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13 दिसंबर 2025

सुपर से हाइपर होती सैन्य शक्ति

वर्तमान सन्दर्भों में देश की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाये रखना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. वैश्विक स्तर पर व्यापक उथल-पुथल मची हुई है. ऐसे में भले ही चारों तरफ से शांति, अहिंसा, भाईचारे की बातें सुनाई देती हों मगर इसके सापेक्ष युद्ध की आवाजें, बमों के धमाके, मिसाइलों के हमले भी सुनाई पड़ते हैं. विज्ञान, तकनीकी विकास के साथ-साथ तमाम देशों ने अपनी सैन्य क्षमता को भी विकसित किया है, समय के साथ मजबूत किया है. हमारा देश भी लगातार अपनी सैन्य क्षमता को मजबूत करता जा रहा है, अपने हथियारों को उन्नत बना रहा है. ऐसा करने के पीछे की मानसिकता युद्ध करना नहीं बल्कि दक्षिण एशिया के साथ-साथ विश्व पटल पर खुद को सक्षम सिद्ध करना है.

 

विगत वर्षों में हमारे देश ने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में अनेक युद्धों के साथ-साथ युद्ध जैसी अनेक स्थितियों का सामना किया है. इसके अलावा अपने पड़ोसी देशों की विस्तारवाद की नीति, वहाँ की अराजक स्थिति के चलते भी सैन्य क्षमता, हथियारों का सशक्त एवं उन्नत किया जाना हमारे लिए एक तरह की मजबूरी भी है. युद्ध के वर्तमान परिदृश्य में अब आमने-सामने की सैनिकों की लड़ाई से ज्यादा प्रचलन ड्रोन का है, मिसाइल का है. इसका जीता-जागता उदाहरण ऑपरेशन सिन्दूर के समय देखने को मिला. हमारी सुपरसोनिक मिसाइल ब्रह्मोस की भूमिका और उसकी सटीक क्षमता को सम्पूर्ण विश्व ने इस दौरान देखा. ब्रह्मोस मिसाइल ने पाकिस्तान के एयरबेस, सैन्य ठिकानों और आतंकी अड्डों को सटीक निशाना बनाकर तबाह करने में अहम भूमिका निभाई. यह भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमता और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन गया, जिसने दुनिया को भारत की सैन्य ताकत का प्रदर्शन किया.

 



ब्रह्मोस की चर्चा के बाद अब ध्वनि मिसाइल चर्चा में है. रक्षा अनुसन्धान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने हाइपरसोनिक श्रेणी की मिसाइल टेक्नोलोजी पर कार्य करते हुए ध्वनि मिसाइल को तैयार कर लिया है. ध्वनि के परीक्षण पश्चात् हमारा देश विश्व की उन सैन्य शक्तियों में सम्मिलित हो जायेगा जो हाइपरसोनिक तकनीक से सुसज्जित हैं. इस मिसाइल की सबसे बड़ी विशेषता इसकी रफ़्तार है. सुपरसोनिक मिसाइलों की तुलना में यह मिसाइल अधिक तेजी से उड़ान भरने में सक्षम है. ऐसा अनुमान है कि ध्वनि हाइपरसोनिक मिसाइल मैक 5 या 6 से अधिक गति से उड़ान भर सकेगी, जो लगभग 7400 किमी प्रति घंटा के बराबर है. इस मिसाइल की एक और विशेषता इसका हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल (एचजीवी) होना है जो बैलिस्टिक बूस्टर से ऊँचाई पर पहुँच कर हवा में ग्लाइड करती है. हवा में ग्लाइड करते हुए लक्ष्य की ओर बढ़ने के कारण यह राडार और मिसाइल रक्षा प्रणालियों से लगभग अदृश्य रहती है. हाइपरसोनिक मिसाइलें अपनी गति और उड़ान पथ में गतिशीलता के कारण पारम्परिक मिसाइलों की तुलना में अधिक प्रभावकारी होती हैं. यह कदम केवल तकनीकी सफलता ही नहीं है बल्कि देश की बदलती हुई सशक्त रणनीतिक स्थिति का परिचायक भी है. अनुमान है कि इस माह के अंत तक ध्वनि हाइपरसोनिक मिसाइल का परीक्षण कर लिया जायेगा. यदि पूर्वनिर्धारित ढंग से कार्ययोजना सफल रही तो वर्ष 2030 तक यह मिसाइल भारतीय सेनाओं का हिस्सा बन जाएगी.

 

डीआरडीओ के हाइपरसोनिक डेमांसट्रेटर व्हीकल प्रोग्राम पर आधारित ध्वनि मिसाइल की क्षमता के बारे में रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी रफ़्तार और हवा में ग्लाइड करने के कारण दुनिया के बेहतर से बेहतर वायु रक्षा प्रणालियों द्वारा इसे रोक पाना सम्भव नहीं होगा. अभी तक चीन की डीएफ-26 हाइपरसोनिक मिसाइल को विश्व की अत्याधुनिक मिसाइलों में गिना जाता है मगर ध्वनि मिसाइल इसके मुकाबले कहीं ज्यादा उन्नत है. डीएफ-26 को जहाँ स्थिर मार्ग और सीमित फुर्ती के लिए जाना जाता है वहीं ध्वनि मिसाइल को जमीन, हवा और समुद्र से प्रक्षेपित किया जा सकता है साथ ही यह उड़ान के दौरान दिशा बदलने में सक्षम है. डीआरडीओ ने मिसाइल के एरोडायनमिक्स, थर्मल मैनेजमेंट, गाइडेंस सिस्टम, स्क्रैमजेट इंजन आदि को लेकर लगातार सफल परीक्षण किये हैं, जिससे ध्वनि मिसाइल के तकनीकी रूप से सफल होने की सम्भावना बहुत अधिक है. इस परीक्षण के सफल होने के बाद भारत रूस, अमेरिका और चीन के साथ उन देशों की श्रेणी में शामिल हो जायेगा जिनके पास हाइपरसोनिक मिसाइल हैं.

 

हाइपरसोनिक मिसाइल ध्वनि की रेंज 6,000 से 10,000 किमी तक होगी, जो अग्नि, ब्रह्मोस से कहीं अधिक है. यह दक्षिण एशिया के सामरिक संतुलन को पूरी तरह बदल देगी. हिन्द महासागर क्षेत्र में बढ़ते तनाव के चलते भी ध्वनि भारत की रणनीतिक भूमिका को निर्णायक स्तर पर प्रभावित करेगी. ब्रह्मोस के बाद अब ध्वनि का आना इस कारण और भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि देश के पास सामरिक महत्त्व वाली बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइल प्रणालियाँ पहले से ही हैं. देश के एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम के द्वारा लगातार विकसित होती मिसाइल प्रणालियों ने देश को एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन स्थापित करने योग्य तो बनाया ही है साथ ही सामरिक स्थिरता बनाये रखने के कारण महाशक्ति के रूप में भी पहचान बनाने में सहायता प्रदान की है. पृथ्वी, आकाश, नाग, अग्नि, त्रिशूल, ब्रह्मोस आदि अनेक मिसाइलों के द्वारा भारत ने अपनी भू-राजनीतिक चुनौतियों का सामना किया वहीं सम्भावित खतरों का मुकाबला करने के लिए स्वयं को सक्षम बनाया. इन मिसाइलों के द्वारा भारत का उद्देश्य किसी दूसरे देश पर आक्रमण करना नहीं बल्कि किसी भी तरह की युद्ध अथवा संघर्ष की स्थिति में अपने आपको आक्रामक और रक्षात्मक रूप से मजबूत बनाना रहा है. ध्वनि मिसाइल देश की रक्षा प्रौद्योगिकी में एक महत्वपूर्ण कदम है. इसके आने से न केवल भारतीय सेना की शक्ति में वृद्धि होगी, बल्कि यह देश की रक्षा नीति और सामरिक स्थिति को भी मजबूत करेगी.


28 अगस्त 2025

कहीं और से नियंत्रित होता मोबाइल

एंड्रॉयड मोबाइल फ़ोन के कॉल डायलिंग सम्बन्धी कुछ बदलाव के बाद अधिकतम लोग ऐसे बिलबिला रहे जैसे कोई अचम्भा हो गया. स्मार्ट फ़ोन की नज़र में आप जैसे बिलबिलाने लोग ही बेवकूफ हैं. आज से नहीं बल्कि स्मार्ट फ़ोन, इंटरनेट के गठबंधन के समय से ही समझाया जा रहा है कि आपके हाथ में सिर्फ़ मोबाइल पकड़ना और स्क्रॉल करना है. बाक़ी सभी कंट्रोल तो उसके पास हैं जो आपको ये मुफ्त सुविधाएँ दे रहा है.


सोचिए, आप कोई एक विज्ञापन देख लें फिर वैसे ही आपकी स्क्रीन पर आने लगते हैं. आप कुछ सर्च कर लें वही आपको दिखने लगता है. कोई रील देख लें फिर उसी तरह की रील आपके सामने से गुजरने लगती हैं. अभी ये बदलाव बहुत छोटा सा बदलाव है. आपकी लोकेशन उनके पास है, आपका बैंक खाता उनके पास है, आपका एटीएम, उसका पिन उनको पता है, आपका आधार-पैन-पासवर्ड आदि सब उनके पास है. सबकुछ तो इंटरनेट से जुड़ा है और वही सबकुछ मोबाइल से लिंक करवाया जा रहा है. यही मोबाइल आपके हाथ में होने के बाद भी दूसरे के नियन्त्रण में है. 


एक जरा से बदलाव के बाद भी आप सजग न हुए, संगठित हो इस लिंक-लिंक खेल के विरोध में न उतरे, अपने तमाम खातों पर मजबूत पासवर्ड न बनाये, हैशटैग खेल और मुफ्तखोरी से बाहर न निकले तो अगला बदलाव हमारे-आपके खातों में, दस्तावेज़ों में, जानकारियों में होगा.

 

25 अगस्त 2025

देश का सुरक्षा कवच सुदर्शन चक्र

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस को लाल किले से मिशन सुदर्शन चक्र की घोषणा करके भारतीय सामरिक शक्ति की मजबूती तथा सक्षमता का विश्वास व्यक्त किया था. भगवान श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र से जोड़ते हुए मिशन को आधुनिक रक्षा नवाचारों में मार्गदर्शन के साथ-साथ भारतीय सांस्कृतिक और पौराणिक विरासत से प्रेरणा लेने वाला बताया जा रहा है. यह अपने आपमें सुखद है कि सुदर्शन चक्र अभियान को एक तरफ देश की पौराणिक, सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ा जा रहा है वहीं यह देश की एक प्रमुख स्ट्राइक कोर से भी जुड़ा हुआ है. भारत की प्रमुख स्ट्राइक कोर 21 को भी सुदर्शन चक्र के नाम से जाना जाता है.

 

सुदर्शन चक्र प्रोजेक्ट के पहले चरण में कम और मध्यम दूरी के लिए परीक्षण का कार्य भी सफलतापूर्वक सम्पन्न कर लिया गया है. परीक्षण के पहले चरण में भारतीय रक्षा अनुसन्धान संगठन (डीआरडीओ) ने ओड़िशा के तट पर इंटीग्रेटेड एअर डिफेंस वेपन सिस्टम (आइएडीडब्ल्यूएस) का सफल परीक्षण किया. आगामी दस वर्षों में अर्थात 2035 तक देश के प्रमुख स्थलों, सामरिक और नागरिक क्षेत्रों को तकनीकी के अत्याधुनिक स्वरूप से सुसज्जित सुरक्षा कवच प्रदान किया जाएगा. इंटीग्रेटेड एअर डिफेंस वेपन सिस्टम अर्थात आइएडीडब्ल्यूएस वह रक्षा प्रणाली है जो एक दिशा में कार्य न करते हुए समग्रता में कार्य करेगी. इसके द्वारा किसी भी दुश्मन देश द्वारा एक साथ छोड़े गए अनेकानेक ड्रोन हमलों के विरुद्ध जवाबी कार्यवाही की जा सकेगी. व्यापक रूप से वायु रक्षा प्रदान करने के लिए इस प्रणाली को रडार, मिसाइल, कमांड-कंट्रोल यूनिट के द्वारा लक्ष्य को सटीक रूप से चुनने, उस पर निशाना साधने के सन्दर्भ में निर्मित किया जा रहा है.

 



विगत लम्बे समय से वैश्विक सुरक्षा की स्थितियों, सामरिक वातावरण, भू-राजनीतिक परिदृश्य में जिस तरह के बदलाव देखने को मिल रहे हैं, उसमें सुरक्षा तंत्र का, सुरक्षात्मक प्रणालियों का विशेष महत्त्व बढ़ता जा रहा है. दो देशों के मध्य आपसी तनाव बढ़ने की स्थिति में, युद्ध की स्थिति में अब देखने में आ रहा है कि ड्रोन, मिसाइल के हमले आम बात हो गई है. विश्व भर में चल रहे अनेक युद्धों, देशों के आपसी तनाव के दौरान किये जाने वाले हमलों में इनका चलन बढ़ा ही है. अभी हाल ही में ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान देखने में आया था कि पाकिस्तान की तरफ से अनेक ड्रोन, मिसाइल ने केवल सैनिक क्षेत्रों में बल्कि नागरिक इलाकों में भी छोड़ी गईं. ऐसे में आवश्यक है कि न केवल सामरिक क्षेत्र बल्कि नागरिक क्षेत्र भी सुरक्षित रहें. सुदर्शन चक्र मिशन का मूल उद्देश्य यही है कि आने वाले समय देश के न केवल सामरिक इलाकों को बल्कि रिहायशी क्षेत्रों को भी सुरक्षात्मक रूप से मजबूत बनाया जाये.

 

वर्तमान दौर में युद्ध जैसी स्थिति में दुश्मन देश के द्वारा केवल सैनिक प्रतिष्ठानों को ही निशाना नहीं बनाया जाता है बल्कि बिजली व्यवस्था, ग्रिड, संचार साधनों, खाद्य आपूर्ति, यातायात, स्वास्थ्य सुविधाओं आदि को भी निशाना बनाया जाता है. ऐसा करने के पीछे दुश्मन की मानसिकता समूची व्यवस्था को पंगु बना देना होता है. युद्धकाल में अथवा किसी भी तरह की तनाव जैसी स्थिति में इस तरह की विषम से देश को बचाने के लिए सुदर्शन चक्र जैसी सुरक्षा प्रणाली की, एक सुरक्षा कवच की महती आवश्यकता है. यद्यपि सुदर्शन चक्र मिशन का अभी पहला चरण ही सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ है तथापि आने वाले दस वर्षों में इसके द्वारा दुश्मन के मिसाइल-ड्रोन हमलों का जवाब देने, साइबर हमलों को निष्प्रभावी बनाने, हैकिंग के खतरों को दूर करने आदि का कार्य पूर्ण क्षमता के साथ किया जाना सम्भव हो सकेगा. अब जबकि सुदर्शन चक्र जैसा सुरक्षा तंत्र अपने प्रभावी रूप में कार्य करने के लिए व्यावहारिक रूप धारण कर चुका है तो निश्चित ही यह अत्याधुनिक तकनीक, सशक्त सुरक्षा प्रणाली के द्वारा भारतीय सामरिक ढाँचे का प्रमुख आधार बनेगा.


20 नवंबर 2024

whatsapp को अपना जीवन न बना लें

आजकल जरा-जरा से काम के लिए whatsapp का उपयोग किया जा रहा है. घरेलू, मित्रवत सम्बन्धों में इसका इस्तेमाल किये जाने के साथ-साथ सरकारी, गैर-सरकारी कार्यों में भी इसका इस्तेमाल किया जा रहा है. Whatsapp के बढ़ते इस्तेमाल के साथ ही इसके दुरुपयोग की घटनाएँ भी बढ़ने लगी हैं. आये दिन किसी न किसी व्यक्ति के, परिवार के इसके द्वारा ठगे जाने की खबरें पढ़ने-सुनने को मिलती हैं. ऐसे में आवश्यक है कि हम सब सुरक्षित रहें, सतर्क रहें. भले ही whatsapp के माध्यम से बहुत से कार्य सम्पन्न किये जाते हों मगर इसे अपना जीवन ना समझ लें, उसे अपनी आफ़त ना बना लें.




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समाचार साभार-

दैनिक जागरण

कानपुर संस्करण

18-11-2024

 

04 अगस्त 2024

बांग्लादेश की हिंसा से भारतीय नागरिकों को सतर्क रहने की आवश्यकता

एक अपील या एक निवेदन सभी से.

 

सोशल मीडिया पर आप सब जितना समय देते हैं, बिलकुल दें, उसे कम न करें मगर अब अपने आसपास भी ध्यान देने की आवश्यकता है. बांग्लादेश के घटनाक्रम के बाद और भी सजग होने की आवश्यकता है. ऐसा इसलिए क्योंकि वहाँ के हालात के केन्द्र में आरक्षण या कहें कि कोटा सिस्टम है. एक ऐसा कोटा सिस्टम जो कतिपय राजनैतिक सोच के चलते, राष्ट्रवादी सोच को स्थापित करने की दृष्टि से उन परिवारों को प्रदान किया जा रहा था जो बांग्लादेश मुक्ति वाहिनीं से सम्बंधित थे.

 

वहाँ जिस कोटा सिस्टम के विरुद्ध हिंसात्मक कार्यवाही की गई, यदि एक नजरिये से देखें तो वह कोटा वहाँ की राष्ट्रवादी सोच से सम्बंधित है, उस मुक्ति वाहिनी के परिजनों के लिए है जिन्होंने बांग्लादेश निर्माण में अपना साथ दिया. स्पष्ट है कि वे लोग ही उस कोटा के खिलाफ होंगे जो बांग्लादेश राष्ट्रवाद सोच के विरुद्ध होंगे. निश्चित ही इसके पीछे पाकिस्तानी समर्थकों का बहुत बड़ा हाथ होगा क्योंकि बांग्लादेश बनने का सबसे बड़ा कष्ट तो उसी को है. इस पूरे आन्दोलन को छात्र आन्दोलन का नाम लेकर न केवल उकसाया गया बल्कि उसे आक्रामक, हिंसात्मक रूप भी प्रदान किया गया. इसके पीछे स्पष्ट रूप से वे ताकतें दिखाई दे रही हैं जो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से भारत-विरोधी गतिविधियों में लिप्त रहती हैं.

 



आपके इंटरनेट पर, सोशल मीडिया पर व्यस्त बने रहने के साथ-साथ सजग, सतर्क रहने की आवश्यकता इस कारण से है क्योंकि बांग्लादेश की तरह की भूमिका अपने देश में भी बनती नजर आ रही है. राष्ट्रवादी सोच का लगातार विरोध किया जा रहा है. पाकिस्तान, फिलिस्तीन के पक्ष में खुलेआम नारेबाजी करने वाले इसी देश में हैं. पाकिस्तान समर्थक यहाँ अपना काम स्लीपर सेल के रूप में पिछले कई वर्षों से करते आ रहे हैं, ऐसी खबरें हम सभी आये दिन पढ़ते-सुनते हैं. अब बस आप सब सजग रहिये. अपने आसपास के ऐसे तत्त्वों को पहचानिए.


13 दिसंबर 2023

संसद भवन की सुरक्षा में सेंध : लापरवाही या चूक

बाईस साल पहले संसद पर हुए आतंकी हमले को लेकर संसद में कार्यवाही चल रही थी, उसी समय संसद की सुरक्षा में घनघोर चूक, जबरदस्त लापरवाही देखने को मिली. संसद में चलती कार्यवाही के दौरान दर्शक दीर्घा से दो युवकों ने कूद कर नारेबाजी की. सदन में कूदने के साथ ही उन युवकों ने रंगीन धुआँ फैलाने वाली कैन भी उछाली, इससे सदन में रंगीन धुआँ भर गया. इसे सामान्य घटना नहीं माना जा सकता है. संसद पर हमले वाले दिन ही दर्शक दीर्घा से युवकों का सदन में कूद जाना जहाँ सुरक्षा व्यवस्था में चूक को बताता है वहीं घनघोर लापरवाही का भी सूचक है.




कुछ वर्ष पहले हमें भी पुरानी संसद भवन में दर्शक दीर्घा में बैठकर सदन की कार्यवाही देखने का अवसर मिला था. संसद भवन में प्रवेश के साथ ही जबरदस्त चौकसी शुरू हो जाती. पहले ही प्रवेश द्वार पर व्यापक रूप से जाँच की जाती है. किसी भी व्यक्ति को अपने साथ किसी भी तरह का सामान ले जाने की अनुमति नहीं थी. उनको उसी पहले सुरक्षा स्थल पर जमा करवा लिया जाता था. हम स्वयं धोखे से अपना इयरफोन गले में लटकाए रह गए, उसे भी जमा करवा लिया गया था. इसके बाद जब संसद भवन इमारत में प्रवेश करना था, उसके ठीक पहले उस पास की जाँच हुई जो सम्बंधित सांसद ने जारी किया था. यहाँ भी मुस्तैद जाँच व्यवस्था से गुजरना पड़ा. पूरे संसद भवन में जगह-जगह अनेक तरह की जाँच मशीनें अपना काम कर रही थीं.


जिस जगह पर दर्शक दीर्घा में प्रवेश करना होता था, वहाँ पर भी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी उपस्थित थे. ऐसा बिलकुल भी महसूस नहीं हो रहा था कि किसी भी तरह से सुरक्षा में, जाँच में कोताही बरती जा रही है. दर्शक दीर्घा में जाने वाले नागरिकों के जूते-चप्पल तक उतरवा लिए जा रहे थे. यहाँ भी एक-एक व्यक्ति की जाँच की जा रही थी. हमने अपनी शारीरिक असमर्थता बताते हुए जूते न उतार पाने की बात कही, छड़ी को न छोड़ पाने की असमर्थता जताई तो सुरक्षा में लगे एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्वयं ही व्यक्तिगत रूप से हमारी शारीरिक स्थिति की जाँच की. जूते उतार कर उनको पैर की स्थिति से अवगत कराया. इसके बाद उन्होंने छड़ी वहीं दरवाजे पर बाहर रखवा ली और एक सुरक्षाकर्मी ने हमें अपने हाथों का सहारा देकर अन्दर कुर्सी तक पहुँचाया. दर्शक दीर्घा में भी व्यवस्था चाक-चौबंद दिखी. सदन में कूदने का कोई रास्ता नहीं था क्योंकि चारों तरफ जाली लगी हुई थी. इसके बाद भी अन्दर सुरक्षाकर्मी पूरी मुस्तैदी से सभी पर निगाह रखे हुए थे. आपस में न तो किसी को बातें करने दे रहे थे और न ही अपने हाथ-पैर हिलाने की अनुमति दे रहे थे. अपनी आँखों को इधर-उधर घुमाते हुए अनुमान लगाया तो हर चौथे-पाँचवें व्यक्ति के आसपास सुरक्षाकर्मी मौजूद था.




पुराने संसद भवन में इस तरह की कड़ी चौकसी बरती जा रही थी, ऐसे में नए संसद भवन में चूक कैसे हो गई, ये गम्भीर प्रश्न है. कैसे दो युवक अन्दर कूद गए? कैसे उनके पास रंगीन धुएँ वाली कैन दर्शक दीर्घा तक बनी रही? क्या किसी सुरक्षाकर्मी के ही इसमें मिले होने का अंदेशा है? क्या किसी सांसद के करीबी का इसमें हाथ है? ऐसी आशंका इसलिए उभरती है क्योंकि उस समय भी किसी भी सांसद के नजदीकी रक्त-सम्बन्धी को, उनके सचिव को, खुद उनको मोबाइल सहित किसी भी सामान सहित संसद भवन के भीतर जाने की छूट थी. अब जबकि नया संसद भवन आधुनिक सुरक्षा व्यवस्था से लैस है, अत्याधुनिक तकनीक, संसाधन वहाँ मौजूद हैं, तक ऐसी चूक बिना किसी भीतरी व्यक्ति के शामिल हुए वगैर संभव नहीं लगती.


फिलहाल तो आरम्भिक जाँच आरम्भ हो गई है. इस चूक में, लापरवाही में कौन, किस तरह शामिल था इसके बारे में तो विस्तृत रिपोर्ट आने के बाद पता चलेगा. अंतिम निष्कर्ष क्या रहेगा ये तो बाद की बात है किन्तु मामला गंभीर और चिंताजनक अवश्य है. 




 

30 अप्रैल 2023

नक्सली हिंसा रोकने को बने कारगर रणनीति

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने विस्फोटक के द्वारा हमला करके ग्यारह जवानों मौत की नींद सुला दिया. डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड के जवान एक ऑपरेशन को अंजाम देकर वापस लौट रहे थे, उसी समय उन पर आईईडी की सहायता से हमला किया गया. बस्तर में नक्सलियों ने इस समय टैक्टिकल काउंटर अफेंसिव कैंपेन (टीसीओसी) चला रखा है. इसके अंतर्गत नक्सली अक्सर बड़े हमले करते हैं. इस कैंपेन के चलते सेना पहले से ही वहाँ अलर्ट मोड पर है, इसके बावजूद भी नक्सली अपना हमला करने में कामयाब रहे. देश में आतंकवाद, क्षेत्रवाद, वर्ग-संघर्ष के साथ-साथ नक्सलवाद भी शासन-प्रशासन के लिए नासूर बन गया है. यह भी एक तरह का आतंकवाद बना हुआ है. समय के साथ बढ़ते शक्ति प्रदर्शन ने नक्सलवाद को हिंसात्मक बना दिया है. प्रसिद्ध नेता माओत्से तुंग की आदर्श खूनी क्रांति की उक्ति पावर कम्स आउट ऑफ़ द बैरल ऑफ़ ए गन (सत्ता बंदूक की नली से निकलती है) के पार्श्व में नक्सलवाद के बीज आरोपित होते दिखते हैं. वामपंथी विचारधारा से लैस माओत्से सदा ही आदर्श खूनी क्रांति के समर्थक रहे और यही कारण है कि किसी न किसी रूप में उनकी विचारधारा को, उनको आदर्श मानने वालों ने भी किसी न किसी तरह से खूनी क्रांति के रास्ते को अपनाना उचित समझा. 


पश्चिम बंगाल के नक्सलवाड़ी गाँव में सन् 1967 में भूमिहीनों, किसानों द्वारा एक तरह का वर्ग-संघर्ष भू-स्वामियों के विरुद्ध आरम्भ हुआ था. इस संघर्ष को मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के तत्कालीन जिला स्तरीय नेता चारू मजूमदार, कानू सन्याल तथा जंगल सन्थाल ने नेतृत्व प्रदान किया. सन् 1967 में किसानों, मजदूरों और जमींदारों के बीच का वर्ग-संघर्ष एक आन्दोलन के रूप में तीव्रता पकड़ने लगा. कभी पश्चिम बंगाल के चार जिलों में फैला यह आन्दोलन लगातार अपने कार्य-प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करता रहा. आँकड़ों के अनुसार नक्सलवाद देश के बीस राज्यों के दो सौ से अधिक जिलों को अपने प्रभाव में ले चुका है. पश्चिम बंगाल से शुरू इस खूनी आन्दोलन ने छत्तीसगढ़, झारखण्ड, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, बिहार, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में अपना प्रभाव कहीं कम, कहीं ज्यादा दिखाया है. इस कारण से अनेक नक्सली संगठनों ने अलग-अलग राज्यों में न केवल अपना अस्तित्व बनाया है बल्कि वहाँ हिंसात्मक कार्यवाहियाँ अंजाम दी हैं. इन संगठनों ने शक्ति प्रदर्शन के लिए अकारण हत्याओं के साथ-साथ धन उगाही, अपहरण, लूटमार जैसी घटनाओं में अपनी संलिप्तता बनाई. नक्सलवाद अब एक आन्दोलन के स्थान पर आतंकवाद अथवा सशस्त्र खूनी हिंसा के समकक्ष खड़ा हो गया है.




देखने-सुनने में यह समस्या जितनी भयावह दिखती है वास्तविकता में उससे कहीं अधिक भयावह है. आये दिन पुलिस थानों पर हमले, रेलवे स्टेशनों को जलाया जाना, स्कूलों, अस्पतालों को बन्द करवा देना, बारूदी सुरंग बिछाना, चुनावों में हिंसा करना, बसों-ट्रेनों में बम धमाके, सरकारी अधिकारियों को मारना, विकास कार्यों में बाधा खड़ी करना, अपहरण, हत्या आदि दर्शाते हैं कि नक्सली आन्दोलन अब आतंकवाद बन गया है. सामान्यतः लोगों ने नक्सली आन्दोलन को आदिवासियों द्वारा अपने हित और हक के लिए चलाया जाने वाला आन्दोलन मान रखा था, यहाँ तक कि आज भी बहुत से लोग इसको हिंसात्मक आन्दोलन अथवा आतंकी घटना मानने को तैयार नहीं हैं. इसके परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए कि कैसे नक्सली बन्दूक उठाये सिर्फ और सिर्फ अपनी शक्ति दिखाने के लिए हमले कर रहे हैं. हाल के वर्षों में सैन्य बलों के साथ-साथ क्षेत्र के भोले-भाले नागरिकों की, हिंसक कार्यवाहियों में मासूम बच्चों, वृद्धों की हत्या करना, आदिवासियों, जंगलवासियों पर जबरन नक्सली आन्दोलन से जुड़ने का दवाब बनाना दर्शाता है कि जंगलवासियों की समस्या का समाधान, आदिवासियों के हकों की प्राप्ति, सामाजिक समरसता की चाह उनके लिए अब गौण हो चले हैं.


ऐसे में सवाल यह उठना स्वाभाविक है कि क्या नक्सली समस्या से निपटने का कोई उपाय नहीं है? क्या देश के एक जिले से फैलता हुआ लगभग चालीस प्रतिशत भू-भाग पर फैल चुका नक्सलवाद समूचे देश को अपनी गिरफ्त में ले लेगा? जंगलवासियों, आदिवासियों के नाम पर चलाया गया आन्दोलन, जमींदारों के शोषण से मुक्ति पाने के लिए चलाया गया आन्दोलन, शोषितों को समाज में समानता दिलवाने के लिए प्रारम्भ हुआ आन्दोलन क्या महज स्वार्थपूर्ति में लगा रहेगा? समानता, सामाजिक समरसता, भेदभाव, न्याय जैसी विशिष्ट अवधारणा को लेकर चला संघर्ष क्या हिंसा, अपहरण, हत्या जैसी आतंकी घटनाओं में परिवर्तित हो जायेगा? इन सवालों के आलोक में सरकारी प्रयासों की तरफ भी ध्यान देना होगा. ऐसा नहीं है कि सरकार सिर्फ दमनात्मक रूप से ही नक्सली हिंसा को दबाना चाहती है. उसके द्वारा वर्ष 2013 में आजीविका योजना के तहत रोशनी नामक विशेष पहल की शुरूआत की गई थी, ताकि सर्वाधिक नक्सल प्रभावित ज़िलों में युवाओं को रोज़गार के लिये प्रशिक्षित किया जा सके. हालिया नक्सली हमले में शहीद हुए रिजर्व गार्ड के रूप में उन्हीं युवाओं को भर्ती किया जाता है जो नक्सली हिंसा छोड़कर समाज की मुख्यधारा से जुड़ते हैं. इसके अलावा सरकार द्वारा सर्वाधिक नक्सल प्रभावित तीस ज़िलों में जवाहर नवोदय विद्यालय और केंद्रीय विद्यालय संचालित किये जा रहे हैं. हिंसा का रास्ता छोड़कर समर्पण करने वाले नक्सलियों के लिये सरकार पुनर्वास की भी व्यवस्था कर रही है.


इन प्रयासों के साथ ही सरकार को चाहिए कि आदिवासियों और जंगलवासियों में यह विश्वास पैदा करें कि जंगल की सम्पत्ति, वन-सम्पदा उनकी अपनी है, उस पर उन्हीं का हक है. केन्द्र सरकार को, राज्य सरकारों को इस तरह के कार्य करने होगे जो विश्वास की परम्परा को बनाये रखते हुए नक्सली आन्दोलन से जुड़े लोगों को राष्ट्र की, विकास की मुख्य धारा में शामिल कर सकें. पुलिस सत्रांश सेना में नवयुवकों की भर्ती लगातार की जा रही है. इन संगठनों में भर्ती के इच्छुक युवकों को सामान्य सा पैकेज न देकर उनको पूर्ण कालिक रोजगार देकर राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़ने का अवसर देना चाहिए. सरकार और नक्सलियों के समर्थक इसे लेकर एकमत हैं कि सुलह का रास्ता बातचीत के बाद निकलता है. ऐसे सरकारी प्रयासों के बीच नक्सलियों को हिंसा का रास्ता छोड़कर वार्ता के लिए आगे आना चाहिए. इसके लिए नक्सलियों को अपना एक सर्वमान्य नेता स्वीकार करना होगा. उनको समझना होगा कि शांति का रास्ता एक व्यवस्थित मन्त्र और तन्त्र के द्वारा ही निकलता है. नक्सली समस्या का हल भले ही हिंसा से न हो, वार्ता से हो पर उसे भी पूर्ण संकल्प और दृढ़ता के साथ करना होगा. एक बात सरकार को, शासन को, प्रशासन का, सशस्त्र बलों को और स्वयं नक्सलियों को भी समझनी होगी कि संकल्प का कोई भी विकल्प नहीं होता और प्रशासन से बढ़कर कोई भी तन्त्र नहीं होता है. 

 






 

23 अप्रैल 2023

टैटू की हानिकारक दीवानगी

आजकल युवाओं की पहली पसंद टैटू है. किसी का नाम, कोई डिज़ाइन बनवाना युवाओं की पहली पसंद बनता जा रहा है. लड़कियों के बीच अत्यधिक प्रचलित रहा यह शौक अब लड़कों में भी बहुतायत में देखा जा रहा है. इसे अपनी गर्दन, कलाई, पेट, पीठ आदि सहित शरीर के विभिन्न अंगों पर टैटू बनवाना आम होता जा रहा है. टैटू बनाने में त्वचा के नीचे रंग डालकर उस डिजाइन को शरीर पर उभारा जाता है, इससे शरीर पर न मिटने वाली आकृति बन जाती है. शरीर पर बनाई जाने वाली खूबसूरत आकृतियाँ कई तरह से लोगों की सुन्दरता को बढ़ाती हैं. 


इस कला का भी अपना इतिहास है. यद्यपि किसी तरह के प्रमाणिक तथ्य ऐसे नहीं मिलते हैं जिनसे इसकी उचित समयावधि ज्ञात हो सके तथापि ऐसा माना जाता है कि टैटू कला का सबसे पहला सबूत 5000 ईसा पूर्व से है. ऐसी मान्यता है कि टैटू कला वास्तव में एक प्राचीन कला है जो 3370 ईसा पूर्व से 3100 ईसा पूर्व के बीच विकसित हुई होगी. भारत में टैटू का इतिहास बहुत पुराना है. देश में यह कला गोदना या गुदना के रूप में प्रचलित रही. आदिवासी समुदायों ने अपने शरीर पर गोदना रूप में आभूषण इस सोच के साथ बनवाए कि इस तरह के आभूषण को उनसे दूर नहीं किया जा सकता. टैटू का सर्वाधिक प्रचलन जनजातियों के माध्यम से हुआ, इसमें अपतानी टैटू सबसे ज्यादा प्रचलित था. इसे बनवाने के लिए काँटों का उपयोग किया जाता था और गहरे नीले रंग में भरने के लिए जानवरों की चर्बी में मिश्रित कालिख का उपयोग किया जाता था. कालांतर में भारत सरकार ने सत्तर के दशक में इस प्रक्रिया को प्रतिबंधित कर दिया.




अस्सी के दशक से पहले टैटू तमिलनाडु में बहुत आम थे और ये विभिन्न जनजातियों से सम्बंधित लोगों की निशानी होते थे. छत्तीसगढ़ में भगवान राम के प्रति भक्ति भावना दर्शाने के उद्देश्य से लगभग एक सदी पहले चेहरे और शरीर को राम शब्द के साथ गोद लिया था जो अत्याचार के खिलाफ एक ताबीज के रूप में भक्ति का प्रदर्शन भी बना. दक्षिण भारत में गोदना को पचकुठारथु कहा जाता है. घुमंतू जाति कोरथी व कोल्लम जाति खुद को दुष्ट प्राणियों से सुरक्षित रखने के लिए स्याही से शरीर पर भूलभुलैया डिजाइन बनवाया करते थे, वहीं टोडा जाति में व्यक्ति के शरीर को लुभावना बनाने के लिए ज्यामिट्रिक आकृतियों को गोदा जाता था. बिहार के धनुको जाति का मानना है कि गोदना से महिलाएँ सुरक्षित रहती हैं. वहीं दूसरी ओर झारखंड में मुंडा जाति के लिए गोदना साहस और मुगलों पर विजय का प्रतीक है. गोंड जनजाति शरीर के खुले हिस्सों को गोदना से ढंक कर स्वयं को सभ्य बनाती है. झारखंड की संथाल जाति में पुरुष अपनी बाँह और कलाई पर सिक्कों नामक आकृति को अंकित करते थे. संथाल महिलाओं के शरीर पर पुष्प पैटर्न बेहद खूबसूरती से अंकित किया जाता था. 


वर्तमान दौर में बदलाव के शौक़ीन युवाओं ने दशकों पुरानी परम्परा को नए स्वरूप में अपनाकर एक नये ट्रेंड का आविष्कार कर लिया. दशकों पहले जिसे आम बोलचाल में गोदना कहा जाता था, वो आज टैटू के रूप में फैशन और स्टेटस सिम्बल बना हुआ है. आज की युवा पीढ़ी अपनी अलग पहचान बनाने के लिए अपने शरीर के विभिन्न हिस्सों पर अनोखे प्रकार के टैटू बनवाने में दिलचस्पी लेने लगी है. अनेक तरह की डिजाइन, नाम, कलाकृति, जीव-जन्तु, फूलों आदि के टैटू बनवाना आज फैशन बन गया है. टैटू बनवाने की दीवानगी में इसके शौक़ीन इससे होने वाले नुकसान की ओर ध्यान ही नहीं दे रहे हैं. टैटू बनवाने के शौक में लोगों की त्वचा माँसपेशियों को नुकसान पहुँच सकता है. टैटू बनवाने की प्रक्रिया में काम आने वाली सुई शरीर में त्वचा में चुभोई जाती है. बहुत सी डिजाइन ऐसी होती हैं जिसे बनाने में सुई को शरीर में गहराई तक चुभोना पड़ता है. इससे माँसपेशियों को नुकसान पहुँचने की आशंका रहती है. इस बारे में विशेषज्ञों की राय है कि शरीर के उस स्थान पर टैटू नहीं बनवाने चाहिए जहाँ पर तिल हों. 




टैटू को रंगीन और आकर्षक बनाने के लिए अनेक प्रकार की स्याही का प्रयोग किया जाता है. कुछ स्याही और उसके रंग त्वचा के लिए हानिकारक होते हैं क्योंकि उनको बनाने में विषैले तत्त्वों का उपयोग किया गया होता है. नीले रंग की स्याही में कोबाल्ट और ऐल्युमिनियम मिला होता है जबकि लाल रंग की स्याही में मरक्यूरियल सल्फाइड की उपस्थिति रहती है. इसी तरह से बहुत से दूसरे रंगों की स्याही में शीशा, कैडियम, क्रोमियम, निकिल, टाइटेनियम, कार्सिनोजेनिक आदि सहित अनेक रासायनिक तत्त्वों और दूसरी धातुओं के होने के प्रमाण मिले हैं. ये सारे रासायनिक तत्त्व और धातु त्वचा में एलर्जी का कारण बनते हैं. इससे चर्म रोग होने की आशंका होती है. चिकित्सकों का कहना है कि टैटू की स्याही के कारण होने वाली एलर्जी से सोराइसिस जैसी बीमारी होने का खतरा रहता है. इसी तरह टैटू बनवाने की प्रक्रिया में इस्तेमाल की जाने वाली सुई से असावधानी होने पर चर्म रोग के साथ-साथ त्वचा कैंसर, हेपेटाइटिस, एचआईवी आदि जैसी संक्रमित बीमारियाँ होने का खतरा रहता है.


त्वचा रोग चिकित्सकों का कहना है कि टैटू बनवाने के बाद शरीर पर होने वाली समस्याओं में टैटू रिऐक्शन सबसे आम है. जब तक शरीर में टैटू की स्याही रहेगी तब तक शरीर में एलर्जी जैसी समस्या होती रहेगी. इससे त्वचा के कैंसर का खतरा बहुत कम है मगर संक्रामक बीमरियाँ होने की संभावना बहुत अधिक है. ऐसे में टैटू बनवाने में सावधानी रखनी चाहिए. इसे बनवाने से पहले हेपेटाइटिस बी का टीका लगवा लें तो इस संक्रामक बीमारी से बहुत हद तक बचा जा सकता है. इसके अलावा टैटू बनवाने से पहले यह सुनिश्चित कर लें कि बनाने वाला इसका अच्छा जानकार हो. उसके पास आधुनिक उपकरण और साफ-सफाई का पूरा ध्यान दिया जाता हो. टैटू बनाने वाली जगह पर नियमित रूप से ऐंटीबायॉटिक क्रीम लगाते रहें. वर्तमान दौर में टैटू के प्रति दीवानगी चरम पर है. यदि कुछ सावधानियों को अपना लिया जाये तो संभव है कि ये शौक कम समस्याओं वाला रहे.

 






 

16 जनवरी 2023

ऑनलाइन धोखाधड़ी का फैलता जाल

राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन की हालिया रिपोर्ट में ऑनलाइन धोखाधड़ी से सम्बंधित मामलों के आँकड़े न केवल चौंकाने वाले हैं बल्कि डराने वाले भी हैं. रिपोर्ट के अनुसार पिछले पाँच वर्षों में देश में ऑनलाइन धोखाधड़ी के मामलों में तीन गुना से भी अधिक की वृद्धि हुई है. पाँच वर्ष पूर्व ऑनलाइन धोखाधड़ी की दर्ज शिकायतों की संख्या साठ हजार से कम थी जो बढ़कर एक लाख चौरासी हजार तक पहुँच गई है. ये चिंताजनक इसलिए है क्योंकि ये वे आँकड़े हैं जिनकी शिकायत साइबर सेल में दर्ज हुई है. बहुत से मामले तो ऐसे होंगे जिनमें शिकार व्यक्तियों ने शिकायत दर्ज नहीं करवाई होगी.


वर्तमान दौर तकनीक का है. बहुसंख्यक लोग इंटरनेट के माध्यम से खरीदारी करने का काम करते हैं. अपने मनपसंद सामान को लेने के बाद तत्काल ही एक क्लिक पर उसका भुगतान हो जाता है. ऑनलाइन खरीददारी के साथ-साथ ऑनलाइन भुगतान वाली स्थिति भी लोगों के लिए बहुत सामान्य सी हो गई है. उनके लिए अब पर्स में नकद धनराशि रखने वाली समस्या नहीं है, उसकी सुरक्षा की चिंता नहीं है. मोबाइल, लैपटॉप आदि के माध्यम से पलक झपकते ही भुगतान हो जाता है मगर यही सुविधा उपभोक्ताओं के साथ ठगी भी करवा रही है. ऑनलाइन आर्थिक गतिविधियों के सञ्चालन में एक तरफ वे लोग हैं जो इस सुविधा का लाभ उठा रहे हैं, इसके दूसरी तरफ वे अपराधी प्रवृत्ति के लोग भी हैं जो इन ऑनलाइन तकनीक का लाभ उठाकर धोखाधड़ी कर रहे हैं, उपभोक्ताओं को लूट रहे हैं. सामान्य बोलचाल में इसे साइबर अपराध या साइबर क्राइम कहा जाता है.




वर्तमान में सरकार के सामने साइबर सुरक्षा बहुत बड़ी चुनौती के रूप में सामने है. साइबर सुरक्षा ऐसा क्षेत्र है जो बहुत ज़्यादा अस्थिर है. साइबरस्पेस से जुड़े खतरे और उनके अलग-अलग तरीक़ों में तेज़ी से वृद्धि हो रही है. अभी हाल ही में रैनसमवेयर अटैक के कारण नई दिल्ली के एम्स में साइबर सुरक्षा में लगी सेंध इसका सबसे ताज़ा उदाहरण है. वर्ष 2022 की माइक्रोसॉफ्ट डिजिटल डिफेंस रिपोर्ट के अनुसार केन्द्र और राज्य अपने-अपने स्तर पर लगातार बढ़ते साइबर हमलों का सामना कर रहे हैं. ये हमले मुख्य रूप से सूचना तकनीक क्षेत्र में, वित्तीय सेवाओं में, परिवहन प्रणाली के साथ-साथ संचार से जुड़े बुनियादी ढाँचे पर हो रहे हैं. साइबर अपराध से जुड़े लोग न केवल सामान्यजन को अपना निशाना बनाते हैं वरन सरकार की सेवाओं और सुविधाओं को जन-जन तक पहुँचाने वाले मंचों को भी अपना निशाना बनाते हैं. इसी कारण से साइबर सुरक्षा सरकार की दृष्टि से भी और आमजन की दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है.


नेशनल कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीमों अर्थात राष्ट्रीय सीईआरटी द्वारा देश की सीमा के भीतर और सीमा पार से संभावित साइबर खतरों को पहचानने में महत्त्वपूर्ण कार्य किया है. आज भी साइबर सुरक्षा उल्लंघनों और इससे जुड़ी घटनाओं की सूचना देने में सीईआरटी सबसे आगे है. कह सकते हैं कि सरकारी तंत्रों में साइबर अपराधियों के सेंध लगाये जाने को रोकने के अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय उपाय हैं किन्तु आमजन जरा सी लापरवाही के कारण ऑनलाइन धोखाधड़ी का शिकार हो जाता है. यद्यपि सरकार की तरफ से भी नागरिकों के हितों की रक्षा के प्रयास लगातार किये जाते हैं इसके बाद भी सामान्य उपभोक्ता साइबर अपराधी द्वारा ऑनलाइन धोखाधड़ी का शिकार हो जाता है. ऐसी स्थिति में नागरिकों को स्वयं में सचेत और सजग रहने की महती आवश्यकता है.


साइबर क्राइम वास्तव में एक अपराध ना होकर विभिन अपराधों का समूह है जिसमे हैकिंग, ऑनलाइन ठगी, फिशिंग, स्पैम ईमेल, रैनसमवेयर, पोर्नोग्राफी, ऑनलाइन ब्लैकमेल एवं इसी प्रकार के अन्य अपराध आते है. किसी भी साइबर अपराधी द्वारा किये जाने वाला सबसे आम साइबर अपराध हैकिंग और अनाधिकृत प्रवेश है. इसमें अपराधी मानसिकता के किसी भी व्यक्ति द्वारा कम्प्यूटर अथवा किसी नेटवर्क में बिना सम्बंधित व्यक्ति की अनुमति के उसका सञ्चालन करना हैकिंग अथवा अनाधिकृत प्रवेश कहलाता है. इसके द्वारा विभिन्न प्रकार की निजी जानकारियाँ और महत्वपूर्ण सीक्रेट डाटा को चुराया जाता है, जिसके माध्यम से यूजर को वित्तीय एवं अन्य प्रकार से नुकसान पहुँचता है. सबसे अधिक अपराध ऑनलाइन ठगी द्वारा किया जा रहा है. अपराधियों द्वारा उपभोक्ता की बैंकिंग जानकारियाँ चुरा ली जाती हैं और उसके माध्यम से उपभोक्ता के बैंक खाते से रकम निकाल ली जाती है. ऑनलाइन ठगी में एक अन्य रूप में फ़ोन कॉल के द्वारा लोगों से उनके फ़ोन नंबर पर किसी सेवा सुविधा के लिए ओटीपी, क्रेडिट-कार्ड, डेबिट कार्ड नंबर आदि देने को कहा जाता है. जैसे ही उपभोक्ता के द्वारा ऐसा किया जाता है, साइबर अपराधी उसके बैंक खाते में सेंध लगाकर धन की निकासी कर लेते हैं. इसके अलावा कई बार उपभोक्ता को स्पैम ईमेल भेजी जाती है. उपभोक्ता द्वारा उस लिंक पर क्लिक करते ही सिस्टम को हैक कर लिया जाता है. इस तरह भी उपभोक्ता अपनी निजी या बैंकिंग जानकारियाँ अनजाने ही साइबर अपराधियों तक पहुँचा देते हैं.  


ऐसा नहीं नही कि साइबर अपराधियों से बचने का कोई तरीका ही नहीं है. बचने के लिए सबसे प्रमुख है उपभोक्ता का स्वयं में जागरूक रहना. अक्सर इंटरनेट यूजर को ऐसे ईमेल और मैसेज आते रहते हैं जिन पर अनजान लिंक मौजूद होते हैं. इन ईमेल और मैसेज से सावधान रहना चाहिए. कुछ इसी तरह की स्थिति उस समय होती है जबकि कोई व्यक्ति किसी वेबसाइट पर अपने उत्पाद, सम्बंधित सेवा की तलाश कर रहा होता है. यहाँ ध्यान रखा जाये कि अनजान वेबसाइट पर क्लिक न किया जाये. आये दिन हम सभी किसी न किसी एप्लीकेशन को अपने मोबाइल या लैपटॉप में डाउनलोड करते हैं. मुफ्त के एप्लीकेशन और उनके साथ-साथ अन्य दूसरे एप्लीकेशन को डाउनलोड करने के लालच से बचना चाहिए. यदि किसी एप्लीकेशन द्वारा किसी भी तरह की अनुमति माँगी जा रही है तो उसे देने के पहले अवश्य जाँच लें कि सम्बंधित कदम की आवश्यकता उस एप्लीकेशन के लिए कितनी है. इंटरनेट उपभोक्ता को अपनी व्यक्तिगत, बैंकिंग सम्बन्धी और अन्य गोपनीय जानकारियाँ सबके साथ शेयर नहीं करनी चाहिए. अक्सर इनके द्वारा भी साइबर अपराधी द्वारा अपराध किये जाते हैं.


उपभोक्ता अपने नेटवर्क को सुरक्षित रखें. कोशिश करें कि अपने मोबाइल, लैपटॉप आदि को यथसंभव अपडेट करते रहें. इसके अलावा सार्वजनिक वाई-फाई की सुविधा का इस्तेमाल करने से भी यथासंभव बचें. यह माध्यम भी साइबर धोखाधड़ी के लिए इस्तेमाल किया जाता है. इसके साथ-साथ अपने एप्लीकेशन में, अपनी वेबसाइट अथवा किसी भी अन्य ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म में प्रयोग किये जाने वाले पासवर्ड को मजबूत और सुरक्षित बनायें. सुरक्षित बनाये गए पासवर्ड को भी समय-समय पर बदलते रहें. ध्यान रखें यदि हम सावधानी बरतेंगे, जरा से सजग रहेंगे तो साइबर अपराधियों द्वारा फैलाये गए जाल में फँसने से बच सकेंगे.  





 

02 जनवरी 2022

साइबर क्राइम से बचा जा सकता है

साइबर अपराध या साइबर क्राइम आज एक प्रचलित शब्द है. आखिर ये साइबर अपराध क्या है? सहज शब्दों में कहें तो इंटरनेट का उपयोग करके कंप्यूटर, लैपटॉप या मोबाइल के द्वारा किया गया कोई भी गैर-कानूनी कार्य साइबर अपराध है. इसके द्वारा एक व्यक्ति मोबाइल, कंप्यूटर आदि के द्वारा इंटरनेट का उपयोग करके किसी दूसरे व्यक्ति के साथ धोखाधड़ी करके गैर कानूनी तरीके से किसी भी कार्य को करता है तो उस व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य साइबर अपराध कहलाता है. ऐसे कार्य करने वाले व्यक्ति को साइबर अपराधी कहते हैं.


इस तरह के अपराध में साइबर अपराधी कोई ना कोई गैर कानूनी तरीके से ऑनलाइन मोड में किसी भी व्यक्ति की व्यक्तिगत जानकारी जैसे उसके लेनदेन करने के खाते का, व्यापारिक गतिविधि के खाते का, सोशल मीडिया खाते का लॉग इन आईडी, उसका पासवर्ड, उसकी निजी जानकारी, उसके बैंक से सम्बंधित जानकारी, केडिट कार्ड, डेबिट कार्ड, आदि की जानकारी लेने अथवा चुराने का प्रयास किया जाता है या फिर चुरा लिया जाता है. ऐसा करने के बाद साइबर अपराधी आर्थिक नुकसान पहुँचाता है.




आर्थिक अपराध के अलावा इंटरनेट पर अब बिना सम्बंधित व्यक्ति की जानकारी के, बिना उसकी अनुमति के उसकी सामग्री का चोरी किया जाना भी आम बात होती जा रही है. ऐसे में यह भी एक तरह का अपराध है.


इसके साथ-साथ किसी व्यक्ति की निजी जानकारी के लिए किसी भी अवैध तरीके से उसके लैपटॉप, कंप्यूटर, मोबाइल आदि में प्रवेश करके सामग्री, जानकारी का चोरी करना भी साइबर अपराध है.


साइबर अपराध में किसी भी अपराधी को कंप्यूटर, मोबाइल के साथ-साथ एक इंटरनेट कनेक्शन की आवश्यकता होती है. उसी के द्वारा वह किसी व्यक्तिगत या सरकार की आर्थिक संपत्ति अथवा अन्य तरह के अपराध करता है.


साइबर अपराध में केवल किसी दूसरे की जानकारी को चोरी करना, आर्थिक चोरी करना ही अपराध नहीं है बल्कि किसी दूसरे की किसी भी तरह की डिवाइस में किसी ऐसे वायरस को पहुँचाना भी अपराध है जिससे उस सम्बंधित कंप्यूटर, मोबाइल आदि को नुकसान पहुँचाया जा सके. इसी तरह किसी भी व्यक्ति की निजी अथवा किसी सार्वजनिक जानकारी का उपयोग बिना उसकी जानकारी, अनुमति के करना भी साइबर अपराध है. किसी दूसरे व्यक्ति की मेल आईडी का गैर-कानूनी इस्तेमाल करना अथवा उसकी क्लोनिंग करके किसी दूसरे से ठगी, धोखाधड़ी करना आदि भी साइबर अपराध की श्रेणी में आता है.


इधर सोशल मीडिया का उपयोग भी बहुतायत हो रहा है. इंटरनेट की मदद से सोशल साइट्स पर गैर कानूनी फोटो, वीडियो, सामग्री, जानकारी को फैलाना से भी साइबर अपराध माना गया है. इसमें इस तरह की जानकारी, सामग्री भी अपराध की श्रेणी में शामिल है जिसके द्वारा सांप्रदायिक तनाव बढे, राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हो, देश हित से सम्बंधित किसी भी जानकारी का गैर-कानूनी इस्तेमाल हो.


इसके अलावा तमाम सोशल साइट्स एप्स जैसे Watsaap, Facebook, Twitter, Teligram, Instagram आदि पर फर्जी नाम या फर्जी आईडी बना कर गैर कानूनी तरीके से किया गया कोई भी कार्य साइबर अपराध कहलाता है.


साइबर अपराधियों से खुद को बचाए रखने के लिए आवश्यक है कि हम सभी अपने सुरक्षा कदमों को मजबूत रखें. अपने खातों से सम्बंधित जानकारियों को सार्वजनिक न करें.


किसी भी तरह की व्यावसायिक गतिविधि में उपयोग होने वाले प्लेटफोर्म में उपयोग किये जाने वाले किसी भी गुप्त कोड को किसी के साथ भी शेयर न करें.


समय-समय पर अपनी आईडी का पासवर्ड बदलते रहें. अनजान मैसेज लिंक या मोबाइल पर आए नोटिफिकेशन पर तब तक क्लिक न करें जब तक कि उसके बारे में पुख्ता जानकारी हासिल न हो.


यदि मनी ट्रांसफर करने वाले तमाम एप्प्स, जैसे SBI नेटबैंकिंग, Phone Pay, Google Pay आदि का यदि उपयोग करते हों तो उनकी टू स्टेप सुरक्षा व्यवस्था करें. साथ ही उसमें काम करने के बाद तुरंत Logout कर दें.


ऐसे अनेक छोटे-छोटे कदम हैं, जिनके उठाये जाने के बाद साइबर अपराधियों के क़दमों को रोका जा सकता है. यह हम सबकी सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है.


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01 अक्टूबर 2021

भयावह माहौल का इंतजार

सितम्बर माह का भी समापन होने को है। इस साल के नौ महीने बीत जायेंगे कुछ घंटों बाद। वर्ष 2020 खतरनाक आहट के साथ आया था और वर्ष 2021 ने खतरनाक रूप दिखाया भी। इस खतरनाक रूप को गुजरे अभी कुछ महीने ही बीते हैं मगर ऐसा लगता है कि जैसे लोग सबकुछ भूल चुके हैं। याद करिए पिछले वर्ष 2020 को अगस्त सितम्बर से सबकुछ सामान्य होने लगा था। इस सामान्य होती दिनचर्या को तगड़ा झटका इस साल लगा। अचानक से भयावहता दिखने लगी। एकदम से ऑक्सीजन की कमी होने लगी। भयावह तरीके से मौतों की संख्या बढ़ने लगी।


रुकिए, रुक कर सोचिए, विचार करिए कि क्या ये सब महज एक बीमारी के कारण हुआ? फिर सोचिए कि इस साल के आरम्भ में वैक्सीनेशन भी शुरू हो गया था। सबकुछ सामान्य था फिर एकदम से ये भयावह रूप? मानवजनित बीमारी के बाद क्या ये सम्भव नहीं कि मानवजनित माहौल बना दिया गया हो, लोगों के मरने के लिए? क्या ये सम्भव नहीं कि जानबूझकर ऑक्सीजन की कमी कर दी गई हो? चिकित्सकों की लापरवाही तो हमने व्यक्तिगत स्तर पर देखी, अनुभव की थी। बहरहाल, जो हुआ सो हुआ पर अब क्या करना है? क्या अब तीसरी लहर के रूप में एक और साजिश का, एक और मानवजनित माहौल का सामना करना है?


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24 जून 2021

हाल्ट, हुकुम सर देयर, फंडर फ़ो

हाल्ट, हुकुम सर देयर. फंडर फ़ो. इस वाक्य से आपमें से संभव है कि बहुत से लोगों का पाला पड़ा हो और बहुत से लोगों का नहीं भी पड़ा होगा. बहुत से लोगों से ऐसे वाक्य का सामना प्रत्यक्ष रूप से किया होगा और बहुत से लोग ऐसे होंगे जिन्होंने ऐसे लोगों की जुबानी ही इस वाक्य से परिचय पाया होगा. हम भी उन्हीं लोगों में से हैं जिन्होंने इस वाक्य का परिचय अपने बाबा जी से प्राप्त किया है.


वैसे बहुत से लोग तो अभी तक कई बार पढ़ चुके होंगे इसे और इसके भीतर की टाइपिंग मिस्टेक खोजने में लगे होंगे. बहुत से लोगों ने तो टाइपिंग मिस्टेक निकाल कर इसे सही भी पढ़ लिया होगा. अब पता नहीं उन्होंने क्या गलती निकाली होगी और उसको सही करके क्या पढ़ा होगा? ये तो परदे के पीछे की बात है मगर जो लोग भी इस वाक्य से परिचित हैं वे अवश्य ही मन ही मन में या फिर खुलकर मुस्कुरा रहे होंगे.


असल में ऐसा वाक्य सुरक्षा प्रहरियों द्वारा किसी समय बोला जाता था. हमारे बाबा जी पुलिस में हुआ करते थे. उनकी पुलिस विभाग में सेवाएँ अंग्रेजी राज्य के समय से ही शुरू हो गईं थीं. उस समय के बारे में, सुरक्षात्मक कदमों के बारे में बताते समय ऐसे वाक्य से हम लोगों का परिचय करवाया था. यह वाक्य असल में ऐसा नहीं हुआ करता था बल्कि जो पहरेदार, सुरक्षाकर्मी अपनी ड्यूटी में तैनात हुआ करते थे उनके द्वारा मूल वाक्य को कुछ इस रूप में बोला जाता था.




इस वाक्य का मूल वाक्य भी आपके बीच रखेंगे पहले इसके बोले जाने का कारण तो पढ़ लीजिये. सुरक्षा बलों की तैनाती की जगह पर, कार्यालय, घरों आदि की सुरक्षा में तैनात कर्मियों द्वारा यह वाक्य उस समय जोर से बोला जाता था जब कोई उनकी निर्धारित सीमा के भीतर प्रवेश कर जाता था. इस वाक्य के द्वारा वे सामने से आने वाले की, सीमा रेखा में घुस आने वाले की पहचान करते थे कि वह दोस्त है अथवा दुश्मन. अब आप सोचेंगे कि एक जरा से वाक्य से कोई कैसे पहचान सकता था कि अन्दर आने वाला दोस्त है या दुश्मन. जी हाँ, सही सोचा आपने. असल में सुरक्षा कर्मियों को किसी भी संदिग्ध व्यक्ति के अपनी सीमा रेखा में घुस आने वाले को गोली मार देने तक के आदेश हुआ करते थे. इसलिए जैसे ही कोई संदिग्ध व्यक्ति इन सुरक्षा कर्मियों को अपनी सीमा में घुसता दिखाई देता था तो वे जोर से बोलते थे, हाल्ट हुकुम सर देयर. फंडर फ़ो. ऐसा वे तीन बार जोर-जोर से बोला करते थे. उसमें जवाब मिल जाने पर तो ठीक अन्यथा की स्थिति में वे सुरक्षा कर्मी उस संदिग्ध पर गोली भी चला देते थे.


यह वाक्य सुरक्षा कर्मियों के अल्प शिक्षित होने, ग्रामीण अंचलों से होने के कारण इस तरह बोला जाने लगा था. मूल वाक्य इस तरह का नहीं हुआ करता था. हॉल्ट, हू कम्स देयर, फ्रेंड ऑर फ़ो?  के द्वारा सामने आने वाले से जानकारी ली जाती थी कि वह दोस्त है या दुश्मन. सामने वाला भी पहली बार में ही अपना जवाब दे दिया करता था.


बाबा जी बताया करते थे कि कई बार दुश्मन की तरफ से अचानक से हमला हो जाया करता था. सुरक्षा कर्मियों को बोलने का, पूछने का मौका ही नहीं मिल पाता था कि हाल्ट. हुकुम सर देयर, फंडर फ़ो? और वे इसे बोलने, पूछने के पहले ही दुश्मन के हमले का शिकार हो जाया करते थे. कुछ इसी तरह का दुश्मन अबकी हमारे बीच है, जो हमारी सुरक्षा व्यवस्था को पूछने का अवसर ही नहीं दे रहा है कि हू कम्स देयर, फ्रेंड ऑर फ़ो? वह तो बस सीधे हमला कर दे रहा है. हमारी इम्युनिटी को, हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बुरी तरह से प्रभावित कर दे रहा है.


जी हाँ, सही समझे आप, कोरोना अबकी ऐसा ही दुश्मन बनके आया है जिसने पूछने का मौका ही नहीं दिया. अभी भी मौका है संभलने का, अपने सुरक्षा तंत्र को सजग बनाने का. अपनी क्षमता को मजबूत कीजिये, अपनी इम्युनिटी पॉवर को बढ़ाइए और किसी भी दुश्मन के हमला करने से पहले, उसके सीमा रेखा में घुसने के पहले ही सुरक्षा तंत्र को पूछने दीजिये, हाल्ट, हुकुम सर देयर.....


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08 अक्टूबर 2020

साइबर अपराधियों से सतर्क रहने की आवश्यकता

वर्तमान में समाज के लगभग सभी कार्य इंटरनेट के माध्यम से होने लगे हैं. सरकार हो या आम आदमी, सरकारी संगठन हों या फिर निजी संस्थान, व्यापार हो या फिर नौकरी, शिक्षा हो या समाजसेवा सभी क्षेत्र आज इंटरनेट का लाभ उठा रहे हैं. इस लाभ के साथ अनचाहे ही बहुत से नुकसान भी समाज में दिखाई देने लगे हैं. इंटरनेट जहाँ एक तरफ लोगों को लाभान्वित कर रहा है वहीं दूसरी तरफ वह नुकसान भी पहुँचा रहा है. इस तरह के तमाम सारे नुकसान को साइबर क्राइम या फिर साइबर अपराध के नाम से जाना जाता है. सामान्य रूप में इंटरनेट पर किया जाने वाला कोई भी अपराधिक कार्य साइबर अपराध के अंतर्गत आता है. इस तरह के अपराध में हैकिंग तो शामिल है ही साथ ही बैंकिंग धोखाधड़ी, किसी का डाटा, जानकारी का चुराया जाना, किसी तरह की धोखाधड़ी करके किसी दूसरे के एकाउंट, ईमेल आदि को हैक कर लेना भी साइबर अपराध की श्रेणी में शामिल किया गया है.


साइबर अपराध में जिस तरह के कार्यों को मुख्य रूप से शामिल किया गया है, उनमें वित्तीय अपराध, अवैध सामग्रियों को बेचना, अश्लील सामग्री का प्रसार-प्रचार, बौद्धिक संपत्ति की चोरी, जालसाजी, आदि हैं. साइबर अपराध की श्रेणी में मुख्य रूप से हैकिंग को शामिल किया गया है. इसमें कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के जानकार व्यक्ति द्वारा किसी कंप्यूटर को लक्ष्य करके उसके लिए सम्बंधित प्रोगाम का निर्माण किया जाता है. इसके बाद वे उस लक्ष्य कंप्यूटर में अपने प्रोग्राम के द्वारा एंट्री करके उस सम्बंधित कंप्यूटर से डाटा चोरी करते हैं. ऐसे हैकर्स का मुख्य लक्ष्य आर्थिक लाभ उठाना होता है. वे इसके लिए किसी अन्य व्यक्ति के कंप्यूटर में अवैध प्रवेश करके उसके कंप्यूटर से बैंक, क्रेडिट कार्ड, एटीएम आदि की सूचनाएँ हासिल कर लेते हैं. किसी व्यक्ति की आर्थिक सूचनाओं को चोरी करने के साथ-साथ ऐसे लोग बड़े-बड़े संस्थानों में भी सेंध लगाते हैं.




आर्थिक चोरी के साथ-साथ वर्तमान में इंटरनेट पर बहुत बड़ा बाजार पोर्नोग्राफी का है. बहुत सी वेबसाइट इसके लिए वयस्कों से सम्बंधित बने नियम-कानूनों का इस्तेमाल करके अपना कारोबार करती हैं मगर बहुत सी वेबसाइट ऐसी हैं जो बाल यौन सम्बन्धी सामग्री का प्रसार करती हैं. देखा जाये तो वैश्विक स्तर पर बाल यौन सामग्री का सर्वाधिक प्रसार इंटरनेट के माध्यम से हो रहा है.


इंटरनेट पर अश्लील सामग्री अत्यंत सुलभ है. आजकल हर हाथ में मोबाइल होने से औ हर हाथ में इंटरनेट होने से इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री को किसी तक पहुँच बनाना कठिन काम नहीं रह गया है. बच्चे भी अब इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री से दूर नहीं रह पाते हैं. यौन अपराध में लिप्त लोग इसी कारण से यौन अपराध के लिए बच्चों को लक्ष्य करते हैं. इसके लिए वे बच्चों में अश्लील सामग्री, वीडियो, फोटो आदि प्रसारित कर उन्हें बहकाते हैं. ऐसी सामग्री को देखने के बाद बहुत से बच्चे भटक जाते हैं. यही बच्चे इन यौन अपराधियों के द्वारा जबरन यौन अपराध में लिप्त कर दिए जाते हैं.  


इन दो मुख्य अपराधों के अलावा साइबर अपराधी भ्रामक ईमेल भेजने के कार्य करता है, जिससे कि यूजर से निजी सूचना लेकर उसके एकाउंट से चोरी करने का प्रयास किया जाये. ईमेल के द्वारा सम्बंधित यूजर को बताया जाता है वह किसी और वेबसाइट में जाकर अपने बैंक की, अपने आधार कार्ड की, अपने पैन कार्ड की, अपने एटीएम की, अपने अन्य किसी दस्तावेज़ की जानकारी भर कर उसे अपडेट करवा ले. ऐसा करने के पीछे मुख्य उद्देश्य यूजर की समस्त जानकारियों को प्राप्त करना होता है. ऐसा करके साइबर अपराधी सम्बंधित यूजर के साथ धोखाधड़ी कर लेता है. इसके लिए साइबर अपराधी कई बार फोन कॉल करके ओटीपी अथवा अन्य गुप्त कोड को बताने की बात करता है.


अब जबकि इंटरनेट का उपयोग सर्व-सुलभ रूप से किया जाने लगा है और यह उपयोग हमारे दैनिक जीवन की दैनिक क्रियाओं की तरह हो गया है तो हम सबको इसके उपयोग में सावधानी बरतने की भी आवश्यकता है. यहाँ हमें ध्यान रखना होगा कि अपने किसी भी इंटरनेट खाते का पासवर्ड सरल नहीं बनाना चाहिए. हमें अपने खातों का पासवर्ड ऐसा बनाना चाहिए जिसे हैक करना सहज न हो. कभी भी अपने नाम, अपनी जन्मतिथि, अपने मोबाइल नंबर, अपने परिजनों के नाम आदि से सम्बंधित पासवर्ड नहीं बनाना चाहिए. ऐसे पासवर्ड को डिकोड करना आसान होता है.


इसके अलावा किसी को भी फोन पर अपने किसी भी इलेक्ट्रॉनिक कार्ड का ओटीपी, पिन आदि नहीं बताना चाहिए. कई बार साईबर अपराधी स्वयं को सम्बंधित बैंकिंग संस्थान का व्यक्ति बताकर गुप्त कोड की जानकारी कर लेता है. इसके लिए ऐसी किसी भी तरह की कॉल आने पर पुलिस को सूचना दी जानी चाहिए.


इसी तरह से अपने सोशल मीडिया खातों के लिए, अपने बैंक खातों के लिए, अपने व्यापारिक खातों के लिए डबल स्टेप सुरक्षा व्यवस्था को लागू किया जाना चाहिए. इस व्यवस्था में लॉग इन करने पर मोबाइल पर एक गुप्त कोड तत्काल प्राप्त होता है. इस तरह की टू वे वेरिफिकेशन प्रक्रिया अपनाये जाने से भी बहुत हद तक साइबर अपराध को रोका जा सकता है.


इसके अलावा सबसे ऊपर जो बात है, वो ये कि हम सभी को सजग रहने की आवश्यकता है. हम इंटरनेट पर जो भी काम कर रहे हैं, उनसे सम्बंधित सुरक्षा उपायों को, क़दमों को अपनाते हुए ही आगे बढ़ें. किसी भी तरह के इंटरनेट कार्य को करने के पहले यह सुनिश्चित कर लें कि वह सुरक्षित है और साथ ही उस इंटरनेट सम्बन्धी कार्य से हम भी तो अनजाने में कोई साइबर अपराध तो करने नहीं जा रहे. ध्यान रखें कि सावधानी ही बचाव है.


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27 जून 2020

कोरोना संक्रमण से सम्बंधित कुछ प्रश्नों के उत्तरों की अपेक्षा

कोरोना संक्रमण को लेकर बहुत सी बातें लगातार सामने आ रही हैं. सामाजिक, शारीरिक दूरी बनाये जाने की बातें की जा रही हैं. हाथ धोने के तरीके बताये जा रहे हैं. इन सबके बीच कुछ शंकाएँ हैं, मन में. शंकाएँ इसलिए क्योंकि जो प्रश्न मन में उठते हैं उनके बारे में समाधान खुद से ही खोज लेते हैं मगर उनके बारे में स्पष्ट उत्तर मिलते नहीं.



सवाल ये हैं कि कोरोना संक्रमण फैलने का मूल कारण क्या है?
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यदि दो व्यक्ति एकसाथ सटे हुए बैठे/खड़े हैं. उनमें एक व्यक्ति पॉजिटिव है और दूसरा स्वस्थ. वे आपस में किसी तरह की बातें न करें (ड्रॉपलेट सम्बन्धी कोई कारण न हो) तो भी क्या दूसरा व्यक्ति संक्रमित हो जायेगा?
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किसी स्वस्थ व्यक्ति ने किसी संक्रमित व्यक्ति से हाथ मिला लिया या फिर किसी संक्रमित वस्तु को छू लिया तो क्या वो पॉजिटिव हो जायेगा?
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यदि स्वस्थ व्यक्ति किसी संक्रमित व्यक्ति/वस्तु को छूने के बाद अपने हाथ को आँख, नाक, मुँह में नहीं लगाता तो भी क्या वह संक्रमित हो जायेगा?
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ऐसी स्थिति में कितने देर रहने के बाद उसकी हथेली संक्रमण मुक्त हो जाएगी, यदि उसे साबुन न मिले, सेनेटाइजर न मिले? या वह संक्रमित ही बनी रहेगी?
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यदि स्वस्थ व्यक्ति किसी ऐसी जगह बैठ जाए जिसे किसी संक्रमित व्यक्ति ने छू लिया हो या वहाँ कोई संक्रमित व्यक्ति बैठा रहा हो तो क्या वो स्वस्थ व्यक्ति संक्रमित हो जायेगा?
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कोरोना संक्रमित व्यक्ति के शरीर के किस हिस्से से छूने से संक्रमण फैलेगा? क्या पॉजिटिव व्यक्ति का पूरा शरीर संक्रमित हो जाता है?
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कहा जा रहा है कि संक्रमण मुँह, आँख, नाक के सहारे फेफड़ों तक ही हो रहा है, ऐसे में किसी संक्रमित व्यक्ति का पूरा शरीर किस तरह/किस कारण संक्रमित हो जाता है?
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संक्रमित व्यक्ति जो कपड़े पहने होता है क्या उसका ऊपरी हिस्सा भी संक्रमित रहता है, जिसे उसने अपनी हथेलियों से न छुआ हो?

सवाल तो बहुत सारे हैं मगर सब इन्हीं के आसपास घूमते-टहलते हैं. इनका जवाब इसलिए भी आवश्यक है, ये जरूरी नहीं कि हमें मिलें बल्कि सबको पता होने चाहिए क्योंकि कोरोना के नाम से जिस भय का व्यापार अब हो रहा है वह खतरनाक है. आज ज्यादातर डॉक्टर्स किसी मरीज को देखने की कोशिश भी नहीं कर रहे हैं. वे ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे बीमार व्यक्ति अपनी आँखों से कोरोना फेंक रहा है.

इन सवालों के जवाब इसलिए भी मालूम होने चाहिए क्योंकि जिस तरह से लोगों का बाहर निकलना हो रहा है, जिस तरह से सभी कार्यालय, संस्थान अपनी सामान्य स्थिति में आ रहे हैं उससे कोरोना संक्रमण बढ़ने की ज्यादा सम्भावना है. मास्क को लेकर, हाथ धोने को लेकर, ड्रॉपलेट को लेकर, मौसम को लेकर, वायरस के जीवित रहने को लेकर जिस तरह से अलग-अलग बातें निकल कर सामने आ रही हैं, वे चिंताजनक हैं. ऐसे में इस तरह के और दूसरे सवालों को उठाया जाना चाहिए, उनका समाधान खोजना चाहिए. सुरक्षा तो अपनी जगह है, संभव है कि ऐसे सवालों से प्राप्त जानकारी से भी सावधानी बढ़ाई जा सके.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

30 मार्च 2020

आँखों की भी सुरक्षा करें लॉकडाउन में

हम सभी इस समय लॉकडाउन वाली स्थिति में हैं. बहुत आवश्यक या कहें कि अनिवार्य होने की स्थिति में ही घर से निकलें अन्यथा घर पर ही रहें. ऐसा बहुत से लोग कर रहे हैं और बहुत से लोग नहीं कर रहे हैं. जैसी जिसकी सोच, बहरहाल जो लोग लॉकडाउन का पूरी ईमानदारी और अनुशासन से पालन कर रहे हैं वे कोरोना के संक्रमण से भले बचे हुए हों मगर बहुतायत लोग मोबाइल के संक्रमण की चपेट में हैं. अब आप कहेंगे कि ये मोबाइल का संक्रमण कौन सी नई बीमारी है. तो इसे बताने की आवश्यकता नहीं बल्कि आप सभी इसे भली-भांति जानते हैं. जो लोग घरों में लगभग कैद जैसी स्थिति में हैं वे दिन भर और देर रात तक मोबाइल के साथ अपना समय बिता रहे हैं. कहिये, है न ऐसा?


मोबाइल का उपयोग तो वैसे भी कई बिन्दुओं से हम सबके लिए नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करता रहा है अब इस समय जबकि सारा दिन किसी तरह की अन्य व्यस्तता नहीं है तो समय मोबाइल के द्वारा ही बिताया जा रहा है. सोचने वाली बात है जिस मोबाइल का कुछ देर का उपयोग ही आँखों के लिए हानिकारक माना जा चुका है तब घंटों के हिसाब से मोबाइल का प्रयोग आँखों के लिए किस कदर लाभदायक होगी? लॉकडाउन का इस्तेमाल अब उन सारे कामों के लिए किया जा सकता है जिन्हें आप अपनी व्यस्तता के चलते अभी तक कर नहीं पाए थे. जिनको पढ़ने का शौक है वे अभी तक जिन-जिन किताबों को अपनी भागदौड़ में नहीं पढ़ सके थे, उन्हें पढ़ सकते हैं. इसी तरह बहुत से लोगों को परिवार के साथ समय न बिता पाने का दुःख रहता था. लीजिये, अब तो सुनहरी मौका है अपने परिवार के साथ वक्त बिताने का. ये समय ऐसा है जबकि आपके यार-दोस्त, पड़ोसी, रिश्तेदार भी आपको परेशान नहीं कर सकते हैं. आपके कोई और शौक भी हों तो इस दौरान उनको भी पूरा किया जा सकता है.


फिलहाल, अभी आँखों की सुरक्षा पर ध्यान केन्द्रित करना है. आप गौर करियेगा अभी से, मोबाइल चलाते समय आप कितनी बार अपनी पलकें झपकाते हैं? ये कोई सामान्य सी स्थिति नहीं बल्कि बहुत अनिवार्य स्थिति है. हमारी पलकें एक मिनट में लगभग 15 से 20 बार झपकती हैं. करिए गौर, मोबाइल चलाते समय एक मिनट में आपने कितनी बार अपनी पलकें झपकाईं? निश्चित ही यह इतनी बार नहीं है, जितना कि सामान्य अवस्था में होता है. इसका नुकसान यह होता है कि आपकी आँखों की नमी सूखने लगती है. नमी सूखने से आँखों की पुतली पर भी असर होता है, साथ ही इसका दुष्प्रभाव नसों पर भी पड़ता है. परिणामतः आँखों की रौशनी का प्रभावित होना शुरू हो जाता है. इसके साथ ही सिर दर्द की समस्या भी आम हो जाती है. इसके लिए आप एक काम करिए कि अपने मोबाइल या स्मार्टफोन को लगातार बहुत देर न चलायें. जैसा कि कंप्यूटर चलाते समय 20-20-20 का एक सिद्धांत आँखों की सुरक्षा के लिए काम करता है, वह यहाँ भी अपनाएँ. इस सिद्धांत में मोबाइल 20 मिनट चलाने के बाद 20 सेकेण्ड के लिए 20 फीट की दूरी पर देखना चाहिए. इससे आँखों को राहत मिलती है.

सुरक्षा की दृष्टि से रात को मोबाइल चलाने से बचना चाहिए. विशेष रूप से अँधेरे में तो मोबाइल चलाना ही नहीं चाहिए. रात में अथवा अँधेरे में मोबाइल का इस्तेमाल करना रेटिना के लिए घातक होता है. मोबाइल से निकलने वाली विशेष किरणें रात के समय सीधे रेटिना को नुकसान पहुँचाती हैं. इससे आँखें ख़राब हो जाती हैं और व्यक्ति अंधेपन का शिकार भी हो जाता है.

आँखों की सुरक्षा के सम्बन्ध में आप विशेष रूप से सजग रहिये क्योंकि यही किसी भी इन्सान के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण अंग है. अपने साथ-साथ अपने बच्चों को भी बचाने की कोशिश करें. आज बहुतायत में देखने में आता है  कि अभिभावक बच्चों को व्यस्त रखने के लिए मोबाइल पर उनके पसंद का चैनल, कार्यक्रम लगा देते हैं. बच्चों के साथ समय बिताने के बजाय वे उसे मोबाइल पर उलझा देते हैं. आज जबकि सारा दिन आप ही मोबाइल में व्यस्त रहेंगे तो संभव है कि बच्चा भी आपकी देखादेखी मोबाइल का और ज्यादा इस्तेमाल करेगा. बच्चों की कोमल आँखें बहुत जल्दी इससे नकारात्मक रूप से प्रभावित हो जाती हैं. यही कारण है कि आज बहुत से बच्चों में आँखों की समस्या उत्पन्न हुई है और उनको चश्मा लगाने की आवश्यकता महसूस हुई है.

ऐसे में आप सभी लोगों से निवेदन है कि आप देशहित में, समाजहित में, अपने परिवार के हित में घर पर ही रह रहे हैं. अच्छा है मगर इसके साथ ही इस पर भी ध्यान दें कि लॉकडाउन का पूरी ईमानदारी से पालन करने के बाद आप स्वयं और अपने परिजनों को कोरोना से बचा ले जाएँ मगर हो सकता है कि आँखों का कोई रोग लगा बैठें. आँखों को कमजोर कर बैठें.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

05 मार्च 2020

जीवन-शैली का सुधार ही बीमारियों से बचाव है

इस समय कोरोना वायरस का हौआ इस कदर छाया हुआ है कि यदि किसी के बगल में पहुँच कर सामान्य सा खाँस दो या छींक दो तो अगला ऐसे देखेगा जैसे मौत को देख लिया हो. यदि किसी को जरा सा मौसमी जुकाम भी हो गया तो तुरंत मेडिकल के चक्कर में पड़ जायेगा. संभव है कि कोरोना एक भयंकर वाली बीमारी हो. इसके प्रभाव में आने वाले की जान पर बन आये मगर क्या वाकई जीवन के लिए एकमात्र यही घातक बीमारी है? देखने में आ रहा है कि जब से कोरोना के देश में चंद मामले सामने आये हैं, लोग मुँह पर मास्क लगाकर चलने लगे हैं. अभी कुछ दिन पहले सरकार, शासन, प्रशासन अपनी दम लगाकर दो-पहिया वाहन चालकों को हेलमेट के लाभ बता रहा था, उनको प्रेरित कर रहा था, बिना हेलमेट वालों पर जुरमाना भी लगाया जा रहा था मगर क्या मजाल कि सबके कानों में जूँ रेंगी हो. कुछेक लोगों को छोड़कर बाकी लोगों को हेलमेट टाँगे तो जरूर देखा मगर लगाये हुए न देखा. इधर कोरोना के आने की खबर मात्र से बहुतायत लोगों के मुँह पर मास्क चिपक गए.


बीमारी से बचाव अच्छी बात है. किसी भी समस्या के चक्कर में पड़ने के पहले ही यदि उससे सुरक्षा कर ली जाए तो बेहतर होता है. इन सबके बीच ऐसे कई बिंदु दिमाग में आये जबकि लगा कि अब हम सभी किस कदर नकली या कहें कि कृत्रिम जीवन जीते चले जा रहे हैं. दिन भर किसी न किसी तरह से ऐसे काम में संलग्न रहेंगे जो पर्यावरण के हित में नहीं हैं मगर एक बीमारी के काल्पनिक हमले से बचने के लिए मुँह पर मास्क लगा लेंगे. क्या कभी इस पर विचार किया है कि कोरोना की आहट के पहले कितने लोग मास्क लगाकर घर से बाहर निकलते थे? शायद इक्का-दुक्का लोग ही ऐसा करते होंगे. तब क्या किसी बीमारी का खतरा नहीं था? क्या गाड़ियों से निकलने वाला धुँआ इन्सान के लिए किसी अमृत के समान है? क्या वह मनुष्य के शरीर में नहीं जा रहा? क्या उसका खानपान ऐसा है कि उसके किसी तरह की बीमारी न हो? क्या वह नैसर्गिक रूप से अपने आपको प्रकृति से जोड़कर चल रहा है? क्या उसकी दिनचर्या ऐसी है जो उसके लिए लाभप्रद है?

बहुत से लोग जो आज कोरोना के भय से मास्क लगाये घूम रहे हैं, इनमें से बहुतायत में ऐसे लोग हैं जो दिन भर तम्बाकू का, गुटके का सेवन करते हैं. घड़ी-घड़ी इनके मुँह से सिगरेट का धुँआ निकलता रहता है. असल में अब बहुतायत लोगों ने अपनी जीवन-शैली में परिवर्तन कर दिया है. उनकी दिनचर्या भी अलग तरह की हो गई है. खानपान भी बदल गया है. सेहत के नाम पर वे लोग सजग नहीं दिखाई देते हैं. यही कारण है कि आजकल बच्चे भी मोटापे का शिकार हो रहे हैं. नजर कमजोर हो रही है. बौद्धिक विकास भी त्वरित गति से नहीं हो रहा है. जरा सा परिश्रम करते ही साँस फूलने लगती है. कोरोना से बचाव का कारण उनकी जागरूकता नहीं है वरन मौत से उनका भय है. ऐसी किसी भी बीमारी से, जिसका कि इलाज संभव नहीं दिखता, व्यक्ति उसके प्रति जागरूक रहता है अन्यथा की स्थिति में वह लापरवाही करता ही करता है.


आज खेलकूद के प्रति लोगों का रुझान कम हुआ है. मैदान में न तो बच्चों की भीड़ दिखाई देती है और न ही बड़े लोगों की. सैर के नाम पर चंद बुजुर्ग लोग दिख जाते हैं. पैदल चलना जैसे आज तौहीन है, व्यक्तित्व पर दाग है. खुले में कुछ देर को बैठना, स्वच्छा हवा में साँस लेना आज के लोग जैसे जानते ही नहीं हैं. चौबीस घंटे वातानुकूलित वातावरण में रहने का आदी हो जाना, जंक फ़ूड की आदत लगा बैठना आदि नुकसान के सिवाय कुछ और नहीं कर रहे हैं. ऐसे में बीमारियों का पनपना आम बात है. ऐसे में ध्यान रखने की आवश्यकता है कि आज एक मास्क किसी को एकमात्र बीमारी से चंद पलों के लिए सुरक्षित रख सकता है क्योंकि वह मास्क भी तो संक्रमित होगा ही, किसी न किसी तरह से. उसे दोबारा उपयोग में लाने का अर्थ खुद को संक्रमित करना ही है. ऐसे में अपनी दिनचर्या को नियमित किया जाये. व्यायाम की तरफ ध्यान दिया जाए. शारीरिक श्रम करने की तरफ बढ़ा जाये. बच्चों को बजाय मोबाइल, कंप्यूटर के मैदान में खेलने को प्रोत्साहित किया जाये. ऐसा करके जहाँ एक तरफ कोई व्यक्ति अपनी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा सकता है वहीं दूसरी तरफ खुद को अनेक बीमारियों से भी सुरक्षित कर सकता है. 
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