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23 अगस्त 2024

स्वस्थ राजनीति के प्रतीक-पुरुष कृष्ण

"कृष्ण को क्या आप अपहरण-भूषण नहीं कहेंगे? खुद ने तो रुक्मिणी का अपहरण किया ही था, अर्जुन को भी बहन सुभद्रा का अपहरण करने को लालायित करते हैं।"

 

असल में समाज की व्यवस्थायें जब बदल जाती हैं, तो बहुत-सी बेतुकी हो जाती हैं। एक युग था जब किसी स्त्री का अपहरण न किया जाए, तो उसका एक ही मतलब था कि उस स्त्री को किसी ने भी नहीं चाहा। एक युग था कि जब किसी स्त्री का अपहरण न किया जाए, तो उसका मतलब था कि उसकी कुरूपता सुनिश्चित है। एक युग था जब सौंदर्य का सम्मान अपहरण था। और अब वह युग नहीं है। लेकिन आज भी अगर यूनिवर्सिटी कैंपस में किसी लड़की को कोई भी धक्का नहीं मारता तो उसके दुख का कोई अंत नहीं है। कोई अंत नहीं है उसके दुख का। और जब कोई लड़की आकर दुख प्रगट करती है कि उसे बहुत धक्के मारे जा रहे हैं तब उसके चेहरे को गौर से देखें, उसके रस का कोई अंत नहीं है। स्त्री चाहती रही है कोई अपहरण करने वाला उसे मिले। कोई उसे इतना चाहे कि चुराना मजबूरी, जरूरी हो जाए। कोई उसे इतना चाहे कि मांगेंगे नहीं, चुराने को तैयार हो जाए।

 



तो कृष्ण जिस युग में थे उस युग को समझेंगे तब यह बात खयाल में आ सकती है। और मैं मानता हूं कि यह हिम्मतवर युग था। यह भी कोई बात कि पंचांग और पत्रा को दिखाकर कोई विवाह कर ले! लेकिन कृष्ण जब किसी को उत्प्रेरित भी कर रहे हैं अपहरण के लिए, तो इसीलिए कि वह कहते हैं कि प्रेम इतनी बड़ी चीज है कि अगर वह है, तो अपहरण भी किया जा सकता है, दांव लगाया जा सकता है। और प्रेम कोई नियम नहीं मानता। और युग था वह जो प्रेम का युग था। जिस दिन नियम शुरू हो जाते हैं, उसी दिन मानना चाहिए कि प्रेम की शक्ति शिथिल हो गई है। अब प्रेम बहुत चुनौतियां नहीं लेता, दांव नहीं लगाता। उस युग के पूरे-के-पूरे ढांचे को समझेंगे तो खयाल में आएगा। यह कृष्ण किसी विशेष युग में पैदा हुए हैं। उस युग की व्यवस्था का हमें खयाल नहीं है। हमारे युग की व्यवस्था को हम उन पर थोपने जाएंगे तो वह कई बार अनैतिक मालूम पड़ने लगेंगे। लेकिन मुझे भी लगता है कि शौर्य के युग, जब जिंदगी में तेज होता है और जब जिंदगी में शान होती है, तो चुनौती के और दांव के युग होते हैं। शिथिल और मरे हुए समाज, जब जिंदगी में सब चुनौती खो जाती है और सब ढीला-ढाला होता है, और तरह की नीतियां बनाते हैं जो मुर्दा नीतियां होती हैं। न, मैं तो कहूंगा कि कृष्ण अगर अपहरण करके न लाएं किसी स्त्री का और उसी स्त्री के बगैर खबर भेजें, उसके पिता के हाथ-पैर पड़ें और सब उपाय करें, तो उस स्त्री का अपमान होगा, उस युग में अपमान होगा। वह स्त्री इसे पसंद नहीं करती। वह कहती कि इतनी भी हिम्मत नहीं है मुझे चुरा सको, तो छोड़ो यह बात!

 

हमें खयाल नहीं है कि आज भी--युग तो बदल जाते हैं, लेकिन कुछ ढांचे चलते चले जाते हैं--आज भी जिसे हम बरात कहते हैं, किसी दिन वे प्रेमी के साथ गए हुए सैनिक थे। और जिसे आज हम दूल्हा को घोड़ा पर बिठाते हैं, दूल्हे को--दूल्हे को घोड़े पर बिठाना बिलकुल बेमानी है, कोई मतलब नहीं है--और एक छुरी भी लटका देते हैं उसके बगल में, वह कभी तलवार थी और कभी वह घोड़ा किसी को चुराने गया था और कुछ साथी थे उसके जो उसके साथ गए थे, वह बरात थी। और आज भी आपको पता होगा कि जब बरात आती है तो लड़की के घरवाली स्त्रियां गालियां देना शुरू करती हैं। कभी सोचा कि वे गालियां क्यों देती हैं? वह जिसके घर की लड़की चुराई जा रही होगी, उसकी दी गई गालियां होंगी। लेकिन अब काहे के लिए गालियां दे रही हैं, वह खुद ही इंतजाम किए हैं सब। आज की लड़की का पिता झुकता है, आज भी। अब कोई कारण नहीं है लड़की के पिता के झुकने का। कभी उसे झुकना पड़ा था। कभी जो उसे छीनकर ले जाता था, जो विजेता होता था, उसके सामने झुक जाना पड़ा था। वह कभी के नियम थे, जो अब भी सरकते हुए मुर्दा हालत में चलते चले जाते हैं।

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साभार ओशो - कृष्‍ण स्‍मृति, प्रवचन – १०

स्वस्थ राजनीति के प्रतीकपुरुष कृष्ण


23 दिसंबर 2023

इमरोज-अमृता-साहिर : जबरिया स्थापित प्रेम-आदर्श

‘इमरोज लिखते, पढ़ते, सुनते ही इस शब्द के मूल अर्थ के स्थान पर एक शख्स उभर कर आता है, जिसके साथ और भी नाम उभरते हैं. यकीन न हो तो इस पोस्ट को पूरा पढ़ने के पहले एक बार आँखें बंद करिए और मन में इमरोज नाम की आकृति बनाइये. इस तस्वीर के साथ आपको तस्वीर दिखेगी अमृता प्रीतम की. जैसे ही अमृता प्रीतम का चित्र आपकी आँखों के सामने बनता है, आपके अंतर्मन में बनता है, उस नाम के साथ एक और नाम उभरता है. आश्चर्य, अबकी ये नाम इमरोज का नहीं है. ऐसा कैसे? यदि इमरोज का नाम मन-मष्तिष्क में आते ही अमृता प्रीतम का चित्र उभरता है तो अमृता प्रीतम का नाम दिल-दिमाग में आते ही इमरोज की छवि उभरनी चाहिए, मगर ऐसा नहीं होता है. अमृता का नाम सामने आते ही इमरोज से अलग दूसरा चेहरा उभरता है और वो चेहरा होता है साहिर लुधियानवी का. है न एक कमाल का त्रिकोण? प्रेम का एक ऐसा त्रिकोण जहाँ प्रेम है मगर उसकी स्वीकार्यता नहीं; प्रेम है मगर उसकी सम्पूर्णता नहीं.




बहरहाल, चर्चा इस त्रिकोणीय प्रेम पर नहीं बल्कि इमरोज के निधन के पश्चात् उभरे प्रेम के कथित आदर्शवादी स्वरूप पर चर्चा का मन है. कथित शब्द पर बहुतेरे आदर्शवादियों को दिक्कत हो सकती है, होती है तो हुआ करे. कुछ ऐसा ही काम तो इमरोज ने किया, अमृता ने किया. इमरोज के निधन के पश्चात् उनके और अमृता के प्रेम का आदर्श भरा स्वरूप दिखाने वाले अचानक से प्रकट हो गए. इमरोज को प्रेम के अनेकानेक अलंकरणों से, विभूषणों से सजाया जाने लगा. आलंकारिकता की, विभूषणों की सीमा से बाहर जाकर इमरोज के प्रेम को सर्वोच्च शिखर पर विराजित करने जैसे प्रयास होने लगे. अमृता प्रीतम की मृत्यु के लगभग दो दशक बाद तक इमरोज निहायत तन्हा जीवन गुजारते रहे, तब उनके प्रेम में आदर्श किसी को नजर नहीं आया. चर्चा का विषय ये भी नहीं है बल्कि चर्चा के केन्द्र में अनावश्यक रूप से एक ऐसी स्थिति को महिमामंडित किये जाने की मानसिकता है, जो बिना कुछ सोचे-समझे बस भेड़चाल में लग जाती है.


इमरोज लगभग चालीस वर्षों तक अमृता के साथ रहे, प्रेम के नाम पर रहे जबकि समाज ने, दुनिया ने कभी उनको अमृता का नौकर समझा, कभी ड्राईवर समझा. अमृता लेखन करती तो इमरोज चाय बनाकर रखते; अमृता की साहित्यिक मंडली घर आती तो इमरोज सबकी खातिरदारी करते; राज्यसभा सदस्य बनी अमृता जब संसद जाती तो इमरोज बाहर बैठे उनका इंतजार करते. इसके बाद भी इमरोज को मिला अपनी पीठ पर साहिर का वो नाम जिसे अमृता अपने नाखूनों से लिखती. इमरोज-अमृता, अमृता-साहिर नाम के इन दो समीकरणों में केमिस्ट्री शायद गायब ही थी, जिसे आँखों पर पट्टी चढ़ाए समाज समझ नहीं पाया. इमरोज प्रेम करते रहे अमृता से, अमृता प्रेम करती रही साहिर से, साहिर अमृता के प्रति अपने प्रेम को जाहिर ही नहीं कर सके और अंततः एक दिन वे अमृता से दूर, बहुत दूर हो गए. प्रेम के इस समीकरण में बहुत सी बातें समझने लायक हैं, जिनको कथित आदर्श थोपने के पहले समझना आवश्यक है. इमरोज और साहिर ने आजीवन विवाह नहीं किया और अमृता ने जिस विवाह को दकियानूसी, घुटन भरा, अहंकारी मानकर अपने पति से अलग रहना स्वीकार किया, वे आजीवन उनके नाम ‘प्रीतम को अपने साथ चिपकाए रहीं. समझ नहीं आता कि प्रेम का ये कौन सा आदर्शमयी स्वरूप है, जिसे समाज में स्थापित करने के प्रयास हो रहे हैं?




बात इतनी सी ही नहीं है बल्कि इससे आगे भी है. एक पल को विचार करिए कि इमरोज विवाहित होते तो इस तरह के प्रेम-सम्बन्ध का निर्वहन कर पाते? साहिर यदि विवाहित होते तो क्या अमृता उनके प्रति अपने प्रेम को इस कदर सार्वजनिक कर पातीं? अमृता यदि अपने पति संग रह रही होती तो क्या इमरोज इस तरह से चालीस साल उनके साथ संबंधों का निर्वहन कर पाते? क्या साहिर के प्रति अमृता तब भी इतनी ही निर्भीकता दिखा पाती? परिवार के नाम पर एक कड़ी के गायब रहने की स्थिति में ही इमरोज, अमृता, साहिर प्रेम का ये स्वरूप दिखा पाए, निभा पाए. अभी बात इमरोज की तो इमरोज किसी भी तरह से न तो प्रेम के दूत हैं, न ही प्रेम का कोई अवतार हैं, न ही किसी तरह के पारिवारिक आदर्श हैं. परिस्थितियों के व्यामोह में लिपटी हुई एक तृष्णा के वशीभूत वे अमृता के साथ बने रहे. प्रेम का स्पष्ट, एकतरफा स्वीकार्य देखने, महसूस करने के के बाद भी इमरोज का अमृता के साथ बने रहना एक अलग कहानी है मगर इसमें किसी तरह का आदर्श खोजने की आवश्यकता नहीं है. ऐसा इसलिए कि जो लोग भी इमरोज के रूप में आदर्श देख रहे हैं, वे अपनी संतानों को भी उसी आदर्श की राह पर चलने की अनुमति देंगे? वर्तमान में समाज में कोई विवाहित व्यक्ति यदि इमरोज के इस आदर्श को अपनाना चाहे तो क्या समाज, परिवार इसकी अनुमति देगा? उसको आदर्श मानेगा?


एक पल को यहाँ भी रुकिए और विचार करिए, सिर्फ हमारी बात पर ही विचार न करिए. तीन स्वतंत्र व्यक्तित्व जो अपने-अपने क्षेत्र में सफल थे, जिनके ऊपर किसी भी तरह की पारिवारिक बंदिश का, पारिवारिक जवाबदेही का मसला नहीं था, जिनके पास एक-दूसरे के प्रति जिम्मेवारी, समर्पण का कोई दायित्व, कर्तव्य जैसा कोई भाव नहीं था वे इस तरह के कथित प्रेम का आदर्श सहज भाव में तो स्थापित कर ही सकते हैं. इस पोस्ट को पढ़ने के बाद फिर सोचियेगा, तीनों नामों की जगह पर अपने परिवार के सदस्यों को, बच्चों को रखकर सोचियेगा. आदर्श को हवा में उड़ते देर न लगेगी. 





 

28 नवंबर 2022

प्रेम के प्रति संकुचित दृष्टिकोण

अक्सर हम मित्रों के बीच प्रेम, प्यार, इश्क को लेकर चर्चा छिड़ जाती है. चर्चा तो इन शब्दों पर न जाने कब से चलती चली आ रही है किन्तु इसका कोई निष्कर्ष निकलता नहीं दिखाई दिया. प्रेम, प्यार जैसे विषय पर जितने लोग उससे कहीं ज्यादा बातें देखने को मिलती हैं. एक ऐसा देश जहाँ प्रेम के प्रतीक राधा-कृष्ण की पूजा होती है वहाँ प्रेम के नाम पर बहुत बड़ा संशय बना हुआ है. खैर, बात इस पर बाद में, जैसी कि पोस्ट का आरम्भ किया था दोस्तों की चर्चा से तो बात वहीं. दोस्तों की चर्चा इस विषय पर इसलिए भी होती है क्योंकि हमारा इस विषय पर बहुत अलग नजरिया है. देखा जाये तो प्रेम, प्यार पर अलग दृष्टि से ही सोचने की आवश्यकता है. हम दोस्तों के बीच भी अक्सर यही बिंदु उभर कर सामने आता है.


यदि इस विषय पर और कोई बात न करते हुए प्यार शब्द को ही देखें तो इसके मायने रिश्तों के अनुसार बदलते भी रहते हैं. यदि एक व्यक्ति कहे कि उसे अपने पिता से प्यार है तो इसके सन्दर्भ अलग होंगे. वही व्यक्ति कहे कि उसे अपनी माँ से प्रेम है तो इसके सन्दर्भ भी अलग हो सकते हैं. इसी तरह यदि वही व्यक्ति कहे कि उसे अपने भाई से, बहिन से, बाबा, दादी, नाना, नानी आदि-आदि से प्रेम है तो इसमें सबके लिए एक स्पष्ट सा नजरिया दिखेगा किन्तु जैसे ही वही व्यक्त कहे कि उसे अपनी सहकर्मी से प्रेम है या उसे अपने साथ में पढ़ने वाले/वाली से प्रेम है तो सुनने वाले की मानसिकता में तुरंत बदलाव दिखाई देगा. ऐसा क्यों? यदि अभी तक विभिन्न रिश्तों, संबंधों में प्रेम किसी तरह से संशय का विषय नहीं बना था तो सहकर्मी या फिर सहपाठी के नाम पर प्रेम शब्द ने अर्थ कैसे बदल लिया?




असल में प्रेम को संबंधों के साथ, रिश्तों के नाम पर बाँट दिया गया है. यही कारण है कि प्रेम का अर्थ शारीरिक संबंधों से, विवाह से लगाया जाने लगा है. ऐसा माना जाने लगता है कि दो व्यक्तियों में उसी स्थिति में प्यार या प्रेम को स्वीकार्यता है जबकि वे स्त्री-पुरुष न हों. यदि ऐसा स्त्री और पुरुष के बीच पाया जाता है तो वो अनैतिक होता है. दोस्तों के बीच की चर्चाओं में इस विषय पर बहुत अलग तरीके से सोचने को, बात करने को मिलता है. देखा जाये तो समाज में अभी भी प्यार के नाम पर बहुत ही संकुचित मानसिकता पाई जाती है. इसे लेकर व्यापक दृष्टिकोण के लिए जरूरी है कि इस विषय पर खुलकर बातचीत हो. समाज में प्रेम के नाम पर जिस तरह की खाँचेबंदी है वह इसे बदनाम करने के और कुछ नहीं कर रही है. अत्यंत पवित्र अवधारणा, पावन परंपरा को संकुचित मानसिकता ने गन्दा कर रखा है.


इक्कीसवीं सदी बदलाव की सदी है, बहुत कुछ बदल भी रहा है मगर प्रेम के प्रति बनी संकुचित मानसिकता में बदलाव नहीं दिखाई दिया है. प्रेम के रूपों में बदलाव आ गया है मगर उसके प्रति बनी धारणा में बदलाव नहीं आया है. तमाम बदलावों, परिवर्तनों के बीच जब तक प्यार, प्रेम को समझने की दशा में, उसके प्रति सोच में बदलाव नहीं आता है तब तक इस विषय के प्रति सोच ऐसे ही संकुचित बनी रहेगी. 





 

20 मार्च 2022

वे क्षण, वो स्नेह, वो अपनापन हमारी धरोहर है

मित्रों के घर आना-जाना तो सभी का लगा ही रहता है. सामान्य तौर पर जाना भी होता है और किसी विशेष अवसर पर भी जाना पड़ता है. एक ऐसा ही विशेष अवसर आया हमारी मित्र के गृह प्रवेश का. मित्रता बहुत पुरानी, अनौपचारिक और पारिवारिक है, सो जाना अनिवार्य जैसा ही था. जाना हुआ भी उसके घर. उसके परिजनों में बहुत सारे लोग ऐसे थे जिनसे मुलाकात नहीं थी मगर सभी के नामों से (कारनामों से भी) जबरदस्त परिचय था. वैसे सोशल मीडिया के कारण उन सभी पारिवारिक सदस्यों के चेहरों से भी परिचय था, बस आमने-सामने की मुलाकात नहीं थी.


फिलहाल, नियत समय पर मित्र के घर जाना हुआ. दिल-दिमाग में एक विचार बहुत बार आया कि वहाँ सबसे मिलना होगा, जिन लोगों से पहली बार मिलना होगा उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी? खुद हमारा अपना व्यवहार, उनसे मिलने का अंदाज उनके प्रति कैसा होगा? उन लोगों की तरफ से मुलाकात कितनी औपचारिक, कितनी अनौपचारिक रहेगी? खैर, इस तरह के सवाल सामने आते और हम अपने स्वभाव के चलते उनको हवा में उड़ा देते क्योंकि विगत वर्षों की दोस्ती का जो अंदाज बना हुआ है उसके कारण यह तो खुद पर भरोसा था कि मुलाकात, परिचय महज औपचारिक तो नहीं ही रहेगा.


जो समय हमने स्वयं में विचार कर रखा था, उससे कुछ देरी से ही घर पहुँचना हुआ. इस देरी का बहुत बड़ा कारण गाड़ी के मिलने में होने वाली समस्या रही. होली का त्यौहार होने के कारण गाड़ियाँ सहज रूप में उपलब्ध नहीं थीं. भले ही कुछ देरी से मित्र के घर पहुँचना रहा हो मगर द्वार पर पहुँचते ही लगा नहीं कि ऐसे लोगों के सामने आकर खड़े हो गए हैं, जिनसे पहली बार मुलाकात हो रही है, पहली बार बातचीत हो रही है. स्वागत की करो तैयारी, आ रहे हैं भगवाधारी की हमारी तर्ज़ पर ही हमारा स्वागत किया गया.


उसे वैसे स्वागत क्या ही कहेंगे, वो स्वागत से बहुत-बहुत ज्यादा ही कुछ था. अपनत्व, स्नेह, प्रेम, अनौपचारिकता, सम्मान, पारिवारिकता से भरपूर दरवाजे का वो अद्भुत नजारा सामने आया जैसा कि सोचा भी न था. ऐसा महसूस हुआ जैसे सभी लोग बस हमारा ही इंतजार कर रहे थे. खिलंदड अंदाज में कोई अपनी बात कह रहा था, कोई कैमरे वाले को बुलाने में लगा था, कोई फूलों की बारिश करने में, कोई गलबहियाँ करने में. और जब ऐसी स्थिति बने कि कार से उतरते ही अपेक्षा से कहीं बहुत अधिक और मनपसंद स्थिति मिल जाये तो फिर न पैर जमीन पर टिके होते हैं और न दिमाग अपने ठिकाने पर होता है. ऐसा स्वागत तो विश्वस्तर पर भी किसी VVVVIP का भी नहीं हुआ होगा या कहें कि उसने कल्पना भी नहीं की होगी.


ऐसा तब होना और भी आश्चर्यचकित करता है, मंत्रमुग्ध करता है जबकि मित्र के परिजनों से केवल खुद का नाम ही परिचित हो, सोशल मीडिया एक माध्यम रहा हो. निस्संदेह अद्भुत, अप्रतिम, स्नेह-अपनत्व-अनौपचारिकता से भरे क्षण थे वे. उन चंद पलों में न केवल हम ही वरन गृह प्रवेश के अवसर पर आये बहुत सारे लोग भी आश्चर्यचकित थे. उसके बाद परिवार के अन्य सदस्यों से व्यक्तिगत मुलाक़ात करवाना, बातचीत का हास्य-बोध भरा माहौल, नितांत अनौपचारिक वातावरण में एकदम पारिवारिक सा अनुभव हो रहा था. यह व्यक्तिगत प्रसन्नता ही होती जबकि आपका पारिवारिक दायरा और अधिक विस्तार ले लेता है. इसे हम सहज रूप में महसूस कर सकते हैं.


वे चंद पल ज़िन्दगी भर के लिए अपना ऋणी बनाने के लिए पर्याप्त हैं. अब वे क्षण, वो स्नेह, वो अपनापन हमारी धरोहर है.





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11 दिसंबर 2021

प्रेम सभी माँग रहे हैं, देने वाला कोई नहीं


 

प्रेम सभी मांग रहे हैं ,देने वाला कोई नहीं

प्रेम शारीरिक नहीं है, इसका नाता कहीं विश्रांति से है, पिघलने से है, पूरा मिट जाने से है।

उन पलों में यह मिट जाता है अत: निश्चित ही यह शारीरिक नहीं। तुम्हें अधिक प्रेम देना सीखना होगा। तुम्हे बस लेने का अनुभव है। तो पहला अनुभव जो उसके अचेतन तक पैठ जाता है वह प्रेम लेने का है। परंतु समस्या यह है कि हर व्यक्ति बच्चा रहा है और हर व्यक्ति के भीतर प्रेम पाने की आकांक्षा है; कोई भी किसी अलग ढंग से पैदा नहीं हुआ है। तो सभी मांग रहे हैं,”हमें प्रेम दो” लेकिन देने वाला कोई भी नहीं क्योंकि वे भी उसी तरह पैदा हुए हैं। हमें सजग व सचेत रहना चाहिए कि हम जन्म की यह अवस्था हमारे पूरे जीवन पर आच्छादित न हो जाए। प्रेम देना बहुत सुंदर अनुभव है क्योंकि देने में तुम सम्राट हो जाते हो। लेना बहुत तुच्छ अनुभव है क्योंकि तुम भिखारी हो जाते हो।


जहां तक प्रेम का प्रश्न है, भिखारी मत बनो, सम्राट रहो क्योंकि तुम्हारे भीतर यह गुणवत्ता असीम है। तुम जितना देना चाहो, दिए चले जा सकते हो। तुम यह चिंता मत करना कि यह चुक जाएगा, कि एक दिन तुम पाओगे कि “हे प्रभु, मेरे पास तो प्रेम देने के लिए बचा ही नहीं।” प्रेम मात्रा नहीं, गुणवत्ता है, ऐसी गुणवत्ता ..जो देने से बढ़ती है और पकड़े रहने से मर जाती है।


अत: इसे पूरी तरह लुटा दो। चिंता मत लो, किसे..यह कंजूस व्यक्ति सोचता है: मैं उसे प्रेम दूंगा जिसमें अमुक गुण होंगे। तुम्हें पता ही नहीं कि तुम्हारे पास कितना प्रेम है..तुम भरे हुए बादल हो। बादल यह चिंता नहीं लेता कि कहां बरसे। चट्टान हो कि उपवन या कि सागर– कोई परवाह नहीं। यह स्वयं को हल्का करना चाहता है और वह निर्भारता ही विश्रांति है।


तो पहला रहस्य है: इसे मांगें मत, प्रतीक्षा मत करें कि कोई आएगा तो हम देंगे। बस दे दें।


अपना प्रेम किसी को भी दें..किसी अजनबी को ही सही। प्रश्न यह नहीं है कि तुम कुछ बहुत कीमती दे रहे हो, कुछ भी, थोड़ी सी सहायता, और वह काफ़ी है।


चौबीस घंटों में तुम जो भी करते हो उसे प्रेम से करो और तुम्हारे दिल की पीड़ा मिट जाएगी। और क्योंकि तुम इतने प्रेमपूर्ण होओगे, लोग तुम्हें प्रेम करेंगे। यह स्वाभाविक नियम है। तुम्हें वही मिलता है जो तुम देते हो। वास्तव में तुम उससे अधिक पाते हो जो तुम देते हो। देना सीखो और तुम पाओगे कि लोग तुम्हारे प्रति कितने प्रेमपूर्ण हैं, वही लोग जिन्होंने तुम्हारे प्रति कभी ध्यान नहीं दिया। तुम्हारी समस्या यही है कि तुम्हारा दिल प्रेम से भरा है लेकिन तुम कंजूस रहे हो; वही प्रेम तुम्हारे दिल पर बोझ हो गया है। दिल को खुला रखने की बजाए तुम इसे पकड़े रहे तो कभी-कभार, किसी प्रेम की घड़ी में यह पीड़ा तिरोहित होने लगती है।


प्रेम बांटो। बस बांटो, और तुम अपने भीतर असीम शांति व मौन का अनुभव करोगे। यही तुम्हारा ध्यान बन जाएगा। ध्यान में उतरने की विभिन्न दिशाएं हैं; और शायद तुम्हारी दिशा यही है।


~ओशो~


(प्रेम पर ओशो के विचार पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

जन्मदिन, ११ दिसम्बर के अवसर पर ओशो को श्रद्धा-सुमन रूप में उनके ही विचार. सबसे ऊपर ओशो के चित्र पर उनके नाम की कैलीग्राफी लेखक द्वारा की गई है.

14 अक्टूबर 2021

प्रेम का मखमली एहसास - 2100वीं पोस्ट (कहानी)

मोबाइल को मेज पर टिका कर वह कुर्सी पर पसर गया. ‘कभी अपने घर को देखते हैं’ की तर्ज़ पर उसने एक नजर ड्राइंग रूम कम स्टडी रूम पर दौड़ाई. अस्तव्यस्त तो नहीं कहा जायेगा मगर करीने से लगा भी नहीं कहा जा सकता. पढ़ने के अलावा भी तमाम शौक के उसी कमरे में अपना आकार लेने के कारण बहुत सी चीजों ने जगह-जगह कब्ज़ा कर रखा था. ऐसा होना स्वाभाविक है क्योंकि अकेले प्राणी के लिए क्या ड्राइंग और क्या स्टडी.


चौंकने जैसी स्थिति में वह किताबें, कागज, कलर्स, कैनवास आदि को उनकी जगह देने के लिए उठा. उसके आने के पहले सभी चीजों को यथास्थान कर दिया जाये अन्यथा कमरे में घुसते ही इसी बात पर लेक्चर मिल जायेगा. याद आया उसे, जब पहली बार वह उसके कमरे पर आई थी तो ‘यही सब खाते-पीते हो क्या? इन्हीं पर सोते-बैठते हो? के साथ उसने इधर-उधर बिखरी किताबों, कागजों, पेन आदि को समेटना शुरू कर दिया था. वह दिन याद आते ही एक मुस्कान के साथ उसने हाथ में पकड़ी किताबों को ज्यों का त्यों छोड़ दिया. आज उसके हाथ से स्टडी रूम संवर जाएगा तो बहुत दिनों तक उसकी महक बनी रहेगी.


साढ़े पाँच बजे महकती पवन की तरह उसका आना हुआ. उसके आने की आहट मात्र ने उन दिनों में पहुँचा दिया जबकि वह उसे अपनी सारी ज़िन्दगी में खुशियाँ बिखेरने के सपने देखा करता था. समय का ही खेल है जिसे ज़िन्दगी भर के लिए उसके साथ होना था वह चंद पलों के लिए अपने एहसासों की बारिश करने आई है.


“आदत अभी तक न बदली तुम्हारी. अभी भी कागज, रंग ही खाते हो. इन्हीं को ओढ़ते-बिछाते हो.” स्टडी रूम में कदम रखते ही उसके वर्षों पुराने अंदाज ने उसे भावनाओं से सराबोर कर दिया.


“एक मिनट रुको” कहते हुए वह सोफे से किताबों को उठाने के लिए आगे बढ़ा.


“तुम रहने ही दो. इतने ही काम वाले होते तो कमरा ऐसा न रहता. रुको मैं सही कर देती हूँ.” पूरे अधिकार के साथ वह कमरे को सजाने में जुट गई.




पहले तो वह कमरे के दरवाजे से टिका उसे सामान लगाते और उस पर बड़बड़ाते देख मुस्कुराता रहा फिर उसकी मदद करने लगा. इस दौरान दोनों के बीच पुराने दिनों की तरह हँसी-मजाक, छेड़छाड़ चलती रही. कभी एक हलकी सी मुस्कान के साथ बात आगे बढ़ती तो कभी ठहाकों के साथ.


“अब लग रहा है जैसे कोई रहता हो यहाँ. आती रहा करो बीच-बीच में इसे भी ज़िन्दगी देने के लिए.” कह कर उसे छेड़ा.


“मैं तो ज़िन्दगी भर ज़िन्दगी देने के लिए आने वाली थी....” आगे के शब्दों पर होंठों के कंपन ने अवरोध पैदा किया. ख़ामोशी ने चीखना शुरू किया ही था कि “कुछ करना सीख लो या अब भी मेरे भरोसे ही रहोगे? कहते हुए उसने माहौल को खुशनुमा बनाया.


उसके कुछ कहने के पहले ही अन्दर से नौकर चाय लेकर आया.


“चलो जल्दी चाय पी लो फिर कहीं बाहर चलते हैं खाना खाने.....” उसने बात काटते हुए अपनी बात जोड़ी “नहीं, कहीं बाहर नहीं जायेंगे. दो दिन से बाहर का खा-खाकर बोर हो गई हूँ. यहीं कुछ बनाती हूँ मैं.”


उसे बिन माँगे बहुत कुछ मिल गया. काश यह पल यहीं रुक जाए हमेशा के लिए.


“ओ हैलो, इधर ध्यान दो. कुछ है भी तुम्हारी किचन में या ऐसे ही बना रखा है अपने स्टडी जैसा? उसके चेहरे पर अप्रत्याशित ख़ुशी, चमक और उसे कहीं खोया सा देख उसने टोका.


थोड़ी देर बाद किचन में उसके प्यार, स्नेह की रेसिपी अपनी खुशबू बिखरने लगी. किचन के एक कोने से टिका मंत्रमुग्ध सा उसे निहारे जा रहा था. इस समय उसके विचारों पर, पूरे व्यक्तित्व पर वही छाई हुई थी. बातों का जवाब न मिलने पर उसने पलट कर देखा तो खुद को ऐसे निहारते देखने पर एक पल को वह भी असहज हो गई.


“ऐसे क्या घूरने में लगे हो? पहली बार देख रहे हो?


“कुछ नहीं. बस.... ऐसे ही....”


“अच्छा चलो, ज्यादा नौटंकी नहीं. चलो, भागो यहाँ से. डायनिंग टेबल सही करो और हाँ सलाद काट लो.” कहते हुए उसने धक्का देकर उसकी नजरों को अपने चेहरे से हटाया.


अपनी बाँहों पर उसकी उँगलियों का एहसास लेकर वह हँसते हुए डायनिंग टेबल की तरफ चल दिया.

 


09 जनवरी 2021

कर लीजिये प्रेम-उपवन की सैर हमारे साथ - दो हजारवीं पोस्ट

यह इस ब्लॉग की दो हजारवीं पोस्ट है. मई 2008 में ब्लॉग बनाने के बाद से लगातार लिखना हो रहा है. कभी रोज लिखा गया, एक दिन में दो-तीन पोस्ट लिखी गईं तो कभी दो-तीन दिन का अन्तराल होता रहा मगर ब्लॉग पर लिखना बंद नहीं हुआ. पिछले दो-तीन दिनों से इस दो हजारवीं पोस्ट के विषय के बारे में विचार चल रहा था. कुछ अलग सा लिखना चाह रहे थे मगर समझ नहीं पा रहे थे कि क्या लिखा जाए. इस बारे में मित्रों से भी चर्चा हुई, सोशल मीडिया पर भी शुभेच्छुओं के बीच बात रखी. बहुत से सुझाव मिले और आश्चर्य की बात देखिए कि बहुतायत में लोगों ने प्रेम सम्बन्धी विषय पर लिखने की राय दी.


वैसे हमने सोचा तो ये था कि इस पोस्ट में अपनी जीवन-यात्रा को संक्षिप्त रूप में लिखा जाये मगर इस बारे में खुद में ही निश्चितता नहीं बन पा रही थी. जैसे-जैसे मित्रों के सुझाव मिलते रहे वैसे-वैसे लगा कि प्रेम ही एक ऐसा विषय है जो कभी भी पुराना नहीं होता, कभी भी किसी को बोर नहीं करता, तो इसी पर लिखा जाये. वैसे भी हम सभी की आदत होती है दूसरों की प्रेमकथा के बारे में जानने की, दूसरों की प्रेम-कहानियाँ सुनने-सुनाने की, प्रेमी-प्रेमिकाओं के बारे में चर्चा करने की. इस बारे में हमने आत्मकथा कुछ सच्ची कुछ झूठी में लिखा भी है. आज की इस दो हजारवीं पोस्ट के विषय से सम्बंधित मित्रों की राय के बाद प्रेम सम्बन्धी विषय पर लिखने का मन बना लिया. इसमें भी आधार हमने खुद को बनाया है. ऐसा करने के पीछे कारण हमारी कुछ सच्ची कुछ झूठी ही है. बहुत से मित्र, पाठक उसमें हमारी प्रेम-कहानी न पाकर उदास हो गए थे.  उन्होंने इस पर अपना दुःख व्यक्त किया था, हमसे अपनी नाराजी प्रकट की थी, इस दो हजारवीं पोस्ट में अपनी ही प्रेमकथा लिख देने या कहें कि उसका आरम्भ कर देने से उन सभी मित्रों, पाठकों की नाराजगी भी दूर होगी और हमें भी किसी न किसी रूप में कुछ सच्ची कुछ झूठी में रह गई कमी को कुछ हद तक पूरा करने का अवसर मिलेगा.



चलिए फिर, आपको सैर करवाते हैं अपनी प्रेम-कहानियों के उपवन में. आश्चर्य न करिए. प्रकृति ने, इंसान की रचना करने वाले सृष्टि निर्माता ने हमारी प्रकृति ही ऐसी बनाई कि मन-दिल हमेशा युवा बना रहा, उसमें प्रेम की लहरें हमेशा उमड़ती-घुमड़ती रहीं. ईश्वर की इस कृति की प्रेमपरक प्रकृति को माता-पिता द्वारा दिए गए नाम ने भी चिरयुवा बनाये रखा. कुमारेन्द्र का सामान्य सा अर्थ भी इसी सन्दर्भ में लगाया जा सकता है. 


हमारे इस प्रेम-उपवन में सैर करते समय प्रेम की ये बगिया आप सभी को हमारी नजर से देखनी होगी. ऐसा इसलिए क्योंकि प्रेम इतना व्यापक फलक वाला गुलशन है जिसे प्रत्येक व्यक्ति अपनी निगाह से देखता है. व्यापक परिदृश्य को अनेकानेक निगाहों से देखने के कारण प्रेम के सन्दर्भ बदल सकते हैं, उसके मानक परिवर्तित हो सकते हैं. ऐसे में हमारे प्रेम-उपवन के भी अनेकानेक निहितार्थ निकाले जा सकते हैं, अनेकानेक सन्दर्भ स्थापित किये जा सकते हैं. ऐसा होने से आप हमारी प्रेम-कहानियों की उस भावबोध को महसूस नहीं कर सकेंगे जिस भावभूमि पर खड़े होकर हमने अपने प्रेम को जिया है, उसको ज़िन्दगी भर के लिए अंतस की गहराइयों में आत्मसात किया है.


आप सभी लोग प्रेम शब्द की पावनता से खुद को जोड़कर धीरे-धीरे आगे बढ़ते रहिए. प्रेम की भावनाओं के नामकरण से बचिए क्योंकि प्रेम बहुत संवेदनशील विषय होता है और यहाँ किसी भी तरह का नामकरण करने पर वह अति-संवेदनशील की श्रेणी में शामिल हो जाता है. इसके बाद स्थिति तनावपूर्ण किन्तु नियंत्रण में है के परम वाक्य से बाहर की हो जाती है.


इसे पढ़कर शायद उन सभी लोगों को बुरा लगे जो प्रेम को अत्यंत संकुचित रूप में देखते-समझते हैं. ऐसे लोगों के लिए प्रेम का मतलब सिर्फ और सिर्फ एक से प्रेम करने से होता है. ऐसा लगता है जैसे प्रेम कोई कोटा सिस्टम हो, एक व्यक्ति से प्रेम हो गया, उसके बाद कोटा ख़तम. प्रेम दिल की पवित्र भावना है जो पल-पल पल्लवित, पुष्पित होती है, सुरभित होती है. हमें तो आज तक प्रेम होता है. आज भी प्रेम होता है. बचपन में भी हुआ, किशोरावस्था में भी हुआ, युवावस्था में भी हुआ. क्या आपको नहीं हुआ? क्या आपको आज प्रेम नहीं होता?


खैर जाने दीजिये, आइये प्रेम-उपवन के उस हिस्से में चलते हैं जो हमारे बचपन से जुड़ा हुआ है. उम्र का वो पड़ाव जब प्रेम के सन्दर्भ, प्रसंग भी ज्ञात नहीं थे मगर उससे प्यार हुआ था. तमाम सारे दोस्तों के बीच वही एक लड़की सबसे ख़ास लगती. उसका ख़ास लगना ही प्रेम है, यह तो तब पता चला जबकि प्रेम का एहसास कर पाने की समझ विकसित हुई. आज जब पीछे पलट कर उस प्रेम की अनुभूति करते हैं तो आज भी वह वैसा ही मासूम दिखाई देता है, तितलियों सा रंगीन, पंछियों सा चंचल. उन दिनों में अख़बारों, पत्रिकाओं से काटे गए चित्रों के आदान-प्रदान करने की स्मृतियाँ आज भी दिल को गुदगुदा देती हैं. बचपन का दौर जिस तरह से मासूमियत के साथ कभी लौटकर न आने को विदा हो जाता है, वह ख़ास लगने वाली शख्सियत भी कभी न मिलने को दूर हो गई. बचपन की वो मासूम कहानी बिना कुछ कहे चलती रही थी, बिना कुछ कहे ही समाप्त हो गई.




समय भागता रहता है, उम्र बढ़ती रहती है, ज़िन्दगी के अनुभव परिपक्वता बढ़ाते रहते हैं. जीवन वास्तविकता के धरातल पर आ चुका था. प्रेम-कहानी को या कहानियों को रचने, गढ़ने से ज्यादा ध्यान खुद को गढ़ने पर, कैरियर बनाने पर दिया जाने का भाव आ गया था. यह भाव हम तो समझ रहे थे मगर दिल नहीं समझ रहा था. वह तो बस प्रेम करते रहना चाह रहा था, सो दिल ने प्रेम किया. पूरी गरिमा के साथ, पूरी पावनता के साथ, पूरी ईमानदारी के साथ किया.


इस अवधि में कहने-बताने लायक बहुत कुछ है. उन दिनों बहुत कुछ घटित हुआ, अच्छा भी, बुरा भी. हँसी भी साथ रही तो आँसुओं ने भी साथ न छोड़ा. बहुत कुछ ऐसा रहा जो साथ-साथ चलता रहा, साथी जैसा लगा इसके बाद भी किसी को अपना न कह सके. दिल, दिमाग, मन आदि सब किसी न किसी द्वंद्व में फँसे समझ आते. आगे बढ़ते कदम बढ़ते-बढ़ते रुक जाते. हाथों को थामने की कोशिश में खुद अपनी ही हथेलियों को बाँध लिया जाता. जो अपना न था, वो अपना न बना. बात जहाँ थी, वहाँ से आगे का सफ़र पूरा करते हुए वापस उसी जगह आकर रुक गई, जहाँ से शुरू हुई थी.  


भावनाओं के धरातल पर खड़े होकर अपने प्रेम का एहसास करते हैं तो सफल-असफल की संकुचित सोच से बहुत आगे का महसूस करते हैं. प्रेम को उथलेपन से ऊपर उठकर महसूस करने का भाव जागृत करके ही प्रेम को चिरस्थायी बनाया जा सकता है. यह कोई ओस की बूँद नहीं जो पल भर बाद मिट जाये. इस भाव को समझने के बाद ही प्रेम का वास्तविक अनुभव प्राप्त किया जा सकता है. इस भाव ने उन दिनों के प्रेम की छवि को धूमिल न होने दिया, उस प्रेम को तन्हा न होने दिया.


उम्र के इस दौर में जबकि जीवन का अर्धशतक अगले किसी मोड़ पर आपका इंतजार कर रहा हो तब प्रेम गंभीरता के भावबोध से भरा होता है. उसमें लड़कपन जैसी उड़ान नहीं होती, लहरों की तरह उछलना-कूदना नहीं होता वरन धीर-गंभीर रूप में वह पावनता का स्वरूप निर्मित करता है. आज इस पड़ाव पर यह कहना कि हमें किसी से प्रेम नहीं है या किसी से प्रेम नहीं होता और किसी से नहीं बल्कि खुद से झूठ बोलना होगा. ऐसा हर वो व्यक्ति कर रहा है जो ऐसे दौर से गुजरता है. उम्र के किसी भी पड़ाव पर प्रेम समाप्त नहीं होता. यदि ऐसा किसी के भी साथ होता है तो वह पाषण हृदय व्यक्ति ही होगा.


फिलहाल, आप लोग प्रेम-उपवन की इतनी सी संक्षिप्त सैर से संतुष्टि प्राप्त करिए क्योंकि विस्तार से सैर करवाने पर वह मात्र एक पोस्ट में समाहित न होने वाली. जैसा कि कुछ सच्ची कुछ झूठी में कहा था, यहाँ भी कह रहे हैं कि अपने प्रेम पर विस्तार से लिखा जायेगा, बहुत कुछ लिखा जायेगा, जो एहसास आज तक दिल के किसी कोने में कैद हैं उन सबको खुले आकाश में उन्मुक्त उड़ान के लिए स्वतंत्र किया जायेगा.


प्रेम की चर्चा होने पर हमारे मित्र विमल किसी विद्वान के वक्तव्य का जिक्र करना कभी नहीं भूलते कि प्रेम अग्नि के समान है उसका सदुपयोग हो तो वह पावक अग्नि के समान शुद्ध करता है, नहीं तो वह सामान्य अग्नि के समान जलाता है.


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वंदेमातरम्

08 जनवरी 2021

दिल से दिल के जुड़ाव में मनोभावों की पावनता

समय का गुजरना सिर्फ गुजरना ही नहीं होता है बल्कि उसके साथ बहुत कुछ भी गुजर जाता है. गुजरता हुआ समय अपने गुजरने का एहसास कराता हुआ बहुत खालीपन छोड़ जाता है. इस खालीपन के साथ बहुत सारी बातें याद रह जाती हैं और बहुत सी बातें हमेशा को जुड़ी रह जाती हैं. इस समय ने ही संबंधों, रिश्तों की परिभाषा को अलग-अलग स्वरूप, अलग-अलग आयाम दिए हैं. गुजरते समय में रिश्ते भी जुड़े होते हैं, सम्बन्ध भी जुड़े होते हैं, इन्सान भी जुड़े होते हैं. रिश्तों, संबंधों की भावात्मकता के चलते न जाने कितने लोग अपने बनते हैं और न जाने कितने लोगों से अपनापन बनता है. इस अपनेपन में दो दिलों के बीच, दो विचारों के बीच, दो भावनाओं के बीच की आपसी सामंजस्य क्षमता, आपसी समन्वय आदि का बहुत बड़ा योगदान रहता है. संबंधों का ये अपनापन समाज में स्नेह, प्रेम की आधारशिला होता है. आवश्यक नहीं कि इस स्नेह में, इन संबंधों में आपस में किसी तरह की स्वार्थी मानसिकता छिपी हो. दिल से दिल का तालमेल विशुद्ध रूप से मनोभावों की शुद्धता का परिणाम है. दो दिलों के बीच की आपसी ईमानदारी का प्रतिफल है.




दो लोगों के बीच की आपसी भावात्मक ईमानदारी के चलते संबंधों में, रिश्तों में प्रगाड़ता बढ़ती है. रक्त-सम्बन्धी न होने के बाद भी अनेक रिश्ते रक्त-संबंधों से ज्यादा सशक्त और विश्वासपरक सिद्ध होते हैं. देखा जाये तो यह एक तरह की आपसी बॉन्डिंग होती है जो बिना कुछ कहे, बिना कुछ करे दो लोगों में स्वतः ही एक-दूसरे के प्रति आकर्षण का भाव जगाती है. यही भाव दो लोगों को करीब लाता है, उनमें रिश्तों की, संबंधों की उष्णता का प्रवाह करता है. विशुद्ध ईमानदारी, विश्वास पर आधारित इस तरह के रिश्तों, संबंधों की पावन इमारत सदियों तक दिल को धड़काती है. गुजरते दिनों की स्मृतियों को जीवंत रखती है. समय गुजरता रहता है और अपनेपन की, अपनों की यही स्मृतियाँ, यही यादें उनको हमारे बीच सदैव जीवित रखती हैं. व्यक्ति सामने है या नहीं, इससे अधिक मायने रखता है कि व्यक्ति दिल में है या नहीं. दिल में किसी के बसे होने के कारण ही वर्षों बीत जाने के बाद भी उसे भुलाया नहीं जाता है.


संबंधों, रिश्तों की प्रगाड़ता दो दिलों को जोड़ती है, दो लोगों के बीच कहे-अनकहे संसार का विस्तार करती है. यही प्रगाड़ता यदि संबंधों का, प्रेम का विस्तार करती है, चेहरे पर हँसी का प्रादुर्भाव करती है तो यही प्रगाड़ता आँखों में नीर भी भरती है. न जाने किस तरह की भावनात्मकता का संसार चारों तरफ रचा-बसा होता है जहाँ हँसी-ख़ुशी के साथ आँसुओं का प्रवाह होता है, अपनों के खोने का भय होता है, सबकुछ उजड़ जाने का डर होता है. किसी का एक पल में मिलकर जीवन भर के लिए जुड़ जाना और किसी का जीवन भर साथ रहकर भी एक पल में जुदा हो जाना, आश्चर्यबोध जैसा कुछ प्रतीत करवाता है. न कहने के बाद भी सबकुछ समझने का भाव, सबकुछ समझते हुए भी कुछ न कहने का बोध, जैसे अलौकिक दुनिया का निर्माण करता है. काश! संबंधों, भावनाओं, रिश्तों, संवेदना की मासूम सी आधारभूमि पर आँसुओं की, जुदा होने की, सबकुछ छूट जाने की कष्टप्रद खरोंच न बनने पाती.


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वंदेमातरम्

04 दिसंबर 2020

प्रेम को बाँधने से प्यार-स्नेह नहीं नफरत-हिंसा ही फैलेगी

ओशो, ये नाम चर्चा में आते ही लोगों के मन-मष्तिष्क में दर्शन, प्रेम न उभरता है बल्कि उभरता है उन्मुक्तता का वातावरण, स्वतंत्र यौन सम्बन्धों पर ओशो की बेबाक राय. बिना ओशो को पढ़े, बिना उनके विचारों की जाने आज भी लाखों लोग ऐसे हैं जो उनके विरुद्ध अनर्गल बयानबाजी करने में लग जाते हैं. फिलहाल, आज हमारी पोस्ट ओशो पर नहीं, प्रेम पर है. ओशो को बहुत वर्षों से पढ़ रहे हैं और हमारा मानना है कि जो व्यक्ति लेखन से जुड़ा है, जो दर्शन को जानना चाहता है उसे ओशो को अवश्य पढ़ना चाहिए. इसके साथ-साथ हमारा ये भी मानना है कि जिनको प्रेम, प्यार, मुहब्बत जैसे शब्दों की गहराई को, इनकी पावनता को जानना-समझना है तो उनको भी ओशो के इन बिन्दुओं पर दिए गए विचारों को अवश्य पढ़ना चाहिए.




बहरहाल, सबके अपने-अपने शौक हैं, अपनी-अपनी पसंद है और उसके लिए किसी को जबरन मजबूर नहीं किया जा सकता है. पिछले दिनों ओशो के प्रेम सम्बन्धी विचारों को पढ़ रहे थे तो दिमाग में उथल-पुथल मची कि समाज में सबसे पवित्र शब्द के साथ कैसे खिलवाड़ किया गया है. प्रेम को संभवतः समाज का सबसे खतरनाक शब्द बना दिया गया है. विस्तृत और पावन अवधारणा से सुसज्जित शब्द को जबरदस्त तरीके से संकुचित कर दिया गया है. किसी भी चर्चा में, किसी भी बातचीत में प्रेम शब्द के आने पर उसको एक ही दिशा में केन्द्रित कर दिया जाता है. समाज के किसी भी वर्ग के बीच प्रेम का अर्थ दो विषमलिंगियों के मध्य के सम्बन्धों से लगाया जाता है. यही स्थिति समझाने के लिए है कि प्रेम को लेकर किस तरह की स्थिति बनती जा रही है समाज में.


दरअसल प्रेम बंधन का नाम नहीं, किसी रिश्ते का नाम नहीं, किसी सम्बन्ध का नाम नहीं. प्रेम तो विशुद्ध प्रेम है, एक अवधारणा है, खुद को मुक्त कर देने की अवस्था है. यदि प्रेम बंधन पैदा करे, व्यक्ति को कैद करे तो वह प्रेम नहीं आसक्ति है, लालसा है, तृष्णा है. प्रेम बाँधता नहीं है बल्कि स्वतंत्र उड़ान प्रदान करता है, स्फूर्ति पैदा करता है, विश्वास जगाता है. अभी भी प्रेम की इस अवधारणा को समझने वाले न के बराबर हैं. जब तक प्रेम को संकुचित समझा जाता रहेगा, जब तक प्रेम में बंधन जैसी स्थिति बनी रहेगी तब तक प्रेम को लेकर भ्रांति बनी ही रहेगी. यदि व्यक्तियों को प्रेम की पावनता का एहसास करना है तो उनको प्रेम की मुक्तता का, प्रेम की स्वतंत्रता का सम्मान करना होगा. प्रेम को बाँध कर समाज में प्रेम, स्नेह नहीं बल्कि नफरत, हिंसा ही फैलाई जा सकती है.


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वंदेमातरम्

06 सितंबर 2020

क्या वाकई हर किसी को नहीं मिलता यहाँ प्यार ज़िन्दगी में

‘हर किसी को नहीं मिलता यहाँ प्यार ज़िन्दगी में, खुशनसीब है वो जिसको है मिली ये बहार ज़िन्दगी में’ इस गीत की ये पंक्तियाँ बड़े ही दार्शनिक भाव से आये दिन किसी न किसी मंच से पढ़ने को मिलती हैं. इस दार्शनिक भाव के पीछे प्यार की परिभाषा को कितना संकुचित करके बताया जाता है, इस पर कभी किसी का ध्यान नहीं गया. इस बारे में शायद इन पंक्तियों का उदाहरण देने वालों ने भी विचार नहीं किया होगा और न ही उन लोगों ने विचार किया होगा जो इनके दार्शनिक भाव को बड़ी ही आत्मीयता से ग्रहण करने सहमति में अपनी गर्दन हिलाते दिखते हैं.


इन्हीं पंक्तियों को सुन-सुन कर दार्शनिक बने घुमते लोगों से एक ही सवाल कि उनके लिए प्यार का अर्थ क्या है? यह एक सवाल जब भी हमने इन पंक्तियों पर दार्शनिक बने लोगों से पूछा तो बजाय जवाब देने के वे लोग अगल-बगल ताकते नजर आये. कुछ ऐसा ही हाल उन लोगों का भी रहा जो इन पंक्तियों में बहुत बड़ा दर्शन छिपा देखते हैं. अब एक बार फिर उन पंक्तियों को पढ़िए और गौर करिए कि क्या वाकई प्यार ऐसी चीज है जो सबको नहीं मिलता? या विषमलिंगियों के बीच आपस में होने वाला प्यार सबको नहीं मिलता? दो व्यक्तियों के बीच (वो भी विषमलिंगी) के बीच पनपने वाले प्यार को प्यार की सम्पूर्णता पर लागू क्यों मान लिया जाता है? क्यों प्रेमी-प्रेमिका के बीच के प्यार की स्थिति को प्यार की व्यापक अवधारणा पर स्वीकार कर लिया जाता है?


इन पंक्तियों पर दार्शनिकता उड़ेलने वाले खुद अपने आपको देखें और बताएँ कि क्या वाकई प्यार उनको बिलकुल नहीं मिला? कहीं ऐसा तो नहीं कि प्यार की परिभाषा को बस लड़का-लड़की के बीच सीमित कर देने के कारण वे प्यार का सन्दर्भ ही भुला बैठे? इस तरह का तथाकथित दर्शन ओढ़े रहने वाले एक बार उन दिनों से अपने जीवन पर निगाह डालना शुरू कर दें, जबसे कि वे कहते हैं कि होश संभाला है, क्या वाकई उन्हें प्यार न मिला? क्या ऐसे लोगों के लिए माता-पिता, भाई-बहिन अथवा उनके परिजनों से मिलने वाले प्यार का कोई महत्त्व नहीं? क्या ऐसे लोगों के लिए उनके दोस्तों के प्यार का कोई अर्थ नहीं? क्या ऐसे लोगों के लिए उनके सहयोगियों, उनके शुभचिंतकों से मिलते प्यार के कोई मायने नहीं?

संभव है कि ऐसा ही हो तभी तो बावली सी सूरत के साथ ऐसी पंक्ति को अपने जीवन का दर्शन बनाये बैठे हैं, ये लोग. ऐसे किसी भी गीत की पंक्तियों को महज आनंद के लिए, संगीत प्रेम के सन्दर्भ में सुना जाना ही सुखद होता है. इन गीतों में अपना ही एक दर्शन छिपा है और उस दर्शन को किसी संकुचित सन्दर्भ में नहीं बल्कि व्यापक सन्दर्भ में देखे जाने की आवश्यकता है. यह विचारणीय यह है कि यदि कोई दर्शन किसी व्यापक अवधारणा को संकुचित करे तो वह दर्शन नहीं बल्कि क्षणिक मनोभाव है. यही मनोभाव सम्बंधित गीत के लिए भी है क्योंकि उसे सम्बंधित फिल्म के विशेष दृश्य, कहानी की माँग के रूप में लिखा, फिल्माया गया है न कि जीवन-दर्शन के लिए. जीवन का प्यार सम्बन्धी दर्शन इतना है कि प्यार एक व्यापक अवधारणा है जो सर्वत्र सुख का संचार करता है. प्यार स्व की भावना नहीं बल्कि पर की भावना से परिपूर्ण होता है. काश कि गीतों की पंक्तियों में भटकते लोग प्यार का वास्तविक अर्थ समझ पाते, समझने का प्रयास कर पाते.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

05 सितंबर 2020

सबसे बड़ा है प्यार, उसके बाद है संसार

सबसे बड़ा है प्यार,
उसके बाद सारा संसार. 

प्यार के प्रतीक माने जाने वाले राधा-कृष्ण को पूजने के बाद भी प्यार शब्द के साथ भ्रान्ति क्यों? प्यार के साथ संकुचन क्यों? प्यार के साथ एकतरफा व्यवहार क्यों?

क्या समझा है कभी कि प्यार है क्या? क्या जाना है कभी कि प्यार कहते किसे हैं? क्या प्यार का नाम स्त्री-पुरुष से जुड़ा हुआ ही है? क्यों प्यार का सन्दर्भ दो विषमलिंगियों के विवाह से लगाया जाता है?

काश कि समाज भी और प्यार करने वाले भी प्यार को समझ पाते. प्यार का उचित अर्थ जान पाते.


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

24 जुलाई 2020

पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले.....

एक बहुत पुराना मधुर गीत है, पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले, झूठा ही सही. इस गीत को जितनी बार सुनो, एक अलग तरह का सन्देश देता है. अब यह सन्देश सभी सुनने वालों के लिए एक जैसा होता होगा या नहीं, कहा नहीं जा सकता. इस गीत को दो तरह से समझने की आवश्यकता है. एक तरफ यदि इस गीत को देखा जा रहा है तो यह गीत विशुद्ध रूप से दो व्यक्तियों के बीच की आपसी स्थिति को दर्शाता है. इन दो लोगों में एक प्रेमी है, एक प्रेमिका है; एक स्त्री है, एक पुरुष है. देखने के सन्दर्भ में इस गीत के मायने प्रेमी-प्रेमिका के बीच की स्थिति से जुड़ते हैं. यही दृश्य समूचे गीत को प्रेमी-प्रेमिका वाले प्रेम के साथ संदर्भित भी करता है. देखा जाये तो यह गीत भी इसी तरह के दृश्य की पूर्ति करता हुआ आगे बढ़ता है.



इसके सापेक्ष यदि इस गीत की आरंभिक पंक्ति पर ध्यान दिया जाये तो यह गहन अर्थ का सन्दर्भ देती है. पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले, झूठा ही सही, यह पंक्ति महज प्रेमी-प्रेमिका के दृश्य को उद्घाटित नहीं करती है. यदि इस एक पंक्ति के सन्दर्भ निकाले जाएँ, भावार्थ निकाले जाएँ तो समझ आता है कि प्यार को पाने के लिए कोई व्यक्ति कितना लालायित है, भले ही वह झूठा प्यार ही क्यों न हो. आखिर लोगों के जीवन में प्यार की इतनी कमी कैसे हो गई है? या फिर प्यार का सन्दर्भ महज प्रेमी-प्रेमिका के प्यार से लगाया जाने लगा है? क्या व्यक्ति का एकाकी होना उसके प्यार में कमी का परिचायक बनता जा रहा है? क्या व्यक्ति का अकेलापन उसके भीतर प्यार की कमी का एहसास करवा रहा है?


देखा जाये तो लगता है कि इस कोरोना काल में ही नहीं वरन बहुत पहले से व्यक्ति खुद में निपट अकेलापन महसूस करता रहा है. इस अकेलेपन में उसे कोई ऐसा साथ चाहिए होता है जो उसकी भावनाओं को समझ सके, उसके साथ दो पल हँस कर बिता सके. यहाँ समर्पण, विश्वास, प्रेम की बहुत आवश्यकता होती है. जिस तरह का समाज, जिस तरह की दुनिया विगत वर्षों में हम बना चुके हैं उसे देखते हुए लगता है कि व्यक्ति अकेले रहने में बहुत स्वतंत्र है, खुश है मगर वास्तविकता इसके कहीं उलट है. जीवन के तमाम सुखद पलों के बीच भी एक पल ऐसा आता है जबकि प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी साथी की, किसी न किसी दोस्त की आवश्यकता महसूस होती है. इसी आवश्यकता के सन्दर्भ में इस गीत की पहली पंक्ति महत्त्वपूर्ण समझ आती है. कोई अकेला व्यक्ति कैसे किसी के प्यार को पाने की चाह रखता है, भले ही वह दो पल का हो, भले ही वह झूठा ही हो.

ये समय ऐसा है जबकि हम सभी निपट अपने में ही समय नहीं बिता रहे हैं या कहें कि बिता नहीं पा रहे हैं. ऐसे में हमें अपने आसपास के लोगों का, अपने साथियों का, अपने दोस्तों का भी ध्यान रखने की आवश्यकता है. उसे भी हमारे साथ की, हमारे प्यार की आवश्यकता है. उसकी यह आवश्यकता दो पल की न हो, झूठी न हो इसका हमें ध्यान रखना होगा. यदि इतना ध्यान हम सभी रख सके तो सभी एक-दूसरे का प्यार, साथ पा रहे होंगे, वो भी सच्चा वाला, सदा-सदा के लिए.


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15 जुलाई 2020

प्रेम का शबनमी एहसास

पता नहीं लोगों की निगाह में इसे प्रेम माना भी जाता है या नहीं पर हमारे लिए तो प्रेम ही था, आज भी है. उसको जब भी देखा तो ऐसा नहीं हुआ कि देखते ही रह गए हों. ऐसा भी नहीं हुआ कि किसी विशेष आकर्षण भाव से उसे पसंद किया हो. कॉलेज समय की बात थी, देखा और एक-दो मुलाकातों के बाद दोनों लोग अपनी-अपनी जगह, अपने-अपने काम में लग गए. चूँकि किसी तरह का ऐसा भाव भी नहीं जगा कि कहा जाये कि आपस में प्रेम हो गया है. उस एक छोटी सी मुलाकात के कई साल बाद मिलना हुआ. अबकी हम दोनों ही किशोरावस्था से एक कदम आगे निकल कर युवावस्था के साथ टहलकदमी कर रहे थे. अब हम दोनों की अपनी ही दुनिया थी. अपने-अपने सपने थे और उन सपनों की अपनी-अपनी दुनिया थी.



वास्तविक दुनिया के इस मिलन ने अबकी सपनों की दुनिया में दस्तक दी. दोनों की ऑंखें मिलीं और अबकी लगा कि पिछली बार की तरह सिर्फ परिचय नहीं है, सिर्फ आपसी मुलाकात नहीं है वरन इससे भी आगे जाकर कुछ और भी है. मिलना लगातार भले न होता हो पर लगभग नियमित होता था. मिलने पर खूब हँसी-मजाक, खूब इधर-उधर की बातें, उसके कॉलेज के किस्से, हमारे भविष्य की कहानियाँ. नज़रों और दिल की भाषा को समझ रहे थे मगर सब कुछ कहने, बोलने, बतियाने के बाद बस वही न कहा गया जो कहना बाकी रह गया था. बंधनों में हम दोनों ही जकड़े हुए थे. उसके सामने परिवार, संस्कारों का बंधन था और हमारे सामने पारिवारिकता की, सामाजिकता की मजबूरी थी. प्यार तो एहसासों की धरती पर पल्लवित हो सकता है जो उचित वातावरण न मिलने पर यथार्थ के धरातल पर सूख भी सकता है. आकर्षण का शबनमी एहसास वास्तविकता की धूप में मर जाता है.


बड़े सपनों को पूरा करने की चाह छोटी हकीकत को अपनाने को तैयार नहीं थी. अंततः समाज की बनी-बनाई परम्परा, परिपाटी पर प्यार पिछड़ गया. आँखों में तमाम अनकहे सवाल लिए एक-दूसरे को बस देखते ही रहे, सिर्फ देखते ही रहे. प्यार की सपनों भरी दुनिया से निकल कर जब वास्तविकता से परिचय किया तो दिलों के बीच दूरी भले ही न बढ़ी हो पर बीच में इतनी दूरी हो चुकी थी कि मिलने पर आँखों की शांत मुस्कराहट ही आपस में सारा हाले-दिल बयान करने लगती.

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10 जुलाई 2020

एक गलती की इतनी बड़ी सजा

किसी गलती की क्या सजा हो सकती है? ये गलती पर निर्भर करता है या सजा देने वाले की मानसिकता पर? अब सजा देने वाले के मन की कोई क्या जाने मगर जहाँ तक हमारी व्यक्तिगत राय है तो कोई भी सजा उसकी गलती के आधार पर ही निर्धारित होनी चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि सजा देने वाले की मानसिकता में परिवर्तन होते रह सकते हैं मगर गलती एक जैसी ही होगी, वह चाहे किसी भी जगह हो, किसी के साथ हो. गलती कई बार जानबूझ कर होती है, कई बार अनजाने में हो जाती है. इसके अलावा कई बार गलती करने के पीछे एक उद्देश्य होता है. यह उद्देश्य दो तरह से हो सकता है, एक सकारात्मक और एक नकारात्मक. अब आप कहेंगे कि गलती भी की जा रही और वह भी सकारात्मक. जी हाँ, ऐसा होता है.


सकारात्मक गलतियाँ हम सभी ने की होंगी, आज भी करते होंगे. याद करिए अपने बचपन को. याद आया कुछ, जब आप मित्र-मंडली किसी ऐसे काम को करके आते हैं कि जिस पर कुछ न कुछ सजा मिलनी निश्चित है तब उस समय उस गलती की जिम्मेवारी कोई ऐसा व्यक्ति अपने सिर ले लेता है जो कम से कम सजा का भागी बनेगा. एक घटना अपनी याद आती है, जबकि हम लोग स्कूल में से समोसे खाने के लिए अपने मित्र को बाहर निकालते थे. उस गलती कि क्लास छूट रहा, पकडे गए तो सजा उसी मित्र को मिलेगी, हम सभी मित्र करते थे. वह बालपन की अबोध गलती थी, पता नहीं आज इसे गलती कहा जायेगा या कि कुछ और. बहरहाल, उन दिनों की तरह दिल युवावस्था में भी अबोध बना रहा, गलतियाँ करता रहा.


बचपन की तमाम गलतियाँ भुला दी गईं, उनकी कहीं न कहीं माफ़ी भी मिल गई मगर एक गलती ऐसी हो गई जिसकी माफ़ी मिलती न दिख रही. वह गलती भी सकारात्मक विचार के कारण पैदा हुई. असल में स्वभावगत एक कमी हमारे अन्दर हमेशा से रही है कि दोस्ती में सबकुछ कुर्बान कर देने तक की मंशा रखते हैं. हमारे घरवालों को बहुत बार हमारे इस स्वभाव से बहुत ज्यादा परेशानी होती है. इसके बाद भी न घरवाले अपनी आदत से बाज़ आते हैं और न हम ही अपनी आदत छोड़ पाते हैं. इसी आदत के चलते दो दोस्तों या कहें दोस्तों से ज्यादा वाली स्थिति के बीच समन्वय बनाने बैठ गए. अब बैठे तो बस बैठे ही रह गए. इस समन्वय के बीच ऐसी ग़लतफ़हमी उपजी कि हम आज तक अपराधी बने सजा भुगत रहे हैं.

इस बारे में कहना कुछ नहीं क्योंकि हम मानते हैं कि गलती हमारी है. गलती ये कि दो लोगों के बीच में कभी नहीं आना चाहिए भले ही सबकी आपस में मित्रता है. गलती ये कि कभी भी संबंधों को बचाए रखने का प्रयास नहीं करना चाहिए भले ही सम्बन्ध आपस में ही क्यों न बिखरते हों. गलती ये भी कि कभी ये नहीं समझना चाहिए कि जो आपके करीब है वो आपकी बात को महत्त्व देगा. खुद को हमेशा सबसे अलग हाशिये पर समझना चाहिए और अपने आपको बचाने की कोशिश करनी चाहिए. फ़िलहाल तो सबक मिला है, इस घटना से. आगे अपने स्वभाव को देखते हैं कि नियंत्रण में आता है या नहीं.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

25 जून 2020

भावनात्मकता से जन्मी पावन अवधारणा है प्रेम

प्रेम, प्यार, मुहब्बत, इश्क ये शब्द आज के समय में गंभीरता से नहीं लिए जाते हैं. इनके पीछे कहीं व्यंग्य का भाव, कहीं उपेक्षा का भाव, कहीं अन्योक्ति का भाव छिपा दिखता है. इश्क की चर्चा होने से पहले ही सामने वाला अपने दिमाग में एक छवि उभर कर स्थायी भाव ग्रहण कर लेती है. इस स्थायी भाव में एक लड़का होता है और एक लड़की शामिल हो जाती है. इनके बीच के संबंधों की परिभाषा स्वतः गढ़ी जाने लगती है. इस परिभाषा में भले ही प्रेम शामिल होता ही है मगर इसके साथ ही प्रेम को लेकर बना हुआ नजरिया भी शामिल होता है. यह परिभाषा प्रेम के नाम पर कम बल्कि स्त्री-पुरुष के दैहिक संबंधों के नाम पर अधिक बनाई जाने लगती है. लोगों द्वारा ये मान लिया जाता है कि प्रेम करने वाले दो विषमलिंगियों के बीच शारीरिक सम्बन्ध बने ही बने होंगे. ये भी माना जाने लगता है कि वे दो प्रेम करने वाले आपस में शादी करेंगे ही. इस शादी करने वाले विचार के साथ प्रेम करने वालों के भी विचार अपना साम्य बिठाने लगते हैं. इसके साथ-साथ समाज में ये मान्यता बनी हुई है कि दो प्रेम करने वालों को आपस में शादी करनी ही चाहिए. प्रेम सम्बन्धी मान्यताओं, विचारों को लेकर लोगों में इतना भ्रम है कि आज भी प्रेम का वास्तविक स्वरूप सामने नहीं आ पाया है.


उक्त विचारों और ऐसे ही अनेक विचारों के सन्दर्भ में कई सवाल मन में हमेशा उठते रहे हैं. ये कहाँ लिखा है कि दो प्रेम करने वालों के बीच शारीरिक सम्बन्ध बने ही होंगे? ये कहाँ लिखा है कि दो प्रेम करने वालों को आपस में शादी करनी ही चाहिए? ये कहाँ की मान्यता है कि बिना शादी किये प्रेम सफल नहीं कहा जाता? ये किस विचारक ने कहा है कि प्रेम का अंतिम स्वरूप शादी ही है? यहाँ प्रेम सम्बन्धी पावन विषय पर बिना किसी पूर्वाग्रह के ध्यान रखना चाहिए कि यह वही समाज है जहाँ राधा-कृष्ण की पूजा की जाती है. यह वही समाज है जहाँ मीरा को स्त्री-सशक्तिकरण का मानक माना जाता है. क्या इन दोनों ने कृष्ण के साथ विवाह किया था? क्या इन दोनों ने कृष्ण के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाये थे? क्या दोनों का प्रेम असफल माना जायेगा? यदि दोनों का प्रेम असफल है तो आज भारतीय समाज दोनों की पूजा क्यों करता है? क्यों राधा-कृष्ण के चित्र अपने पूजागृह में लगाये होता है? क्यों नहीं राधा की जगह कृष्ण की पत्नी रुक्मिणी की तस्वीर लगाई गई होती है?


असल में प्रेम एक विशुद्ध पावन अवधारणा है जो दो चरों के बीच की भावनात्मक स्थिति से जन्मती है. इन दो चरों में दोनों सजीव हो सकते हैं, एक सजीव एक निर्जीव हो सकता है. यहाँ प्रेम करने वालो दो विषमलिंगी भी हो सकते हैं, दो समलिंगी भी हो सकते हैं. प्रेम करने वाले प्रेमी-प्रेमिका हो सकते हैं, अन्य दूसरे रिश्ते वाले भी हो सकते हैं. यहाँ प्रेम का वास्तविक स्वरूप समझने की जरूरत है. प्रेम कोई ऐसा स्त्रोत नहीं जो एक व्यक्ति से करने के बाद सूख जाता है. प्रेम कोई ऐसा धन नहीं जो एक पर खर्च कर दिया गया तो अन्य किसी के लिए शेष नहीं बचता है. प्रेम एक तरह की भावना है, एक तरह की संवेदना है जो एक या अनेक से हो सकती है. एकसाथ कई से हो सकती है. समान रूप से हो सकती है.

यहाँ ध्यान यह रखने की जरूरत होती है कि प्रेम संबंधों में सामने वाले के साथ किसी तरह का विश्वासघात न हो. इसके पीछे कारण यह कि प्रेम आपस में विश्वास की माँग करता है. किसी भी व्यक्ति का यह कहना कि एक बार प्रेम करने के बाद किसी दूसरे से कैसे प्रेम किया जा सकता है, सिद्ध करता है कि उसके दिल में प्रेम नहीं वरन एक व्यक्ति विशेष के प्रति आकर्षण का भाव बना रहा है. प्रेम का सम्बन्ध स्पष्ट रूप से सामने वाले के प्रति भावनात्मक, सकारात्मक भावना रखना है. ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई व्यक्ति एक व्यक्ति के प्रति भावनात्मक रूप से सकारात्मक रहे और अन्य व्यक्तियों के प्रति नकारात्मक हो जाये.

असल में प्रेम को लेकर एक ऐसी मानसिकता बनी रही है जो समय के साथ रूढ़ हो गई है. ऐसा माना जाने लगा है कि जिससे प्रेम किया जाये यदि उससे शादी नहीं होती है तो वह प्रेम असफल माना जायेगा. ये भी माना जाता है कि प्रेम करने वाले व्यक्ति से शादी न हो पाने पर किसी दूसरे व्यक्ति से प्रेम करना अपराध है. ऐसा भी माना जाता है कि इस जीवन में एक ही व्यक्ति से प्रेम किया जा सकता है, यदि एक से अधिक लोगों से प्रेम किया जाता है तो वह भी अपराध है. ये सारी स्थितियाँ समाज में प्रेम के विस्तार पर अंकुश लगाती हैं. प्रेम का सीधा सा सम्बन्ध दो आपसी लोगों में भावनात्मकता का विस्तार है. यहाँ यदि उनके मन में आपस में एक-दूसरे के लिए छल, विश्वासघात, धोखा नहीं है तो प्रेम का यही सफलतम रूप है. देखा जाये तो प्रेम किसी संकुचन का नहीं वरन विस्तार का नाम है. काश! इसे समझा जा सकता, प्रेम करने वालों द्वारा भी, प्रेम संबंधों का निर्धारण करने वालों द्वारा भी.

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25 मई 2020

प्रेम कहानियों पर इतना कौतूहल क्यों

लोगों की रुचि दूसरों की ज़िन्दगी में झाँकने की क्यों होती है? दूसरे की ज़िन्दगी में सुख है या दुःख इससे झाँकने वालों का कोई लेना-देना नहीं होता है, बस वे उसमें झाँकना चाहते हैं. इस ताका-झाँकी में यदि विषय प्रेम का, इश्क का हो तो फिर कहना ही क्या. इस विषय के आगे सभी विषयों को गौड़ कर दिया जाता है. किसी दूसरे के जीवन का कोई प्रेम-प्रसंग हाथ लग भर जाए फिर उसके आगे सारे प्रसंग बौने हो जाते हैं. किसी और के प्रेम-प्रसंगों के लिए, दूसरे की प्रेम-कहानियों को सुनने के लिए लोगों में बेताबी दिखाई देने लगती है. ऐसा किस मानसिकता के कारण होता है? ऐसा किस प्रवृत्ति के चलते लोग करते हैं? कई बार इस विषय पर अपने मित्रों से बातचीत करने की कोशिश की मगर कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आया.


अपने जीवन की कुछ घटनाओं को कुछ सच्ची कुछ झूठी के द्वारा सबके बीच लाने का एक प्रयास विगत वर्ष किया था. उसके लेखन का जब आरम्भ किया था तब बहुत से दोस्तों, परिचितों के कई सवालों का सामना करना पड़ा था जो प्रेम-कहानियों से संदर्भित थे. इसके पहले भी बहुत बार लोगों के सवालों, निगाहों का शिकार हुए ऐसे सवालों को लेकर. कई बार हमारे कहीं आने-जाने को लेकर, किसी से दोस्ती को लेकर, किसी से बातचीत को लेकर ऐसे सवालों से सामना करना पड़ा. ऐसे प्रसंगों पर कई बार बात बदलने की कोशिश भी की मगर दूसरी तरफ से घूम-फिर कर बात को प्रेम-प्रसंगों पर लाकर टिका दिया जाता. ऐसा लगता जैसे उस समय किसी भी अन्य विषय से अधिक महत्त्वपूर्ण विषय लोगों के लिए हमारी प्रेम-कहानी को जानना रहता है. आजतक यह हमारी समझ से बाहर है कि ऐसा आखिर क्यों होता है? क्या उसके पीछे अगले के मन में, अचेतन में छिपी प्रेम करने की भावना रहती है? क्या उसके मन में उसके प्रेम की स्थिति इस बहाने संतुष्टि का एहसास करती है? क्या इसी तरह से वह अपने प्रेम सम्बन्धी समय को पुनः जीना चाहता है?


अब एकबार फिर इसी तरह के सवालों से सामना करना पड़ रहा है. अपनी कुछ सच्छी कुछ झूठी के प्रकाशन पश्चात् एक नई पुस्तक के लेखन में जुट गए थे. पुस्तक प्रेम कहानियों को लेकर है. इसमें कहानियों को शामिल किया गया है. ज्यादातर कहानियाँ हमसे जुड़ी हुई हैं और सत्य हैं. हाँ, इसमें कल्पना का कुछ तड़का लगाते हुए इनको पठनीय बनाने का प्रयास किया है. इसके साथ-साथ प्रयास किया है कि दूसरे व्यक्ति की छवि, उसकी सामाजिकता, पारिवारिकता पर किसी तरह का प्रभाव न पड़े, न सकारात्मक और न ही नकारात्मक. इनमें से कुछ कहानियों को ब्लॉग पर प्रकाशित भी किया जा रहा है. इसके साथ-साथ उनको सोशल मीडिया पर भी शेयर किया जा रहा है. ऐसा किये जाने से इन कहानियों की पहुँच अधिकाधिक लोगों तक हो रही है. इसके चलते बहुत से परिचित लोगों के सवालों की बौछार होने लगी है. अभी तो बस इतना ही कहना है कि इनको बस कहानियाँ मानकर पढ़िए और यदि लगता है कि ये सच हैं तो उनको अपने दिल में बसाये रखिये.

प्रेम ही ऐसा विषय है जो कभी पुराना नहीं होता. कभी बासी नहीं होता. कभी विध्वंसक नहीं होता. प्रेम ही ऐसा विषय है जो व्यक्ति को व्यक्ति होना सिखाता है. इन्सान को इंसानियत सिखाता है. दुनिया को एक अलग दुनिया में ले जाता है. यदि अनुभव करना हो तो पहले-दूसरे प्रेम की बंधी-बँधाई सीमारेखा से बाहर निकल कर देखो. प्रेम की तरह उन्मुक्त हो उड़ कर देखो. निश्चित ही एक नई दुनिया का, सतरंगी दुनिया का अपने आसपास एहसास करोगे.

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20 जनवरी 2020

प्यार दैहिक अवधारणा नहीं है


प्यार, प्रेम, इश्क ऐसे शब्द हैं जिन पर कहीं न कहीं चर्चा देखने-सुनने को मिल जाती है. कोमल भावनाओं को अपने में समेटे इन शब्दों के साथ समाज बहुत ही कठोरता से अपना व्यवहार करता है. प्यार को लेकर आये दिन हमें स्वयं हमारे कुछ मित्रों की तरफ से अनेक सवालों से दो-चार होना पड़ता है. समझ नहीं आता है कि आखिर प्रेम को लेकर इतना संशय समाज में क्यों है? प्यार को लेकर लोगों में भ्रम की स्थिति क्यों बनी हुई है? समझने वाली बात है कि क्या किसी व्यक्ति को किसी एक व्यक्ति से प्रेम हो जाने के बाद किसी दूसरे से प्यार नहीं होता? क्या एक से अधिक लोगों से प्यार करना असामाजिक है? क्या प्यार की परिणति विवाह होना चाहिए? यदि विवाह न हो सके तो क्या रो-रोकर मर जाना चाहिए?


ऐसे विषय पर जो कहीं न कहीं संवेदनशील भी है, भावनात्मक भी है वहाँ हमारी सोच ये है कि प्रेम वो पवित्र अवधारणा है जो मन से संचालित होती है. प्यार का आधार किसी भी रूप में शारीरिकता नहीं होना चाहिए वरन उसका निर्माण आत्मा, भावना, पवित्रता की आधारभूमि पर होना चाहिए. ऐसा आज के समय में लोगों के लिए विश्वास करना भी कठिन है. जबकि असलियत यही है कि प्रेम यही है. जो विश्वास से उपजता है, उसमे किसी तरह के अविश्वास की कोई जगह ही नहीं. यदि प्रेम में अविश्वास किसी भी तरह से उपस्थित हुआ तो समझो कि वहाँ कभी प्रेम था ही नहीं. ऐसा किसी भी प्यार करने वाले, किसी भी प्रेम करने वाले के साथ है. प्यार के सम्बन्ध में कहा जाये तो हमारी नजर में प्रेम का उत्कर्ष वैवाहिक बंधन नहीं है वरन आपसी भावनाओं को समझने और महसूस करने की स्थिति है.

बहुतेरे लोगों के लिए आज भी प्रेम एक ऐसा विषय है जो एक व्यक्ति से शुरू होता है और उसी एक व्यक्ति पर समाप्त हो जाता है. प्रेम कि यह समाप्ति या तो मिलन पर होती है अथवा बिछड़ने पर. इसे किसी भी रूप में प्रेम का समग्र नहीं कहा जायेगा वरन यह तो प्रेम का एकाकी स्वरूप हुआ, जहाँ बस मैं ही मैं है. प्रेम कभी मैं की बात नहीं करता है. और यही कारण है कि प्रेम को किसी एक बिंदु पर नहीं बांधा जा सकता है? सोच कर देखे कोई भी कि ये कैसे संभव है कि किसी दिल से प्रेम की, प्यार की बारिश हो रही है तो वह बस एक को ही उससे लाभान्वित करे? आखिर कैसे संभव है कि प्रेम से ओतप्रोत दिल प्रेम की बारिश करे और एक के अलावा किसी अन्य को प्रेम-रस से सराबोर न करे? असल में समाज में बहुतेरे लोगों के लिए प्रेम पहली नजर से शुरू होकर देह के मिलन पर ठहर जाने की प्रक्रिया मात्र है. ऐसे लोगों के लिए प्रेम एकाकी भाव को उत्पन्न करता है. यहाँ समझना होगा कि प्रेम और विश्वास का अपना अंतर्संबंध है. प्रेम के साथ विश्वास का होना प्रेम की गंभीरता को, उसके एहसास को और विराट बना देता है. आखिर इसी देश में राधा-कृष्ण का मीरा-कृष्ण का प्रेम ऐसे ही पावन-पूज्य नहीं है.

आज प्रेम क्षणिक आवेग का नाम बनता जा रहा है. प्यार का अर्थ पहली नजर से लगाया जाने लगा है. प्यार को दैहिक आकर्षण के आसपास केन्द्रित कर दिया गया है. प्रेम की पावन-पूज्य अवधारणा के आधार पर हमारे समाज में उसे राधा-कृष्ण के रूप में पूजा भले जाए पर सहज रूप में स्वीकारा नहीं जाता है. यही विभेद ही प्रेम को, प्यार को सशंकित करता है, संकुचित करता है.