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03 मई 2025

जातिगत जनगणना का राजनैतिक खेल

केन्द्र सरकार ने जातिगत जनगणना की स्वीकृति देकर समूचे देश में राजनैतिक हलचल पैदा कर दी है. जातिगत जनगणना की स्वीकृति मिलते ही विपक्षी दलों ने इसे अपनी जीत घोषित कर दिया. ऐसा इसलिए क्योंकि विपक्षी दल लम्बे समय से इसकी माँग करते रहे हैं. ऐसे समय में जबकि सभी राजनैतिक दलों के साथ-साथ समूचे देश का ध्यान पहलगाम आतंकी हमले की तरफ था, केन्द्र सरकार का जातिगत जनगणना करवाने का निर्णय न केवल चौंकाने वाला है बल्कि अप्रत्याशित भी है. राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि केन्द्र सरकार के इस निर्णय के पीछे बिहार का आगामी विधानसभा चुनाव है. यह एक तरह से सही भी हो सकता है क्योंकि बिहार में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव द्वारा जातिगत जनगणना को आधार बनाकर भाजपा के विरुद्ध, नीतीश कुमार के विरुद्ध माहौल बनाया जाना निश्चित था.

 

जातिगत जनगणना देश के लिए अथवा देश के इतिहास की अनोखी घटना नहीं है. अंग्रेजी शासन में 1881 से लेकर 1931 तक जातिगत जनगणना होती रही थी. यदि जातिगत जनगणना की समयावधि को देखें तो लगभग सौ वर्षों के बाद यह पुनः होने जा रही है. यद्यपि स्वतंत्रता के पूर्व 1941 में भी जातिगत जनगणना करवाई गई थी तथापि उसके आँकड़ों को प्रकाशित नहीं करवाया गया था. देश की आज़ादी के बाद भी एक तरह से जातिगत जनगणना होती आई है किन्तु उसे सम्पूर्ण न कहकर आंशिक कहा जा सकता है क्योंकि उसमें अनुसूचित जातियों और जनजातियों की ही गणना होती रही है. यह गणना 1951 से लेकर 2011 तक होती रही है. 2011 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण करवाकर जातिगत आँकड़ों की पहचान करने का प्रयास किया गया था किन्तु इस सर्वेक्षण के जातिगत आँकड़े प्रकाशित नहीं हो सके थे. विपक्षी दलों द्वारा केन्द्र सरकार पर जातिगत जनगणना करवाए जाने का दबाव लगातार बनाया जाता रहता था किन्तु कांग्रेस द्वारा हमेशा इसका विरोध किया गया. ऐसे में राहुल गांधी का जातिगत गणना के लिए सर्वाधिक सक्रिय रहना, इस माँग के मामले में अन्य विपक्षी दलों को पीछे छोड़ देना हैरान करने वाला है.

 



इस तरह की स्थितियाँ देखने के बाद ऐसा समझ आ रहा है कि विपक्षी दल हों या फिर केन्द्र सरकार, सभी के लिए जातिगत जनगणना एक राजनैतिक खेल है. इसके द्वारा समाज के या कहें मतदाताओं के बहुत बड़े वर्ग को साधने का प्रयास किया जा रहा है. पिछले कुछ सालों में भाजपा द्वारा जिस तरह से ओबीसी में अपना जनाधार मजबूत किया है, वह उन तमाम दलों के लिए परेशानी और चिंता का कारण बना हुआ है जिनके लिए ओबीसी वोट-बैंक रहा है. इसी तरह कांग्रेस, जिसने ओबीसी आरक्षण का हमेशा ही विरोध किया है, के द्वारा ओबीसी को जातिगत जनगणना के, आरक्षण के लाभ समझाना राजनैतिक खेल ही है. यह सही है कि सामाजिक कल्याण के लिए समाज की मुख्यधारा में सभी जातियों, उपजातियों का शामिल होना आवश्यक है. यह भी सही है कि एकमात्र आरक्षण के रास्ते से चलकर समाज का अथवा सभी जातियों-उपजातियों का भला नहीं हो सकता. समाजोत्थान के लिए आवश्यक है कि आरक्षण की नीतियों के साथ-साथ समाज कल्याण की अन्य योजनाओं को भी सबके बीच पहुँचाया जाये.

 

ऐसे में जबकि जातिगत जनगणना की स्वीकृति मिल चुकी है तब सवाल उठता है कि आरक्षण की सीमा लगातार बढ़ती रही है किन्तु इसका लाभ सभी को प्राप्त नहीं हो सका है तो क्या जातिगत जनगणना का लाभ वास्तविक रूप में मिल सकेगा? विभिन्न सरकारों द्वारा नियमित रूप से ऐसे प्रयास किये जाते रहे हैं कि आरक्षण का लाभ यथोचित वर्ग तक, उपयुक्त व्यक्तियों तक पहुँचे. बावजूद इसके अभी भी पिछड़ों-वंचितों-शोषितों की संख्या पर्याप्त रूप में देखने को मिलती है. अभी भी बहुत बड़ी संख्या में ऐसे परिवार हैं जिनके द्वार तक आरक्षण नहीं पहुँच सका है. ऐसे में यह कहना उचित प्रतीत नहीं होता है कि बिना जातिगत जनगणना के समाज के वंचित वर्ग तक, ओबीसी तक, एससी-एसटी तक आरक्षण सहित अन्य योजनाओं का लाभ नहीं पहुँचेगा. क्या जातिगत जनगणना के बाद प्राप्त आँकड़ों के आधार पर देश के संसाधनों का बँटवारा कर देना ही सामाजिक समस्याओं का समाधान है? क्या देश में अनेकानेक नीतियाँ, परियोजनाएँ जातिगत आँकड़ों के आधार पर बनाई जाएँगी? जातिगत जनगणना की स्वीकृति मिलने के साथ ही इस पर भी प्रश्नचिन्ह लगता है कि क्या ऐसी गणना सिर्फ हिन्दुओं के सन्दर्भ में ही होगी अथवा इसके दायरे में मुसलमान, ईसाई, सिख, बौद्ध आदि सहित अनेक समुदायों को भी लाया जायेगा?

 

देखा जाये तो अभी जातिगत जनगणना की स्वीकृति केन्द्र सरकार द्वारा दी गई है किन्तु इसके आँकड़े आने के बाद उसके क्रियान्वयन पर, उसके व्यावहारिक पक्ष की तरफ ध्यान दिया जाना आवश्यक होगा. इस जनगणना के लाभ-हानि के सम्बन्ध में भी उसी समय उचित रूप में ज्ञात हो सकेगा. एक ऐसे राजनैतिक वातावरण वाले देश में जहाँ सामाजिक कल्याण, सामाजिक न्याय की बात भी जातियों को केन्द्र में रखते हुए की जाती है; जहाँ एक-एक व्यक्ति खुद को जाति विशेष का प्रतिनिधि साबित करते हुए संसद तक पहुँच जाता है; जहाँ जातिगत आधार किसी भी राजनैतिक दल के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन जाता है; जहाँ चुनावों में क्षेत्र, विकास, नीति आदि प्रमुख न होकर जाति ही सर्वोपरि हो जाती है वहाँ जातिगत जनगणना सम्बन्धी राजनीति वैमनष्यता को बढ़ावा देने वाली हो सकती है. इस तरह की राजनीति जिसमें कि देश के, समाज के विकास से अधिक महत्त्वपूर्ण जातीय विभाजन हो, राजनैतिक दलों के जनाधार को कमजोर करना हो उससे सामाजिक एकजुटता ही कमजोर होगी.


03 अगस्त 2023

इंटरनेशनल रिसर्च जर्नल 'बोहल शोध मंजूषा' में हम भी संदर्भित

इंटरनेशनल रिसर्च जर्नल 'बोहल शोध मंजूषा' के जुलाई 2023 अंक में प्रकाशित शोध-पत्र में हमें भी संदर्भित किया गया है. (पृष्ठ 12)

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शोध-पत्र शीर्षक - दलित साहित्य और भारतीय समाज

शोधार्थी - बाबु बिगुल्ला

हिन्दी विभाग, डॉ. अम्बेडकर मुक्त विश्वविद्यालय, हैदराबाद

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प्रकाशक - गुगनराम एजुकेशनल एण्ड सोशल वैलफेयर सोसायटी, भिवानी (हरियाणा)

सम्पादक - डॉ. नरेश सिहाग 'बोहाल'





04 सितंबर 2018

नोटा की उतावली से पहले


केंद्र सरकार के एक विधेयक पारित करते ही सवर्णों में मानो भूचाल आ गया. बहुतायत में सवर्ण एकजुट होकर केंद्र सरकार को सबक सिखाने के लिए जुट गए. अपनी ताकत को वे किसी प्रत्याशी के पक्ष में लाकर नहीं वरन नोटा बटन दबाकर दिखाना चाह रहे हैं. वे सवर्ण प्रत्याशियों को भी हराने के पक्ष में नहीं हैं जबकि यहाँ ध्यान रखना होगा कि संसद में किसी सवर्ण ने इस एक्ट का विरोध नहीं किया था. इसके बाद भी सवर्णों की नाराजगी सिर्फ भाजपा से ही है. यही वह बिंदु है जहाँ कि भाजपा विरोधी अपनी चाल में सफल हो गए दिखते हैं.


इसी बिंदु पर आकर नोटा प्रेमियों को आज से लगभग तीन दशक पहले जाना होगा जबकि पूरे देश में आरक्षण विरोधी प्रदर्शन, आन्दोलन चल रहा था. उन्हें अपने नोटा आंदोलन को धरती पर उतारने के पहले 1990-91 में चले आरक्षण विरोधी देशव्यापी आंदोलन को शिद्दत से याद कर लेना चाहिए क्योंकि तब का युवा आज से ज़्यादा आक्रोशित था. उस समय का आन्दोलन आज के आन्दोलन से ज़्यादा ज़मीनी आंदोलन था. उस समय के देशव्यापी आन्दोलन में किसी तरह का सोशल मीडिया सहयोग नहीं हुआ करता था. इसके बाद भी आन्दोलन पूर देश में हुआ. अनेक होनहार युवाओं ने आत्मदाह किया. अनेक युवाओं ने लाठियाँ खाईं और बहुतों को जेल भी भेजा गया मगर सरकार अपने कदम को पीछे लेने को तैयार न हुई. आरक्षण सरकारी मर्जी के हिसाब से लागू हुआ. उसके बाद हुए आम चुनाव में सरकार गिर गई फिर क्या हुआ उससे? आगे किसी और सरकार पर खतरा न हो, इस डर से आगे आने वाली सरकारों ने आरक्षण हटाया? नहीं न. ऐसे में वर्तमान में नोटा समर्थकों की यह कपोल कल्पना ही है कि उनके नोटा से आगे आने वाली सरकारें सवर्णों की ताकत को महसूस करेंगी. यदि किसी तरह से नोटा समर्थकों ने वर्तमान भाजपा सरकार को गिरा दिया तो क्या जो सरकार आएगी वो एक्ट हटा देगी?

देखा जाये तो सरकारों को इस तरह के आन्दोलनों से किसी तरह का फर्क नहीं पड़ता है. ये सोचना अपने आपमें भूल ही है कि नोटा की ताकत के बाद सवर्णों की पूछ राजनैतिक हलकों में बढ़ जाएगी. उनको सोचना होगा कि कांग्रेस अपनी हरकतों से 44 सीट पर आ गई तो उनके नेताओं के कौन से काम रुक गए? उनका कौन सा नुक़सान हो गया? ऐसा ही भाजपा के साथ होगा, यदि वह हारती है. एक बात और आरक्षण विरोधी आन्दोलनकारियों का उस समय एकमात्र विरोध था तो सरकार से. यहाँ आज की स्थिति ये है कि नोटा समर्थकों को एक तरफ सरकार से लड़ना है साथ ही उनसे भी लड़ना है जिनके लिए ये एक्ट लाया गया है. क्या लगता है कि जब सवर्ण एकजुट होकर नोटा के द्वारा सरकार को हराने की, एक्ट में संशोधन की माँग बुलंद करेगी तो दलित समर्थक शांति से बैठे रहेंगे? वे जब सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद शांति से नहीं बैठे तो यहाँ कैसे बैठ जायेंगे. ऐसे में वर्तमान आन्दोलनकारियों को दोतरफा लड़ाई लड़नी होगी और दोनों ही जगह बेमकसद युद्ध है. उनको ध्यान रखना चाहिए कि एक अकेले सरकार से लड़कर पूरे देश में आंदोलन करके आरक्षण कम या समाप्त तो हुआ नहीं. अब तो दो या दो से अधिक लोगों से लड़ना है, ऐसे में सकारात्मक परिणाम की आशा कहाँ से मिले? यदि वाकई नोटा समर्थक केंद्र सरकार से नाराज हैं और उसे सबक सिखाना चाहते हैं तो एकजुट होकर सभी जगह अपना उम्मीदवार उतारें. उसको जिताने की कोशिश करें. न भी जिता सकें तब भी उसके वोटों को भविष्य की रूपरेखा बनाने के काम में ला सकते हैं. केंद्र सरकार के वर्तमान विधेयक को भावी राजनैतिक रणनीति के रूप में देखा जाना चाहिए. (इस बारे में जल्द ही)

07 अगस्त 2018

सुखद परिणाम तो नहीं देगा यह संशोधन


अंततः केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को पलटते हुए एससी/एसटी एक्ट में संशोधन विधेयक लोकसभा में पारित करवा ही दिया. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किसी दलित व्यक्ति द्वारा शिकायत के बाद तत्काल सवर्ण की गिरफ़्तारी पर रोक लगाने का आदेश दिया था. अदालत के इस आदेश को गैर-भाजपाई दलों ने, दलित संगठनों ने मोदी का, केंद्र सरकार का आदेश साबित करते हुए केंद्र सरकार पर अनावश्यक दबाव बना डाला. केंद्र की सत्ताधारी भाजपा के अन्दर भी इस आदेश के प्रति असंतोष दिखाई दिया. अदालत के आदेश को नकारात्मक रूप में समाज में प्रस्तुत किया गया. ऐसे दर्शाया गया जैसे इस अधिनियम को समाप्त ही कर दिया गया है. इसके बाद तो खुलेआम और गुपचुप ढंग से सरकार के खिलाफ लामबंदी की जाने लगी. आगामी चुनाव को देखते हुए केंद्र सरकार ने हथियार डालते हुए दलितों की रक्षा करने का मन बनाया.


इस अधिनियम में संशोधन के बाद इसका कितना उपयोग, दुरुपयोग दलित कर पायेंगे, इस अधिनियम के चलते कितने सवर्ण फंसेंगे, कितने बचेंगे ये तो बाद की बात है मगर यह तय है कि नब्बे के दशक में आरक्षण के लागू होने के बाद बनी सवर्ण-दलित की खाई को एक बार फिर गहरा कर दिया गया है. जातिगत भावना से समाज में विभेद की, भेदभाव की बात करने वाले भी इस संशोधन बिल की वकालत करते देखे जा रहे हैं. विगत कई वर्षों की जातिगत राजनीति देखने-समझने के बाद एक बात तो स्पष्ट है कि इस देश से जातिगत स्थिति कभी समाप्त होने वाली नहीं है. दलित वर्ग के बहुतेरे लोगों में भले ही आरक्षण के सहारे आगे बढ़ने की मानसिकता का विकास न हुआ हो मगर अपने नाम के साथ किसी सवर्ण की उपजाति लगाने का लोभ संवरण नहीं होता है. इसी तरह सवर्ण वर्ग के बहुत से लोगों में भले ही दलितों के प्रति सकारात्मक भावना का विकास न हुआ हो मगर आरक्षण की मलाई चाटने के लिए वे खुद को अन्य पिछड़ा वर्ग अथवा दलित वर्ग में शामिल करवाने को तैयार हैं. इस तरह की स्थिति के बीच अब इस संशोधन बिल के बाद की स्थितियाँ विकट नहीं तो कम से कम सुखदायी नहीं होने वाली.

राजनैतिक दल इसका अपने चुनावी समीकरणों के उपयोग करेंगे और वहीं दलित वर्ग के बहुतेरे ईर्ष्यालु, विद्वेषपूर्ण मानसिकता वाले लोग इसका दुरुपयोग सवर्णों को जबरन फँसाने में करेंगे. राजनैतिक दलों में भाजपा जहाँ इसी संशोधन बिल के द्वारा दलित वोटों को एपीआई तरफ खींचने की कोशिश करेगी वहीं, गैर-भाजपाई दल इसके द्वारा दलित वोटों को अपनी तरफ यह दिखाकर लाने का प्रयास करेंगे कि उनके दबाव के कारण ही यह संशोधन बिल सामने आ सका. भाजपा-विरोधी दल संगठित रूप से अदालत के फैसले को सरकार की मंशा बताने में सफलता प्राप्त कर ही चुके हैं, ऐसे में उनके लिए इस संशोधन बिल का राजनैतिक लाभ और ज्यादा ले पाना आसान हो गया है. यदि ऐसा होता है तो यह कदम भाजपा के लिए आत्मघाती सिद्ध होगा. इसके अलावा समाज में विद्वेष बढ़ने के भी आसार नजर आते हैं. अदालत के आदेश के बाद जिस तरह से दलित संगठनों ने, भाजपा-विरोधी दलों ने भारत बंद के दौरान हिंसात्मक प्रदर्शन किये थे, वे सिवाय विद्वेष की भावना के और कुछ नहीं थे. अनुसूचित जाति/जनजाति अधिनियम के दुरुपयोग के एक नहीं अनेक उदाहरण हैं जिनके कारण ही सर्वोच्च न्यायालय को तत्काल गिरफ़्तारी न करने का आदेश पारित करना पड़ा था. बहरहाल, केंद्र सरकार ने अपना चुनावी दाँव खेल दिया है. लोकसभा में जितनी सहजता से यह बिल पारित हो गया, उतनी ही सहजता से यह राज्यसभा में पारित हो जायेगा. महामहिम राष्ट्रपति की तरफ से भी इसके रोके जाने की कोई आशंका नहीं है. इसके लागू होने के बाद देखना यह है कि कौन किस स्तर तक जाकर इसका उपयोग वास्तविक रूप में करता है.

03 अगस्त 2018

सवर्ण राजनीति की मुख्यधारा की माँग नहीं

उच्चतम न्यायालय द्वारा एससी-एसटी एक्ट के सम्बन्ध में दिए गए निर्णय के खिलाफ जाते हुए सरकार संशोधन विधेयक वर्तमान सत्र में ला रही है. इसकी तैयारी के बीच पिछड़ा वर्ग आयोग को भी संवैधानिक दर्जा दे दिया गया है. दलितों-पिछड़ों के लिए उठाये जाते इन कदमों के बीच आरक्षण सम्बन्धी तमाम सारे और भी कदम इस दौरान उठाये जाते रहे हैं. शिक्षा, नौकरी के साथ-साथ पदोन्नति में भी आरक्षण यथावत रखा गया है. केंद्र सरकार के दलितों-पिछड़ों को लेकर किये जा रहे तमाम सारे कार्यों में से शायद ही किसी का इतना विरोध हुआ जो जितना कि एससी-एसटी एक्ट में संशोधन को लेकर हो रहा है. यह स्थिति तब है जबकि इस एक्ट में कोई आमूल-चूल परिवर्तन करने के बजाय उच्चतम न्यायालय द्वारा महज इतनी व्यवस्था की गई थी कि आरोपी सवर्ण की गिरफ़्तारी बिना जाँच के नहीं होगी. इस आदेश को मोदी सरकार की मंशा बताते हुए विपक्षियों ने उपद्रवी माहौल बना डाला. इसका नकारात्मक असर यह हुआ कि केंद्र सरकार संशोधन बिल लाने को तैयार हो गई.


न्यायालय के आदेश के खिलाफ जाकर केंद्र सरकार का इस तरह से संशोधन विधेयक लाने के मूल में विशुद्ध राजनीति है. यह कोई छिपा हुआ एजेंडा नहीं है वरन केंद्र सरकार के कदमों से बराबर सिद्ध होता रहा है कि वह किसी भी रूप में सवर्णों को मददकारी हो या न हो मगर दलितों-पिछड़ों के लिए मददगार अवश्य रहेगी. देश के सवर्णों को सरकार के इस कदम से आपत्ति या निराशा जैसा कुछ नहीं लगना चाहिए क्योंकि सिर्फ यही सरकार नहीं वरन देश की सभी सरकारों का एकमात्र उद्देश्य ऐसे कदमों से दलितों-पिछड़ों का वोट प्राप्त करना है. यदि गंभीरता से देखा जाये तो दलित-पिछड़े किसी भी राजनैतिक दल के लिए आज मुख्यधारा के लोग हैं. सवर्ण अपने आपको किसी भी रूप में मुख्यधारा में न माने, राजनीति के लिए खुद को अहम् न माने. आज न सरकारों को और न ही विपक्ष को सवर्णों की, उनके वोट की आवश्यकता है. यदि सामाजिक प्रस्थिति के रूप में इस बिंदु पर निगाह डाली जाये तो नब्बे के दशक से राजनीति की मुख्यधारा से सवर्णों का पतन किया जाना आरम्भ हो गया था. हिन्दू धर्म की छुआछूत की भावना को, विभेद की भावना को समस्त राजनैतिक दलों द्वारा बुरी तरह से अपने पक्ष में दोहन किया गया. यही कारण है कि जाति का विरोध करने वाले इन राजनैतिक दलों द्वारा जाति-विहीन समाज की बात भले ही की जाती हो मगर समाज से जाति दूर करने की बात नहीं की जाती है. इसी का दुष्परिणाम यह हुआ कि राजनीति में जातिगत आधार पर न केवल राजनैतिक दलों का गठन हुआ वरन वे सत्ता में भी काबिज होने लगे.

यहाँ आकर सवर्णों को समझना होगा कि वे अब राजनीति की मुख्यधारा की माँग नहीं हैं. अर्थशास्त्र का माँग और आपूर्ति का नियम सिर्फ अर्थशास्त्र में ही लागू नहीं होता बल्कि समाज के प्रत्येक हिस्से में लागू होता है. आज देश की राजनीति की माँग दलित हैं, पिछड़े हैं तो सत्ता पक्ष द्वारा, विपक्ष द्वारा, राजनैतिक दलों द्वारा उनकी माँग को स्वीकार किया जा रहा है. सवर्णों को यह समझने की भूल नहीं करनी चाहिए कि वे किसी भी रूप में प्रभावकारी मतदाता हैं. कायदे से देखा जाये तो सवर्ण आज भी निपट कबीलों में बंटा हुआ है. अतीत की छोटी-छोटी रियासतों की तरह वह आज भी छोटे-छोटे से वर्गों में विभक्त है. यही कारण है कि उसके पक्ष में एक आदेश के साथ किसी भी राजनैतिक दल के सवर्ण जनप्रतिनिधि भी आकर नहीं खड़े हुए. देश में वर्तमान में हो रही राजनीति की चाल को समझने की आवश्यकता है. यहाँ सभी राजनैतिक दलों का एकमात्र उद्देश्य सत्ता की प्राप्ति होता है, वह कैसे हो यह उसका विचार-बिंदु होता है. उन्हें न सवर्णों के हितार्थ कोई कदम उठाना है और न ही दलितों-पिछड़ों के हितार्थ. सत्ता की खातिर उन्हें कब कौन सा कदम उठाना पड़ सकता है, ये उन्हें खुद नहीं मालूम होता है.  

02 अप्रैल 2018

राजनैतिक स्वार्थपूर्ति के लिए विरोध


देश के बहुत सारे दलित संगठनों ने एससी/एसटी एक्ट पर उच्चतम न्यायालय के फैसले के विरोध में भारत बंद का ऐलान किया था. भारत बंद को कांग्रेस, बसपा सहित कई राजनीतिक पार्टियों का समर्थन भी मिला. इस आन्दोलन में लगे संगठनों और राजनैतिक दलों की मांग थी कि अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 में उच्चतम न्यायालय द्वारा किये संशोधन को वापस लिया जाये और एक्ट को पहले की तरह लागू किया जाए. उच्चतम न्यायालय ने अपने एक फैसले में कुछ दिन पहले कहा था कि अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 के अंतर्गत आरोपी व्यक्ति की गिरफ़्तारी न की जाये बल्कि उसे जमानत दी जाये. आदेश में कहा गया है कि ऐसे किसी मामले में न केवल गिरफ़्तारी को रोका गया है बल्कि एफआईआर लिखने को भी प्रतिबंधित किया गया है. एफआईआर दर्ज करने के पहले डीएसपी द्वारा ऐसे मामले की जाँच की जाएगी. ऐसे मामलों में किसी अधिकारी की गिरफ़्तारी के पहले उसके उच्चाधिकारियों से अनुमति लेनी होगी और किसी सामान्य व्यक्ति के सन्दर्भ में एसएसपी से ऐसी अनुमति चाहिए होगी. इस आदेश के आने के बाद से तमाम दलित संगठनों के अलावा कई राजनैतिक दलों ने इस निर्णय को सरकारी मंशा से ओतप्रोत बताया. उनके द्वारा आरोप लगाया गया कि सरकार द्वारा संविधान से छेड़छाड़ की जा रही है और दलितों के हितों से खिलवाड़ किया जा रहा है. यहाँ समझना होगा कि आखिर उच्चतम न्यायालय का आदेश सरकार का आदेश कैसे हुआ? दूसरी बात कि न्यायालय ने इस अधिनियम को समाप्त तो किया नहीं है वरन ऐसे व्यक्तियों के हितों का संरक्षण किया है जो दुर्भावना के तहत इस अधिनियम में फँसा दिए जाते हैं.


दरअसल अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम 11 सितम्बर 1989 को संसद में पारित किया गया, जो जम्मू-कश्मीर को छोड़कर सम्पूर्ण देश में लागू किया गया. यह अधिनियम उस प्रत्येक व्यक्ति पर लागू होता है जो एससी/एसटी वर्ग से सम्बंधित नहीं है और इस वर्ग के सदस्यों का उत्पीड़न करता है. इस अधिनियम में 5 अध्याय एवं 23 धाराएं हैं. यह पीड़ितों को विशेष सुरक्षा और अधिकार देता है. इस अधिनियम के तहत दर्ज मामलों की सुनवाई के लिए लिए विशेष अदालतों की भी व्यवस्था है. उच्चतम न्यायालय द्वारा दिया गया आदेश वर्ष 2009 को महाराष्ट्र के गवर्नमेंट फार्मेसी कॉलेज में एक दलित कर्मचारी की तरफ से फर्स्ट क्लास के दो अधिकारियों के खिलाफ कानूनी धाराओं के तहत शिकायत दर्ज कराने के बाद उत्पन्न हुआ. इंस्टिट्यूट के प्रभारी डॉ० सुभाष महाजन द्वारा लिखित में कोई निर्देश नहीं देने के बाद दलित कर्मचारी ने सुभाष महाजन की शिकायत कर एफआईआर दर्ज कराई. सुभाष महाजन ने उच्च न्यायालय से अपनी एफआईआर रद्द करने की मांग की किन्तु उच्च न्यायालय ने इस माँग को ठुकरा दिया. बाद में सुभाष महाजन ने उच्चतम न्यायालय में अपील की. जहां उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को हटाने का आदेश दिया गया. इस मामले के बाद सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि ST/SC एक्ट के तहत गिरफ्तारी न की जाए बल्कि अग्रिम जमानत की मंदूरी दी जाए.


किसी निर्णय का विरोध करना लोकतान्त्रिक प्रक्रिया है. ऐसा करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है किन्तु भारत बंद के दौरान जिस तरह से हिंसात्मक तरीके अपनाये गए वह न केवल आपत्तिजनक है बल्कि निंदनीय है. इस बंद के दौरान किये गए उत्पात में न केवल सार्वजनिक, निजी संपत्ति को नुकसान हुआ वरन कई जगह से लोगों के मारे जाने की खबर भी आई है. यहाँ ऐसे संगठनों को सोचना होगा कि वे आखिर चाह क्या रहे हैं? वे खुद भी बहुत अच्छे से समझते हैं कि उनके द्वारा इस कानून का किस तरह दुरुपयोग किया जा रहा है. पूरे देश में दर्ज ऐसे मामलों में 85 प्रतिशत मामले फर्जी पाए जाते हैं. संविधान द्वारा संशोधन करके दलितों के हितों का संरक्षण करने के लिए, उनके साथ भेदभाव को समाप्त करने के लिए बनाया गया अधिनियम एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा है. आये दिन दलितों द्वारा इस अधिनियम के अंतर्गत फँसा देने की धमकी दिए जाने की खबरें सामने आती रहती हैं. ऐसे में यदि उच्चतम न्यायालय द्वारा कोई आदेश आया था तो उसके लिए लोकतान्त्रिक तरीके से अपना विरोध दर्ज करवाया जा सकता था. ऐसा न करते हुए तमाम सारे दलित संगठनों और राजनैतिक दलों ने इस निर्णय को अपनी राजनीति चमकाने का अवसर माना. उनके द्वारा न्यायालय के इस निर्णय की आड़ में मोदी का, भाजपा का विरोध किया जाना था और उसका परिणाम जान-माल के नुकसान के द्वारा सामने आया.

आज जिस तरह से सवर्णों के देवी-देवताओं के साथ अभद्रता की जा रही है, उनके धार्मिक स्थलों, मानकों के साथ आपत्तिजनक व्यवहार किया जा रहा है, उनको इस अधिनियम के द्वारा जबरन फंसाया जा रहा है उससे साफ़ है कि ये दलित संगठन और इनके नेता किसी भी रूप में आपसी सद्भाव नहीं चाहते हैं. आज दलित वर्ग कानूनी प्रावधान की आड़ लेकर सवर्णों का उत्पीड़न करने का कार्य कर रहा है और इसे उनके पूर्वजों के उत्पीड़न का बदला बताया जा रहा है तो कालचक्र किसी दिन फिर घूमेगा. उत्पीड़न का बदला उत्पीड़न वाला नियम चलता रहेगा, जिसे कभी कानून मदद करेगा तो कभी जन-समुदाय. इस नियम से, इस सोच से संभवतः किसी का भला तो नहीं ही होने वाला, चाहे वाल व्यक्ति हो या संगठन.