिया पर अपने स्त्रीवादी आंदोलनों की धार को तेज़ करने के लिए हैप्पी टू ब्लीड जैसा कार्यक्रम चलाया गया था. इसका मक़सद महिलाओं के मासिक धर्म के प्रति समाज में बनी सोच के प्रति सकारात्मक माहौल बनाया जाना होना चाहिए था पर वही न होकर सबकुछ हुआ. एक से एक महिलाओं ने अपनी-अपनी फ़ोटो डाल कर समाज को बताने की कोशिश की कि उसको भी मासिक धर्म होता है. इन महिलाओं की अपने ब्लीड होने को लेकर हैप्पी वाली स्थिति सिर्फ़ फ़ोटो खींचने और सोशल मीडिया पर शेयर करने भर तक सीमित रही. इसके बाद पता नहीं वे कितने दिन बिना पैड के रहीं या फिर अब तक बिना पैड के ही रह रहीं हैं? 


आंदोलन छेड़ने वाली ये आधुनिक, क्रांतिकारी महिलाएँ पैड धारण कर रहीं हैं ता नहीं, उनको ब्लीड से हैप्पीनेस हो रही है या नहीं ये उनका विषय पर हाल ही में सामाजिक सुधारों के स्वनामधन्य ब्राण्ड एम्बेसडर बने अभिनेता जी पैड आधारित फ़िल्म लेकर आ गए. फ़िल्म देखी तो नहीं हमने पर अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इसमें महिलाओं के उन्हीं पाँच दिनों की बात होगी. पैड वाली समस्या के साथ-साथ सुधारवादी चर्चा भी हो सकती है. पैड की आड़ में महिलाओं की शारीरिक सुरक्षा की बात हो सकती है. मासिक धर्म को लेकर सामाजिक विमर्श की चर्चा भी हो सकती है. होनी भी चाहिए क्योंकि आज भी इस मुद्दे को पुरुषों से ज़्यादा महिलाओं द्वारा ही नकारात्मक रूप से देखा जाता है. उन दिनों रसोई में  जाना, पूजा  करना, सामान  छूना आदि प्रतिबंध महिलाएँ ही लगाती हैं. सामाजिक दृष्टि से एक सार्थक पहल, यदि इस फ़िल्म से हो रही है, को कुछ नौटंकीधारियों ने भटकाना शुरू कर दिया है. नामचीन महिलाएँ पैड लेकर फ़ोटो सोशल मीडिया पर शेयर करने लग गईं हैं. इस क्रांति से चर्चा होगी. अब परिवार में सब एकसाथ बैठकर अलग-अलग उम्र की महिलाओं के अलग-अलग आकार, अलग-अलग ब्राण्ड के पैड को पसंद कर सकेंगे. इस फ़िल्म ने पैड का प्रचार कर हैप्पी टू ब्लीड समर्थकों के ख़िलाफ़ काम किया है. समाज में भ्रम को फैलाया है. अब ब्लीड करती हुई महिला बिना पैड सार्वजनिक आए या फिर पैड को बाँधे? आख़िर प्राकृतिक, नैसर्गिक शारीरिक क्रिया पर प्रतिबंध क्यों? चर्चाओं को विस्तार देते हुए सभी को झिझक छोड़ परिवार की, पड़ोस की, कार्यालय की महिलाओं से जानकारी लेते रहना चाहिए. आख़िर समभाव के नाते उन पाँच दिनों के कष्टों को सिर्फ़ हैप्पी टू ब्लीड वाले, पैडमैन वाले ही क्यों जानें, उसके बारे में सब जानें, सब समझें. बस महिलाएँ ख़ुद  तैयार कर लें इन पर चर्चा के लिए. क्या वे अभी हैं तैयार? 

07 अगस्त 2017

माँग और आपूर्ति के सिद्धांत पर आधारित फ्रेंड्स विद बेनिफिट्स

किस आसानी से कह दिया जाता है दोस्त और उतनी ही आसानी से कह दिया जाता है कि अब दोस्ती समाप्त। ये वर्तमान का चलन है। इसे हम यदि संस्कृति, सभ्यता के चलन के रूप में न देखकर एक सामाजिक अवधारणा के रूप में स्वीकारें तो शायद ऐसे रिश्तों का आकलन करना आसान हो जायेगा। फ्रेंड्स विद वेनिफिट्स भले ही इन अंग्रेजी शब्दों के अर्थ सीधे-सीधे उस बात को नहीं साबित कर पा रहे हों जो इनके भीतर छुपा है पर यह तो स्पष्ट ही हो रहा है कि कुछ अनजाना सा अर्थ बड़े ही खूबसूरत शब्दों में छुपाकर सामने रखा गया है। इन शब्दों में छुपी पूरी बहस को लड़का अथवा लड़की के दायरे से बाहर आकर देखना पड़ेगा।


यहाँ तार्किक रूप से अवलोकन करने से पहले इस शब्द-विन्यास पर विचार करें तो और भी बेहतर होगा। पहला शब्द फ्रेंड्स यानि कि दोस्त, अब आइये और देखिये आसपास की दोस्ती की परिभाषा। दो विषमलिंगी आपस में मिलते हैं, कालेज के दिनों में अथवा अपने अन्य कामकाजी दिनों में। आपसी मुलाकातों का दौर बढ़ता है और प्यार जैसा शब्द जन्म लेता है। जन्म तो शायद उसने पहली मुलाकात में ही ले लिया था पर जुबान पर आया कुछ दिनों के बाद। प्यार परवान चढ़ा तो ठीक नहीं तो दोनों दोस्ती तो निभा ही सकते हैं जैसे वाक्य के साथ अपने रिश्तों का पटाक्षेप करते हैं। (पता नहीं रिश्तों का पटाक्षेप होता भी है या नहीं?) अब दोस्ती उस रूप में नहीं होती जो जन्म-जन्मान्तर की बातों पर विचार करे। इस हाथ ले उस हाथ दे वाली बात यहाँ भी लागू होती है। शारीरिक सम्बन्ध अब हौवा नहीं रह गये हैं। दो विपरीत लिंगियों में दोस्ती की कई बार शुरुआत सेक्स के आधार पर ही होती देखी गई है। यदि ऐसा नहीं होता तो क्यों महानगरों के पार्क, चैराहे शाम ढलते ही जोड़ों की गरमी से रोशन होने लगते हैं? दोस्ती का ये नया संस्करण है।

अब शब्द आता है वेनिफिट्स क्या और कैसा? इसको बताने की आवश्यकता नहीं। महानगरों में चल रहे मेडीकल सेंटर में होते गर्भपात ही बता रहे हैं कि किस वेनिफिट्स की बात की जा रही है। ये बहुत ही साधारण सी बात है कि यदि हमारे रिश्तों की बुनियाद आपसी शर्तों के आधार पर काम कर रही है तो उसमें हम भावनाओं को कैसे सहेज सकते हैं? देखा जाये तो अभी इन शब्दों की संस्कृति का चलन कस्बों, छोटे शहरों आदि में नहीं हुआ है। यदि हुआ भी होगा तो उसका स्वरूप अभी वैसा नहीं है जो इन शब्दों का मूल है। महानगरों में जहाँ तन्हाई है, मकान मिलने की समस्या है, परिवहन की समस्या है, कामकाज के समय निर्धारण की समस्या है, कार्य के स्वरूप में दिन-रात का कोई फर्क नहीं है वहाँ इस तरह के सम्बन्ध बड़ी ही आसानी से बनते देखे जाते हैं। सहजता से कुछ भी कहीं भी मिल जाने की स्थिति ने इस प्रकार के रिश्तों को और भी तवज्जो दी है। किसी के सामने कोई जिम्मेवारी वाला भाव नहीं। माँग और आपूर्ति का सिद्धान्त यहाँ पूरी तरह से लागू होता है। अब इस तरह का निर्धारण कतई काम नहीं करता कि वो लड़का है या लड़की। दोनों की अपनी जरूरतें हैं, दोनों के अपने तर्क हैं, दोनों की अपनी शर्तें हैं जो पूरा करे वही फ्रेंड अन्यथा कोई दूसरा रिश्ता देखे।

अभी हमें इन रिश्तों की गहराई में जाना होगा और देखना होगा कि हम जिस समाज की कल्पना कर रहे हैं वह किस प्रकार के रिश्तों से बनता है? यह सार्वभौम सत्य है कि आज के युग में परिवारों के टूटने का चलन तेजी से बढ़ा है। लड़के और लड़कियों में कार्य करने की, घर से बाहर रह कर कुछ करने की इच्छा प्रबल हुई है ऐसे में अन्य जरूरतों के साथ-साथ शरीर ने भी अपनी जरूरत के अनुसार रिश्तों को स्वीकारना सीखा है। भारतीय संस्कृति के नाम की दुहाई देकर हम मात्र हल्ला मचाते रहते हैं पर मूल में जाने की कोशिश नहीं करते। बात हाथ से निकलती तब समझ में आती है जब हमारे सामने माननीय न्यायालय आकर खड़े हो जाते हैं, जैसा कि धारा 377 पर हुआ। फ्रेंड्स विद वेनिफिट्स को युवा वर्ग, वह वर्ग जिसकी ये जरूरत है स्वीकार चुका है क्योंकि समाज में एक बहुत बड़ा वर्ग आज प्रत्येक कार्य के ऊपर सेक्स को महत्व दे रहा है।


12 जून 2016

अभियान के नाम पर देह से खिलवाड़

विगत कुछ समय से स्त्री-सम्बन्धी मुद्दों पर या फिर स्त्री-केन्द्रित विषयों पर ज्यादा ही चर्चा देखने को मिल रही है. इस चर्चा में, विमर्श में स्त्री की आज़ादी की बात की जा रही है. उसके स्वतंत्र विचारों की बात हो रही है. उसके अस्तित्व पर बहस हो रही है. सोचकर, सुनकर अच्छा लगता है कि समाज में स्त्री, पुरुष दोनों ही स्त्री-विकास की, स्त्री-सशक्तिकरण की बात करने में लगे हैं. इस अच्छे-भले सुनने, महसूस करने के बीच यदि स्त्री-स्वतंत्रता, स्त्री-सशक्तिकरण के लिए उठाये गए मुद्दों पर दृष्टिपात करने पर कहानी कुछ और ही समझ आती है. स्त्री की आज़ादी की आवाज़ उठाने वाले विषयों में हैप्पी टू ब्लीड, फ्री सेक्स, मैरिटल रेप, उन्मुक्त शारीरिक सम्बन्ध, माहवारी पर चुप्पी तोड़ो, मंदिर प्रवेश आदि-आदि दिखाई देते हैं. कहीं, किसी तरफ से स्त्रियों के स्वावलंबन की बात नहीं होती है. किसी तरफ से स्त्रियों की आर्थिक आज़ादी की चर्चा नहीं होती है. कोई भी स्त्रियों के वास्तविक अधिकारों की बात करता नहीं दिखता है. ऐसा लगता है जैसे स्त्री की समूची दुनिया को देह के इर्द-गिर्द, सेक्स के आसपास, धर्म के चारों तरफ ही केन्द्रित कर दिया गया है. समाज में एक तरफ स्त्री-सशक्तिकरण की वकालत करने वाले, स्त्रियों के अधिकारों की चर्चा करने वाले, स्त्री-अस्तित्व की लड़ाई लड़ने वाले समाज पर ही आरोप लगाते हैं कि स्त्रियों को सदैव सेक्स और धर्म के नाम पर कैद किया जाता रहा; उसके अस्तित्व को छोटा करके दिखाया जाता रहा; महिलाओं की सोच को कुंठित करके रखा गया और इसके ठीक उलट उन्हीं के द्वारा स्त्री-आज़ादी के लिए धर्म और सेक्स को ही मुख्य बिन्दु बनाया जाता है.

समझने वाली बात है कि क्या सेक्स की आज़ादी से, देह की आज़ादी से, माहवारी की चुप्पी तोड़ने से स्त्री को वाकई आज़ादी मिल जाएगी? कहीं ये स्त्री-सशक्तिकरण का झंडा उठाये वर्ग द्वारा एक तरह का षड्यंत्र तो नहीं जो स्त्री को सेक्स और धर्म की चाशनी में लपेटकर उसी में बंधक बना देना चाहता है? हैप्पी टू ब्लीड से लेकर माहवारी पर चुप्पी तोड़ो पर इस तरह से होहल्ला मचाया गया जैसे कि स्त्री की आज़ादी की राह में यही सबसे बड़ा रोड़ा है. प्रतिमाह आने वाली इस शारीरिक प्रक्रिया के बारे में इस तरह से दुष्प्रचार किया जा रहा मानो इन पाँच दिनों में स्त्री को सिर्फ पुरुष ही बंधक बना लेता हो; सिर्फ पुरुष ही उसकी आवाज़ को खामोश कर देता हो. प्राकृतिक शारीरिक संरचना में अनिवार्यता के चलते उत्पन्न कतिपय दैहिक क्रियाविधि को घर-परिवार की महिलाओं द्वारा ही सबसे ज्यादा निशाने पर लिया जाता है. मंदिर में प्रवेश न करना, पूजादि धार्मिक कृत्य न करना, रसोई में घुसने, खाद्य-पदार्थ छूने की मनाही आदि-आदि सहित अनेक कार्यों से महिलाओं को महिलाओं द्वारा ही वंचित किया जाता है. स्त्री की देह को जिस तरह से प्रश्नवाचक चिन्ह लगा कर देखा जाता है, जिस तरह से उसकी शारीरिक सञ्चालन की प्राकृतिक गतिविधि को केन्द्रित करके स्त्री को लक्ष्य किया जाता है, उस सोच पर, उस गतिविधि पर नियंत्रण लगाये जाने की आवश्यकता है.


वर्तमान में जिस तरह का परिवेश समाज में बनता जा रहा है उसमें सेक्स को, स्त्री-देह को प्रमुखता दी जाने लगी है. किसी भी उत्पाद का विज्ञापन हो, किसी भी तरह का म्यूजिकल कार्यक्रम हो, कोई भी एलबम हो, क्रिकेट का मैदान हो सभी जगह किसी न किसी रूप में स्त्री-देह को सजा-संवार कर पेश किया जाता है. यदि इस तथ्य को ध्यान में रखा जाये तो कहीं ऐसा तो नहीं कि स्त्री से सम्बंधित इस तरह के संचालित अभियानों का कथित उद्देश्य उनकी देह को ही विमर्श के केंद्र में रखना हो? स्त्री देह से सम्बंधित विभिन्न समस्याओं का समाधान संभव हो कि सार्वजनिक सहभागिता से निकले किन्तु इस तरह के सार्वजनिक अभियानों से कतई नहीं निकलने वाला. ये अभियान विवाद पैदा करने के अलावा और कुछ नहीं कर रहे हैं. सोचिये एक मिनट रुक कर कि हैप्पी टू ब्लीड से किस तरह का सन्देश दिया गया? फ्री सेक्स के द्वारा किस तरह से संबंधों की वकालत की जा रही है? मैरिटल रेप जैसी अवधारणा से क्या दाम्पत्य जीवन सुखमय बनेगा? माहवारी पर चुप्पी किससे तोड़नी होगी और कैसे? बेहतर हो कि ऐसे विषयों पर सकारात्मक चर्चा हो न कि प्रचार की तरह इन्हें इस्तेमाल किया जाये. माहवारी जैसे विषयों को, सेक्स जैसे विषयों को समाज की गति को देखते हुए, उसके परिवेश को देखते हुए पाठ्यक्रम में शामिल किया जाये. अपनी देह के गोपन को जानना-समझना प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है किन्तु ये किसी का अधिकार नहीं कि वो स्वतंत्रता के नाम पर दूसरे की देह से खेलने का कार्य करे. 

03 जनवरी 2016

माताओं का चरित्रहनन है ये आरोप


‘चयन के बदले डीडीसीए के चयनकर्ता द्वारा सेक्स की माँग की गई’ जैसे आरोप की गम्भीरता को समझने की आवश्यकता है. इस आरोप को सामान्य आरोप अथवा झूठा बयान कहकर विस्मृत नहीं किया जा सकता है क्योंकि ऐसे आरोप की जानकारी किसी सामान्य व्यक्ति द्वारा नहीं दी गई है. संवैधानिक पद पर बैठे, मुख्यमंत्री जैसे जिम्मेवार पद पर बैठे किसी व्यक्ति द्वारा यदि इस तरह के आरोप का खुलासा किया जा रहा है तो ऐसे आरोप को आपसी विवाद कहकर नजरंदाज़ नहीं किया जा सकता है. दिल्ली मुख्यमंत्री के सचिव के कार्यालय पर सीबीआई के छापे के तत्काल बाद ही जागृत अवस्था में आये दिल्ली मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली को डीडीसीए के घोटालों में घेरने का प्रयास किया. इसी प्रयास में वे खिलाड़ी के चयन के बदले सेक्स की माँग जैसे आरोप को सामने रखने से भी नहीं चूके. ये आरोप जितनी सपाट तरीके से डीडीसीए चयनकर्ताओं पर लगाया गया उतनी ही सपाट तरीके से इसे भुला सा दिया गया. इस आरोप की गम्भीरता पर न तो डीडीसीए की तरफ से ध्यान दिया गया और न ही स्वयं दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल द्वारा दिया गया. इस तरह के आरोप के द्वारा भले ही केजरीवाल ने डीडीसीए को अथवा जेटली को घेरने का प्रयास किया हो किन्तु इसे हलके में नहीं लिया जा सकता है. प्रत्यक्ष रूप से न सही किन्तु अप्रत्यक्ष रूप से ही केजरीवाल ने अनेकानेक चयनकर्ताओं की माँओं के चरित्र पर सवालिया निशान लगा दिए. डीडीसीए चयनकर्ताओं ने मात्र उसी एक खिलाड़ी का चयन नहीं किया होगा, यदि सेक्स की माँग सही है तो केवल उसी के खिलाड़ी की माँ से नहीं की गई होगी और यदि ऐसा कोई भी आरोप असत्य है तो भी कितनी-कितनी महिलाओं, कितने-कितने खिलाडियों को शर्मसार होना पड़ रहा होगा इसका अंदाजा स्वयं केजरीवाल को नहीं होगा.
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ऐसे आरोप की जानकारी होने के बाद भी केजरीवाल का शांत होकर बैठ जाना अपने में एक अलग कहानी कहता है. जैसा कि उनके द्वारा बताया गया कि एक पत्रकार ने उनको ऐसी जानकारी दी तो उन्हें समूचे घटनाक्रम को स्वयं संज्ञान में लेते हुए डीडीसीए के चयनकर्ताओं के खिलाफ जाँच बैठानी चाहिए थी. और यदि इस तरह की बयानबाज़ी में कोई सत्यता नहीं है तो केजरीवाल ने न केवल समूचे लोकतंत्र का अपमान किया है बल्कि तमाम महिलाओं का अपमान किया है, देश की प्रतिभाओं का भी अपमान किया है. मुख्यमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के द्वारा ऐसी जानकारी देने के बाद भी किसी तरह की जाँच न करना इसे कपोलकल्पित सिद्ध करता है. यदि ऐसा महज राजनैतिक कटुता के कारण किया गया है तो घिनौनी राजनीति का इससे बड़ा उदाहरण कहीं और नहीं मिलेगा. ऐसे बयान के बाद भी आश्चर्य देखिये कि किसी भी जागरूक महिला संगठन की तरफ से, न किसी राजनैतिक दल की तरफ से, न डीडीसीए की तरफ से, न किसी पत्रकार संगठन की तरफ से इसका कोई विरोध नहीं किया गया है. ये समझाने के लिए ही पर्याप्त है कि किस तरह से राजनीति में महिलाओं को सम्मान दिया जा रहा है. किसी वरिष्ठ राजनीतिक द्वारा सौ टका टंच माल से लेकर एक मुख्यमंत्री द्वारा सेक्स की माँग के बयान तक उतर आना समूची स्थिति को स्पष्ट करता है.
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अपने आन्दोलन के बाद से जिस तरह से केजरीवाल और उनकी टीम ने लोकप्रियता हासिल की थी वो उनके क्रियाकलापों के चलते लगातार कम होती जा रही है. उनके समर्थक भले ही कुछ भी कहते रहें किन्तु आम आदमी पार्टी की रैली में एक किसान की आत्महत्या के प्रयास में मृत्यु हो जाना, दिल्ली में हुए रेप कांड के नाबालिग आरोपी को रिहाई पश्चात् आर्थिक सहायता उपलब्ध करवाए जाने सम्बन्धी बयान, आम आदमी पार्टी के मंत्रियों, नेताओं का कई-कई आपराधिक मामलों में लिप्त पाया जाना, मुख्यमंत्री के सचिव के कार्यालय से विदेशी मुद्रा का मिलना और अब स्वयं मुख्यमंत्री केजरीवाल द्वारा महिलाओं, खिलाडियों के चरित्र को घेरे में खड़ा कर देना अत्यंत क्षोभजनक है. केजरीवाल को समझना चाहिए कि दिल्ली का मुख्यमंत्री होना किसी राज्य का मुख्यमंत्री होना भर नहीं है; देश की राजधानी होने के कारण वैश्विक दृष्टि दिल्ली में लगी रहती है. उनके इस बयान के दीर्घगामी परिणाम/दुष्परिणाम क्या होंगे ये तो आने वाला समय बताएगा किन्तु इस तरह के बयान को देने और फिर किसी भी तरह की कार्यवाही न करना उनकी क्षुद्र मानसिकता को ही दर्शाता है. राजनीति में विभिन्न दलों के बीच, विभिन्न व्यक्तियों के मध्य आपसी वाद-विवाद चलते ही रहते हैं किन्तु राजनैतिक विवाद में जिस तरह के कदम केजरीवाल द्वारा अथवा उनके अन्य नेताओं द्वारा उठाये जाते रहे हैं वे निंदनीय हैं. कहीं न कहीं ‘राजनीति बदलने आये हैं’ जैसे उनके बयान की ही बखिया उधेड़ते हैं. यहाँ इन नेताओं को नहीं वरन उन महिलाओं को सजग होने की आवश्यकता है जो जरा-जरा सी बात को महिलाओं की इज्जत से जोड़ते हुए वितंडा खड़ा करने लगती हैं. केजरीवाल ने जो कुछ कहा है वो महज बयान नहीं, महज एक आरोप नहीं बल्कि अनेकानेक माताओं का चरित्रहनन है.

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