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09 अप्रैल 2026

वित्तीय वर्ष 2025-26 में श्वेतवर्णा से प्रकाशित पुस्तकों पर रॉयल्टी

वित्तीय वर्ष 2025-26 में श्वेतवर्णा से प्रकाशित पुस्तकों में से सात पुस्तकों पर रॉयल्टी



शारदा जी से पहली मुलाकात हुई थी हमारे ही जनपद के कोंच में एक साहित्यिक कार्यक्रम में. परिचय इस मुलाकात से भी पुराना था और ये दोनों बातें ही श्वेतवर्णा के जन्म लेने से भी बहुत पुरानी थीं.


बहरहाल, श्वेतवर्णा का अस्तित्व में आना हुआ और हम जैसे स्वान्तः सुखाय लेखकों को भी जीवन मिला. अपने छपास रोग के आरम्भिक दिनों में कुछ पुस्तकों का प्रकाशन स्वयं ही करवाया. इसके बाद एक-दो पुस्तकों का प्रकाशन हुआ अपने मित्रों के सहयोग से. उसी समय शारदा जी ने श्वेतवर्णा की जानकारी दी. इसके बाद तपती दुपहरी की शाम के साथ पुराने परिचय-सम्बन्ध-विश्वास ने ऐसा रंग जमाया कि अपनी पुस्तकों का कहीं और से प्रकाशन का सोच भी नहीं सके. जिस विश्वास से हमने पुस्तकों का प्रकाशन जारी रखा, उसी अधिकार से एक बार शारदा जी ने धमकी भी दे डाली थी कि हमने कहीं और से पुस्तकें प्रकाशित करवाईं तो अच्छा नहीं होगा.


आज उसी विश्वास-अपनत्व ने सुखद एहसास करवाया. इस वित्तीय वर्ष 2025-26 में श्वेतवर्णा से प्रकाशित पुस्तकों में से सात पुस्तकों पर रॉयल्टी भी प्राप्त हुई है. यह सुखद एहसास विगत कई वर्षों में पहली बार मिला है. इसमें हमारी एकल लेखन वाली पुस्तकें तो हैं ही, इसके साथ ही देवेन्द्र सिंह जी की पुस्तक और ऋचा सिंह राठौर के साथ लिखी गईं पुस्तकें भी शामिल हैं. (हालाँकि इन लोगों के साथ वाली पुस्तकों की रॉयल्टी हम ही डकार जायेंगे)


संलग्न चित्र में बाकी विवरण इसीलिए छिपा दिया है ताकि कुछ लोग जलन महसूस न करने लगें. विवरण के लिए ऐसे लोग आकुल-व्याकुल न हों. ये विवरण हमारी थाती है, हमारे-शारदा जी के-श्वेतवर्णा के आपसी विश्वास, अपनत्व-अधिकार का परिचायक है.




20 दिसंबर 2025

ज़िन्दगी जिन्दाबाद का घोष जल्द ही आपके साथ होगा

वर्ष 2025 भी जाने की तैयारी कर रहा है. जितने दिन इस अंतिम महीने में निकल गए हैं, अब उतने दिन भी शेष नहीं बचे हैं. समय की गति के अनुसार आना और जाना लगा ही रहना है. कल को इसी वर्ष का स्वागत किया था, अब इसी को विदा करने का समय आ गया है. कुछ ऐसा ही आने वाले वर्ष 2026 के साथ भी होगा. इन आते-जाते वर्षों के स्वागत और विदाई के बीच याद बस यही रह जाता है कि उस एक वर्ष में हम सबने क्या किया? क्या पाया, क्या खोया? क्या सुखद रहा, क्या दुखद रहा?


आप सभी सुधिजनों को याद होगा कि वर्ष 2019 में आत्मकथा ‘कुछ सच्ची कुछ झूठी आपके बीच हमारी बातों को लेकर उपस्थित हुई थी. उसी समय हमारे शुभेच्छुजनों ने प्रेरित किया था कि वर्ष 2005 में हुई दुर्घटना के बाद की अपनी जीवन-यात्रा को भी एकसूत्र में पिरोकर प्रकाशित करवाया जाये. विचार तो था कि वर्ष 2020 में इसे भी ‘ज़िन्दगी जिन्दाबाद के रूप में प्रकाशित करवाया जायेगा. अक्सर ऐसा होता है कि सोचा कुछ जाता है और हो कुछ जाता है, हमारे साथ भी यही हुआ. ज़िन्दगी जिन्दाबाद का घोष करने बैठे तो हाथों ने काँपना शुरू कर दिया, आँखों ने नम होना शुरू कर दिया, दर्द ने अपना अलग रूप दिखाना शुरू कर दिया. इन सबके बीच कुछ दुखद घटनाओं ने हिला दिया और ज़िन्दगी जिन्दाबाद को बीच में रोक देना पड़ा. यद्यपि समय के दिए गए आघातों से उबरते हुए ज़िन्दगी जिन्दाबाद को ब्लॉग पर कहानी के रूप में लिखते रहे.

 



इसी लेखन को एडिट करके, पुस्तक के रूप में संयोजित करके इस जाते हुए वर्ष 2025 में आप सबके बीच लाने का मन बना लिया है. जल्दी ही ‘ज़िन्दगी जिन्दाबाद को आप सब अपने बीच पाएँगे. ‘कुछ सच्ची कुछ झूठी की तरह आप सबका स्नेह ‘ज़िन्दगी जिन्दाबाद को भी मिलेगा, ऐसा विश्वास है.


17 सितंबर 2025

हमारा लेखन और बाबा जी की सीख

 कुछ सीखें, बातें ज़िन्दगी भर काम आती हैं. ऐसा कुछ है हमारे साथ बाबा जी की बातों को लेकर. उनका अपने साथ सुबह की सैर पर हम तीनों भाइयों को ले जाना और पूरे रास्ते किसी न किसी कहानी, किसी न किसी दृष्टान्त के माध्यम से जीवन की सच्चाई को समझाना, जीवन में आने वाली समस्याओं से निपटने की सलाह देना. 


अपने बाबा जी के साथ अक्सर अपने लेखन सम्बन्धी चर्चा कर लिया करते थे. बचपने का अपरिपक्व लेखन बाबा जी की अनुभवी आँखों के सामने से गुजरता रहता, इसी कारण वे लेखन की गम्भीरता को देख भी रहे थे. सुबह की अपनी यात्रा के दौरान एक दिन बाबा जी ने हमारे लिखे किसी लेख की चर्चा करते हुए उस लेख के एकदम विपरीत बिन्दुओं पर विमर्श शुरू किया. बाबा जी के कुछ प्रश्नों का उत्तर तो हम दे सके, कुछ में अटक गए. ऐसे में बाबा जी ने हमारे लेख की प्रशंसा करते हुए कहा कि तुम लिखने लगे हो, ऐसे में किसी भी मुद्दे को, विषय को दोनों पक्षों की तरफ से देखो. जरूरी नहीं कि दोनों पक्षों को शामिल करते हुए लिखा जाये मगर दिमाग में दोनों पक्ष रहने चाहिए. 


इसके अलावा और भी बहुत सी बातें बाबा जी द्वारा लेखन के सम्बन्ध में बताई गईं, जो आज भी हमारे लिए मार्गदर्शन का काम करती हैं. बचपने से पड़ी लेखन की आदत आज भी बनी हुई है, बाबा जी द्वारा दोनों पक्षों को विचार करने की बात आज भी कंठस्थ है और इसी का परिणाम है कि किसी भी मुद्दे पर, किसी भी विषय पर बाल की खाल निकालने की हद तक चले जाते हैं. 


आज हमारे बाबा जी की पुण्यतिथि है. उनको सादर चरण स्पर्श... सादर श्रद्धांजलि. 




01 मई 2025

ब्लॉग यात्रा के सत्रह वर्ष

कम्प्यूटर से परिचय होने के क्रम में ही इंटरनेट से भी परिचय हुआ था. कम्प्यूटर से परिचय बहुत पहले हो चूका था किन्तु इंटरनेट से मित्रता होने में समय लगा. वर्ष 2008 में घर पर इंटरनेट नेटवर्क के आने के बाद उससे मित्रता बढ़ी. दोनों से बहुत देर बाद मुलाकात हुई मगर उस मुलाकात ने भी प्रोत्साहित किया. लेखन को वैश्विक आयाम देने का विचार मन में आने लगा. काफी जद्दोजहद के बाद अंततः ‘मुफ्त का चन्दन, घिस मेरे नंदन’ को चरितार्थ किया. एक ब्लॉग बनाने की मंशा को पूरा करने के चक्कर में कई सारे ब्लॉग बना गए मगर हर तरफ से जाँच-परख कर, जानकारी लेने-देने के बाद एक ब्लॉग पर जुट गए. वर्ष 2008 में अप्रैल के अंतिम दिनों में ब्लॉग बनाये जाने की कवायद शुरू हुई थी. घबराहट ऐसी थी ब्लॉग बनाये जाने के बाद भी उसी दिन कुछ भी पोस्ट नहीं किया था. दो-तीन दिन निकल जाने के बाद चार मई को पहली पोस्ट इसी ब्लॉग पर लिखी गई.

 



ब्लॉगिंग की सत्रह वर्षीय यात्रा पूरी होने पर पीछे पलट कर देखते हैं तो अपनी ब्लॉग लेखन की यात्रा में अनेक ब्लॉग अलग-अलग विषयों पर बनाये जाते रहे. अनेक सामूहिक ब्लॉग से जुड़ना होता रहा. अनेक वेबसाइट पर लिखना हुआ. बहुत से दोस्तों के, परिचितों के, अपरिचितों के ब्लॉग बनाये, बनवाए जाते रहे. ब्लॉग की लोकप्रियता के दौर में बहुत से मित्रों से संपर्क हुआ. अनेक मित्रों से घनिष्ठ सम्बन्ध बने. वैचारिक आदान-प्रदान होता रहा. मिलना जुलना होता रहा. लग रहा था जैसे कि ब्लॉग संसार ने एक अलग तरह की ही दुनिया का निर्माण कर दिया है. ब्लॉग संसार के मित्रों की तरफ से सुझाव दिए गए ब्लॉग के द्वारा धनोपार्जन की. इस तरफ प्रयास किया गया मगर मन न लगा क्योंकि तकनीकी रूप से जितनी साक्षरता उसके लिए चाहिए थी, उतनी हममें दिखाई न दी. सच तो ये है कि तकनीकी से निकटता बनाये रखने के बाद भी इस मामले में हम अशिक्षित ही रह गए. बहरहाल, लेखन में एक लम्बा समय व्यतीत करने के बाद भी साहित्यिक क्षेत्र में, लेखन के क्षेत्र में किसी तरह की स्थापना न होने का एहसास होता है.

 

लेखन क्षेत्र में यह भी एक तरह की मजदूरी सी है. श्रम किये जा रहे हैं और उसका क्या परिणाम निकलेगा इसे उस लेखन का उपयोग करने वालों पर छोड़ दिया है. इन सत्रह वर्षों की यात्रा में हजारों पोस्ट लिखी गईं. इसी ब्लॉग पर 2500 से अधिक पोस्ट हो गईं हैं. अभी संख्याबल की तरफ ध्यान जाते ही गौर किया तो जानकारी हुई कि अभी कुछ दिन पहले ही इस ब्लॉग पर हमने अपनी 2500वीं पोस्ट लिखी थी.


2500वीं पोस्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें.

30 मार्च 2025

राष्ट्रीय पेन्सिल दिवस

इसे संयोग ही कहा जाएगा. आज रविवार अवकाश के चलते बहुत दिनों से इधर-उधर बिखरे पड़े पेन-पेन्सिल को इकठ्ठा, साफ़-सफाई के कार्यक्रम में लगे थे. सोच भी रहे थे कि आज एक पोस्ट लगाईं जाये फाउंटेन पेन पर.

 

अभी देखा तो जानकारी हुई कि आज, 30 मार्च को राष्ट्रीय पेन्सिल दिवस है. बस, इस अवसर पर अपनी ही कुछ पेंसिलों के साथ....

 

(पेन की तरह पेंसिलों के शौक ने बहुत सारी पेन्सिल भी इकठ्ठा करवा रखी हैं. जो खजाने में बंद हैं, उन पेंसिलों से परिचय फिर किसी दिन...)




26 जनवरी 2024

हमारी शान, हमारी ताकत, हमारा गर्व : हमारा प्यारा तिरंगा


तिरंगा हम सबकी शान है. उन्मुक्त गगन में लहराते तिरंगे को नमन करने के साथ ही याद आया अपना लेखकीय तिरंगा. ये वो तिरंगा है जो हमें ताकत देता है, सच कहने की, असत्य के खिलाफ लिखने की, अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने की. 

इस तिरंगे को भी नमन. 

हमारी शान, हमारी ताकत, हमारा गर्व
हमारा प्यारा तिरंगा.... 
❤ ❤ ❤
26 जनवरी 2024


04 मई 2023

ब्लॉगिंग के पंद्रह वर्ष

आज इस ब्लॉग के पंद्रह वर्ष हो गए. इस ब्लॉग के क्या, ब्लॉगिंग करते हुए ही पंद्रह वर्ष बीत गए. इन पंद्रह वर्षों में जीवन के उतार-चढ़ाव तो देखे ही, ब्लॉगिंग जगत के भी जबरदस्त उतार-चढ़ाव देखे. बहुत से मित्रों ने माइक्रो-ब्लॉगिंग के नाम से चलने वाले मंचों पर अपनी उपस्थिति बना ली, कुछ मित्र अभी भी यहीं सक्रिय हैं. हमने भी अपनी सक्रियता यहाँ बनाये रखी, उसका कारण ये रहा कि विगत कुछ समय से माइक्रो-ब्लॉगिंग के तमाम मंचों पर संवाद की स्थिति, विमर्श की स्थिति में जबरदस्त गिरावट आई है. यदि नाम लेकर कहा जाये तो फेसबुक पर, ट्विटर पर अब उस तरह की सामग्री, उस तरह का विमर्श देखने को नहीं मिलता है, जैसा कि कभी हुआ करता था.




इंटरनेट की दुनिया में जब ऑरकुट, फेसबुक आदि का चलन बढ़ा तो इस तरफ भी हाथ आजमाए. जैसा अनुभव ब्लॉगिंग के आरंभिक दिनों में मिला था, वैसा ही अनुभव यहाँ भी हुआ. खैर अभी बात ब्लॉगिंग की, जहाँ एक तरफ हम आज भी सीखने की अवस्था में हैं, वहीं हमारी सक्रियता देखते हुए बहुत से लोग उसी आरंभिक दौर में हमसे सीखने के लिए प्रयासरत थे. जितना संभव हुआ करता, हम सीखते और उनको भी सिखाते. ये बात है सन 2008 के बाद की. उस समय ब्लॉगिंग पर बहुत सारे सामूहिक ब्लॉग हुआ करते थे. खुद को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने की लालसा में बहुत सारे सामूहिक ब्लॉग से जुड़ना भी हुआ. इसी क्रम में बहुत से अच्छे लोगों से जुड़ना हुआ तो बहुत से बुरे लोग भी जुड़े. बहुत से लोग ऐसे भी जुड़े जो किसी भी समय मदद करने को, ब्लॉग सम्बन्धी समस्या का समाधान करने को तत्पर रहते. इसी तरह कुछ लोग ऐसे जुड़े, जिनकी मानसिकता में कुछ लोगों के ब्लॉग की रेटिंग को कम करवाना, उस पर पाठकों का कम से कम पहुँचना हो, ये काम होता था. बावजूद इसके भी ब्लॉगिंग की दुनिया से बहुत कुछ सकारात्मक सीखने को मिला.


शुरू के कुछ साल ब्लॉग के माध्यम से वाकई ज्ञानार्जन के रूप में गुजरे. कालांतर में एक ऐसा राजनैतिक दौर आया जिसने बहुत कुछ बदल दिया. उसी राजनैतिक बदलाव ने लोगों की विचारधारा को सामने ला दिया. लम्बे समय से चले आ रहे राजनैतिक और ऐतिहासिक विभ्रम से पर्दा हटा तो वर्षों के ब्लॉगिंग मित्र नाराज हो गए. ब्लॉगिंग के माध्यम से माइक्रो-ब्लॉगिंग में आये ऐसे मित्रों ने ब्लॉग की जगह ब्लॉक करना शुरू कर दिया.


बहरहाल, आज पंद्रह साल बाद भी ब्लॉगिंग पहले की तरह नियमित है. न केवल हम ब्लॉगिंग कर रहे हैं बल्कि नए लोगों को भी इसके लिए प्रेरित कर रहे हैं. ये दुनिया कब तक रहेगी पता नहीं मगर जब तक रहेगी हम ब्लॉगिंग करते रहेंगे, ब्लॉग-पोस्ट लिखते रहेंगे. 








 

04 नवंबर 2022

फाउंटेन पेन आज भी है लेखकों की पसंद

फाउंटेन पेन एक ऐसा उपकरण होता है, जिसके माध्यम से लेखन कार्य किया जाता है. एक निब की सहायता से इसका उपयोग स्याही को कागज़ पर उतार कर लिखा जाता है. आज बहुतायत में लोग इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपयोग लिखने के लिए करने लगे हैं फिर भी बहुत सारे लोग लिखने के लिए पेन का उपयोग करते हैं. मूल रूप से दो तरह के पेन उपयोग में लाए जा रहे हैं. इनमें एक बॉलपेन और दूसरा फाउंटेन पेन है. फाउंटेन पेन का उपयोग अब कम ही दिखता है. इसके अलावा वर्तमान में बच्चों द्वारा लिखने के लिए पेन्सिल का उपयोग किया जाता है. फाउंटेन पेन में उस पेन में बनी टंकी के अंदर भरी स्याही को निब की सहायता से कागज़ पर चलाया जाता है. निब और जीबी की सहायता से कागज पर उतरी स्याही कागज पर चिपक जाती है. इसी तरह से अक्षरों का लिखना होता रहता है.  


पूर्व में जबकि पेन का अविष्कार न हुआ था तब पक्षियों के पंखों से, हड्डियों से बने पेन की सहायता से, पत्थर को नुकीला बनाकर लेखन कार्य हुआ करता था. कालांतर में इसका विकास हुआ, जिसके चलते पेंसिल और फाउंटेन पेन का आविष्कार हुआ. फाउंटेन पेन का अविष्कार होने का लाभ ये हुआ कि अब पेन को बार-बार स्याही में डुबोने की आवश्कता नहीं होती थी. इससे पहले जिस तरह के उपकरण लेखन हेतु उपयोग में लाये जा रहे थे, वे चाहे हड्डियों से बने हों, पक्षियों के पंखों के बने रहे हों या फिर पत्थर से निर्मित हों सभी को बार-बार स्याही में डुबोना पड़ता था.




आज हम लोग जिस तरह के फाउंटेन पेन को देख रहे हैं, उसका स्वरूप बाँस के माध्यम से बनाया गया था. पहले पेन बनाने के लिए इसका उपयोग किया गया था. बाँस को काटकर एक शार्प निब वाला पेन तैयार किया गया, जिसे इंक बुश के नाम से जाना जाता था. यह पेन अन्य पेन के मुकाबले में बहुत बड़ा होता था. इंक बुश पेन आगे से पतला और पीछे से मोटा होता था. इसका पीछे वाला हिस्सा खोखला होता था, जिसमें स्याही भरी जाती थी. इसी के बाद ही फाउंटेन पेन अस्तित्व में आये. ऐसा माना जाता है कि पेन का सर्वप्रथम आविष्कार इराक में हुआ था. यह एक नुकीली धातु के द्वारा बनाया गया था. यदि पहले रीड पेन की बात की जाये तो उसका आविष्कार मिस्त्र में हुआ था. ऐसा कहा जाता है कि फाउंटेन पेन का आविष्कार भी मिस्त्र में हुआ था.


फाउंटेन पेन का अविष्कार फ्रेंच के वैज्ञानिक पेट्राचे पोएनरु और रॉबर्ट विलियम थॉमसन ने किया. उन्होंने 25 मई 1857 को इसका आविष्कार किया था. यदि ऐतिहासिक रूप में देखा जाये तो भारत में हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के लोगों को सबसे पहले पेन के आविष्कार का श्रेय दिया जाता है. मोहनजोदड़ो शहर से कई ऐसे लेखयुक्त मोहरें प्राप्त हुईं हैं जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि भारत में पेन का आविष्कार मोहनजोदड़ो काल में हुआ था. फाउंटेन पेन के आविष्कार से ही बॉलपेन के आविष्कार का रास्ता खुला. बॉलपेन का आविष्कार इस क्षेत्र में क्रांति माना जाता है. बॉलपेन का आविष्कार जॉन जैकब लाउड और लासलो बीरो ने किया.


जब फाउंटेन पेन बना था तो इसकी खूब बिक्री हुई. कालांतर में जब साठ के दशक में बॉलपेन की तकनीक आयी तो लोगों द्वारा इसे हाथों-हाथ लिया गया. फाउंटेन पेन का उपयोग आज भले कम हो रहा हो किन्तु वह पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुआ है. आज भी ज्यादातर लेखक फाउंटेन पेन का उपयोग करते हैं. सुलेखन के लिए लोग आज भी फाउंटेन पेन को ही महत्त्व देते हैं.


(फाउंटेन पेन दिवस, 04 नवम्बर पर विशेष)





 

23 अप्रैल 2022

लिखने-पढ़ने से हो रही ऊबन

अक्सर ऐसा होता है कि पढ़ने-लिखने का मन नहीं करता है. बचपन से ही पढ़ने-लिखने का शौक तो रहा ही, एक आदत सी बनी हुई है. दिन भर चाहे जैसी व्यस्तता रही हो मगर रात को सोने के पहले किसी न किसी किताब के कुछ पन्नों को पढ़े बिना चैन नहीं मिलता है. कुछ ऐसा हाल लिखने को लेकर है. आज जबकि बहुतायत में लेखन कार्य लैपटॉप पर ही होता है फिर भी कुछ पेज अपने हाथों से फाउंटेन पेन के द्वारा रंगे ही जाते हैं. ऐसी आदत या कहें कि शौक होने के बाद भी विगत कुछ समय से पढ़ने-लिखने से एक तरह की वितृष्णा सी होने लगी है. इसका कारण बहुत खोजने के बाद भी समझ नहीं आ रहा है. जो थोड़ा-बहुत समझ में आया, उसके बाद तो यही समझ आया कि ज़िन्दगी तो पहले से ही जबरदस्त अनिश्चय भरी हुई थी, ऐसे में कोरोना के आने ने और भी उथल-पुथल मचा दी. इसके चलते किसी भी काम को बहुत अधिक मन से करने का, बहुत अधिक उत्साह से करने का मन नहीं करता है. ऐसा ही कुछ लिखने-पढ़ने को लेकर भी हुआ है.


वैसे देखा जाये तो जिस तरह की सामाजिक गति बनी हुई है, उसे देखते हुए लगता भी है कि कोई फायदा नहीं किसी तरह से कुछ लिखने-पढ़ने का. समाज का एक-एक आदमी अपनी चाल चलने में लगा हुआ है, अपने में मगन बना हुआ है. बहुतों को तो समाज की समस्याओं से, लोगों की परेशानियों से कोई मतलब नहीं. लगभग सभी लोग किसी न किसी दायरे में सिमटे हुए हैं. सभी लोग किसी न किसी खाँचे में फिट हैं. ऐसे में उनके लिए अपने दायरे, अपने खाँचे अधिक महत्त्वपूर्ण हैं. वे न तो उससे बाहर आना चाह रहे हैं और न ही उसके बाहर देखना चाह रहे हैं. ऐसे लोगों के कारण सामाजिक गतिशीलता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. यही प्रभाव अन्य लोगों को भी नकारात्मकता की तरफ ले जाता है. कोरोना के समय ऐसी ही नकारात्मकता बहुत तेजी से सबके बीच फैली थी. संभव है उसी नकारात्मकता ने हमारे दिल-दिमाग पर भी अपना असर छोड़ा हो.


फ़िलहाल तो यह एक आशंका है, इस पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है. जल्द ही लिखने-पढ़ने से होने वाली ऊबन को दूर करने की कोशिश की जाएगी. यद्यपि लिखना-पढ़ना आज, अभी भी बना हुआ है मगर जिस तेजी से, जिस नियमितता से यह पहले थी, वैसे नहीं है. खैर, जल्द ही सब सही होगा.


18 मार्च 2022

ऑनलाइन लेखन को प्रभावी बनायें

किसी कंप्यूटर, स्मार्टफ़ोन अथवा किसी भी तरह के डिजिटल डिवाइस पर पढ़ी जाने वाली किसी भी सामग्री को ऑनलाइन लेखन के रूप में परिभाषित किया जाता है. इसे सामान्य रूप में डिजिटल लेखन भी कहा जाता है. ऑनलाइन लेखन अनेक रूपों में हमारे बीच उपस्थित रहता है. किसी भी डिजिटल उपकरण के द्वारा पढ़े-लिखे-देखे जाने वाले संदेशों, टेक्स्ट मैसेज, ईमेल, ब्लॉगिंग, ट्वीट या फिर सोशल मीडिया के अन्य सहायक माध्यम जैसे फेसबुक, व्हाट्सएप आदि पर लिखना या वहाँ पर टिप्पणियाँ करना भी ऑनलाइन लेखन के रूप में जाना जाता है. किसी भी प्रकाशित सामग्री को कागज़ पर पत्रिका, पुस्तक के रूप में पढ़ना और किसी सामग्री को स्क्रीन पर पढ़ने में अंतर होता है. ऑनलाइन पाठक बहुत ज्यादा सामग्री को या कहें कि विस्तार से लिखे गए विषय को पढ़ने के कम इच्छुक रहते हैं. इसी कारण से वे पढ़ते समय जल्द से जल्द पेज को आगे बढ़ाने में विश्वास रखते हैं. ऐसी स्थिति में ऑनलाइन लेखन करने के भी अपने तरीके हैं, अपनी विधियाँ हैं, ऑनलाइन लेखन करने वाले को इसका ध्यान रखना आना चाहिए. 


ऑनलाइन लेखन किसी भी रूप में कठिन विधा नहीं है. सामान्य रूप में हम सभी किसी न किसी रूप में ऑनलाइन लेखन करते ही हैं. किसी को मेल करना, सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर किसी पोस्ट को लिखना या फिर किसी पोस्ट पर कमेंट करना भी ऑनलाइन लेखन के अंतर्गत आता है. यहाँ सामान्य रूप में कुछ बिंदु हैं, जिनका ध्यान ऑनलाइन लेखन के दौरान रखा जाना चाहिए. इन्हीं के सतत अभ्यास से ऑनलाइन लेखन को प्रभावी बनाया जा सकता है.




शीर्षक को रोचक बनाना – ऑनलाइन लेखन में एक पल को सोशल मीडिया में किसी पोस्ट पर की जाने वाली टिप्पणी को छोड़ दें तो ऑनलाइन लेखन का अपना ही महत्त्व है. ऐसे में किसी भी सामग्री के लिए पाठकों की अधिकाधिक उपस्थिति सम्बंधित पोस्ट के शीर्षक को प्रभावी बनाकर संभव है. यदि किसी सामग्री का शीर्षक प्रभावी और रोचक है तो पाठक स्वतः उस सामग्री की तरफ आकर्षित होता है.

 

सामग्री के संक्षेपण से आरम्भ – ऑनलाइन पाठन में एक बहुत बड़ी समस्या किसी भी पाठक द्वारा समय की उपलब्धता है. बहुतायत में देखने में आता है कि ऑनलाइन पाठक कम से कम समय में अधिक से अधिक सामग्री को पढ़ लेना चाहता है. ऐसे में वह किसी भी सामग्री को पूरा पढ़ने के बजाय उसके संक्षेपण या कहें कि उसके सारांश को पढ़ना पसंद करता है. यदि किसी पाठ्य-सामग्री का आरम्भ उसके सारांश से किया जाये तो संभव है कि अपनी मनपसंद सागरी देखकर पाठक उसे पूरा पढ़ने के प्रति आकर्षित हो. यहाँ यह ध्यान रखना बहुत आवश्यक है कि सारांश पूरी तरह से ऑनलाइन सामग्री से सम्बंधित-संदर्भित हो. यदि ऐसा नहीं होता है तो पाठक अपने आपको ठगा हुआ महसूस करता है. ऐसी स्थिति में सम्बंधित ऑनलाइन मंच पर पाठकों का ट्रैफिक कम होता जाता है.

 

सामग्री को उप-शीर्षकों (हेडिंग) में विभक्त करना – यदि पाठ्य-सामग्री बहुत विस्तार लिए है तो बेहतर है कि सम्पूर्ण सामग्री को कई उप-शीर्षकों में बाँट दिया जाये. इससे पढ़ने वाले व्यक्ति को अपने मनपसंद हेन्डिंग के द्वारा सामग्री को खोजना, पढ़ना सहज हो सकेगा. इस तरह से सामग्री भी अलग-अलग स्पष्ट रूप में समझ आने लगती है.

 

सामग्री सहज ग्राह्य हो – ऑनलाइन लेखन में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि यहाँ पर सिर्फ टेक्स्ट लिखने भर से ही काम नहीं बनता है. ऑनलाइन लेखक द्वारा बहुधा अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए, उसे और प्रमाणिक बनाने के लिए, पाठकों तक सहज पहुँच बनाने के लिए सामग्री में टेक्स्ट के साथ-साथ चित्रों का, वीडियो का उपयोग भी किया जाता है. ऐसी स्थिति में लेखक को ध्यान रखना चाहिए कि टेक्स्ट सामग्री का अन्य सामग्री के साथ इस तरह का समन्वय हो कि वह पाठकों को सहज रूप में स्वीकार हो, समझ आये. यदि टेक्स्ट में अथवा अन्य सामग्री में किसी तरह के विरोधभास की स्थिति बनती है या फिर किसी सामग्री के द्वारा भड़काने वाली, अश्लीलता जैसी स्थिति बनती है तो वह भी सार्थक ऑनलाइन लेखन नहीं कहा जाता है.

 

क्लिष्ट शब्दों के प्रयोग से बचना चाहिए - लेख को लिखते समय यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि उसमें प्रयुक्त शब्द सामान्य बोलचाल के हों. अनावश्यक रूप से कठिन, क्लिष्ट, भारी-भरकम शब्दों के प्रयोग से बचा जाना चाहिए. यदि लेख में सामान्य शब्द, सरल शब्द का प्रयोग किया जायेगा तो पाठकों के लिए सामग्री को और उसमें दी गई जानकारी को समझना आसान होता है. ऐसा होने से पाठकों में सम्बंधित साईट के प्रति और सामग्री के प्रति रुचि बढ़ती है.

 

की-वर्ड का उपयोग किया जाना चाहिए – ऑनलाइन लेखन, पाठन में की-वर्ड किसी भी पाठ्य-सामग्री का मुख्य तत्त्व कहा जा सकता है. ऑनलाइन सर्च इंजन में इन्हीं की-वर्ड्स के द्वारा सामग्री को खोजना सरल होता है. बहुत सारे लेखकों के साथ यह समस्या होती है कि उनके द्वारा अत्यंत महत्त्वपूर्ण सामग्री को ऑनलाइन लिखा गया होता है, उनके द्वारा सार्थक पोस्ट की गई होती है मगर वह सामग्री उपयुक्त की-वर्ड्स के अभाव में पाठकों के सामने नहीं आ पाती है. इसके लिए लेखकों को ध्यान रखना चाहिए कि वे की-वर्ड्स के रूप में सम्बंधित लेख से जुड़े शब्दों का ही चयन करें. उसमें दी गई सामग्री किन-किन बिन्दुओं पर केन्द्रित है, उसी को अपने की-वर्ड्स में शामिल किया जाना चाहिए.

 

सामग्री में विषय से सम्बंधित लिंक भी देनी चाहिए – यह एक स्वाभाविक सी स्थिति होती है कि जब कोई लेखक किसी लेख को लिखता है तो वह उसमें अनेक सन्दर्भों का उपयोग भी करता है. कई बार वह अपनी बात को प्रमाणिक बनाने के लिए भी, अपनी बात में तर्क प्रस्तुत करने के लिए भी अन्य पाठ्य-सामग्री का सहारा लेता है. ऑनलाइन लेखन में यह सुविधा रहती है कि लेखक अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए उपयोग की जाने वाली लिंक का, सम्बंधित पाठ्य-सामग्री का हवाला दे सकता है. इसके लिए सम्बंधित बिन्दुओं पर, सम्बंधित जानकारी पर उस लिंक को लगाया जा सकता है, जहाँ से वह सामग्री ली गई है या फिर जहाँ से अपनी बात को कहने के लिए लेखक द्वारा तथ्य लिए गए हैं. इस तरह लिंक दिए जाने से पाठक सीधे तौर पर उस वेबसाइट पर अथवा सम्बंधित मंच आर जाकर विस्तृत रूप में सामग्री को देख-पढ़ सकता है. ऑनलाइन लेखन में अपने लेख में बीच-बीच में महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं, जानकारी पर लिंक का लगाया जाना सम्बंधित लेख को और अधिक प्रभावी बनाता है.

 

देखा जाये तो ऑनलाइन लेखन ऑफलाइन लेखन के मुकाबले बहुत सहज और आसान हो गया है. इसके लिए उक्त कुछ बिन्दुओं को ध्यान में रखते हुए अभ्यास किया जाये, लेखन किया जाये तो समय के साथ ऑनलाइन लेखन में परिपक्वता आती है, सामग्री में भी गाम्भीर्य आता है.

 

 

 


08 जनवरी 2021

ऐतिहासिक निकली हरे रंग की स्याही

कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के अंदर कोई न कोई प्रतिभा होती है, उसे कोई न कोई शौक भी होता है। ये बात और है कि बहुत से लोगों को प्रतिभा निखारने का, उसे दिखाने का अवसर नहीं मिल पाता, इसी तरह बहुत से लोग किसी न किसी कारण से अपने शौक भी पूरे नहीं कर पाते। ऐसी स्थितियों के लिए आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक आदि पक्ष भी जिम्मेवार होते हैं। इसके साथ-साथ व्यक्ति किस स्थान, किस शहर, किस परिस्थिति में रह रहा है, यह भी शौक एवं प्रतिभा के संदर्भ में महती भूमिका निभाते हैं। 

बचपन से ही फाउण्टेन पेन से लिखने की आदत बनी और कालांतर में यही आदत शौक के रूप में भी विकसित हो गई। आज भी मोबाइल, कम्प्यूटर के दौर में प्रतिदिन फाउण्टेन पेन से लिखना होता है। लिखने के शौक के साथ-साथ अलग-अलग रंग की स्याही का इस्तेमाल करना भी शौक जैसा ही है। लिखने के साथ-साथ फाउण्टेन पेन का प्रयोग स्केचिंग के काम में, कैलीग्राफ़ी में भी कर लिया जाता है। ऐसे में भी अलग-अलग रंग की स्याही की आवश्यकता होती है। 

ऐसे दौर में जबकि पेन का, विशेष रूप से फाउण्टेन पेन का इस्तेमाल कम से कम किया जा रहा हो, उरई जैसी छोटी जगह पर तो यह कमी और भी महसूस की जाती है। इस कमी के बीच फाउण्टेन पेन की स्याही की माँग करना एक तरह की ज्यादती ही कही जाएगी। काली, नीली स्याही की उपलब्धता तो फिर भी हो जाती है पर लाल, हरी स्याही की माँग करना आसमान के तारे माँगने जैसा हो जाता है। इसमें भी हरे रंग की स्याही तो उरई में नामुमकिन स्थिति को प्राप्त कर जाती है। कोरोनाकाल और लाॅकडाउन जैसी परिस्थिति के पहले तो उरई से बाहर कहीं बड़े शहर जाने पर स्याही ले आया करते थे। इस बार न हमारा जाना हो सका और अन्य किसी की सुलभता, सहजता न होने के कारण भी हरे रंग की स्याही उपलब्ध न हो सकी।



इधर हरे रंग की स्याही लगभग समाप्ति पर थी। पिछले दो महीने से उरई की दुकानों के चक्कर लगाए जा रहे थे पर हरी स्याही की उपलब्धता नहीं हो पा रही थी। बिक्री न होने के कारण दुकानदारों की अपनी मजबूरी थी। काफी भागदौड़ और लगभग रोज की पूछताछ के बाद आज अंततः एक दुकान से दो शीशियाँ प्राप्त हो ही गईं। यद्यपि दोनों शीशियों से कुछ स्याही बह भी चुकी है तथापि हाल-फिलहाल लिखने का, स्केचिंग का, कैलीग्राफ़ी का काम बाधित न होगा। समाप्ति की ओर बढ़ती जा रही हरी स्याही के कारण इन कामों को हरे रंग से करना रोकना, कम करना पड़ा था। 

आज हरी स्याही का मिलना खुशी दे गया तो उनकी पैकिंग तिथि ने आश्चर्यचकित कर दिया। मई 1997 की पैक ही हुई स्याही को सही ठिकाना मिला जनवरी 2021 में। इस स्याही को धैर्य के साथ इस्तेमाल किया जाएगा और सुरक्षित रख लिया जाएगा क्योंकि एक तरह से ये ऐतिहासिक हरी स्याही हो गई। हरी स्याही मिलने के बाद भी हरी स्याही की खोज जारी रहेगी। वैसे जल्द ही कहीं न कहीं सैर को निकला जाएगा और बोरा भरकर हरी स्याही खरीद ली जाएगी। 



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वंदेमातरम्

02 जनवरी 2021

सपनीली राह पर हकीकत के कदम

कोरोनाकाल का संकट झेलते-देखते हुए आखिरकार लोगों के सामने नया साल 2021 आ ही गया. वैसे भी उसे अपने समय से आना ही था मगर जिस तरह से लोगों में कोरोना का भय पैदा किया गया, मौत के आँकड़ों के सहारे जिस तरह से लोगों के बीच डर का माहौल बनाया गया उसके बाद से लोग जल्द से जल्द वर्ष 2020 के जाने की बात करने लगे. यह समय के हाथों में ही रहता है अन्यथा लोग मई-जून में ही वर्ष 2020 को समाप्त करवा कर वर्ष 2021 को ला देते. इस आये हुए नए साल में क्या-क्या सुखद छिपा है, क्या-क्या दुखद छिपा है यह तो तभी मालूम चल सकेगा जबकि यह साल अपने परदे हटाएगा मगर फिलहाल उसकी आहट सुखद खबर के साथ हुई है. कोरोना की वैक्सीन आने की खबर मिली.


वैक्सीन के बारे में, उसके परीक्षण, उसके परिणाम पर चर्चा उनके लिए जो इस बारे में बड़ी तन्मयता से अपनी नजर लगाए हैं. इस बारे में अभी कुछ कहना-बताना उचित भी नहीं क्योंकि अभी इसके निश्चित परिणाम के बारे में कोई खबर भी नहीं. नए साल के हमारे पहले दो दिन सामान्य रूप में वैसे ही निकले जैसे कि पिछले साल के निकले थे. कोरोना का, लॉकडाउन का, अनलॉक का विशेष प्रभाव हमारी दिनचर्या पर नहीं पड़ा था, हाँ शाम का नियमित घूमना-फिरना बंद हो गया था.




नए साल में कभी भी किसी भी तरह से कोई संकल्प लेने का, कोई काम पूरा करने जैसा कोई काम कभी नहीं किया. अपनी तरफ से हमेशा यही प्रयास रहा कि कुछ न कुछ नया किया जाये मगर किसी काम को ही करने का संकल्प जैसा कुछ नहीं किया. इस बार विचार किया है (जो विगत साल-दो साल से विचार ही बना हुआ है) कि कुछ नया लिखा जाये. नया से मतलब कुछ अलग हटकर. पिछले काफी समय से जिस तरह से लेखन किया जा रहा है, वह अब मजा नहीं दे रहा है. पढ़ने का शौक तो ज्यों का त्यों बना हुआ है, लिखने का शौक भी ज्यों का त्यों बना हुआ है, यह सुखद है.


दिमाग दौड़ाते हैं कि किस तरह के विषयों पर लिखना है, कैसा लिखना है. लिखने के साथ-साथ कोशिश यही रहेगी कि वह सबको अधिक से अधिक पढ़ने को भी मिले. बीते वर्ष में किंडल संस्करण पर भी अपना लेखन ले गए, इस वर्ष उसको और विस्तार देने का प्रयास रहेगा. इसके साथ-साथ मित्रों के सहयोग से यदि पुस्तकों का प्रकाशन भी होता रहेगा तो उससे भी पीछे नहीं हटा जायेगा.


चलिए फिर, इंतजार करिए किसी नए विषय पर हमारा लिखा पढ़ने का. हम भी प्रयास करते हैं कुछ नया, अलग हटकर, कुछ विशेष आप सबको पढ़वाने का.

 

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वंदेमातरम्

14 दिसंबर 2020

स्याही की नमी में शब्द नहीं जीवन उभरता है, स्मृतियाँ बिखरती हैं

एक दौर था जबकि सुलेख पर बहुत ध्यान दिया जाता था. अब एक दौर ऐसा आया है जबकि लिखने पर ही बहुत ध्यान नहीं दिया जाता है. जो पीढ़ी अपने अनुभवों को लेकर आई है वह भी कंप्यूटर की चपेट में आ चुकी है, नई पीढ़ी तो कम्प्यूटर पर ही पैदा हुई है. ऐसे में लिखने-लिखाने, लेखन आदि की बात उसके लिए एकदम से बेवकूफी वाली बातें हैं. इस बेवकूफी भरी बातों के बीच यदि खुद को गंवार साबित करना है तो किसी भी स्टेशनरी की दुकान पर जाकर फाउंटेन पेन माँग लीजिये. दुकान वाला ऐसे देखता है जैसे मंगल पर भेजे गए अंतरिक्ष यान पर बैठ कर कोई प्राणी धरती पर आ गया है. इसमें भी और अजूबा बनने वाली स्थिति वह होती है जबकि आप उस दुकान वाले से फाउंटेन पेन में भरने के लिए स्याही माँगिए. मंगल ग्रह से आने के बजाय वह आपको न जाने कौन से अजीब से ग्रह से आया हुआ घोषित कर दे. आज के समय में बहुतेरे लोगों के लिए, खासतौर से वे लोग जिनके लिए लिखना बहुत बड़ी मशक्कत की विषय-वस्तु है उनके लिए फाउंटेन पेन, स्याही आदि चीजें अजूबा ही हैं.


इस अजूबी दुनिया में अभी भी बहुत से प्राणी ऐसे हैं जो खुद को इस पुरातन समाज से जोड़े रखने में खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं. ऐसे लोगों के लिए लिखना आज भी एक धर्म है, एक पावन कृत्य है, उनकी पूजा है. उनके लिए कम्प्यूटर का इस्तेमाल आधुनिक जीवन-शैली के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना है मगर लिखना उनके लिए जीवन है. इस जीवन को एक-एक साँस उनके शब्दों से मिलती है. इस जीवन की धड़कन आज भी की-बोर्ड से नहीं बल्कि फाउंटेन पेन से चलती है. ऐसे लोगों के लेखन शौक की देह में रक्त का प्रवाह उसी स्याही का होता है जो कागज़ पर शब्द बनकर उतरती है. आज की उस पीढ़ी के लिए जो की-बोर्ड की दुनिया में, मोबाइल की टच स्क्रीन के संसार में खो चुकी है, ऐसे लोग भले ही अजूब हों मगर ऐसे लोगों ने ही अपनी ज़िन्दगी को असलियत में जिया है, आज भी उसी का सुख उठा रहे हैं.




पठन-पाठन करने वालों के लिए, लिखने के शौक़ीन लोगों के लिए कागज, पेन, स्याही जैसा सुख कहीं और नहीं है. उनके सामने, उनकी मेज पर भले ही उत्तम दर्जे के कम्प्यूटर, मोबाइल क्यों न मौजूद हों मगर उनके लेखन का चरम तभी पूर्ण होता है जबकि हाथ में कलम हो और हथेलियों के नीचे कागज़. स्याही की नमी में उभरते शब्दों में कोई रचना नहीं बल्कि ऐसे लोगों का जीवन उभरता है, उनके अनुभव उभरते हैं, उनकी स्मृतियाँ बिखरती हैं. इस सुख का अनुभव आज की पीढ़ी शायद ही कभी कर सके.


एक निवेदन पेन, कागज, स्याही के शौकीनों से कि वे अपने इस शौक को, अपनी इस जीवन-शैली को अपनी आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित करने का प्रयास करें. इस सुख को उनकी धड़कनों में, उनकी साँसों में, उनके रक्त-प्रवाह में समाहित करने की चेष्टा करें. 


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वंदेमातरम्

27 सितंबर 2020

प्रयास पिताजी की तरह की हस्तलिपि लेखन का

अपनी प्रशंसा सुनना किसे ख़राब लगता होगा? हमें भी नहीं लगता और खासतौर से उस प्रशंसा को अत्यंत सहज भाव से स्वीकार करते हैं जो हमारी हस्तलिपि (हैण्ड राइटिंग) को लेकर होती है. ऐसा इसलिए क्योंकि हमारी इस राइटिंग को सुधारने के पीछे हमारे मन्ना चाचा (श्री नरेन्द्र सिंह सेंगर) तथा पिताजी (श्री महेन्द्र सिंह सेंगर) का योगदान है.


मन्ना चाचा की बैंक में सेवाओं का बहुत सारा समय कालपी, कोंच, कानपुर में बीता. इस कारण उनका नियमित रूप से उरई आना होता था. वे हम लोगों को बॉल पेन से लिखते देख लेते तो बहुत गुस्सा होते थे. फाउंटेन पेन से लिखने की आदत उनके द्वारा ही डलवाई हुई है. हम लोगों के लिए वे सुन्दर से फाउंटेन पेन भी लाया करते थे. (पेन इकठ्ठा करने का हमें जो शौक लगा है वो भी उन्हीं की देन कहा जायेगा क्योंकि उनके पास भी बहुत बेहतरीन पेनों का संग्रह आज भी है. इसमें कुछ विदेशी पेन भी शामिल हैं)


इसके अलावा किसी अक्षर को कैसे लिखा जाएगा, इसका अभ्यास पिताजी का लिखा हुआ देख कर किया करते थे. वकालत पेशे से सम्बद्ध होने के कारण पिताजी को बहुत से कागजों को लिखना होता था. बहुत से लिखे हुए कागज़ उनके द्वारा फाड़कर रद्दी में फेंके जाते थे. हम उन्हीं फटे टुकड़ों को उठाकर चोरी-चोरी पिताजी के बनाये अक्षरों की घंटों नक़ल किया करते थे.


आज फेसबुक पर टहलते हुए एक चैलेंज (#handwritingchallenge) दिखाई दिया. हमारे अनेक मित्रों ने, जो हमारी हस्तलिपि से परिचित हैं, हमारे प्रति अपना स्नेह व्यक्त किया. अपनी हस्तलिपि के पहले आज अपने पिताजी की हस्तलिपि के कुछ हिस्से आपके सामने. हमारा आज भी प्रयास रहता है पिताजी की तरह अक्षर बनाने का मगर बचपन से लेकर अभी तक सफल नहीं हो सके. कुछ अक्षर तो बन जाते हैं मगर कुछ अक्षर हमें मुँह चिढ़ाते हुए आगे बढ़ जाते हैं.





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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

30 अगस्त 2020

दिन भर उमड़ते विचार रात को चले जाते सोने

पूरे दिन अनेक-अनेक विचार दिमाग में चलते रहते हैं. लगता है कि लिखने बैठा जाये तो न जाने कितना लिख जाए. दिन भर तमाम और कामों की उठापटक में बहुत ज्यादा समय नहीं मिल पाता तो लिखना कम ही हो पाता है. अब जबकि रात को लिखने बैठते हैं, फुर्सत से तो दिमाग एकदम साफ़ नजर आने लगता है. ऐसा लगता है जैसे दिन भर के उठे तमाम विचार सोने चले गए हों. ऐसा नहीं कि शारीरिक रूप से अथवा मानसिक रूप से किसी तरह की थकान हो मगर इसके बाद भी ऐसा क्यों हो जाता है, पता नहीं. 

कहीं यह भी कोरोना काल में बहुत लम्बे समय से घर में घुसे रहने का नकारात्मक असर तो नहीं? बहरहाल, इसका भी निदान करना ही पड़ेगा.  


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

23 जुलाई 2020

काव्य रचनाओं में उभर आती है दिल की बात

उस उम्र में पहली कविता लिखी गई जब कविता की समझ बाल-कविताओं के रूप में ही विकसित हो रही थी.  न केवल लिखी बल्कि पिताजी के प्रयास से दो समाचार-पत्रों में प्रकाशित भी हुई थी. तत्कालीन पाठ्य-पुस्तकों में, समाचार-पत्रों के बच्चों का कोना, बाल सभा जैसे साप्ताहिक स्तंभों, बाल पत्रिकाओं में प्रकाशित कविताओं के द्वारा कविताओं को सिर्फ पढ़ा ही जा रहा था. न ऐसा विचार था और न ही कहीं मन में था कि कभी कविताएँ भी लिखी जाएँगी. अपनी पहली कविता के प्रकाशन बाद भी जबकि बड़ों से आशीर्वाद; साथियों से, छोटों से स्नेह मिला तब भी ऐसा विचार मन में नहीं आया था. नौ-दस वर्ष की उम्र में पहली कविता के लेखन-प्रकाशन के बाद भी कविताएँ लिखते रहने जैसा कोई भाव मन में नहीं जागा.


आज जबकि गद्य के साथ-साथ पद्य लेखन भी लगातार हो रहा है इसके बाद भी ऐसा लगता है कि कविता लिखी नहीं जा सकती है. जी हाँ, हमारे साथ यही वास्तविकता है. आज भी हम कविता लेखन के नाम पर कविता लिख नहीं पाते हैं. यह एक स्वतः स्फूर्त प्रक्रिया है जो क्षणिक भाव-बोध के साथ आरम्भ होती है और किसी रचना के रूप में इतिश्री को प्राप्त होती है. हमारा व्यक्तिगत रूप से ऐसा मानना है कि काव्य-लेखन कोई प्रक्रिया नहीं है वरन मन की अनुभूति है. कविता, गीत, ग़ज़ल आदि विभिन्न काव्य-विधाओं का लेखन हमसे कभी सायास नहीं हुआ. ऐसा कभी नहीं हुआ कि सोच-विचार कर कागज-कलम लेकर बैठे और एक काव्य-रचना का जन्म हो गया. हमारे साथ ऐसा अनायास होता है. कभी ट्रेन-बस में यात्रा करते समय, कभी घर से महाविद्यालय आते-जाते समय, कभी बाजार में नितांत आवारगी से टहलते हुए, कभी देर रात बिस्तर पर सोने की कोशिश करते समय.

सभी काव्य-रचनाओं के केन्द्र में कोई न कोई घटना, स्थिति, व्यक्ति रहा है. प्रेम सम्बन्धी काव्य-रचनाओं पर हमारे साथियों का, पाठकों का, श्रोताओं का एक मासूम सा सवाल हमसे हमेशा रहा है कि ये रचनाएँ किसके लिए लिखी गईं? यह सत्य है कि कुछ रचनाएँ अपने उस अतीत को याद करते हुए लिखी गईं, जो हमारा वर्तमान नहीं बन सका. यह भी सच है कि कुछ काव्य-रचनाओं में उस प्रेम की खुशबू है जो हमारे साथ न होकर भी हमारे जीवन में घुली-मिली है. चूँकि हमें अभिव्यक्ति का सर्वाधिक सहज और प्रभावित करने वाला माध्यम काव्य समझ आता है. बहुत ही कम शब्दों में किसी भी बात को दिल की गहराइयों तक बहुत ही आकर्षक और आलंकारिक रूप में उतारा जा सकता है. यही कारण है कि हमने अपनी कविताओं के द्वारा अपने मन की, अपने दिल की बात कहने का प्रयास किया है. इसी के चलते अतुकांत रचनाओं का लेखन भी खूब हुआ है. अतुकांत होने के बाद भी उनमें एक तरह लयबद्धता बनी रहे, इसका प्रयास लगातार किया है. बहुत सी रचनाओं में व्याकरणिक अनुशासन दिखाई नहीं देता है. इसके पीछे हमारा स्वयं का मानना है कि जब कोई रचना स्वान्तः-सुखाय के रूप में हो, अनायास भावबोध के कारण जन्मी हो, अनुभूतियों का प्रस्फुटन हो तो उसे किसी बंधन से मुक्त ही माना जाना चाहिए, रखा जाना चाहिए. शेष तो बस लिखने का प्रयास अभी भी है, लगातार है.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

18 जुलाई 2020

बिना पढ़े लिखने का सुख

बहुत बार ऐसा होता है कि दिमाग में खूब सारे विचार उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं मगर जब लिखने बैठो तो लगता है जैसे सबकुछ साफ़ हो गया है. दिमाग किसी कोरे कागज़ सा नजर आने लगता है जहाँ कुछ भी लिखा नहीं है. लिखने का मन होने के बाद भी कुछ न लिख पाना, विचारों का आधिक्य होने के बाद भी उनको शब्दों का रूप न दे पाना जैसे सामान्य सी घटना हो जाती है. ऐसा बहुत बार उस समय भी होता है जबकि किसी विशेष आयोजन पर कोई साहित्यिक रचना लिखनी हो. किसी अवसर विशेष पर पद्य रचना लिखनी हो. ऐसे समय में लिखने की मुश्किल से लगता है कि अभी और बहुत सारा पढ़ने की आवश्यकता है.


ऐसे विचार आते समय ऐसे बहुत से लोग दिमाग में कौंध जाते हैं जो आये दिन अपने लेखन से परिचय करवाते हैं. अपनी तमाम रचनाओं को सुनाते हुए अपने आपको साहित्यकार की श्रेणी में शामिल बताते हैं. ऐसे में उनकी तारीफ करते हुए यदि जानकरी ली जाये कि वे किसे पढ़ते रहे हैं, हाल-फ़िलहाल किसे पढ़ रहे हैं तो इधर-उधर झाँकने लगते हैं. उनसे जानकारी की जाये कि कौन-कौन सी साहित्यिक रचनाओं को पढ़ा है, किस-किस पुस्तक को पढ़ा है तो वे भौचक से बस मुँह खोले खड़े रह जाते हैं.


हमारी समझ से परे है कि आखिर बिना पढ़े लिखने की आदत कैसे बन जाती है? आखिर बिना कुछ पढ़े लोग लिख भी कैसे लेते हैं?



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#हिन्दी_ब्लॉगिंग