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22 जुलाई 2026

शब्दों का भटकाव

सम्भवतः आप सभी को ‘शब्द विस्तार’ और ‘शब्द संकुचन’ का अर्थ और उदाहरण की जानकारी होगी.

इसके अलावा अभिधा, लक्षणा, व्यंजना के बारे में बहुत से लोगों ने पढ़ा होगा.

 

उक्त दो के बारे में जानकारी न होने के कारण लोग भटक-भटक कर न जाने कहाँ पहुँच जा रहे हैं. इसी तरह कुछ शब्द अपने आपमें ही एक पहचान बन जाते हैं और व्यक्ति अपनी मानसिक संकुचन की स्थिति में उस शब्द की पहचान के इर्द-गिर्द डोलता-भटकता रहता है. इसे ऐसे समझें कि हमारे आसपास में एक हैं जिनको किसी कारणवश ‘बंदरवा’ से कभी सम्बोधित किया गया था. स्थिति ये है कि आज भी यदि बंदरवा बोल दें तो सब उसी एक व्यक्ति से इसका अर्थ जोड़ देते हैं.

 

कुछ इसी तरह से कल से कुछ भटकन हमारी एक पोस्ट पर है. समझ नहीं पा रहे हैं कि कल को इनकी नाली में, किचेन की सिंक में, बाथरूम के कोने में, बरामदे में ‘कोई विशेष जीव’ टहलता दिखेगा तो ये भटकते लोग क्या कहेंगे, क्या करेंगे? जिस विशेष जीव का नाम वर्ग विशेष के लोगों की भावनाओं को आहत न होने देने के कारण नहीं लिख रहे हैं, उस विशेष जीव को पालेंगे-पोसेंगे या फिर वही ट्रीटमेंट देंगे, जो उसे हमेशा से दिया जाता रहा है? मानसिकता को, दृष्टि को कम से कम इतना तो खुला रखना चाहिए कि भटकने के बाद भी सबकुछ समझ आए, साफ़ दिखे.


21 अगस्त 2025

डिजिटल युग में हिन्दी भाषा का विकास

समय के साथ-साथ हिन्दी भाषा अपना विस्तार करती जा रही है. अपने देश में भले ही हिन्दी को लेकर विवाद जैसी स्थिति रहती हो मगर वैश्विक स्तर पर हिन्दी लगातार विकास कर रही है. वर्तमान डिजिटल युग में अनेकानेक स्थितियाँ ऐसी हैं, जिनके सन्दर्भ में भाषाई स्तर को, उसके महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता है. इसी में हिन्दी भाषा ने भी अपने स्वरूप को बढ़ाया है.

 

डिजिटल युग में हिन्दी की प्रासंगिकता को लेकर किसी भी तरह के भ्रम की स्थिति नहीं है. तकनीक का भाषाई विकास में प्रमुख योगदान है. इंटरनेट, सोशल मीडिया, ई-कॉमर्स और ऑनलाइन माध्यम से शिक्षा ने हिन्दी के उपयोग को बढ़ाया है. तकनीक के विस्तार के चलते ही अनेक सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म आज समाज में प्रचलित हैं. फेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, व्हाट्सएप आदि माध्यमों में आज हिन्दी भाषा में पर्याप्त सामग्री मिल रही है. रील्स के द्वारा हो या फिर वीडियो के द्वारा, लिखित सामग्री हो या फिर कोई चित्र सभी में बहुतायत में हिन्दी भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है. बहुसंख्यक लोग भी अन्य भारतीय भाषाओं के साथ-साथ हिन्दी में संवाद करना पसंद कर रहे हैं.

 

इसके अलावा अनेक कम्पनियाँ ऐसी हैं जिनका व्यापार, कारोबार डिजिटल रूप में होता है. बहुत सारे नागरिक, युवा आज डिजिटल माध्यम से खरीददारी करने में अधिक विश्वास करते हैं. इनके लिए भी ऑनलाइन व्यापार करने वाली कम्पनियों ने हिन्दी माध्यम को भी अपना रखा है. अमेज़न, फ्लिपकार्ट जैसी कम्पनियों द्वारा अपने इंटरफेस को हिन्दी में उपलब्ध कराया जा रहा है. यह बभी हिन्दी के विस्तार को दर्शाता है. ऐसा होने के कारण इन कम्पनियों से जुड़ने वाले लोग शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों से भी हैं.

 

देखा जाये तो हिन्दी अब केवल भाषा नहीं, केवल बोलचाल का माध्यम नहीं बल्कि वह सांस्कृतिक आधार का निर्माण कर रही है, आर्थिक और तकनीकी क्षेत्र में भी एक सशक्त माध्यम बनकर स्थापित हो चुकी है.

 

01 मार्च 2025

विलुप्त होती डायरी लेखन विधा

कई बार बहुत सी बातें अनायास ही निकल आती हैं, ऐसी बातें जिनका कोई चर्चा नहीं हो रहा होता है, जिनके बारे में कोई बात नहीं चल रही होती है. ये मानवीय स्वभाव है कि किसी भी बात को अन्य दूसरी बात से सम्बंधित कर ही लेते हैं. ऐसी ही किसी बात की चर्चा के दौरान अचानक से डायरी लेखन की चर्चा होने लगी. इस चर्चा के आरम्भिक बिन्दु में पहली बात यही उठी कि क्या आजकल डायरी लेखन बंद हो गया है? या फिर साहित्य की इस महत्त्वपूर्ण विधा को महत्त्व नहीं दिया जा रहा है? इन दो सवालों से इतर बात कोई और भी हो तो कहा नहीं जा सकता मगर एक बात ये तो है कि वर्तमान में डायरी लेखन की चर्चा सार्वजनिक रूप से नहीं हो रही है.

 

इधर सामान्य चर्चा के दौरान बात हो रही थी व्यक्ति के व्यवहार की, उसकी मनोदशा की और उससे बाहर निकलने की. इसी में एक बिन्दु यह भी सामने आया कि कोई व्यक्ति यदि किसी बात को लेकर परेशान है, समस्या से ग्रस्त है ऐसे में यदि उसके पास कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जिससे वह अपनी बात को खुलकर कह सके तो यदि वह अपनी बात को लिखकर व्यक्त कर दे तो उसकी समस्या का बहुत बड़ा हिस्सा स्वतः ही वहीं समाधान में बदल जाता है. किसी के लिए यह बात कितनी महत्त्वपूर्ण है, कितनी प्रभावी है इसका तो पता नहीं पर व्यक्तिगत रूप से इस कदम से हमें बहुत लाभ हुआ है. किसी तरह की समस्या होने पर, कुछ दिक्कत होने पर अपनी बात न कह पाने की स्थिति में कागज़ पर कुछ लिख देने से, कोई कविता लिख देने से, उस विषय से सम्बंधित कोई लेख लिख देने से दिल-दिमाग को बहुत आराम मिलता है. संभवतः डायरी विधा के जन्मने का एक कारण यह भी रहा होगा.

 

आजकल देखने में आ रहा है कि कम उम्र के बच्चे भी हताशा-निराशा में आत्महत्या जैसा कदम उठा रहे हैं, मौत को गले लगा रहे हैं. दुनियादारी की भागदौड़ इस कदर तेज है कि अपने परिवार में ही रुककर किसी दूसरे सदस्य की समस्या को देखने की फुर्सत नहीं है, ऐसे में समाज से क्या उम्मीद की जाये. आज के बच्चे अपने आपमें ही नितांत एकाकी जीवन गुजार रहे हैं, ऐसे में उनके सामने अपनी बात कहने की, अपनी समस्या कहने की दिक्कत तो है ही. उनको न तो उनकी पढ़ाई के दौरान, न ही पारिवारिक क्षणों में इस तरह की किसी भी प्रक्रिया से परिचित करवाया गया है. ऐसी स्थिति में उनको डायरी लेखन की वास्तविकता से क्या ही अवगत कराया गया होगा, ये सोचा-समझा जा सकता है.

 

इधर सामान्य चर्चाओं में बहुत से लोगों द्वारा डायरी लेखन और ब्लॉग लेखन को एकसमान, एक जैसा बताने का प्रयास किया जा रहा है. देखा जाये तो ये दोनों स्थितियाँ ही अलग हैं. इन दोनों के बीच किसी भी तरह का कोई साम्य नहीं है. आज की पीढ़ी को डायरी लेखन का महत्त्व समझाना होगा. हिन्दी साहित्य के पाठ्यक्रम में इसे किसी पेपर के एक बिन्दु के रूप में रखने से इस विधा का भला नहीं हो रहा. डायरी लेखन विधा को एक स्वतंत्र विधा के रूप में विकसित करने की, स्थापित करने की आवश्यकता है.


31 जुलाई 2024

प्रेमचन्द से इतर भी है साहित्य

विषयों और विमर्शों का ताना-बाना बुनते हुए समाज निरंतर आगे ही बढ़ता रहता है. साहित्य अत्यंत सूक्ष्मता के साथ किसी भी बहस, विमर्श पर अपनी नजर बनाये रखता है, इसीलिए साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है. समय के साथ हुए अनेक परिवर्तनों को समाज ने स्वीकारा है किन्तु साहित्यिक जगत ने ऐसा करने में बहुत हद तक कंजूसी की है, आज भी करता है. इक्कीसवीं सदी आने के साथ ही वैश्विक रूप से बहुत कुछ बदला है. जीवन-शैली, मूल्यों, विचारों, परिवार, संस्कृति, रिश्तों आदि में न केवल परिवर्तन हुए हैं वरन पुरातन ढाँचों का विखंडन, विध्वंस भी हुआ है. ये और बात है कि प्रत्येक परिवर्तन, विखंडन, विध्वंस के साथ विरोधात्मक स्वरों का उठना होता रहा किन्तु परिवर्तनों को आवश्यकतानुरूप स्वीकारा भी जाता रहा. परिवर्तनों के इन्हीं विध्वंस और नव-निर्माण के क्रम से सामाजिक ताने-बाने का विस्तार होता रहा.

 

साहित्य में परिवर्तनों को स्वीकारने में खुलापन न मिलने को यदि आज की तारीख के सन्दर्भ में देखा जाये तो और भी स्पष्ट होता है. प्रतिवर्ष 31 जुलाई को साहित्य जगत में प्रेमचन्द जयंती का आयोजन देश भर में होता है. इन आयोजनों, कार्यक्रमों में प्रेमचन्द की परम्परा का जिक्र होता है, उनके साहित्य पर चर्चा होती है, उसकी प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला जाता है. इन सबके बीच कई सवाल भी खड़े होते हैं किन्तु उन पर विमर्श की दृष्टि से विचार करने की बजाय एकांगी रूप में विवाद किया जाता है. सवाल यह नहीं कि जिस कालखण्ड में प्रेमचन्द लेखन कर रहे थे, क्या उसी समय में उनके साथ कोई दूसरा लेखक साहित्य सृजन नहीं कर रहा था? सवाल यह भी नहीं कि जिस समय, परिस्थिति को देखते हुए प्रेमचन्द ने कहानियों, उपन्यासों का लेखन किया वे स्थितियाँ आज हैं अथवा नहीं? सवाल यह भी नहीं कि प्रेमचन्द की साहित्यिक परम्परा दक्षिणपंथी हैं, वामपंथी हैं या फिर कलावादी? सवाल यह भी नहीं कि प्रतिवर्ष जिस गम्भीरता से प्रेमचन्द के विचारों को प्रासंगिक मानते हुए मात्र मंचीय परम्पराओं में प्रसारित किया जाता है उनको उतनी ही गम्भीरता से आत्मसात क्यों नहीं किया जाता? सवाल यह भी नहीं कि आज की कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाली पीढ़ी को प्रेमचन्द के उस साहित्य द्वारा क्या सन्देश दिया जा रहा है जो आज से लगभग एक सदी पूर्व लिखा गया था?

 



ऐसे सवाल इसीलिए खड़े होते हैं क्योंकि हिन्दी साहित्य ने विस्तीर्ण रूप से सोचने में, नवोन्मेषी साहित्यकारों को आत्मसात करने में दरियादिली नहीं दिखाई है. ऐसा लगभग प्रत्येक कालखंड में हुआ है जबकि नए रचनाकार को, किसी भी नई रचना को आलोचना के केन्द्र में रखते हुए उस पर स्वीकारात्मक दृष्टि नहीं डाली गई वरन अस्वीकरण भाव रखा गया. यदि प्रेमचन्द के समकालीन लेखकों पर ही समीक्षात्मक रूप से विचार किया जाये तो जयशंकर प्रसाद, राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह, शिवपूजन सहाय, राहुल सांकृत्यायन, पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ आदि ऐसे साहित्यकार रहे हैं जिनकी गद्य रचनाओं का समग्र रूप में मूल्यांकन नहीं किया गया है. 1936 में प्रेमचन्द के निधन से पूर्व ही जैनेन्द्र, भगवती चरण वर्मा जैसे साहित्यकार अपने उपन्यासों के द्वारा साहित्यिक जगत में चमकने लगे थे. तत्कालीन साहित्यिक परिदृश्य में प्रेमचन्द के समकालीन साहित्यकारों पर विहंगम दृष्टि क्यों नहीं आरोपित की गई, इसके कारण भी तत्कालीन स्थितियों से निर्मित हुए होंगे लेकिन वर्तमान स्थितियों में हिन्दी साहित्य के पाठ्यक्रमों से समकालीन साहित्यकारों का, नवोन्मेषी साहित्यकारों का, रचनाओं का गायब रहना निश्चित ही अचंभित करने वाला तो है ही, शोध का विषय भी है.

 

आज जैसे ही पाठ्यक्रम परिवर्तन की चर्चा होती है, साहित्यकारों के नामों में बदलाव की बात होती है तो भूचाल सा आ जाता है, ऐसा एकाधिक बार हो चुका है. सोचने वाली बात है कि इक्कीसवीं सदी में जबकि सोचने, समझने, काम करने, रहन-सहन आदि का तरीका बदल चुका है; परिस्थितियों में परिवर्तन आ चुका है; तकनीकी में परिवर्तन आ चुका है; सामाजिक ढाँचे में बदलाव देखने को मिल रहे हैं; जीवन-मूल्यों में बदलाव आया है तब भी साहित्य के नाम पर लगभग विलुप्त हो चुकी स्थितियों को थोपने जैसा कार्य किया जा रहा है. हिन्दी साहित्य पाठ्यक्रमों में प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा स्तर तक या कहें कि शोध के स्तर तक प्रेमचन्द उपस्थित हैं. साहित्य महज पठन-पाठन का नहीं बल्कि खुद को समाज के सापेक्ष समझने-समझाने वाला माध्यम है. एक पल को विचार कीजिये कि वैश्विक मानकों से सम्बन्ध रखने वाली पीढ़ी किस तरह अतीत के उन मानकों के साथ समन्वय बनाएगी जो अब अस्तित्व में ही नहीं हैं? आज के वैश्वीकरण दौर में आज़ादी के पहले की मूल्य व्यवस्था से किस तरह तारतम्य जोड़ सकेगी? सुपरसोनिक गति का अनुभव करने वाली पीढ़ी बैलगाड़ी की गति को कैसे समझेगी?

 

विद्यार्थी वर्ग में साहित्यिक उदासीनता का एक कारण यह भी है. पाठ्यक्रमों में आज भी वह साहित्य आरोपित है जिसकी काल-सापेक्षता से वर्तमान पीढ़ी स्वयं को जोड़ नहीं पा रही है. ऐसा नहीं है कि प्रेमचन्द को वर्तमान परिदृश्य में खारिज कर दिया जाये. इसे भी पारिवारिक संरचना के रूप में समझने की आवश्यकता है. समय के साथ परिवार में प्राचीन मूल्यों का सम्मान करते हुए नवीन अवधाराणाओं को स्वीकार लिया जाता है; बुजुर्गों के अनुभवों से लाभान्वित होते हुए नव-विचारों को उन्मुक्त आकाश उपलब्ध कराया जाता है उसी प्रकार प्रेमचन्द की साहित्यिक छाँव में नवोन्मेषी साहित्य को, साहित्यकारों को भी पुष्पित-पल्लवित होने का अवसर मिलना चाहिए.

 


12 सितंबर 2023

हिन्दी शब्दों का अप्रचलित होते जाना सुखद नहीं

हिन्दी से सम्बन्धित दिवस, सप्ताह आदि का आयोजन शुरू होते ही सभी जगह हिन्दी की बात होने लगती है. हिन्दी को लेकर हिन्दी भाषियों और अहिन्दी भाषियों के द्वारा हिन्दी विकास के लिए अपने स्तर पर चर्चा आरम्भ हो जाती है. आज हिन्दी दिवस के अवसर पर हिन्दी के विकास, उसकी उन्नति, राष्ट्रभाषा बनने की राह में आते अवरोध, वैश्विक भाषा बनने की राह, हिन्दी उपन्यास को बुकर मिलने, हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ में भाषाई मान्यता मिलने आदि पर चर्चा न करके कुछ ऐसे बिन्दुओं पर चर्चा करते हैं, जिन पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता है. आज बहुत से हिन्दी शब्द सामान्य प्रयोग से बाहर होते जा रहे हैं या कहें कि बाहर किये जा रहे हैं. इनकी जगह पर अंग्रेजी शब्दों को सहजता से इस्तेमाल किया जा रहा है. ऐसी स्थिति के लगातार स्वीकार्यता मिलने से बहुत सारे हिन्दी शब्दों का विलोपन देखना पड़ सकता है. 




देखा जाये तो शब्दों की अपनी ही निराली दुनिया है. इस शाब्दिक दुनिया में ऐसे बहुत से शब्द हैं जिनका कोई विशेष अर्थ नहीं हैं मगर वे बहुतायत में बोले जाते हैं, आपसी वार्तालाप में प्रयोग किये जाते हैं. ऐसे शब्दों के अर्थ व्यक्तियों की बातचीत के सन्दर्भ में स्वतः निर्धारित हो जाते हैं. ग्रामीण अंचल में सहज रूप से बोलचाल में आने वाला शब्द ‘ठलुआ’ राजनीति में उस समय खूब चर्चा में रहा जबकि एक राजनैतिक महाशय ने इसे चर्चा के केन्द्र में ला दिया था. शब्दों के ऐसे प्रयोग के साथ-साथ शब्द-संकुचन, शब्द-विस्तार जैसी अवधारणा सहज देखने को मिलती है. हमारे आसपास बहुत से शब्द ऐसे हैं जो अपने मूल अर्थ से अधिक विस्तार पा गए. ‘डालडा’‘टुल्लू’‘ऑटो’‘तेल’ आदि ऐसे ही शब्द हैं जिनका अपना विशेष सन्दर्भ है किन्तु आज ये व्यापकता के साथ प्रयुक्त किये जा रहे हैं. वनस्पति घी के एक ब्रांड के रूप में सामने आये डालडा को आज ब्रांड नहीं वरन उत्पाद के रूप में देखा जाता है. इसी तरह तेल शब्द का अभिप्राय उस उत्पाद से है जो तिल से निकलता है. आज इसका विस्तार होकर अनेक तरह के पदार्थों के लिए प्रयोग में लाया जाने लगा. शब्दों की इसी व्यापकता के सन्दर्भ में आज एक शब्द ‘निर्भया’ भी चर्चा में है. दिल्ली में दिल दहलाने वाली घटना के बाद निर्भया शब्द चलन में आया और आज इसे अन्य दूसरी घटनाओं के साथ भी जुड़ा हुआ पाते हैं. बिना उसका मर्म जाने, बिना शब्दों का मूल भाव जाने उसे व्यापक सन्दर्भों में प्रयुक्त किया जाना भाषाई विसंगति ही है. 


शब्द-विस्तार की तरह शब्द-संकुचन की स्थिति भी देखने में आती है. इसके उदाहरण के रूप में ‘कमल’ को लिया जा सकता है. कमल के विविध पर्यायों के अलग-अलग सन्दर्भ, अलग-अलग अर्थ हैं वो चाहे ‘सरोज’ हो, ‘पंकज’ हो या फिर ‘नीरज’ आदि हो. इसके बाद भी किसी भी स्थान विशेष पर खिले हुए कमल-पुष्प को सिर्फ कमल से ही पुकारा जाता है. दरअसल शब्द-संकुचन अथवा शब्द-विस्तार की स्थिति व्यक्ति की उस मानसिकता के कारण उपजती है जहाँ वो किसी भी शब्द अथवा स्थिति के मूल में जाना पसंद नहीं करता. किसी शब्द के मूल अर्थ की जानकारी लेने का प्रयास नहीं करता है, वहाँ भी ऐसी स्थिति देखने को मिलती है. इनके अलावा भाषाई स्तर पर शब्दों के विलुप्त होने की स्थिति भी अब आम हो चली है.


शब्दों का विलुप्त होना उनके चलन में न रहने के कारणशब्द विशेष के कार्यों, वस्तुओं आदि के चलन में न रहने के कारणउनसे गँवईपन का बोध होने के चलते उनको किनारे किये जाने के कारण से होता है. बहुत सारे ऐसे शब्द हमारे बीच से इस कारण गायब हुए क्योंकि उनसे सम्बंधित सेवाओं का, वस्तुओं का प्रचलन ही समाज में नहीं हो रहा है. इनमें ‘भिश्ती’, ‘मसक’, ‘ठठेरा’, ‘सिल-बट्टा’, ‘मूसल’ आदि शब्दों को लिया जा सकता है. किसी समय ग्रामीण अंचलों में धड़ल्ले से बोले जाने वाला ‘फटफटिया’ शब्द ‘मोटरसाईकिल’ से होता हुआ ‘बाइक’ पर आकर रुक गया. इसी तरह से सामान्य बोलचाल में हिन्दी शब्दों की उपलब्धता के बाद भी अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग से भी बहुत से शब्द या तो चलन से बाहर हो गए हैं या फिर उसी राह पर हैं. घर में काम आने वाली ‘तश्तरी’ अब ‘प्लेट’ में बदल चुकी है. ‘प्याले’ भी ‘कप’ में बदल गए हैं. ‘फीवर’, ‘वीकनेस’, ‘डॉगी’, ‘केयर’, ‘टेस्टी’, ‘वीसी’, ‘रजिस्ट्रार’, ‘एडमीशन’, ‘लिस्ट’ आदि सहित ऐसे अनेक शब्द हैं जो बहुत तेजी से आम बोलचाल में शामिल होकर मूल हिन्दी शब्दों ‘बुखार’, ‘कमजोरी’, ‘कुत्ता’, ‘स्वादिष्ट’, ‘कुलपति’, ‘कुलसचिव’, ‘प्रवेश’, ‘सूची’ आदि को चलन से बाहर करने में लगे हैं.


भाषाई स्तर पर ये स्थिति चिंताजनक हैहोनी भी चाहिए क्योंकि ऐसे अनेक मूल हिन्दी शब्द अपने अस्तित्व में होने के बाद भी धीरे-धीरे चलन से बाहर होते जा रहे हैं. अपने अस्तित्व में होने के बाद भी शिक्षा क्षेत्र से ‘भौतिकी’, ‘रसायन विज्ञान’ आदि जैसे कुछ शब्द अब चलन से बाहर ही हैं. इनकी जगह पर सहजता से ‘फिजिक्स’,’ केमिस्ट्री’ का प्रयोग होने लगा है. कई बार लगता है कि जब इन्सान ने अपने रिश्तोंसंबंधोंपरिवार तक को विलुप्त होने की स्थिति में पहुँचा दिया है तो फिर शब्दों की बिसात ही क्या है. तकनीकी के बढ़ते जा रहे प्रभाव के चलते एक अबोल स्थिति इंसानों के मध्य पनपती जा रही है. सूचना तकनीकी क्रांति ने बातचीत को भी लगभग समाप्त कर दिया है. संदेशों का आदान-प्रदान करके कर्तव्यों की इतिश्री की जाने लगी है. ऐसी अबोल स्थिति में जबकि संवाद विलुप्त हैंबातचीत में ही शब्द विलुप्त हैं तो फिर भाषाई विलुप्तता से घबराहट किसलिए? 






 

20 जून 2022

स्कूटी वाली लड़की - कहानी संग्रह

हमारा बहुप्रतीक्षित कहानी संग्रह स्कूटी वाली लड़की प्रकाशित होकर आ गया है. आप सभी से निवेदन है कि उसे पढ़कर अपनी राय से अवगत कराने का कष्ट करें. 
पुस्तक अमेज़न और श्वेतवर्णा की साईट पर उपलब्ध है... 
अमेज़न: 279/-
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15 जून 2022

भाषाई संवर्द्धन में सहायक राष्ट्रीय शिक्षा नीति

देश के लिए भाषाई स्तर पर हाल की दो घटनाएँ निश्चित ही आह्लादकारी रही हैं. इनमें पहली घटना हिन्दीभाषी उपन्यास को बुकर पुरस्कार मिलना तथा दूसरी घटना संयुक्त राष्ट्र द्वारा अपनी भाषाओं में हिन्दी भाषा को शामिल करना रहा है. यह संयोग ही नहीं है कि एक तरफ भारत सरकार ने नई शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं, कला, संस्कृति के संवर्द्धन हेतु विशेष प्रावधान किये हैं और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय भाषा को एक अलग पहचान मिलनी भी दिखने लगी है. 


राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं, कला और संस्कृति के सम्बन्ध में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि ‘भारत की इस सांस्कृतिक सम्पदा का संरक्षण, संवर्धन एवं प्रसार देश की उच्चतम प्राथमिकता होनी चाहिए क्योंकि यह देश की पहचान के साथ-साथ अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण है. भारत में भ्रमण, भारतीय अतिथि सत्कार का अनुभव लेना, भारत के खूबसूरत हस्तशिल्प एवं हाथ से बने कपड़ों को खरीदना, भारत के प्राचीन साहित्य को पढ़ना, योग एवं ध्यान का अभ्यास करना, भारतीय दर्शनशस्त्र से प्रेरित होना, भारत के अनुपम त्योहारों में भाग लेना, भारत के वैविध्यपूर्ण संगीत एवं कला की सराहना करना और भारतीय फिल्मों को देखना आदि ऐसे कुछ आयाम हैं जिनके माध्यम से दुनिया भर के करोड़ों लोग प्रतिदिन इस सांस्कृतिक विरासत में सम्मिलित होते हैं, इसका आनंद उठाते हैं और लाभ प्राप्त करते हैं.’ कला, संस्कृति की यह विशालता निश्चित रूप से भाषा के साथ जुड़ती है. भाषा के माध्यम से ही किसी भी देश की संस्कृति, कला आदि से परिचय होता है, उसके साथ समन्वय बनता है. एक संस्कृति का दूसरी संस्कृति के नागरिकों संग बातचीत करना, एक देश का दूसरे देश के साथ तालमेल बैठाना, अपने अनुभवों को दूसरों से साझा करना आदि भाषा से ही संचालित होता है. यदि कहा जाये कि संस्कृति हमारी भाषाओं में समाहित है तो यह अतिश्योक्ति न होगी.




राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं के प्रति सजगता का एक बहुत बड़ा कारण है कि भारतीय भाषाओं के प्रति समुचित ध्यान नहीं दिया गया है. उनके संवर्द्धन, संरक्षण के प्रति भी सकारात्मक एवं ठोस कदम नहीं उठाये गए हैं. इस नकारात्मक वृत्ति का दुष्परिणाम यह रहा है कि विगत पचास वर्षों की कालावधि में देश ने अपनी दो सौ से अधिक भाषाओं को खो दिया है. यूनेस्को ने भी 197 भारतीय भाषाओं को लुप्तप्राय की श्रेणी में शामिल किया है. यह स्थिति किसी भी देश की भाषाई संस्कृति के लिए सुखद तो कदापि नहीं कही जाएगी. भारतीय भाषाओं की इसी दशा को देखते हुए शिक्षा नीति में प्रावधान किया गया है कि स्कूली स्तर पर ही कला, संगीत, हस्तकौशल पर विशेष ध्यान देते हुए शिक्षा का माध्यम मातृभाषा अथवा स्थानीय भाषा बनाया जाये. मातृभाषा अथवा स्थानीय भाषा में प्राथमिक शिक्षा को दिए जाने के पीछे भी सरकार की मंशा यही है कि कम से कम स्कूली शिक्षा, अध्ययन के माध्यम से ही मातृभाषा, स्थानीय भाषाओं का संरक्षण, संवर्द्धन हो सकेगा.


भाषा को लेकर यहाँ के नागरिकों में अनेक प्रकार के भ्रम फैले हुए हैं. शिक्षा क्षेत्र में ऐसे लोगों का विचार है कि विज्ञान विषयों का अध्ययन मातृभाषा में किया जाना सहज, संभव नहीं है. इसके लिए ऐसे राज्यों अथवा शिक्षण संस्थानों द्वारा अंग्रेजी को वरीयता दी जाती है. उनका मानना है कि उच्च माध्यमिक स्तर पर विज्ञान विषयों को अंग्रेजी माध्यम में ही पढ़ाना श्रेयस्कर है. इस बारे में देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम से सीख लेने की आवश्यकता है. यह सुनकर भाषाई विभेद करने वाले लोगों को आश्चर्य होगा कि डॉ. कलाम ने बारहवीं तक की सम्पूर्ण शिक्षा, जिसमें विज्ञान विषय भी शामिल हैं, अपनी मातृभाषा तमिल में ली थी. 


शिक्षा नीति में बहुभाषिक व्यवस्था को लागू करते हुए त्रिभाषा फार्मूला का यथाशीघ्र क्रियान्वयन किये जाने पर बल दिया गया है. त्रिभाषा फार्मूला के पीछे की भावना यही है कि हिन्दीभाषी राज्यों के विद्यार्थी दक्षिण अथवा अन्य राज्यों की एक भाषा सीखें, इसी तरह अहिन्दीभाषी राज्यों के विद्यार्थी हिन्दी सीखें. ऐसा करने से देश के विभिन्न राज्यों में फैली भाषाई कटुता को दूर करने में सहायता मिलेगी. राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इस प्रकार की व्यवस्था भी की गई है जिसके अंतर्गत भारतीय भाषाओं के शिक्षण को बढ़ावा देने हेतु राज्य परस्पर अनुबंध कर भाषा शिक्षकों का आदान-प्रदान कर सकते हैं.  त्रिभाषा फार्मूला में संस्कृत भाषा को भी मुख्य धारा में शामिल करने के लिए इसे उच्चतर शिक्षा तक अपनाये जाने की व्यवस्था की गई है. इसे एक पृथक विषय के पढ़ाने से ज्यादा रुचिपूर्ण एवं नवाचारी तरीकों से जोड़ने का सकारात्मक कदम उठाया गया है. गणित, खगोलशास्त्र, योग आदि सहित अन्य समकालीन विषयों को संस्कृत के साथ जोड़कर संस्कृत विश्वविद्यालयों और अन्य उच्चतर शिक्षण संस्थानों को बहु-विषयक संस्थानों के रूप में विकसित करने का मार्ग प्रशस्त किया गया है.


इन प्रावधानों के साथ ही शिक्षा नीति में अनुवाद को लेकर बहुत ही गंभीरता दिखाई गई है. अभी तक अनुवाद को मौलिक कार्य तो स्वीकारा ही नहीं जाता रहा है, इससे भी दुखद स्थिति यह रही है कि अनुवाद को दोयम दर्जे का माना जाता रहा है. इस दिशा में न तो बहुत ज्यादा कार्य हुआ हुआ है और न ही अनुवाद कार्य को प्रोत्साहित किया गया है. ऐसी स्थिति होने के कारण ज्ञान, विज्ञान, संस्कृति, इतिहास आदि विषयों के प्रसार का क्षेत्र संकुचित रह जाता है. किसी भी विषय का यदि उसी क्षेत्र की स्थानीय भाषा में अनुवाद करा दिया जाये तो उस ज्ञान से, उस विषय से सभी क्षेत्रों के नागरिक परिचित हो सकते हैं. यदि वैश्विक स्तर पर कोई ज्ञानवर्द्धक पुस्तक किसी भी भाषा में छपती है और यदि भारतीय भाषाओं में उसका अनुवाद उपलब्ध हो जाये तो निश्चित ही देश के नागरिक, विद्यार्थी वैश्विक साहित्य का लाभ अपनी भाषा में ले सकेंगे. राष्ट्रीय शिक्षा नीति में राष्ट्रीय अनुवाद संस्थान की स्थापना तथा अनुवाद के उच्च गुणवत्ता वाले पाठ्यक्रम चलाने का प्रावधन किया जाना दर्शाता है कि भाषा विकास हेतु सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया गया है.


कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारत के विभिन्न भाषाओं, बोलियों, कला एवं संस्कृति के संवर्धन हेतु पर्याप्त प्रावधान किये गये हैं. यदि इन सभी प्रावधानों का शतप्रतिशत क्रियान्वयन हो गया तो भारतीय सनातन संस्कृति अपने गौरवशाली अतीत को पुनः प्राप्त कर भारत को विश्व के अग्रिम पंक्ति के देशों में स्थापित करने में सफल होगी. यहाँ हम सभी को स्मरण रखना होगा कि यदि नागरिकों में अपनी ही भाषा के प्रति स्वाभिमान नहीं होगा तो उनको विश्व में कहीं सम्मान नहीं मिल सकेगा.


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11 जून 2022

संयुक्त राष्ट्र की भाषाओं में हिन्दी सम्मिलित

न्यूयॉर्क. संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने बहुभाषावाद(multilingualism) पर एक उल्लेखनीय पहल की है। भारत के लिए यह गौरव की बात है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा(UNGA) के कामकाज में अब हिंदी भाषा को भी जगह मिलेगी। UNGA ने 10 जून को इस दिशा में एक उल्लेखनीय पहल करते हुए  बहुभाषावाद (multilingualism) पर भारत की ओर से पेश किए गए प्रस्ताव को पारित कर दिया। यानी अब  UNGA के कामकाज में हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं को भी तवज्जो मिलेगी। बता दें कि अरबी, चीनी, अंग्रेजी, फ्रेंच, रूसी और स्पेनिश संयुक्त राष्ट्र की 6 आफिसियल लैंग्वेज हैं, जबकि अंग्रेजी और फ्रेंच UN सेक्रेट्रिएट की कामकाजी भाषाएं हैं।




हिंदी के अलावा बांग्ला और उर्दू को भी मिली जगह

UNGA में शुक्रवार को पारित प्रस्ताव में कहा गया है कि हिंदी भाषा सहित ऑफिसियल और नन ऑफिसियल लैंग्वेजेज संयुक्त राष्ट्र के इम्पोर्टेंट कम्युनिकेशन और मैसेजेज के प्रसार को प्रोत्साहित करती हैं। इस साल पहली बार प्रस्ताव में हिंदी भाषा का उल्लेख है। इस प्रस्ताव में पहली बार बांग्ला और उर्दू का भी जिक्र है। यूनाइटेड नेशन में भारत के परमानेंट रिप्रेजेंटेटिव टीएस तिरुमूर्ति( TS Tirumurti) ने इस पहल का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि बहुभाषावाद को UN की कोर वैल्यु के रूप में मान्यता दी गई है। तिरुमूर्ति ने बहुभाषावाद व हिंदी को प्राथमिकता देने के लिए यूएन महासचिव के प्रति आभार जताया। उन्होंने कहा कि भारत 2018 से यूएन के ग्लोबल कम्युनिकेशन डिपार्टमेंट (DGC) के साथ पार्टनरशिप कर रहा है। यूएन की न्यूज  और मल्टीमीडिया कंटेंट्स को हिंदी में प्रसारित करने व मुख्यधारा में लाने के लिए अलग से फंड दे रहा है।


हिंदी @ यूएन प्रोजेक्ट

बता दें कि हिंदी को बढ़ावा देने के प्रयासों के तहत 'हिंदी @ यूएन' प्रोजेक्ट 2018 में शुरू किया गया था। इसका मकसद हिंदी भाषा के जरिये संयुक्त राष्ट्र की अप्रोच को और व्यापक बनाने के साथ दुनिया भर में लाखों हिंदी भाषी आबादी के बीच इंटरनेशनल मुद्दों के बारे में अधिक जागरुकता फैलाना रहा है। तिरुमूर्ति ने कहा-"इस संदर्भ में मैं 1 फरवरी, 1946 को पहले सेशन में अपनाए गए UNSC के प्रस्ताव 13(1) को याद करना चाहूंगा, जिसमें कहा गया था कि संयुक्त राष्ट्र अपने उद्देश्यों को तब तक प्राप्त नहीं कर सकता जब तक कि दुनिया के लोगों को इसके उद्देश्यों और एक्टिविटीज के बारे में पूरी जानकारी नहीं हो।" यानी तिरुमूर्ति का आशय भाषा की पहुंच से था।


क्या है संयुक्त राष्ट्र महासभा यानी UNGA

संयुक्त राष्ट्र महासभा (United Nations General Assembly) जिसे संक्षिप्त में UNGA भी कहते हैं, संयुक्त राष्ट्र (United Nations) के मुख्य 6 अंगों में से एक है।  यह एक इंटरनेशनल पॉलिटिकल फोरम है। यहीं से अंतरराष्‍ट्रीय सियासत के एजेंडे तय होते हैं। UNGA को दुनिया की लघु संसद भी कहा जाता है। इसकी पहली सभा 10 जनवरी 1946 को लंदन के मेथोडिस्ट सेंट्रल हॉल में आयोजित हुई थी। उस समय इसके सिर्फ 51 देश मेंबर थे। आज यह संख्‍या 193 हो चुकी है।


(उक्त आलेख इस वेबसाइट से ज्यों का त्यों लिया गया है. इसका किसी भी रूप में व्यावसायिक उपयोग नहीं किया जा रहा है. इसे जनहित में जानकारी प्रसारित करने के उद्देश्य से लगाया गया है.)

उक्त समाचार के बारे में कुछ अन्य जानकारी यहाँ क्लिक करके भी प्राप्त की जा सकती है.


23 फ़रवरी 2022

बचपन से परिचित नाम जुड़ा डिग्री में भी, कैरियर में भी

वृन्दावन लाल वर्मा, इस नाम से परिचय बचपन में ही हो गया था. यद्यपि उस समय आपके बारे में बहुत जानकारी नहीं थी तथापि इतना अवश्य पता चल गया था कि ये कहानियों जैसा, किताबों जैसा कुछ लिखते हैं. सात-आठ वर्ष की उम्र में साहित्य के नाम पर बस कहानी, कविता शब्द ही समझ आते थे क्योंकि इनको अपनी पाठ्य-पुस्तकों में देख-पढ़ रहे थे. इसके अलावा घर पर पढ़ने का माहौल बना होने के कारण भी पुस्तकों के रूप में वृन्दावन लाल वर्मा नाम देखने को मिल रहा था. बाद में टीवी पर आने वाले मृगनयनी धारावाहिक को देखने के दौरान और भी स्पष्ट जानकारी हुई. उसी धारावाहिक को देखने के दौरान मृगनयनी उपन्यास पढ़ने का अवसर मिला.


बाद में कक्षाओं में, पाठ्य-पुस्तकों में ऐसे उलझे कि साहित्य के नाम पर बहुत सी पुस्तकों से परिचय स्नातक अध्ययन के दौरान ही कॉलेज के पुस्तकालय के माध्यम से हुआ. उसमें भी वृन्दावन लाल वर्मा जी के साहित्य को अलग-अलग करके नहीं देखा-समझा. झाँसी की रानी और गढ़ कुंडार उसी दौरान पढ़ने को मिले. बस पढ़ने का शौक था, सो पढ़ लिया मगर कभी सोचा नहीं था कि बचपन से सुनते चले आ रहे इस नाम का सम्बन्ध हमारे कैरियर से, हमारी डिग्री से भी हो जायेगा.


हिन्दी साहित्य से परास्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद पितातुल्य ब्रजेश अंकल के द्वारा पीएच.डी. करने का आदेश हुआ. हमारी तरफ से बहुत दिनों से इस मामले को लेकर टालमटोल हो रही थी. एक दिन अंकल ने न केवल आदेश दिया बल्कि हमारे ऊपर अत्यंत स्नेह भाव, वरदहस्त रखने वाले डॉ. दुर्गा प्रसाद श्रीवास्तव जी के पास भी ले गए. उनके सामने शिष्य भाव से जाकर बैठ गए. उस समय तक दिमाग में ये था कि जब परास्नातक की डिग्री ले ली है तो अपने नाम के आगे डॉ. अवश्य ही लगवाएंगे मगर ऐसा कब करेंगे, किस विषय से करेंगे ये न सोचा था. विषय का चक्कर इसलिए भी था क्योंकि हिन्दी साहित्य से परास्नातक के पूर्व हम अर्थशास्त्र में एमए की डिग्री हासिल कर चुके थे.


खैर, दो-चार सवाल इधर-उधर के होने के बाद, सामान्य सी बातचीत होने के बाद डीपी सर (डॉ. दुर्गा प्रसाद श्रीवास्तव जी को सामान्य बोलचाल में इसी संबोधन से पहचाना जाता रहा है) ने हिन्दी साहित्य में हमारी रुचि और हमारे पसंद के शोध क्षेत्र की जानकारी ली. सर को बताया कि गद्य में ज्यादा रुचि है और हम चाहते हैं कि हमारी पीएच.डी. किसी भी विषय में हो पर क्षेत्र बुन्देलखण्ड का हो. ऐसा जानते ही सर ने तत्काल कहा कि वृन्दावन लाल वर्मा जी के साहित्य में कर लो, उनका साहित्य मूलतः गद्य ही है. चूँकि इस नाम से हम बचपन से ही परिचित थे, सो हमने भी तुरंत सहमति में अपना सिर हिला दिया.


उसी समय सर ने शोध-विषय ‘वृन्दावन लाल वर्मा के साहित्य में अभिव्यक्त सौन्दर्य का अनुशीलन’ निर्धारित कर दिया. अगले दिन सिनोप्सिस बना कर विश्वविद्यालय जमा करने का आदेश दिया. बाद में बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी द्वारा संशोधन के बाद हमें शोध-कार्य करने के लिए ‘डॉ. वृन्दावन लाल वर्मा के उपन्यासों में अभिव्यक्त सौन्दर्य का अनुशीलन’ शीर्षक अनुमोदित हुआ. दो वर्षों की अवधि में अपना शोध-कार्य विश्वविद्यालय में जमा करके अगले वर्ष सम्पूर्ण आवश्यक प्रक्रिया के बाद अपने नाम के आगे डॉ. लगाने की अनुमति और गौरव प्राप्त हुआ. किसी समय बस नाम से परिचित होने वाले व्यक्तित्व से अपने शोध-कार्य के दौरान व्यापकता के साथ परिचय हुआ. यह बात हमें आज भी गौरवान्वित करती है कि बचपन से परिचित नाम हमारे साथ न केवल डिग्री रूप में जुड़ा बल्कि यही डिग्री आगे चलकर हमारा कैरियर बनी. वर्ष २००५ में हिन्दी साहित्य से ही स्थानीय गांधी महाविद्यालय में अध्यापन करने का अवसर मिला और सहायक प्राध्यापक के रूप में हमारा चयन हुआ. इसके साथ ही हमारे लिए यह भी गौरव का विषय आज तक है कि हमारे शोध-निर्देशक डॉ. दुर्गा प्रसाद श्रीवास्तव जी देश में तीसरे ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने दो विषयों में डी.लिट्. की उपाधि प्राप्त की हुई थी. डीपी सर ने हिन्दी साहित्य और भाषा विज्ञान में डी.लिट्. उपाधि हासिल की थी.




एम.ए. करने के बाद अपने नाम के आगे डॉ. लगाने की इच्छा रखने की पूर्ति इस रूप में हुई कि हिन्दी साहित्य के साथ-साथ अर्थशास्त्र विषय से भी बाद में पीएच.डी. उपाधि बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी से प्राप्त की. अपनी पढ़ाई के दौरान से ही हम पर विशेष स्नेह रखने वाले डॉ. शरद जी श्रीवास्तव सर ने निर्देशन में अर्थशास्त्र विषय में पीएच.डी. उपाधि हासिल करने का सौभाग्य मिला. इसका भी शोध-क्षेत्र हमने बुन्देलखण्ड ही चुना.


आज, २३ फरवरी को प्रसिद्द उपन्यासकार, नाटककार वृन्दावन लाल वर्मा जी की पुण्यतिथि है.  हिन्दी उपन्यास के विकास में उनका योगदान महत्त्वपूर्ण है. उन्होंने ऐसे दौर में जबकि प्रेमचंद उपन्यास विधा में एक युग बन चुके थे, उपन्यास के क्षेत्र में न केवल प्रवेश किया बल्कि ऐतिहासिक उपन्यासों की सफल रचना करके अपना एक अलग, विशिष्ट स्थान बनाया. देखा जाये तो वृन्दावन लाल वर्मा जी ने एक तरफ प्रेमचंद की सामाजिक परंपरा को आगे बढ़ाया तो दूसरी तरफ हिन्दी में ऐतिहासिक उपन्यास की धारा को उत्कर्ष तक पहुँचाया.


आज उनकी पुण्यतिथि पर सादर नमन.


15 नवंबर 2021

हमारे लेखन के प्रति आपके विश्वास ने लगातार लिखने को प्रेरित किया है

हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग की सूची आ गई है. प्रसन्नता की बात है कि आप सभी के पढ़ते रहने के कारण, लेखन हेतु प्रोत्साहित करने के कारण हमारा ब्लॉग रायटोक्रेट कुमारेन्द्र भी इस सूची में है.

कुल 107 ब्लॉग को इस सूची में सम्मिलित किया गया है. पूरी सूची आप इस लिंक से देख सकते हैं.



सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग सूची में आये अन्य ब्लॉग-लेखकों को भी बधाई-शुभकामनाएँ.

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ब्लॉग लेखन वर्ष 2008 से नियमित रूप से चल रहा है. लेखन एक बात है, उससे बड़ी बात है कि आप सुधिजनों, शुभेच्छुओं द्वारा लगातार इसे पढ़ा भी जा रहा है. यहाँ कहें कि महज पढ़ा ही नहीं जा रहा है, उससे एक कदम आगे आकर हमें सराहा जा रहा है, प्रोत्साहित किया जा रहा है. ऐसा इसलिए क्योंकि आये दिन हमारे मित्र, हमारे सहयोगी, हमारे शुभचिंतक, हमारे पाठक, हमारे परिजन आदि विषय, मुद्दे बताते, सुझाते हैं लिखने के लिए. आप सभी के इस स्नेह, प्यार, हमारे लेखन के प्रति आपके विश्वास ने लगातार लिखने को प्रेरित किया है. ऐसे में ब्लॉग को मिलने वाला सम्मान आपका सम्मान है, आपका स्नेह है.

हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग की सूची में आपका यह ब्लॉग विगत कई वर्षों से लगातार सम्मिलित हो रहा है. इसके लिए आप सभी की शुभकामनायें हमारी शक्ति बनी हैं. आप सभी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने योग्य न तो हम हैं और न ही हमारे पास शब्द हैं. यही कामना है, आकांक्षा है कि आप अपना यह स्नेह, प्यार, विश्वास लगातार, सदैव हम पर, हमारे लेखन पर, हमारे ब्लॉग पर बनाये रहिएगा.

हमारे मीडिया के मित्रों ने ब्लॉग की इस उपलब्धि को अपने-अपने मंचों पर स्थान दिया है. उनके स्नेह और सहयोग की अपेक्षा सदैव के लिए है.








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14 सितंबर 2021

अपनी भाषा का सम्मान रहे

हिन्दी दिवस का आयोजन बहुत से लोगों के लिए महज एक औपचारिकता सी है. इस औपचारिकता में लोग भूल जाते हैं कि यह दिवस हिन्दी के लिए है न कि हिन्दी साहित्य के लिए. आज सुबह-सुबह ही एक सज्जन मिल गए. उन्होंने हिन्दी दिवस की शुभकामनायें दी तो हमने भी जवाब में उनको शुभकामना बोल दिया. इस पर वे बड़े ही आत्ममुग्ध भाव से बोले कि न, ये हमारा दिन नहीं बल्कि आपका दिन है. हम तो साइंस वाले आदमी हैं. हमारा हिन्दी से क्या काम?


उनको ये बताते हुए कि हम भी साइंस वाले आदमी हैं, समझाया कि आपने अभी जो गर्वोक्ति की है वो किस भाषा में की? बस इसी भाषा को बोलने वालों का दिन है ये.


इस पर उनको ऐसा अनुभव हुआ जैसे कि किसी बहुत बुरी स्थिति में ला खड़ा कर दिया हो. उनके चेहरे की भाव-भंगिमा से लगा कि वे अपने आपको हिन्दी वाला आदमी बताये जाने पर अपमानित महसूस कर रहे हैं.


जब भी हिन्दी भाषी व्यक्तियों के साथ में इस तरह की मानसिकता जन्म लेगी, हिन्दी का विकास नहीं हो सकता. हिन्दी ही क्या किसी भी भाषा को बोलने, लिखने, पढ़ने वाले जब निम्न स्तर की मानसिकता लेकर समाज में कार्य करेंगे, उस भाषा का विकास होना कठिन है.


बहरहाल, हिन्दी दिवस पर हमारे कुछ विचार अपने मित्रों सहित प्रकाशित हैं. उनको पढ़िए और प्रयास करिए कि हिन्दी के विकास में अपना कुछ योगदान कर सकें.




09 जनवरी 2021

ऐतिहासिकता को जीवंत स्वरूप प्रदान करने वाले साहित्यकार

हिन्दी उपन्यासों के वाल्टर स्कॉट कहलाने वाले वृन्दावनलाल वर्मा की आज 131वीं जयंती है. आज ही 9 जनवरी सन 1889 को उनका जन्म झाँसी जिले के मऊरानीपुर में हुआ था. उनका बचपन अपने चाचा के पास ललितपुर में बीता. चाचा के साहित्यिक-सांस्कृतिक रुचि के होने के कारण उनकी भी रुचि पौराणिक तथा ऐतिहासिक कथाओं के प्रति बचपन से ही थी. लेखन प्रवृत्ति बचपन से ही होने के कारण उन्होंने नौंवीं कक्षा में ही तीन छोटे-छोटे नाटक लिखकर इण्डियन प्रेस प्रयाग को भेजे. जहाँ से उनको पुरस्कार स्वरूप 50 रुपये भी प्राप्त हुए. प्रारम्भिक शिक्षा भिन्न-भिन्न स्थानों पर संपन्न करने के बाद उन्होंने बी.ए. और क़ानून की परीक्षा पास की. इसके बाद वे झाँसी में वकालत करने लगे.


पौराणिक और ऐतिहासिक विषयों के प्रति रुचि होने के चलते और लेखन के द्वारा भारतीय इतिहास की सत्यता सबके सामने लाने की उनकी प्रतिज्ञा ने मात्र बीस साल की अल्पायु में सन 1909 में उनसे सेनापति ऊदल नाटक लिखवा लिया. इसके राष्ट्रवादी तेवरों से बौखलाकर अंग्रेज़ सरकार ने इस नाटक पर पाबंदी लगा कर इसकी प्रतियाँ जब्त कर लीं. बचपन में भारतीय समृद्ध इतिहास के प्रति नकारात्मक भाव देखकर वृन्दावन लाल वर्मा देश का वास्तविक इतिहास सबके सामने लाने की प्रतिज्ञा कर चुके थे.  उनकी प्रतिज्ञा अपने आपसे थी, इसी कारण वे इतिहास की सत्यता सामने लाने के लिए लगातार प्रयत्नशील बने रहे. इसी के चलते उन्होंने ऐतिहासिक विषयों की ओर अपना ध्यान केन्द्रित किया. इसके साथ-साथ ऐतिहासिक उपन्यास लिखने की प्रेरणा उनको प्रसिद्द ऐतिहासिक उपन्यासकार वाल्टर स्काट से मिली. गढ़कुंडार जैसे विस्तृत उपन्यास की कथा-वस्तु के बारे में उनका स्वयं का कहना है कि एक शिकार कार्यक्रम के दौरान रात भर उस किले की छवि देखते-देखते ही उन्होंने उसकी एतिहासिकता की कथा को स्वरूप प्रदान कर दिया था. 


उनका ऐतिहासिक उपन्यास लेखन की तरफ प्रवृत्त होना उस समय बहुत ही साहसिक कदम कहा जायेगा क्योंकि उस दौर में प्रेमचंद उपन्यास सम्राट के रूप में अपनी सशक्त उपस्थिति हिन्दी साहित्य में बनाये हुए थे. ऐसे दौर में इतिहास जैसे विषय पर लेखन करना और उसे जनसामान्य के बीच सहज मान्यता प्रदान करवाना सरल नहीं था. वृन्दावन लाल वर्मा जी की सरल और रोचक लेखन-शैली का ही कमाल कहा जायेगा कि उनके पहले ऐतिहासिक उपन्यास ने उन्हें पर्याप्त ख्याति प्रदान करवा दी. उनके पहले ऐतिहासिक उपन्यास गढ़कुंडार को जबरदस्त प्रसिद्धि मिली. इसके बाद तो वृन्दावन लाल वर्मा ने विराटा की पद्मिनी, कचनार, झाँसी की रानी, माधवजी सिंधिया, मुसाहिबजू, भुवन विक्रम, अहिल्याबाई, टूटे कांटे, मृगनयनी आदि सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यास लिखे. उनके उपन्यासों में इतिहास जीवन्त होकर बोलता है. इसके साथ-साथ उन्होंने सामाजिक उपन्यास, नाटक, कहानियाँ भी लिखीं. उनकी आत्मकथा अपनी कहानी भी सुविख्यात है.




भारतीय ऐतिहासिकता को साहित्यिक जगत में जीवंत स्वरूप में प्रदान करने वाले साहित्यकार वृन्दावन लाल वर्मा सन 23 फ़रवरी 1969 में हमसे विदा हो गए. उनकी मृत्यु के 28 साल बाद 9 जनवरी सन 1997 को भारत सरकार ने उन पर एक डाक टिकट जारी किया.

आज उनके जन्मदिन पर उनकी पुण्य स्मृतियों को नमन...


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वंदेमातरम्



05 अक्टूबर 2020

हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग में रायटोक्रेट कुमारेन्द्र : वर्ष 2020




वर्ष 2020 के हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग में हमारा ब्लॉग रायटोक्रेट कुमारेन्द्र भी शामिल है.
(kumarendra.blogspot.com)

पूरी सूची इस लिंक पर है.
https://www.indiantopblogs.com/p/hindi-blog-directory.html


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23 सितंबर 2020

शब्द-विस्तार और शब्द-संकुचन

हिन्दी साहित्य का अध्ययन करते समय पढ़ा था शब्द-संकुचन और शब्द-विस्तार के बारे में. बहुत से लोगों के लिए ये दो शब्द संयोजन भी आश्चर्य का विषय हो सकते हैं. शब्द-संकुचन और शब्द-विस्तार आजकल संभवतः किसी रूप में पढ़ाया नहीं जा रहा.


आज यहाँ फेसबुक पर चलाए जा रहे एक कपल चैलेंज के सन्दर्भ में ऐसा ही कुछ देखने को मिला. इस सोशल मीडिया ने ही नहीं बल्कि समाज ने इस कपल शब्द की परिभाषा ही बदल कर रख दी है. आज दिन भर की फेसबुक की भागदौड़ में यही नजर आया कि लोगों के लिए कपल का अर्थ महज पति-पत्नी से ही है. इसी को शब्द-संकुचन कहते हैं.


शब्द-संकुचन और शब्द-विस्तार के बारे में एक-दो उदाहरण देकर समझाएँगे तो सबकी समझ में आ जाएगा. हम सभी लोग एक शब्द निरंतर प्रयोग में लाते हैं और वह है तेल. इस शब्द का वास्तविक अर्थ है तिल से निकलने वाले तरल पदार्थ से. यह शब्द-विस्तार का उदाहरण है कि आज समाज में बहुत से तेल हम सभी इस्तेमाल करते हैं. सरसों का तेल, आँवले का तेल, गरी का तेल आदि-आदि. ये शब्द का विस्तार कहा जाता है जबकि किसी भी शब्द के अनेक अर्थ निर्मित हो जाएँ और चलन में आ जाएँ.


इसी तरह शब्द-संकुचन के रूप में हम कमल को देख सकते हैं. कमल के रूप में बहुत से नाम हमारे बीच हैं. सरोवर में खिले तो सरोज, कीचड़ में खिले तो पंकज, जल में खिले तो जलज मगर हम सभी को एक ही शब्द कमल से परिभाषित करते हैं.


कपल शब्द के अनेक अर्थ हैं जो युगल को, दो को, जोड़े को प्रदर्शित करते हैं मगर आज सभी ने पति-पत्नी की ही फोटो यहाँ लगाई. शब्द-संकुचन से शब्द की वास्तविक शक्ति कम हो जाती है. किसी भी दो के जोड़े को सामान्य अर्थों में कपल कहा जा सकता है. इसके बाद भी अंग्रेजी भाषा की संकुचित परिभाषा के चलते सभी लोग एक ही जगह पर अटके रहे.


फिलहाल तो सभी को अपने-अपने कपल की बधाई. बाकी हिन्दी का जो सामान्य सा ज्ञान हमारे पास था, उसे यहाँ बघार दिया. हिन्दी के मूर्धन्य विद्वान किसी भी गलती के लिए हमें क्षमा करेंगे.


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16 सितंबर 2020

देवनागरी और मानकीकृत वर्णमाला

हिन्दी दिवस के बाद अब फिर सबकुछ सामान्य सा दिखाई दे रहा है. मानकीकृत देवनागरी के सम्बन्ध में एक दिन पर्याप्त चर्चा होने के बाद अब शांति है. देवनागरी मूलतः संस्कृत भाषा की लिपि है और अब इसे अनेक भाषाओं ने अपनाया है. हिन्दी को राष्ट्रभाषा का स्थान तो नहीं मिल सका है, हाँ वह राजभाषा अवश्य है और इसकी लिपि देवनागरी है. वर्तमान में हिन्दी देश-विदेश में व्यापक रूप से प्रयुक्त हो रही है. ऐसे में यह स्वीकारा गया कि यदि इसका मानकीकृत रूप शिक्षण और लेखन में न अपनाया गया तो वैश्विक स्तर पर इसके समझने में समस्या उत्पन्न हो सकती है. इसी के चलते वर्ष 1961 में वर्तनी आयोग का गठन किया गया. केन्द्र सरकार की निगरानी में यह कार्य हुआ और वर्ष 1980 में अंतिम सुझाव के साथ ही देवनागरी लिपि का मानकीकृत रूप जारी किया गया. इसमें सिफ़ारिश की गई कि भाषाई एकरूपता के लिए इनका ही अनुसरण किया जाए.


आइये देश में मानकीकृत देवनागरी के सम्बन्ध में, इसके लेखन के मानक तरीकों पर कुछ कदम अपनाये जाने की सिफारिश की गई है, उनको देखें. इसमें मानक वर्णमाला को इस प्रकार से अपनाया गया है.


1. मूल स्‍वर

अ इ उ ऋ


2. संयुक्‍त स्‍वर

अ + इ = ए

अ + उ = ओ


3. दीर्घ स्‍वर

आ ई ऐ औ


4. अनुस्‍वार

अं


5. विसर्ग

अः


6. नया जुड़ा स्वर


7. नुक़्ता

उत्क्षिप्त और अरबी फ़ारसी अंग्रेज़ी मूल की ध्वनियों के लिए


8. व्यंजन

क ख ग घ ङ

च छ ज झ ञ

ट ठ ड ढ ण

त थ द ध न

प फ ब भ म


9. अंतःस्थ

य र ल व


10. ऊष्म

श ष स ह


11. उत्क्षिप्त ध्वनियाँ

ड़ ढ़


12. विशेष संयुक्त व्यंजन

क्ष त्र ज्ञ


13. नासिक्य व्यंजन (व्यंजनों वर्गों के पंचम वर्ण)

ङ ञ ण न म


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14 सितंबर 2020

हिन्दी लिख दो चाहे हिंदी, अब सब चलता है

हिन्दी दिवस का स्वयंभू आयोजन किया जाये और हिन्दी पर ही लोगों द्वारा ज्ञान न दिया जाये, ऐसा संभव नहीं. आज इस दिवस पर सोशल मीडिया पर बुरी तरह से संदेशों की, ज्ञान की बरसात हो रही है. हिन्दी सही है या हिंदी, सितम्बर सही है या सितंबर, शुभकामनाएँ सही है या शुभकामनाएं जैसा एक सवाल उठाया था, जिस पर देशकाल, वातावरण के अनुसार सबके अपने-अपने मत मिले. तकनीक के आज के दौर में जबकि सभी लोग ज्ञानवान हैं, अथाह प्रतिभासंपन्न हैं ऐसे में किसी को सुझाव देना भी खतरे से खाली नहीं होता है. हिन्दी में सम्बन्ध में इसे और भी गम्भीरता से लिया जा सकता है.


सोशल मीडिया के अतिशय उपयोग ने हिन्दी का उपयोग भी बढ़ा दिया है. इस अत्यधिक उपयोग ने जहाँ एक तरफ कुछ सुगमता प्रदान की है वहीं कुछ सीमाबंदी के कारण गलतियों को स्वीकारने को भी विवश किया है. सम्भव है कि आज जबकि राजभाषा आयोग के तमाम सुझावों को लगातार अपनाया जा रहा है, तब ऐसे बिन्दुओं को गलती कहना भी बहुत से लिख्खाड़जनों को पसंद नहीं आएगा. फिलहाल तो कुछ बिन्दु व्याकरण सम्मत और कुछ वर्तनी आयोग आपके समक्ष.




यदि हिन्दी सही या हिंदी पर ही विचार करें तो इसे समझने के लिए पञ्चम वर्ण के व्याकरणिक नियम पर ध्यान देना होगा. व्याकरण नियमों के अनुसार ऐसे शब्द में सम्बन्धित वर्ग के पञ्चम वर्ण का आधा लगाया जाना चाहिए. वर्णमाला के अनुसार निम्न वर्ग हैं.


क ख ग घ ङ (क वर्ग)

च छ ज झ ञ (च वर्ग)

ट ठ ड़ ढ ण (ट वर्ग)

त थ द ध न (त वर्ग)

प फ़ ब भ म (प वर्ग)


व्याकरण नियम के अनुसार हिन्दी शब्द लिखे जाने में के पूर्व पञ्चम वर्ण को आधा करने लगाया जाना है. यहाँ वर्ण त वर्ग में है. अतः इस वर्ग का पञ्चम वर्ण आधा होकर द के पूर्व आएगा. इसीलिए हिन्दी शब्द सही है. इसी तरह यदि लिखना हो सितम्बर तो सितंबर लिखना व्याकरण नियम के अनुसार शुद्ध नहीं है. आप स्वयं बोलकर देखिये तो आपको ज्ञात होगा कि वर्ण के पूर्व पञ्चम वर्ण आधा होकर लगेगा. वर्ण ब शामिल है प वर्ग में. इसलिए इस वर्ग का पञ्चम वर्ण आधा होकर के पूर्व लगेगा. इसीलिए सितम्बर सही है न कि सितंबर.


ये तो हुआ व्याकरणिक ज्ञान. इधर भाषाई विकास के लिए लगातार सरकारी प्रयास होते रहे हैं. इनमें अनेक आयोग के माध्यम से भाषा को सरल से सरल बनाये जाने के लिए नियम भी बनाये गए. इसके साथ-साथ कम्प्यूटर के आने के बाद से और हिन्दी भाषा के वैश्विक रूप से प्रयोग किये जाने एक बाद से भी इसके सरलीकरण करने का वैश्विक दवाब भी देखने को मिलता रहा है. इसी के चलते वर्तनी आयोग ने पञ्चम वर्ण के प्रयोग को सरल बना दिया. उसके अनुसार व्याकरणिक कठिनाई को दूर करते हुए सीधे-सीधे अनुस्वार को मान्यता दे दी. उसके अनुसार पञ्चम वर्ण को आधा करके लगाने, सम्बंधित वर्ग को पहचानने की समस्या को दूर करते हुए सम्बंधित वर्ण के ऊपर बिंदी (ध्यान दें बिन्दी नहीं, जिसे अनुस्वार कहते हैं) लगाने को मान्यता दी.


कम्प्यूटर के प्रयोग के चलते भी पञ्चम वर्णों के प्रयोग में दिक्कत सामने आ रही थी. ऐसे में वर्तनी आयोग की इस सिफारिश को सहज भाव से स्वीकार करने के बजाय कम्प्यूटर की सुविधा ने इस परिवर्तन को स्वीकार लिया. यही कारण है कि अब हिंदी भी सही है, सितंबर भी सही है, शुभकामनाएं भी सही है. वर्तनी आयोग की अनुस्वार और अनुनासिक को लेकर भी एक सिफारिश है, जिसके अनुसार वह अनुस्वार यानि कि बिन्दु में और अनुनासिक अर्थात चन्द्रबिन्दु में भेद नहीं करता है. उसका मानना है कि इसके उपयोग को सम्बन्धित शब्द के प्रयोग के अनुसार समझ लिया जाए. हंस और हँस शब्द की व्याख्या करते हुए उसका कहना है कि इन दो शब्दों का जहाँ, जिस सन्दर्भ में प्रयोग हो रहा हो वहाँ इसके भाव को समझते हुए उसका अर्थ निश्चित कर लिया जाए.


फिलहाल, आज हिन्दी दिवस पर इतना ही ज्ञान पर्याप्त है. आप सभी को शुभकामनाएँ, १४ सितम्बर २०२०, हिन्दी दिवस की. खुश रहें, हिन्दी को समृद्ध करने के लिए लगातार प्रयत्नशील रहें.


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28 अगस्त 2020

पत्रिकाएँ बंद होती रहेंगी, हम स्यापा करते रहेंगे

आज सोशल मीडिया कादम्बिनी और नंदन पत्रिकाओं के बंद किये जाने की सूचना से आहत दिखाई दिया. बहुतों की पोस्ट से आँसू भी बहते नजर आये. समझ नहीं आया कि इन पत्रिकाओं के बंद होने का ये दुःख वास्तविक है या फिर सोशल मीडिया के प्रदर्शनकारी मंच पर सबको यह दिखाना है कि हम इन पत्रिकाओं के कितने बड़े प्रशंसक हैं? जिस अनुपात में सोशल मीडिया में इन पत्रिकाओं के पक्ष में पोस्ट दिखाई दीं यदि बस उतने लोग ही इन दो पत्रिकाओं के पाठक हो जाते तो इनके बंद होने की स्थिति कतई नहीं आई होती. इस बात को हम इसलिए कह सकते हैं क्योंकि विगत कई वर्षों से हम भी एक लघु-पत्रिका का संपादन-प्रकाशन कर रहे हैं, वह भी बिना किसी बाहरी आर्थिक सहायता के. कादम्बिनी, नंदन पत्रिकाओं का प्रकाशन समूह कोई आर्थिक स्थिति से कमजोर लोगों का समूह नहीं है. ऐसे में इन पत्रिकाओं को बंद करने का कारण महज आर्थिक नहीं है.


आज जो लोग सार्वजनिक प्रचार-प्रसार के मंच पर स्यापा फ़ैलाने में लगे हैं, उनमें से कितने लोग होंगे जिन्होंने विगत एक वर्ष में ही इन दोनों पत्रिकाओं को खरीद कर पढ़ा होगा? मुश्किल से दो-चार व्यक्ति ऐसे मिल जाएँ तो बहुत बड़ी बात है. तकनीक के दौर में जहाँ अब लोग प्रकाशित सामग्री से दूरी बनाते जा रहे हैं, लोगों के सामने तमाम वेबसाइट और किंडल संस्करण बेहतर विकल्प के रूप में उपस्थित है तो लोग पत्रिकाओं के खरीदने का कष्ट क्यों करेंगे? विगत वर्षों में लोगों का रुझान पढ़ने से जिस तरह हटा है, जिस तरह प्रकाशित सामग्री से पाठक दूर हुआ है उसने बहुत कुछ स्पष्ट कहानी रच दी है. इनके साथ-साथ एक और स्थिति स्पष्ट देखने को मिल रही है कि अब व्यक्ति न तो स्वयं पढ़ने के प्रति लालायित दिखाई दे रहा है और न ही अपने बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित कर रहा है. जो चंद लोग पढ़ने के प्रति जागरूक दिखाई देते हैं वे भी ऑनलाइन सामग्री को वरीयता देते दिख रहे हैं. ऐसे में प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं की स्थिति दोयम दर्जे की होनी ही है.


पाठकों की कमी का कारण क्या है, इसे खोजा जाना आवश्यक है. यदि ये कहा जाये कि पढ़ने वालों की संख्या में एकदम से गिरावट आ गई है या फिर ये कहा जाये कि पुस्तक पढ़ने के शौक़ीन अब नहीं रहे तो यह भी झूठ होगा. ये भी कहना गलत होगा कि हिन्दी पाठक अब कम हो गए हैं. ऐसा इसलिए कि यदि पढ़ने वालों की संख्या में गिरावट आ गई होती, प्रकाशित सामग्री के प्रति लोगों का रुझान न के बराबर होता, हिन्दी पाठकों की संख्या कम हो गई होती तो फिर किसी अंग्रेजी पुस्तक का हिन्दी अनुवाद क्यों लाखों प्रतियों में बिकता? अभी हाल के कुछ वर्ष इसके उदाहरण हैं जबकि ऐसी पुस्तकों की बिक्री लाखों प्रतियों में रही है. ये प्रकाशित प्रतियाँ मँहगे दामों में भी लगातार बिकती रही हैं. ऐसे में कुछ न कुछ तो है जिसे न तो प्रकाशक समझ पा रहे हैं और न ही पाठक इसे समझना चाहते हैं.

जहाँ तक हमारा अपना अनुमान है कि पत्रिकाओं के प्रति लोगों का झुकाव कम अवश्य हुआ है. पत्रिकाओं को यदि मासिक ही मान लिया जाये तो प्रतिमाह खरीदना किसी आम पाठक को एक बोझ सा समझ आने लगा है. बच्चों की पत्रिकाओं के प्रति अब पहले जैसा रुझान देखने को नहीं मिलता है. प्रकाशन के मंहगे होने ने भी पाठकों को पत्रिकाओं की तरफ से दूर किया है. पत्रिकाओं का मंहगा होना, उनके संग्रहण की समस्या होना, पत्रिकाओं का समय निकल जाने के बाद उनका समुचित मूल्य न मिलना, पत्रिकाओं को खरीद कर पढ़ने से ज्यादा माँगकर पढ़ने की प्रवृत्ति रखने ने भी पत्रिकाओं के सामने संकट उत्पन्न किया है.

इन दो पत्रिकाओं के बंद हो जाने के बाद और कितनी पत्रिकाएँ बाजार में शेष हैं बंद होने को, इसकी गिनती की जानी चाहिए. इस हालत के बाद भी न पाठक सुधरने वाले और न ही प्रकाशन समूह. हम बच्चों में पुस्तकें पढ़ने की आदत को विकसित नहीं कर सकेंगे, ये भी परम सत्य है. हम स्वयं अपनी पुरानी आदत को फिर से जिन्दा नहीं कर सकेंगे, ये भी परम सत्य है. ऐसी स्थिति में अपार खर्च उठाकर कोई भी समूह पत्रिकाओं का निरंतर प्रकाशन नहीं करेगा, ये भी परम सत्य है. इस तमाम सत्यों के बीच एक सत्य यह है कि हिन्दी साहित्य का हाल हम हिन्दी भाषियों ने ही बुरा किया है. हम ही इसके लिए दोषी हैं, हम ही जिम्मेवार हैं.

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