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16 सितंबर 2011

कितना समझाया है मन मतवाले....==600वीं पोस्ट

अभी एक घंटे पहले जब अपनी पोस्ट लगाई तो पता चला कि अगली पोस्ट की संख्या 600 होगी। सोचा कि कल कोई अच्छी सी पोस्ट को लगा कर 600 की संख्या का उत्सव मनाया जाये या फिर अपने जन्मदिन 19 सितम्बर को दोहरा आनन्द लिया जाये। उत्सव के नाम पर याद आया कि आज 16 सितम्बर को हमारे किसी अपने का जन्मदिन है। बस फिर क्या था, एक पोस्ट लगा देने के बाद भी उत्सव और आनन्द उठाने का लोभ संवरण नहीं कर सके और अपनी 600वीं पोस्ट को कविता के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

समर्पित अपने किसी करीबी सदस्य को.....उनके जन्मदिन की शुभकामनाओं सहित--


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कितना समझाया है मन मतवाले,

न सपने तू देखा कर-

सपनों की दुनिया में महज छलावे,

न सपने तू देखा कर-

सपनों की दुनिया निर्मोही,

खो जायेगा ओ मनमौजी,

सुख है केवल दो पल का,

वह भी केवल कोरा-कोरा,

मृगतृष्णा सी एक जगाकर,

आ जाते हैं हमें डराने,

कितना समझाया है मन मतवाले,

न सपने तू देखा कर-

सपने हैं इक झील विशाल,

चमके जगमग नीला आकाश,

चांद तारों का रूप दमकता,

मोहित होता तू देख छटा,

झोंका हवा का अगले ही पल,

मचा देता है जैसे हलचल,

जगमग झील का रूप बदलता,

मंजर बस उठती गिरती लहरों का,

ढूँढें किसमें चन्दा तारे,

अब तो बस धारे ही धारे,

कितना समझाया है मन मतवाले,

न सपने तू देखा कर-

सपना एक सजाया फिर भी,

घरौंदा एक बनाया फिर भी,

जुगनू की जगमगाहट जिसमें,

चिड़ियों की चहचहाहट जिसमें,

राह-राह पर फूल खिले हैं,

नहीं कहीं भी शूल मिले हैं,

महकी जिसमें खुशियां ही खुशियां,

नहीं दिलों के बीच दूरियां,

लेकिन जीवन एक हकीकत,

न सपनों से जाये काटे,

कितना समझाया है मन मतवाले,

न सपने तू देखा कर-

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चित्र गूगल छवियों से साभार