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16 जून 2026

व्यक्तिगत स्वतंत्रता या नैतिक पतन

वर्तमान में भारतीय समाज एक तरह के वैचारिक और सांस्कृतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है. यह स्थिति न केवल चिंताजनक है बल्कि इस पर विचार करने की आवश्यकता है. आधुनिकता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, प्रगतिशीलता आदि का नाम लेकर वर्तमान समाज जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है, वहाँ नैतिक मूल्यों का पतन ही दिखता है. हास्य के नाम पर, मनोरंजन के रूप में अमर्यादित आचरण को दर्शाया जा रहा है. किसी कॉमेडी शो में एक युवक द्वारा अपनी महिला मित्र को बिरयानी खिलाने के बदले कीमत वसूलने की बात करना, किसी अन्य मंच से एक डॉक्टर युवती द्वारा शवों के साथ संवेदनहीन मजाक करने की स्वीकारोक्ति, किसी और कार्यक्रम में हास्य के नाम पर अपने माता-पिता के अंतरंग पलों में शामिल होने की बात कहना विवेकशून्यता को दर्शाता है. यह स्थिति इसलिए और भी भयावह लगती है क्योंकि इस प्रकार की फूहड़ता, अश्लीलता सार्वजनिक रूप से परोसी जा रही है और समाज का पढ़ा-लिखा युवा वर्ग खुलकर तालियाँ बजाते हुए खुद को कूल, प्रगतिशील साबित कर रहा है.

 

देखा जाये तो इस तरह की नैतिक गिरावट केवल मनोरंजन के मंचों तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में भी प्रवेश कर चुकी है. हाल ही में किशोरों और युवाओं के उजागर हुए चैट इसकी अलग ही कहानी कहते हैं. इनमें सहपाठी लड़कियों और महिलाओं के बारे में जिस स्तर की अश्लील, अमर्यादित बातें की गई हैं, उन्हें कोई भी सभ्य व्यक्ति अकेले में पढ़ते हुए भी शर्म से पानी-पानी हो जाए. यहाँ चिंताजनक यह है कि इस विकृत संवाद में केवल लड़के ही नहीं बल्कि लड़कियाँ भी समान रूप से शामिल हैं. यह इस बात का संकेत है कि डिजिटल क्रांति ने युवाओं से आत्मनियंत्रण, मर्यादा, शालीनता को पूरी तरह से छीन लिया है. इसी का दुष्परिणाम है कि इंटरनेट पर आए दिन निजी पलों के, अन्तरंग सम्बन्धों के वीडियो लीक तो होते ही हैं, उनको देखने की चाह रखने वालों की संख्या भी बहुत बड़ी होती है. यह समाज में बढ़ती वासना, अश्लीलता का परिचायक है.

 

समाज में फैलती जा रही इस विभीषिका ने केवल युवा-वर्ग को ही अपनी गिरफ्त्त में नहीं लिया है बल्कि इसने  पारिवारिक और वैवाहिक संस्थाओं को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है. पारिवारिक रिश्ते इसी विकृत मानसिकता की भेंट चढ़ रहे हैं. रिश्तों की मर्यादा को तार-तार करने वाली घटनाएँ अब रोजमर्रा की बातें हो गई हैं. एक युवक का अपनी ही सास से विवाह करना, किसी युवक द्वारा अपनी भाभी को पाने की हवस में अपने ही मासूम भतीजे की बेरहमी से हत्या कर देना, विवाहेतर सम्बन्धों की खुलेआम स्वीकार्यता और अपने जीवन-साथी की हत्या करवा देना दिखाता है कि वासना ने इंसान को पथभ्रष्ट कर दिया है. रिश्तों की इस संवेदनहीनता का वीभत्स रूप तब दिखता है जब एक माँ अपने शारीरिक सम्बन्धों में बाधक बनते अपने ही बच्चे के हाथ-पैर तोड़े जाने और उसकी जान लिए जाने को मूकदर्शक बनकर देखती रहती है.

 

सबसे बड़ा प्रश्न तो यही है कि आखिर समाज इस स्थिति पर पहुँचा कैसे? यह मानसिक पतन, सामाजिक विकृति एकाएक हो नहीं ही आई होगी. आधुनिकता के झूठे मुखौटे, सूडो-फेमिनिज्म, अत्यधिक व्यक्तिवाद, पारम्परिक परिवार व्यवस्था का अंधविरोध, विवाह संस्था के ऊपर दैहिक सम्बन्धों को वरीयता, खुलेपन की आड़ में यौन-सम्बन्धों को अपनाने आदि ने इस पतन की नींव रखी है. व्यक्ति की असीमित, अनियंत्रित स्वतंत्रता ने सामाजिक ढाँचे को ही खोखला कर दिया है. रिलेशनशिप, सिचुएशनशिप, लिव-इन, फ्रेंड्स विद बेनेफिट्स आदि ने मूलतः व्याभिचार, अनैतिकता, अश्लीलता को सामाजिक स्वीकृति दे दी है. इससे धीरे-धीरे परिवार व्यवस्था बिखरने लगी और नई पीढ़ी संस्कार, नैतिकता, मर्यादा आदि से मुक्त होने लगी. इस भटकाव का असर यह हुआ है कि आज के युवाओं को यह अहसास ही नहीं कि वे कुछ गलत कर रहे हैं. एक साथ कई जगह सम्बन्ध बनाना, बार-बार साथी बदलना, किसी भी एक व्यक्ति या संस्था के प्रति वफादार न रहना, मर्यादा, शालीनता की सीमाओं को पार करना अब उनकी नजर में कोई गलती नहीं है. इसके उलट उन्होंने संस्कार, मर्यादा, शालीनता आदि को ही मज़ाक बना दिया है; इनका पालन करने वाले को पिछड़ा, दकियानूसी बताया है. समाज के प्रबुद्ध वर्ग ने इस नकारात्मकता का विरोध करने के बजाय चुप्पी साधे रखी है परिणामतः सार्वजनिक मंचों से फूहड़ता, अश्लीलता का सहज स्वरूप हमारे घर-परिवारों तक आ चुका है.

 

हम सभी को यह समझना होगा कि उच्छ्रंखल, अनुशासनहीन, अमर्यादित आचरण का परिणाम सुखद नहीं होने वाला है. हमारे देश की सामाजिक संरचना पश्चिमी देशों जैसी नहीं है बल्कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में बिना आत्म-अनुशासन के, बिना पारिवारिक सहयोग के, बिना सुदृढ़ नैतिक मूल्यों के समाज को व्यवस्थित और शांतिपूर्ण रख पाना पूरी तरह संभव नहीं है. पश्चिमी सभ्यताओं की नक़ल के नाम पर हमारे समाज में फूहड़ता ही फैलती जा रही है, उन देशों जैसा अनुशासन, उनके जैसी जीवन-शैली, उनके जैसा सिविक सेंस हमारे समाज में कदाचित देखने को नहीं मिलता है. सोचने वाली बात है कि जब समाज से शर्म, मर्यादा, शालीनता, संस्कार, सम्मान आदि पूरी तरह समाप्त हो जाएंगे तो समाज में अपराध, मानसिक अवसाद, अविश्वास, अश्लीलता, फूहड़ता का ही साम्राज्य दिखाई देगा. यदि हम आज भी बिना सँभले आधुनिकता के नाम पर ऐसे ही आत्मघाती मार्ग पर चलते रहे तो आने वाले समय में हमें सामाजिक और मानवीय विनाश का सामना करना पड़ेगा, यह समय जागने का, अपनी जड़ों की ओर लौटने का, मर्यादाओं को पुनः स्थापित करने का है.

 


18 अक्टूबर 2025

दीपमालिके तेरा आना मंगलमय हो

‘दीपमालिके तेरा आना मंगलमय हो’ यह वाक्य कितना सुन्दर, सार्थक, सशक्त और मनोहारी प्रतीत होता है. चारों ओर दीपों की कतार, मोमबत्तियों-झालरों का सतरंगी प्रकाश, रंग-बिरंगी आतिशबाजी, विविध आवाजों-रोशनियों के साथ फूटते पटाखे... अपने आप में अद्भुत छटा का प्रदर्शन करते हैं. बच्चे, युवा, बुजुर्ग सभी अपनी-अपनी उमंग और मस्ती में दीपावली का आनन्द उठाते नजर आते हैं. नये-नये परिधानों में सजे-संवरे लोग एकदूसरे से मिलजुल कर समाज में समरसता का वातावरण स्थापित करते हैं. दीपावली का पर्व सभी के अन्दर एक प्रकार की अद्भुत चेतना का संचार करता है. घरों की साफ-सफाई, लोगों से मिलना-जुलना, मिठाई आदि घर-परिवार के सभी सदस्यों को समवेत रूप से सहयोगात्मक कदम उठाने में मदद करता है.

 

भारतीय परम्परा, संस्कृति में पर्वों, त्यौहारों का महत्व हमेशा से रहा है. यहाँ की अनुपम वैविध्यपूर्ण संस्कृति में विभिन्न मनमोहक ऋतुएँ हैं, ठीक उसी तरह से विविधता धारण किये पर्व-त्यौहार भी हैं. इन त्यौहारों की विशेष बात यह है कि इन्हें धार्मिकता से जोड़ने के साथ-साथ सामाजिकता से भी परिपूर्ण बनाया गया है. धार्मिक संदेशों के मध्य से सामाजिक सरोकारों, समरसता, सौहार्द्र, भाईचारे आदि की भी प्रतिस्थापना करते ये पर्व दिखाई देते हैं. किसी भी पर्व का, किसी भी अनुष्ठान का उद्देश्य मात्र स्वयं को प्रसन्न रखने की स्थिति में नहीं होना चाहिए. इनका उद्देश्य सदैव यही हो कि सामाजिकता का विकास हो, सामाजिक सरोकारों की स्थापना हो. व्यक्ति को व्यक्ति से जोड़े रखने का माध्यम यही पर्व-त्यौहार बनें. दीपावली के संदर्भ में ही देखें तो इसके आने के कई-कई दिनों पूर्व से घर के कार्यों को आपसी सहयोग से सम्पन्न करना, उत्सव के दिन सभी से मिलने-जुलने का उपक्रम किसी भी रूप में असामाजिकता का संदेश देता नहीं दिखता है.

 



वर्तमान में स्थितियों में कुछ परिवर्तन सा महसूस होता है. सहजता और सरलता का प्रतीक पर्व अब बाह्य आडम्बर और चकाचौंध भरी स्थितियों के वशीभूत होता समझ में आता है. यदि हम अपने आसपास के परिदृश्य का अवलोकन करें तो तमाम सारी प्राकृतिक स्थितियों के साथ-साथ कृत्रिमता का विकास होता भी समाज में दिखाई देता है. भूमण्डलीकरण, वैश्वीकरण, औद्योगीकरण जैसी भारी-भरकम वैश्विक शब्दावली ने पर्वों-त्यौहारों की सहजता, सरलता को विखण्डित सा कर दिया है. दीपावली का रंगीन-रोशनीपरक उद्देश्य ‘इस दीपावली आप क्या खिला रहे हैं’ की सेल्युलाइड दुनिया के पीछे संकुचित, भयभीत सा खड़ा दिखाई देता है. इसी आभासी दुनिया का दुष्परिणाम है कि अब आकाश को छूने के लिए उड़ते रॉकेट को देखकर बच्चों की तालियाँ, खिलखिलाती हँसी नहीं वरन् उनकी फटी-फटी सी आँखें, अचम्भित से हाव-भाव दिखाई पड़ते हैं. कृत्रिम चकाचौंध और औपचारिकता की भेंट हमारे पर्व ही नहीं चढ़े हैं वरन् हमारे रिश्ते-नाते, हमारे सामाजिक सरोकार भी तिरोहित हुए हैं. बच्चों के हाथों में झूमती रंगीन फुलझड़ी एकाएक मद्विम पड़ जाती है जैसे ही उसके सामने विदेशी आतिशबाजी आकर अपना विस्तार करने लगती है. गरिमामयी रिश्तों की गर्मजोशी अचानक ही हिम प्रशीतक की भांति लगने लगती है जब कि किसी और के हाथों में मंहगे गिफ्ट प्रदर्शित होने लगते हैं.

 

हमारे घरों में आज लक्ष्मी जी के रात में उतर कर आने की संकल्पना कार्य नहीं करती वरन् लक्ष्मी जी के वर्तमान धौंसपरक स्वरूप से अपने आपको प्रतिष्ठित करने की भावना कार्य करती है. मँहगे से मँहगे संसाधनों का उपयोग करके हम दीपावली का त्यौहार नहीं मनाते हैं बल्कि अपने आसपास के वातावरण में अपनी सत्तात्मक स्थिति को स्थापित करने का कार्य करते हैं. ऐसी विद्रूपकारी, हास्यास्पद स्थितियों में अब हँसी भी नहीं आती है बल्कि सरोकारों के संकुचित होते जाने को देखकर आँखों में आँसू अवश्य ही उतर आते हैं. हमारी स्वयं को स्थापित करने की सोच के कारण समाज से समरसता और भाईचारे जैसी स्थितियों का विलोपन सा होता जा रहा है. सौहार्द्र को भी बाजारीकरण का रंग चढ़ जाता है; सद्भावना भी झिलमिलाती पॉलीपैक में बिकने लगती है; भाईचारा भी किसी यूज एण्ड थ्रो जैसी बोतल मे चमकदार पेय पदार्थ सा चमकने लगता है. ऐसे में हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि दीपमालिके तेरा आना मंगलमय हो?

 

नैराश्य के इस वातावरण के बाद भी; कृत्रिम चकाचौंध के बीच भी; दीपावली का एक ही दीपक अंधियारे को मिटाने हेतु संकल्पित रहता है. हमें भी उसी दीपक की तरह से स्वयं को इन विपरीत स्थितियों के बाद भी, सामाजिक सरोकारों के विध्वंसपरक हालातों के बाद भी दीपमालिके का स्वागत तो करना ही है. बाजारीकरण में गुम सी हो चुकी भारतीयता में भी प्रस्फुटन सा दिखता है जो हमें जागृत करता है कुछ करने को; एक प्रकार के आवरण को गिराने को; असामाजिकता को मिटाने को; सामाजिक सरोकारों की स्थापना को. इसके लिए हमें सर्वप्रथम स्वयं से ही आरम्भ करना होगा. भारीभरकम खर्चों के बीच, मँहगी से मँहगी आतिशबाजी को उड़ाते समय एकबारगी हम उन बच्चों के बारे में भी विचार कर लें जो कहीं दूर सिर्फ इनकी रोशनियाँ देखकर ही अपनी दीपावली मना रहे होंगे. उन बच्चों के बारे में भी एक पल को सोचें जो कहीं दूर किसी कचरे के ढेर से जूठन में अपना भोजन तलाशते हुए अपने पकवानों की आधारशिला का निर्माण कर रहे होंगे. यह नहीं कि हम दीपावली पर अपने उत्साह को, अपनी उमंग को व्यर्थ गुजर जाने दें पर कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि कल को एकान्त में, तन्हा बैठने पर हमें स्वयं के कृत्यों से शर्मिन्दा न होना पड़े; हमें अपने एक बहुत ही छोटे से कदम से हमेशा प्रसन्नता का एहसास होता रहे; अपनी खुशी से दूसरे बच्चों में, और लोगों की खुशी में वृद्धि का भाव जागृत होता रहे. हमें दीपमालिके के स्वागत में एक-एक दीप प्रज्ज्वलित करते समय इस बात को ध्यान में रखना होगा कि इसका प्रकाश सिर्फ और सिर्फ हमारे घर-आँगन तक नहीं अपितु समाज के उस कोने-कोने को भी आलोकित कर दे जिस कोने में अंधेरा वर्षों से अपना कब्जा कायम रखे है. उजाले की एक सकारात्मक किरण ही भीषणतम अंधेरे को मिटाने की शक्ति से आड़ोलित रहती है, बस हम ही संकल्पित हों और पूरे उत्साह से, उमंग से परिवर्तन का, समरसता का दीपक प्रज्ज्वलित करने का विश्वास अपने में कर लें. आप स्वयं एहसास करेंगे कि आपका मन स्वतः स्फूर्त प्रेरणा से दीपमालिके का स्वागत करने को तत्पर हो उठेगा.


09 जून 2025

मानसिकता के संक्रमणकाल में समाज

हत्या तो हत्या है और जिसने भी की है उसे सजा मिलनी ही चाहिए. यह केवल किसी क्रिया की प्रतिक्रिया देना मात्र नहीं होता बल्कि एक हँसते-खेलते इन्सान को हमेशा के लिए शांत कर देना होता है. एक परिवार को ज़िन्दगी भर के लिए न भरने वाला घाव देना होता है. समाज के बीच खुद हत्यारे के परिवार को भी शर्मिंदगी से जीवन गुजारने की सजा देना होता है. अभी हाल के चर्चित राजा-सोनम रघुवंशी मामले में इंदौर के इस नवदम्पत्ति जोड़े के अचानक से गायब हो जाने की खबर के बाद पति राजा का शव मिलना और पत्नी सोनम का गायब होना शासन-प्रशासन पर, मेघालय के पर्यटन पर, पर्यटकों की सुरक्षा पर सवालिया निशान लगा रहा था. राजा की लाश मिलने के सत्रह दिन बाद अचानक से सोनम पुलिस को मिली. उसकी गिरफ्तारी हुई अथवा उसने आत्मसमर्पण किया, ये बाद की बात है. उसी के ऊपर अपने पति की हत्या करवाने का शक जताया जा रहा है,  हत्या उसी ने की या करवाई इस बारे में अंतिम सत्य तो बाद में पता चलेगा मगर जिस तरह से लोगों की प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं, उससे ऐसा लग रहा है जैसे समाज, परिवार, विवाह संस्था रसातल में पहुँचने ही वाले हैं. मीडिया, सोशल मीडिया में इस तरह से बयानबाजी हो रही है मानो पति-पत्नी संबंधों में हत्या जैसा ये पहला और आश्चर्यजनक मामला हो.

 



इस एक घटना के साथ कुछ महीने पहले हुए नीले ड्रम कांड को, पॉलीथीन में पति के टुकड़े भरने वाले कांड को जोड़ा जा रहा है. पुरुष समाज को, पतियों को एकदम से डर के साये में देखा जाने लगा है. ऐसा लगने लगा है जैसे कि हर पत्नी हत्यारिन हो और हर पति तलवार-चाकू की नोंक पर. सोचिएगा एक पल को कि इस घटना से सारा समाज सदमे में क्यों है? क्या इसलिए कि पत्नियाँ अब पतियों की हत्या करने-करवाने लगीं? क्या इसलिए कि महिलाओं ने इस हत्याकारी क्षेत्र में पुरुषों/पतियों के एकाधिकार पर अतिक्रमण करना शुरू कर दिया? क्या इसलिए कि पत्नी के रूप में एक महिला का इस तरह का स्वरूप समाज ने इक्कीसवीं सदी में भी नहीं सोचा था? कहीं इसलिए तो सदमे जैसी स्थिति नहीं कि एक सेक्स सिम्बल के रूप में, एक उत्पाद के रूप में, विज्ञापन के लिए नग्न-अर्धनग्न अवस्था में सुलभ रूप में समझ आने वाली आधुनिक महिला अब साजिश रचती, हत्या करती-करवाती नजर आने लगी है? इस छवि में भी आश्चर्य कैसा, सदमा कैसा? टीवी के माध्यम से ऐसी स्त्रियाँ पहले ही आपके घर में, आपके बेडरूम में, आपके बच्चों के बीच स्थापित हो चुकी हैं. इन तथाकथित आधुनिक जीवन-शैली जीने वाली महिलाओं को करोड़ों-अरबों रुपयों का व्यापार करने के साथ-साथ साजिश रचते भी दिखाया जाता है. परिवार में विखंडन करवाती इस धारावाहिक स्त्री को बाहर हत्या करते, हत्या की साजिश रचते भी दिखाया जा रहा है. आखिर इस क्रिया की प्रतिक्रिया तो होनी ही है.

 

यदि समाज इस कारण सदमे में है कि एक महिला सामान्य भाव से, बिना किसी घबराहट-भय के एक हत्याकांड में शामिल है तो गौर करिएगा, ससुराल में एक बहू-पत्नी की हत्या में पति रूपी पुरुष के साथ सास, जेठानी, ननद जैसी स्त्रियाँ भी शामिल रही हैं. एक महिला को जलाते समय, उसका गला घोंटते समय जब एक महिला के रूप में उनके हाथ नहीं काँपे तो फिर सोनम के हत्यारी होने की आशंका पर इतनी हलचल क्यों? वैसे यहाँ याद रखने वाली एक बात ये भी है कि इसी देश में बरसों तक जन्मी-अजन्मी बेटियों को मौत की नींद में सुलाने वाले हाथों में ज्यादातर हाथ महिलाओं के ही रहे हैं. हाँ, एक सत्य ये अवश्य है कि पिछले कुछ सालों में ख़ुद महिलाओं ने ही महिलाओं के पक्ष में बने क़ानूनों का जिस तरह दुरुपयोग किया है, उससे आज जागरूक, कर्तव्यनिष्ठ, पारिवारिक-सामाजिक दायित्व-बोध को समझने वाली महिलाओं ने भी ऐसी महिलाओं का खुलकर विरोध करना शुरू कर दिया है.

 

समाज की बहुतायत महिलाओं का ऐसी हत्यारी महिलाओं के विरोध में खड़े होने का कारण समाज में व्याप्त सकारात्मकता का होना है. देखा जाये तो समाज कई-कई मानसिकता वालों से, अनेक प्रकार की मनोदशा वालों से मिलकर संचालित होता है. समाज में दोनों तरह के स्त्री और पुरुष हैं. हत्यारी मानसिकता स्त्री और पुरुष दोनों में है, संस्कारी मानसिकता भी दोनों में है. ऐसा नहीं है कि समाज के सभी स्त्री और पुरुष समाज का भला करते घूम रहे हों, उनमें कोई बुराई न हो और ऐसा भी नहीं है कि समाज में स्त्री-पुरुष सिर्फ हत्या, साजिश ही करने में लगे हों. स्व-मानसिक स्थिति के चलते इन्सान अपने क़दमों को उठाता है और घटना को अंजाम देता है. ये और बात है कि इंटरनेट की, रील की, आधुनिकता की चकाचौंध में रची-बसी दुनिया ने संस्कारों को, संस्कृति को, जीवन-मूल्यों को, परिवार को, समाज को, यहाँ के व्यवस्थित ताने-बाने को तिलांजलि दे दी है. संबंधों का, रिश्तों का कोई मोल अब जैसे दिखता ही नहीं है. आधुनिकता के चक्कर में सिर्फ और सिर्फ विखंडन, ध्वंस, परित्याग आदि ही देखने को मिल रहा है. ऐसी मानसिकता के बीच भी यदि सामाजिक संरचना की, पारिवारिक ढाँचे की, विवाह संस्था की परवाह करने वाले लोग हैं, महिलाएँ हैं, पुरुष हैं तो निश्चित रूप से परिदृश्य अभी पूरी तरह से काला नहीं हुआ है, पूरी तरह से अंधकारमय नहीं हुआ है. रौशनी की एक सम्भावना अभी भी है. अब इस सम्भावना में रील की इस आभासी दुनिया में झूमते मम्मी-पापा-बच्चों को तय करना होगा कि वे किस तरह की मानसिकता के इंसान बनना चाहते हैं. किस तरह की मानसिकता का समाज बनाना चाहते हैं.

 


20 जनवरी 2025

महाकुम्भ में बौराया सोशल मीडिया

हिन्दू धर्म की सर्वाधिक पवित्र और प्राचीन परम्पराओं में से एक कुम्भ का आयोजन है. इसके आयोजन के पीछे अनेक पौराणिक, धार्मिक और खगोलीय कारण हैं. वर्तमान में प्रयागराज में महाकुम्भ का आयोजन हो रहा है. गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों की त्रिवेणी की भांति ही यहाँ ज्ञान, भक्ति और कर्म की त्रिवेणी का संगम है. यह समय आत्मशुद्धि, आस्था और ध्यान के लिए उपयुक्त माना गया है. पौराणिक कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन के समय देव और दानवों के बीच हुई रस्साकशी में अमृत की बूँदें बारह स्थानों पर गिरी थीं. जिनमें चार स्थान पृथ्वी पर और आठ देवलोक में हैं. पृथ्वी में ये चार स्थान प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक के रूप में चिन्हित हैं. प्रयागराज में संगम, हरिद्वार में गंगा, उज्जैन की क्षिप्रा और नासिक की गोदावरी नदी के तट पर कुम्भ का आयोजन होता है.

 

कुम्भ की तिथियाँ खगोलीय घटनाओं के आधार पर निर्धारित होती हैं. सूर्य और बृहस्पति ग्रह की स्थिति का इससे गहरा सम्बन्ध है. चूँकि बृहस्पति को अपनी कक्षा में बारह वर्ष का समय लगता है, इसलिए इसका आयोजन प्रत्येक बारह वर्ष में होता है. प्रयागराज में कुम्भ का आयोजन उस समय होता है जब सूर्य मकर राशि में और बृहस्पति वृष राशि में होता है. इसी तरह से सूर्य के मेष राशि में और बृहस्पति के कुम्भ राशि में आने पर हरिद्वार में, सूर्य के कर्क और बृहस्पति के सिंह में आने पर नासिक में तथा सूर्य के मेष राशि में और बृहस्पति के सिंह राशि में आने पर उज्जैन में कुम्भ मेला आयोजित होता है. प्रयागराज में दो कुम्भ पर्वों के बीच छह वर्ष के अन्तराल में अर्धकुम्भ भी होता है. नासिक और उज्जैन में बृहस्पति के सिंह राशि में होने के कारण यहाँ के कुम्भ मेले को सिंहस्थ भी कहा जाता है.

 



महाकुम्भ सनातन परम्परा के प्रतीक, गंगा स्नान, तीर्थ दर्शन और साधु-संतों के त्रिवेणी तट पर आगमन, कल्पवास करने का पर्व नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति की जड़ों से जुड़ने का सशक्त माध्यम है. इसके साथ-साथ यह भक्ति-भाव से भगवान और भक्त के आपस में मिलन का विराट आयोजन है. महाकुम्भ में परम्परा, मान्यता, वेदांती, महामंडलेश्वर, संत, गृहस्थ, विद्वान, निर्गुण, सगुण आदि के माध्यम से भारतीय संस्कृति, सनातनता के विविध मनोहारी रंग, गुण, कलाएँ आदि देखने को मिलते हैं. कहीं यज्ञ हो रहा है, कहीं कथा हो रही है, कहीं ध्यान तो कहीं प्रवचन. कहीं नागा संन्यासियों का समाधि-बोध का सुख है तो कहीं अमरत्व की चाह में त्रिवेणी के पावन जल में डुबकी लगाती श्रद्धालुओं की भीड़. पवित्रता, पावनता, ज्ञान, कर्म, भक्ति, साधना, ध्यान, योग, समाधि आदि से ओत-प्रोत सनातन संस्कृति के इस विशाल आयोजन को सोशल मीडिया के कुछ अराजक तत्त्वों ने तमाशा बना दिया है.

 

सोशल मीडिया की संपादकत्वविहीन कार्यशैली ने उच्छृंखलता को बढ़ाया है. इसके द्वारा महाकुम्भ में आये लाखों श्रद्धालुओं, साधुओं, संन्यासियों, वैरागियों की भक्ति, आस्था और वैराग्य का मजाक बनाना शुरू कर दिया गया. इनको आईआईटी का युवा साधु, माला बेचती युवती की आँखें, युवा साध्वी का दैहिक सौन्दर्य ही आकर्षण का केन्द्र समझ आया. महाकुम्भ की पावनता, ज्ञान, भक्ति से इतर सोशल मीडिया के लिए ये लोग फूहड़ सवालों, सेल्फी, वीडियो आदि का केन्द्रबिन्दु बने. विडम्बना देखिये कि इसी अतिवादिता के कारण इन तीनों को महाकुम्भ से प्रस्थान करना पड़ा. अखाड़ों के क्रिया-कलाप, नागा संन्यासियों की समाधिस्थ भावना, साधु-संतों की ध्यान प्रक्रिया, गृहस्थों द्वारा किया जा रहा कल्पवास, जगह-जगह होते प्रवचन, पौराणिक कथाएँ, सांस्कृतिकता आदि सोशल मीडिया के लिए महत्त्वपूर्ण नहीं रही.



 

ऐसा नहीं कि महाकुम्भ में पहुँचने वाला प्रत्येक साधु, संन्यासी शास्त्रों का ज्ञाता ही हो. अनेक तो पूर्ण निरक्षर भी होंगे किन्तु वे अपना सम्पूर्ण जीवन भगवद-भक्ति में समर्पित कर चुके हैं. सम्भव है कि उनके पास सोशल मीडिया के कथित चैनलों के अनर्गल प्रश्नों के उत्तर न हों. सम्भव है कि उनके पास फूहड़ कुतर्कों की काट भी न हो. उनके पास अपने आराध्य देव के प्रति श्रद्धा है, धर्म में आस्था है. ऐसे सहज लोगों के मुँह में जबरन माइक डाल कर कुछ व्यूज, लाइक आदि के लिए उन्हें अज्ञानी बताया जा रहा है. महाकुम्भ का उद्देश्य गंगा स्नान, संत दर्शन, और आध्यात्मिक शांति प्राप्त करना है. ऐसे में धर्म, ज्ञान, साधना आदि से अनभिज्ञ सोशल मीडिया के उतावले लोग कुम्भ की प्रतिष्ठा पर चोट कर रहे हैं.

 

शासन-प्रशासन को चाहिए कि वह महाकुम्भ क्षेत्र में नियंत्रित मीडिया मंचों को ही अनुमति प्रदान करें. अनर्गल रूप से सोशल मीडिया पर दिखती रील्स, वीडियो के द्वारा जहाँ महाकुम्भ की पावनता, प्रतिष्ठा, आस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं वहीं मीडिया चैनलों की भूमिका, छवि भी धूमिल हो रही है. जिस तरह से सम्पूर्ण क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था में सुरक्षाकर्मी, कैमरे, आधुनिक तकनीक कार्य कर रही है, उसके माध्यम से ही असभ्य सोशल मीडिया, यूट्यूबरों, रील्स बनाने वालों को प्रतिबंधित किया जाये. सरकार द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को अपमानजनक, अमर्यादित सामग्री को हटाने सम्बन्धी निर्देश जारी करने चाहिए.

 

हम सभी को समझना होगा कि त्रिवेणी संगम को जीवन के यथार्थ में उतारना कुम्भ का संदेश है. जिसमें दृश्य और दृष्टि गंगा, यमुना की भांति प्रत्यक्ष बह रही है वहीं दर्शन सरस्वती की भांति अदृश्य होकर प्रवाह बनाये है. जो दिखता है वह तो सत्य है ही पर जो नहीं दिखता है वह भी परम सत्य है. महाकुम्भ केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है बल्कि हमारी सनातन संस्कृति का प्रतीक है. इसकी पवित्रता बनाए रखना सभी का कर्तव्य है. इसे तमाशा बनाने वालों के खिलाफ खड़ा होना हम सभी का कर्तव्य है. कथित माइकधारियों और उनकी फूहड़ रिपोर्टिंग को रोकने के लिए सरकार और समाज दोनों को सशक्त कदम उठाने होंगे.

 


22 जनवरी 2024

समग्र विश्व का राममय होना कल्याणकारी संकेत

पञ्च तत्वों- पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु, आकाश का समन्वित स्वरूप ही सृष्टि है. इस सृष्टि के गोचर-अगोचर, दृश्य-अदृश्य, चर-अचर आदि विविध रूपों के द्वारा इसका सञ्चालन निर्बाध गति से होता रहता है. इन्हीं पञ्च तत्वों की अलौकिकता ने रामलला की जन्मभूमि पर अपना उत्कर्ष प्राप्त किया. देश की सांस्कृतिक चेतना और मर्यादा की शुचिता के मानक रूप रामलला अपनी जन्मभूमि पर, अपने प्रासाद में पूर्ण वैभव, पूर्ण दिव्यता के साथ विराजमान हुए. पृथ्वी की भांति क्षमा, अग्नि की भांति प्रकाशमान, जल की भांति शीतल, वायु के जैसे सुगंधि प्रवाह और आकाश की भांति सकल स्वरूप में विस्तारित श्रीराम को किसी अवतार से अधिक आस्था, श्रद्धा, भक्ति का केन्द्र स्वीकारा गया. अपने इन्हीं समन्वित और अलौकिक गुणों के कारण ध्वंस किये गए मंदिर से लेकर अपने अस्तित्व पर प्रश्न उठाये जाने के तक भी रामलला टेंट की छाया से समग्र सृष्टि को संचालित करते रहे.

 



भारतवर्ष की सनातन संस्कृति और परम्परा के पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम का प्राण-प्रतिष्ठा के साथ अपनी जन्मभूमि में आना मात्र एक संघटना नहीं है. देशकाल, परिस्थितियों के साथ उद्घाटित होते रहने वाली ध्वंस-निर्माण की, पुनर्स्थापन की प्रक्रिया जनमानस को उद्द्वेलित करती रही. संस्कृति, धर्म, आस्था के परमपूज्य रूप में श्रीराम की जन्मभूमि के लिए कंठ-कंठ से निकले प्रण ने, संकल्प ने सोयी हुई चेतना को जगाने का कार्य किया. वर्षों-वर्षों से अपनी ही धरती, अपनी भी संस्कृति में अपनी सांस्कृतिक विरासत को पददलित होते देख, उसके प्रति नकारात्मकता देख बहुत बड़े हिन्दू समाज ने बारम्बार अपने को अपमानित महसूस किया. काल की अविरल गति के परिणामस्वरूप विधि का ऐसा विधान निर्मित हुआ कि हिन्दुओं की वर्षों से चली आ रही साध पूरी हुई. श्रीराम जन्मभूमि पर रामलला के भव्य-दिव्य मंदिर की संकल्पना साकार होने तक युवाओं ने, वृद्धों ने, साधू-संतों ने बलिदान ही बलिदान दिए हैं.

 

सम्पूर्ण विश्व में यह अपनी तरह का प्रथम उदाहरण कहा जायेगा जहाँ जेहादी और बर्बर आक्रान्ताओं के चंगुल से किसी समाज ने अपनी धार्मिक भूमि को, अपनी आस्था के केन्द्र को मुक्त करवाया है. ऐसे में श्रीराम मंदिर का निर्माण मात्र मंदिर का निर्माण नहीं है बल्कि सकल विश्व के लिए एक सन्देश भी है. मंदिर का निर्माण सन्देश है समानांतर रूप से विश्व की उन सभी जेहादी और बर्बर ताकतों को, जो किसी अन्य के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते; जो विलग पहचान और संस्कृति को कुचलने के लिए निम्न से निम्नतर स्तर तक जाने को ही वीरता समझते हैं; जो सोचते हैं कि खून से रंगी हुई तलवार के बल पर न्याय को मिटाया जा सकता है. श्रीराम मंदिर का निर्माण, श्रीराम की प्राण-प्रतिष्ठा सन्देश है उनके लिए भी जो नफरत का वातावरण निर्मित कर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते हैं; जो उन्माद और हिंसा के द्वारा अपनी वैचारिकी की सत्ता का सञ्चालन चाहते हैं. श्रीराम मंदिर निर्माण के प्रत्येक चरण में रामभक्तों में उन्माद भले ही परिलक्षित हुआ हो मगर उसमें कट्टरता समाहित नहीं थी. सौगंध राम की खाते हैं, मंदिर वहीं बनायेंगे के द्वारा उनका प्रण दृष्टिगोचर हुआ मगर उसके द्वारा हिंसा का परिचालन नहीं हुआ. रामलला हम आयेंगे, मंदिर वहीं बनायेंगे के नारे से जनसमुदाय के संकल्प का प्रकटीकरण हुआ मगर उसने किसी और की आस्था-श्रद्धा पर चोट नहीं की.

 

इसी आस्था का, विश्वास का, सहिष्णुता का, उदारता का सुखद परिणाम रहा कि अकेले अयोध्या या उत्तर प्रदेश में नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारतवर्ष में श्रीराम के प्रति जनसमुदाय को भाव-व्हिवल होते देखा गया. हिन्दू समाज के इन्हीं अलौकिक गुणों के कारण अकेले भारतवर्ष ने ही नहीं वरन विश्व के बहुसंख्यक देशों ने श्रीराम को आराध्य मानते हुए राममय वातावरण निर्मित किया. श्रीराम मंदिर के शिलान्यास से लेकर प्राण-प्रतिष्ठा के सुअवसर तक सम्पूर्ण देश ने अपनी सहभागिता की. किसी राज्य की पावन मिट्टी ने नींव में मिलकर शक्ति का स्वरूप निर्मित किया. सुदूर क्षेत्रों की नदियों के जल ने जन्मभूमि को पवित्र करने का महती कार्य किया. जाति-धर्म के बंधनों से मुक्ति प्राप्त करते हुए अनेकानेक नागरिकों ने अपने-अपने स्तर से अपना अभीष्ट देने का प्रयास किया. किसी ने पताका प्रेषित करके धर्म-ध्वजा फहराने में अपना योगदान दिया तो किसी ने धूप-समिधा के द्वारा वातावरण को सुगन्धित किया. कहीं से पुष्पों ने आकर रामलला का श्रृंगार करने का मनोरथ पाया तो कहीं से भक्त मंडली ने आकर भक्ति के सागर को लहराया. उत्तर से दक्षिण तक, हिमालय से कन्याकुमारी तक सर्वत्र राम ही राम दृश्यमान रहे. जन-जन भक्तिभाव में लीन रहकर अपनी सामाजिकता में, अपने कर्तव्यों में मगन रहा. इससे पहले समग्र में राममय वातावरण नहीं देखा गया, न ही महसूस किया गया.

 

मंदिर शब्द का उच्चारण निश्चित ही एक ऐसे दृश्य को उकेरता है जहाँ धार्मिक कृत्य परिलक्षित हो रहे हैं, धार्मिकता का आवरण है, अनुष्ठान आदि विधि-विधान से सम्पन्न हो रहे हैं. इस शब्द के साथ ही स्थापत्य कला का, मूर्ति कला का, ऐतिहासिकता का दृष्टिगोचर होना स्वाभाविक है. भारतीय सनातन संस्कृति में सदैव से मंदिरों को लेकर एक श्रद्धा-भाव, आस्था, विश्वास आदि का समन्वित स्वरूप समाज के विभिन्न वर्गों में उनके मतानुसार अपने पूर्ण बिम्ब-विधान के साथ आरोपित होता रहा है. इन सभी रंगों को अपने में समाहित करने के साथ-साथ गौरव, संस्कृति, प्रतिष्ठा, सम्मान, वैभव, स्वाभिमान का भी आरोपण श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में परिलक्षित है. भारतीय सनातन संस्कृति का, जनमानस का, समग्र विश्व का राममय होना निश्चित ही कल्याणकारी संकेत है. जिस प्रकार श्रीराम ने अपने वनवासकाल में असुरों का सर्वनाश करते हुए उत्तर से दक्षिण तक सनातन संस्कृति की स्थापना की थी, धर्म-ध्वजा को फहराने का पुनीत कार्य किया था, उसी प्रकार से राममय वातावरण सनातन संस्कृति की प्रतिस्थापना को संकल्पित दिख रहा है. जय श्रीराम! 





 

20 जनवरी 2024

सांस्कृतिक वैभव की प्रतिष्ठा

श्रीराम के साथ मीडिया, सोशल मीडिया पूरी तरह से एकाकार हो चुका है. प्रत्येक प्राणी, एक-एक मंच राममय दिख रहे हैं. जो रामभक्त हैं वे उनका जयगान कर रहे हैं, जो इसके विरोधी हैं वे भी रामनाम जप रहे हैं. रामनाम की पावनता, उसकी दिव्यता, भव्यता आज सम्पूर्ण विश्व में प्रकीर्णित हो रही है. जन्मभूमि स्थल पर ही श्रीराममंदिर का निर्माण निश्चित ही गौरवान्वित करने वाला है.




22 जनवरी को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा, घर-घर दीपोत्सव के सम्मोहन में जन-जन सम्मोहित है, आह्लादित है. अभिभूत होते इस गौरवशाली क्षण में आँखें बार-बार नम होती हैं. इसका कारण एक तरफ़ जहाँ अपने सांस्कृतिक वैभव को प्रतिष्ठित होते देखना है वहीं दूसरी तरफ़ नब्बे के दौर में इस प्रतिष्ठा के लिए प्राण-प्रण से ओत-प्रोत नागरिकों का संघर्ष भी देखा है.


संघर्ष से वैभव की इस कठोर यात्रा में चटकती धूप के बाद मिली शीतल छाँव निश्चित ही उन सभी बलिदानियों की आत्मा को शांति पहुँचा रही होगी, जो इस जन्मभूमि के लिए नींव का पत्थर बन श्रीराममंदिर की विशालता को धारण कर चुके हैं.

उन सभी को बारम्बार नमन. जय श्रीराम.




 

24 अक्टूबर 2023

सनातन संस्कृति के विरुद्ध तथ्यहीन, असत्य बातों का प्रचार

विजयादशमी का पावन पर्व उसी तरह से गुजर गया जैसे कि प्रतिवर्ष गुजरता है. एक दिन पहले से शुभकामनाओं का आदान-प्रदान चलना शुरू हुआ. सोशल मीडिया के तमाम मंचों के द्वारा नीलकंठ के दर्शन करवा दिए गए, पान खिलवा दिए गए. इधर कई वर्षों से ऐसा होने लगा है कि अब किसी भी पर्व-त्यौहार पर मिलने-जुलने का काम मोबाइल के द्वारा होने लगा है. चित्रों के, शब्दों के माध्यम से शुभकामनाओं का आना-जाना हो जाता है, उसी को मिलना-जुलना, लोगों का आना-जाना मान लिया जाता है. जितना उत्साह मोबाइल पर, सोशल मीडिया के मंचों पर दिखाई देता है, उससे अधिक उदासीनता एक-दूसरे से प्रत्यक्ष मिलने में दिखती है. 




इस उदासीन सी स्थिति के साथ-साथ विगत कुछ वर्षों से एक चलन और देखने को मिलने लगा है कि दशहरा आते ही रावण को महान बताये जाने के प्रयास होने लगते हैं. उसे एक भावुक इंसान, अत्यंत विद्वान, सजग भाई, जिम्मेवार पति, मानवीय दृष्टिकोण रखने वाला बताया जाने लगता है. राम के सापेक्ष उसके व्यक्तित्व को इस तरह से खड़ा किया जाने लगता है कि राम को मानने वाले खुद में शर्म महसूस करने लगें. रावण को इतना महान बताया जाने लगता है कि समाज के बहुत से लोग उसी की तरह के भाई, पति, इंसान मिलने की कल्पना करने लगते हैं. दरअसल ये जहाँ एक तरफ सनातन संस्कृति को धूमिल करने का, उसे बदनाम करने का षड्यंत्र है वहीं दूसरी तरफ सनातन संस्कृति वालों के द्वारा अपनी ही संस्कृति से विमुख होने का दुष्परिणाम है.


इक्कीसवीं सदी में आने के बाद से लोगों में आधुनिक होने का ऐसा नशा चढ़ा है कि अपनी ही संस्कृति को नकारना उनके लिए गर्व की बात होने लगी है. जिस तरह से किसी अत्याधुनिक अथवा आधुनिक माने लाने वाले परिवार के लिए यह बड़े गर्व की बात होने लगी है कि उसकी बेटी रसोई का काम नहीं जानती, ठीक इसी तरह से यह भी गौरवान्वित करने वाली बात होने लगी है कि किसी व्यक्ति को हिन्दू धर्म के बारे में जानकारी नहीं, सनातन संस्कृति की समझ नहीं, अपने ही धर्म ग्रंथों, धार्मिक व्यक्तित्वों के बारे में कोई जानकारी नहीं. ऐसे में केवल उन लोगों को ही दोष नहीं दिया जा सकता जो सनातन संस्कृति के खिलाफ काम कर रहे हैं. वे तो अपने काम को पूर्ण मनोयोग से करने में लगे हैं. उनको इस काम के लिए उचित मानदेय, पारिश्रमिक भी मिल रहा है. समय-समय पर ऐसे लोग सम्मानित भी किये जाते हैं. इसके उलट सनातन संस्कृति के लोग क्या कर रहे हैं? हिन्दू धर्म के रक्षक होने का दावा करने वाले क्या कर रहे हैं?


ये लोग भी ऐसी बातों का विरोध इसलिए भी नहीं कर पाते क्योंकि अपने ही धर्म के बारे में इनको ज्ञान नहीं. रावण के बारे में बताई जा रही अनर्गल बातों की काट के सम्बन्ध में असली ज्ञान इनको है ही नहीं. रावण ने सीता जी का स्पर्श क्यों नहीं किया; रावण और उसकी बहिन के आपसी सम्बन्ध क्या थे; रावण के पतिरूप, पितारूप, भाईरूप की असलियत क्या थी आदि बातों को तब समझा जाता जबकि अपने धर्मग्रंथों का अध्ययन किया होता. इंटरनेट पर बिखरी बड़ी काल्पनिक, असत्य, तथ्यहीन बातों को पढ़कर हिन्दू धर्म को, सनातन संस्कृति को समझने का दंभ भरने वालों ने ही ऐसी बातों को बढ़ा-चढ़ा कर समाज में फैला रखा है. वर्तमान दौर में सनातन संस्कृति के विरुद्ध काम करने वालों को सबक सिखाने से कहीं ज्यादा आवश्यक है कि सनातन संस्कृति, हिन्दू धर्म, इनके व्यक्तित्वों, धार्मिक ग्रंथों के बारे में प्रचारित तथ्यहीन, असत्य बातों को फैलने से रोका जाये. 





 

14 सितंबर 2022

मोक्ष की अवधारणा और कुछ सवाल

सनातन संस्कृति में मोक्ष की अवधारणा को लेकर बहुत सी बातें कही गईं हैं. जीव के जीवन-मरण से मुक्ति का मार्ग मोक्ष को स्वीकारा गया है. इसी की प्राप्ति के लिए ऐसा माना जाता है कि तमाम सारी प्रजातियों में मनुष्य जन्म मिलना सौभाग्य की बात होती है और इसी जन्म में ऐसे कर्म कर लेने चाहिए कि व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त हो जाये. मोक्ष प्राप्ति की अवधारणा की सहज स्वीकार्यता के कारण ही मनुष्यों को सत्कर्म करने के प्रति प्रेरित किया जाता है. उनको सभी प्रकार की बुराइयों से दूर रहने का प्रवचन दिया जाता है. इसी के साथ-साथ उनको भगवान की भक्ति करने, परोपकार करने, ईश्वर का नाम लेने की सलाह दी जाती है.


यहाँ एक बात समझने वाली ये है कि क्या मोक्ष की लालसा में किये जाने वाले सद्कार्य लालच की श्रेणी में नहीं आते हैं. जिस सनातन संस्कृति में मोक्ष की अवधारणा है, उसी में कहा गया है कि किसी फल की आशा में कार्य नहीं करना चाहिए. यहाँ तो ईश्वर का नाम, भगवान-भक्ति, परोपकार आदि मोक्ष की कामना के साथ किये जा रहे हैं. देखा जाये तो यह विशुद्ध लालच ही है. ऐसे में एक लालच के द्वारा मोक्ष की प्राप्ति कैसे संभव है? यहीं एक सवाल और मन में उभरता है कि आखिर मोक्ष की प्राप्ति किसके लिए, किसलिए? क्या किसी को अपने जन्म के पहले के जन्मों या जन्म का भान है कि उसे कष्ट मिले थे या सुख? यदि ये मान लिया जाये कि बहुत से लोग अपने कर्मों से मोक्ष प्राप्त कर गए होंगे तो क्या उनको इसका एहसास होगा कि वे जन्म-मरण से मुक्ति पा गए हैं? वे अब मोक्ष प्राप्त कर गए हैं?




एक पल को सारी बातों को दरकिनार करते हुए मान लिया जाये कि सभी जीवों द्वारा किसी भी तरह का बुरा काम, गलत कर्म करना बंद कर दिए गए. सभी अपनी-अपनी तरह से ईश्वर की भक्ति में लीन रहने लगे, परोपकार करने लगे. ये भी मान लिया जाये कि सभी को अपने इन्हीं सद्कर्मों से मोक्ष मिल गया तो क्या ये प्रकृति के विरुद्ध कार्य नहीं है? क्या इससे सृष्टि सञ्चालन की व्यवस्था अवरुद्ध नहीं हो जाएगी? ऐसा इसलिए कि यदि सभी जीवों को मोक्ष मिल जायेगा, सभी को जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाएगी तो फिर इस सृष्टि में जन्म किसका होगा? इस प्रकृति का सञ्चालन कैसे होगा?


संभव है कि हम अल्पज्ञानी की समझ से बाहर हों उक्त बातें किन्तु मन की जिज्ञासा को शांत करना चाहते हैं.  

 





 

28 अक्टूबर 2020

आवाज़ उठाओ कायदे से तो सुनी जाती है

आज, 28 अक्टूबर को फेसबुक पर एक पोस्ट दिखी, पोस्ट कुछ ऐसी थी कि उस पर रुककर उसे देखा. वह एक वेंक्वेट हॉल के सन्दर्भ में थी, जो हमारे परिचित लोगों द्वारा संचालित है. उरई जैसी छोटी जगह में परिचय बहुत सहजता से बन जाता है ऐसे में वह व्यक्ति जो इस वेंक्वेट हॉल को चला रहा है वह अधिकतर लोगों से परिचित होगा. बहरहाल, जो पोस्ट देखी थी वो किसी परिचय के लिए नहीं थी वरन वह एक बैनर से संदर्भित थी. उस हॉल के नाम के साथ एक बैनर दिखाया गया था, जिसमें सबसे नीचे एक सफ़ेद पट्टी में बहुत से देवी-देवताओं के चित्र बने हुए थे. चित्र बने होना भी उस पोस्ट का मूल बिंदु नहीं था बल्कि उन देवी-देवताओं से सुशोभित उस बैनर के लगाये जाने की जगह का असल मसला था. वह बैनर एक सड़क के किनारे बनी दीवार पर लगाया गया था और इतने नीचे लगा था जहाँ न केवल खड़े होकर बल्कि बैठकर भी धार मारी जा सकती थी.


धार मारने से आप अब समझ गए होंगे. असल में जिस दीवार पर बैनर लगा हुआ था वहाँ पर आने जाने वाले लोग (इसमें स्त्री-पुरुष दोनों शामिल हैं) लघुशंका से निवृत्त हो लिया करते हैं. संभव है कि किसी अतिशय बुद्धिजीवी ने उस हॉल को चलाने वालों को सलाह दे दी हो कि कोई बैनर भगवानों के चित्र सहित लगा दो तो वहाँ धार बहनी बंद हो जाएगी. ऐसा ही कुछ उस व्यक्ति ने बताया हो हमारे परिचित में है. उस पोस्ट को देखते ही हमने उसे फोन किया. उसने यही बात बताई तो हमने कहा कि अपने कर्मचारी बैठाओ जो वहाँ पेशाब करने वाले व्यक्तियों की ठुकाई करें मगर यह तरीका गलत है. यह इसलिए भी गलत है क्योंकि रात के अँधेरे में दारू पीकर मूतने वालों को न दीवार समझ आती है, न बैनर और न ही भगवान. ऐसे में भगवानों का निरादर होना ही होना है. परिचित व्यक्ति ने बात समझी और मानी भी फिर एक मित्र की सहायता से उस विवादित पट्टी को बैनर से हटवा दिया गया.




पिछले दो सालों में यह तीसरा ऐसा अवसर है जिसमें देवी-देवताओं से सम्बंधित विवादित सामग्री को हटवाया है. ये तो वे मामले हैं जो आँखों के सामने आ गए अन्यथा की स्थिति में हिन्दुओं को घंटा बनाकर रख दिया गया है, आओ और बजाकर चले जाओ. इससे पहले अप्रैल 2018 में शराब-बियर की दो दुकानों के नामों में बदलाव करवाया था. उसमें इतनी सहजता नहीं हुई थी, जितनी कि आज इस मामले में हुई थी. इसके पीछे एक तो उन दोनों का अपरिचित होना रहा था साथ ही शराब जैसे धंधे से जुड़ा होना भी मुख्य कारण रहा था. दो-चार बार के प्रयासों के बाद वे नाम भी हट गए थे.


इस पोस्ट का उद्देश्य अपने इन कामों को दिखाना नहीं बल्कि उन हिन्दुओं के मन में ये विश्वास जगाना है कि यदि वे अपने धर्म, अपने आराध्यों के अपमान में हो रही किसी भी बात का, घटना का विरोध करते हैं, पुरजोर तरीके से करते हैं तो आवाज़ को सुनने वाले लोग हैं. हिन्दू धर्म के विरुद्ध हो रही तमाम बातों में से कुछ बातों को सुना जाता है, विसंगतियों को दूर किया जाता है, बस आवाज़ उठानी पड़ती है. सो, बिना डरे, बिना संकोच करे आवाज़ उठाइये. गलत देखिए तो खामोश न रहिए. आज आप एक आवाज़ बनेंगे, कल को आपके साथ बहुत सी आवाजें जुड़ जायेंगीं.


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02 अक्टूबर 2019

दरकना एक और पारिवारिक आधार-स्तम्भ का


परिवार में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने आपमें एक आधार स्तम्भ होते हैं. उनके न कहने के बाद भी वे किसी न किसी रूप में परिवार को एकसूत्र में जोड़े रखने का काम करते हैं. परिवार की मान-मर्यादा को, उसकी प्रतिष्ठा को, उसके वर्चस्व को ऐसे ही लोगों के द्वारा स्वतः ही स्थापना मिलती रहती है. ऐसी स्थिति में जबकि परिवार का नाम क्षेत्र में हो, क्षेत्र के आसपास भी हो, उसके पुरखों का अपना रसूख, अपनी इज्जत, उनका नाम स्थापित हो तब ऐसे लोगों द्वारा स्वतः ही उस मान-सम्मान में, प्रतिष्ठा में वृद्धि की जाती रहती है. परिवार की पहचान का ये सदस्य आधार बनते हैं. दसियों लोगों के होने के बाद भी ऐसे सदस्य परिवार की पहचान बनते हैं. हमारा परिवार भी अपने क्षेत्र में दशकों से अपनी एक छाप बनाये हुए है. इसमें परिवार की एकजुटता भी बहुत मायने रखती है. कई-कई पीढ़ियों के बाद भी यदि परिवार का सम्मान, प्रतिष्ठा बनी हुई है तो उसके पीछे हम सब सदस्यों का एकजुट होना है. 

समय के साथ प्रकृति का नियम परिवार पर भी लागू होता रहा. बुजुर्ग परिजन अपने संस्कार, अपनी संस्कृति को अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करते रहे और स्वयं अनंत यात्रा को जाते रहे. बुजुर्गों का चले जाना परिवार में एक खालीपन लाता रहा मगर उस खालीपन को किसी न किसी सदस्य द्वारा स्वतः ही भरा जाता रहा. इसके लिए परिवार की तरफ से कभी कोई प्रयास भी नहीं किये गए. कभी किसी तरह का समर्थन न व्यक्त किया गया, न कभी विरोध जैसी स्थिति दिखाई दी. विरासतन एक परिपाटी परिवार में चलती चली आई और उसका पालन भी होता रहा. बहुत अच्छे से याद है कि गाँव के सैकड़ों किमी दूर भी अपने बाबा के बजाय अपने बड़े बाबा (हमारे बाबा के बड़े भाई) के नाम से अपना परिचय हम देते रहे हैं. ग्वालियर में पढ़ने के दौरान अनेक अवसर ऐसे आये जबकि वहाँ और वहाँ के आसपास के क्षेत्रों में हमारा परिचय बड़े बाबा के नाम पर स्थापित हुआ.

बाबा लोगों के गुजर जाने के बाद ऐसी स्थिति हमारे सामने आई कि हमें अपना परिचय देना पड़ा तो ताऊजी और पिताजी का नाम ही सहारा बना. गाँव में किसी भी तरह की छुटपुट विवाद की स्थिति में ताऊजी और पिताजी के नाम ने उन विवादों को स्वतः ही हल कर दिया. कालांतर में परिवार ताऊजी और पिताजी से विहीन हुआ. उस समय भी लगा कि अब गाँव में परिवार की स्थिति को, उसकी मान-मर्यादा को किसके नाम पर स्थापना मिलेगी? जैसा कि अभी तक होता आया था, अबकी भी ऐसा हुआ. स्वतः ही हमारी पीढ़ी के सबसे बड़े भाई हेमंत भाईसाहब अपने आप नेतृत्व करते दिखे. न परिवार में किसी तरह का विवाद हुआ, न कोई मीटिंग हुई, न किसी तरह की पंचायत. कालचक्र चलता हुआ जैसे अपने आप ही हेमन्त भाईसाहब (मुन्ना भाईसाहब) के सामने खड़ा हो गया. गाँव और उसके आसपास की स्थितियों में हेमन्त भाईसाहब पारिवारिक मर्यादा के साथ सबके बीच मौजूद रहने लगे. घर, जमीन, खेती सहित अनेक स्थितियां जैसे भाईसाहब के नाम से ही अपने आप सहज रूप में स्वीकार होने लगीं. निश्चिंतता रहती कि भाईसाहब हैं इसलिए किसी तरह का विवाद न तो गाँव में होगा और न ही आसपास क्षेत्र में. ऐसा होता भी, उनके नाम से ही बहुत सी समस्याएं अपने आप समाधान की तरफ मुड़ जातीं.

कालचक्र का घूमना जारी था. पीढ़ियों से चलता हुआ वह अपने साथ अबकी रुका तो हमारे मुन्ना भाईसाहब को अपने साथ ले जाने के लिए. प्रकृति के नियम का पालन सबको करना ही होता है, हमारे भाईसाहब भी उससे बंधे हुए थे. बिना किसी से कुछ कहे, बिना अपनी जिम्मेवारी को किसी को हस्तांतरित किये ख़ामोशी से काल के साथ अनंत यात्रा को निकल गए. परिवार के बुजुर्गों के साथ अपने को शामिल कर गए. एक सूनापन परिवार में समझ आ रहा है. परिवार की आन-बान-शान की जिम्मेवारी अब किसके सिर पर आएगी? अब कालचक्र स्वतः किसका चयन करेगा परिवार के नाम को आगे बढ़ाने के लिए. परिवार की सदियों पुरानी मान-मर्यादा का सञ्चालन, उसका निर्वहन अब किसके द्वारा किया जायेगा, किसके नाम के द्वारा किया जायेगा यह भविष्य के गर्भ में है. फ़िलहाल एक सूनेपन के साथ समूचा परिवार आँखों में नमी लेकर ख़ामोशी से बैठा है.

सादर नमन, श्रद्धांजलि मुन्ना (हेमन्त) भाईसाहब को.

16 अगस्त 2019

बुन्देलखण्ड की संस्कृति में आज भी जीवित है कजली


आधुनिकता का पर्याप्त प्रभाव होने के बाद भी बुन्देलखण्ड क्षेत्र में पावन पर्व कजली उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है. यहाँ की लोक-परम्परा में शौर्य-त्याग-समर्पण-वीरता के प्रतीक मने जाने वाले कजली का विशेष महत्त्व है. इस क्षेत्र के परम वीर भाइयों, आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम के साथ-साथ अन्य बुन्देली रण-बाँकुरों की विजय-स्मृतियों को अपने आपमें संजोये हुए कजली मेले का आयोजन आठ सौ से अधिक वर्षों से निरंतर होता आ रहा है. सावन महीने की नौवीं से ही इसका अनुष्ठान शुरू हो जाता था. घर-परिवार की महिलाएँ खेतों से मिट्टी लाकर उसे छौले के दोने (पत्तों का बना पात्र) में भरकर उसमें गेंहू, जौ आदि को बो देती थी. नित्य उसमें पानी-दूध को चढ़ाकर उसका पूजन किया जाता था, इसके पीछे उन्नत कृषि, उन्नत उपज होने की कामना छिपी रहती थी. सावन की पूर्णिमा को इन पात्रों (दोने) में बोये गए बीजों के नन्हें अंकुरण (कजली) को निकालकर दोनों को तालाब में विसर्जन किया जाता था. बाद में इन्हीं कजलियों का आपस में आदरपूर्वक आदान-प्रदान करके एक दूसरे को शुभकामनायें देते हुए उन्नत उपज की कामना भी की जाती थी. ये परम्परा आज भी चली आ रही है, बस इसमें शौर्य-गाथा के जुड़ जाने से आज इसका विशेष महत्त्व हो गया है.

कजली विसर्जन में बिटिया रानी - उरई, माहिल तालाब 

बुन्देलखण्ड के महोबा राज्य पर पृथ्वीराज चौहान की नजर लगी हुई थी. इसी कारण एक साजिश रचकर कुछ विरोधियों ने महोबा के अतुलित वीर भाइयों आल्हा-ऊदल को राज्य से निकलवा दिया था. पृथ्वीराज चौहान को भान था कि आल्हा और ऊदल के न होने के कारण महोबा की सैन्य क्षमता कमजोर हो गई होगी. ऐसे में अब महोबा को जीतना संभव है. सन 1182 में पृथ्वीराज चौहान ने महोबा पर आक्रमण की एक योजना बनाई. उसने महोबा की राजकुमारी के अपहरण की योजना बनाई और तय किया गया कि कजलियों के विसर्जन के समय ही आक्रमण करके राजकुमारी का अपहरण कर लिया जाये. महोबा के राजा परमाल की पुत्री चंद्रावलि अपनी हजारों सहेलियों और महोबा की अन्य दूसरी महिलाओं के साथ प्रतिवर्ष कीरत सागर तालाब में कजलियों का विसर्जन करने जाया करती थी. अपनी विजय को सुनिश्चित करने और राजकुमारी के अपहरण के लिए उसके सेनापति चामुंडा राय और पृथ्वीराज चौहान के पुत्र सूरज सिंह ने महोबा को घेर लिया. जिस समय ये घेरेबंदी हुई उस समय आल्हा-ऊदल कन्नौज में थे. 

राजा परमाल खुद ही आल्हा-ऊदल को राज्य छोड़ने का आदेश दे चुके थे, ऐसे में उनके लिए कुछ कहने-सुनने की स्थिति ही नहीं थी मगर उनके साथ-साथ सभी लोग जानते थे कि आल्हा-ऊदल के बिना पृथ्वीराज चौहान की सेना को हरा पाना मुश्किल होगा. इस विषम परिस्थिति में महोबा की रानी मल्हना ने आल्हा-ऊदल को महोबा की रक्षा करने के लिए तुरंत वापस आने का सन्देश भिजवाया. सूचना मिलते ही आल्हा-ऊदल अपने चचेरे भाई मलखान के साथ महोबा पहुँच गए. परमाल के पुत्र रंजीत के नेतृत्व में पृथ्वीराज की सेना पर आक्रमण कर दिया गया. इस युद्ध की सूचना मिलते ही राजकुमारी चंद्रावलि का ममेरा भाई अभई (रानी मल्हना के भाई माहिल का पुत्र) उरई से अपने बहादुर साथियों के साथ महोबा पहुँच गया. लगभग 24 घंटे चले इस भीषण युद्ध में आल्हा-ऊदल के अद्भुत पराक्रम, वीर अभई के शौर्य के चलते पृथ्वीराज चौहान की सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा. सेना रणभूमि से भाग गई. इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान का पुत्र सूरज सिंह भी मारा गया. इसके अलावा राजा परमाल का पुत्र रंजीत सिंह और वीर अभई भी वीरगति को प्राप्त हुए. कहा जाता है कि इसी युद्ध में पृथ्वीराज चौहान ने ऊदल की हत्या छलपूर्वक कर दी थी. जिसके बाद आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान को मारने की शपथ ली किन्तु बाद में अपने गुरु की आज्ञा मानकर संन्यास ग्रहण कर जंगल में तपस्या के लिए चले गए थे.

इस ऐतिहासिक विजय के बाद राजकुमारी चंद्रावलि और उसकी सहेलियों के साथ-साथ राजा परमाल की पत्नी रानी मल्हना ने, महोबा की अन्य महिलाओं ने भी भुजरियों (कजली) का विसर्जन किया. इसी के बाद पूरे महोबा में रक्षाबंधन का पर्व धूमधाम से मनाया गया. तब से ऐसी परम्परा चली आ रही है कि बुन्देलखण्ड में रक्षाबंधन का पर्व भुजरियों का विसर्जन करने के बाद ही मनाया जाता है. इसके बाद ही इस क्षेत्र में बहिनें रक्षाबंधन पर्व के एक दिन बाद भाइयों की कलाई में राखी बाँधती हैं. वीर बुंदेलों के शौर्य को याद रखने के लिए ही कहीं-कहीं सात दिनों तक कजली का मेला आयोजित किया जाता है. यहाँ के लोग आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम को नमन करते हुए बुन्देलखण्ड के वीर रण-बाँकुरों को याद करते हैं.

27 जुलाई 2019

कहाँ गए सावन के वो झूले


सावन का मौसम अपने आपमें अनेक तरह की रागात्मक क्रियाएं छिपाए रहता है. रक्षाबंधन का पावन पर्व, पेड़ों पर डाले गए झूले, उनमें पेंग भरते हर उम्र के लोग, गीत गाते हुए महिलाओं का झूलों के सहारे आसमान को धरती पर उतार लाने की कोशिश. सामान्य बातचीत में जब भी सावन का जिक्र होता है तो उसके साथ सहज ही झूलों की चर्चा होने लगती है. झूलों की चर्चा होने पर उसके साथ महिलाओं का जुड़ा होना पाया जाता है. ऐसा शायद कोई दृष्टान्त सामने आया हो जबकि सावन के झूलों की बात चल रही हो और उसमें पुरुषों की चर्चा की जा रही हो. ऐसा माना जाता रहा है कि झूला झूलने का काम सिर्फ महिलाओं का है. अब ऐसा मानने वाले लोग भी कम दिखने लगे हैं. इसका कारण स्त्री-पुरुष समानता नहीं वरन झूलों का न के बराबर दिखाई देना है. पहले झूले बहुतायत में दिखाई देते थे. शायद ही कोई बड़ा, घना पेड़ बिना झूले के रहता हो. अब ऐसा कुछ दिखाई नहीं देता. अब ऐसे पेड़ भी बहुत कम दिखते हैं और झूले भी न के बराबर दिखते हैं. हाँ, पार्कों में अवश्य ही ऐसे झूले दिखते हैं. उनमें बच्चों का पेंग भरते देखना सुखद लगता है. भले ही पेड़ की कमी यहाँ दिखती हो मगर झूले का असल स्वाद यहाँ अवश्य ही मिलता है.

बरगद का पेड़ (यही जगह कहलाती है बरगदिया तरे)

हमें अपना बचपन और उसके बाद की स्थिति भली-भांति याद है जबकि खूब झूला झूला जाता था. उस समय जहाँ हम लोग रहते थे वहाँ पर एक बड़ा बरगद का पेड़ हुआ करता था. जिसकी छाँव में हम बच्चे अपनी शरारतें करते और बड़े लोग अपनी चर्चाएँ. उस जगह को बरगदिया तरे कह कर पुकारा जाता था. सभी लोग उस जगह को इसी नाम से आज भी पहचानते हैं. उसी बरगद के पेड़ पर झूला डल जाया करता था फिर क्या दिन क्या रात, क्या सुबह क्या शाम, क्या बच्चे क्या बड़े, क्या महिलाएं क्या पुरुष सभी लोग झूला झूलते नजर आते थे. दो-दो, चार-चार के अलावा कई बार आठ-आठ लोग एकसाथ झूला झूलते नजर आते. किसी दिन खूब मजबूत लम्बा सा बांस लेकर बाँधा जाता और उसी के अनुपात में मोटी रस्सी. बस फिर क्या एक-एक करके झूला झूलने वालों की संख्या बढ़ती रहती, पेंग भी बढ़ती रहती. किसी-किसी दिन डंडे की जगह बड़ा सा तख्ता बाँध दिया जाता. फिर क्या, कुछ लोग एक तरफ मुंह करके बैठते, कुछ लोग दूसरी तरफ मुंह करके. कभी-कभी शरारत का आलम ये रहता कि झूले को बजे झुलाने के, पेंग बढाने के उसी को गोल-गोल घुमाया जाता रहता. जिस-जिस बच्चे को गोल-गोल घूमने से समस्या होती वह चक्कर खाता हुआ इधर से उधर डोलता नजर आता. 


अपने घर के पास के झूले के साथ-साथ ननिहाल में भी झूले का खूब आनंद उठाया है. एक बार का किस्सा तो बहुत अच्छे से याद है जबकि घर के बाहर लगे नीम के पेड़ पर झूला डाला गया. उस झूले में बजे डंडे के चारपाई का इस्तेमाल किया गया. इसका कारण ये कि हमने इच्छा जताई कि लेट कर झूला झूलना है. फिर क्या था, ननिहाल में सबके अत्यंत प्रिय होने के कारण मामा लोगों ने आनन-फानन डंडे की जगह चारपाई बाँध दी. अब लेटे-लेटे झूले का आनंद किया गया. कॉलेज टाइम में भी झूला झूलने का आनंद लिया. मेले में, प्रदर्शनी में आज भी झूला झूलने का आनंद लेते हैं. अब ये बात और है कि ये झूले पेड़ के बजाय जमीन पर खड़े होते हैं और बिजली के सहारे से गोल-गोल चक्कर लगवाते हैं. इन झूलों में रफ़्तार का मजा भले आये मगर न तो पेंग बढ़ाकर आसमान छूने जैसा रोमांच आता है, न ही महिलाओं के लोकगीतों की मधुर स्वर-लहरियाँ सुनाई देती हैं, न ही बच्चों की शरारतें देखने को मिलती हैं. अब तो रफ़्तार, तकनीक के चलते शोर, चीख-पुकार, चिल्ला-चोट ही सुनाई देती है. आज भी आने-जाने के दौरान, घूमने के दौरान कहीं भी पेड़ पर पड़ा झूला दिख जाता है तो बिना झूले मन मानता नहीं है. कभी-कभी इस मन को घर के जाल पर बेटी के लिए लगाए जाते झूले में झूल कर भी समझा लिया जाता है.

06 मार्च 2019

कुम्भ पश्चात् का प्रयागराज करेंगे कैद


महाशिवरात्रि के स्नान पश्चात् कुम्भ 2019 संपन्न हो गया. अनेकानेक वर्षों से चले आ रहे कुम्भ स्नान, पर्व की इस परम्परा में इस बार कई-कई तरह के नए आयाम जुड़े. देश के प्रधानमंत्री द्वारा और प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा इस सम्बन्ध में विशेष रुचि दिखाई गई. इसके कारण भी प्रशासनिक अधिकारियों में एक तरह की मुस्तैदी साफ़ तौर पर बनी रही. समूचे कुम्भ के दौरान स्वच्छता, सुरक्षा, अनुशासन आदि का संगम भी बखूबी बना रहा. स्वच्छता के सम्बन्ध में स्वयं प्रधानमंत्री ने प्रशंसा की तथा सफाई कर्मियों के प्रतिनिधियों के रूप में पांच व्यक्तियों के पैर भी पखारे. इस बार सांस्कृतिक झांकियों का बनाया जाना, प्रयागराज में सड़कों के किनारे बने मकानों अथवा अन्य इमारतों में भारतीय संस्कृति सम्बन्धी चित्रकारी ने आने वालों का मन मोह लिया. कुम्भ मेला परिसर में की गई लाइटिंग और सजावट आदि ने भी कुम्भ की रंगत को बढ़ा दिया था. यहाँ उद्देश्य कुम्भ के बारे में बताना नहीं वरन यह बताना भर है कि कई बार चाहने के बाद भी कुम्भ में न जा सके.  


यह हमारी अपनी दृष्टि से इसलिए दुखद है क्योंकि हम समूचे कुम्भ मेले को अपने कैमरे की निगाह से कैद करना चाह रहे थे. कुम्भ का अपना जो भी धार्मिक महत्त्व है वह अपना है ही मगर कहीं, किसी भी आयोजन में उससे सम्बंधित प्रदर्शनी, सजावट, उसकी व्यवस्था आदि से भी उस आयोजन के बारे में बहुत कुछ देखने-समझने को मिलता है. देश भर के हिस्सों से आये हुए लोगों के साथ-साथ विदेशों से आये हुए पर्यटकों से मिलना जानकारी में वृद्धि करता है, खुद अपने नजरिये को बढ़ाता है. ऐसा नहीं कि इस बार प्रयागराज कुम्भ में जाने का प्रयास नहीं किया, किया और वो भी एक बार नहीं तीन बार मगर कुम्भ को कैद करना हो ही नहीं पाया. हर बार किसी न किसी काम के चक्कर में यही सोचकर आगे के लिए कार्यक्रम बढ़ाते रहे कि अगले किसी दिन चले जायेंगे. ऐसा करते-करते दिन आगे निकलते रहे और बाद में ऐसी स्थिति बन गई कि फिर कुम्भ जाने का प्रोग्राम टालना ही पड़ा. 


हमारा उद्देश्य संगम में स्नान करना नहीं था क्योंकि प्रयागराज आना-जाना करते हुए दशकों बीत गए मगर कभी संगम स्नान का सुख नहीं लिया. ये और बात है कि अपनी प्रयागराज यात्रा में शायद ही किसी बार ऐसा हुआ हो जबकि संगम जाना न हुआ हो अथवा माँ गंगा का आशीष न लिया हो. इस बार भी कुम्भ स्नान से अधिक मन इस समूचे आयोजन को अपनी आँखों से देख हमेशा-हमेशा के लिए अपनी धरोहर बना लेना था. बहरहाल, जानकारी मिली है कि बहुत सी झांकियां, प्रदर्शनी अभी कुछ समय तक ज्यों की त्यों बनी रहेंगी. ऐसा भी ज्ञात हुआ है कि सजावट, लाइटिंग आदि भी लम्बे समय तक बनाये रखी जाएगी. ऐसे में जल्द ही कुम्भ समापन पश्चात् एक यात्रा प्रयागराज की तरफ की जाएगी. अबकी हमारा कैमरा कुम्भ आयोजन बाद के कुम्भ मेला परिसर को अपनी कैद में लेगा. देखा जाये तो यह भी संग्रहणीय होगा क्योंकि कई दिनों के अनुशासन, व्यवस्थित, सांस्कृतिक, रंगारंग स्वरूप के बाद संगम तट का रूप-रंग किस तरह से मन-मष्तिष्क को आकर्षित करता होगा.

02 मार्च 2019

स्वीपर आंटी भी हमारे जैसी इंसान हैं


बिटिया रानी की वार्षिक परीक्षा चल रही है. इस समय कक्षा पाँच में है. कल अपना पेपर देने के बाद घर आना हुआ. इधर-उधर की बातों के बाद, पेपर से सम्बंधित चर्चा के बाद उसने बताया कि सुबह परीक्षा के लिए जाते समय सीढ़ियों से उतरते समय बच्चों की भीड़ थी. जल्दी उतरने के चक्कर में किसी ने मुझे धक्का दे दिया. मैंने जल्दी से सामने काम कर रही स्वीपर आंटी को पकड़ लिया नहीं तो मुँह के बल गिर पड़ती. 

उसको समझाया कि संभल कर, आसपास देख कर चला करो. जब भीड़ कम हो जाये तब सीढ़ियाँ चढ़ा-उतरा करो. 

इस पर उसने कहा कि हाँ, ये बात तो है पर हम आपको कुछ और बताना चाह रहे. हमारे पूछने पर उसने बताया कि उसके कुछ दोस्तों ने कहा कि अपने हाथ धोकर आओ क्योंकि तुमने स्वीपर आंटी को छू लिया है. 

हमने पूछा कि फिर तुमने क्या किया? 

इस पर वो बोली कि हमने अपने दोस्तों से कहा कि हमारे हाथ गंदे नहीं हुए हैं और हम इसलिए अपने हाथ नहीं धोने जायेंगे कि हमने स्वीपर आंटी को पकड़ लिया.

इसमें सबसे बड़ी बात जो हमें लगी वह यह कि बिटिया के दोस्तों ने इस कारण उससे बात नहीं की मगर इसके बाद भी उसने अपने हाथ नहीं धोये, जबकि किसी तरह की गन्दगी नहीं लगी थी हाथों में. हम कुछ कहते इससे पहले वो फिर बोली कि पापा स्वीपर आंटी भी तो हमारी तरह इन्सान हैं. उनको जो काम मिला है, वो कर रही हैं. उनको छूने से कोई गन्दगी तो लग नहीं गई थी हमें.


उसकी बातों से लगा कि हम लोग अपने घर में अपने बच्चों को जो शिक्षा देने जा रहे हैं, देना चाहते हैं वह गलत दिशा में नहीं जा रही. असल में हम सभी ने घर में कभी भी उसके ऊपर नंबर गेम हावी नहीं किया गया, न ही होने दिया गया. पढ़ाई को कक्षा के पाठ्यक्रम की समाप्ति अथवा उसके रटवाने से ज्यादा विषय की व्यापक समझ विकसित करने पर ध्यान दिया गया. हरदम एक और कोशिश रही कि पढ़ाई के साथ-साथ, स्कूली शिक्षा के साथ-साथ अभी से सामाजिक, सांस्कृतिक क्रियाकलापों में भी उसकी सहभागिता होती रहे. इसके चलते अधिक से अधिक प्रयास यही होता है कि उसे भी सामाजिक कार्यक्रमों में, सांस्कृतिक समारोहों में शामिल होने दिया जाये. अनेक तरह के सामाजिक कार्यों में उसको भी सक्रिय रूप से शामिल किया जाता है. कभी वृक्षारोपण में, कभी नेत्रहीन बच्चों के बीच सहभागिता करवाने में, कभी कहीं कुछ वितरण करवाने में. ऐसा करवाने के पीछे हमारी सोच यही है कि वह कम से कम अभी से जीवन के इस पक्ष को भी ध्यान दे.

इसके साथ-साथ प्रयास यह भी रहता है कि देश के इतिहास के बारे में, यहाँ के वीरों के बारे में, संस्कृति के बारे में, लोक-पर्वों आयोजनों आदि के बारे में भी उसे जानकारी रहे. समय-समय पर विभिन्न स्थानों पर घूमने जाना तो होता ही रहता है इसके अलावा कोशिश रहती है कि एकबारगी भले ही किसी बड़े मॉल या किसी अत्याधुनिक स्थानों की सैर उसे न करवा पायें पर कम से कम अपनी लोक-संस्कृति से उसका परिचय आवश्यक करवा दिया जाये. इसी में उसे समय-समय पर लगने वाली प्रदर्शनियों, मेलों आदि की सैर करवा देते हैं. अभी तक तो उसकी जीवन-गाड़ी सही दिशा में, सही पटरी पर जा रही है. कामना है कि आगे भी ऐसे ही सकारात्मकता बनी रहे.

10 फ़रवरी 2018

संस्कार हस्तांतरित हो रहे अगली पीढ़ी में


आज अम्मा जी का जन्मदिन है. जन्मदिन मनाने की परम्परा हम बच्चों की कभी नहीं रही उसी तरह की आदत सी बनी हुई है, ये और बात है कि आधुनिकता के चलते अब हम अपने बच्चों के जन्मदिन मनाने लगे हैं. हाँ, हमारे बच्चे ही हमारा जन्मदिन मनाने लगे हैं. हमारे अम्मा-पिताजी ने कभी हमारा जन्मदिन नहीं मनाया और न ही कभी हमने जिद करी अपना जन्मदिन मनाने की. जन्मदिन पर अपने अम्मा-पिताजी के पैर छूकर, उनका आशीर्वाद लेकर कब, कैसे चालीस साल पार कर गए, पता ही नहीं चला. आज की पीढ़ी की तरह न कभी कोई पार्टी, न कभी कोई जश्न, न कभी कोई केक, न कभी कोई होटल. इधर समाज की तथाकथित मान्यताओं को सिर-माथे लगाया. बच्चों का जन्मदिन मनाया. केक भी कटवाया गया, पार्टी भी की गई, लोगों को भी बुलाया गया. खैर.... आज अवसर था अम्मा के जन्मदिन का. केक तो नहीं कटा, न ही कटवाया जाना था क्योंकि हमें पता था कि अम्मा को खुद पसंद नहीं आएगा. इसके बाद भी जन्मदिन का उल्लास दिखा, हर्ष दिखा.





सुबह-सुबह बातचीत में अम्मा के जन्मदिन की यादें ताजा हुईं. शुभकामनाओं के आदान-प्रदान के बाद सभी लोग अपने-अपने काम में लग गए. काम निपटते-निपटते शाम हो गई. बिटिया रानी अपनी दोस्त के घर से वापस आई. ख़ुशी उसके चेहरे पर दिख रही थी और हाथों में एक लिफाफा. उसने कान में आकर फुसफुसाया, आप अपना कैमरा सही कर लो, हम दादी के लिए गिफ्ट लाये हैं. हमने गिफ्ट की बात सोची भी नहीं थी. दिमाग में इतना था कि शाम को बाजार से वापसी करते समय मिठाई वगैरह लेते आयेंगे और अम्मा का जन्मदिन मना लिया जायेगा. उनकी ख़ुशी के लिए हमें मालूम था कि यही बहुत बड़ा कदम होगा. पिताजी के जाने के बाद हरसंभव कोशिश हम भाइयों और सभी बहुओं ने की है कि अम्मा को दुखी न होने दिया जाये, उनको ख़ुशी कितनी दे सके, इसका पता नहीं. कुछ ऐसा ही आज भी था. हमारी सोच से एक कदम आगे जाकर हमारी बिटिया रानी अपनी दादी के लिए गिफ्ट तक की व्यवस्था कर लाई. कहते हैं न कि असल से ज्यादा पसंद सूद होता है, ठीक उसी तरह सूद को भी अपना महाजन ज्यादा पसंद आया. जब बिटिया परी ने आकर कान में फुसफुसाया कि आप अपना कैमरा तैयार रखिये, हम दादी के लिए सरप्राइज गिफ्ट लाये हैं लगा कि हमारा पालन-पोषण, हमारे संस्कार, हमारी शिक्षा गलत दिशा में नहीं जा रहे. यदि नातिन को दादी के जन्मदिन की फ़िक्र है, उनका जन्मदिन मनाये जाने की आतुरता है, उल्लास है इसका अर्थ है कि उसके भीतर पारिवारिक संस्कार का बीजारोपण हो चुका है.





आनन-फानन अपना कैमरा रेडी किया, मोबाइल कैमरे को भी मोर्चे पर तैनात किया. किसी भी तरह से बिटिया की कोशिशों पर पानी नहीं फिरना चाहिए. हम ज़िन्दगी भर अपनी अम्मा का जन्मदिन किसी भी तरह से नहीं मना सके मगर यदि अगली पीढ़ी रिश्तों की अहमियत जानना, समझना चाहती है तो उसे महज एक कैमरे की कीमत पर रोका नहीं जायेगा. हम अपना कैमरा लेकर तैयार, हमारी पत्नी निशा मोबाइल पर तैयार और बिटिया अपनी दीदी चंचल के साथ गिफ्ट देने के लिए तैयार. गिफ्ट दिया गया, आँख बंद कर. गिफ्ट पैक खोला गया, छोटा सा पैकेट. दादी के साथ हम सब हैरान कि इसमें होगा क्या. और जब रैपर हटाया गया तो सबकी हँसी निकल गई. अम्मा भी खूब हँसी. परी ने उनके लिए विशेष रूप से लिया था ताश खेलने का साधन. चूँकि अम्मा खाली समय का उपयोग ताश खेल का करती हैं और उसे देखते हुए परी ने गोल्ड प्लेटेड ताश अपनी दादी के लिए गिफ्ट में लिए. दादी को मिठाई खिलाई गई, उनके साथ फोटो भी खिंचवाई गई. फोटो खींचते, खिंचवाते समय एक बात दिमाग में बार-बार क्लिक कर रही थी कि अपनी बिटिया की परवरिश में कहीं कमी नहीं हुई है. आखिर वो भी पारिवारिकता को, रिश्तों को अहमियत दे रही है.