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16 जून 2025

भावनाओं से खिलवाड़

अहमदाबाद हवाई जहाज दुर्घटना के अंतिम कुछ सेकेण्ड के फोटो, वीडियो....

इस तरह की बहुत सी पोस्ट दिखाई देने लगी हैं. सोशल मीडिया में हवाई जहाज दुर्घटना के बाद से एकदम से फोटो और वीडियो की बाद सी आ गई. अपनी-अपनी पोस्ट पर लाइक, शेयर, कमेंट बटोरने के चक्कर में भावनात्मकता, संवेदना को दरकिनार करते हुए फोटो और वीडियो अपलोड करने में लगे हुए हैं. लाइक, शेयर, कमेंट करने वाले भी बिना सत्य जाने, बिना तथ्य जाने आँखें बंद किये उसी दिशा में बहे जा रहे हैं. अंतिम समय के फोटो में भी उन्हीं तीन मासूम बच्चों के फोटो सामने आ रहे हैं जो अपने माता-पिता के साथ लन्दन शिफ्ट होने के लिए जा रहे थे. निश्चित रूप से फोटो-वीडियो के द्वारा लोगों की भावनाओं से खेलने वाले जानते हैं कि किस फोटो से उनको ज्यादा से ज्यादा शेयर, लाइक मिलने वाले हैं.

 



यहाँ एक बात समझ नहीं आ रही कि ये सबकुछ ख़त्म होने के अंतिम कुछ सेकेण्ड पहले की फोटो, वीडियो किसने लिए? किसने सार्वजनिक किये?

 

क्या उन बच्चों के माता-पिता अपने पूरे परिवार की मौत को लेकर, हवाई जहाज की दुर्घटना को लेकर एक तरह से आश्वस्त हो चुके थे, तभी उन्होंने चिल्लाते-चीखते बच्चों को सँभालने की बजाय उनकी फोटो खींचकर अपने किसी परिचित को भेजे, अपने किसी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर अपलोड किये?

 

क्या जहाज के अन्दर कोई सीसी टीवी कैमरा टाइप कुछ रहता है जो किसी नेटवर्क के माध्यम से लगातार फोटो, वीडियो बनाता हुआ कहीं धरती पर बने सेंटर को भेजता रहता है?

 

क्या इसी जहाज में कोई ऐसा व्यक्ति था जो बिना डर, भय, बचने की कोशिश के फोटो, वीडियो खींच कर अपने किसी परिचित को लगातार भेजता रहा?

 

क्या दुर्घटना स्थल से किसी व्यक्ति का अथवा कई व्यक्तियों के मोबाइल इस हालत में मिले हैं, जिनसे ये फोटो, वीडियो निकाल कर सार्वजनिक किये जा रहे हैं?

 

सोशल मीडिया में तैर रहे तमाम एविएशन एक्सपर्ट इस बारे में भी अपनी विशेषज्ञतापूर्ण राय दें.


30 दिसंबर 2024

रामलला हम आ गए हैं, मंदिर वहीं बना गए हैं

रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होने के बाद से ही मन में अभिलाषा थी श्रीराम जन्मभूमि मंदिर जाने की, रामलला के दर्शन करने की. इसके पीछे किसी तरह के भक्तिभाव से ज्यादा अपनी संस्कृति, अपने संस्कारों, राष्ट्रीय भाव-बोध के संवाहक के दर्शन करने का भाव था. भीड़-भाड़ के दौरान उत्पन्न होने वाली अनेकानेक दिक्कतों से बचने के लिए ही प्राण प्रतिष्ठा वाले दिन अयोध्या जाने का कार्यक्रम नहीं बनाया था. बहरहाल, लगभग एक वर्ष की समयावधि में ही रामलला के दर्शन करने का अवसर स्वतः ही सामने आ गया. छोटे भाइयों की व्यापारिक-व्यावसायिक मीटिंग का केन्द्र अयोध्या होने पर उनके द्वारा साथ चलने का स्नेहिल प्रस्ताव सामने रखा गया, जिसे बिना एक पल की देरी किये हमने लपक लिया. वर्ष 2024 के निपट अंतिम दिनों में बिना किसी पूर्व-योजना के अयोध्या धाम पहुँचना हो गया.

 





29 दिसम्बर की शाम को अयोध्या धाम में प्रवेश करने के बाद छोटे भाई तो अपनी व्यावसायिक मीटिंग के लिए निकल गए, हम चल दिए रामलला के दर्शन की इच्छा लिए, श्रीराम जन्मभूमि मंदिर देखने की इच्छा में. समय का तारतम्य कुछ ऐसा रहा कि रामलला के दर्शन तो आज नहीं हो सके मगर वहाँ से सम्बंधित तमाम सारी जानकारियाँ एकत्र कर ली गईं, ताकि अगली सुबह पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार यहाँ आने पर किसी तरह की दिक्कत न हो. रात को नौ बजे के बाद भी हजारों की संख्या में श्रद्धालु, दर्शनार्थी मंदिर परिसर में नजर आ रहे थे. अगले दिन सुबह-सुबह श्रीराम जन्मभूमि मंदिर प्रांगण में रामलला के दर्शन हेतु पहुँचना हो गया. आरम्भिक औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद हम लोगों के कदम आगे की तरफ चल पड़े.

 

श्रीराम जन्मभूमि प्रांगण में आने के बाद कदम-कदम पर न चाहते हुए भी आँखें सजल हो उठतीं. हर कदम पर याद आता वो दौर जब कारसेवकों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी. कैसे तुष्टिकरण की राजनीति ने अनेकानेक कारसेवकों को मौत की नींद सुला दिया था. मंदिर की तरफ़ बढ़ता हर कदम याद दिलाता कि किस तरह के कष्ट-अपमान सहने के बाद ये गर्व का क्षण देखने को मिला है. श्रीराम मंदिर विरोधी बात-बात पर बाबरी ढाँचे के ध्वंस को महज राजनीति बताते और कटाक्ष करते. ऐसे ही दौर में जबकि रामलला को एक टेंट की छाया उपलब्ध कराई जा रही थी, श्रीराम मंदिर के, रामलला के दर्शन हेतु अयोध्या जाना हुआ था. तत्कालीन प्रदेश सरकार की व्यवस्था इस तरह से थी जैसे रामलला के दर्शन के स्थान पर कोई अपराध करने आ गए हों. सुरक्षा व्यवस्था में लगे पुलिसकर्मियों का व्यवहार, उनकी बातचीत, भाषा-शैली को कोई भी सामान्य व्यक्ति सुनना पसंद नहीं करेगा. उनके अन्दर ऐसा भाव था ही नहीं कि उनके सामने खड़ा व्यक्ति, रामलला के दर्शन करने को आया श्रद्धालु किसी भी तरह की सामान्य जानकारी ही माँग रहा है, न कि किसी तरह का अपराध कर रहा है.

 





सुरक्षा व्यवस्था में लगे पुलिस कर्मियों की अतिवादिता, अहंकार, अभद्र कार्य-शैली के चलते किसी दिन उस तंग गली के भीतर से टेंट में विराजमान रामलला के दर्शन हेतु पहुँचने को नकार दिया था. उन पुलिस कर्मियों के कथित अहंकार के ऊपर श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का गर्वीला भाव प्रचंड रूप में हावी था. उनके व्यवहार, भाषा-शैली के बाद वहीं तुरंत ही उनके अधिकारियों के समक्ष एक जिद को पकड़ लिया. उनसे स्पष्ट भाषा में कहा कि अब उसी दिन रामलला के दर्शन करने आयेंगे जबकि हम हैलीकॉप्टर से उतरेंगे और आप लोग हमारी सुरक्षा व्यवस्था में होंगे या फिर उस दिन आयेंगे जब श्रीराम जन्मभूमि मंदिर बन जायेगा. उस दिन अपनी जिद में रामलला के दर्शन किये बिना वापस लौट आए थे मगर मन में एक विश्वास था कि किसी न किसी दिन हम मंदिर के भीतर पहुँचकर रामलला के दर्शन करेंगे. उन तंग, सँकरी गलियों के स्थान पर चौड़ी, चमचमाती सड़कें हजारों-हजार श्रद्धालुओं को सहज भाव से आगे चलते रहने का स्थान उपलब्ध करवा रही थीं. किसी दिन पूरे अहंकारी भाव में तैनात खाकी सेना अब पूरे आदर-भाव के साथ एक-एक जानकारी देने को तत्पर थी. बात-बात पर सर-सर की अनुगूँज, हँसते-मुस्कुराते हुए हजारों की भीड़ को आगे का रास्ता बनाती सुरक्षा व्यवस्था से लग रहा था कि आज हिन्दू वास्तविक रूप में अपनी संस्कृति के प्रांगण में है.

 

उस सुसज्जित, भव्य प्रांगण में खड़े होकर स्मरण हो आया वो दौर जब छात्र-जीवन में कंठ से स्वर गूँजता था

रामलला हम आयेंगे, मंदिर वहीं बनायेंगे”

बच्चा बच्चा राम का, जन्मभूमि के काम का”


उस समय में जबकि रामलला के दर्शन करने के बाद सुरक्षा व्यवस्था की औपचारिता से बाहर निकले तो खुद को उसी प्रांगण के साथ समाविष्ट करने का भाव जागा. मोबाइल, कैमरे के द्वारा पावन परिसर को सदैव के लिए सुरक्षित कर लेने का भाव जागा. ऐसी स्थिति में भाव-व्हिवल मन-संवेदन, आँखों की नमी और कैमरे में सामंजस्य बिठाना कठिन हो रहा था. दोनों का समन्वय न बन पाने से ज़्यादा मुश्किल हो रहा था ख़ुद का उस पावन भूमि के साथ तादाम्य स्थापित कर पाना. बहरहाल, “तारीख़ नहीं बतायेंगे” जैसी कटुक्ति सुनने के दौर को सहने के बाद अब स्वतः ही “रामलला हम आ गए हैं, मंदिर वहीं बना गए हैं” की गर्वोक्ति निकलनी स्वाभाविक थी और हजारों की भीड़ के बीच स्वतः प्रस्फुटित हुई भी.

 

जय श्रीराम

 


12 अगस्त 2024

आक्रामकता और यंत्रणा से जूझते खिलाड़ी

लगभग तीन सप्ताह तक चला पेरिस ओलम्पिक बहुत सारे खिलाड़ियों के लिए खुशियों की बारिश लाया तो बहुत से खिलाड़ियों के लिए निराशा का पल. भारतीय खिलाड़ियों के सन्दर्भ में सभी की अपनी-अपनी दृष्टि है, अपना-अपना नजरिया है. 117 खिलाड़ियों और 140 अधिकारियों-सहायकों की टीम की कुल सफलता मात्र छह पदक प्राप्त करना ही रही. अनेक भारतीय खिलाड़ी पदक की दौड़ में बहुत जल्दी बाहर हो गए, कुछ खिलाड़ी अपना बेहतर प्रदर्शन करते हुए पदकों की दौड़ में भले बने रहे मगर अंतिम रूप से पदक प्राप्त नहीं कर सके.

 

निस्संदेह ओलम्पिक जैसा खेल आयोजन जबरदस्त प्रतिस्पर्धात्मक होने के साथ-साथ मानसिक और शारीरिक दबाव पैदा करने वाला होता है. किसी भी स्पर्धा के अंतिम-अंतिम क्षणों तक खिलाड़ी को अपनी ऊर्जा, अपनी शक्ति, अपना विश्वास बनाये-बचाए रखना ही उसे विजयी बनाता है. देखा जाये तो अब ओलम्पिक ही नहीं किसी भी खेल आयोजन में किसी भी खिलाड़ी के लिए ऊर्जा, विश्वास, संयम बनाये रखना एक चुनौती है. जिस तरह से पढ़ते-सुनते आये हैं कि खेल आपस में समन्वय बढ़ाते हैं, एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को जन्म देते हैं, सहयोगी भावना का विकास करते हैं वैसा अब बहुत कम या कहें कि न के बराबर देखने को मिलता है. अब खिलाड़ियों में आपस में सहयोग, समन्वय, मैत्री-भाव से ज्यादा शत्रुता, कटुता का भाव देखने को मिलता है. उनके अन्दर विजयी होने की मानसिकता इस कदर हावी है कि वे साथी प्रतिद्वन्द्वी खिलाड़ी का अहित करने से भी नहीं चूकते हैं. इसी पेरिस ओलम्पिक में भारतीय महिला पहलवान निशा दहिया को मैच के दौरान लगी चोट इसी नकारात्मक प्रतिद्वंद्विता का उदाहरण है. कुश्ती, मुक्केबाजी सहित अनेक खेलों में खिलाड़ियों के बीच अब स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की जगह आक्रामकता, वैमनष्यता नजर आने लगी है.

 



खेलों में विजयी होने की भावना उचित है मगर विजयी होने के लिए, पदक, ट्रॉफी, सम्मान आदि पाने की चाहत में नकारात्मक प्रतिस्पर्धा ने खेल भावना को ठेस पहुँचाई है. सिर्फ और सिर्फ जीतने की भावना ने खिलाड़ियों को भी यातना, यंत्रणा के दौर से गुजरने को मजबूर किया है. विभिन्न खेलों के कोच द्वारा, ट्रेनर द्वारा अपने खिलाड़ियों को कठिन से कठिनतम अभ्यास करवाए जाने की खबरें समय-समय पर देखने-सुनने को मितली रही हैं मगर इस ओलम्पिक में खिलाड़ियों की शारीरिक, मानसिक यंत्रणा का उदाहरण देखने को मिला. कुश्ती प्रतिस्पर्धा में भारत की महिला पहलवान विनेश फोगाट को फाइनल में सौ ग्राम वजन अधिक होने के कारण अयोग्य घोषित कर दिया गया. दो किलो वजन को कम करने के लिए फोगाट रात भर जागकर कसरत करती रहीं, यहाँ तक कि उन्होंने अपना खून भी निकलवाया. यह किसी खिलाड़ी द्वारा अथवा उसके कोच द्वारा एक तरह की यातना है. सेमीफाइनल जीतने के बाद फोगाट ने न कुछ खाया और न ही पानी पिया. रात भर कसरत करने, कुछ न खाने-पीने, खून निकलवाने का दुष्परिणाम यह हुआ कि फोगाट को निर्जलीकरण की स्थिति में अस्पताल में भर्ती करवाया गया.

 

ये दो उदाहरण उस मानसिकता की बानगी भर हैं, जिसमें कोई खिलाड़ी सिर्फ और सिर्फ जीतना चाहता है. वह अपने विरोधी खिलाड़ी को चोट पहुँचाकर जीत रहा है अथवा खुद को शारीरिक-मानसिक कष्ट देकर, इसका उसके लिए कोई अर्थ नहीं. सोचने वाली बात है कि नेहा दहिया को इस तरह की चोट लग जाती कि उनका हाथ, कंधा सदैव के लिए काम करना बंद कर देता तो क्या इसे विरोधी खिलाड़ी की खेल भावना, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा कहा जाता? क्या पदक वाकई इतना महत्त्वपूर्ण था कि उसके लिए विनेश फोगाट ने खुद को जोखिमपूर्ण स्थिति में डाला? जीतने के प्रति, पदक के प्रति, सम्मान के प्रति एक तरह की जिजीविषा अवश्य होनी चाहिए मगर उसके लिए आक्रामकता, हिंसात्मक रवैया, बैर-भाव जैसी मानसिकता अपनाने की आवश्यकता नहीं. खेलों के द्वारा स्वस्थ समाज बनाने की परिकल्पना रखने के बाद भी खेलों को, खिलाड़ियों की आपसी स्पर्धा को इस तरह से प्रस्तुत किया जाता है जैसे वे किसी रण में जा रहे हों. ‘महासंग्राम’, ‘क्रिकेट का विश्वयुद्ध’, ‘खिलाड़ियों के बीच जंग’ आदि शब्दावली का उपयोग किया जाना ऐसा लगता है जैसे दो देशों अथवा दो खिलाड़ियों के बीच खेल नहीं बल्कि युद्ध चल रहा हो.

 

खेल में आक्रामकता किसी भी शारीरिक, मौखिक व्यवहार से जुड़ी होती है, जिसका मुख्य उद्देश्य विरोधी को चोट पहुँचाकर विजय प्राप्त करना होता है. आक्रामकता यदि स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के चलते हो तो उससे खिलाड़ी को, खेल भावना को ठेस नहीं पहुँचती है मगर जब यह नकारात्मक रूप में अपनाई जाती है तो इसके नुकसान खेल और खिलाड़ी ही उठाते हैं. आज आवश्यकता इसकी है कि कोच, अधिकारी और खिलाड़ी निष्पक्ष खेल भावना को बढ़ावा दें, खेल के नियमों का सम्मान करें, विरोधी खिलाड़ी के प्रति सद्भाव बनाये रखें. यदि इस तरह का अनुशासन खिलाड़ियों द्वारा नहीं अपनाया जाता है तो निश्चित ही खेलों, खेल भावना को ही क्षति पहुँचेगी और इसका खामियाजा खिलाड़ियों को ही उठाना पड़ेगा.

  


28 जुलाई 2024

निशानेबाजी में पदक और हमारी ख़ुशी

कई बार कुछ खुशियाँ ऐसी होती हैं जो व्यक्तिगत रूप से खुद अपने से सम्बन्धित नहीं होती हैं मगर इसके बावजूद वे खुशियाँ अपने से जोड़ती हैं, प्रभावित करती हैं. इस तरह की खुशियों में एक तरह का अनदेखा सा बंधन होता है जो किसी न किसी रूप में बंधा तो होता है मगर सामाजिक रूप में नजर नहीं आता है. इस तरह के बंधन बहुत ही आंतरिक, अत्यंत ही आत्मीय होते हैं. इनमें भले ही सामने वाले से कोई रिश्ता न हो, भले ही उससे कोई सम्बन्ध न हो मगर कुछ ऐसा होता है जो प्रभावित करता है और उसकी खुशियों से खुद को जोड़ता है.

 



कुछ इसी तरह की ख़ुशी आज मिली जबकि खबर मिली कि पेरिस ओलम्पिक 2024 में भारत को अपना पहला पदक निशानेबाजी में मिला. यह पदक कांस्य के रूप में आया जिसे मनु भाकर ने दस मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में प्राप्त किया. यहाँ विशेष बात ये है कि ओलम्पिक के इतिहास में निशानेबाजी में किसी महिला द्वारा हासिल किया गया यह पहला पदक है.

 

इस जीत से ख़ुशी मिलना स्वाभाविक ही है क्योंकि ओलम्पिक के दूसरे ही दिन देश के नाम पहला पदक आया. हम लोग उस पीढ़ी से आते हैं, जिसने ओलम्पिक में अपने देश के खिलाड़ियों को बस खेलते ही देखा है. पदकों का सूखा ख़त्म होने के लिए वर्षों तक इंतजार करना पड़ा था. इस कारण से ख़ुशी मिलने के अलावा इसलिए भी इस पदक से ख़ुशी मिली क्योंकि पाँच वर्ष पूर्व 2019 में हमने भी निशानेबाजी में प्रदेश स्तर की प्रतियोगिता में रजत पदक प्राप्त करते हुए राष्ट्रीय स्पर्धा के लिए जगह बनाई थी. संयोग से यह स्पर्धा भी दस मीटर एयर राइफल की थी.

 

बहरहाल, कतिपय पारिवारिक कारणों से, कोरोना के कारण उसके बाद आगे आना नहीं हो सका किन्तु भारतीय निशानेबाजों की छोटी से छोटी जीत भी हमें व्यक्तिगत रूप से प्रभावित करती है, ख़ुशी देती है. मनु को बधाई, शुभकामनायें; साथ ही सभी भारतीय खिलाड़ियों को भी शुभकामनाएँ कि देश को रोज ही कई-कई पदक प्रदान करवाते रहें.


16 नवंबर 2022

एहसासों का दरिया....

भावनाओं का अतिरेक

उमड़ते देखा,

एहसासों का दरिया

इस आँख से उस आँख तक

मचलते देखा,

नजरें चुरा कर

आँखों की बारिश

थामने की कोशिश,

शब्द-शब्द पर लबों को

लरजते देखा।


उक्त पंक्तियाँ पोस्ट के लेखक की ही हैं. कई बार कुछ पंक्तियाँ ही समूची मनोदशा की परिचायक होती हैं. इन पंक्तियों में भी कुछ ऐसा ही है. भावनाओं, एहसासों, संबंधों आदि महज शब्द नहीं होते हैं, यदि इनको माना जाये, इनकी गहराई को समझा जाये तो ये बहुत अधिक आत्मीय और संवेदना से भरे शब्द होते हैं. दो-चार वर्णों से बने इन शब्दों में किसी भी व्यक्ति को बाँधे रखने की शक्ति होती है. कितना भी कठोर दिल इन्सान हो उसकी आँखों को नम कर देने की क्षमता भी इन शब्दों में होती है.


आज के दौर में जहाँ बहुतायत सम्बन्ध, रिश्ते स्वार्थपूर्ति के लिए बनाये जाने लगे हैं वैसे में भावनात्मकता से भरे संबंधों का अपना ही महत्त्व है. इस महत्ता को, इन संबंधों को वही समझ सकता है जो इनको उसी गंभीरता से निभाता हो. इस स्थिति से दो-चार होने पर एहसास हुआ कि कई बार शब्द कम पड़ जाते हैं, अपनी बात कहने के लिए. बात को कहने से ज्यादा शब्दों को रोकने की कोशिश करनी पड़ती है. शब्दों से ज्यादा आँखों की नमी सबकुछ कह देने को व्याकुल सी दिखती है. खुद को कमजोर न पड़ने देने के साथ-साथ सामने वाले को भी कमजोर न होने देने का प्रयास करना पड़ता है. समझ नहीं आता है कि शब्दों को प्रकट कर देना ज्यादा महत्त्वपूर्ण है या फिर उनको रोके रखना? आँखों की नमी को छिपाना ज्यादा मुश्किल है या फिर नजरों का न मिलाना?


बहरहाल, ये हमारा व्यक्तिगत अनुभव रहा है कि बहुत से क्षणों में बात को न कहना, आँखों की नमी का छलकना, नज़रों का सामने वाले की नजर से बचाना ही सबकुछ कह देता है. इस सबकुछ कहे जाने को समझना ही महत्त्वपूर्ण है. 




09 जनवरी 2021

कर लीजिये प्रेम-उपवन की सैर हमारे साथ - दो हजारवीं पोस्ट

यह इस ब्लॉग की दो हजारवीं पोस्ट है. मई 2008 में ब्लॉग बनाने के बाद से लगातार लिखना हो रहा है. कभी रोज लिखा गया, एक दिन में दो-तीन पोस्ट लिखी गईं तो कभी दो-तीन दिन का अन्तराल होता रहा मगर ब्लॉग पर लिखना बंद नहीं हुआ. पिछले दो-तीन दिनों से इस दो हजारवीं पोस्ट के विषय के बारे में विचार चल रहा था. कुछ अलग सा लिखना चाह रहे थे मगर समझ नहीं पा रहे थे कि क्या लिखा जाए. इस बारे में मित्रों से भी चर्चा हुई, सोशल मीडिया पर भी शुभेच्छुओं के बीच बात रखी. बहुत से सुझाव मिले और आश्चर्य की बात देखिए कि बहुतायत में लोगों ने प्रेम सम्बन्धी विषय पर लिखने की राय दी.


वैसे हमने सोचा तो ये था कि इस पोस्ट में अपनी जीवन-यात्रा को संक्षिप्त रूप में लिखा जाये मगर इस बारे में खुद में ही निश्चितता नहीं बन पा रही थी. जैसे-जैसे मित्रों के सुझाव मिलते रहे वैसे-वैसे लगा कि प्रेम ही एक ऐसा विषय है जो कभी भी पुराना नहीं होता, कभी भी किसी को बोर नहीं करता, तो इसी पर लिखा जाये. वैसे भी हम सभी की आदत होती है दूसरों की प्रेमकथा के बारे में जानने की, दूसरों की प्रेम-कहानियाँ सुनने-सुनाने की, प्रेमी-प्रेमिकाओं के बारे में चर्चा करने की. इस बारे में हमने आत्मकथा कुछ सच्ची कुछ झूठी में लिखा भी है. आज की इस दो हजारवीं पोस्ट के विषय से सम्बंधित मित्रों की राय के बाद प्रेम सम्बन्धी विषय पर लिखने का मन बना लिया. इसमें भी आधार हमने खुद को बनाया है. ऐसा करने के पीछे कारण हमारी कुछ सच्ची कुछ झूठी ही है. बहुत से मित्र, पाठक उसमें हमारी प्रेम-कहानी न पाकर उदास हो गए थे.  उन्होंने इस पर अपना दुःख व्यक्त किया था, हमसे अपनी नाराजी प्रकट की थी, इस दो हजारवीं पोस्ट में अपनी ही प्रेमकथा लिख देने या कहें कि उसका आरम्भ कर देने से उन सभी मित्रों, पाठकों की नाराजगी भी दूर होगी और हमें भी किसी न किसी रूप में कुछ सच्ची कुछ झूठी में रह गई कमी को कुछ हद तक पूरा करने का अवसर मिलेगा.



चलिए फिर, आपको सैर करवाते हैं अपनी प्रेम-कहानियों के उपवन में. आश्चर्य न करिए. प्रकृति ने, इंसान की रचना करने वाले सृष्टि निर्माता ने हमारी प्रकृति ही ऐसी बनाई कि मन-दिल हमेशा युवा बना रहा, उसमें प्रेम की लहरें हमेशा उमड़ती-घुमड़ती रहीं. ईश्वर की इस कृति की प्रेमपरक प्रकृति को माता-पिता द्वारा दिए गए नाम ने भी चिरयुवा बनाये रखा. कुमारेन्द्र का सामान्य सा अर्थ भी इसी सन्दर्भ में लगाया जा सकता है. 


हमारे इस प्रेम-उपवन में सैर करते समय प्रेम की ये बगिया आप सभी को हमारी नजर से देखनी होगी. ऐसा इसलिए क्योंकि प्रेम इतना व्यापक फलक वाला गुलशन है जिसे प्रत्येक व्यक्ति अपनी निगाह से देखता है. व्यापक परिदृश्य को अनेकानेक निगाहों से देखने के कारण प्रेम के सन्दर्भ बदल सकते हैं, उसके मानक परिवर्तित हो सकते हैं. ऐसे में हमारे प्रेम-उपवन के भी अनेकानेक निहितार्थ निकाले जा सकते हैं, अनेकानेक सन्दर्भ स्थापित किये जा सकते हैं. ऐसा होने से आप हमारी प्रेम-कहानियों की उस भावबोध को महसूस नहीं कर सकेंगे जिस भावभूमि पर खड़े होकर हमने अपने प्रेम को जिया है, उसको ज़िन्दगी भर के लिए अंतस की गहराइयों में आत्मसात किया है.


आप सभी लोग प्रेम शब्द की पावनता से खुद को जोड़कर धीरे-धीरे आगे बढ़ते रहिए. प्रेम की भावनाओं के नामकरण से बचिए क्योंकि प्रेम बहुत संवेदनशील विषय होता है और यहाँ किसी भी तरह का नामकरण करने पर वह अति-संवेदनशील की श्रेणी में शामिल हो जाता है. इसके बाद स्थिति तनावपूर्ण किन्तु नियंत्रण में है के परम वाक्य से बाहर की हो जाती है.


इसे पढ़कर शायद उन सभी लोगों को बुरा लगे जो प्रेम को अत्यंत संकुचित रूप में देखते-समझते हैं. ऐसे लोगों के लिए प्रेम का मतलब सिर्फ और सिर्फ एक से प्रेम करने से होता है. ऐसा लगता है जैसे प्रेम कोई कोटा सिस्टम हो, एक व्यक्ति से प्रेम हो गया, उसके बाद कोटा ख़तम. प्रेम दिल की पवित्र भावना है जो पल-पल पल्लवित, पुष्पित होती है, सुरभित होती है. हमें तो आज तक प्रेम होता है. आज भी प्रेम होता है. बचपन में भी हुआ, किशोरावस्था में भी हुआ, युवावस्था में भी हुआ. क्या आपको नहीं हुआ? क्या आपको आज प्रेम नहीं होता?


खैर जाने दीजिये, आइये प्रेम-उपवन के उस हिस्से में चलते हैं जो हमारे बचपन से जुड़ा हुआ है. उम्र का वो पड़ाव जब प्रेम के सन्दर्भ, प्रसंग भी ज्ञात नहीं थे मगर उससे प्यार हुआ था. तमाम सारे दोस्तों के बीच वही एक लड़की सबसे ख़ास लगती. उसका ख़ास लगना ही प्रेम है, यह तो तब पता चला जबकि प्रेम का एहसास कर पाने की समझ विकसित हुई. आज जब पीछे पलट कर उस प्रेम की अनुभूति करते हैं तो आज भी वह वैसा ही मासूम दिखाई देता है, तितलियों सा रंगीन, पंछियों सा चंचल. उन दिनों में अख़बारों, पत्रिकाओं से काटे गए चित्रों के आदान-प्रदान करने की स्मृतियाँ आज भी दिल को गुदगुदा देती हैं. बचपन का दौर जिस तरह से मासूमियत के साथ कभी लौटकर न आने को विदा हो जाता है, वह ख़ास लगने वाली शख्सियत भी कभी न मिलने को दूर हो गई. बचपन की वो मासूम कहानी बिना कुछ कहे चलती रही थी, बिना कुछ कहे ही समाप्त हो गई.




समय भागता रहता है, उम्र बढ़ती रहती है, ज़िन्दगी के अनुभव परिपक्वता बढ़ाते रहते हैं. जीवन वास्तविकता के धरातल पर आ चुका था. प्रेम-कहानी को या कहानियों को रचने, गढ़ने से ज्यादा ध्यान खुद को गढ़ने पर, कैरियर बनाने पर दिया जाने का भाव आ गया था. यह भाव हम तो समझ रहे थे मगर दिल नहीं समझ रहा था. वह तो बस प्रेम करते रहना चाह रहा था, सो दिल ने प्रेम किया. पूरी गरिमा के साथ, पूरी पावनता के साथ, पूरी ईमानदारी के साथ किया.


इस अवधि में कहने-बताने लायक बहुत कुछ है. उन दिनों बहुत कुछ घटित हुआ, अच्छा भी, बुरा भी. हँसी भी साथ रही तो आँसुओं ने भी साथ न छोड़ा. बहुत कुछ ऐसा रहा जो साथ-साथ चलता रहा, साथी जैसा लगा इसके बाद भी किसी को अपना न कह सके. दिल, दिमाग, मन आदि सब किसी न किसी द्वंद्व में फँसे समझ आते. आगे बढ़ते कदम बढ़ते-बढ़ते रुक जाते. हाथों को थामने की कोशिश में खुद अपनी ही हथेलियों को बाँध लिया जाता. जो अपना न था, वो अपना न बना. बात जहाँ थी, वहाँ से आगे का सफ़र पूरा करते हुए वापस उसी जगह आकर रुक गई, जहाँ से शुरू हुई थी.  


भावनाओं के धरातल पर खड़े होकर अपने प्रेम का एहसास करते हैं तो सफल-असफल की संकुचित सोच से बहुत आगे का महसूस करते हैं. प्रेम को उथलेपन से ऊपर उठकर महसूस करने का भाव जागृत करके ही प्रेम को चिरस्थायी बनाया जा सकता है. यह कोई ओस की बूँद नहीं जो पल भर बाद मिट जाये. इस भाव को समझने के बाद ही प्रेम का वास्तविक अनुभव प्राप्त किया जा सकता है. इस भाव ने उन दिनों के प्रेम की छवि को धूमिल न होने दिया, उस प्रेम को तन्हा न होने दिया.


उम्र के इस दौर में जबकि जीवन का अर्धशतक अगले किसी मोड़ पर आपका इंतजार कर रहा हो तब प्रेम गंभीरता के भावबोध से भरा होता है. उसमें लड़कपन जैसी उड़ान नहीं होती, लहरों की तरह उछलना-कूदना नहीं होता वरन धीर-गंभीर रूप में वह पावनता का स्वरूप निर्मित करता है. आज इस पड़ाव पर यह कहना कि हमें किसी से प्रेम नहीं है या किसी से प्रेम नहीं होता और किसी से नहीं बल्कि खुद से झूठ बोलना होगा. ऐसा हर वो व्यक्ति कर रहा है जो ऐसे दौर से गुजरता है. उम्र के किसी भी पड़ाव पर प्रेम समाप्त नहीं होता. यदि ऐसा किसी के भी साथ होता है तो वह पाषण हृदय व्यक्ति ही होगा.


फिलहाल, आप लोग प्रेम-उपवन की इतनी सी संक्षिप्त सैर से संतुष्टि प्राप्त करिए क्योंकि विस्तार से सैर करवाने पर वह मात्र एक पोस्ट में समाहित न होने वाली. जैसा कि कुछ सच्ची कुछ झूठी में कहा था, यहाँ भी कह रहे हैं कि अपने प्रेम पर विस्तार से लिखा जायेगा, बहुत कुछ लिखा जायेगा, जो एहसास आज तक दिल के किसी कोने में कैद हैं उन सबको खुले आकाश में उन्मुक्त उड़ान के लिए स्वतंत्र किया जायेगा.


प्रेम की चर्चा होने पर हमारे मित्र विमल किसी विद्वान के वक्तव्य का जिक्र करना कभी नहीं भूलते कि प्रेम अग्नि के समान है उसका सदुपयोग हो तो वह पावक अग्नि के समान शुद्ध करता है, नहीं तो वह सामान्य अग्नि के समान जलाता है.


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वंदेमातरम्

08 जनवरी 2021

दिल से दिल के जुड़ाव में मनोभावों की पावनता

समय का गुजरना सिर्फ गुजरना ही नहीं होता है बल्कि उसके साथ बहुत कुछ भी गुजर जाता है. गुजरता हुआ समय अपने गुजरने का एहसास कराता हुआ बहुत खालीपन छोड़ जाता है. इस खालीपन के साथ बहुत सारी बातें याद रह जाती हैं और बहुत सी बातें हमेशा को जुड़ी रह जाती हैं. इस समय ने ही संबंधों, रिश्तों की परिभाषा को अलग-अलग स्वरूप, अलग-अलग आयाम दिए हैं. गुजरते समय में रिश्ते भी जुड़े होते हैं, सम्बन्ध भी जुड़े होते हैं, इन्सान भी जुड़े होते हैं. रिश्तों, संबंधों की भावात्मकता के चलते न जाने कितने लोग अपने बनते हैं और न जाने कितने लोगों से अपनापन बनता है. इस अपनेपन में दो दिलों के बीच, दो विचारों के बीच, दो भावनाओं के बीच की आपसी सामंजस्य क्षमता, आपसी समन्वय आदि का बहुत बड़ा योगदान रहता है. संबंधों का ये अपनापन समाज में स्नेह, प्रेम की आधारशिला होता है. आवश्यक नहीं कि इस स्नेह में, इन संबंधों में आपस में किसी तरह की स्वार्थी मानसिकता छिपी हो. दिल से दिल का तालमेल विशुद्ध रूप से मनोभावों की शुद्धता का परिणाम है. दो दिलों के बीच की आपसी ईमानदारी का प्रतिफल है.




दो लोगों के बीच की आपसी भावात्मक ईमानदारी के चलते संबंधों में, रिश्तों में प्रगाड़ता बढ़ती है. रक्त-सम्बन्धी न होने के बाद भी अनेक रिश्ते रक्त-संबंधों से ज्यादा सशक्त और विश्वासपरक सिद्ध होते हैं. देखा जाये तो यह एक तरह की आपसी बॉन्डिंग होती है जो बिना कुछ कहे, बिना कुछ करे दो लोगों में स्वतः ही एक-दूसरे के प्रति आकर्षण का भाव जगाती है. यही भाव दो लोगों को करीब लाता है, उनमें रिश्तों की, संबंधों की उष्णता का प्रवाह करता है. विशुद्ध ईमानदारी, विश्वास पर आधारित इस तरह के रिश्तों, संबंधों की पावन इमारत सदियों तक दिल को धड़काती है. गुजरते दिनों की स्मृतियों को जीवंत रखती है. समय गुजरता रहता है और अपनेपन की, अपनों की यही स्मृतियाँ, यही यादें उनको हमारे बीच सदैव जीवित रखती हैं. व्यक्ति सामने है या नहीं, इससे अधिक मायने रखता है कि व्यक्ति दिल में है या नहीं. दिल में किसी के बसे होने के कारण ही वर्षों बीत जाने के बाद भी उसे भुलाया नहीं जाता है.


संबंधों, रिश्तों की प्रगाड़ता दो दिलों को जोड़ती है, दो लोगों के बीच कहे-अनकहे संसार का विस्तार करती है. यही प्रगाड़ता यदि संबंधों का, प्रेम का विस्तार करती है, चेहरे पर हँसी का प्रादुर्भाव करती है तो यही प्रगाड़ता आँखों में नीर भी भरती है. न जाने किस तरह की भावनात्मकता का संसार चारों तरफ रचा-बसा होता है जहाँ हँसी-ख़ुशी के साथ आँसुओं का प्रवाह होता है, अपनों के खोने का भय होता है, सबकुछ उजड़ जाने का डर होता है. किसी का एक पल में मिलकर जीवन भर के लिए जुड़ जाना और किसी का जीवन भर साथ रहकर भी एक पल में जुदा हो जाना, आश्चर्यबोध जैसा कुछ प्रतीत करवाता है. न कहने के बाद भी सबकुछ समझने का भाव, सबकुछ समझते हुए भी कुछ न कहने का बोध, जैसे अलौकिक दुनिया का निर्माण करता है. काश! संबंधों, भावनाओं, रिश्तों, संवेदना की मासूम सी आधारभूमि पर आँसुओं की, जुदा होने की, सबकुछ छूट जाने की कष्टप्रद खरोंच न बनने पाती.


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वंदेमातरम्

10 अक्टूबर 2020

ये ज़िन्दगी दोस्ती के नाम

दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है जो किसी भी रिश्ते से बड़ा है. हमने व्यक्तिगत रूप से महसूस किया है कि इस रिश्ते में जितना अधिकार है उतना किसी और रिश्ते में नहीं. हो सकता है कि बहुत से लोगों को इससे आपत्ति हो क्योंकि रिश्तों की कसौटी पर बहुत बार कई लोग दोस्ती से ऊपर पति-पत्नी के संबंधों को दर्शाने लगते हैं. देखा जाये तो पति-पत्नी का रिश्ता एक अलग तरह का रिश्ता है, उसे अभी यहाँ परिभाषित करने की आवश्यकता नहीं है. इस रिश्ते के सन्दर्भ में यदि दोस्ती को कसौटी पर परखा जाये, उसका आकलन, विश्लेषण किया जाये तो पता चलेगा कि कई बार बहुत सी बातें पति, पत्नी आपस में किसी भी कारण से छिपा जाते हैं मगर दोस्ती में ऐसा नहीं होता है. हो सकता है ऐसा सबके साथ न होता हो. किसी के लिए पति-पत्नी का रिश्ता दोस्ती से ऊपर आता हो और वह अपने दोस्तों के बजाय सारी बातें आपस में बाँट लेते हों.


बहरहाल, सबकी अपनी-अपनी स्थिति है. हम तो सभी रिश्तों, संबंधों को बिना किसी तराजू पर तौले बराबर सम्मान देते हैं. विगत दो-तीन दिन में रिश्तों, संबंधों, दोस्ती को लेकर कोई न कोई घटना सामने आ जा रही है. कोई घटना खुद से सम्बंधित हो जाती है, कोई किसी और के सन्दर्भ में देखने को मिलती है. इधर दिमाग में, दिल में अजब सी उठापटक मची हुई थी. इसी उठापटक में एक बहुत पुरानी घटना याद आ गई. वर्ष 2006-07 की बात होगी, ये वो समय था जबकि हम स्वयं अपनी दुर्घटना, पिताजी के देहांत के बाद की पारिवारिक स्थितियों से लड़ने में लगे थे. दुर्घटना के बाद वर्ष 2005 में ही अपने एक मित्र के सहयोग से गाँधी महाविद्यालय में मानदेय प्रवक्ता के रूप में हमारा चयन हो गया था. कहने को तो नौकरी डिग्री कॉलेज की थी मगर न तो उसमें नियमितता थी और वेतन प्रतिदिन ली गई कक्षाओं के आधार पर बनाया जाता था जो अधिकतम पाँच हजार रुपए हुआ करता था.


छोड़िए ये वेतन, धन की बातें, जो बात करने के लिए पोस्ट लिखी वो लिखते हैं. दुर्घटना के बाद कृत्रिम पैर लगने के बाद जुलाई 2006 से नियमित रूप से कॉलेज जाने का क्रम आरम्भ हुआ, उसी तरह से वेतन का निर्धारण भी हुआ. इसी में बहुत अच्छे से याद नहीं, उसी साल या फिर उसके अलग वर्ष यानि कि 2007 में हमारे एक अभिन्न मित्र, लंगोटिया यार कहना चाहिए, का घर आना हुआ. उससे पहले उसका घर आना हमारे एक्सीडेंट के समय ही हुआ था. इधर-उधर की तमाम बातों के बाद उसने कुछ पांच-छह सौ रुपयों की जरूरत बताई. हमारे पूरे परिवार की स्थिति उन दिनों ‘तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में है’ वाली हुआ करती थी, इसके बाद भी उसकी जरूरत को पूरा किया. समय के साथ ऐसी स्थिति चलती रही. यह भले नियमित न थी मगर यदा-कदा उस बचपन के मित्र का साधिकार सामने आकर अपनी जरूरत को पूरा करने की मंशा को प्रकट करना होता था.



हमें अपने सामाजिक जीवन में इस तरह के कार्यों में कभी समस्या नहीं हुई. कभी-कभी घरवालों को अम्मा को, भाइयों को समस्या होती थी, वो भी हमारी सहायता करने को लेकर नहीं वरन सबकी सहायता करने को लेकर (अब वो समस्या हमारी धर्मपत्नी को है), वो समस्या भी हमारी दुर्घटना के बाद उठे सहायता सम्बन्धी हाथों को देखने के बाद ख़त्म हो गई. फिर भटक गए मूल विषय से. समस्या होने, न होने के क्रम में आपको बताते चलें कि हमने घर में कभी इसका जिक्र नहीं किया कि कुछ आर्थिक मदद की जा रही है, यदा-कदा कभी भनक भी लगी तो इसका आभास करा दिया कि यथोचित धन वापस आ गया है. कई बार घरवालों से छिपाते हुए अपने मित्र की आर्थिक मदद बाहर से धन लेकर की गई.


एक दिन उसका घर आना हुआ. ऐसा नहीं कि वह सिर्फ कुछ पैसे लेने के लिए ही मिला करता. घर आना भी होता था, कभी कॉलेज भी मिलने आता, कभी बाजार में मिल जाता. उस दिन उसके घर आने पर उसका पूरा हावभाव बदला हुआ था. चेहरे पर हमेशा रहने वाली ख़ुशी गायब सी थी. हमारे साथ मिलने के दौरान उसकी दिखने वाली मित्रवत अकड़ जैसे किसी ने चुरा ली हो. चेहरा ऐसे लग रहा था जैसे कई दिनों से बीमार हो. हमारे हालचाल पूछते ही वो फूट-फूट कर रोने लगा. हम खुद अकबके से रह गए. समझ नहीं आ रहा था कि ये हो क्या रहा है? उसे समझाने का प्रक्रम करते मगर वह कभी हाथ पकड़ता, कभी गले लग जाता और रोना बराबर बना हुआ था. एक पल को लगा कि उसके साथ कोई दुर्घटना तो नहीं हो गई. कुछ मिनट बाद जब वो शांत हुआ, उसको पानी पिलाया और उसके रोने का कारण पूछा तो उसके जो कहा उसके बाद हमारी आँख झर-झर करके बहने लगी. अभी हम उसे शांत करवा रहे थे, अब वो हमें शांत करवाने लगा. ये तो गनीमत समझो कि हम मित्रों की संवेदना के बीच कोई और नहीं था.


उसने जो कहा वो अपने आपमें बहुत संवेदनात्मक और भावपूर्ण है, जिसे समझने वाले ही समझ सकेंगे. उसके रोने का कारण पूछने पर उसके मुँह से बस इतना निकला कि कुमारेन्द्र हमें माफ़ कर देना.  हम समझे थे कि तुम्हारी नौकरी डिग्री कॉलेज में लग गई है तो तनख्वाह पचास, साठ हजार होगी, इसलिए कभी-कभी हजार-पाँच सौ तुमसे माँग लेते थे. हमें अभी दो-चार दिन पहले मालूम चला कि तुमको पाँच हजार मिलते हैं, वे भी कुछ शर्तों के साथ. तब हमें लगा कि हम तुम्हारी मदद नहीं कर पाए इसके बाद भी तुमने अपनी इस विपत्ति में हमारी सहायता की.


मित्रवत संबंधों में जिस तरह की गालियों का आपस में आदान-प्रदान होता है, उसे यदि आप समझते हैं तो समझ लीजिये,, उस दिन सिर्फ प्रदान हुआ, आदान तो हुआ ही नहीं. समय किसी के साथ एक जैसा व्यवहार नहीं करता है. हमारे सन्दर्भ में भी एक जैसा नहीं रहा, हमारे दोस्त के सन्दर्भ में भी नहीं रहा. हाँ, मित्रता तब भी जैसी थी, आज भी वैसी है. आज भी वो गाली खाता है, आज भी वो हमें गाली देता है. आज भी वो हमसे पैसे माँगता है, आज हम भी उससे पैसे माँगते हैं. आज भी हम दोनों मिलते हैं और जब हम दोनों मिलते हैं तब वैसे ही मिलते हैं जैसे कि बचपन में मिला करते थे, बिना किसी जिम्मेवारी के, बिना किसी औपचारिकता के, बिना किसी स्वार्थ के. हाँ, गालियाँ देना बचपन से बाहर आने पर सीख लीं, वे देते ही हैं..... बिना किसी लिहाज के, हाँ... उसमें किसी की माँ-बहिन शामिल नहीं होती.... ये गालियाँ सिर्फ हमारी बनाई हैं, हम दोस्तों के लिए हैं. दोस्तों के नाम, गालियाँ आपके लिए नहीं.



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31 जुलाई 2020

पत्रों का सुखद एहसास अब गायब हो गया

आज, 31 जुलाई को लोग कई-कई कारणों से याद रखते हैं. कोई पार्श्व गायक मुहम्मद रफ़ी के कारण याद रखता है तो कोई साहित्यकार प्रेमचंद के कारण. इनके अलावा और भी बहुत से कारण होंगे आज की तारीख को याद करने के. इन्हीं बहुत से कारणों में एक कारण याद रखने का है, इस तिथि को विश्व पत्र दिवस मनाया जाना. हो सकता है कि आपको आश्चर्य हुआ हो कि ऐसा भी कोई दिवस मनाया जाता है. जी हाँ, 31 जुलाई को विश्व पत्र दिवस भी मनाया जाता है. ऐसा माना जाता है कि आज ही की तारीख में सबसे पहला पत्र इंग्लैण्ड में लिखा गया. उसके बाद से तकनीक के विकास करने तक पत्र ही वैचारिक आदान-प्रदान का सशक्त माध्यम बना हुआ था.


विश्व पत्र दिवस का मनाया जाना जितना आश्चर्य का विषय हो सकता है, उतना ही बहुत से युवा साथियों के लिए आश्चर्य का विषय पत्र का लिखा जाना भी हो सकता है. वर्तमान दौर में यदि एक बहुत बड़ी संख्या उन लोगों की होगी जिन्होंने पत्रों का लेखन किया है, पत्रों का इंतजार किया है तो एक बहुत बड़ी संख्या उन लोगों की भी होगी जिन्होंने पत्र का इस्तेमाल ही नहीं किया होगा. आज के दौर में तीव्रगति से इधर से उधर अपनी बात पहुँचाने के तमाम माध्यम विकसित हो चुके हैं मगर इसके बाद भी लगता है कि जो एहसास, जो संवेदनाएँ पत्र में छिपी होती हैं वे आज के किसी तकनीकी माध्यम में नहीं हैं.


आज भी याद आता है वो समय जबकि पत्रों का आना, उनको बार-बार पढ़ा जाना, पत्रों का सहेज कर रखा जाना अपने आपमें एक बहुत विशेष बात हुआ करती थी. हम आज भी सैकड़ों की संख्या में पत्रों को अपने पास सुरक्षित रखे हुए हैं. कई बार फुर्सत के समय में, अकेलापन महसूस होने पर इनके साथ समय बिताना बहुत अच्छा लगता है. परिजनों के पत्र आने पर सबसे पहले कौन पढ़ेगा को लेकर अक्सर युद्ध जैसी बन जाया करती थी. पत्र में किस-किसको नाम लेकर संबोधित किया गया है, इसको भी बहुत महत्त्वपूर्ण माना जाता था. किसी विशेष आयोजन पर आने वाले पत्र के समय एक लिफाफे में कई-कई छोटे-छोटे कागजों में पत्रों का आना मनोहारी मौसम जैसा लगता था. बचपन के उस दौर से बाहर आकर युवावस्था में मित्रों के पत्रों का इंतजार, पत्रों में कई बार कोड वर्ड में अपनी बात को कहने की काबिलियत भी दिखा दी जाती थी ताकि यदि धोखे से घरवालों के हाथ पत्र पड़ जाए तो उस कोड वर्ड को समझ न सकें.

ऐसे समय में याद आता है हॉस्टल टाइम में अपने एक मित्र द्वारा पत्रिका में भेजा गया सन्देश और उसके बाद उसके नाम पर रोज ही चालीस-पचास पत्र आने शुरू हो गए. यह कॉलेज के लिए और हॉस्टल के लिए आश्चर्य का विषय बना हुआ था कि आखिर उसके पास इतने पत्र कहाँ-कहाँ से आते हैं. यह सब करामात उसके द्वारा अनु नाम रखकर एक लड़की के रूप में पत्रिका में सन्देश छपवाने के बाद हुई थी. इसी तरह एक बार अपने शहर के मुख्य डाकघर में हमें प्रधान द्वारा बुलवाकर इसकी जानकारी ली गई थी कि हमारे पास इतने पत्र रोज कहाँ से और क्यों आते हैं. ये बात सन 1996-97 के आसपास की होगी, उस समय हमारे पास रोज ही दस-बारह पत्र आया करते थे.

आज हमारे पास पत्र आने की संख्या भले बहुत ही सीमित हो गई हो, हमारे द्वारा भी पत्र लिखने की गति भी कम हो गई हो मगर बंद नहीं हुई है. ई-मेल और सोशल मीडिया के इस दौर में लोगों ने अपनी बात इधर से उधर पहुँचाने का अलग माध्यम भले ही अपना लिया हो मगर हम आज भी बहुत से परिचितों, अपरिचितों, पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाकारों आदि को पत्र भेजते हैं. उनको पत्र लिखना हम आज भी हस्तलिपि में ही करते हैं. आप भी कोशिश करिए पुनः, अच्छा लगेगा. जो लोग पत्र लिखते रहे हैं, पत्रों का इंतजार करते रहे हैं, वे भली-भांति इसके सुखद एहसास को समझ सकते हैं. जिन लोगों ने कभी पत्र नहीं लिखा, पत्रों के इंतजार करने की अनुभूति नहीं की वे इसका आनंद उठा सकते हैं.

वर्तमान दौर में जबकि सभी लोग खुद में अकेलापन महसूस कर रहे हैं, उस समय आपके हाथ से लिखे दो शब्द आपके अपनो के लिए बहुत बड़ा सुख का माध्यम बन सकते हैं. लिख कर देखिये, हम भी लिख रहे हैं, आप भी लिखिए.

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14 जुलाई 2020

बहुत ज्यादा प्यार भी अच्छा नहीं होता

आज की पोस्ट का बस इतना ही सार है.... 



कोई भी हो हर ख्वाब तो सच्चा नहीं होता,
बहुत ज्यादा प्यार भी अच्छा नहीं होता,
कभी दामन छुड़ाना हो तो मुश्किल हो,
प्यार के रिश्ते टूटें तो, प्यार के रस्ते छूटें तो
रास्ते में फिर वफाएं पीछा करती हैं.


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13 जून 2020

समय और यादों की साजिश है गलतियों का एहसास करवाना

आजकल निपट खाली बैठे हैं. जब लॉकडाउन लगा था तो सोचा था कि तमाम अधूरे काम निपटा लिए जायेंगे मगर आज तक सिर्फ सोचना ही हो रहा है. इस सिर्फ सोचने भर ने जीवन में बहुत नुकसान किया है हमारा. बहुत से बनते काम इसी सोचने के चक्कर में बिगड़ गए हैं. सोचने का काम इतनी तल्लीनता से होता है कि सम्बंधित विषय के ऐसे-ऐसे बिन्दुओं तक पर सोच लिया जाता है जिनका दूर-दूर तक कोई भविष्य, वर्तमान नहीं. बहरहाल, इसी खाली बैठे रहने में बहुत सी बातें याद आती हैं. बहुत सी यादें दिल-दिमाग में फिर से अंकुरित होकर खुद के आसपास उनका एहसास करवाने लगती हैं.


ये यादें भी बड़ी अजब सी स्थिति है. समझ नहीं आता कि ये दिल की स्थिति है या फिर दिमाग की? भूतकाल से जुड़े होने के बाद भी यादें वर्तमान को प्रभावित करती हैं साथ ही भविष्य की राह पर भी अपने निशान बनाने का दम रखती हैं. इन दिनों तमाम ऐसी यादों से दो-चार हो रहे हैं जो सुखद एहसास नहीं दे रहीं. बार-बार कोशिश होती है कि उन यादों को अपने आसपास फटकने न दें मगर ऐसा हो नहीं पा रहा है. हमारे अपने जीवन में बहुत कम ऐसा हुआ है जबकि हम परेशान रहे हों या फिर किसी स्थिति-परिस्थिति से हम खुद को बाहर न निकाल पाए हों. इस बार समझ नहीं आ रहा है कि हम कहाँ कमजोर पड़ रहे हैं? यह भी समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर इन यादों को हम अपने सामने खड़ा होने से क्यों नहीं रोक पा रहे हैं? कई बार लगता है कि ऐसा तो नहीं कि इनको हम खुद ही छूट दिए हों हमारे सामने खड़े होने की? कहीं ऐसा तो नहीं कि इन यादों के सहारे हम उन दिनों में फिर जाना चाहते हों जो हमारे हाथ से निकल गया है? कहीं ऐसा तो नहीं कि इन्हीं यादों के रूप में हम अपनी तमाम गलतियों का पश्चाताप करना चाह रहे हों?


बार-बार सोचने, विचार करने के बाद भी निर्धारित नहीं कर पा रहे हैं कि आखिर असल सत्य क्या है? ये नहीं कहते कि जो समय बीत चुका उसमें हमने कोई गलती नहीं की थी. ये भी नहीं कहते कि वे गलतियाँ हमने जानबूझ कर कीं या फिर किसी को परेशान करने के लिए कीं. इसके बाद भी यदि वही समय सामने खड़ा होकर सवाल-जवाब करे तो कष्ट होना स्वाभाविक है. यह जानते-समझते हुए कि हमारा कोई भी कदम किसी भी तरह से नियोजित नहीं था किसी को भी परेशान करने के लिए, उसके बाद भी आरोपी बनाया जाना, दोषी सिद्ध किया जाना उन्हीं यादों का खेल है. वे यादें अक्सर सामने आकर एहसास करवाती हैं कि हमने कहीं न कहीं गलती की हैं. वे इसका आभास करवाती हैं कि हम कहीं न कहीं दोषी हैं. वे यादें ये भी साबित करती हैं कि अब हमारे हाथ में कुछ नहीं, अब हमें सिर्फ उन्हीं यादों के हाथों परेशान होना है. अब हमें उन्हीं यादों के द्वारा निर्धारित दंड भुगतना है.

ऐसा लगता है कि ये समय की और यादों की मिलीभगत है जो हमें हमारी गलतियों का बार-बार आभास करवाते हुए हमें दण्डित करना चाहते हैं. हम मानते हैं, स्वीकारते हैं कि हम दोषी हैं, हमने गलती की है मगर हम ये भी जानते हैं, ये समय भी जानता है, यादें भी जानती हैं कि अब उन गलतियों का कोई पश्चाताप नहीं. या कहें कि पश्चाताप करने का कोई फायदा नहीं क्योंकि यदि फायदा होना होता तो उसी समय मिल गया होता जबकि पूर्व में कई-कई बार पश्चाताप किया, अपना दोष स्वीकारा.

आज फिर स्वीकारते हैं कि हम दोषी हैं, हमसे गलतियाँ हुईं हैं मगर इसका समाधान क्या है? क्या समय, यादें हमें ऐसे ही परेशान करती रहेंगी? क्या ये ऐसे ही हमें आभास करवाती रहेंगी हमारी गलतियों की? यदि ऐसा है तो क्या वाकई इतनी बड़ी गलतियाँ हुई हैं हमसे? क्या वाकई इतने बड़े दोषी हैं हम?

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10 जून 2020

हर बार लगता जैसे सामने खड़ी खिलखिला हँस रही है

किसी व्यक्ति के साथ गुजारा समय जितना महत्त्वपूर्ण होता है, उससे महत्त्वपूर्ण होता है उन पलों में उस व्यक्ति का व्यवहार. यही व्यवहार उस व्यक्ति की स्मृतियों को चिर-स्थायी करता है. यही स्मृतियाँ उस व्यक्ति को सदैव दिल में जीवित बनाये रखती हैं. श्वेता के साथ की कुछ ऐसी अल्प-स्मृतियाँ चिर-स्थायी बनकर दिल में सदैव के लिए बस गईं हैं. ऐसा आज अकेले हमें अपने साथ ही नजर नहीं आया बल्कि कई लोगों की निगाहों में, उनके स्वर में, उनकी भावनाओं में ऐसा परिलक्षित हुआ.


श्वेता 

आज, 10 जून श्वेता की तीसरी पुण्यतिथि के अवसर पर ऐसे कई लोगों से मिलना हुआ जो भावनात्मक रूप से खिंचे आ रहे थे. हर बार की तरह इस बार भी रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया था मगर सामाजिक दूरी के नियमों का पालन करते हुए अत्यंत सीमित रूप में. पहले विचार बना था कि महज दस लोगों के द्वारा रक्तदान करवाकर श्वेता को श्रद्धा सुमन अर्पित किये जायेंगे लेकिन यह विचार बस विचार ही बन गया. ऐसा इसलिए क्योंकि भावनात्मकता पर किसी तरह की औपचारिकता का पहरा नहीं होता है, किसी तरह की बंदिश नहीं होती है. इसी के चलते कुछ लोगों में श्वेता की स्मृति में रक्तदान करने की भावनात्मक जिद भी देखी गई.


श्रद्धा सुमन अर्पित करते अपर जिलाधिकारी प्रमिल कुमार सिंह 

इस भावनात्मक जिद में अंततः मेडिकल टीम को अपनी हार मानने पर एक व्यक्ति ने विवश कर दिया. 72 वर्षीय शिव सिंह सेंगर रक्तदान के लिए बार-बार आत्मीय रूप से लगातार निवेदन करते रहे. हर बार मेडिकल टीम रक्तदान सम्बन्धी नियमावली का सहारा लेकर उनके निवेदन को इंकार में बदल देती. एक तरफ भावनात्मकता थी और दूसरी तरफ नियम मगर अंततः भावनाओं की, आत्मीयता की विजय हुई. आवश्यक स्वास्थ्य जाँचों को करने के बाद शिव सिंह जी ने इस तरह चहकते हुए रक्तदान किया जैसे कोई अपने बच्चे का जीवन सींच रहा हो. कहीं न कहीं यह सही भी था. शिव सिंह जी का ही नहीं वरन श्वेता का रिश्ता जिससे भी बना अत्यंत अपनत्व भरा रहा. अपनी मधुर मुस्कान के द्वारा एक पल में सभी को अपने परिवार में शामिल कर लेने वाली श्वेता की चाह भगवान को भी रही होगी. तभी उस उम्र में जबकि लोग अपने भविष्य के सपने बुनते हैं, अपने बच्चों के साथ खेलते-कूदते हैं, श्वेता हम सबको अपनी यादों के बीच छोड़ गई.

रक्तदान करते शिव सिंह सेंगर (72 वर्ष)

डॉ० अंकुर शुक्ला 

इसे संयोग ही कहा जायेगा कि श्वेता से हमारी अंतिम मुलाकात रक्तदान करने के दौरान ही हुई थी. किसी को आवश्यकता पड़ने पर उसे कॉल की गई होगी. चिकित्सक परिवार से सम्बन्ध रखने के कारण उसे रक्त की महत्ता ज्ञात थी. तत्काल उसकी उपस्थिति रक्तदान के लिए हुई. उस समय तक हम रक्तदान कर चुके थे. श्वेता के रक्तदान करने के बाद हमारी एक मित्र ने हमसे उसकी तरफ इशारा करते हुए उससे परिचित होने की बात पूछी. हमने श्वेता को चुप रहने का इशारा करते हुए उसे पहचानने से इंकार कर दिया. तब हमें बताया गया कि ये मुस्कान हॉस्पिटल वाले डॉ० अंकुर शुक्ला की पत्नी है. हमने उस पर भी अनभिज्ञता दिखाई तो हमारी मित्र चौंकी क्योंकि उस समय तक अंकुर और मुस्कान जनपद में ही नहीं वरन आसपास के क्षेत्रों में भी विख्यात हो चुके थे. ऐसे में हमारे जैसे दिन भर घूमने वाले, सामाजिक प्राणी को इनके बारे में न मालूम होना आश्चर्य की, चौंकने की बात ही थी.

हमारी मित्र की शक्ल-सूरत देख हम दोनों ठहाका मार कर हँस दिए. ऐसा इसलिए क्योंकि अंकुर हमारे छोटे भाई के समान है और उस दिन के पहले भी कई बार हम लोगों की मुलाकात पारिवारिक माहौल में हो चुकी थी. तब श्वेता ने ही उन मित्र का संशय दूर करते हुए कहा, ये हमारे बड़े भाई हैं. तब अंदाजा भी नहीं था कि हँसने-खिलखिलाने वाली श्वेता के साथ अगला कोई पल किसी भी रिश्ते के रूप में बिताने को नहीं मिलेगा. 

ये हैं हम 

आज से पहले भी दो बार उसकी स्मृति में रक्तदान किया और हर बार यही लगता है जैसे वह सामने खड़ी होकर उसी तरह खिलखिलाकर हँस रही है और कह रही है कि ये हमारे बड़े भाई हैं.

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07 जून 2020

काश कि दिल-दिमाग-मन को फॉर्मेट किया जा सकता

कभी-कभी भावावेश में या फिर अचानक ही अनजाने में ऐसे कदम उठ जाते हैं जिनके बारे में बाद में सोचने पर अफ़सोस होता है. कई बार उन बातों के परिणाम सामने आने के बाद भी अफ़सोस होता है. आवश्यक नहीं कि ऐसी बातों का या कदमों का कोई दुष्परिणाम हो मगर जो भी होता है वो खुद को अच्छा नहीं लगता है. ऐसे में स्वाभाविक है कि यदि आपकी खुद की बातों का जो परिणाम रहा हो वो ही आपको पसंद न आ रहा हो तो दुःख होना स्वाभाविक है. अब पता नहीं ऐसा सबके साथ होता है या हमारे साथ ही ऐसा है?



कुछ बातों का असर कई-कई वर्षों बाद देखने को मिलता है. कुछ बातें तत्काल अपना परिणाम दिखा देती हैं. जिन बातों का असर तत्काल देखने को मिल जाता है, उनके चलते दुःख भी क्षणिक रहता है. इसके उलट ऐसी बातें जिनके परिणाम देर से मिलें उनके बारे में कष्ट भी बहुत लम्बे समय तक रहता है. इन्हीं में बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जिनका छिपे रहना ही बेहतर होता है मगर कई बार भावनाओं में बह जाने के कारण बातें भी सामने आ जाती हैं. जिस समय भावनाओं का प्रकटीकरण किया जाता है, संभव है कि उस समय माहौल उनके अनुकूल हो मगर जैसे ही वातावरण उन बातों के विपरीत होता है वे बातें कष्ट देने लगती हैं.


ऐसी बातों पर पश्चाताप से भी कोई हल नहीं निकलता है. ऐसी बातों को कहने से संदर्भित क्षमा याचना भी उनके परिणाम से उत्पन्न कष्ट को कम नहीं करती. सोचने वाली बात है कि ऐसी बातों के लिए दोषी व्यक्ति पश्चाताप करना चाहता है मगर इसका कोई निदान नहीं. संभव है कि ये स्थिति अत्यंत कष्टकारी ही होती है. काश कि दिल-दिमाग-मन ऐसे यंत्र होते जिनको समय के साथ फॉर्मेट किया जा सकता. इनमें अच्छी-अच्छी यादों को संग्रहित कर लिया जाता और बुरी-बुरी बातों को, दुःख देने वाली घटनाओं को निकाल दिया जाता. काश ऐसा हो पाता.

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24 मई 2020

दिल और दिमाग के अंतर्संबंध

मानव शरीर में दिल और दिमाग, दोनों का महत्त्वपूर्ण स्थान है. दोनों के अपने निर्णय होते हैं और जीवन के फैसलों में दोनों के निर्णयों को एक-दूसरे पर हावी नहीं होने देना चाहिए. किसी भी व्यक्ति के जीवन में कठिन स्थितियों में, नकारात्मक स्थितियों में, विवाद की स्थितियों में, तनाव के समय में दिल की जगह दिमाग की बातों को महत्त्व देना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि दिल के निर्णय मूल रूप से भावनात्मक एहसास पर आधारित होते हैं. जबकि दिमाग तर्क-क्षमता के द्वारा सही-गलत को परिभाषित करते हुए अपना निर्णय देता है.


दिल का सम्बन्ध सदैव से भावनात्मकता से रहा है. उसके द्वारा लिए गए निर्णय विवेकपूर्ण होने से ज्यादा संवेदनात्मक होते हैं. उसका विवेक संबंधों, रिश्तों एहसासों को प्राथमिकता देते हुए व्यक्ति को कार्य करने को प्रेरित करता है. ऐसा नहीं है कि दिल के द्वारा विवेकपूर्ण निर्णय लेने में किसी तरह की त्रुटि होती है अथवा उसका व्यक्ति के जीवन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. उसके द्वारा मन-मष्तिष्क को भी निर्णय लेने सम्बन्धी दिशा प्राप्त हो जाती है क्योंकि दिमाग भी कहीं न कहीं दिल के निर्णयों पर अपने विवेक का प्रयोग करते हुए सही-गलत को परिभाषित करता है.



किसी भी व्यक्ति द्वारा निर्णय लेने सम्बन्धी स्थिति में दिल और दिमाग दोनों ही सक्रिय हो जाते हैं. इस स्थिति में व्यक्ति अपने जीवन, अपने भविष्य, अपने समय के अनुसार विवेकपूर्ण ढंग से विचार करता है कि उसके लिए अंतिम रूप से क्या सही है. उसी के अनुसार वह निर्णय लेता है. यही वह स्थिति होती है जबकि व्यक्ति के जीवन, भविष्य, कठिन स्थिति, नकारात्मकता, निराशा आदि दशाओं में दिमाग के निर्णयों की विजय हो जाती है. इसे ऐसे समझा जा सकता है जैसे किसी व्यक्ति के बहुत ही करीबी व्यक्ति के विवाह का आयोजन है और वह व्यक्ति किसी प्राकृतिक आपदा के कारण जाने में असमर्थ है. ऐसी विषम स्थिति में उसका दिल उसे जाने को प्रेरित करता है मगर दिमाग विवेकपूर्ण निर्णय लेते हुए उसे सही, गलत स्थिति समझाते हुए जाने से रोकता है. निश्चित है कि ऐसे विषम समय में व्यक्ति अपने जीवन की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए विवाह आयोजन में न जाने का निर्णय करता है.

किसी भी इन्सान को गंभीरता की स्थिति में जबकि उसे दिल और दिमाग में से किसी एक को चुनना पड़े तो उसे याद रखना चाहिए कि उसके निर्णय का क्या और कैसा असर होने वाला है. यदि उसके निर्णय का असर किसी व्यक्ति के कैरियर, उसके भविष्य, उसके जीवन पर पड़ने वाला है तब उसे अपने दिमाग की तार्किकता को महत्त्व देना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि दिल विशुद्ध रूप से भावनात्मकता को वरीयता देता है जबकि दिमाग का ज्ञान मानसिक, शैक्षिक, तार्किक, बुद्धिमत्ता से समूची स्थितियों का आकलन कर निर्णय करता है.

इसका अर्थ कदापि यह नहीं कि दिल के निर्णयों का महत्त्व नहीं. किसी भी रूप में दिल के विवेक पर दिमाग को हावी करना नहीं है क्योंकि जीवन में दोनों का अपना महत्त्वपूर्ण स्थान है. बिना दिल-दिमाग के कोई भी इन्सान सकारात्मक रूप से किसी स्थिति पर, किसी विचार पर आगे नहीं बढ़ सकता है. मूल रूप से दिल और दिमाग एक-दूसरे से अंतर्सम्बंधित होते हैं. बहुत सी स्थितियों में दिमाग के निर्णयों पर दिल के निर्णयों का भी प्रभाव होता है. जब कोई व्यक्ति अपने परिवार के बारे में, अपने अभिभावकों के बारे में, अपने बच्चों के बारे में निर्णय लेने की स्थिति में होता है तब वह दिल के ज्ञान को दिमाग के विवेक पर वरीयता देता है. भले ही ये कहा जाये कि बात अपने दिल की सुननी चाहिए परन्तु तार्किक रूप से उसका आकलन दिमाग से करते हुए निर्णयों का सम्मान करना व्यक्ति का दायित्व होना चाहिए.

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(हालाँकि ये पोस्ट पुरानी है मगर आज खुद के दिल-दिमाग की स्थिति में तालमेल, समन्वय की जगह द्वंद्व दिख रहा था. ऐसे में ये पोस्ट याद आई तो इसे फिर प्रकाशित कर दिया.)
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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

08 मई 2020

भावनात्मक रूप से ख़ुशी के साथ निराशा भी हाथ आई

भावनात्मकता के कम, ज्यादा करने का कोई बटन होना चाहिए इस शरीर में. ये पोस्ट विशुद्ध रूप से हमसे ही सम्बद्ध है और वो भी हमारी संवेदना, हमारी भावना के कारण. जैसा कि आपमें से बहुत से लोगों को जानकारी होगी, हमारी पुस्तक कुछ सच्ची कुछ झूठी के प्रकाशित होने की. हमने वर्षों पहले एक सपना देखा था, आत्मकथा लिखने का. उसे साकार करने के बारे में पहले सोचा जब हम तीस साल के हुए फिर लगा कि नहीं, अभी जल्दी हो जायेगा, ऐसा कदम उठाना. इसके बाद चालीस वर्ष की उम्र में अपने ऊपर नियंत्रण नहीं कर सके और लिखने बैठ ही गए. लिखे और फिर उसे प्रकाशित करने का भी प्रयास किया. चूँकि यह हमारा ड्रीम प्रोजेक्ट था, ऐसे में इसे किसी भी कीमत पर छपवाना भी था. सो कीमत अदा करने के साथ छपवाया भी.


इस पुस्तक के द्वारा किसी भी तरह की प्रसिद्धि का, किसी भी तरह के व्यापार का, किसी भी तरह की प्रतिष्ठा का लोभ दिल-दिमाग में नहीं था, आज भी नहीं है. ऐसा इसलिए हो सका क्योंकि ये विशुद्ध हमारी ही कहानी है. अपने लोगों के पास तक हम अपने इस रूप में पहुँचना चाहते थे. बहुत से अपने लोगों तक हम पहुँचे भी. बहुत से लोगों को नाराजगी भी रही कि उनके पास तक हमारा ये रूप स्वयं हमारे द्वारा नहीं पहुँचाया गया. इसकी हमारी कुछ सीमायें थीं. प्रकाशन सम्बन्धी सीमाओं की समाप्ति के बाद इस पर आगे विचार किया जायेगा. उक्त कई बिन्दुओं की लालसा, तृष्णा न होने के बाद भी एक अभिलाषा रही कि अपने लोग हमें बताएँ कि हम उन्हें अपने इस रूप में कितने अपने से लगे. इस लालसा को, लालच को कोई कुछ भी कह सकता है, यह उसका अधिकार, उसकी स्वतंत्रता है.



कुछ सच्ची कुछ झूठी के प्रकाशन ने एक तरफ ख़ुशी प्रदान की तो दूसरी तरफ निराशा भी. आखिर हमारे अपने उन लोगों से भी इसके बारे में दो शब्द भी नहीं निकले जिनसे अपेक्षा थी. आज भी है मगर अब शायद अपेक्षा का पौधा उतना हरा, महकता हुआ नहीं है जो इसके प्रकाशन के समय था. बहरहाल, सबकी अपनी-अपनी व्यस्तताएँ, अपनी-अपनी वरीयताएँ हैं. आज यह बात अपने एक मित्र से कुछ सच्ची कुछ झूठी की चर्चा के बाद उठी तो सोचा इसे व्यक्त ही कर दें. पीड़ा दिल-दिमाग में रखनी नहीं चाहिए. हम रखते भी नहीं.

सभी के आभार सहित क्षमा, यदि किसी को अन्यथा लगे.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

04 फ़रवरी 2020

कुछ याद न आया करे


याददाश्त का किसी भी व्यक्ति के जीवन में बड़ा ही महत्त्व माना गया है. ऐसा समझा जाता है कि जिसकी याददाश्त बहुत अच्छी होती है उसे बुद्धिमान कहा जाता है. ऐसे व्यक्तियों को सफलता प्राप्त करने से कोई नहीं रोक सकता है. किसी पुस्तक में पढ़ा भी था कि स्वामी विवेकानन्द अपने बचपन में किताब पढ़ते जा रहे थे और उसके पृष्ठ फाड़ कर फेंकते जा रहे थे. ऐसा करते देख उनके पिता ने इसका कारण पूछा तो नरेन्द्र बोले कि उनको किताब याद होती जा रही है. ऐसा सुनकर जब उनके पिता ने इस बात की सत्य जाँची तो वे आश्चर्यचकित रह गए. नरेन्द्र को किताब ज्यों की त्यों, शब्दशः याद थी. स्वामी विवेकानन्द की प्रतिभा, उनके बौद्धिक कौशल का लोहा तो सारी दुनिया आज भी मानती है. याददाश्त का इतना प्रबल रूप प्राप्त कर लेना हर एक के वश की बात नहीं होती है. किसी भी व्यक्ति के लिए आसान नहीं होता है अपनी याददाश्त को प्रभावी बनाये रख पाना. उम्र के अनुसार, कार्यक्षमता के हिसाब से, दिनचर्या के चलते भी व्यक्तियों की याददाश्त में विचलन देखने को मिलता है.


याददाश्त का उत्तम होना भले ही किसी भी व्यक्ति को शीर्ष पर पहुंचता हो मगर कई बिन्दुओं पर याददाश्त का अच्छा होना उस व्यक्ति के लिए सुखद नहीं होता है. सैद्धांतिक रूप से भले ही किसी भी व्यक्ति का जीवन बचपन, युवावस्था और वृद्धावस्था जैसे चरणों में बाँट दिया गया हो मगर व्यावहारिक रूप से उसका जीवन प्रतिपल एक नया चरण होता है. हर नए आने वाले पल में वह अपने जीवन को नए रूप में देखता है. ये और बात है कि आने वाले समय को वह वर्तमान पल की आपाधापी में महसूस नहीं कर पाता है, उसका एहसास नहीं कर पाता है. एक-एक पल किसी भी व्यक्ति के जीवन में अपनी अहम् भूमिका का निर्वहन करता है. ऐसे में उन व्यक्तियों के लिए अत्यंत कष्टकारी समय बार-बार सामने आता है जिनकी याददाश्त अच्छी होती है. कुछ भी न भूल पाने वाले व्यक्तियों के लिए अपने अतीत को लेकर आगे बढ़ना बहुत कठिन हो जाता है. असल में दिमाग किसी तरह का कोई कंप्यूटर अथवा मोबाइल नहीं कि जिसे जब मन आया फॉर्मेट कर दिया. दिमाग को बचपन से ही सक्रिय, सचेत, सजग बनाये जाने के कदम उठाये जाने लगते हैं. ऐसे में बहुत से लोगों का दिमाग अत्यंत सक्रिय अवस्था में बना रहता है. उनकी सोचने-समझने और याद करने की शक्ति भी अन्य लोगों से विलक्षण स्थिति में होती है. और मजे की बात यह कि अपने अतीत को लेकर ऐसे लोग ही सबसे ज्यादा परेशान रहते हैं.

अपने अतीत को कितना याद रखा जाये कितना भुलाया जाये यह व्यक्ति के हाथ में होना चाहिए. अपनी याददाश्त की क्रियाशीलता पर किसी व्यक्ति का अधिकार होना ही चाहिए. यादों का पिटारा किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को खुश कम रखता है, उसे रुलाता ज्यादा है. कई बार लगता है याददाश्त का सशक्त होना व्यक्ति की संवेदनशीलता, उसकी भावनात्मकता से भी जुड़ा हुआ मामला है. अक्सर देखने में आया है कि कोई व्यक्ति अपनी खुद की याददाश्त का कितना भी ख़राब होना बताये मगर यदि कोई घटना उसकी भावना से, उनकी संवेदना से जुड़ी होती है तो वह उसे बरसों-बरस याद रहती है. व्यक्तिगत तौर पर हमसे जुड़े हमारे मित्रों की याददाश्त, उनके क्रियाकलापों को देखकर अक्सर इस बिंदु की पुष्टि हुई है. ऐसे में यदि याददाश्त और भावनात्मकता का गहरा सम्बन्ध है तो व्यक्ति को बहुत ज्यादा भावनात्मक नहीं होना चाहिए. उसे अपनी सामर्थ्य और अपने व्यवहार के अनुसार ही अपनी भावनात्मकता का विस्तार करना चाहिए. समय के साथ व्यक्ति के संबंधों में भी परिवर्तन आता है, उनके निर्वहन में भी किसी न किसी तरह के बदलाव आते हैं. इस तरह के परिवर्तन उसकी यादों को, उसकी स्मृतियों को प्रभावित करते हैं. सशक्त याददाश्त के चलते, यादों के पल-प्रति-पल आसपास विचरण करने से परेशान होते व्यक्तियों को अपनी भावनात्मक्र पर अंकुश लगाना चाहिए. दिल-दिमाग न तो कंप्यूटर है और न ही कोई मशीन कि जिसे जब मन आया फॉर्मेट कर दिया. इसे स्वयं के व्यवहार से ही नियंत्रित किया जा सकता है.