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29 जुलाई 2026

तकनीकी दौर में भी गुरु की प्रासंगिकता

 

भारतीय संस्कृति में आदिगुरु के रूप में पूजनीय महर्षि वेद व्यास के जन्मदिन के रूप में मनाया जाने वाला पर्व गुरु पूर्णिमा हमारी महान ज्ञान परम्परा के स्मरण का पवित्र अवसर है. भारतीय संस्कृति में अनादिकाल से गुरु-शिष्य परम्परा का गौरवशाली स्थान रहा है. इसी कारण से अज्ञानता के अंधकार को चीरकर मानवता को विवेक-मुक्ति का मार्ग दिखाने वाले गुरुओं के सम्मान में आषाढ़ मास की पूर्णिमा को श्रद्धा और उल्लास के साथ गुरु पूर्णिमा पर्व मनाया जाता है.

 

भारतीय संस्कृति में ज्ञान को एक तरह की ऊर्जा के रूप में परिभाषित किया गया है. भारतीय मनीषियों ने इसे जीवन की समग्रता को जानने-समझने की एक प्रक्रिया माना है. इसे ऐसी चेतना बताया है जो गुरु मुख से शिष्य के हृदय की ओर संचरित होती है. गुरु-शिष्य की इस परम्परा में ज्ञान और आचरण में किसी तरह का विभेद स्वीकारा नहीं गया है. कथनी और करनी में विभेद न होने को ही शिक्षा माना गया है. गुरु-शिष्य परम्परा के कारण भारतीय संस्कृति में गुरु का सम्मान सामाजिक शिष्टाचार के रूप में स्वीकार्य नहीं रहा है बल्कि इसे आध्यात्मिक साधना के रूप में स्वीकारा गया है. गुरुब्रह्मा गुरुविष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः, गुरुः साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः के रूप में यह बताया गया है कि समस्त शक्तियों का ज्ञान और उनका बोध कराने वाला माध्यम गुरु ही है और ऐसा माध्यम ईश्वर से भी उच्च पद पर है. गुरु ही है जो इंसान के भीतर की कुंठा, अहंकार, अज्ञानता, लालच, विद्वेष आदि को समाप्त करता है. उसके ऐसे परिष्करण से ही किसी भी शिष्य की आंतरिक प्रतिभा पूर्ण रूप से प्रस्फुटित होने लगती है.

 

समय के साथ गुरु-शिष्य परम्परा में भी परिवर्तन देखने को मिले हैं. इक्कीसवीं सदी के संदर्भ में देखें तो सम्पूर्ण विश्व तकनीकी विकास, उपभोक्तावाद, वैश्वीकरण आदि के दौर से गुजर रहा है. आज का युग सूचनाओं का युग बन गया है. इंटरनेट, गूगल, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आदि के इस दौर में ज्ञान किसी एक व्यक्ति के अधिकार क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा है. हर हाथ में डिवाइस ने एक क्लिक पर व्यक्ति के सामने वैश्विक जानकारी का भंडार लगा दिया है. यहाँ यह समझना बहुत आवश्यक है कि हमारे सामने एक क्लिक पर जानकारी आ रही है अथवा ज्ञान? हमें इस तकनीकी रफ़्तार वाले युग में यह भी समझना होगा कि उँगलियों के सहारे स्क्रॉल करती जानकारी हमारे लिए वाकई लाभकारी है अथवा हम अनावश्यक जानकारियों का भंडार-गृह बनते जा रहे हैं? तकनीकी के बदलते दौर में, शिक्षा के बदलते आयामों के युग में लोगों के मन में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या इस तकनीकी युग में गुरु की प्रासंगिकता शेष है?

 

इस प्रश्न के उत्तर के पूर्व हम सभी को वर्तमान सन्दर्भों में सूचनाओं का, आँकड़ों का सुलभता से मिलना और उसके उपयोग के बारे में सोचना, विचार करना पड़ेगा. भले ही तकनीकी माध्यमों से सूचनाएँ, आँकड़े, जानकारियाँ कितनी भी सुलभता से क्यों न उपलब्ध हो जाएँ किन्तु वे कभी भी ज्ञान का, बोध का का स्थान नहीं ले सकती हैं. अब जबकि मशीनी तकनीकी से जानकारियाँ तो उपलब्ध हो जा रही हैं मगर उनके उपयोग पर, उनके समायोजन पर, व्यक्ति के समन्वय पर, इंसानी चरित्र पर सवालिया निशान तो लग ही रहे हैं. तीव्र तकनीकी विकास के चलते जिस तरह से आज का युवा उन्मादित होकर भटकता; सोशल मीडिया के भ्रामक मायाजाल में फँसा हुआ; एकाकीपन से भरा हुआ; मानसिक अवसाद से गुजरता हुआ; तनाव से जूझता दिख रहा है तब वास्तविक गुरु की आवश्यकता और अधिक महसूस होने लगी है.

 

आज शिक्षा व्यवस्था को एक व्यावसायिक उत्पाद बना दिया गया है; शिक्षण संस्थानों को पाठ्यक्रम पूरा करवाने और डिग्री बाँटने का केन्द्र बना दिया गया है; चरित्र निर्माण, मूल्य-शिक्षा, नैतिकता, समन्वय, भावनात्मकता आदि का लोप होता दिखने लगा है तब समझ आ रहा है कि आधुनिक शिक्षा प्रणाली ने केवल सफल व्यक्ति बनाने का प्रयास किया है न कि संवेदनशील मनुष्य बनाने का. ऐसे व्यावसायिक दौर में गुरु-शिष्य का पवित्र रिश्ता विक्रेता और क्रेता के रूप में बदलता जा रहा है. कोचिंग संस्थानों, शिक्षा के बाजार ने सम्बन्धों की, रिश्तों की मर्यादा को, गरिमा को नष्ट कर दिया है. इस विकृति के बीच गुरु पूर्णिमा का पर्व मूल जड़ों की ओर लौटने की प्रेरणा देता है. यह पर्व हमें इस बात का भी एहसास कराता है कि भारतीय संस्कृति में केवल मनुष्य को ही गुरु के रूप में नहीं स्वीकारा गया है बल्कि प्रकृति, जीव-जन्तु, घटनाओं आदि को भी गुरु रूप में स्वीकारा गया है.

 

आज के डिजिटल युग में गुरु को वेदों, शास्त्रों, पौराणिक ग्रंथों के ज्ञाता  के रूप में नहीं बल्कि एक मार्गदर्शक, परामर्शदाता, जीवन-प्रशिक्षक की भूमिका में देखने की आवश्यकता है. समय बदलने के साथ-साथ गुरु का स्वरूप, उसकी भूमिका में भी परिवर्तन लाने की आवश्यकता है. आज भले ही ऑनलाइन माध्यमों से शिक्षण कार्य सम्पन्न होने लगा हो किन्तु यह समझना होगा कि तकनीकी प्रगति के बीच भी गुरु-शिष्य के बीच का मानवीय रिश्ता, संवेदना, नैतिक ऊर्जा का संस्कार विलुप्त न हो पाए. एक वास्तविक गुरु केवल विषयों को पढ़ाने का काम नहीं करता है बल्कि वह विद्यार्थियों के मन में उठने वाले संशयों का शमन करता है. अपने शिष्यों को सही और गलत के बीच का भेद समझा कर संकटकाल में नैतिक संबल प्रदान करता है. वर्तमान सन्दर्भों में ऐसे गुरुओं की आवश्यकता है जो तकनीकी कौशल के साथ-साथ करुणा, सहानुभूति, सहनशीलता, सहयोग, सामाजिक उत्तरदायित्व आदि जैसे मानवीय मूल्य भी सिखाएँ.

 

कह सकते हैं कि गुरु पूर्णिमा का पर्व अतीत की वंदना करने का ही नहीं बल्कि भविष्य के प्रति संकल्पित होने का दिन भी है. यह पर्व हमें याद दिलाता है कि भले ही युग बदल जाए, तकनीक विकसित हो जाए, जीवन की प्राथमिकताएँ बदल जाएँ परंतु मानव जीवन में गुरु की आवश्यकता सदैव रहेगी. व्यक्ति को सही दिशा देने के लिए एक प्रकाशपुंज, मार्गदर्शक, गुरु का होना अनिवार्य है. जब तक समाज में अज्ञान, द्वेष, अहंकार, भटकाव आदि रहेगा तब तक गुरु की प्रासंगिकता भी रहेगी.

05 नवंबर 2025

नैक के प्रति सुस्त चाल

भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों (कॉलेज, विश्वविद्यालय आदि) का मूल्यांकन और प्रमाणन का कार्य राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (National Assessment and Accreditation Council) द्वारा किया जाता है. संक्षेप में इसे नैक से सम्बोधित किया जाता है. यह यूजीसी का एक स्वायत्त निकाय है जिसकी स्थापना 1994 में हुई थी. नैक के द्वारा गुणवत्ता के मानकों के अनुरूप संस्थानों की ग्रेडिंग करना है. ऐसा किये जाने के पीछे मुख्य उद्देश्य यह था कि विद्यार्थियों को सही संस्थान चुनने में मदद मिले.

 

नैक के मुख्य कार्यों और उद्देश्यों में शैक्षणिक संस्थाओं की मान्यता को उनके मूल्यांकन के आधार पर की गई ग्रेडिंग से किया जाना है. शिक्षण क्षेत्र में उच्च शिक्षा से सम्बंधित संस्थाओं, चाहे वे महाविद्यालय हों अथवा विश्वविद्यालय सभी का मूल्यांकन नैक द्वारा किया जाता है.

 

इसके माध्यम से सुनिश्चित किया जाता है कि संस्थान गुणवत्ता मानकों को पूरा करते हैं अथवा नहीं. इन मानकों में पाठ्यक्रम, शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया, अनुसंधान, बुनियादी ढाँचा आदि के साथ-साथ अध्यापकों और विद्यार्थियों से सम्बंधित सुविधाओं और मूलभूत ढाँचे को शामिल किया जाता है.

 



विगत वर्षों में नैक को लेकर लगातार उठाये जाने वाले कदमों के बाद भी उच्च शिक्षण संस्थाओं में नैक मूल्यांकन करवाने को लेकर जागरूकता न के बराबर है. नैक मूल्यांकन प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कदम उठा रहा है. इसके लिए उसके द्वारा ऑनलाइन और हाइब्रिड मॉडल जैसी नई रणनीतियाँ शामिल हैं किन्तु निजी संस्थाएँ हों अथवा सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाएँ, सभी नैक करवाने में अभी बहुत पीछे हैं. उत्तर प्रदेश में यह स्थिति तो और भी सोचनीय है. 

 


01 नवंबर 2025

MMTTP के लिए ड्यूटी लीव मिलने का प्रावधान

MMTTP के द्वारा करवाये जाने कोर्स/प्रोग्राम के लिए ड्यूटी लीव मिलने का प्रावधान यूजीसी की तरफ़ से किया गया है.



मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम (MMTTP) का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों के शिक्षकों को आधुनिक शिक्षण पद्धतियों और नेतृत्व कौशल से सशक्त बनाना है. यह कार्यक्रम राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 की सिफारिशों को लागू करने पर केन्द्रित है. इस प्रशिक्षण का लक्ष्य शिक्षकों की क्षमताओं को बढ़ाना और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना है. इसमें ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरह के प्रशिक्षण शामिल किये गए हैं. 


बहुत सी संस्थाओं में देखने में आ रहा है कि इस कोर्स में सहभागिता करने वाले प्राध्यापकों को उन उच्च शिक्षण संस्थाओं के प्राचार्यों द्वारा अवकाश प्रदान नहीं किया जा रहा है. ऐसे में प्राध्यापकों द्वारा अध्यापन कार्य के लिए संस्था में उपस्थित रहने के दौरान ही इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में सहभागिता करना पड़ता है. ऐसे में जहाँ अध्यापन कार्य भी प्रभावित होता है वहीं इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के उद्देश्य में भी बाधा उत्पन्न होती है. 


इसी को देखते हुए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम में सहभागिता करने पर अवकाश का प्रावधान किया गया है. 


04 सितंबर 2025

मशीनी शैक्षिक दौर में शिक्षकों का महत्त्व

विकास के परिवर्तनशील चरणों में शिक्षा क्षेत्र में भी अनेक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए. शिक्षा व्यवस्था परिवर्तनों के दौर में गुरुकुल पद्वति से निकल कर ई-लर्निंग तक आ गई है. इसके बाद भी समाज से शिक्षकों के महत्त्व को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है. जब तकनीकी विकास आज की तरह नहीं था तब शिक्षकों के पास अपने विद्यार्थियों की समस्त प्रकार की समस्याओं के समाधान करने की महती जिम्मेदारी हुआ करती थी. आज जबकि तकनीकी विकास हाथों-हाथों में मोबाइल, लैपटॉप के माध्यम से सुसज्जित है तब भी शिक्षकों की जिम्मेदारी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. किसी भी शिक्षक का काम विद्यार्थियों को उसकी पुस्तक को समाप्त करवा देना मात्र नहीं है, उसका दायित्व सिर्फ पाठ्यक्रम को पूरा करवा देना मात्र नहीं है. ऐसा होना भी नहीं चाहिए. प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च स्तरीय शिक्षा के समस्त सोपानों में शिक्षक की जिम्मेदारी बनती है कि वह भावी पीढ़ी को राष्ट्र-निर्माण की दिशा में कार्य करने की मानसिकता से निर्मित करे. अध्यापन कार्य के पीछे की मूल भावना के अनुसार एक शिक्षक को किसी उत्पाद का निर्माण नहीं करना है वरन वह एक नागरिक तैयार करना है, एक व्यक्तित्व का विकास करना है.

 

आज जबकि तकनीकी विकास के दौर में ई-लर्निंग, ई-मैटर आदि के द्वारा शिक्षा देने की बात होने लगी है. वैश्वीकरण के आधुनिक दौर में कम्प्यूटर, मोबाइल, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, पॉवर पॉइंट प्रेजेंटेशन, ई-मेल, मैसेज, सोशल-मीडिया आदि को ही शिक्षक मान लिया गया है. ये मशीनी अंग शिक्षक के सहायक उपकरण तो हो सकते हैं किन्तु किसी शिक्षक का स्थान नहीं ले सकते हैं. मशीनीकृत शिक्षा व्यवस्था, ऑनलाइन क्लासेज के माध्यम से किसी विषय को भले ही सहजता से समझाया जा सकता हो किन्तु किसी व्यक्ति में उसके व्यावहारिक लक्षणों को विकसित नहीं किया जा सकता है. तकनीकी रूप से मशीनी शिक्षा के प्रति आसक्ति ने विद्यार्थियों में सहनशीलता, सामूहिकता, सांगठनिकता, बड़ों के प्रति सम्मान, समाज के प्रति दायित्व-बोध, परोपकार की भावना आदि को कम करने के साथ-साथ लगभग समाप्त ही किया है. ऐसा होने के कारण आज समाज में बच्चों को, नवयुवकों को बड़ी संख्या में अवसाद में जाते देखा जा सकता है. नवयुवकों की बहुत बड़ी संख्या नशे की गिरफ्त में जा रही है. जरा-जरा सी बात में नाकामी मिलने पर निराशा छा जाना और उसकी तीव्रता इतनी बढ़ जाना कि उनका आत्महत्या करने को प्रवृत्त होना आदि आज आम होता जा रहा है. तकनीक को हाथ में लिए घूमने वाली पीढ़ी को लगता है कि वह अपने साथ ज्ञान का सीमित भंडार लेकर चल रहा है, ऐसे में उसे किसी शिक्षक की आवश्यकता नहीं है. देखा जाये तो किसी भी तरह का तकनीकी विकास किसी भी शिक्षक की महत्ता को कम नहीं कर सकता है.

 

सत्यता यही है कि मशीन ज्ञान तो दे सकती है किन्तु आत्मविश्वास नहीं जगा सकती. ई-लर्निंग से घर बैठे विषय से सम्बंधित जानकारी मिल सकती है किन्तु उसकी अभिव्यक्ति का तरीका नहीं मिल सकता. बचपन से संस्कार, आत्मविश्वास, जिज्ञासा, सामूहिकता, समन्यव, सहयोग आदि की जिस भावना का विकास एक शिक्षक करता है वह किसी और के द्वारा नहीं हो सकता है. यही कारण है कि आज भी बच्चों को विद्यालय भेजने की परंपरा का निर्वहन सभी के द्वारा किया जा रहा है, भले ही वह उच्च स्तरीय शिक्षा व्यवस्था को अपनी भौतिकता के चलते घर में स्थापित करवा सकता हो. तकनीक के साथ विकास करते समाज को शिक्षकों के महत्त्व को समझते हुए नई पीढ़ी को भी इनके महत्त्व को समझाना होगा.

 


27 जून 2025

विलय नहीं समस्या का समाधान हो

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पचास से कम नामांकन वाले प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों का नजदीकी विद्यालयों में विलय करने का निर्णय लिया है. ऐसे विद्यालयों की संख्या हजारों में है जहाँ पर नामांकन पचास से कम है. यदि नामांकन कम है तो उसे बढ़ाया जाये न कि विद्यालय का विलय कर दिया जाये, उसे बंद कर दिया जाये. वैसे भी सरकारों की प्राथमिकता बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना होता है. न केवल सरकारों द्वारा बल्कि विश्व बैंक द्वारा भी अनेक योजनाओं को क्रियान्वित किया गया जिनसे बच्चों को विद्यालय लाया जा सके. संविधान में 86वाँ संशोधन कर शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया गया. निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम अथवा शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के अन्तर्गत छह से चौदह वर्ष की आयु वर्ग के बालक-बालिकाओं को निःशुल्क प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है. सर्व शिक्षा अभियान के अन्तर्गत प्राथमिक शिक्षा से वंचित बस्तियों में विद्यालय खोले गए. इन सकारात्मक कार्यों, योजनाओं के बीच सरकार द्वारा शारदा (स्कूल हर दिन आयें) योजना क्रियान्वित है. इसमें छह से चौदह वर्ष की आयु वर्ग के ऐसे बालक-बालिकाओं का नामांकन होगा, जो किसी विद्यालय में नामांकित नहीं हैं अथवा नामांकन के बाद भी अपनी प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण नहीं कर सके. ऐसे बच्चों को चिन्हित कर उनका नामांकन नजदीकी विद्यालयों में आयु-संगत कक्षा में कराया जायेगा और शिक्षा से लेकर प्रत्येक सामग्री निःशुल्क उपलब्ध करायी जाएगी.  

 



बच्चों तक शिक्षा की सुलभता सम्बन्धी योजनाओं के बाद भी यदि सरकार को विद्यालयों का विलय करना पड़े तो स्थिति न केवल गम्भीर है बल्कि चिन्तनीय भी है. सरकार को नामांकन कम होने के कारणों-कारकों को खोजा जाना चाहिए. उन बिन्दुओं पर विचार करना चाहिए जो प्राथमिक विद्यालयों, उच्च प्राथमिक विद्यालयों के नामांकन को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहे हैं. विद्यालयों का विलय सिर्फ एक विद्यालय बंद होना नहीं होगा बल्कि यह अनेक दुष्परिणामों को साथ लेकर आएगा. सबसे बड़ा दुष्प्रभाव बच्चों की शिक्षा पर ही दिख रहा है. उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग के हाउसहोल्ड सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार 2020-21 में 4.81 लाख, 2021-22 में 4 लाख से अधिक और 2022-23 में 3.30 लाख बच्चों ने बीच में स्कूल छोड़ दिया. एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में स्कूल छोड़ने की दर अन्य प्रदेशों की तुलना में अधिक है. इसमें भी लड़कियों का प्रतिशत लड़कों की अपेक्षा अधिक है.

 

विद्यार्थियों का बड़ी संख्या में विद्यालय छोड़ना, नामांकन न करवाना चिन्ता का विषय है. सामाजिक-आर्थिक कारक, गरीबी, लैंगिक विभेद, शिक्षकों की कमी, बुनियादी ढाँचे की समस्या, शिक्षा में अरुचि, बाल श्रम का प्रचलन, अन्य सामजिक समस्याएँ आदि ड्रॉपआउट का कारण बनती हैं. ऐसे में विचार किया जाये कि जब बच्चे अपने ही गाँव में अथवा न्यूनतम दूरी पर बने विद्यालय नहीं जा रहे हैं, तो उनसे कैसे अपेक्षा की जा सकती है कि वे कुछ किमी दूर स्थित विद्यालय जायेंगे? विद्यालयों का दूर होना बालिकाओं के लिए और बड़ी समस्या होगी. निम्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि, घरेलू ज़िम्मेदारियाँ, सुरक्षा चिंताओं आदि के कारण उनकी शिक्षा पर पहले से ही संकट छाया रहता है. विद्यालय विलय पश्चात् उनके स्कूल छोड़ने की आशंका और ज़्यादा है. इसके साथ-साथ शिक्षकों के पदों की कटौती, नई शिक्षक भर्ती पर संकट, रसोइयों, शिक्षामित्रों का असुरक्षित भविष्य भी इसी से सम्बद्ध है.

  

यदि कम नामांकन पर ध्यान दें तो सरकारी नियम और कार्य-प्रणाली भी इसके लिए जिम्मेदार है. शिक्षा का अधिकार अधिनियम में प्रावधान के बावजूद सरकारी प्राथमिक विद्यालय के एक किमी परिक्षेत्र में खुलेआम निजी विद्यालयों को मान्यता दी जा रही है. निजी विद्यालयों का लगातार बड़ी संख्या में खुलते जाना और अधिनियम के अन्तर्गत गरीब विद्यार्थियों को प्रत्येक निजी विद्यालय द्वारा अपने यहाँ निशुल्क प्रवेश देने की बाध्यता भी कम नामांकन का एक कारक है. नियमानुसार निजी विद्यालयों द्वारा गरीब विद्यार्थियों को प्रवेश देने पर सरकार द्वारा निजी विद्यालयों को प्रतिपूर्ति शुल्क दिया जाता है, अभिभावकों को भी एक निश्चित राशि प्रदान की जाती है. इस आर्थिक पक्ष के कारण अभिभावकों, निजी विद्यालयों ने विद्यार्थियों को प्राथमिक विद्यालयों से दूर कर दिया. इसी तरह सरकारी प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश आयु छह वर्ष और निजी विद्यालय में तीन-चार वर्ष होने के कारण भी नामांकन पर असर पड़ा है. इसके चलते भी बहुत से माता-पिता अपने बच्चों को सरकारी विद्यालय के स्थान पर निजी विद्यालय में प्रवेश दिला देते हैं. इनके अलावा शिक्षकों की कमी, शिक्षकों का दूसरे सरकारी कार्यों में व्यस्त रहना, विद्यालयों में प्राथमिक सुविधाओं की कमी होना, स्मार्ट क्लासेज की शून्यता आदि भी कम नामांकन के लिए उत्तरदायी बिन्दु हैं.

 

विद्यालयों का विलय स्थायी अथवा दीर्घकालिक समाधान नहीं है. इसकी गारंटी कौन लेगा कि भविष्य में विलय किये गए विद्यालय में कम नामांकन नहीं होगा? ऐसे में विचारणीय बिन्दु यह होना चाहिए कि उन कारणों का पता लगाकर उनका समाधान किया जाये जिनके कारण विद्यालयों में कम नामांकन हो रहा है. सरकार को चाहिए कि विद्यालयों के मूलभूत ढाँचे को सुव्यवस्थित करे. शिक्षकों की कमी को पूरा करने के साथ अन्य कार्यों के लिए अलग से कर्मचारियों की नियुक्ति करे. कक्षाओं को विकसित बनाया जाये तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हेतु नवीनतम तकनीकों से विद्यार्थियों को परिचित कराया जाये. सरकारी नीतियों, योजनाओं को सहज तरीके से अनुपालन योग्य बनाया जाये ताकि अभिभावक परेशान न हों. सरकार प्राथमिक शिक्षा क्षेत्र में आ रही समस्या का समाधान करे, लगातार गहराते जा रहे रोग का इलाज करे न कि सम्बंधित अंग को ही काट कर अलग कर दे. शिक्षक संगठनों, अभिभावकों द्वारा इस निर्णय का विरोध किये जाने के बाद सरकार से अपेक्षा की जा सकती है कि वह अपने निर्णय पर पुनर्विचार करके शिक्षा को सुलभ, सहज बनाने का प्रयास करेगी. सरकार को ध्यान रखना चाहिए कि उसका लक्ष्य बच्चों को शिक्षा उपलब्ध करवाना है न कि उनको शिक्षा से वंचित करना, इसके लिए उसे अतिरिक्त आर्थिक बोझ ही क्यों न उठाना पड़े.

 


23 फ़रवरी 2025

शिक्षकों पर कार्यवाई से पहले अनुमति लेना जरूरी

अशासकीय शिक्षण संस्थानों में आये दिन वहाँ के शिक्षक प्रबंधन समिति, संस्थान प्रमुख (प्राचार्य/प्रधानाचार्य) की तानाशाही का शिकार होते रहते हैं. इस सम्बन्ध में कई बार शिक्षकों की ओर से अपनी समस्या को सरकार के समक्ष रखा भी गया. शिक्षकों के विरुद्ध कार्यवाही करने की मंशा को लेकर इस बार विधान परिषद् उत्तर प्रदेश सभापति कुँवर मानवेन्द्र सिंह द्वारा सकारात्मक पहल की गई है. उनके द्वारा निर्देशित किया गया है कि अब बिना अनुमति लिए शिक्षकों के विरुद्ध कार्यवाही नहीं की जा सकेगी. प्रबंध तंत्र द्वारा निलंबन, सेवा समाप्ति जैसे कदम उठाये जाने के पहले शिक्षा सेवा चयन आयोग से अनुमति लेनी होगी. 


बात-बात पर उच्चाधिकारियों को कार्यवाही हेतु प्रेषित करने की धमकी देने वालों के दिमाग़ अब सन्तुलन की स्थिति में आ जाएँगे.

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अमर उजाला
22-02-2025




13 अक्टूबर 2024

शोध-आलेखों में सन्दर्भ लेखन

अकादमिक क्षेत्र में लेखन का बहुत महत्त्व है. वर्तमान में अनेक नीतियों के चलते न केवल शोधार्थियों के लिए बल्कि प्राध्यापकों के लिए भी लेखन महत्त्वपूर्ण हो गया है. जहाँ शोधार्थियों के शोध-कार्य हेतु शोधपरक लेखन को अनिवार्य जैसा किया गया है वहीं उच्च शिक्षा क्षेत्र से सम्बंधित प्राध्यापकों के लिए शोधपरक लेखन को उनकी अकादमिक योग्यता से जोड़ दिया गया है. शोध कर रहे विद्यार्थियों के लिए तो अपने शोध ग्रन्थ को लिखते समय उनसे अपेक्षा ही की जाती थी कि वे शोधपरक आलेख लिखेंगे. अब प्राध्यापक वर्ग के लिए भी एक तरह की अनिवार्यता लगा दी गई है कि वे अपनी अकादमिक प्रोन्नति हेतु स्वयं भी शोधपरक लेखन हेतु तत्पर रहेंगे. शोधपरक लेखन को, उसके प्रकाशन को प्राध्यापक वर्ग हेतु उनके मूल्यांकन से जोड़ दिया गया है. अब इनकी अकादमिक प्रोन्नति हेतु, उनकी अकादमिक योग्यता के लिए एपीआई के लिए लेखन को, शोधपरक लेखन को वरीयता दी जा रही है.

 

आलेख और शोध-आलेख में बहुत बड़ा अंतर नहीं है. इसे मात्र इतने से परिचयात्मक रूप में समझा जा सकता है कि जिस आलेख के साथ सन्दर्भ जुड़े हुए हैं, उसे शोध-आलेख कहते हैं. इसका सीधा सा अर्थ है कि उस आलेख में अपनी बात को प्रामाणिक ढंग से कहा गया है अथवा किसी तरह की शोध का उल्लेख किया गया है. इसके अलावा सन्दर्भ रहने पर आलेख विश्वसनीय बन जाता है. किसी आलेख में सन्दर्भों का होना उस लेखक के शोध कार्य को भी प्रमाणित करते हुए विश्वसनीय बनाता है. इसके साथ-साथ आलेख में सन्दर्भों का होना लेखक की लेखकीय योग्यता को, उसकी क्षमता को, प्रतिभा को, मेहनत को भी प्रदर्शित करता है.

 



सन्दर्भों के होने की स्थिति के साथ-साथ अक्सर न केवल शोधार्थियों में बल्कि प्राध्यापकों में भी इसे लेकर संशय की स्थिति रहती है कि उनके द्वारा सन्दर्भों का उल्लेख कहाँ किया जाये, किस तरह किया जाये? ये समस्या अब और जटिल होती समझ आने लगी है जबकि शोध कार्यों को लेकर, शोध-प्रबंधों को लेकर, शोध-आलेखों को लेकर लगातार एकसमान नीति पर जोर दिया जाने लगा है. शोध-आलेख के साथ सन्दर्भ लिखने के कुछ अलग-अलग तरीके लेखकों द्वारा प्रयोग में लाये जाते रहे हैं. कुछ लेखक आलेख में यथास्थान सन्दर्भों का उल्लेख करते हैं. ऐसा करने पर पाठकों के लिए अवरोध उत्पन्न होता है. इस अवरोध का बचाव करने के लिए सन्दर्भों को शोध-आलेख के अंत में अथवा प्रत्येक पृष्ठ पर सबसे नीचे दिए जाने की व्यवस्था को एकसमान रूप से स्वीकार किया गया. ऐसे सन्दर्भ जो प्रत्येक पृष्ठ पर नीचे दिए जाते हैं, उन्हें पाद-टिप्पणी/फुटनोट (Footnote) कहते हैं और जो सन्दर्भ आलेख के अन्त में एक ही जगह दिए जाते हैं उनको अन्त-टिप्पणी/एंडनोट (Endnote) कहते हैं. शोध-आलेखों की प्रमाणिकता, महत्ता के लिए इस तरह के दो सन्दर्भों में से किसी एक सन्दर्भ का होना आवश्यक है. बिना सन्दर्भ के लिखे गए लेख को शोध-आलेख के रूप में मान्यता नहीं मिलती है. ऐसे आलेख की कोई विश्वसनीयता भी नहीं होती है.

 

किसी भी शोध-आलेख में सन्दर्भों को कई जगहों से एकत्र किया जाता है. कई सन्दर्भ पुस्तकों से लिए जाते हैं तो बहुत से सन्दर्भों को शोध-पत्रिकाओं से लिया जाता है. वर्तमान में इंटरनेट का बहुतायत उपयोग होने के कारण से अनेक वेबसाइट भी सामग्री संग्रहण के काम आती हैं. शोध-आलेखों में उनका भी सन्दर्भ देना आवश्यक होता है. ऐसी स्थिति में कई बार शोधार्थियों के समक्ष, लेखकों के समक्ष, प्राध्यापकों के समक्ष समस्या आती है कि इन विभिन्न माध्यमों से एकत्र किये गए सन्दर्भों का उल्लेख कैसे किया जाये? एकरूपता की दृष्टि से भी ये आवश्यक हो जाता है कि शोध-आलेख में सन्दर्भों को एकसमान रूप से लिखा जाये.

 

यहाँ पुस्तकों, शोध-पत्रिकाओं, इंटरनेट पर उपलब्ध वेबसाइट से ली गई सामग्री, आँकड़ों आदि के सन्दर्भ को लिखने का ढंग कुछ इस प्रकार से अपनाया जा सकता है. यदि सन्दर्भ पुस्तक से लिए गए हैं तो उनके लिखने का तरीका इस प्रकार होगा. सबसे पहले पुस्तक के लेखक का नाम लिखा जायेगा, इसमें भी उपनाम पहले लिखा जायेगा फिर नाम. इसके बाद पुस्तक के प्रकाशन का वर्ष लिखा जाता है. प्रकाशन वर्ष लिखने के बाद बोल्ड फॉर्मेट में पुस्तक का नाम दिया जायेगा. इसके पश्चात् पुस्तक के प्रकाशन का स्थान और फिर पुस्तक के प्रकाशक का नाम आता है. सन्दर्भ लिखने के क्रम में सबसे अंत में पृष्ठ संख्या लिखना होता है. इसे इस उदाहरण से और आसानी से समझा जा सकता है.

सेंगर, कुमारेन्द्र सिंह (डॉ.), 2009, पत्रकारिता के सन्दर्भ, उरई (उ.प्र.), बुन्देलखण्ड प्रकाशन, पृ. 97

 

पुस्तकों के साथ-साथ शोध-पत्रिकाओं में प्रकाशित आलेखों से भी सामग्री को लिया जाता है. ऐसे में इनका सन्दर्भ देने में क्रम कुछ इस तरह से रखते हैं. पुस्तक की तरह ही यहाँ सबसे पहले लेखक का नाम लिखा जाता है, इसमें भी उपनाम को पहले लिखते हैं फिर लेखक का नाम, इसके बाद आलेख के प्रकाशन का वर्ष लिखा जाता है. प्रकाशन वर्ष लिखने के बाद सम्बंधित आलेख का शीर्षक लिखा जाता है, जिससे सामग्री को लिया गया है. जिस पत्र, पत्रिका अथवा संकलन में वह आलेख प्रकाशित है उसका नाम वोल्ड फॉर्मेट में लिखा जाता है. इसके बाद पत्रिका की अंक संख्या, पत्रिका प्रकाशक का नाम और फिर पत्रिका के प्रकाशन का स्थान लिखा जाता है. क्रम लिखने में सबसे अंत में पृष्ठ संख्या लिखते हैं. इसे निम्न उदाहरण से सहजता से समझा जा सकता है.

सेंगर, कुमारेन्द्र सिंह (डॉ.), 2010, वृन्दावन लाला वर्मा के साहित्य में सौन्दर्य-बोधमेनिफेस्टो (शोधपत्रिका), Vol.II, अंक- 2, समाज अध्ययन केन्द्र, उरई, पृ. 94.

 

वर्तमान दौर में तकनीक के उपयोग से इनकार नहीं किया जा सकता है. ऐसे में शोध-सामग्री को बहुत सी वेबसाइट से भी एकत्र किया जाता है. वेबसाइट से ली गई सामग्री का सन्दर्भ भी देना चाहिए. इससे शोध-आलेख की प्रमाणिकता बनी रहती है. इसके लिए सबसे पहले इस वेबसाइट की लिंक, जिसे यूआरएल कहा जाता है उसे लिखा जाता है, इसके बाद जिस तारीख को सम्बंधित वेबसाइट से सामग्री को लिया गया उसे लिखना होगा है. उदाहरण के लिए निम्नवत को देख सकते है.

https://dastawez.blogspot.com/2022/02/blog-post_28.html (दिनांक 19-09-2023 को देखा गया.)

 

हिन्दी भाषा के शोध-आलेखों के लिए पिछले कुछ समय से सर्वमान्य रूप में सन्दर्भों को इस रूप में लिखा जा रहा है, स्वीकारा जा रहा है. बावजूद इसके शोधार्थी और प्राध्यापकगण अपने-अपने क्षेत्र, शैक्षणिक संस्थान के नियमानुसार इसकी जाँच करके ही अपने शोध-आलेखों में सन्दर्भ लेखन करें.

 

ये आलेख सूचना, जानकारी मात्र के लिए है.


14 सितंबर 2024

प्राध्यापकों का अनूठा विरोध प्रदर्शन

सत्ताएँ, कुर्सियाँ, प्राधिकारी जब अपने-अपने दायित्वों से च्युत होने लगते हैं, हो जाते हैं तो उनको अपनी आवाज़ सुनाने के लिए प्रताड़ित पक्ष को कुछ न कुछ कदम उठाने ही पड़ते हैं. अक्सर प्रताड़ित पक्ष अपनी अवहेलना के कारण, अपने कार्य में प्रगति होता न देख क्षुब्ध होकर क्रोधवश ऐसे कदम उठा लेता है जिसे सहज रूप में स्वीकार नहीं किया जाता है. ये जानते हुए भी कि विरोधात्मक कदम उठाने वाला पक्ष अपनी ओर से कतई गलत नहीं है मगर समाज आदर्शात्मक रूप में ऐसे किसी भी कदम का समर्थन नहीं करता है जो कि किसी भी तरह के आदर्श का ध्वंस करते हों, किसी भी तरह से सामाजिक व्यवस्था में अवरोध पैदा करते हों. यह बिन्दु उस समय और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है जबकि विरोध का मुद्दा शिक्षित वर्ग से जुड़ा हो, शिक्षकों से सम्बंधित हो. इस को ध्यान में रखते हुए गांधी महाविद्यालय, उरई के प्राध्यापकों ने व्यवस्था के विरुद्ध आवाज़ भी उठाई और विरोध करने का, अपनी नाराजगी को प्रदर्शित करने का एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया.

 




विरोध का, नाराजगी का मामला चूँकि महाविद्यालय के प्राध्यापकों से जुड़ा हुआ था, ऐसे में उनके द्वारा ऐसे किसी भी कदम को गलत ठहराया जा सकता था, जिससे किसी व्यवस्था में अव्यवस्था उत्पन्न होने लगे. गुरुतर दायित्व-बोध का भान होने के कारण प्राध्यापकों द्वारा किये गए विरोध प्रदर्शन से महाविद्यालय के किसी भी कार्य में किसी भी तरह की रुकावट नहीं आई. महाविद्यालय में जिन कक्षाओं में अध्यापन कार्य चल रहा था, उन कक्षाओं का सञ्चालन भी सुचारू रूप से होता रहा. स्नातक और परास्नातक कक्षाओं में नवीन सत्र हेतु प्रवेश प्रक्रिया भी संचालित है, प्राध्यापकों ने इसका भी ध्यान रखा और उनके विरोधात्मक कदम के बाद भी विद्यार्थियों के प्रवेश सम्बंधित कक्षाओं में होते रहे. कार्यालयीन कार्य भी यथोचित रूप से संपन्न होते रहे.

 

आपको बताते चलें कि महाविद्यालयों में कैरियर एडवांसमेंट स्कीम के अन्तर्गत प्राध्यापकों की प्रोन्नति प्रक्रिया को अपनाया जाता है. इस प्रक्रिया के अंतर्गत प्रोन्नति के नियमों और सेवा-शर्तों को पूरा करने वाले प्राध्यापकों को निश्चित प्रारूप में अपना आवेदन समस्त अभिलेखों के साथ प्राचार्य कार्यालय में जमा करना पड़ता है. गांधी महाविद्यालय, उरई के दस प्राध्यापकों द्वारा यथोचित सेवा-शर्तों को पूरा करने के बाद अपनी प्रोन्नति सम्बन्धी आवेदन की फाइल को समस्त दस्तावेजों के साथ गत वर्ष, 2023 में 15 सितम्बर को प्राचार्य कार्यालय में जमा किया गया था. उसके बाद से अद्यतन सम्बंधित प्राधिकारी द्वारा, प्राचार्य द्वारा कोई आधिकारिक जानकारी किसी भी प्राध्यापक को नहीं दी गई और न ही इस सम्बन्ध में बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी द्वारा गठित साक्षात्कार पैनल को आधिकारीक ढंग से सूचित किया गया. सम्बंधित उच्चाधिकारी, प्राधिकारी की इस तरह की कार्य-संस्कृति के चलते पूरा एक वर्ष हो जाने के बाद भी वे दस प्राध्यापक अपनी प्रोन्नति की राह ताकने में लगे हैं.

 


इस तरह की कार्य-संस्कृति, कार्य-प्रणाली से क्षुब्ध होकर उन दस प्राध्यापकों के साथ-साथ अन्य जागरूक प्राध्यापकों ने विरोध का, अपनी नाराजगी प्रदर्शित करने का एक नया तरीका अपनाया. इस विरोध प्रदर्शन में सम्बंधित प्राध्यापकों ने एक वर्ष से फाइलों की स्थिति में प्रगति ने देखते हुए प्राचार्य कार्यालय में फाइल जमा करने की पहली वर्षगाँठ मनाई. अवसर भले ही विरोध करने का रहा, भले ही नाराजगी दिखाने का था, प्राचार्य की उदासीन कार्य-प्रणाली के विरुद्ध था मगर किसी भी तरह का तो शोर-शराबा किया गया, न किसी तरह की नारेबाजी की गई, न किसी तरह से कक्षाओं में अध्यापन कार्य को बाधित किया गया. नारेबाजी, शोरगुल, हंगामा आदि से उलट इस अवसर पर प्राध्यापकों द्वारा केक काट कर अपना विरोध जताया गया. केक के साथ-साथ महाविद्यालय के समस्त प्राध्यापकों, कर्मचारियों को जलपान भी करवाया गया. इसमें भी प्राध्यापकों ने गंभीरतापूर्वक व्यवहार अपनाते हुए इस बात का ध्यान रखा कि महाविद्यालय का अध्यापन अथवा कार्यालयीन कार्य बाधित न हो, इसलिए सभी विभागों में जलपान पहुँचाये जाने की व्यवस्था की गई.

 





महाविद्यालय के प्राध्यापकों ने इस अवसर पर कहा कि वे लोग शिक्षित वर्ग से आते हैं, शिक्षा देने का कार्य करते हैं. और तो और शिक्षक को राष्ट्र निर्माता कहा जाता है, ऐसे में उनके द्वारा विरोध के तरीके से एक तरह का सन्देश भी देना उनका उद्देश्य था, साथ ही विद्यार्थियों में भी चेतनात्मक विकास करवाना था. आज विरोध, अनशन के नाम पर देश की, समाज की संपत्ति को नुकसान पहुँचाया जाता है, समाज में अराजकता फैलाई जाती है, यह सब नकारात्मक प्रवृत्ति का परिचायक है. उन्होंने अपने इस तरह के शालीन, सभ्य, शांत विरोधात्मक कदम के द्वारा प्रयास किया है कि अपने दायित्वों, कार्यों के प्रति उदासीन प्राचार्य, प्राधिकारी संभवतः जाग सकें. प्राध्यापकों ने कहा कि प्रोन्नति के इस मुद्दे के साथ-साथ एनपीएस का मुद्दा भी उनके महाविद्यालय में उलझा हुआ है. इसके लिए भी प्राध्यापकों और कर्मियों द्वारा इसी तरह से शालीन, सभ्य विरोध प्रदर्शन करके उदाहरण निर्मित किया जायेगा.

 




विरोध प्रदर्शन के इस अवसर पर शिक्षक संघ अध्यक्ष रोहित कुमार पाठक, महामंत्री डॉ. धर्मेन्द्र कुमार, पूर्व नैक प्रभारी डॉ. ऋचा सिंह राठौर, पूर्व आईक्यूएसी संयोजक डॉ. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर, डॉ. सुनीता गुप्ता, डॉ. ऋचा पटैरिया, प्रीति परमार, डॉ. मोनू मिश्रा, डॉ. के.के. गुप्ता, डॉ. के.के. त्रिपाठी, डॉ. मसऊद अंसारी, डॉ. कंचन दीक्षित, डॉ. इन्द्रमणि दूबे, डॉ. संदीप श्रीवास्तव, डॉ. शिवसंपत्त द्विवेदी, डॉ. वंदना सिंह, डॉ. विश्वप्रभा त्रिपाठी, कश्यप पालीवाल, महेन्द्र सिंह आदि उपस्थित रहे.         




05 सितंबर 2024

गुरु और शिक्षक का अंतर

ओ फ़ेसबुक की भेड़चाल में बहकने वाले/वालियो

 

आप सबने ज़िन्दगी से सीखा, माता-पिता पहले गुरु रहे, प्रकृति से ज्ञान प्राप्त किया, इससे लिया, उससे बटोरा, कण-कण ने दिया, वक्त ने सिखाया आदि-आदि. सारी बातें सही हैं, आदर्श विचारक हैं मगर बहकते-भटकते कुछ और जानकारी भी सीख लो, सहेज लो. गुरु कोई भी हो सकता है, कोई भी से मतलब कोई भी. ज्ञान किसी से भी मिल सकता है, किसी से भी माने किसी से भी. ये लोग माता-पिता, कोई रिश्तेदार, सहयोगी, मित्र, कोई भी कामगार, किसी भी व्यवसाय का व्यक्ति, किसी भी संस्थान का सदस्य, निरक्षर, साक्षर आदि कोई भी हो सकते हैं. ये गुरु हो सकते हैं पर शिक्षक नहीं.

 

हर कोई शिक्षक नहीं बन सकता. हर किसी को शिक्षक नहीं कहा जा सकता. प्रशासनिक अधिकारी प्रशासनिक अधिकारी ही होगा. पुलिस वाला पुलिस वाला ही रहेगा. डॉक्टर को डॉक्टर ही कहा जायेगा. इंजीनियर इंजीनियर ही रहेगा. व्यापारी भी यही रहेगा. हाँ, ये गुरु हो सकते हैं. इनको गुरु माना-समझा-कहा जा सकता है. इससे इतर शिक्षक एक निश्चित प्रक्रिया के बाद शैक्षिक संस्थान में नियुक्त व्यक्ति होता है. निश्चित डिग्री, निश्चित अर्हता, निश्चित प्रक्रिया के बाद ही कोई व्यक्ति शिक्षक कहलाता है.

 

शिक्षक दिवस देश के एक शिक्षक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी के सम्मान में उनके जन्मदिन पर मनाते हैं. यह दिन उनके जन्मदिन पर शिक्षकों का सम्मान करने का दिन है. इनसे इतर किसी और से ज्ञान पाने वाले को गुरु कहिए, उनका सम्मान गुरु पूर्णिमा को करिए.


30 जनवरी 2024

ग्रेडिंग प्रणाली समाप्त करना समाधान नहीं

देश की शैक्षणिक व्यवस्था में लगातार किसी न किसी रूप में सुधारात्मक कदम उठाये जाते रहे हैं. समयानुसार ऐसा किया जाना एक सतत प्रक्रिया है. उच्च शिक्षा क्षेत्र में सुधारात्मक क़दमों के रूप में राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद (नैक) की कार्यकारी परिषद की बैठक में निर्णय लिया गया कि अब देश में उच्च शिक्षण संस्थानों को मान्यता प्रणाली (एक्रीडिटेशन सिस्टम) के द्वारा ग्रेड नहीं दिया जाएगा. अब महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों को ए डबल प्लस से लेकर डी तक किसी भी प्रकार का ग्रेड नहीं मिलेगा. इसके स्थान पर उच्च शिक्षण संस्थानों को द्विआधारी मान्यता पद्वति के द्वारा मान्यता प्राप्त या मान्यता प्राप्त नहीं के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा. यह व्यवस्था शैक्षणिक सत्र 2024-25 से लागू हो जाएगी.

 



उच्च शिक्षण संस्थानों में ग्रेडिंग के स्थान पर मान्यता प्रणाली को दो चरणों में लागू किया जायेगा. पहले चरण में बताया जाएगा कि संस्थान मान्यता प्राप्त है अथवा मान्यता प्राप्त नहीं है. पहले चरण की इस प्रक्रिया के पश्चात दूसरे चरण में संस्थानों को एक से लेकर पाँच तक के स्तर पर आँका जायेगा. इसका उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों को अच्छा करते रहने के लिए प्रेरित करना होगा. जिस संस्थान का प्रदर्शन जिस क्षेत्र में जितना अच्छा होगा, उसे उसी के अनुसार एक से पाँच तक की रेटिंग दी जाएगी. नैक की कार्यकारी परिषद् का मानना है कि इस द्विआधारी व्यवस्था से अभिभावकों और विद्यार्थियों के लिए यह पहचानना सहज हो जायेगा कि कौन सा संस्थान मान्यता प्राप्त है और कौन सा नहीं. इसी के साथ उस शैक्षणिक संस्थान की एक से पाँच तक की रेटिंग के अनुसार वे उसे अपने अध्ययन हेतु चयनित कर सकेंगे.

 

अभी तक की संचालित व्यवस्था में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के दिशानिर्देशों के अन्तर्गत नैक द्वारा पूरे देश के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों को ग्रेड प्रदान किये जाते हैं. जो विश्वविद्यालय और महाविद्यालय नैक टीम के निरीक्षण के दौरान उनके द्वारा निर्धारित मापदंडों पर खरे नहीं उतरते हैं, उनको ग्रेड प्राप्त करने में मुश्किल होती है. यूजीसी के अनुसार देश के कुल 1113 विश्वविद्यालयों में से 437 के पास ही नैक मूल्यांकन ग्रेडिंग है जबकि बाकी 676 के पास नैक मूल्यांकन नहीं है. इसी तरह देश में 43796 महाविद्यालयों में से 9335 के पास ही नैक मूल्यांकन ग्रेडिंग है जबकि 34461 कॉलेज अभी तक मूल्यांकन नहीं करवा सके या असफल हुए हैं. नैक एक स्वायत्त संस्था है, जिसे 1994 में यूजीसी द्वारा स्थापित किया गया था. इसका काम देश भर के विश्वविद्यालयों, उच्च शिक्षण संस्थानों, निजी शिक्षण संस्थानों में गुणवत्ता को परखना, उनका मूल्यांकन करके ग्रेडिंग देना है. यूजीसी के दिशा-निर्देशों के अनुसार सभी उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए नैक से मान्यता प्राप्त करना आवश्यक है. यदि किसी संस्थान द्वारा इसकी मान्यता नहीं ली जाती है तो उसे सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलता है.

 

जैसा कि नैक की कार्यकारी समिति के अध्यक्ष भूषण पटवर्धन ने कहा कि मान्यता की द्विआधारी पद्धति यह सुनिश्चित करेगी कि ग्रेड की अस्वास्थ्यकर प्रतिस्पर्धा जड़ से समाप्त हो जाए. वह दौड़ जिसमें एक महाविद्यालय को ए डबल प्लस से सम्मानित किया गया और दूसरे को ए प्लस से सम्मानित किया जाना था, समाप्त हो, ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या वाकई ऐसा हो सकेगा? इस स्तर पर आकर विचारणीय यह है कि ऐसे संस्थान जो मान्यता प्राप्त नहीं वर्ग में आयेंगे उनके शिक्षकों, कर्मचारियों, विद्यार्थियों का भविष्य क्या होगा? उनके कैरियर की दिशा क्या होगी? शिक्षण दायित्वों से इतर अनेकानेक कार्यों के लिए शिक्षकों को अनुमति होगी अथवा नहीं? नैक मूल्यांकन-रहित संस्थानों के भविष्य के साथ-साथ उनसे जुड़े शिक्षकों, कर्मियों, विद्यार्थियों के भविष्य पर भी समवेत रूप से विचार किया जाना महती आवश्यकता है.

 

एक लम्बे समय से यूजीसी द्वारा बार-बार निर्देशित किये जाने के बाद भी बहुसंख्यक संस्थानों द्वारा नैक मूल्यांकन नहीं करवाया गया. इसके पीछे ऐसा नहीं कि संस्थानों की मंशा मूल्यांकन करवाने की नहीं है बल्कि वास्तविकता ये है कि बहुत बड़ी संख्या में ऐसे संस्थान हैं जिनका मूलभूत ढाँचा ही नैक द्वारा निर्धारित किये गए मानदंडों के आसपास भी नहीं ठहरता है. ग्रामीण अंचलों में संचालित संस्थानों में तो स्थिति और भी दयनीय है. मूलभूत ढाँचे के अभाव के साथ-साथ शिक्षकों की कमी, विद्यार्थियों का बहुत बड़ी संख्या में अनुपस्थित रहना, पाठ्यक्रमों का रोजगारपरक न होने से प्रवेश का कम होना आदि ऐसी स्थितियाँ हैं जिनके कारण भी बहुत से संस्थान नैक मूल्यांकन में सफल नहीं हुए हैं.

 

विगत कुछ वर्षों में शिक्षा के उन्नतीकरण से अधिक जोर उसके व्यवसायीकरण पर दिया गया. परिणामस्वरूप निजी संस्थानों की भरमार हो गई, जिनमें से बहुतायत में शिक्षा व्यवस्था, शिक्षकों, विद्यार्थियों, परीक्षा, मूल्यांकन आदि की स्थिति किसी से छिपी नहीं है. ऐसे संस्थान धनबल की ताकत से किसी भी कार्य को पूर्ण करवाने का दम भरते भी हैं और रखते भी हैं. इसी के चलते माना जाने लगा था कि नैक मूल्यांकन भी अब पारदर्शी नहीं रह गया है. नवीन व्यवस्था के पहले चरण को आगामी चार महीनों में पूरा किया जाना है. ऐसे में वे संस्थान जिनका ढाँचा ही सही नहीं है, जहाँ मूलभूत सुविधाओं का अभाव है, वे कैसे इस चरण के लिए आवेदन कर सकेंगे? निश्चित है कि संस्थानों द्वारा मान्यता प्राप्त करने के लिए वही अतार्किक, असंगत उपाय अपनाए जाने की आशंका रहेगी जिनके कारण नैक मूल्यांकन को अनुपयुक्त माना जाने लगा है. यूजीसी द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों की मूल्यांकन प्रणाली बदलने से इतर प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि संस्थान अपने मूलभूत ढाँचे में, शैक्षणिक गुणवत्ता में, शैक्षणिक वातावरण, विद्यार्थियों की उपस्थिति में आवश्यक सुधार करें. बिना इसके किसी भी बदलाव का बहुत सारगर्भित प्रभाव नहीं होने वाला. 






 

19 फ़रवरी 2023

दबाव न बनायें बच्चों पर

मौसम में बसंती रंग चढ़ने को है और बच्चों के सामने परीक्षा किसी भय की तरह खड़ी होने लगी है. विभिन्न बोर्ड परीक्षाएँ आरम्भ होने लगी हैं. बच्चों की परीक्षाएँ आरम्भ होने पर और उसके पूर्व भी उनके अभिभावकों द्वारा बालमन पर अतिरिक्त दबाव डाला जाने लगता है. सार्वजनिक रूप से भले ही अभिभावक इसे न स्वीकारें किन्तु सत्य यही है कि उनके द्वारा अपने बच्चों पर प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष दबाव बहुत बुरी तरह से डाला जाता है. बचपन में ही अध्ययन को लेकर अतिरिक्त सजगता दिखाना, ज्यादा से ज्यादा अंक लाने की चाह, कक्षा में-विद्यालय में सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित होने की कामना करना, अन्य दूसरे बच्चों के साथ प्रतिस्पर्धा की भावना का नकारात्मक रूप विकसित करना आदि बच्चों के कोमल मन-मष्तिष्क पर असर डाल रहा है. ये सारा दबाव समूचे वर्ष भर तो काम करता ही है किन्तु इसका विकृत और भयावह रूप परीक्षाओं के समय देखने को मिलता है. दिन-दिन भर, गई रात तक, अलस्सुबह जगाकर बच्चों के दिमाग में किताबों को लगभग ठूँस देने की मानसिकता बहुतायत अभिभावकों में देखी जा रही है.


आजकल जिस तरह से कॉन्वेंट पद्धति का विकास हुआ, जिस तरह से अत्यधिक किताबों का बोझ बच्चों पर लादा जा रहा है, जिस तरह से कठिन से कठिन पाठ्यक्रम को मंजूरी दी जा रही है, जिस तरह से कमीशन के लालच में निजी प्रकाशकों की बहुतायत किताबों को पाठ्यक्रम में शामिल किया जा रहा है वो चिंता का विषय होना चाहिए. ये सब कुछ अकेले विद्यालय प्रबंधन की मंशा से नहीं हो रहा है, ऐसा अकेले निजी प्रकाशकों की मंशा से नहीं हो रहा है, ऐसा शिक्षा क्षेत्र में काम करने वाले दलालों-माफियाओं की मंशा से नहीं हो रहा है वरन इसमें कहीं न कहीं अभिभावकों की मंशा भी अन्तर्निहित है. वे एकदम से अपने बच्चों को सर्वश्रेष्ठ देखना चाहते हैं. वे एकदम से अपने बच्चों में विश्व के सभी क्षेत्रों का ज्ञान समाहित हुए देखना चाहते हैं.




अभिभावकों द्वारा अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देने का प्रयास अपेक्षित है किन्तु घर में दवाब भरा माहौल बना देना उचित नहीं. बहुतायत में ये बच्चे अपने-अपने विद्यालयों में एक तरह का अनुशासनात्मक माहौल का बिगड़ा हुआ स्वरूप देखते हैं. क्लासरूम का माहौल, शिक्षा पद्धति का मानक स्वरूप न होना, अत्यधिक पाठ्यक्रम, रटने की मानसिकता आदि से बच्चों में स्कूलों के वातावरण के प्रति एक भय दिखता है. लगभग उसी तरह का माहौल वह अपने घर में देखता है, अपने अभिभावकों में भी शिक्षक का अनुशासन देखता है, अधिकाधिक अंक लाने का दबाव देखता है तो बच्चा अनजाने ही अवसाद की स्थिति में चला जाता है. ऐसी स्थिति के आने पर ऐसे बच्चे गुमसुम, शांत, बिना किसी अतिरिक्त क्रिया-प्रतिक्रिया के देखे जा सकते हैं. डरे-सहमे से ये बच्चे किसी अनजान व्यक्ति के सामने सहजता से व्यवहार नहीं कर पाते हैं. न केवल उनके साथ बल्कि हमउम्र बच्चों के साथ भी उनको समन्वय करने में, सहयोग करने में समस्या होती है. ये स्थितियाँ आगे चलकर बच्चों में एकाकीपन की, अकेलेपन की भावना पैदा करती हैं. घर-स्कूल का दबाव ही कहा जायेगा जबकि नौनिहाल आत्महत्या जैसा जघन्य कदम उठाने लगे हैं, घरों से भागने लगे हैं.


बच्चों द्वारा असफलता के भय से अथवा कुछ प्रतिशत अंक कम आने के चलते मौत की राह चले जाना समूची व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करता है. इक्कीसवीं सदी में जहाँ एक तरफ अधिकारों, स्वतंत्रता, फ्री-सेक्स, हैप्पी टू ब्लीड, लिव-इन-रिलेशन आदि जैसी अतार्किक चर्चाओं में बुद्धिजीवियों से लेकर मीडिया तक निमग्न हैं, वहाँ बच्चों पर लादे जाने वाले अनावश्यक, अप्रत्यक्ष बोझ को दूर करने के लिए किसी तरह की चर्चा नहीं होती है. ये सम्पूर्ण समाज के लिए क्षोभ का विषय होना चाहिए कि एक बच्चा कुछ प्रतिशत कम अंक आने के भय से अथवा कम अंक आने के कारण मृत्यु को चुन लेता है. समाज के विभिन्न क्षेत्रों में, विभिन्न विषयों में अपनी सक्रियता दिखा रहे समाजशास्त्री, मनोविज्ञानी इस दिशा में संज्ञाशून्य से नजर आते हैं. घर से लेकर स्कूल तक, अभिभावकों से लेकर शिक्षक तक सभी अपनी-अपनी मानसिकता का बोझ बच्चों के मन-मष्तिष्क पर लाद रहे हैं. अपने अतृप्त सपनों को, अपने उस कैरियर को जो वे नहीं बना सके, बच्चों के माध्यम से पूरा करने पर जोर लगाये हैं. अपने बच्चों को साक्षर, शिक्षित, संस्कारित बनाने से ज्यादा ध्यान इस तरफ है कि वे कैसे अधिक से अधिक अंकों से सफलता प्राप्त करें. वे बच्चों की शिक्षा की बुनियाद को मजबूत करने के स्थान पर उनके मन में अधिकाधिक ‘पैकेज वाली जॉब’ को पाने का लालच भरने में लगे हैं. इसके चलते अभिभावकों, शिक्षकों के असफल अतीत को अपने भविष्य द्वारा पूरा करने के चक्कर में बच्चों द्वारा अपना वर्तमान दोषपूर्ण बना लिया जाता है.


संभव है कि वैश्वीकरण, भूमंडलीकरण के दौर में बच्चों को उन्नत तकनीक से, उच्चतम शिक्षा से, आधुनिक संसाधनों से सज्जित करना अभिभावकों की मजबूरी हो गई हो; ये भी संभव है कि बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा के चलते बच्चों में अधिकाधिक अंक लाने का दबाव बनाया जाने लगा हो किन्तु ये सब बच्चों के भविष्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है. अभिभावकों को चाहिए कि अपने व्यस्ततम समय में से कुछ समय निकालकर अपने बच्चों के साथ बिताने का काम करें. आज के दूषित वातावरण में बच्चों के लिए खेलने को पार्कों, मैदानों की कमी लगातार होती जा रही है तो इसका अर्थ ये नहीं कि बच्चों को सिर्फ कंप्यूटर, मोबाइल, टीवी के भरोसे ही छोड़ दिया जाये. उनकी भावनाओं को समझने के लिए, उनमें सहयोग की भावना विकसित करने के लिए, उनमें विश्वास जगाने के लिए अभिभावकों को बच्चों के साथ घुलना-मिलना चाहिए. इसके साथ-साथ अभिभावक इसका ध्यान अवश्य रखें कि बच्चों का वर्तमान यदि सशक्त होगा तो वे भविष्य की बुलंद इमारत अवश्य बनेंगे और यदि उनका वर्तमान ही भयग्रस्त, विश्वासरहित हुआ तो सुखद भविष्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. बच्चों को विश्वास में लेने की जरूरत है. उनके भीतर से खोखलापन हटाकर आत्मविश्वास भरने की जरूरत है. उन पर अनावश्यक दवाब बनाकर उनके जीवन को असमय समाप्त करने के स्थान पर उनको खिलखिलाते रहने के अवसर प्रदान करने की आवश्यकता है. अंकों की प्रतिस्पर्धा के बजाय उनमें स्वावलंबन की, सहयोग की, समन्वय की भावना का विकास करने की जरूरत है. यदि हम आने वाले समय में ऐसा कर पाए तो अवश्य ही विकास की राह प्रशस्त कर पायेंगे, अन्यथा कष्ट तो दिनों-दिन बढ़ते ही जाना है. 

 






 

08 जून 2022

सड़क दुर्घटनाएँ और नागरिक कर्तव्य

आजकल सड़क दुर्घटनाओं के समाचार सुनाई देना आम बात हो गई है. इन दुर्घटनाओं में मारे जाने वालों में अधिकतम संख्या बच्चों की दिख रही है. ये चिंताजनक है मगर इसके बाद भी ऐसा लगता है जैसे समाज के बहुतायत लोग इस तरफ से मुँह मोड़े बैठे हैं. यदि आसपास के माहौल पर गौर करें तो बच्चों, किशोरों के साथ होने वाली दुर्घटनाओं के मूल में कारण तेज रफ़्तार वाहन का चलाया जाना है. बाइक के खुलेआम होते स्टंट, चार पहिया वाहन का अनियंत्रित रफ़्तार से दौड़ाया जाना, सुरक्षा मानकों का न मानना आदि ऐसी स्थितियाँ हैं जिनके कारण सड़क दुर्घटनाएँ आम हो चली हैं. ऐसी घटनाओं पर समाज क्षणिक प्रतिक्रिया देते हुए प्रशासन को दोषी बना देता है. 


किसी भी तरह की दुर्घटना पर शासन-प्रशासन को जिम्मेवार बताकर अपने आपको दोषमुक्त कर लेने की संकल्पना आज सहज रूप में दिखाई देने लगी है. क्या वाकई एक सामान्य नागरिक का दायित्व, उसका कर्तव्य इतना ही है? क्या वाकई समूची जिम्मेवारी सिर्फ और सिर्फ प्रशासन की है? हम नागरिकों की, माता-पिता की, घर-परिवार की कोई जिम्मेवारी नहीं है? क्या शैक्षणिक संस्थानों का एकमात्र उद्देश्य पाठ्यक्रम को समाप्त करवाना भर रह गया है? क्या शिक्षकों का, शैक्षणिक संस्थानों का दायित्व नहीं है कि वे अपने यहाँ पढ़ने वाले बच्चों को सजगता, सतर्कता, सुरक्षा के बारे में जागरूक करें?  क्या पारिवारिक स्तर पर बच्चों को संयमित रहने, अनुशासित रहने के बारे में नहीं बताया जा सकता है?




इस बात से शायद ही कोई इनकार करे कि उसके शहर में, उसके कस्बे में स्कूल यूनिफार्म पहने किशोर बाइक स्टंट करते किसी न किसी सड़क पर दिख जाते हैं. तेज गति से फर्राटा भरती बाइक, बिना हेलमेट के चलाई जाती बाइक, तीन-तीन लोगों का बाइक पर जमे होना किसी के लिए आपत्तिकारक नहीं रह गया है. यदि इस तरह की हरकतों को रोकने का काम किया जा रहा है तो सिर्फ प्रशासन द्वारा, आम नागरिक ऐसी टोकाटाकी से खुद को दूर ही रखे हैं. इसका कारण इन उद्दंड युवाओं, किशोरों द्वारा गाली-गलौज करना, हाथापाई करना है.


नियमानुसार स्कूल में पढ़ रहे बच्चों का ड्राइविंग लाइसेंस नहीं बन सकता है. ऐसे में विडम्बना यह है कि ऐसे बच्चों को न तो घर-परिवार में रोका जाता है और न ही सड़क पर यातायात पुलिस के द्वारा उनको प्रतिबंधित किया जाता है. यहाँ समझने वाली बात ये है कि स्कूल के बच्चे को बाइक किसी घर से ही मिली होगी. चाहे वो उसका अपना घर रहा हो अथवा उसके किसी दोस्त का. क्या उनके माता-पिता का दायित्व नहीं बनता है वे बच्चों को बाइक चलाने से रोकें. यहाँ दुर्घटना होने की स्थिति में प्रशासनिक लापरवाही से अधिक पारिवारिक लापरवाही का मामला सामने आता है. ऐसी कई-कई दुर्घटनाएँ नदियों, बाँधों, रेलवे ट्रेक, सड़क, आदि पर आये दिन दिखाई देती हैं.


प्रथम दृष्टया ऐसे मामलों में प्रशासन को दोषी ठहराया जा सकता है. किसी भी नागरिक की सुरक्षा का दायित्व प्रशासन का है. महज इतने भर से आम नागरिक अथवा परिवार भी अपने दायित्व से मुँह नहीं मोड़ सकता है. बच्चों को घर में, स्कूल में जागरूक किया जाना चाहिए. न केवल अपनी सुरक्षा वरन अन्य दूसरे नागरिकों की सुरक्षा के बारे में बताया जाना चाहिए. हमें समझना होगा कि प्रशासनिक तंत्र के पास नागरिकों की सुरक्षा के साथ-साथ नागरिक-विकास के, समाज-विकास के अनेकानेक कार्य होते हैं. एक सामान्य अवधारणा में नागरिकों की संख्या की तुलना में सरकारी मशीनरी, प्रशासनिक तंत्र बहुत-बहुत छोटा और अत्यंत सीमित है. उसकी पहुँच प्रत्येक क्षेत्र में बना पाना न तो व्यावहारिक है और न ही सरल है. ऐसे में आम नागरिक की भी जिम्मेवारी बनती है कि वो समाज में प्रशासनिक भूमिका निर्वहन के लिए खुद को तैयार करे. जीवन कितना अनमोल है इसकी अहमियत बच्चों को, नौजवानों को बताये जाने की आवश्यकता है.


ध्यान रखना चाहिए कि जिन बच्चों को देश की, समाज की आधारशिला रखनी है, उसका भविष्य बनना है उनका यूँ चले जाना किसी के हित में नहीं है. किसी भी बच्चे का, नौजवान का चले जाना जितना हानिकारक और दुखद एक परिवार के लिए है, उतना ही किसी समाज और देश के लिए भी है. यदि समाज का एक-एक नागरिक, माता-पिता, शिक्षक स्वयं को प्रशासन का अंग मानकर बच्चों को सचेत करने का कार्य करें, बच्चों को अनुशासित करने का दायित्व निभाएं, बच्चों को जीवन की महत्ता के बारे में समझाएँ तो आये दिन बच्चों की लापरवाही से होने वाली दुर्घटनाओं को रोका जा सकता है. बच्चों को असमय मौत के आगोश में जाने से रोका जा सकता है. परिवार, समाज, देश की अमूल्य क्षति को रोका जा सकता है.  


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20 अप्रैल 2022

शिक्षक की महत्ता

समाज ने विकास के नए-नए आयामों को निरंतर ही प्राप्त किया है, साथ ही उनका विकास भी किया है. इनको लेकर उसके द्वारा कई-कई नए-नए मानक स्थापित भी किये गए हैं. इन्हीं में एक मानक शिक्षा के क्षेत्र में भी स्थापित किया गया है. इक्कीसवीं सदी तक आते-आते शिक्षा क्षेत्र में कई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए, कई अत्यावश्यक कदमों को उठाया गया. शिक्षा व्यवस्था ने कई तरह के परिवर्तनों को देखते-समझते हुए अपना स्वरूप भी बदला. आज शिक्षा व्यवस्था गुरुकुल पद्वति से निकल कर ई-लर्निंग तक आ गई है. इस ऑनलाइन शिक्षा व्यवस्था को कोरोनाकाल में और ज्यादा महत्त्व मिला. ऑनलाइन शिक्षा व्यवस्था अथवा शैक्षिक तकनीक का कितना भी विकास कर लिया गया हो, मगर समाज से शिक्षकों की महत्ता को, उनके द्वारा प्रत्यक्ष कक्षाओं में दी जा रही शिक्षा के महत्त्व को कम नहीं किया जा सकता है. तकनीकी विकास ने संस्थागत अनेकानेक बिन्दुओं को दरकिनार कर दिया हो किन्तु इससे शिक्षकों की जिम्मेवारियाँ और उनका दायित्वों पर नकारात्मक असर नहीं हुआ है. वे समय के साथ कम नहीं हुई हैं वरन बढ़ी ही हैं. एक समय जबकि तकनीकी विकास आज की तरह नहीं था तब शिक्षकों के पास अपने विद्यार्थियों की समस्त प्रकार की समस्याओं के समाधान करने की महती जिम्मेवारी हुआ करती थी. आज जबकि तकनीकी विकास हाथों-हाथों में मोबाइल, लैपटॉप के माध्यम से सुसज्जित है तब भी शिक्षकों की जिम्मेवारी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है.

 

आज ऐसा माना जाने लगा है कि किसी भी शिक्षक का काम किसी संस्थान में, किसी कमरे में बैठे अनेक विद्यार्थियों को उसकी पुस्तक को समाप्त करवा देना मात्र है. शिक्षक के लिए उसका दायित्व सिर्फ पाठ्यक्रम को पूरा करवा देना मात्र नहीं है और होना भी नहीं चाहिए. प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च स्तरीय शिक्षा के समस्त सोपानों में एक विद्यार्थी का साथ अबसे अधिक एक शिक्षक के साथ ही रहता है. ऐसे में किसी भी स्तर के शिक्षक की जिम्मेवारी बनती है कि वह भावी पीढ़ी को राष्ट्र-निर्माण की दिशा में कार्य करने की मानसिकता से निर्मित करे. यह विचार करना शायद आज किसी के लिए संभव नहीं हो पा रहा है कि अध्यापन कार्य किसी तरह के व्यवसाय से सम्बंधित करके कभी नहीं देखा गया है. इसके पीछे की मूल भावना सिर्फ इतनी थी कि एक शिक्षक किसी तरह का उत्पाद निर्मित नहीं करता है वरन वह एक नागरिक तैयार करता है, एक व्यक्तित्व का विकास करता है. ऐसे में उसके कार्यों, उसकी भावना, उसकी मानसिकता का प्रभाव उसके विद्यार्थियों पर पड़ता है. किसी भी शिक्षक को अपना आदर्श मानकर एक विद्यार्थी उससे बहुत कुछ सीखता है. उसकी कही बातों को गाँठ बांधकर जिंदगी भर उन पर अमल करने की कोशिश करता है.

 

आज जबकि तकनीकी विकास के दौर में ई-लर्निंग, ई-मैटर आदि के द्वारा शिक्षा देने की बात होने लगी है. वीडियो कांफ्रेंसिंग के साथ-साथ ऑनलाइन शिक्षा की अवधारणा ने यह साबित करने का प्रयास किया है कि शिक्षक का कार्य विशुद्ध रूप से अपने पाठ्यक्रम को पूरा करवा देना, विद्यार्थियों की परीक्षा लेना, उनकी उत्तर-पुस्तिका जाँचकर अंक देना रह गया है. वैश्वीकरण के आधुनिक दौर में कम्प्यूटर, मोबाइल, पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन, ई-मेल, मैसेज, सोशल-मीडिया आदि को शिक्षक माना-समझा जाने लगा है. ये किसी भी शिक्षक के सहायक उपकरण तो सिद्ध हो सकते हैं न कि किसी शिक्षक के स्थान पर स्वीकार्य हो सकते हैं. आज विकास की अंधी दौड़ में अभिभावकों के पास समय की अत्यंत कमी देखने को मिलती है. ऐसे में उनके द्वारा प्रयास यही किया जाता है कि शिक्षा का कोई ऐसा माध्यम मिल जाये जो नितांत उन्हीं के बच्चे पर ध्यान दे सके. मोबाइल क्रांति के बाद इंटरनेट क्रांति ने जैसे अभिभावकों के मन की मुराद पूरी कर दी हो. एक क्लिक पर समस्त जानकारियों को अपने सामने देखकर अभिभावक भी संतुष्टि का एहसास कर रहे हैं.

 

इस बिंदु पर आकर वे यह समझना नहीं चाहते कि ऑनलाइन माध्यम से जानकारी तो मिल सकती है किन्तु किसी योग्य व्यक्ति का सान्निध्य नहीं मिल सकता है, जो बच्चों को सही-गलत समझा सके. भारतीय संस्कृति, सांस्कृतिक व्यवस्था में किसी भी व्यक्ति के लिए शिक्षा लेने का अर्थ सिर्फ पाठ्यक्रमों का पूरा कर लेना मात्र कभी नहीं रहा है. यही कारण है कि शिक्षा व्यवस्था के किसी भी चरण में नैतिक शिक्षा, शारीरिक शिक्षा, हमारे पूर्वजों के बारे में शिक्षा आदि को भी साथ-साथ दिया जाता रहा है. ऐसा माना जाता रहा है कि एक शिक्षक अपने पाठ्यक्रम के साथ-साथ अपने विद्यार्थियों में समाज के प्रति सेवा-भावना, राष्ट्र के प्रति जिम्मेवारी का भाव, प्राणीमात्र के लिए परोपकार की भावना, संगठन-शक्ति का विकास, सामूहिकता की स्वीकार्यता आदि गुणों का विकास भी करता है. ऐसे में समझना कतई मुश्किल नहीं है कि मशीनी संस्कृति, मशीनी शिक्षा के द्वारा विषय-सामग्री की उपलब्धता तो हो सकती है किन्तु उससे सम्बंधित विषय पर ज्ञान मिलेगा, ऐसा कहा नहीं जा सकता है.

 

मशीनीकृत शिक्षा व्यवस्था, ऑनलाइन क्लासेज या फिर कांफ्रेंसिंग के जरिये किसी विषय को सहजता से समझाया भले ही जा सकता हो किन्तु किसी व्यक्ति में उसके व्यावहारिक लक्षणों का विकास नहीं किया जा सकता है. तकनीकी रूप से मशीनी शिक्षा के प्रति आसक्ति ने विद्यार्थियों में सहनशीलता, सामूहिकता, सांगठनिकता, बड़ों के प्रति सम्मान, समाज के प्रति दायित्व-बोध, परोपकार की भावना आदि को कम करने के साथ-साथ लगभग समाप्त ही किया है. ऐसा होने के कारण आज समाज में बच्चों को, नवयुवकों को बड़ी संख्या में अवसाद में जाते देखा जा सकता है. नवयुवकों की बहुत बड़ी संख्या नशे की गिरफ्त में जा रही है. जरा-जरा सी बात में नाकामी मिलने पर निराशा छा जाना और उसकी तीव्रता इतनी बढ़ जाना कि उनका आत्महत्या करने को प्रवृत्त होना आदि आज आम होता जा रहा है. ये समझने वाली बात है कि आखिर ऐसा हो क्यों रहा है? आज लोगों की जीवन-शैली तकनीकी रूप से, भौतिक रूप से पहले से कहीं अधिक संपन्न हुई है. लोगों को अपने मनमाफिक कार्यक्षमता के अनुसार कार्य करने की स्वतंत्रता भी प्राप्त हुई है. ऐसे में समाज में शिक्षकों के प्रति गंभीरता का भाव समाप्त भले ही न हुआ हो किन्तु कम अवश्य हुआ है. तकनीक को सर्वस्व मानने वालों के लिए एक शिक्षक का महत्त्व संस्थान स्तर पर कार्य करने वाले व्यक्ति जितना रह गया है. तकनीक को हाथ में लिए घूमने वाली पीढ़ी को लगता है कि वह अपने साथ ज्ञान का सीमित भंडार लेकर चल रहा है, ऐसे में उसे किसी शिक्षक की आवश्यकता नहीं है. देखा जाये तो किसी भी तरह का तकनीकी विकास किसी भी शिक्षक की महत्ता को कम नहीं कर सकता है. किसी भी शिक्षक की स्थान-पूर्ति नहीं कर सकता है.

 

मशीन ज्ञान दे सकती है किन्तु आत्मविश्वास नहीं जगा सकती. ऑनलाइन शिक्षा किसी भी विषय पर सामग्री की उपलब्धता सहज करवा सकती है किन्तु उसके व्यावहारिक पक्षों से परिचित नहीं करा सकती. ई-लर्निंग से घर बैठे विषय से सम्बंधित जानकारी मिल सकती है किन्तु उसकी अभिव्यक्ति का तरीका नहीं मिल सकता. किसी समय में तकनीक के, सामग्री के, पुस्तकों आदि के अभाव ने शिक्षकों की महत्ता को स्थापित किया होगा किन्तु आज तकनीकी विकास के दौर में भी शिक्षकों का होना अनिवार्य है. बचपन से संस्कार, आत्मविश्वास, जिज्ञासा, सामूहिकता, समन्यव, सहयोग आदि की जिस भावना का विकास एक शिक्षक करता है वह किसी और के द्वारा नहीं हो सकता है. यही कारण है कि आज भी बच्चों को विद्यालय भेजने की परंपरा का निर्वहन सभी के द्वारा किया जा रहा है, भले ही वह उच्च स्तरीय शिक्षा व्यवस्था को अपनी भौतिकता के चलते घर में स्थापित करवा सकता हो. तकनीक के साथ विकास करते समाज को शिक्षकों के महत्त्व को समझते हुए नई पीढ़ी को भी इनके महत्त्व को समझाना होगा.

 


06 दिसंबर 2021

अध्यापन कार्य और ऐतिहासिक तिथियों का जुड़ना

आज छह दिसम्बर है, किसी के लिए शौर्य दिवस किसी के लिए काला दिवस. इस दिन को यदि बाबरी ढाँचा विध्वंस से जोड़कर देखा जाये तो और भी तमाम सारे अर्थ सामने आ सकते हैं. इस दिन का बाबरी ढाँचा ध्वंस से जोड़कर देखने से हमारा भी सन्दर्भ बना हुआ है. किसी समय कॉलेज टाइम में की गई गतिविधियों, रामलला हम आयेंगे, मंदिर वहीं बनायेंगे के घोष के बीच यह दिन बहुत कुछ याद दिला जाता है. इधर एक बात और बताते चलें कि अदालत का फैसला राममंदिर निर्माण के पक्ष में आने के बाद से सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर इस दिन हमारी स्वीकार्यता बनी रही अन्यथा की स्थिति में पहले इस दिन किसी भी रूप में राममंदिर निर्माण की, बाबरी ढाँचा ध्वंस की पोस्ट डालते ही हम पर प्रतिबन्ध लगा दिए जाते थे. कहीं दो दिन पोस्ट न कर पाने का प्रतिबन्ध, कहीं कोई फोटो न लगा पाने का प्रतिबन्ध, कहीं एकाउंट ही लॉग इन न कर पाने का प्रतिबन्ध.


बहरहाल, हमारे लिए व्यक्तिगत रूप से छह दिसम्बर का दिन यदि राममंदिर निर्माण से जुड़ा होने के कारण गर्व का एहसास कराता है वहीं हमारी आजीविका से जुड़ा होने के कारण भी एक अलग तरह की अनुभूति देता है. वर्ष 2005 की कुछ अत्यंत दुखद घटनाओं के बाद उस साल का समापन एक सुखद घटना से हुआ था. वह सुखद घटना थी हमारा मानदेय प्रवक्ता के रूप में चयनित होने को लेकर. मानदेय प्रवक्ता पर चयन होने के बाद छह दिसम्बर को ही हमने गांधी महाविद्यालय, उरई में हिन्दी विभाग में कार्य करना शुरू किया था. आज जब कैलेण्डर देखते हैं तो सोलह वर्ष की बाली उमरिया बीती हुई दिखाई देती है.


सोलह साल के लम्बे कार्यानुभव में बहुत सी खट्टी-मीठीं बातें हमारे अनुभव के पिटारे में बंद हैं. वे बातें हँसाती कम, रुलाती ज्यादा हैं. फिलहाल तो मानदेय प्रवक्ता से बाहर निकल कर अब विनियमित हो गए हैं. विनियमितीकरण के बाद फिर से एक नए सिरे से महाविद्यालय ने नियुक्ति पत्र दिया, नए रूप में नियुक्ति की गई. इस बार भी तिथि ऐतिहासिक ही रही. अबकी 08 मार्च को स्थायी शिक्षक के रूप में सहायक प्राध्यापक पद पर कार्यभार ग्रहण किया. अब स्थायी शिक्षकों के रूप में महाविद्यालय ने, विश्वविद्यालय ने, सरकार से स्वीकार कर लिया है. इसके बाद भी संघर्ष बहुत से मोर्चों पर अभी ज़ारी है. संघर्ष भरे जीवन में एक संघर्ष इस अध्यापन क्षेत्र का भी.


04 सितंबर 2021

घर की मुर्गी को मुर्गी ही समझा गया


 

कल शिक्षक दिवस है. इस अवसर पर सरकारी, गैर-सरकारी आयोजन होते हैं, शिक्षकों को सम्मानित करने के. इस वर्ष स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है. ऐसे में जानकारी हुई थी कि उत्तर प्रदेश के सभी जनपदों में 75 शिक्षकों का (महाविद्यालय स्तर पर) सम्मान किया जाना है. 


इस बारे में रात को आधिकारिक सूचना भी प्राप्त हो गई. अपने महाविद्यालय से सम्मानित होते कई शिक्षकों के बीच हमारा भी नाम चमक रहा है. अच्छा लगा अपने लोगों के बीच सम्मानित होने में. यद्यपि सम्मान समारोह कल होना है मगर ख़ुशी अभी से है. ख़ुशी इसलिए भी हो रही है कि भले ही ये शासन-प्रशासन का कार्यक्रम हो मगर 'घर की मुर्गी दाल बराबर' वाली बात को थोड़ा किनारे कर दिया गया है. सरकारी नीति के तहत ही सही, सभी जनपदों में ही सही 'घर की मुर्गी को मुर्गी ही' समझा गया है.


सभी को बधाई, शुभकामना. सभी शिक्षकों को, गुरुजनों को शिक्षक दिवस की शुभकामनायें.

25 जुलाई 2020

ऑनलाइन क्लासेज का शिगूफा

जिस तरह से कोरोना संक्रमण की स्थिति दिखाई दे रही है, उसके अनुसार सरकारों द्वारा लॉकडाउन पुनः लगाये जाने के सम्बन्ध में जिस तरह के कदम उठाये जा रहे हैं, उन्हें देखकर लगता नहीं है कि शिक्षण संस्थान सहज रूप में जल्दी शुरू हो सकेंगे. प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के शिक्षण संस्थानों ने ऑनलाइन पढ़ाई के रूप में अपना तंत्र फैलाना शुरू कर दिया है. उच्च शिक्षा क्षेत्र में अभी तो छूटी परीक्षाओं को पुनः करवाए जाने को लेकर संशय बना हुआ है. नए सत्र के लिए प्रवेश प्रक्रिया पर संशय बना हुआ है. यद्यपि यहाँ भी जल्द से जल्द प्रक्रिया को पूरा करके ऑनलाइन कोर्स आरम्भ करने पर जोर दिया जा रहा है तथापि ऐसा व्यावहारिक रूप में होता समझ नहीं आ रहा है.



बाजार का खोल देना, कार्यालयों का खोल देना, कंपनियों को फिर से शुरू कर देना एक अलग स्थिति है और शिक्षण संस्थानों को खोलना एक बिलकुल अलग स्थिति है. यहाँ किसी भी रूप में बच्चों को सामाजिक दूरी के नियम में बाँधना मुश्किल कार्य है. ऐसे में निजी संस्थानों ने अपने अस्तित्व को बनाये, बचाए रखने के लिए ऑनलाइन क्लासेज का एक नया शिगूफा छोड़ दिया है. प्रतिदिन कुछ वीडियो डालकर उनको देखने का काम बच्चों के भरोसे छोड़ दिया जाता है. यहाँ बच्चे कम उनके अभिभावक ज्यादा लगे रहते हैं ऑनलाइन क्लासेज के चक्कर में. होमवर्क को रोज डाउनलोड करना, बच्चों के द्वारा किये जाने वाले काम को अपलोड करना आदि काम अभिभावकों के मत्थे ही मढ़े गए हैं.

निजी शैक्षणिक संस्थानों ने अभिभावकों से फीस वसूलने के लिए ऑनलाइन क्लासेज का नया चलन शुरू कर दिया मगर क्या किसी भी निजी संस्थान में इससे पहले किसी भी बच्चे को फाइल बनाना, अपलोड करना, डाउनलोड करना, वेबसाइट चलाना आदि बताया गया था? ये हमारा अपना व्यक्तिगत अनुभव है कि रोज ही दसियों अभिभावकों को, अपने परिचितों को, मित्रों को इस बारे में जानकारी दे रहे हैं. निजी संस्थानों ने आदेश देकर अपने शिक्षकों को इस काम में झोंक दिया है. शिक्षकों ने भी इसे बस एक काम समझ कर सोशल मीडिया के द्वारा अथवा किसी अन्य रूप में बस खानापूर्ति करना समझ लिया है. देखा जाये तो ऑनलाइन क्लासेज का असल अर्थ न तो इन संस्थानों को ज्ञात है और न ही इस काम में लगे शिक्षकों को. सबके सब बस एक खानापूर्ति करने में लगे हैं. उनको न बच्चों के वर्तमान से कोई लेना देना है न ही भविष्य से. उनको न बच्चों के शारीरिक विकास से कोई मतलब है न ही उनके मानसिक विकास से.

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