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16 अक्टूबर 2022

दिल और दिमाग के द्वंद्व में...

दिल और दिमाग की अपनी ही अलग कहानी है. बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जिनके लिए दिल और दिमाग में तालमेल नहीं बैठता है. अक्सर जिस बात के लिए दिल तैयार होता है, दिमाग उसके लिए अपनी सहमति नहीं देता है. कई बार इसका उल्टा भी होता है. ऐसा नहीं है कि हर बार दिल ही सही होता है और दिमाग गलत. बहुत बार ऐसा होता है कि दिल सही होता है, तो बहुत बार दिमाग का कहना भी सही होता है. बावजूद इसके व्यक्तिगत अनुभव किया है कि दिल और दिमाग के आपसी सम्बन्ध चाहे जैसे हों मगर उनका सबसे ज्यादा शिकार इन्सान ही बनता है और वही सर्वाधिक कष्ट का सामना करता है.


देखा जाये तो दिल का सम्बन्ध भावनात्मकता से और दिमाग का सम्बन्ध व्यावहारिकता से है. इसके पीछे किस तरह का सिद्धांत काम करता है या नहीं, इसके बारे में तो विस्तृत अध्ययन के बाद ही ज्ञात हो सकता है. यहाँ जो भी कहा जा रहा है, वह हमारा नितांत व्यक्तिगत अनुभव है. दिल के मामले में ज्यादातर मामलों में भावनात्मकता को ही सर्वोपरि देखा है. दिमाग के द्वारा लाख विश्लेषण करने के बाद भी यदि दिल को संवेदनात्मक रूप से कोई बात सही लगती है तो इन्सान उसी को करने के प्रति संवेदित होता है. इसके उलट दिमाग के द्वारा किसी भी बात के होने या न होने, करने या न करने के पीछे पूरी गणित बैठा ली जाती है, उससे सम्बंधित लाभ-हानि का आकलन कर लिया जाता है. ऐसा करने के बाद ही उस स्थिति को विचारणीय मानकर आगे बढ़ना होता है.




आजकल हम स्वयं दिल और दिमाग के झंझावात में झूल रहे हैं. बहुत सी बातें इस तरह से सामने आ रही हैं कि उनके लिए समझ नहीं पाते हैं कि दिल की सुनें या दिमाग की? बहुत सी बातों में लगता है कि दिल सही कह रहा है मगर दिमाग के आकलन पर जाते हैं तो वह भी गलत प्रतीत नहीं होता है. इसी तरह बहुत सी बातों में दिमाग का विश्लेषण एकदम सटीक दिखाई देता है मगर भावनात्मक रूप से दिल की बात भी गलत नहीं लगती है. दिल और दिमाग के बनाये इस तरह के द्वंद्व के बीच हम खुद को घिरा हुआ पाते हैं. बहुत सी स्थितियों में दोनों के बीच का रास्ता निकाल लिया जाता है मगर बहुत बार ऐसा होता है कि खुद को उस घिरी हुई स्थिति से बाहर निकालना मुश्किल मालूम होता है. ऐसी स्थिति अत्यंत जटिल होती है क्योंकि न तो दिल गलत होता है और न ही दिमाग. ऐसी स्थिति में हम व्यक्तिगत रूप से जो काम करते हैं वो ये कि दिल की बात मान लेते हैं. हमारा अपना मानना है कि दिल और दिमाग के द्वंद्व में बात दिल की ही मान लेनी चाहिए क्योंकि एक वही है जो भावनाओं की, एहसासों की परवाह करता है, बिना किसी गणित के, बिना किसी विश्लेषण के अपनी बात कहता है.


ऐसा करना हमारे व्यक्तिगत स्तर की बात है. आप किसकी बात मानते हैं, किसकी बात मानेंगे ये आप अपने आकलन से करियेगा. कहा जा सकता है कि दिमाग लगाइयेगा कि किसकी बात मानी जाये, दिल की या दिमाग की. 





 

06 जनवरी 2022

कुछ है जो असंतुलित किये है

कभी-कभी सब कुछ सही सा दिखने के बाद भी कुछ सही सा नहीं लगता है. अपने आपमें ही ऐसा महसूस होता रहता है जैसे बहुत कुछ छूट सा रहा है, बहुत कुछ अनचाहा सा हो रहा है. कभी-कभी समझ ही नहीं आता कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? वैसे देखा जाये तो कभी-कभी ही क्यों ऐसा हर बार होता है जबकि समझना कठिन होता है कि ये बहुत कुछ अनचाहा सा क्यों हो रहा है. मन की, तन की साम्यावस्था बनाये रखना बहुत कठिन हो जाता है. मन और तन का आपसी तालमेल न बैठ पाने के कारण किसी काम को करने की मनःस्थिति भी नहीं बन पाती है. मन कुछ करना चाहता है, दिल कुछ कहता है और देह कुछ और करने लगती है. इस असंतुलन को संतुलित कर पाना बहुत ही मुश्किल काम होता है.


हर बार ऐसी स्थिति के बाद कोई ठोस और कठोर निर्णय लेने का मन करता है मगर संभवतः असंतुलन की स्थिति किसी एक स्थायी निर्णय पर भी नहीं पहुँचने देती है. कई बार लगता है किसी मशीन की तरह, किसी कंप्यूटर की तरह दिल-दिमाग को अपडेट किया जा सकता. किसी तकनीक के द्वारा फॉर्मेट किया जा सकता अपनी मेमोरी को, अपनी स्मृति को. वाकई, यदि मन को, दिल को, दिमाग को किसी कंप्यूटर की तरह फॉर्मेट किया जा सकता, किसी सॉफ्टवेयर की तरह अपडेट किया जा सकता, उसको असामान्य स्थिति होने पर अनइनस्टॉल, इनस्टॉल किया जा सकता. अफ़सोस ऐसा कुछ इंसानी शरीर के साथ, उसके दिल-दिमाग के साथ नहीं किया जा सकता है.


ऐसा न हो पाने के कारण तमाम उलझनों का बोझ उठाये बस चलायमान रखा जा रहा है. खुद को कर्तव्य पथ पर सक्रिय बनाये रखा जा रहा है. ये भी समझ से परे है कि खुद को काम में लगाए हुए हैं अथवा काम में उलझे होने का बहाना बनाये हुए हैं?




19 जुलाई 2020

यादों का हटाया जाना सहज होता तो....

यादें समय-असमय चली आती हैं, कभी परेशान करने तो कभी प्रसन्न करने. इनको आने के लिए न तो किसी से अनुमति की आवश्यकता होती है और न ही इनके आने का कोई समय निर्धारित होता है. क्या घटना है, क्या स्थिति है, कैसी परिस्थिति है इससे भी कोई लेना-देना नहीं, बस इन यादों का मन हुआ और आकर सामने खड़ी हो जाती हैं. अब जबकि ये समय अनलॉक की स्थिति के बाद भी नितांत अपने आपमें ही व्यतीत हो रहा है तब इन यादों ने जैसे दिल-दिमाग पर अपना ही कब्ज़ा कर रखा है. इस समय जीवनशैली नियमित होने के बाद भी, अनुशासित होने के बाद भी कहीं न कहीं थोड़ी सी अनियमित है, थोड़ी सी अनुशासनहीन है. ऐसे में कोई काम पूर्ण मनोयोग से संपन्न नहीं हो पा रहा है. किसी भी काम को करते समय उससे सम्बंधित किसी न किसी तरह की यादें अपना स्वरूप निर्मित कर लेती हैं.



आज की आईएस तकनीकी भरी दुनिया में बहुत सारे इंस्ट्रूमेंट बाजार में उपलब्ध हैं. इनमें से बहुतों के साथ मेमोरी का चक्कर जुड़ा होता है. कई बार उनको कार्यशील बनाये रखने के लिए पुरानी संग्रहित फाइल्स को हटाना होता है, उसमें जमा पुरानी, अनुपयोगी सामग्री को भी हटाना होता है. कई बार मन में आता है कि ऐसा कुछ दिमाग के साथ, दिल के साथ क्यों नहीं है? क्यों इनके साथ ऐसी कोई प्रक्रिया जुड़ी नहीं है जो दिल-दिमाग को भी फोर्मेट कर दे, उसके भीतर जमा अनुपयोगी, बेकार सामग्री को, यादों को हमेशा के लिए डिलीट कर दे.

ऐसा विचार इसलिए आता है क्योंकि हर एक याद ख़ुशी देती हो ऐसा नहीं है. ऐसा भी नहीं है कि हर एक याद का अपना कोई महत्त्व हो. बहुत बार लगता है कि दिमाग, दिल बहुत सी ऐसी यादों को अपने में समेटे है जिनका होना सिर्फ दुःख ही देता है. ऐसी बहुत सी यादें हैं जिनका होना सिर्फ दुःख का कारण होता है. लगता है कि यदि उनका हटाया जाना सहज होता तो शायद बहुत से लोगों का जीवन सुखमय हो सकता था.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

07 जून 2020

काश कि दिल-दिमाग-मन को फॉर्मेट किया जा सकता

कभी-कभी भावावेश में या फिर अचानक ही अनजाने में ऐसे कदम उठ जाते हैं जिनके बारे में बाद में सोचने पर अफ़सोस होता है. कई बार उन बातों के परिणाम सामने आने के बाद भी अफ़सोस होता है. आवश्यक नहीं कि ऐसी बातों का या कदमों का कोई दुष्परिणाम हो मगर जो भी होता है वो खुद को अच्छा नहीं लगता है. ऐसे में स्वाभाविक है कि यदि आपकी खुद की बातों का जो परिणाम रहा हो वो ही आपको पसंद न आ रहा हो तो दुःख होना स्वाभाविक है. अब पता नहीं ऐसा सबके साथ होता है या हमारे साथ ही ऐसा है?



कुछ बातों का असर कई-कई वर्षों बाद देखने को मिलता है. कुछ बातें तत्काल अपना परिणाम दिखा देती हैं. जिन बातों का असर तत्काल देखने को मिल जाता है, उनके चलते दुःख भी क्षणिक रहता है. इसके उलट ऐसी बातें जिनके परिणाम देर से मिलें उनके बारे में कष्ट भी बहुत लम्बे समय तक रहता है. इन्हीं में बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जिनका छिपे रहना ही बेहतर होता है मगर कई बार भावनाओं में बह जाने के कारण बातें भी सामने आ जाती हैं. जिस समय भावनाओं का प्रकटीकरण किया जाता है, संभव है कि उस समय माहौल उनके अनुकूल हो मगर जैसे ही वातावरण उन बातों के विपरीत होता है वे बातें कष्ट देने लगती हैं.


ऐसी बातों पर पश्चाताप से भी कोई हल नहीं निकलता है. ऐसी बातों को कहने से संदर्भित क्षमा याचना भी उनके परिणाम से उत्पन्न कष्ट को कम नहीं करती. सोचने वाली बात है कि ऐसी बातों के लिए दोषी व्यक्ति पश्चाताप करना चाहता है मगर इसका कोई निदान नहीं. संभव है कि ये स्थिति अत्यंत कष्टकारी ही होती है. काश कि दिल-दिमाग-मन ऐसे यंत्र होते जिनको समय के साथ फॉर्मेट किया जा सकता. इनमें अच्छी-अच्छी यादों को संग्रहित कर लिया जाता और बुरी-बुरी बातों को, दुःख देने वाली घटनाओं को निकाल दिया जाता. काश ऐसा हो पाता.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

24 मई 2020

दिल और दिमाग के अंतर्संबंध

मानव शरीर में दिल और दिमाग, दोनों का महत्त्वपूर्ण स्थान है. दोनों के अपने निर्णय होते हैं और जीवन के फैसलों में दोनों के निर्णयों को एक-दूसरे पर हावी नहीं होने देना चाहिए. किसी भी व्यक्ति के जीवन में कठिन स्थितियों में, नकारात्मक स्थितियों में, विवाद की स्थितियों में, तनाव के समय में दिल की जगह दिमाग की बातों को महत्त्व देना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि दिल के निर्णय मूल रूप से भावनात्मक एहसास पर आधारित होते हैं. जबकि दिमाग तर्क-क्षमता के द्वारा सही-गलत को परिभाषित करते हुए अपना निर्णय देता है.


दिल का सम्बन्ध सदैव से भावनात्मकता से रहा है. उसके द्वारा लिए गए निर्णय विवेकपूर्ण होने से ज्यादा संवेदनात्मक होते हैं. उसका विवेक संबंधों, रिश्तों एहसासों को प्राथमिकता देते हुए व्यक्ति को कार्य करने को प्रेरित करता है. ऐसा नहीं है कि दिल के द्वारा विवेकपूर्ण निर्णय लेने में किसी तरह की त्रुटि होती है अथवा उसका व्यक्ति के जीवन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. उसके द्वारा मन-मष्तिष्क को भी निर्णय लेने सम्बन्धी दिशा प्राप्त हो जाती है क्योंकि दिमाग भी कहीं न कहीं दिल के निर्णयों पर अपने विवेक का प्रयोग करते हुए सही-गलत को परिभाषित करता है.



किसी भी व्यक्ति द्वारा निर्णय लेने सम्बन्धी स्थिति में दिल और दिमाग दोनों ही सक्रिय हो जाते हैं. इस स्थिति में व्यक्ति अपने जीवन, अपने भविष्य, अपने समय के अनुसार विवेकपूर्ण ढंग से विचार करता है कि उसके लिए अंतिम रूप से क्या सही है. उसी के अनुसार वह निर्णय लेता है. यही वह स्थिति होती है जबकि व्यक्ति के जीवन, भविष्य, कठिन स्थिति, नकारात्मकता, निराशा आदि दशाओं में दिमाग के निर्णयों की विजय हो जाती है. इसे ऐसे समझा जा सकता है जैसे किसी व्यक्ति के बहुत ही करीबी व्यक्ति के विवाह का आयोजन है और वह व्यक्ति किसी प्राकृतिक आपदा के कारण जाने में असमर्थ है. ऐसी विषम स्थिति में उसका दिल उसे जाने को प्रेरित करता है मगर दिमाग विवेकपूर्ण निर्णय लेते हुए उसे सही, गलत स्थिति समझाते हुए जाने से रोकता है. निश्चित है कि ऐसे विषम समय में व्यक्ति अपने जीवन की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए विवाह आयोजन में न जाने का निर्णय करता है.

किसी भी इन्सान को गंभीरता की स्थिति में जबकि उसे दिल और दिमाग में से किसी एक को चुनना पड़े तो उसे याद रखना चाहिए कि उसके निर्णय का क्या और कैसा असर होने वाला है. यदि उसके निर्णय का असर किसी व्यक्ति के कैरियर, उसके भविष्य, उसके जीवन पर पड़ने वाला है तब उसे अपने दिमाग की तार्किकता को महत्त्व देना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि दिल विशुद्ध रूप से भावनात्मकता को वरीयता देता है जबकि दिमाग का ज्ञान मानसिक, शैक्षिक, तार्किक, बुद्धिमत्ता से समूची स्थितियों का आकलन कर निर्णय करता है.

इसका अर्थ कदापि यह नहीं कि दिल के निर्णयों का महत्त्व नहीं. किसी भी रूप में दिल के विवेक पर दिमाग को हावी करना नहीं है क्योंकि जीवन में दोनों का अपना महत्त्वपूर्ण स्थान है. बिना दिल-दिमाग के कोई भी इन्सान सकारात्मक रूप से किसी स्थिति पर, किसी विचार पर आगे नहीं बढ़ सकता है. मूल रूप से दिल और दिमाग एक-दूसरे से अंतर्सम्बंधित होते हैं. बहुत सी स्थितियों में दिमाग के निर्णयों पर दिल के निर्णयों का भी प्रभाव होता है. जब कोई व्यक्ति अपने परिवार के बारे में, अपने अभिभावकों के बारे में, अपने बच्चों के बारे में निर्णय लेने की स्थिति में होता है तब वह दिल के ज्ञान को दिमाग के विवेक पर वरीयता देता है. भले ही ये कहा जाये कि बात अपने दिल की सुननी चाहिए परन्तु तार्किक रूप से उसका आकलन दिमाग से करते हुए निर्णयों का सम्मान करना व्यक्ति का दायित्व होना चाहिए.

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(हालाँकि ये पोस्ट पुरानी है मगर आज खुद के दिल-दिमाग की स्थिति में तालमेल, समन्वय की जगह द्वंद्व दिख रहा था. ऐसे में ये पोस्ट याद आई तो इसे फिर प्रकाशित कर दिया.)
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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

14 मार्च 2020

दिल की अपनी, दिमाग की अपनी - 1700वीं पोस्ट

मानव शरीर में दिल और दिमाग, दोनों का महत्त्वपूर्ण स्थान है. दोनों के अपने निर्णय होते हैं और जीवन के फैसलों में दोनों के निर्णयों को एक-दूसरे पर हावी नहीं होने देना चाहिए. किसी भी व्यक्ति के जीवन में कठिन स्थितियों में, नकारात्मक स्थितियों में, विवाद की स्थितियों में, तनाव के समय में दिल की जगह दिमाग की बातों को महत्त्व देना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि दिल के निर्णय मूल रूप से भावनात्मक एहसास पर आधारित होते हैं. जबकि दिमाग तर्क-क्षमता के द्वारा सही-गलत को परिभाषित करते हुए अपना निर्णय देता है.

दिल का सम्बन्ध सदैव से भावनात्मकता से रहा है. उसके द्वारा लिए गए निर्णय विवेकपूर्ण होने से ज्यादा संवेदनात्मक होते हैं. उसका विवेक संबंधों, रिश्तों एहसासों को प्राथमिकता देते हुए व्यक्ति को कार्य करने को प्रेरित करता है. ऐसा नहीं है कि दिल के द्वारा विवेकपूर्ण निर्णय लेने में किसी तरह की त्रुटि होती है अथवा उसका व्यक्ति के जीवन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. उसके द्वारा मन-मष्तिष्क को भी निर्णय लेने सम्बन्धी दिशा प्राप्त हो जाती है क्योंकि दिमाग भी कहीं न कहीं दिल के निर्णयों पर अपने विवेक का प्रयोग करते हुए सही-गलत को परिभाषित करता है.


किसी भी व्यक्ति द्वारा निर्णय लेने सम्बन्धी स्थिति में दिल और दिमाग दोनों ही सक्रिय हो जाते हैं. इस स्थिति में व्यक्ति अपने जीवन, अपने भविष्य, अपने समय के अनुसार विवेकपूर्ण ढंग से विचार करता है कि उसके लिए अंतिम रूप से क्या सही है. उसी के अनुसार वह निर्णय लेता है. यही वह स्थिति होती है जबकि व्यक्ति के जीवन, भविष्य, कठिन स्थिति, नकारात्मकता, निराशा आदि दशाओं में दिमाग के निर्णयों की विजय हो जाती है. इसे ऐसे समझा जा सकता है जैसे किसी व्यक्ति के बहुत ही करीबी व्यक्ति के विवाह का आयोजन है और वह व्यक्ति किसी प्राकृतिक आपदा के कारण जाने में असमर्थ है. ऐसी विषम स्थिति में उसका दिल उसे जाने को प्रेरित करता है मगर दिमाग विवेकपूर्ण निर्णय लेते हुए उसे सही, गलत स्थिति समझाते हुए जाने से रोकता है. निश्चित है कि ऐसे विषम समय में व्यक्ति अपने जीवन की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए विवाह आयोजन में न जाने का निर्णय करता है.

किसी भी इन्सान को गंभीरता की स्थिति में जबकि उसे दिल और दिमाग में से किसी एक को चुनना पड़े तो उसे याद रखना चाहिए कि उसके निर्णय का क्या और कैसा असर होने वाला है. यदि उसके निर्णय का असर किसी व्यक्ति के कैरियर, उसके भविष्य, उसके जीवन पर पड़ने वाला है तब उसे अपने दिमाग की तार्किकता को महत्त्व देना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि दिल विशुद्ध रूप से भावनात्मकता को वरीयता देता है जबकि दिमाग का ज्ञान मानसिक, शैक्षिक, तार्किक, बुद्धिमत्ता से समूची स्थितियों का आकलन कर निर्णय करता है. 


इसका अर्थ कदापि यह नहीं कि दिल के निर्णयों का महत्त्व नहीं. किसी भी रूप में दिल के विवेक पर दिमाग को हावी करना नहीं है क्योंकि जीवन में दोनों का अपना महत्त्वपूर्ण स्थान है. बिना दिल-दिमाग के कोई भी इन्सान सकारात्मक रूप से किसी स्थिति पर, किसी विचार पर आगे नहीं बढ़ सकता है. मूल रूप से दिल और दिमाग एक-दूसरे से अंतर्सम्बंधित होते हैं. बहुत सी स्थितियों में दिमाग के निर्णयों पर दिल के निर्णयों का भी प्रभाव होता है. जब कोई व्यक्ति अपने परिवार के बारे में, अपने अभिभावकों के बारे में, अपने बच्चों के बारे में निर्णय लेने की स्थिति में होता है तब वह दिल के ज्ञान को दिमाग के विवेक पर वरीयता देता है. भले ही ये कहा जाये कि बात अपने दिल की सुननी चाहिए परन्तु तार्किक रूप से उसका आकलन दिमाग से करते हुए निर्णयों का सम्मान करना व्यक्ति का दायित्व होना चाहिए. 
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(यह इस ब्लॉग की 1700वीं पोस्ट है.)