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26 सितंबर 2025

उम्र का चक्कर ही समाप्त कर दो


 

अरे साहब, जब स्थिति नियंत्रण से बाहर होती समझ आये तो उसे पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए.... ठीक वैसे ही जैसे खिलाड़ी मैदान में गिरने के बाद खुद को एकदम फ्री छोड़ देता है....

कानूनी आयु घटाने का सोचने से बेहतर है कि ये उम्र का चक्कर ही समाप्त कर दो... न उम्र, न सोचा-विचारी, बस सम्बन्ध ही सम्बन्ध....

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दैनिक जागरण, कानपुर

25.09.2025


05 फ़रवरी 2018

देह और यौन सम्बन्धों की तरफ़ मुड़ती चर्चाएँ

जिस तेज़ी से समाज बदल रहा है, उतनी तेज़ी से समाज में चर्चाओं के विषय में भी परिवर्तन हो रहा है. ये बदलाव किसी तरह की सामाजिकता के चलते आता हुआ नहीं है बल्कि इसके पीछे भी एक तरह का सेक्सुअल कारक काम कर रहा है. सामान्य रूप से देखा जाए तो ऐसा लगता है जैसे समाज और यहाँ के चंद जागरूक नागरिक समाजिक बदलाव लाने को सचेत हैं. वे इसी सचेतन दशा में इन चर्चाओं को आगे लाते रहते हैं. वैसे समाज में कहीं भी किसी बदलाव के लिए चर्चाओं का होना ज़रूरी है. समाज में ही क्या कहीं भी किसी तरह के परिवर्तन के लिए चर्चा होती ही है. घर में कोई काम होना है तो चर्चा तय है. किसी की पढ़ाई का मामला हो, किसी की शादी का मामला हो, किसी की ख़रीददारी होनी हो, किसी के रोज़गार का विषय हो सभी में चर्चा का होना मुख्य है. होना भी चाहिए क्योंकि चर्चा करने से सम्बंधित विषय पर उपयुक्त राय मिल जाती है या फिर सही राह दिख जाती है. वैसे भी समवेत चर्चा से निकले निर्णयों के आधार पर ठोस परिणाम मिलने की अपेक्षा रहती है. इस अपेक्षा पर वे चर्चाएँ ही खरी उतरती हैं जिनमें कुछ सार्थकता होती है. इधर कुछ समय से बदलाव के दौर से गुज़रता समाज अतिशय चर्चाबाज़ हो गया है. चंद सार्थक चर्चाओं के चारों तरफ़ निरर्थक चर्चाओं की भीड़ लगी हुई है. सबकी अपनी चर्चाएँ हैं, सबके अपने मंतव्य हैं. 

चर्चाओं के चलते दौर लगातार परिवर्तित होकर स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की तरफ़ मुड़ जाते हैं. वैसे इधर चर्चाओं में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की अधिकता देखने को मिल रही है. चर्चा ही क्या दैनिक क्रियाकलाप भी इसी के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गए हैं. स्त्री ने ये किया, उस महिला ने वो पहना, फ़लाँ लड़की का फ़लाँ लड़के के साथ चक्कर है, वो आदमी उस महिला को घूर रहा है, फ़लाँ लड़का रोज़ नई लड़की को घुमा रहा है, उस व्यक्ति ने उस महिला को छुआ, वो उसे देख मुस्कुराई, उसने उसे अजीब नज़रों से देखा आदि-आदि विषय तो रोज़ चर्चा में रहते ही हैं. इनके अलावा भी कुछ क्रांतिकारी विषय चर्चा में आने लगे हैं. इनके मूल में समाजिक बदलाव की बात कही जाती है, किसी गोपन विषय पर अगोपन होने की मंशा व्यक्त की जाती है, व्यक्तिगत विषयों पर खुली बहस करवाने की बात की जाती है. सोशल मीडिया पर एक हैशटैग आंदोलन शुरू होता है और फिर सब खुलकर चर्चाओं में शामिल होने लगते हैं. फिर चर्चा काम प्रदर्शन शुरू होने लगता है. कौन कितनी अश्लीलता से खुलकर सामने आ सकता है, इसकी होड़ लग जाती है. कौन कितना अशालीन लिख सकता है, इस पर ज़ोर दिया जाने लगता है. किसके विषयों में, भावाभिव्यक्ति में कामुकता अधिक समाहित हो सकती है, इसको प्रमुखता दी जाने लगती है. महिला-पुरुष सम्बन्धों के सार्थक, सकारात्मक विस्तार के लिए शुरू होने वाली चर्चाएँ देह-विमर्श के रूप में बदलने लगती हैं. किसके दाग़ अच्छे हैं, किसकी दैहिक संतुष्टि अधिक है, कौन कितने मिनट टिक सकता है आदि चर्चा के विषय बनने लगते हैं. 

स्त्री हो या पुरुष, उसके सम्बन्धों को जब तक देह की तराज़ू पर तौला जाता रहेगा तब तक खुला विमर्श कामुकता, अश्लीलता की कहानी ही लिखता रहेगा. जिस तरह स्त्री देह की समस्या को लेकर खुली चर्चा की वकालत की जा रही है, उससे क्या लगता है कि सारी समस्या सुलझ जाएगी? क्या लगता है कि आज के तकनीकी, इंटरनेट युग में लोगों को माहवरी, उसकी समस्या, स्त्री की परेशानी के बारे में जानकारी न होगी? क्या लगता है कि ऐसे लोग पैड के बारे में न जानते होंगे? क्या लगता है कि खुली चर्चा से सभी एक-दूसरे की मदद करने लगेंगे उन पाँच दिनों में? क्या खुली चर्चा की सार्थकता तब होगी जब पारिवारिक मर्यादा को भूल लोग आपस में उन दिनों की चर्चा करने लगेंगे? आधुनिकता के कथित आवरण को ओढ़कर हम सोचने लगे हैं कि खुले दिमाग़ और विचार के हो गए हैं. जहाँ आज भी परीक्षा ड्यूटी के दौरान किसी पुरुष शिक्षक द्वारा लड़की के हाथों  नक़ल  पर्ची छीनना छेड़खानी माना जाता हो, बाज़ार में किसी सहायता के लिए महिला  पुकारना या उसकी तरफ़ मदद का हाथ बढ़ाना फ़्लर्ट करना समझा जाता है, ज़हम महिला को देखना भी अपराध की श्रेणी में आता हो वहाँ ख़ुद महिलाओं से उनके पीरियड्स पर, पैड पर, उसके दाग़ पर खुली चर्चा की अपेक्षा करना समझा जा सकता है. ऐसे लोगों से, जो इस तरह के विषयों पर खुली चर्चा का दम भरते हैं, एक सवाल कि किसी ऐसी युवती  जो अपने काम करने में सक्षम नहीं है, किसी परिस्थिति में उसके पिता, भाई द्वारा इसके पैड को बदलना-पहनाना सम्भव है? 

चर्चाएँ हों, खुलकर हों, इन्हीं विषयों पर हों पर उनके उद्देश्य को भटकाया न जाए, भटकने न दिया जाए. और ऐसा हाल-फ़िलहाल सम्भव नहीं दिखता है. 

17 मई 2010

यौन शिक्षा - चुनौतीपूर्ण किन्तु आवश्यक प्रक्रिया - (भाग - 6)

(समापन किस्त)

यौन शिक्षा - चुनौतीपूर्ण किन्तु आवश्यक प्रक्रिया

डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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(6) दायित्व क्या हो हम सभी का
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‘यौन शिक्षा’ के द्वारा सरकार, समाज, शिक्षकों, माता-पिता का उद्देश्य होना चाहिए कि वे एक स्वस्थ शारीरिक विकास वाले बच्चों, युवाओं का निर्माण करें। ‘यौन शिक्षा’ के एक छोटे भाग यौनिक अंगों की जानकारी, गर्भधारण की प्रक्रिया, प्रसव प्रक्रिया, गर्भपात आदि से अलग हट कर ‘यौन शिक्षा’ के द्वारा समाज में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की स्वीकार्यता, उसकी संस्कारिकता, उसके पीछे छिपे मूल्यों, शारीरिक विकास के विविध चरणों, शरीर के अंगों की स्वच्छता, अनैतिक सम्बन्धों से उपजती शारीरिक बीमारियाँ, यौनजनित बीमारियों के दुष्परिणाम, स्त्री-पुरुष सम्बन्धों (माता-पिता, पति-पत्नी, भाई-बहिन, मित्रों आदि) की आन्तरिकता एवं मर्यादा की जानकारी, उनके मध्य सम्बन्धों की मूल्यता, वैवाहित जीवन की जिम्मेवारियाँ, इनके शारीरिक एवं आत्मिक सम्बन्धों की आवश्यकता, आपसी सम्बन्ध और उनमें आदर का भाव आदि-आदि अनेक ऐसे बिन्दु हो सकते हैं जो ‘यौन शिक्षा’ के रूप में समझाये जा सकते हैं। इन मूल्यों, सम्बन्धों, आन्तरिकता, पारिवारिकता, सामाजिकता, शारीरिकता आदि को समझने के बाद यौनजनित बीमारियों, एच0आई0वी0/एड्स आदि भले ही समाप्त न हो सकें पर इनके रोगियों की संख्या में बढ़ते युवाओं की संख्या में अवश्य ही भारी गिरावट आयेगी।

‘यौन शिक्षा’ को लागू करने, इसको देने के विरोध में जो लोग भी तर्क-वितर्क करते नजर आते हैं उनको भी सामाजिक-पारिवारिक-शारीरिक कसौटी पर कसना होगा। यह कहना कि ‘यौन शिक्षा’ तमाम सारी समस्याओं का हल है, अभी जल्दबाजी होगी पर यह कहना कि ‘यौन शिक्षा’ से विद्यालय, समाज एक खुली प्रयोगशाला बन जायेगा, एक प्रकार की ‘ड्रामेबाजी’ है। आज बिना इस शिक्षा के क्या समाज, विद्यालय और तो और परिवार भी क्या शारीरिक सम्बन्धों को पूर्ण करने की प्रयोगशाला नहीं बन गये हैं? जो कहते हैं कि पशु-पक्षियों को कौन सी ‘यौन शिक्षा’ दी जाती है पर वे सभी शारीरिक सम्बन्ध सहजता से बना लेते हैं, अपनी प्रजाति वृद्धि करते हैं, वे लोग अभी ‘यौन शिक्षा’ को मात्र शारीरिक सम्बन्धों की तृप्ति को समझने का एक माध्यम मान रहे हैं। ‘यौन शिक्षा’ का तात्पर्य अथवा उद्देश्य केवल स्त्री-पुरुष के यौनिक अंगों की जानकारी देना, यौनांगों के चित्र दिखाना, शारीरिक सम्बन्धों की क्रिया समझाना, गर्भधारण-प्रसव की प्रक्रिया समझाना मात्र नहीं है। समाज में शारीरिक सम्बन्धों को पवित्रता प्राप्त है जो सिर्फ पति-पत्नी के मध्य ही स्वीकार्य हैं और उनका उद्देश्य शारीरिक सुख-संतुष्टि के अतिरिक्त संतानोत्पत्ति कर समाज को नई पीढ़ी प्रदान करना भी है।

कहीं न कहीं ‘यौन शिक्षा’ की कमी ने पश्चिमी खुले सम्बन्धों को भारतीय समाज में पर्दे के पीछे छिपी स्वीकार्यता दी और पति-पत्नी के विश्वासपरक, पवित्र रिश्ते से कहीं अलग शारीरिक संतुष्टि की राह अपनायी। परिणमतः टीनएज प्रेगनेन्सी, बिन ब्याही माँएँ, यौनजनित बीमारी से ग्रसित युवा वर्ग, बलात्कार, बाल शारीरिक शोषण, गर्भपात, कूड़े के ढ़ेर पर मिलते नवजात शिशु, आत्महत्याएँ आदि जैसी शर्मसार करने वाली घटनाओं से हम नित्य ही दो-चार होते हैं। अन्त निष्कर्षतः एक वाक्य से कि मेरी दृष्टि में ‘यौन शिक्षा’ के स्वरूप, उद्देश्य, शैली के अभाव ने ही परिवार नियोजन के प्रमुख हथियार ‘कण्डोम’ को अनैतिक सम्बन्धों के, यौनजनित रोगों के, समय-असमय शारीरिक सुख प्राप्ति के, यौनाचार के सुरक्षा कवच के रूप में सहज स्वीकार्य बना दिया है। अच्छा हो कि ‘कण्डोम, बिन्दास बोल’, ‘आज का फ्लेवर क्या है?’, ‘कन्ट्रासेप्टिव पिल्स’ जैसे विज्ञापनों से शिक्षा लेते; महानगरों के सुलभ शौचालयों एवं अन्य सार्वजनिक स्थलों पर लगी ‘कण्डोम मशीनों’ पर भटकते; पोर्न साइट, नग्न चित्रों में शारीरिक-यौनिक जिज्ञासा को शान्त करते बच्चों, युवाओं को सकारात्मक, उद्देश्यपरक, संस्कारपरक, मूल्यपरक ‘यौन शिक्षा’ से उस वर्जित विषय की जानकारी दी जाये जो मानव जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होने के बाद भी किसी न किसी रूप में प्रतिबंधित है।


(समाप्त)
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16 मई 2010

यौन शिक्षा - चुनौतीपूर्ण किन्तु आवश्यक प्रक्रिया - (भाग - 5)


यौन शिक्षा - चुनौतीपूर्ण किन्तु आवश्यक प्रक्रिया
डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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(5) महती रूप से आवश्यक है टीनएजर्स के लिए
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‘सेक्स एजूकेशन’ को लेकर मेरा व्यक्तिगत मत है कि इसकी विशेष आवश्यकता किशोरावस्था (टीनएजर्स) को है। यदि देखा जाये तो यह वह उम्र है जो ‘सेक्स लाइफ’ को अधिकतम जिज्ञासा से देखती है; जो अधिकतम संक्रमण के दौर से गुजर रही होती है। शारीरिक-यौनिक विकास एवं परिवर्तन, विपरीत लिंगी आकर्षण, शारीरिक सम्बन्धों के प्रति जिज्ञासा उन्हें शारीरिक सम्बन्धों की ओर ले जाती है जो विविध यौनजनित रोगों (एसटीडी) उपहार में देती है। शारीरिक-यौनिक विकास एवं परिवर्तन को समझने की चेष्टा में वे किसी गलत जानकारी, बीमारी का शिकार न हों, एच0आई0वी0/एड्स जैसी बीमारियों के वाहक न बनें इसके लिए इस उम्र के लोगों को ‘सेक्स एजूकेशन’ की आवश्यकता है। ‘यौन शिक्षा’ का पर्याप्त अभाव इस आयु वर्ग के लोगों को यौनिक जानकारी की प्राप्ति के लिए अपने मित्रों, ब्लू फिल्मों, पोर्न साइट आदि का से करवाती है जो भ्रम की स्थिति पैदा करती है। इन स्त्रोतों से जानकारियाँ भ्रम की स्थिति उत्पन्न करने के साथ-साथ शारीरिक उत्तेजना भी पैदा करती है जो अवांछित सम्बन्धों, बाल शारीरिक शोषण, अप्राकृतिक सम्बन्धों आदि का कारक बनती है। अपनी शारीरिक-यौनिक इच्छापूर्ति मात्र के लिए के लिए किया गया शारीरिक-संसर्ग टीनएज प्रेगनेन्सी, गर्भपातों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ युवाओं में एस0टी0डी0, एच0आई0वी0/एड्स जैसी बीमारियों को तीव्रता से फैलाता है। एक सर्वे के अनुसार दिल्ली अकेले में एस0टी0डी0 क्लीनिक में प्रतिदिन आने वाले मरीजों की संख्या का लगभग 57 प्रतिशत 15-22 वर्ष की आयु वर्ग के लड़के-लड़कियाँ हैं। ‘यौन शिक्षा’ का अभाव इस संख्या को और भी अधिक बढ़ायेगा।

‘यौन शिक्षा’ को देने के पीछे यह मन्तव्य कदापि नहीं होना चाहिए कि युवा वर्ग सुरक्षित शारीरिक सम्बन्ध बनाये, जैसा कि लगभग एक दशक पूर्व केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री का कहना था कि मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन किसके साथ सोता है बस वे आपस में ‘कण्डोम’ का प्रयोग करते हों। इस प्रकार की कथित आधुनिक सोच ने ही भारतीय समाज को विचलित किया है, ‘यौन शिक्षा’ के मायने भी बदले हैं। ‘यौन शिक्षा’ के सकारात्मक एवं विस्तारपरक पहलू पर गौर करें तो उसका फलक उद्देश्यपरक एवं आशापूर्ण दिखायी पड़ेगा।

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15 मई 2010

यौन शिक्षा - चुनौतीपूर्ण किन्तु आवश्यक प्रक्रिया - (भाग - 4)


यौन शिक्षा - चुनौतीपूर्ण किन्तु आवश्यक प्रक्रिया
डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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(4) यौन शिक्षा का स्वरूप
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यहाँ आकर यह तो स्पष्ट होता है कि ‘यौन शिक्षा’ क्यों और कैसी हो। बच्चों की दुनिया पर निगाह डालें तो हमें पता चलेगा कि ज्यादातर बच्चे-लड़के, लड़कियाँ दोनों ही शारीरिक दुराचार का शिकार होते हैं। हम इसके कारणों का पता लगाये बिना इस अपराध को मिटाना तो दूर इसे कम भी नहीं कर सकते। बड़ी आयु के लोगों द्वारा बच्चों के शारीरिक शोषण की घटनाओं के साथ-साथ अब बच्चों द्वारा ही आपस में शारीरिक दुराचार की घटनायें भी सामने आने लगीं हैं। यहाँ हम बच्चों को ‘यौन शिक्षा’ के द्वारा स्त्री-पुरुष सम्बन्धों, मासिक धर्म, गर्भधारण, शारीरिक सम्बन्धों की जानकारी देकर उनका भला नहीं कर सकते। इस उम्र के बच्चों को ‘यौन शिक्षा’ के माध्यम से समझाना होगा कि एक लड़के और एक लड़की के शारीरिक अंग क्या हैं। उनमें अन्तर क्या है। हमें बताना होगा कि उनके शरीर में यौनिक अंगों की महत्ता क्या है। इन अंगों का इस उम्र विशेष में कार्य क्या है।

इन बातों के अलावा इस उम्र में वर्तमान परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में ‘सेक्स एजूकेशन’ के रूप में बच्चों को समझाना होगा कि किसी भी लड़का-लड़की के शरीर के यौनिक अंग उसके व्यक्तिगत अंग होते हैं, जिनका प्रदर्शन नहीं किया जाना चाहिए। शरीर के इन अंगों को न किसी को स्पर्श करने देना चाहिए न किसी दूसरे के यौनिक अंगों को स्पर्श करना चाहिए। किसी के कहने पर भी उसके इन अंगों का स्पर्श नहीं करना चाहिए और न ही अपने इन अंगों का स्पर्श करवाना चाहिए यदि कोई ऐसा करता भी है (भले ही प्यार से या कुछ देकर या जबरदस्ती) तो तुरन्त अपने माता-पिता, शिक्षकों अथवा किसी बड़े को इसकी जानकारी देनी चाहिए।

हमारे पारिवारिक-सामाजिक ढाँचें में अभी भी एक बहुत बड़ी खामी यह है कि यदि कोई बच्चा अपनी यौनजनित जिज्ञासा को शान्त करना चाहता है तो हम या तो उसे अनसुना कर देते हैं या फिर उसे डाँट-डपट कर शान्त करा देते हैं। यदि किसी रूप में उसके सवालों का जवाब देते हैं तो इतनी टालमटोल से कि बच्चा असंतुष्ट ही रहता है। यही असंतुष्टता उसे यौनिक हिंसा, शारीरिक दुराचार का शिकार बनाती है। माता-पिता, शिक्षकों को ‘यौन शिक्षा’ के माध्यम से बच्चों को उनकी जिज्ञासा को सहज रूप से हल करना चाहिए, हाँ, यदि सवाल इस प्रकार के हों जो उसकी उम्र के अनुभव से परे हैं अथवा नितान्त असहज हैं तो उनका उत्तर ‘अभी आपकी उम्र इन सवालों को समझने की नहीं है’ जैसे सुलभ वाक्यों के द्वारा भी दिया जा सकता है। बच्चों के प्रश्नों के उत्तर उनकी सवालों की प्रकृति और परिस्थितियों पर निर्भर करती है। इसी तरह टीनएजर्स की ‘यौन शिक्षा’ का स्वरूप अलग होगा।


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14 मई 2010

यौन शिक्षा - चुनौतीपूर्ण किन्तु आवश्यक प्रक्रिया - (भाग - 3)


यौन शिक्षा - चुनौतीपूर्ण किन्तु आवश्यक प्रक्रिया
डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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(3) जिज्ञासा के साथ कौतूहल भी - दस वर्ष से ऊपर की अवस्था
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दस वर्ष के ऊपर की अवस्था में आने के बाद शारीरिक परिवर्तन, शारीरिक विकास के साथ-साथ यौनिक विकास, यौनिक परिवर्तन भी होने लगता है। यह परिवर्तन लड़को की अपेक्षा लड़कियों में तीव्रता से एवं स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। लड़कियों में मासिक धर्म की शुरूआत उनमें एक प्रकार की जिज्ञासा तथा एक प्रकार का भय पैदा करती है। यही वह स्थिति होती है जब भारतीय परिवारों में सम्भवतः पहली बार किसी लड़की को अपनी माँ, चाची, भाभी, बड़ी बहिन आदि से ‘सेक्स’ को लेकर किसी प्रकार की जानकारी मिलती है। इस ‘सेक्स एजूकेशन’ में जिज्ञासा की शान्ति, जानकारियों की प्राप्ति कम, भय, डर, सामाजिक लोक-लाज का भूत अधिक होता है। ऐसी ‘यौन शिक्षा’ लड़कियों में अपने यौनिक-शारीरिक विकास के प्रति भय ही जाग्रत करती है, उनकी किसी जिज्ञासा को शान्त नहीं करती है।

लड़कों में यह स्थिति और भी भयावह होती है; परिवार से किसी भी रूप से कोई जानकारी न दिए जाने के परिणामस्वरूप वे सभी अपने मित्रों, पुस्तकों, इंटरनेट आदि पर भटकते रहते हैं और थोड़ी सी सही जानकारी के साथ-साथ बहुत सी भ्रामक जानकारियों का पुलिंदा थामें भटकते रहते हैं। शारीरिक विकास, यौनिक अंगों में परिवर्तन, विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण, सेक्स सम्बन्धी जानकारी, शारीरिक संसर्ग के प्रति जिज्ञासा अब जिज्ञासा न रह कर प्रश्नों, परेशानियों का जाल बन जाता है। इसमें उलझ कर वे शारीरिक सम्बन्धों, टीनएज़ प्रेगनेन्सी, गर्भपात, यौनजनित रोग, आत्महत्या जैसी स्थितियों का शिकार हो जाते हैं।

इन सारी स्थितियों के परिप्रेक्ष्य में देखें तो क्या लगता नहीं है कि जिस यौनिक उत्तेजना, यौनिक जिज्ञासा, लैंगिक विभिन्नता, शारीरिक विभिन्नता, शारीरिक-यौनिक विकास, शारीरिक सम्बन्ध, विपरीत लिंगी आकर्षण के प्रति जिज्ञासुभाव बचपन से ही रहा हो उसका समाधान एक सर्वमान्य तरीके से हो, सकारात्मक तरीके से हो, न कि आधी-अधूरी, अधकचरी, भ्रामक जानकारी के रूप में हो? यहाँ ‘सेक्स एजूकेशन’ की वकालत करने, उसको लागू करने अथवा देने के पूर्व एक तथ्य विशेष को मन-मष्तिष्क में हमेशा रखना होगा कि यह शिक्षा उम्र के विविध पड़ावों को ध्यान में रखकर अलग-अलग रूप से अलग-अलग तरीके से दी जानी चाहिए। ऐसा नहीं कि जिस ‘यौन शिक्षा’ के स्वरूप को हम छोटे बच्चों को दें वही स्वरूप टीनएजर्स के सामने रख दें।


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13 मई 2010

यौन शिक्षा - चुनौतीपूर्ण किन्तु आवश्यक प्रक्रिया - (भाग - 2)


यौन शिक्षा - चुनौतीपूर्ण किन्तु आवश्यक प्रक्रिया
डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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(2) यौनांगों के प्रति उत्सुकता - पाँच से दस वर्ष की अवस्था
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पाँच वर्ष से दस वर्ष तक की उम्र के बच्चों में अपने लड़के एवं अपने लड़की होने का एहसास उस अवस्था में आ जाता है जहाँ उनकी लैंगिक जिज्ञासा तीव्रता पकड़ती है पर वे एक दूसरे से अपने यौनिक अंगों के प्रदर्शन को छिपाते हैं। लड़के-लड़कियों में एक-दूसरे के प्रति मेलजोल का झिझक भरा भाव होता है। इस समयावधि में ‘सेक्स’ से सम्बन्धित जानकारी, शारीरिक परिवर्तनों से सम्बन्धित जानकारी के लिए वे समलिंगी मित्र-मण्डली की मदद लेते हैं। इस आधी-अधूरी जानकारी को जो टी0वी0, इण्टरनेट, पत्र-पत्रिकाओं आदि से प्राप्त होती है, के द्वारा वे ‘सेक्स’ से सम्बन्धित शब्दावली, यौनिक अंगों से सम्बन्धित शब्दावली को आत्मसात करना प्रारम्भ कर देते हैं। यह जानकारी उन्हें भ्रमित को करती ही है, अश्लीलता की ओर भी ले जाती है। इस समयावधि में शारीरिक विकास भी तेजी से होता है जो इस उम्र के बच्चों में शारीरिक आकर्षण भी पैदा करता है। लड़का हो या लड़की, इस उम्र तक वह विविध स्त्रोतों से बहुत कुछ जानकारी (अधकचरी ही सही) प्राप्त कर चुके होते हैं और यही जानकारी उनको ‘सेक्स’ के प्रति जिज्ञासा पैदा करती है जिस ‘सेक्स’ को शारीरिक क्रिया से जोड़ा जाता रहा है। हालांकि परिवार में इस उम्र से पूर्व वे बच्चे अपने माता-पिता अथवा घर के किसी अन्य युगल को शारीरिक संसर्ग की मुद्रा में अचानक या चोरी छिपे देख चुके होते हैं जो उनकी जिज्ञासा को और तीव्र बनाकर उसके समाधान को प्रेरित करती है; लड़कियों में शारीरिक परिवर्तनों की तीव्रता लड़कों के शारीरिक परिवर्तनों से अधिक होने के कारण उनमें भी एक प्रकार की जिज्ञासा का भाव पैदा होता है; अभी तक के देखे-सुने किस्सों, जानकारियों के चलते विपरीत लिंगी बच्चों में आपस में शारीरिक आकर्षण देखने को मिलता है।

खेल-खेल में, हँसते-बोलते समय, पढ़ते-लिखते समय, उठते-बैठते समय, भोजन करते या अन्य सामान्य क्रियाओं में वे किसी न किसी रूप में अपने विपरीत लिंगी साथी को छूने का प्रयास करते हैं। इस शारीरिक स्पर्श के पीछे उनका विशेष भाव (जो भले ही उन्हें ज्ञात न हो) अपनी यौनिक जिज्ञासा को शान्त करना होता है और इसमें उनको उस समय तृप्ति अथवा आनन्दिक अनुभूति का एहसास होता है जब वे अपने विपरीत लिंगी साथी के अंग विशेष -गाल, सीना, कंधा, जाँघ आदि- का स्पर्श कर लेते हैं। इस यौनिक अनुभूति के आनन्द के लिए वे विशेषतः बात-बात पर एक दूसरे का हाथ पकड़ते, आपस में ताली मारते भी दिखायी देते हैं।

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12 मई 2010

यौन शिक्षा - चुनौतीपूर्ण किन्तु आवश्यक प्रक्रिया - भाग - 1


यौन शिक्षा - चुनौतीपूर्ण किन्तु आवश्यक प्रक्रिया
डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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‘यौन शिक्षा’, यदि इसके आगे कुछ भी न कहा जाये तो भी लगता है कि किसी प्रकार का विस्फोट होने वाला है। हमारे समाज में ‘सेक्स’ पूरा ‘यौन’ को एक ऐसे विषय के रूप में सहज स्वीकार्यता प्राप्त है जो पर्दे के पीछे छिपाकर रखने वाला है; कहीं सागर की गहराई में दबाकर रखने वाला विषय है। यह भारतीय समाज के संस्कारित परिवेश का परिणाम है अथवा ‘सेक्स’ को सीमित परिधि में परिभाषित करने का परिणाम है कि समाज में ‘सेक्स’ सभी के जीवन में भीतर तक घुला होने के बाद भी ‘आतंक’ का पर्याय है। यह बात सत्य हो सकती है कि भारतीय, सामाजिक, पारिवारिक परम्पराओं के चलते ‘सेक्स’ ऐसा विषय नहीं रहा है जिस पर खुली बहस अथवा खुली चर्चा की जाती रही हो। ‘सेक्स’ को मूलतः दो विपरीतलिंगी प्राणियों के मध्य होने वाले शारीरिक संसर्ग को समझा गया है (चाहे वे प्राणी मनुष्य हों अथवा पशु-पक्षी) और इस संकुचित परिभाषा ने ‘सेक्स एजूकेशन’ अथवा ‘यौन शिक्षा’ को भी संकुचित दायरे में ला खड़ा कर दिया है।

‘यौन शिक्षा’ अथवा ‘सेक्स एजूकेशन’ के पूर्व ‘सेक्स’ को समझना आवश्यक होगा। ‘सेक्स’ का तात्पर्य आम बोलचाल की भाषा में ‘लिंग’ अथवा शारीरिक संसर्ग से लगाते हैं। ‘सेक्स’ अथवा ‘सेक्स एजूकेशन’ का अर्थ मुख्यतः मनुश्य, पशु-पक्षी (विशेष रूप से स्त्री-पुरुष) के मध्य होने वाली शारीरिक क्रियाओं से लगा कर इसे चुनौतीपूर्ण बना दिया है। एक पल को ‘सेक्स एजूकेशन’ के ऊपर से अपना ध्यान हटाकर मानव जीवन की शुरुआत से उसके अंत तक दृष्टिपात करें तो पता लगेगा कि ‘सेक्स एजूकेशन’ का प्रारम्भ तो उसके जन्म लेने के साथ ही हो जाता है। इसे उम्र के कुछ प्रमुख पड़ावों के साथ आसानी से समझा जा सकता है-

(1) उम्र का पहला पड़ाव - पाँच वर्ष तक की अवस्था
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एक-दो वर्ष से लेकर चार-पाँच वर्ष तक की उम्र तक के बच्चे में अपने शरीर, लैंगिक अंगों के प्रति एक जिज्ञासा सी दिखाई देती है। इस अबोध उम्र में बच्चे अपने यौनिक अंगों को छूने, उनके प्रदर्शन करने, एक दूसरे के अंगों के प्रति जिज्ञासू भाव रखने जैसी क्रियाएँ करते हैं। यही वह उम्र होती है जब बच्चों (लड़के, लड़कियों में आपस में) में जिज्ञासा होती है कि वे इस धरती पर कैसे आये? कहाँ से आये? या फिर कोई उनसे छोटा बेबी कहाँ से, कैसे आता है? इस जिज्ञासा की कड़ी में आपने इस उम्र के बच्चों को ‘पापा-मम्मी’, ‘डॉक्टर’ का खेल खेलते देखा होगा। परिवारों के लिए यह हास्य एवं सुखद अनुभूति के क्षण होते हैं पर बच्चे इसी खेल-खेल में एक दूसरे के यौनिक अंगों को छूने की, उन्हें देखने की, परीक्षण करने की चेष्टा करते हैं (वे आपस में सहजता से ऐसा करने भी देते हैं) पर इसके पीछे किसी प्रकार की ‘सेक्सुअलिटी’, शारीरिक सम्बन्धों वाली बात न होकर सामान्य रूप से अपनी शारीरिक भिन्नता को जानने-समझने का अबोध प्रयास मात्र होता है। इस उम्र में एक प्रकार की लैंगिक विभिन्नता उन्हें आपस में दिखायी देती है; लड़के-लड़कियों को अपने यौनिक अंगों में असमानता; मूत्र त्याग करने की प्रक्रिया में अन्तर; शारीरिक संरचना में विभिन्नता दिखती है जो निश्चय ही उनके ‘लैंगिक बोध’ को जाग्रत करतीं हैं। देखा जाये तो यह उन बच्चों की दृष्टि में यह ‘सेक्सुअल’ नहीं है, शारीरिक संपर्क की परिभाषा में आने वाला ‘सेक्स’ नहीं है।

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17 फ़रवरी 2009

यौन शिक्षा - चुनौतीपूर्ण किन्तु आवश्यक प्रक्रिया

ये लेख शोध-पत्रिका "कृतिका" में प्रकाशित हुआ है। इससे पहले इस लेख के बारे में आप सबसे जिक्र हो चुका है। लेख तब प्रकाशित नहीं हुआ था। अब प्रकाशित होने के बाद आप सबके सामने है। विषय ऐसा है जो आज की जरूरत है पर हम सब फ़िर भी इस पर राजनीति कर रहे हैं। कृपया पूर्वाग्रह त्याग कर पढ़ें तब किसी निष्कर्ष पर पहुंचेंगे।

‘यौन शिक्षा’, यदि इसके आगे कुछ भी न कहा जाये तो भी लगता है कि किसी प्रकार का विस्फोट होने वाला है। हमारे समाज में ‘सेक्स’ अथवा ‘यौन’ को एक ऐसे विषय के रूप में सहज स्वीकार्यता प्राप्त है जो पर्दे के पीछे छिपाकर रखने वाला है; कहीं सागर की गहराई में दबाकर रखने वाला विषय है। यह भारतीय समाज के संस्कारित परिवेश का परिणाम है अथवा ‘सेक्स’ को सीमित परिधि में परिभाषित करने का परिणाम है कि समाज में ‘सेक्स’ सभी के जीवन में भीतर तक घुला होने के बाद भी ‘आतंक’ का पर्याय है। यह बात सत्य हो सकती है कि भारतीय, सामाजिक, पारिवारिक परम्पराओं के चलते ‘सेक्स’ ऐसा विषय नहीं रहा है जिस पर खुली बहस अथवा खुली चर्चा की जाती रही हो। ‘सेक्स’ को मूलतः दो विपरीत लिंगी प्राणियों के मध्य होने वाले शारीरिक संसर्ग को समझा गया है (चाहे वे प्राणी मनुष्य हों अथवा पशु-पक्षी) और इस संकुचित परिभाषा ने ‘सेक्स एजूकेशन’ अथवा ‘यौन शिक्षा’ को भी संकुचित दायरे में ला खड़ा कर दिया है।
‘यौन शिक्षा’ अथवा ‘सेक्स एजूकेशन’ के पूर्व ‘सेक्स’ को समझना आवश्यक होगा। ‘सेक्स’ का तात्पर्य आम बोलचाल की भाषा में ‘लिंग’ अथवा शारीरिक संसर्ग से लगाते हैं। ‘सेक्स’ अथवा ‘सेक्स एजूकेशन’ का अर्थ मुख्यतः मनुष्य, पशु-पक्षी (विशेष रूप से स्त्री-पुरुष) के मध्य होने वाली शारीरिक क्रियाओं से लगा कर इसे चुनौतीपूर्ण बना दिया है। एक पल को ‘सेक्स एजूकेशन’ के ऊपर से अपना ध्यान हटाकर मानव जीवन की शुरुआत से उसके अंत तक दृष्टिपात करें तो पता लगेगा कि ‘सेक्स एजूकेशन’ का प्रारम्भ तो उसके जन्म लेने के साथ ही हो जाता है। इसे उम्र के कुछ प्रमुख पड़ावों के साथ आसानी से समझा जा सकता है-
एक-दो वर्ष से लेकर चार-पाँच वर्ष तक की उम्र तक के बच्चे में अपने शरीर, लैंगिक अंगों के प्रति एक जिज्ञासा सी दिखाई देती है। इस अबोध उम्र में बच्चे अपने यौनिक अंगों को छूने, उनके प्रदर्शन करने, एक दूसरे के अंगों के प्रति जिज्ञासू भाव रखने जैसी क्रियाएँ करते हैं। यही वह उम्र होती है जब बच्चों (लड़के, लड़कियों में आपस में) में जिज्ञासा होती है कि वे इस धरती पर कैसे आये? कहाँ से आये? या फिर कोई उनसे छोटा बेबी कहाँ से, कैसे आता है? इस जिज्ञासा की कड़ी में आपने इस उम्र के बच्चों को ‘पापा-मम्मी’, ‘डाक्टर’ का खेल खेलते देखा होगा। परिवारों के लिए यह हास्य एवं सुखद अनुभूति के क्षण होते हैं पर बच्चे इसी खेल-खेल में एक दूसरे के यौनिक अंगों को छूने की, उन्हें देखने की, परीक्षण करने की चेष्टा करते हैं (वे आपस में सहजता से ऐसा करने भी देते हैं) पर इसके पीछे किसी प्रकार की ‘सेक्सुअलिटी’, शारीरिक सम्बन्धों वाली बात न होकर सामान्य रूप से अपनी शारीरिक भिन्नता को जानने-समझने का अबोध प्रयास मात्र होता है। इस उम्र में एक प्रकार की लैंगिक विभिन्नता उन्हें आपस में दिखायी देती है; लड़के-लड़कियों को अपने यौनिक अंगों में असमानता; मूत्र त्याग करने की प्रक्रिया में अन्तर; शारीरिक संरचना में विभिन्नता दिखती है जो निश्चय ही उनके ‘लैंगिक बोध’ को जाग्रत करतीं हैं। देखा जाये तो यह उन बच्चों की दृष्टि में यह ‘सेक्सुअल’ नहीं है, शारीरिक संपर्क की परिभाषा में आने वाला ‘सेक्स’ नहीं है।
पाँच वर्ष से दस वर्ष तक की उम्र के बच्चों में अपने लड़के एवं अपने लड़की होने का एहसास उस अवस्था में आ जाता है जहाँ उनकी लैंगिक जिज्ञासा तीव्रता पकड़ती है पर वे एक दूसरे से अपने यौनिक अंगों के प्रदर्शन को छिपाते हैं। लड़के-लड़कियों में एक-दूसरे के प्रति मेलजोल का झिझक भरा भाव होता है। इस समयावधि में ‘सेक्स’ से सम्बन्धित जानकारी, शारीरिक परिवर्तनों से सम्बन्धित जानकारी के लिए वे समलिंगी मित्र-मण्डली की मदद लेते हैं। इस आधी-अधूरी जानकारी को जो टी0वी0, इण्टरनेट, पत्र-पत्रिकाओं आदि से प्राप्त होती है, के द्वारा वे ‘सेक्स’ से सम्बन्धित शब्दावली, यौनिक अंगों से सम्बन्धित शब्दावली को आत्मसात करना प्रारम्भ कर देते हैं। यह जानकारी उन्हें भ्रमित को करती ही है, अश्लीलता की ओर भी ले जाती है। इस समयावधि में शारीरिक विकास भी तेजी से होता है जो इस उम्र के बच्चों में शारीरिक आकर्षण भी पैदा करता है। लड़का हो या लड़की, इस उम्र तक वह विविध स्त्रोतों से बहुत कुछ जानकारी (अधकचरी ही सही) प्राप्त कर चुके होते हैं और यही जानकारी उनको ‘सेक्स’ के प्रति जिज्ञासा पैदा करती है जिस ‘सेक्स’ को शारीरिक क्रिया से जोड़ा जाता रहा है। हालांकि परिवार में इस उम्र से पूर्व वे बच्चे अपने माता-पिता अथवा घर के किसी अन्य युगल को शारीरिक संसर्ग की मुद्रा में अचानक या चोरी छिपे देख चुके होते हैं जो उनकी जिज्ञासा को और तीव्र बनाकर उसके समाधान को प्रेरित करती है; लड़कियों में शारीरिक परिवर्तनों की तीव्रता लड़कों के शारीरिक परिवर्तनों से अधिक होने के कारण उनमें भी एक प्रकार की जिज्ञासा का भाव पैदा होता है। अभी तक के देखे-सुने किस्सों, जानकारियों के चलते विपरीत लिंगी बच्चों में आपस में शारीरिक आकर्षण देखने को मिलता है।
खेल-खेल में, हँसते-बोलते समय, पढ़ते-लिखते समय, उठते-बैठते समय, भोजन करते या अन्य सामान्य क्रियाओं में वे किसी न किसी रूप में अपने विपरीत लिंगी साथी को छूने का प्रयास करते हैं। इस शारीरिक स्पर्श के पीछे उनका विशेष भाव (जो भले ही उन्हें ज्ञात न हो) अपनी यौनिक जिज्ञासा को शान्त करना होता है और इसमें उनको उस समय तृप्ति अथवा आनन्दिक अनुभूति का एहसास होता है जब वे अपने विपरीत लिंगी साथी के अंग विशेष-गाल, सीना, कंधा, जाँघ आदि- का स्पर्श कर लेते हैं। इस यौनिक अनुभूति के आनन्द के लिए वे विशेषतः बात-बात पर एक दूसरे का हाथ पकड़ते, आपस में ताली मारते भी दिखायी देते हैं।
दस वर्ष के ऊपर की अवस्था में आने के बाद शारीरिक परिवर्तन, शारीरिक विकास के साथ-साथ यौनिक विकास, यौनिक परिवर्तन भी होने लगता है। यह परिवर्तन लड़को की अपेक्षा लड़कियों में तीव्रता से एवं स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। लड़कियों में मासिक धर्म की शुरूआत उनमें एक प्रकार की जिज्ञासा तथा एक प्रकार का भय पैदा करती है। यही वह स्थिति होती है जब भारतीय परिवारों में सम्भवतः पहली बार किसी लड़की को अपनी माँ, चाची, भाभी, बड़ी बहिन आदि से ‘सेक्स’ को लेकर किसी प्रकार की जानकारी मिलती है। इस ‘सेक्स एजूकेशन’ में जिज्ञासा की शान्ति, जानकारियों की प्राप्ति कम, भय, डर, सामाजिक लोक-लाज का भूत अधिक होता है। ऐसी ‘यौन शिक्षा’ लड़कियों में अपने यौनिक-शारीरिक विकास के प्रति भय ही जाग्रत करती है, उनकी किसी जिज्ञासा को शान्त नहीं करती है।
लड़कों में यह स्थिति और भी भयावह होती है; परिवार से किसी भी रूप से कोई जानकारी न दिए जाने के परिणामस्वरूप वे सभी अपने मित्रों, पुस्तकों, इंटरनेट आदि पर भटकते रहते हैं और थोड़ी सी सही जानकारी के साथ-साथ बहुत सी भ्रामक जानकारियों का पुलिंदा थामें भटकते रहते हैं। शारीरिक विकास, यौनिक अंगों में परिवर्तन, विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण, सेक्स सम्बन्धी जानकारी, शारीरिक संसर्ग के प्रति जिज्ञासा अब जिज्ञासा न रह कर प्रश्नों, परेशानियों का जाल बन जाता है। इसमें उलझ कर वे शारीरिक सम्बन्धों, टीनएज़ प्रेगनेन्सी, गर्भपात, यौनजनित रोग, आत्महत्या जैसी स्थितियों का शिकार हो जाते हैं।
इन सारी स्थितियों के परिप्रेक्ष्य में देखें तो क्या लगता नहीं है कि जिस यौनिक उत्तेजना, यौनिक जिज्ञासा, लैंगिक विभिन्नता, शारीरिक विभिन्नता, शारीरिक-यौनिक विकास, शारीरिक सम्बन्ध, विपरीत लिंगी आकर्षण के प्रति जिज्ञासुभाव बचपन से ही रहा हो उसका समाध्न एक सर्वमान्य तरीके से हो, सकारात्मक तरीके से हो, न कि आधी-अधूरी, अध्कचरी, भ्रामक जानकारी के रूप में हो? यहाँ ‘सेक्स एजूकेशन’ की वकालत करने, उसको लागू करने अथवा देने के पूर्व एक तथ्य विशेष को मन-मश्तिष्क में हमेशा रखना होगा कि यह शिक्षा उम्र के विविध पड़ावों को ध्यान में रखकर अलग-अलग रूप से अलग-अलग तरीके से दी जानी चाहिए। ऐसा नहीं कि जिस ‘यौन शिक्षा’ के स्वरूप को हम छोटे बच्चों को दें वही स्वरूप टीनएजर्स के सामने रख दें।
यहाँ आकर यह तो स्पष्ट होता है कि ‘यौन शिक्षा’ क्यों और कैसी हो। बच्चों की दुनिया पर निगाह डालें तो हमें पता चलेगा कि ज्यादातर बच्चे-लड़के, लड़कियाँ दोनों ही- शारीरिक दुराचार का शिकार होते हैं। हम इसके कारणों का पता लगाये बिना इस अपराध को मिटाना तो दूर इसे कम भी नहीं कर सकते। बड़ी आयु के लोगों द्वारा बच्चों के शारीरिक शोषण की घटनाओं के साथ-साथ अब बच्चों द्वारा ही आपस में शारीरिक दुराचार की घटनायें भी सामने आने लगीं हैं। यहाँ हम बच्चों को ‘यौन शिक्षा’ के द्वारा स्त्री-पुरुष सम्बन्धों, मासिक धर्म, गर्भधारण, शारीरिक सम्बन्धों की जानकारी देकर उनका भला नहीं कर सकते। इस उम्र के बच्चों को ‘यौन शिक्षा’ के माध्यम से समझाना होगा कि एक लड़के और एक लड़की के शारीरिक अंग क्या हैं? उनमें अन्तर क्या है? हमें बताना होगा कि उनके शरीर में यौनिक अंगों की महत्ता क्या है? इन अंगों का इस उम्र विशेष में कार्य क्या है? इन बातों के अलावा इस उम्र में वर्तमान परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में ‘सेक्स एजूकेशन’ के रूप में बच्चों को समझाना होगा कि किसी भी लड़का-लड़की के शरीर के यौनिक अंग उसके व्यक्तिगत अंग होते हैं, जिनका प्रदर्शन नहीं किया जाना चाहिए। शरीर के इन अंगों को न किसी को स्पर्श करने देना चाहिए न किसी दूसरे के यौनिक अंगों को स्पर्श करना चाहिए। किसी के कहने पर भी उसके इन अंगों का स्पर्श नहीं करना चाहिए और न ही अपने इन अंगों का स्पर्श करवाना चाहिए यदि कोई ऐसा करता भी है (भले ही प्यार से या कुछ देकर या जबरदस्ती) तो तुरन्त अपने माता-पिता, शिक्षकों अथवा किसी बड़े को इसकी जानकारी देनी चाहिए।
हमारे पारिवारिक-सामाजिक ढाँचे में अभी भी एक बहुत बड़ी खामी यह है कि यदि कोई बच्चा अपनी यौनजनित जिज्ञासा को शान्त करना चाहता है तो हम या तो उसे अनसुना कर देते हैं या फिर उसे डाँट-डपट कर शान्त करा देते हैं। यदि किसी रूप में उसके सवालों का जवाब देते हैं तो इतनी टालमटोल से कि बच्चा असंतुष्ट ही रहता है। यही असंतुष्टता उसे यौनिक हिंसा, शारीरिक दुराचार का शिकार बनाती है। माता-पिता, शिक्षकों को ‘यौन शिक्षा’ के माध्यम से बच्चों को उनकी जिज्ञासा को सहज रूप से हल करना चाहिए, हाँ, यदि सवाल इस प्रकार के हों जो उसकी उम्र के अनुभव से परे हैं अथवा नितान्त असहज हैं तो उनका उत्तर ‘अभी आपकी उम्र इन सवालों को समझने की नहीं है’ जैसे सुलभ वाक्यों के द्वारा भी दिया जा सकता है। बच्चों के प्रश्नों के उत्तर उनकी सवालों की प्रकृति और परिस्थितियों पर निर्भर करती है। इसी तरह टीनएजर्स की ‘यौन शिक्षा’ का स्वरूप अलग होगा।
‘सेक्स एजूकेशन’ को लेकर मेरा व्यक्तिगत मत है कि इसकी विशेष आवश्यकता टीनएजर्स किशोरावस्था को है। यदि देखा जाये तो यह वह उम्र है जो ‘सेक्स लाइफ’ को आधुनिकतम जिज्ञासा से देखती है; जो आधुनिकतम संक्रमण के दौर से गुजर रही होती है। शारीरिक-यौनिक विकास एवं परिवर्तन, विपरीत लिंगी आकर्षण, शारीरिक सम्बन्धों के प्रति जिज्ञासा उन्हें शारीरिक सम्बन्धों की ओर ले जाती है जो विविध यौनजनित रोगों (एसटीडी) उपहार में देती है। शारीरिक-यौनिक विकास एवं परिवर्तन को समझने की चेष्टा में वे किसी गलत जानकारी, बीमारी का शिकार न हों, एच0आई0वी0/एड्स जैसी बीमारियों के वाहक न बनें इसके लिए इस उम्र के लोगों को ‘सेक्स एजूकेशन’ की आवश्यकता है। ‘यौन शिक्षा’ का पर्याप्त अभाव इस आयु वर्ग के लोगों को यौनिक जानकारी की प्राप्ति अपने मित्रों, ब्लू फिल्मों, पोर्न साइट आदि से करवाती है जो भ्रम की स्थिति पैदा करती है। इन स्त्रोतों से जानकारियाँ भ्रम की स्थिति उत्पन्न करने के साथ-साथ शारीरिक उत्तेजना भी पैदा करती है जो अवांछित सम्बन्धों, बाल शारीरिक शोषण, अप्राकृतिक सम्बन्धों आदि का कारक बनती है। अपनी शारीरिक-यौनिक इच्छापूर्ति मात्र के लिए के लिए किया गया शारीरिक-संसर्ग टीनएज प्रेगनेन्सी, गर्भपातों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ युवाओं में एस0टी0डी0, एच0आई0वी0/एड्स जैसी बीमारियों को तीव्रता से फैलाता है। एक सर्वे के अनुसार दिल्ली अकेले में एस0टी0डी0 क्लीनिक में प्रतिदिन आने वाले मरीजों की संख्या का लगभग 57 प्रतिषत 15-22 वर्ष की आयु वर्ग के लड़के-लड़कियाँ हैं। ‘यौन शिक्षा’ का अभाव इस संख्या को और भी अधिक बढ़ायेगा।
‘यौन शिक्षा’ को देने के पीछे यह मन्तव्य कदापि नहीं होना चाहिए कि युवा वर्ग सुरक्षित शारीरिक सम्बन्ध बनाये, जैसा कि लगभग एक दशक पूर्व केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री का कहना था कि मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन किसके साथ सोता है बस वे आपस में ‘कण्डोम’ का प्रयोग करते हों। इस प्रकार की कथित आधुनिक सोच ने ही भारतीय समाज को विचलित किया है, ‘यौन शिक्षा’ के मायने भी बदले हैं। ‘यौन शिक्षा’ के सकारात्मक एवं विस्तारपरक पहलू पर गौर करें तो उसका फलक उद्देश्यपरक एवं आशापूर्ण दिखायी पड़ेगा।
‘यौन शिक्षा’ के द्वारा सरकार, समाज, शिक्षकों, माता-पिता का उद्देश्य होना चाहिए कि वे एक स्वस्थ शारीरिक विकास वाले बच्चों, युवाओं का निर्माण करें। ‘यौन शिक्षा’ के एक छोटे भाग यौनिक अंगों की जानकारी, गर्भधारण की प्रक्रिया, प्रसव प्रक्रिया, गर्भपात आदि से अलग हट कर ‘यौन शिक्षा’ के द्वारा समाज में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की स्वीकार्यता, उसकी संस्कारिकता, उसके पीछे छिपे मूल्यों, शारीरिक विकास के विविध चरणों, शरीर के अंगों की स्वच्छता, अनैतिक सम्बन्धों से उपजती शारीरिक बीमारियाँ, यौनजनित बीमारियों के दुष्परिणाम, स्त्री-पुरुष सम्बन्धों (माता-पिता, पति-पत्नी, भाई-बहिन, मित्रों आदि) की आन्तरिकता एवं मर्यादा की जानकारी, उनके मध्य सम्बन्धों की मूल्यता, वैवाहिक जीवन की जिम्मेवारियाँ, इनके शारीरिक एवं आत्मिक सम्बन्धों की आवश्यकता, आपसी सम्बन्ध और उनमें आदर का भाव आदि-आदि अनेक ऐसे बिन्दु हो सकते हैं जो ‘यौन शिक्षा’ के रूप में समझाये जा सकते हैं। इन मूल्यों, सम्बन्धों, आन्तरिकता, पारिवारिकता, सामाजिकता, शारीरिकता आदि को समझने के बाद यौनजनित बीमारियों, एच0आई0वी0/एड्स आदि भले ही समाप्त न हो सकें पर इनके रोगियों की संख्या में बढ़ते युवाओं की संख्या में अवश्य ही भारी गिरावट आयेगी।
‘यौन शिक्षा’ को लागू करने, इसको देने के विरोध में जो लोग भी तर्क-वितर्क करते नजर आते हैं उनको भी सामाजिक-पारिवारिक-शारीरिक कसौटी पर कसना होगा। यह कहना कि ‘यौन शिक्षा’ तमाम सारी समस्याओं का हल है, अभी जल्दबाजी होगी पर यह कहना कि ‘यौन शिक्षा’ से विद्यालय, समाज एक खुली प्रयोगशाला बन जायेगा, एक प्रकार की ‘ड्रामेबाजी’ है। आज बिना इस शिक्षा के क्या समाज, विद्यालय और तो और परिवार भी क्या शारीरिक सम्बन्धों को पूर्ण करने की प्रयोगशाला नहीं बन गये हैं? जो कहते हैं कि पशु-पक्षियों को कौन सी ‘यौन शिक्षा’ दी जाती है पर वे सभी शारीरिक सम्बन्ध सहजता से बना लेते हैं, अपनी प्रजाति वृद्धि करते हैं, वे लोग अभी ‘यौन शिक्षा’ को मात्र शारीरिक सम्बन्धों की तृप्ति को समझने का एक माध्यम मान रहे हैं। ‘यौन शिक्षा’ का तात्पर्य अथवा उद्देश्य केवल स्त्री-पुरुष के यौनिक अंगों की जानकारी देना, यौनांगों के चित्र दिखाना, शारीरिक सम्बन्ध की क्रिया समझाना, गर्भधारण-प्रसव की प्रक्रिया समझाना मात्र नहीं है। समाज में शारीरिक सम्बन्धों को पवित्रता प्राप्त है जो सिर्फ पति-पत्नी के मध्य ही स्वीकार्य हैं और उनका उद्देश्य शारीरिक सुख-संतुष्टि के अतिरिक्त संतानोत्पत्ति कर समाज को नई पीढ़ी प्रदान करना भी है।
कहीं न कहीं ‘यौन शिक्षा’ की कमी ने पश्चिमी खुले सम्बन्धों को भारतीय समाज में पर्दे के पीछे छिपी स्वीकार्यता दी और पति-पत्नी के विश्वासपरक, पवित्र रिश्ते से कहीं अलग शारीरिक संतुष्टि की राह अपनायी। परिणामतः टीनएज प्रेगनेन्सी, बिन ब्याही माँएँ, यौनपनित बीमारी से ग्रसित युवा वर्ग, बलात्कार, बाल शारीरिक शोषण, गर्भपात, कूड़े के ढ़ेर पर मिलते नवजात शिशु, आत्महत्याएँ आदि जैसी शर्मसार करने वाली घटनाओं से हम नित्य ही दो-चार होते हैं। अन्त निष्कर्षतः एक वाक्य से कि मेरी दृष्टि में ‘यौन शिक्षा’ के स्वरूप, उद्देश्य, शैली के अभाव ने ही परिवार नियोजन के प्रमुख हथियार ‘कण्डोम’ को अनैतिक सम्बन्धों के, यौनजनित रोगों के, समय-असमय शारीरिक सुख प्राप्ति के, यौनाचार के सुरक्षा कवच के रूप में सहज स्वीकार्य बना दिया है। अच्छा हो कि ‘कण्डोम, बिन्दास बोल’, ‘आज का फ्लेवर क्या है?’, ‘कन्ट्रासेप्टिव पिल्स’ जैसे विज्ञापनों से शिक्षा लेते; महानगरों के सुलभ शौचालयों एवं अन्य सार्वजनिक स्थलों पर लगी ‘कण्डोम मशीनों’ पर भटकते; पोर्न साइट, नग्न चित्रों में शारीरिक-यौनिक जिज्ञासा को शान्त करते बच्चों, युवाओं को सकारात्मक, उद्देश्यपरक, संस्कारपरक, मूल्यपरक ‘यौन शिक्षा’ से उस वर्जित विषय की जानकारी दी जाये जो मानव जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होने के बाद भी किसी न किसी रूप में प्रतिबंधित है।

05 सितंबर 2008

शिक्षा, शिक्षक दिवस

इस देश की कितनी बड़ी विडम्बना है कि हम अपनी संस्कृति को भुला कर पश्चिमी संस्कृति का अनुसरण करते जा रहे हैं. विभिन्न भारतीय पर्वों, त्योहारों को मनाने के स्थान पर "डे" मनाने लगे हैं. अपनी परम्परा को त्याग कर पाश्चात्य परम्परा का अनुकरण करने लगे हैं. किस बात को कहा जाए किसे नहीं ये बात भी अब समझ से परे हो गई है. हम ख़ुद तय नहीं कर पा रहे हैं कि हमें चाहिए क्या है? हर बात में सबके अपने-अपने तर्क, अपने-अपने मशविरे हैं.
आज का दिन है जिसे हम लोग शिक्षक दिवस के रूप में मनाते हैं। ये आयोजन इसलिए नहीं कि हम अपनी संस्कृति को भूल कर पाश्चात्य संस्कृति की तरफ़ जा रहे हैं, ये आयोजन तो याद दिलाता है उस महान व्यक्तित्व की जिसने अपने अभावों को दरकिनार कर शिक्षा के चरम को छुआ. अनेक तर्कों से अपने ज्ञान से भारतीय दर्शन की एक नई इबारत लिखी. भरतीय दर्शन को एक पहचान दी, देश की शिक्षा व्यवस्था को सुधरने के उपाय दिए.
कभी-कभी शर्म तो इस बात पर आती है कि ये वो देश है जहाँ अच्छी बातों का समर्थन करने वाले कम, बाल की खाल निकलने वाले बहुत मिल जायेंगे। ब्लॉग के मारों का क्या कहना, वे तो बाल की खाल निकालते हैं उस खाल में फ़िर एक बाल पैदा करते हैं और फ़िर उसमें से खाल निकालते हैं. जहाँ हम शिक्षक दिवस को टीचर्स डे कहने लगे हों, सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन को पाश्चात्य सभ्यता से रंगा मानने लगे हों वहां सेक्स एजुकेशन को लेकर क्या समझाया जाए?
टीचर बहुत हैं जो सेक्स की सिक्षा दे रहे हैं पर उचित दंग से नहीं, प्रोग्शालायें बहुत हैं पर फैला रहीं हैं एड्स और तमाम यौन संक्रामक बीमारियाँ. बहरहाल भटकाईए अपने बच्चों को चोरी-छिपे रहस्यों को समझने की दुनिया में और बना दीजिये यौन रोगी. पुराने लोग अपनी बात न करें जो सालों बिता देते थे खिड़की और छत पर ताका-झांकी करने में, ये नै जेनरेशन है जो कच्ची उमर में पके फल खा रही है. क्या सर्वे रिपोर्ट्स नहीं पढ़ते? चलिए कौन किसे समझाए....जब टीचर उपलब्ध हैं......प्रयोगशालाएं उपलब्ध हैं तो कमी कहाँ है? जानकारी की बुराई करने वाले ही परदे के पीछे बैठ कर रंगीन किताबों के रंगीन चित्रों में अपनी तृप्ति करते हैं, इन्टरनेट कैफे की आड़ वाली सीट पर बैठ कर रंगीन फिल्मों का मजा लेते हैं, इन्टरनेट पर गिने चुने शब्दों के सहारे, गिने चुने ब्लॉग के सहारे अपनी तृप्ति का साधन खोजते हैं और कहते हैं कि क्या जरूरत है सेक्स एजुकेशन की? वाह री सिक्षा व्यवस्था.....वाह रे उसके ऐसे हर जगह उपलब्ध शिक्षक.

03 सितंबर 2008

सेक्स एजुकेशन की जरूरत

अभी पिछले दिनों अपने एक मित्र की शोध पत्रिका कृतिका के लिए यौन शिक्षा (SEX EDUCATION) पर एक लेख लिखने का आदेश सा मिला. मित्र हैं तो आदेश सिरोधार्य हुआ पर पशोपेश में रहे की इस विषय पर क्या और कैसा लिखा जाए? बहुत कुछ खंगाला पर वो नहीं मिला जो हम चाह रहे थे। इस बीच कुछ ऐसा भी देखने पढने को मिला की एक बारगी लगा कि वाकई इस देश में अब यौन शिक्षा की जरूरत बहुत बढ़ गई है.

सेक्स एजुकेशन को सिर्फ़ आदमी-औरत के शारीरिक संबंधों तक सीमित करके नहीं देखें तो हम इसकी महत्ता को समझ पायेंगे. चूंकि हमारे मित्र को पता है कि हम ब्लॉग पर भी इस लेख को चिपका सकते हैं तो उन्हों ने फिल्मी डिरेक्टर की तरह हमारे ऊपर विश्वास की सख्ती कर दी कि पत्रिका प्रकाशित होने के पहले इस लेख को ब्लॉग पर पोस्ट नहीं करोगे।

इस कारण से उस लेख को ज्यों का त्यों कुछ दिन बाद लिखेंगे पर सेक्स एजुकेशन की जरूरत के बारे में इतना समझ लें कि इस शिक्षा की जरूरत बच्चों को ये बता कर करनी होगी कि हमारे शरीर के किन-किन अंगों को हमें किसी दूसरे के सामने प्रदर्शित नहीं करना है. अक्सर देखा गया है कि 6-7 वर्ष तक के बच्चों में अपने यौनांगों को लेकर एक तरह की उत्सुकता रहती है. वे किसी न किसी बहाने आपस में, खेल-खेल में ही एक दूसरे के यौन्नंगों का निरीक्षण-परीक्षण करते हैं. उनकी इसी जिज्ञासा का लाभ समाज के बहसी भेडिये उठाते हैं और हमारे बच्चे नसमझी में यौन शोषण का शिकार हो जाते हैं।

चलिए अभी इतना ही, बाकी बस इतना समझिये कि ये कहना कि सेक्स एजुकेशन जानवरों को तो कोई नहीं देता फ़िर भी वे अपनी नस्ल को बढ़ा रहे हैं, एक दूसरे के साथ संसर्ग कर रहे हैं, ख़ुद को धोखा देना होगा. हमें मात्र नस्ल नहीं बढानी है, मात्र शारीरिक संबंधों को नहीं सिखाना है हमें बताना है कि पति-पत्नी के संबंधों में विश्वास क्या है? पारिवारिक जिम्मेवारियां क्या हैं? बच्चों की परिवरिश क्या और कैसी हो? इस कारण सेक्स एजुकेशन को लागू होना चाहिए या नहीं ये बाद की बात है पर कंडोम, बिंदास बोल.....आज का फ्लेवर क्या है जैसे विज्ञापनों और पीली पन्नियों में बिकती किताबों, नेट पर घूमती रंगीन दुनिया से सेक्स को समझते बच्चों को उसका असल मतलब तो समझाना ही होगा.