10 October 2020

ये ज़िन्दगी दोस्ती के नाम

दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है जो किसी भी रिश्ते से बड़ा है. हमने व्यक्तिगत रूप से महसूस किया है कि इस रिश्ते में जितना अधिकार है उतना किसी और रिश्ते में नहीं. हो सकता है कि बहुत से लोगों को इससे आपत्ति हो क्योंकि रिश्तों की कसौटी पर बहुत बार कई लोग दोस्ती से ऊपर पति-पत्नी के संबंधों को दर्शाने लगते हैं. देखा जाये तो पति-पत्नी का रिश्ता एक अलग तरह का रिश्ता है, उसे अभी यहाँ परिभाषित करने की आवश्यकता नहीं है. इस रिश्ते के सन्दर्भ में यदि दोस्ती को कसौटी पर परखा जाये, उसका आकलन, विश्लेषण किया जाये तो पता चलेगा कि कई बार बहुत सी बातें पति, पत्नी आपस में किसी भी कारण से छिपा जाते हैं मगर दोस्ती में ऐसा नहीं होता है. हो सकता है ऐसा सबके साथ न होता हो. किसी के लिए पति-पत्नी का रिश्ता दोस्ती से ऊपर आता हो और वह अपने दोस्तों के बजाय सारी बातें आपस में बाँट लेते हों.


बहरहाल, सबकी अपनी-अपनी स्थिति है. हम तो सभी रिश्तों, संबंधों को बिना किसी तराजू पर तौले बराबर सम्मान देते हैं. विगत दो-तीन दिन में रिश्तों, संबंधों, दोस्ती को लेकर कोई न कोई घटना सामने आ जा रही है. कोई घटना खुद से सम्बंधित हो जाती है, कोई किसी और के सन्दर्भ में देखने को मिलती है. इधर दिमाग में, दिल में अजब सी उठापटक मची हुई थी. इसी उठापटक में एक बहुत पुरानी घटना याद आ गई. वर्ष 2006-07 की बात होगी, ये वो समय था जबकि हम स्वयं अपनी दुर्घटना, पिताजी के देहांत के बाद की पारिवारिक स्थितियों से लड़ने में लगे थे. दुर्घटना के बाद वर्ष 2005 में ही अपने एक मित्र के सहयोग से गाँधी महाविद्यालय में मानदेय प्रवक्ता के रूप में हमारा चयन हो गया था. कहने को तो नौकरी डिग्री कॉलेज की थी मगर न तो उसमें नियमितता थी और वेतन प्रतिदिन ली गई कक्षाओं के आधार पर बनाया जाता था जो अधिकतम पाँच हजार रुपए हुआ करता था.


छोड़िए ये वेतन, धन की बातें, जो बात करने के लिए पोस्ट लिखी वो लिखते हैं. दुर्घटना के बाद कृत्रिम पैर लगने के बाद जुलाई 2006 से नियमित रूप से कॉलेज जाने का क्रम आरम्भ हुआ, उसी तरह से वेतन का निर्धारण भी हुआ. इसी में बहुत अच्छे से याद नहीं, उसी साल या फिर उसके अलग वर्ष यानि कि 2007 में हमारे एक अभिन्न मित्र, लंगोटिया यार कहना चाहिए, का घर आना हुआ. उससे पहले उसका घर आना हमारे एक्सीडेंट के समय ही हुआ था. इधर-उधर की तमाम बातों के बाद उसने कुछ पांच-छह सौ रुपयों की जरूरत बताई. हमारे पूरे परिवार की स्थिति उन दिनों ‘तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में है’ वाली हुआ करती थी, इसके बाद भी उसकी जरूरत को पूरा किया. समय के साथ ऐसी स्थिति चलती रही. यह भले नियमित न थी मगर यदा-कदा उस बचपन के मित्र का साधिकार सामने आकर अपनी जरूरत को पूरा करने की मंशा को प्रकट करना होता था.



हमें अपने सामाजिक जीवन में इस तरह के कार्यों में कभी समस्या नहीं हुई. कभी-कभी घरवालों को अम्मा को, भाइयों को समस्या होती थी, वो भी हमारी सहायता करने को लेकर नहीं वरन सबकी सहायता करने को लेकर (अब वो समस्या हमारी धर्मपत्नी को है), वो समस्या भी हमारी दुर्घटना के बाद उठे सहायता सम्बन्धी हाथों को देखने के बाद ख़त्म हो गई. फिर भटक गए मूल विषय से. समस्या होने, न होने के क्रम में आपको बताते चलें कि हमने घर में कभी इसका जिक्र नहीं किया कि कुछ आर्थिक मदद की जा रही है, यदा-कदा कभी भनक भी लगी तो इसका आभास करा दिया कि यथोचित धन वापस आ गया है. कई बार घरवालों से छिपाते हुए अपने मित्र की आर्थिक मदद बाहर से धन लेकर की गई.


एक दिन उसका घर आना हुआ. ऐसा नहीं कि वह सिर्फ कुछ पैसे लेने के लिए ही मिला करता. घर आना भी होता था, कभी कॉलेज भी मिलने आता, कभी बाजार में मिल जाता. उस दिन उसके घर आने पर उसका पूरा हावभाव बदला हुआ था. चेहरे पर हमेशा रहने वाली ख़ुशी गायब सी थी. हमारे साथ मिलने के दौरान उसकी दिखने वाली मित्रवत अकड़ जैसे किसी ने चुरा ली हो. चेहरा ऐसे लग रहा था जैसे कई दिनों से बीमार हो. हमारे हालचाल पूछते ही वो फूट-फूट कर रोने लगा. हम खुद अकबके से रह गए. समझ नहीं आ रहा था कि ये हो क्या रहा है? उसे समझाने का प्रक्रम करते मगर वह कभी हाथ पकड़ता, कभी गले लग जाता और रोना बराबर बना हुआ था. एक पल को लगा कि उसके साथ कोई दुर्घटना तो नहीं हो गई. कुछ मिनट बाद जब वो शांत हुआ, उसको पानी पिलाया और उसके रोने का कारण पूछा तो उसके जो कहा उसके बाद हमारी आँख झर-झर करके बहने लगी. अभी हम उसे शांत करवा रहे थे, अब वो हमें शांत करवाने लगा. ये तो गनीमत समझो कि हम मित्रों की संवेदना के बीच कोई और नहीं था.


उसने जो कहा वो अपने आपमें बहुत संवेदनात्मक और भावपूर्ण है, जिसे समझने वाले ही समझ सकेंगे. उसके रोने का कारण पूछने पर उसके मुँह से बस इतना निकला कि कुमारेन्द्र हमें माफ़ कर देना.  हम समझे थे कि तुम्हारी नौकरी डिग्री कॉलेज में लग गई है तो तनख्वाह पचास, साठ हजार होगी, इसलिए कभी-कभी हजार-पाँच सौ तुमसे माँग लेते थे. हमें अभी दो-चार दिन पहले मालूम चला कि तुमको पाँच हजार मिलते हैं, वे भी कुछ शर्तों के साथ. तब हमें लगा कि हम तुम्हारी मदद नहीं कर पाए इसके बाद भी तुमने अपनी इस विपत्ति में हमारी सहायता की.


मित्रवत संबंधों में जिस तरह की गालियों का आपस में आदान-प्रदान होता है, उसे यदि आप समझते हैं तो समझ लीजिये,, उस दिन सिर्फ प्रदान हुआ, आदान तो हुआ ही नहीं. समय किसी के साथ एक जैसा व्यवहार नहीं करता है. हमारे सन्दर्भ में भी एक जैसा नहीं रहा, हमारे दोस्त के सन्दर्भ में भी नहीं रहा. हाँ, मित्रता तब भी जैसी थी, आज भी वैसी है. आज भी वो गाली खाता है, आज भी वो हमें गाली देता है. आज भी वो हमसे पैसे माँगता है, आज हम भी उससे पैसे माँगते हैं. आज भी हम दोनों मिलते हैं और जब हम दोनों मिलते हैं तब वैसे ही मिलते हैं जैसे कि बचपन में मिला करते थे, बिना किसी जिम्मेवारी के, बिना किसी औपचारिकता के, बिना किसी स्वार्थ के. हाँ, गालियाँ देना बचपन से बाहर आने पर सीख लीं, वे देते ही हैं..... बिना किसी लिहाज के, हाँ... उसमें किसी की माँ-बहिन शामिल नहीं होती.... ये गालियाँ सिर्फ हमारी बनाई हैं, हम दोस्तों के लिए हैं. दोस्तों के नाम, गालियाँ आपके लिए नहीं.



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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

9 comments:

  1. बहुत ही उत्कृष्ट उदाहरण मित्रता का।
    कम से कम मित्र ने स्वीकार तो किया। वरना, लोगों को पता होता है। फिर भी मांगते हैं और वापसी का नाम भी नहीं लेते।

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  3. मित्रता के ऊपर बहुत ही भावुक एवं मार्मिक अभिव्यक्ति

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  4. Adbhut bhaisab apke ek ek sabd dil me utar gye

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  5. मित्रता होनी ही ऐसी चाहिए जहाँ औपचारिकता न हो। बेझिझक कुछ भी बोल सकें। आपकी मित्रता को मुबारकबाद।

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