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03 जनवरी 2023

आपसी सहयोग, विश्वास को नहीं छोड़ेंगे

विगत दो वर्षों की उथल-पुथल भरी जीवन-शैली के बीच भी लोगों ने अपने उत्साह को नहीं छोड़ा. जिस तरह से कोरोना ने लोगों के दिल-दिमाग में गहरे घाव छोड़े थे उसे देखकर लगता नहीं था कि लोग सहजता से बाहर निकल सकेंगे. बावजूद इसके लोगों ने अपनी जिजीविषा को नहीं छोड़ा और कोरोनाकाल के डरावने घेरे से खुद को बाहर निकाल लाये. लोगों की जिजीविषा ने जहाँ उनके अपने-अपने पर्वों-त्योहारों को मनाने का अवसर दिया वहीं दूसरों के सुख-दुःख में भी शामिल होने का मौका दिया.


अब जबकि पुराने साल को पीछे छोड़कर हम सब नए साल में पहुँच गए हैं तब हमें अपने डरावने अतीत और उसकी भयावहता को पीछे छोड़ने की आवश्यकता है. लोगों ने सब कुछ भूल कर नए वर्ष का स्वागत पूरे जोश, उत्साह, उमंग से किया है, ये सुखद है मगर इसी सुखद के पीछे से कोरोना वायरस की खतरनाक आहट फिर से सुनाई देने लगी है. खबरें डरावनी ही नहीं अत्यंत भयावह हैं. लोग बाहर से उत्साहित दिखाई दे रहे हैं मगर भीतर ही भीतर उनको बहुत कुछ डरा रहा है. यह डर लोगों के खुद के प्रति नहीं बल्कि अपनों के लिए है. उन नौनिहालों के लिए है जिन्होंने अभी ज़िन्दगी का बहुत सूक्ष्म पल ही देखा और उनके सामने भयानक वायरस आकर खड़ा हो गया. विगत दो सालों में जिस तरह से नौनिहालों ने, युवाओं ने इस संसार को त्यागा है, उनको कोरोना ने अपना ग्रास बनाया है वह वाकई दुखद भी है, भयावह भी है. ऐसी घटनाओं से दिल सिहर उठता है. अपने हाथों में ऐसी जिंदगियों को जाते देखना, जिनको भविष्य के लिए नए-नए सपने देखना था, अत्यंत कष्टकारी होता है.




ज़िन्दगी का यही वो क्षण होता है जबकि तकनीकी, ज्ञान, विज्ञान से संपन्न व्यक्ति के हाथ में कुछ नहीं होता है. उसके पास सिवाय हाथ मलने के, सिवाय पछताने के कुछ नहीं रह जाता है. देखा जाये तो यही स्थितियाँ व्यक्ति को सिखाती भी हैं. यही हालात व्यक्ति को लड़ने के लिए ऊर्जा भी देते हैं. जिजीविषा और विश्वास से भरे जनमानस को अपनी पिछली इन्हीं घटनाओं से सबक लेने की आवश्यकता है. एक बार पीछे पलट कर देखने की आवश्यकता है. हम सभी ने लॉकडाउन जैसी भयावहता को देखा और सहा है. क्या उस दौर में हमने भौतिकतावादी वस्तुओं का संग्रह करने का विचार किया? क्या उन दिनों में लोगों ने लक्जरी गाड़ियों, सामानों, जेवरातों को खरीदने के लिए प्रयास किये? सभी ने प्रयास किये अपने लोगों की सुरक्षा के. सभी ने कोशिश की एकसाथ रहने की. सभी के कदम बढ़ाये सामुदायिकता के लिए. सभी ने संग्रह किया जीवन देने वाली खाद्य-सामग्री का.


उन दिनों एक बहुत लम्बा समय बिना भौतिकता के बीता. उस समय को लोगों ने आपस में एक-दूसरे का साथ देकर बिता दिया. ऐसे में यह समझने वाली बात है कि ज़िन्दगी में आवश्यक क्या है, अनिवार्य क्या है. यही वो समझ है जो इंसानियत सिखाती है, इन्सान बनाती है. हमने जब भी इस सोच को, इस समझ को छोड़ा है हम सभी इन्सान से जानवर में बदल गए. इसी बदलाव ने समाज को ख़राब कर दिया. इसी परिवर्तन ने प्रकृति का विनाश करना शुरू कर दिया. इसी बदलाव ने पर्यावरण को असुरक्षित कर दिया. इसी परिवर्तन ने मानसिकता को दूषित कर दिया है. आज हम अपने चारों तरफ नजर डालें तो प्रदूषित वातावरण ज्यादा देखने को मिल रहा है. चाहे प्रकृति की बात करें, पर्यावरण की बात करें, संस्कृति की बात करें, खान-पान की बात करें, सामाजिकता की बात करें, पहनावे की बात करें, बोल-चाल की बात करें सभी में एक तरह का प्रदूषण स्पष्ट दिखाई देने लगा है.


विगत को विस्मृत करते हुए हम सभी आगत के स्वागत में लगे हैं, अच्छा है मगर हमें विगत को पूरी तरह से विस्मृत नहीं करना चाहिए. नए साल के जश्न के ठीक पहले जाने वाले साल के सबक को याद रखें. जाने वाले साल ने हमें क्या-क्या सीखने योग्य दिया उसे याद रखें. बीत चुके अन्य सालों में भी हम सबने किस तरह दुःख-दर्द सहकर भी सबके साथ को स्वीकार किया, सबके विश्वास को बनाये रखा, उसी को आने वाले साल के साथ भी बनाये रखें. आने वाला समय कितना भयावह होगा, होगा भी या नहीं इस बारे में आज से परेशान होने की नहीं बल्कि सजग रहने की आवश्यकता है. आने वाले कल की चिंता में हमें अपना आज ख़राब नहीं करना है.


जाने वाले इस साल के साथ अपने नौनिहालों को, युवाओं को सिखाना है कि कैसे अतीत से सीख लेते हुए हम आगे बढ़ें. निश्चित ही ये पीढ़ी रफ़्तार की शौक़ीन है, तकनीक की प्रेमी है. ऐसे में उसको ये समझाने की महती आवश्यकता है कि रफ़्तार और तकनीक के शौक में ज़िन्दगी को ख़त्म नहीं किया जाना चाहिए. इसी पीढ़ी को समाज, संस्कृति, साहित्य, सामाजिकता आदि का पाठ सिखाना होगा. हम सभी को नए साल के स्वागत के जश्न के साथ याद रखना होगा कि आने वाले साल को हम जो भी धरोहर सौंपेंगे, वही हमको वो अपने जाते समय देकर जायेगा. तो संकल्पित हों कि एक-दूसरे का विश्वास बनते हुए, एक-दूसरे का साथ बनते हुए आने वाले संकटों का सामना करेंगे. नए साल को हम खुशियाँ, स्वास्थ्य, सुखद मनोभाव, बेहतर इन्सान, सामाजिकता आदि से सजाते हुए आगे बढ़ेंगे. 






 

08 अगस्त 2022

बांग्लादेश के संकट पर भारत का रुख

वर्तमान दौर भारत के पड़ोसी देशों के लिए सुखद नहीं है. श्रीलंका का आर्थिक और राजनैतिक संकट कुछ दिनों पहले ही वैश्विक पटल पर उभर कर सामने आया था. पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है. अब बांग्लादेश की बिगड़ती आर्थिक स्थिति सबके सामने आ रही है. इन तीनों पड़ोसी देशों में जनसामान्य को रोजमर्रा की वस्तुओं का मिलना दुष्कर होता जा रहा है. मँहगाई का स्तर बढ़ता जा रहा है. विदेशी मुद्रा कोष में लगातार गिरावट आती जा रही है. इन सभी देशों की मुद्रा की कीमत भी डॉलर के मुकाबले लगातार गिर रही है. बांग्लादेश सरकार ने अपने निर्माण के बाद पहली बार तेल कीमतों में अतिशय वृद्धि करके डाँवाडोल होती अपनी आर्थिक स्थिति से निपटने को एक अजब सा कदम उठाया है.   


बांग्लादेश की सरकार भले कहे कि उसके देश में हालात सामान्य हैं किन्तु यह अंतिम सत्य नहीं है. तेल कीमतों के बढाए जाने के बाद जिस तरह से नागरिकों ने सड़क पर उतर कर विरोध, विद्रोह किया है वह वहाँ के हालात बताने को पर्याप्त है. बांग्लादेश की आर्थिक स्थिति के खराब होने की एक बड़ी वजह वहाँ आयात के बढ़ना और निर्यात का घटना रहा है. आयात बढ़ने के का सीधा असर वहाँ के खजाने पर हुआ. एक रिपोर्ट के अनुसार जुलाई 2021 से लेकर मई 2022 के बीच 81.5 अरब डॉलर का आयात किया गया. पिछले साल की तुलना में यह 39 प्रतिशत अधिक है. जाहिर सी बात है कि ऐसा होने के कारण वहाँ के मुद्रा कोष पर नकारात्मक प्रभाव पड़ना ही था. बांग्लादेश का विदेशी मुद्रा भंडार वर्ष 2021 जुलाई तक 45 अरब डॉलर था, जो जुलाई 2022 को यह घटकर 39 अरब डॉलर रह गया. अनुमान है कि इस स्थिति में बांग्लादेश के पास पाँच महीने आयात करने की क्षमता बची है. इन स्थितियों से निपटने के लिए बांग्लादेश के वित्त मंत्री ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से 4.5 अरब डॉलर का कर्ज माँगा है. इसका उद्देश्य एक प्रकार से देश के विदेशी मुद्रा भंडार को कुछ ताकत प्रदान करना है.




बांग्लादेश के ऐसे आर्थिक हालातों पर प्रश्न अवश्य ही उठता है कि भारत का नजरिया क्या होना चाहिए? भारत उसकी सहायता के लिए क्या कदम उठाता है यह एक राजनयिक बिंदु है मगर भारत को वहाँ की बिगड़ती स्थिति से मुँह फेर कर नहीं बैठना चाहिए. बांग्लादेश की बिगड़ती आर्थिक स्थिति भारत के लिए भी चिंता का कारण होनी चाहिए. इसके पीछे का कारण बांग्लादेश का पड़ोसी होना मात्र नहीं है वरन अन्य दूसरी स्थितियाँ भी हैं. बांग्लादेश वर्ष 1971 में बनने के साथ ही भारत का पड़ोसी देश कहलाया अन्यथा की स्थिति में वह पहले अविभाज्य भारत का ही हिस्सा था. वहाँ की संस्कृति, वातावरण आदि में बहुत हद तक समानता देखने को मिलती है. अविभाजित भारत का भाग होने के कारण दोनों तरफ के बहुतेरे नागरिकों में दो देशों जैसा भाव का एहसास नहीं जन्मा है. रोजगार की तलाश में आज भी बांग्लादेश से हजारों की संख्या में नागरिक भारत में घुसपैठ करते हैं. अवैध तरीके से होने वाली घुसपैठ ही भारत-बांग्लादेश संबंधों में कटुता का कारण भी बनी है.


बांग्लादेश की तरफ से होने वाली अवैध घुसपैठ के चलते भारत में तनाव बना रहता है. इस घुसपैठ ने न केवल भारतीय संसाधनों, आर्थिक स्थितियों पर बोझ डाला है बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी ध्वस्त किया है. बांग्लादेशी घुसपैठियों के यहाँ अनेक तरह के अपराधों में लिप्त होने के प्रमाण मिले हैं. ऐसे में यदि बांग्लादेश का आर्थिक संकट लम्बा चलता है, वहाँ के नागरिकों में इसी तरह विरोध की मानसिकता बनी रही, रोजगार के अवसरों में कमी आती रही तो निश्चित ही वहाँ से घुसपैठ करने वालों की संख्या बढ़ेगी. रोजगार की तलाश में हजारों की संख्या में नागरिकों का भारत में आना होगा. यह स्थिति कतई सुखद नहीं होगी. इससे न केवल दोनों देशों के राजनयिक, कूटनीतिक संबंधों पर नकारात्मक असर होगा, भारत के सामाजिक ढाँचे और आर्थिक संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ेगा.


इसके अलावा दोनों देशों की सीमा अत्यंत विस्तीर्ण है, जहाँ की भौगौलिक स्थिति के कारण पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था कर पाना दुष्कर होता है. इसका लाभ उठाते हुए नकली नोटों, हथियारों, नशीले पदार्थों आदि की तस्करी की घटनाएँ नियमित रूप से अंजाम दी जाती हैं. बांग्लादेश का आर्थिक संकट इस तरह की अवैध गतिविधियों को और बढ़ावा देगा. जाहिर सी बात है कि बांग्लादेश में वस्तुओं की कमी को पूरा करने के लिए भारत से तस्करी करके, अवैध रूप से वस्तुओं को बांग्लादेश पहुँचाया जायेगा. निश्चित ही यह भारत के लिए आर्थिक समस्या ही उत्पन्न करेगा. बांग्लादेश आर्थिक संकट के दौरान भारत की तरफ से उसे खाद्यान्न सहायता प्रदान की गई है. अन्य आवश्यक संसाधनों की सहायता प्रदान करने की दृष्टि से उच्चस्तरीय कदम उठाये जा रहे हैं.


चूँकि बांग्लादेश कपड़ा निर्यातकों में अपना एक विशेष स्थान रखता है. वैश्विक बाजार में यहाँ के कपड़े की जबरदस्त माँग रहती है. रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण यहाँ के कपड़ा निर्यात की माँग पर नकारात्मक असर पड़ा. बिगड़ते आर्थिक हालातों में खाने-पीने की चीजों और ईंधन के बढ़े दाम से नागरिकों को परेशानी पैदा हुई. नागरिकों के सड़कों पर उतरने से वहाँ भी श्रीलंका जैसे हालात दिखाई दे रहे हैं. ऐसे में बांग्लादेश चीन के कर्ज जाल में फँस जाये तो कोई आश्चर्य की बात नहीं. चीन पहले भी चटगाँव को लेकर बहुत ज्यादा रुचि दिखाता रहा है, ऐसे में उसके द्वारा आर्थिक सहायता की बड़ी पहल करना कोई नई बात नहीं होगी. यदि बांग्लादेश चीन के आर्थिक चंगुल में फँसता है तो यह भारत के दृष्टिकोण से भी उचित नहीं होगा. इसलिए भारत को बांग्लादेश के आर्थिक संकट को जल्द से जल्द दूर करने हेतु यथासंभव कदम उठाने की आवश्यकता है.


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23 अप्रैल 2021

एक निवेदन मददगार साथियों से

इधर कोरोना वायरस की दूसरी लहर, जैसा कि ऐसा कहा जा रहा, के आने के बाद से लोगों पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है. ऐसे में बहुत से लोगों को आवश्यक चिकित्सकीय सुविधाएँ नहीं मिल पा रही हैं. लोग मदद के लिए परेशान हैं. कोई दवाओं के लिए परेशान है तो कोई ऑक्सीजन के लिए. ऐसी स्थिति में हमारे बहुत से मित्र सोशल मीडिया की सहायता से जरूरतमंद लोगों की भरपूर सहायता, सहयोग कर रहे हैं. सभी साधुवाद के पात्र हैं.  


एक निवेदन है सभी से, जो पोस्ट किसी की सहायता के लिए लगाई गई है, यदि उसके द्वारा मदद हो चुकी है अथवा बहुत दिन हो चुके हों तो उस पोस्ट को डिलीट कर दिया करें. पोस्ट बने रहने से वह किसी नये सदस्य के सामने से गुजरती है तो वह संवेदना के साथ सम्बन्धित पोस्ट पर मदद, सहयोग की अपील/प्रयास करने लगता है, जबकि उस पोस्ट के द्वारा मदद पहले ही हो चुकी है. ऐसी स्थिति में कई लोगों को अनावश्यक परेशानी होती है साथ ही ऐसी स्थिति किसी के साथ दो-तीन बार होने पर वह सहायता के लिए आगे आना बंद कर देता है.


मदद के लिए लिखी ऐसी पोस्ट का कोई दीर्घकालिक लाभ भी नहीं. ऐसी स्थिति में वे भविष्य में अन्य लोगों के लिए संशय तो पैदा कर ही सकतीं हैं साथ ही अनावश्यक रूप से इंटरनेट स्पेक्ट्रम की जगह को घेरे रहेंगीं.


एक निवेदन और कि जिस पोस्ट के द्वारा मदद मिल जाए तो उस पोस्ट के स्क्रीनशॉट के साथ इस बारे में अवश्य सूचित कर दिया जाए ताकि सहयोग में लगे सुधिजन उस ओर से निश्चिंत हो सकें.


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वंदेमातरम्

16 दिसंबर 2020

सहायता करने की सच्ची मानसिकता का प्रेरणादायी उदाहरण

सुबह लगभग दस बजे का समय है. बाजार में हलचल अभी शुरू होती जा रही है. दुकानें भी आराम-आराम से खुलती दिख रही हैं. ऐसी ही सामान्य सी सुस्त सुबह में सड़क के किनारे एक महिला बेहोशी की हालत में सड़क किनारे गिरी हुई है. वह अकेली नहीं है बल्कि उसके आसपास कई लोगों की भीड़ भी है. भीड़ भले ही ऐसी न हो जिसे बहुत बड़ी भीड़ कहा जाये मगर इतनी अवश्य है जो सड़क किनारे अचेतावस्था में गिरे किसी भी व्यक्ति की मदद कर सकती है. उस सुबह की भीड़ भी इतनी थी जो उस महिला की सहायता कर सकती थी. इसके बाद भी भीड़ बस तमाशा बने उस महिला को देखे जा रही थी. रुकने वाले रुक जाते थे और रुक कर एक नजारा देख चलने वाले फिर अपने रास्ते चल देते थे. उस रुकी भीड़ में कुछ युवा भी थे, कुछ पुरुष भी, कुछ लड़के भी मगर जिस तरह से स्त्री, पुरुष विभेद विगत कुछ वर्षों में समाज में बना दिया गया है, उससे शायद उनकी भी हिम्मत न पड़ रही थी उस महिला की सहायता करने की. इसके अलावा पुलिस, कानून के तमाम चकल्लस देखते हुए भी बहुत से लोग उस सड़क किनारे बेहोश पड़ी महिला से दूरी बनाये रखे होंगे.


उसी समय एक महिला का सड़क के दूसरी तरफ से निकलना हुआ. दूसरी तरफ से इसलिए क्योंकि उस सड़क पर आवागमन के लिए बने डिवाईडर न केवल सड़क को अलग-अलग भागों में बाँट रहे थे बल्कि सड़क पर चलने वालों को भी दो हिस्सों में अलग-अलग किये हुए थे. समाज में सभी एक प्रवृत्ति के नहीं होते, ठीक वैसे ही जैसे कि हमारे शरीर से जुड़ी सभी उँगलियाँ एक जैसी नहीं होतीं. इस एक जैसी प्रवृत्ति न होने के कारण अपनी स्कूटी से सड़क के दूसरी तरफ से चली जाने वाली उस महिला ने सड़क के दूसरी तरफ, डिवाइडर के उस पार कुछ असामान्य सा देखा-समझा. उस महिला ने स्कूटी को वापस सड़क किनारे गिरी अचेत महिला के पास लाकर रोका और फिर जैसा कि किसी भी जागरूक, संवेदित व्यक्ति को करना था, उसने अपना काम शुरू किया.


स्कूटी से उतर कर उस महिला ने अपने बैग से पानी की बोतल निकाल कर अचेत महिला को होश में लाने का उपक्रम शुरू किया. सजग महिला की हिम्मत, उसकी सक्रियता देख आसपास खड़े कुछ युवकों ने भी अपना सहयोग देना शुरू किया. इतनी देर के बाद जब भीड़ का हिस्सा न बन, एक सक्रिय महिला ने अपनी सजगता दिखाई तो उस अचेत महिला की बंद हथेलियों में से एक में कोई फोटो सी दिखाई दी और दूसरी में एक मोबाइल नंबर लिखा नजर आया. या भी सबकुछ भीड़ को नहीं बल्कि उस स्कूटी वाली महिला को नजर आया. उन्होंने अपने मोबाइल से तत्काल उस नंबर पर बात की. वो नंबर उस अचेत महिला के किसी रिश्तेदार का नहीं था. अब भी स्थिति ज्यों की त्यों थी कि वो महिला कौन है? वह सड़क पर अचेत क्यों पड़ी हुई है? उसके हाथ में लिखा नंबर किसका है? उसकी दूसरी हथेली में दबी फोटो किसकी है? वह यहाँ अचेतावस्था में कैसे पहुँची?


इस बीच उस जागरूक महिला के कहने पर किसी व्यक्ति ने एम्बुलेंस को फोन करके बुलाया. तब तक महिला भी कुछ होश में आती नजर आई. एम्बुलेंस आकर उस महिला को जिला चिकित्सालय ले गई. सक्रिय, जागरूक महिला अपने कार्यक्षेत्र को चल दी, भीड़ अपने-अपने विचार-तर्क गढ़ते हुए अपने-अपने रास्ते चल दी. बात यही समाप्त नहीं हुई, जो सजग रहता है, वह सदैव सजग रहता है. अचेत महिला की सहायता को रुकी उस महिला ने लगातार अपने फोन से चिकित्सालय प्रशसान से, पुलिस प्रशासन से संपर्क बनाये रखा. अंततः जब सुखद खबर ये मिली कि वह अचेत महिला, जो किसी संदेहास्पद वस्तु के खा लेने से अचेत हो गई थी, अब स्वस्थ है, खतरे से बाहर है.


यह पूरी घटना जनपद जालौन के उरई शहर की है. इस घटना को यहाँ सामने लाने का उद्देश्य महज इतना है कि उरई जैसे छोटे से शहर में भी जहाँ कि परिचय का दायरा आसानी से बड़ा किया जा सकता है, वहाँ भी सड़क किनारे अचेत पड़ी एक महिला सहायता को तरसती है. उसके चारों तरफ जमा भीड़ सिर्फ तमाशबीन बनी रहती है. इसके पीछे भले ही कानूनी लफड़े की बात हो या स्त्री, पुरुष विभेद की बात मगर स्थिति सुखद नहीं कही जाएगी.


अब आपको मिलवा दें उस महिला से जो अचानक से उस रास्ते से गुजरीं और बिना किसी लफड़े, समस्या की परवाह करते हुए उस अचेत महिला की सहायता में जुट गईं. वे डॉ० विश्वप्रभा त्रिपाठी हैं जो वर्तमान में गांधी महाविद्यालय, उरई में मनोविज्ञान विभाग में कार्यरत हैं साथ ही संगीत, समाजसेवा के क्षेत्र में भी अपनी उपस्थिति बनाये हुए हैं. वे जनपद के ही नहीं बल्कि प्रदेश के अत्यंत प्रतिष्ठित परिवार से सम्बद्ध हैं. सामाजिक सक्रियता बनाये रखना, लोगों की मदद करना उनके खून में है, उनके स्वभाव में है. इसी के चलते उन्होंने बिना किसी तरह की देरी किये, बिना अच्छा-बुरा सोचे उस अचेत महिला की सहायता की.




इस घटना को सामने लाने का उद्देश्य यही है कि हममें से बहुत से लोग कानूनी दांव-पेंच, पुलिस प्रशासन के रवैये से डर कर, घबरा कर बहुत बार सहायता देने से बचते हैं. ऐसा होना नहीं चाहिए. यदि हम अपने आपमें सशक्त हैं, ईमानदार हैं और निस्वार्थ भाव से किसी की सहायता कर रहे हैं तो किसी तरह की समस्या नहीं आती है. हम सभी को डॉ० विश्वप्रभा त्रिपाठी जी के इस कदम से सीखने की आवश्यकता है, प्रेरणा लेने की आवश्यकता है. इसी तरह से एक-एक करके समाज की नींव बनती है, समाज की आधारशिला मजबूत होती है, समाज की इमारत भव्य बनती है.



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वंदेमातरम्

21 सितंबर 2020

जाने-अनजाने हो गई मदद

अक्सर ऐसा होता है कि किसी की सहायता करने का मन होता है मगर स्थितियों और नियमों के चलते ऐसा कर पाना मुश्किल हो जाता है. ऐसी स्थिति बड़ी ही जटिल हो जाती है. सामने वाला समझता है कि जिस व्यक्ति से मदद माँगी जा रही है वह सहायता करना नहीं चाह रहा और जो मदद करना चाहता है वह नियमों, परिस्थितियों के कारण मजबूर रहता है. इधर पिछले तीन-चार दिन से कुछ ऐसा ही हो रहा था हमारे साथ. चीनी वायरस कोरोना के चलते विश्वविद्यालय की परीक्षाओं को बीच में ही स्थगित करना पड़ा था. उसी में परास्नातक की मौखिकी परीक्षाओं को भी टालना पड़ा था. इधर जैसे-जैसे अनलॉक की स्थिति आगे बढ़ती रही शासन स्तर से परीक्षाओं को लेकर अपने कदम बढाए जाने लगे. इसी में आदेश आया कि अंतिम वर्ष की छूटी हुई परीक्षाओं को करवाया जाएगा. इन्हीं में परास्नातक की मौखिकी परीक्षाओं को भी शामिल किया गया था.


अभी मौखिकी परीक्षा के तीन-चार दिन पहले मोबाइल पर घंटी बजी. उस नम्बर पर बहुत सीमित लोगों की ही कॉल आती है, उन सबके नम्बर उसमें सेव हैं ऐसे में अनजाना नम्बर चमकने पर आश्चर्य हुआ. फोन उठाया तो पता चला कि परास्नातक का छात्र है जिसकी मौखिकी परीक्षा से सम्बंधित समस्या है. उसके समाधान के बारे में कुछ कहने के पहले जानकारी की कि ये नम्बर उसे दिया किसने है. उसने बताया कि बहुत खोजबीन के बाद इंटरनेट से प्राप्त हुआ. वह नम्बर सार्वजनिक नहीं है फिर याद आया कि बहुत पहले उस नम्बर को कुछ जगहों पर दे रखा था, दूसरे मोबाइल नम्बर के विकल्प रूप में. उसकी बात सुनने के बाद लगा कि उसकी सहायता की जानी चाहिए मगर स्थिति ऐसी थी कि चाह कर भी मदद नहीं हो सकती थी.


उसकी पूरी बात सुनने-समझने के बाद उसको समझाया. आश्वस्त किया कि यथासंभव मदद की जाएगी. वह दिन में दो-तीन बार फोन करके किसी भी तरह से सहायता करने की बात करता और हम हर बार उसे आश्वस्त करते. असल में रविवार को मौखिकी परीक्षा थी और उसी दिन एक प्रतियोगी परीक्षा होने के कारण उसकी उपस्थिति में कुछ विलम्ब की सम्भावना थी. मौखिकी परीक्षा सम्पन्न होने, सभी विद्यार्थियों के अंक इंटरनेट के माध्यम से विश्वविद्यालय भेजने की प्रक्रिया में समय बहुत नहीं लगता है. ऐसे में आंतरिक और वाह्य परीक्षक भी अपना कार्य पूर्ण करके घर पहुँचने की कोशिश में रहते हैं. आखिर वे भी सुबह नौ बजे से आधा सैकड़ा से अधिक विद्यार्थियों के विस्मयकारी ज्ञान से जूझ रहे होते हैं.


अध्यापन कार्य से जुड़े होने के कारण अन्दर से यह भी लग रहा था कि किसी विद्यार्थी का नुकसान न हो. इस सम्बन्ध में किसी तरह की सहायता न कर पाने की विवशता के कारण खुद में बुरा भी लग रहा था. उसे अपनी प्रतियोगी परीक्षा पूर्ण मनोयोग से देने की बात कहते हुए उस दिन भी उसे आश्वस्त किया. किसी बच्चे का भला हो जाने की नीयत से किये जाने वाले आश्वासन संभवतः सत्य में बदल गए. विश्वविद्यालय से सूचना प्राप्त हुई कि मौखिकी परीक्षा के अंकों को विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर शाम छह बजे के बाद ही अपलोड किया जाएगा. ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि मौखिकी परीक्षा की सूचना विद्यार्थियों को अल्प समय में दी गई थी. ऐसे में विश्वविद्यालय की तरफ से शाम छह बजे तक अनुपस्थित विद्यार्थियों की प्रतीक्षा करने को कहा गया.


ऐसी जानकारी मिलते ही उस छात्र को खबर कर दी. वह अत्यंत ख़ुशी के भाव से अपनी परीक्षा देने उपस्थित हो गया. उससे मुलाकात तो नहीं हो सकी क्योंकि हम आंतरिक अथवा वाह्य परीक्षक के दायित्व से मुक्त थे. बात करते-करते उसका बार-बार गला भर आता. उसे समझाया कि इसमें हमारा कोई प्रयास नहीं है, यह विश्वविद्यालय के आदेश से स्वतः ही हुआ है. वह पिछले तीन-चार दिन से लगातार हमारे द्वारा फोन रिसीव किये जाने, उसकी बात लगातार सुनने, उसे आश्वस्त करने आदि को लेकर वह अत्यंत भावुक हो रहा था. अच्छा लगा कि भले ही कोई काम हमारे प्रयास से न हुआ हो मगर एक छात्र ख़ुशी-ख़ुशी अपने परीक्षा में शामिल हो सका.


हमसे मिलने, मिठाई खिलाने की उसकी बात पर कहा कि बस हमें याद रखना और जब नौकरी लग जाए तो आना मिठाई खिलाने. उस छात्र को शुभकामनाएँ.


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

12 जून 2020

बेटी की वैवाहिक ख़ुशी में शामिल है अनाज बैंक

जब आप किसी की ख़ुशी में शामिल होते हैं तो न केवल उस परिवार की ख़ुशी में वृद्धि होती है बल्कि खुद को भी प्रसन्नता महसूस होती है. ऐसी ख़ुशी उस समय भी मिलती है जबकि आप किसी की ख़ुशी में बिना किसी स्वार्थ के सम्मिलित होते हैं. ऐसी ही ख़ुशी में शामिल होने का अवसर अनाज बैंक टीम को आज मिला. इस टीम का एक हिस्सा होने के नाते उस ख़ुशी में एक भाग हमें भी मिला. उस आनंद का अतिरेक आंतरिक रूप से महसूस किया.


जनपद जालौन के ग्राम खजुरी का एक परिवार विगत कई वर्षों से वाराणसी अपने काम के सिलसिले में जाता रहता है. इस वर्ष भी उसका वहाँ जाना हुआ. उसके वहाँ पहुँचते ही कोरोना ने अपना रूप दिखाना शुरू  किया और उसके कारण सरकार को लॉकडाउन लगाना पड़ा. ऐसी स्थिति में इस परिवार के सामने न केवल रोजगार का संकट पैदा हुआ बल्कि खाने-पीने की भी समस्या उत्पन्न हुई. ऐसे में वाराणसी में संचालित अनाज बैंक मुख्यालय ने तमाम परिवारों की तरह इस परिवार का भी भरण-पोषण का जिम्मा लिया. बिना किसी क्षेत्र, वर्ग की परवाह किये अनाज बैंक सदैव सबकी सहायता करता है.

वह परिवार लॉकडाउन जैसे समय में भी वाराणसी में आराम के साथ निवास कर रहा था मगर उस परिवार के बुजुर्ग पारिवारिक सदस्य, जो गाँव में थे, उनके लिए लगातार चिंता करते रहते थे. उनके बराबर जोर डालने पर, दवाब बनाने पर खजुरी का यह परिवार साइकिल से, पैदल वाराणसी से अपने गाँव के लिए निकल पड़ा. अनाज बैंक संस्थापक डॉ० राजीव श्रीवास्तव सहित अनाज बैंक वाराणसी की टीम ने उस परिवार को रोकने का बड़ा प्रयास किया मगर अपने घर के बुजुर्गों के दवाब के कारण वह परिवार अपने गाँव आ ही गया. चालीस-पैंतालीस दिन तक अनाज बैंक के संपर्क में रहने के कारण यह परिवार लॉकडाउन, कोरोना, क्वारंटाइन आदि के बारे में जान-समझ चुका था. इस कारण गाँव आने के पहले पूरे परिवार ने अपनी जाँच मेडिकल कॉलेज, उरई में करवाई तथा सबकुछ सामान्य होने के बाद भी अपने आपको चौदह दिन के क्वारंटाइन में रखा.

बेटी के बाबा के साथ शाखा प्रबंधक धर्मेन्द्र कुमार 

इस परिवार का संपर्क लगातार अनाज बैंक वाराणसी से तथा बुन्देलखण्ड की क्षेत्रीय शाखा उरई से बना रहा. अनाज बैंक निदेशक डॉ० अमिता सिंह लगातार इस परिवार को राशन सामग्री की सहायता उपलब्ध करवाती रहीं. यह जानकारी होने पर कि इस परिवार की बेटी का विवाह इसी 19 जून को संपन्न होना है अनाज बैंक ने इसमें अपनी सहभागिता परिवार की तरह करने का विचार बनाया. अनाज बैंक द्वारा इस परिवार की ख़ुशी में स्वयं को सम्मिलित किया गया. परिवार को न केवल सहायता करने बल्कि वैवाहिक आयोजन को पारिवारिक आयोजन मानकर अनाज बैंक बुन्देलखण्ड की तरफ से प्रयास किया गया.


अनाज बैंक संरक्षक माननीय इन्द्रेश जी के निर्देशानुसार संस्थापक राजीव जी का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ. इसके साथ-साथ अनाज बैंक निदेशक डॉ० अमिता सिंह के निर्देशन में उरई शाखा टीम ने खजुरी गाँव पहुँचकर परिवार को यथासंभव खाद्य-सामग्री प्रदान की तथा बिटिया को वस्त्र-आभूषण तथा उसकी गृहस्थी से सम्बंधित आवश्यक सामान उपहारस्वरूप आशीर्वाद के साथ प्रदान किये. इस अवसर पर टीम ने वैवाहिक तैयारियों के बारे में भी जानकारी ली. परिजन अनाज बैंक के इस कदम से अत्यधिक उत्साहित और प्रसन्न दिखे. बिटिया को भावी जीवन के सुखमय होने का आशीर्वाद.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

19 मई 2020

हताशा, निराशा, कुंठा तो आपने ओढ़ ही ली है

अचानक से परिवार के सामने ऐसी स्थिति आ जाये जो कभी सोची न हो, जैसी स्थिति कभी सामने आई न हो तो क्या स्थिति होती है दिमाग की? किसी पारिवारिक आपदा के समय अचानक से ऐसा निर्णय लेना पड़ जाये जो किसी एक-दो व्यक्तियों के लिए नहीं वरन सम्पूर्ण परिजनों पर प्रभाव डालेगा तो उस समय आपकी क्या हालत होती है? कभी विचार किया है कि अपने परिवार के किसी ख़ुशी के समारोह की तैयारी भी हम सभी सूचीबद्ध तरीके से करते हैं उसके बाद भी अंतिम समय में कोई न कोई चूक हो जाती है. कभी कोई सामान कम पड़ जाता है, कभी कोई सामान लाना भूल जाया जाता है. ऐसा तब होता है जबकि आप ख़ुशी का कार्यक्रम संपन्न कर रहे हों. याद करिए, आपके साथ भी हुआ होगा जबकि किसी कार्यक्रम से सम्बंधित निमंत्रण/आमंत्रण पत्र बाँटने पड़े हों. कई-कई बार की सूची बनाने के बाद, कई-कई लोगों से जानकारी लेने के बाद भी आपका कोई नजदीकी अवश्य ही छूट गया होगा. चलिए नजदीकी न सही कोई न कोई ऐसा रह गया होगा उस आमन्त्रण पत्र पाने से जिसे आप न्यौता देना चाहते थे. ऐसा तब हो जाता है जबकि आप सबकुछ एक प्लानिंग के द्वारा करते हैं.


अब इसी सन्दर्भ में एक  बार केन्द्र सरकार के बारे में अथवा किसी भी राज्य सरकार के बारे में विचार करिए. क्या आपने कभी सोचा था कि लॉकडाउन जैसी स्थिति इस देश में आएगी? क्या आपने कभी विचार किया था कि एक दिन ऐसा आएगा जबकि आपको बाहर से आने के बाद अपने ही परिजनों से दूर रहना पड़ेगा? इससे पहले बहुत से लोगों ने देश में युद्ध की स्थिति के समय को देखा होगा, झेला होगा मगर वह वक्त भी इतना भयावह नहीं था. उस समय आपके घर के बगल में दुश्मन की गोली चलने का, बम फूटने का भय नही हुआ करता था. आपके किसी के छू लेने से आपको गोली लगने का डर नहीं हुआ करता था. आज इसके ठीक उलट है. आपको किसी व्यक्ति से ही नहीं बल्कि किसी सामान से भी संक्रमित होने का खतरा है. किसी के छींकने, थूकने से भी आपको खतरा है. ऐसे में विचार करिए कि जिस आपने पहली बार कोरोना के संक्रमण की खबर सुनी थी, क्या आपने उस समय भी लॉकडाउन के बारे में विचार किया था?


अब आपके सामने दो महीने के आसपास की स्थिति है. आप घर पर बैठे टीवी, मोबाइल पर अपनी विद्वता पेलने में लगे हैं. इसी सबको देखते हुए अब आप सरकारों को सलाह देने के काबिल हो गए हैं. सरकारों के कदमों की आलोचना करने लायक हो गए हैं. ये ठीक वैसा ही है जैसे आप अपने सोफे में धँसे, कुछ न कुछ अपने हलक में उतारते हुए किसी बल्लेबाज को गेंद खेलने का तरीका बताने लगते हैं, किसी गेंदबाज को गेंद फेंकने का तरीका समझाने लगते हैं. कभी विचार किया है कि मैदान पर पिच के ऊपर खड़े बल्लेबाज को किस गति की गेंद का सामना करना पड़ता है? नहीं न, क्योंकि आपको महज अपना मुँह चलाने की विशेषज्ञता हासिल है.

आपके परिवार में एक व्यक्ति गंभीर बीमारी का शिकार हो जाता है तब आपके होश उड़ जाते हैं. बहत्तर लोगों से विचार करते हैं मगर समझ नहीं पाते हैं कि कौन से डॉक्टर को दिखाया जाये? कौन सा इलाज करवाया जाये? कहाँ ले जाया जाये? हर एक बार निर्णय लेने के बाद उससे उपजे परिणामों को देखने के बाद आप अगला कदम उठाते हैं. कभी विचार किया है कि आप महज एक व्यक्ति के इलाज को लेकर किस स्थिति तक परेशान होते हैं? इस समय आप सरकारों के निर्णयों को लेकर हमलावर हो सकते हैं क्योंकि आप अपने घर में सुरक्षित हैं. ऐसा इसलिए भी कर सकते हैं क्योंकि आप किसी रूप में खुद को सरकारी क़दमों में सहयोगी नहीं मान रहे हैं.

ये इस देश की सबसे बुरी स्थिति है, यहाँ चाहे ख़ुशी का अवसर हो या फिर दुःख का, कोई सामान्य सी स्थिति है या फिर आपदा की आपको सरकारों के निर्णयों में बस कमी ही दिखाई देती है. ऐसा इसलिए क्योंकि आपके लिए घटनाओं को देखने के बाद उनका विश्लेषण करने की कला आती है. कभी विचार किया है कि इसी देश की सरकारों ने सुनामी जैसी विभीषिका से आपको सुरक्षित बनाये रखा. कभी सोचा है कि केदारनाथ की भयंकर आपदा में भी सरकारों ने आपके लोगों को सुरक्षित रखा. कभी ध्यान दिया कि ऐसी अनेक आपदाओं से आपको या फिर आपके नजदीकी लोगों को बचाए रखा. ऐसी-ऐसी जगह सरकारों द्वारा बचाव कार्य सफलतापूर्वक पूरे किये गए जहाँ आप सामान्य दिनों में जाने की सोचकर भी काँप जाएँ.

फिर विचार करिए अपनी मानसिकता पर कि कहीं आप बौद्धिक रूप से हताश तो नहीं? सोचिये कि कहीं आप विरोध करते रहने की मानसिकता के चलते अवसाद में तो नहीं जा चुके हैं? अपनी स्थिति को देखिये और विचार करिए कि कहीं आप पर कुंठित पागलपन तो हावी नहीं हो चुका है? देखिये और सोचिये, ये सब सही है क्योंकि इस पोस्ट के बाद अभी और न जाने क्या-क्या बकने वाले हैं. फिर विचार करिए कि सरकारें जो कर रही हैं वो अलग, आप ऐसा क्या कर रहे हैं जिससे ये देश आपका ऋणी रहे, ये देशवासी आपका एहसान मानें? सोचियेगा, अन्यथा हताशा, निराशा, कुंठा तो आपने ओढ़ ही ली है.

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14 मई 2020

लौटे हो किस कारण कहो, भूख से या मौत से डर कर

यह पोस्ट बहुत से लोगों को दुःख दे सकती है, दे क्या सकती है, देगी ही. ये मानवीय स्वभाव है जो किसी के दुःख में दुखी होने लगता है. खासतौर से उस समय और तेजी से ऐसा होता है जबकि किसी और के दुःख से व्यक्ति को किसी दूसरे की बुराई करने का अवसर मिले. कोरोना संक्रमण से बचने-बचाने के लिए लॉकडाउन किया गया. इसके कुछ दिन बाद देश भर से मजदूरों का अपने गृह स्थान के लिए पलायन शुरू हो गया. रोज ही सैकड़ों तस्वीरें सोशल मीडिया पर, मीडिया पर दिखाई जाने लगीं जिनमें हजारों-हजार मजदूर पैदल अपने घरों की तरफ लौट रहे हैं.


लॉकडाउन के कारण सभी तरह के काम, सभी तरह के उद्योग एकदम बंद हैं. ऐसे में दिहाड़ी मजदूरों, कामगारों के सामने समस्या आना स्वाभाविक है. घरों तक में काम बंद करवा दिए गए हैं. इसके चलते भी आमदनी रुकी है. इसी सबने आर्थिक संकट के साथ-साथ भोजन का संकट भी पैदा कर दिया हो. ऐसी स्थिति के होने में किसी तरह का अविश्वास नहीं होना चाहिए मगर जिस तरह से लगभग सभी राज्यों से सभी राज्यों के लिए मजदूरों का, कामगारों का आना हो रहा है वह अवश्य ही सोचने को मजबूर करता है. क्या ये सभी वाकई भोजन न मिलने के कारण वापस आ रहे हैं? क्या इनको वाकई भूखे पेट रहना पड़ रहा था? क्या इन्हें वास्तविक रूप में किसी ने खाद्य-सहायता उपलब्ध नहीं करवाई? यदि यही भी सत्य है तो रोज ही सैकड़ों फोटो, वीडियो कहाँ के हैं जो खाद्य-सामग्री का वितरण कर रहे हैं? रोज ही आने वाली खबरें कहाँ की हैं जिनमें खाना दिए जाने की बात कही जा रही है? यदि यह भी सही है तो फिर खाना किसे बाँटा जा रहा है? खाद्य-सामग्री किसे वितरित की जा रही है?


ऐसा संभव ही नहीं कि सभी राज्यों की सरकारें, प्रशासन, सामाजिक कार्यकर्त्ता एकदम नाकारा हो जाएँ. ऐसा भी संभव नहीं कि सभी जगहों से भ्रामक फोटो-ख़बरें आने लगें. मजदूरों के पैदल आने की खबरों, फोटो को भी झुठलाया नहीं जा सकता है. यहाँ मनोवैज्ञानिक रूप से समझने की आवश्यकता है. असल में अपने घर से सैकड़ों-हजारों किमी दूर रह रहे इन मजदूरों के अन्दर कोरोना से होने वाली मौतों का भय बैठा हुआ है. ऐसे में ये अपनी मौत के बाद अपने परिवार, बच्चों के लिए चिंतित रहे होंगे. इसी मनोवैज्ञानिक भय ने इनको अपने कार्यस्थल से पलायन करने को मजबूर नहीं किया बल्कि प्रेरित किया. इनके मन में अपने घर पहुँचने, अपने घर में मरने, अपनी मिट्टी में मरने, अपने लोगों के बीच मरने की स्थिति जन्म ले रही थी. ये सभी अपने प्रति नहीं बल्कि अपने उस परिवार के प्रति निश्चिन्त होना चाहते हैं, जो उनके साथ है. यदि वाकई इन्हें परिवार की, अपनों की, अपने घर-मिट्टी की चिंता होती तो चंद रुपयों के लिए ये अपना गृह स्थान छोड़कर नहीं गए होते.

आज जो दशा मजदूरों की दिखाई जा रही है, वह निश्चित ही चिंता का विषय है मगर इसके साथ ही चिंता का विषय यह भी है कि आखिर राहत सामग्री का वितरण कहाँ हो रहा है? चिंता की बात ये भी है कि क्या ये मजदूर हालात सही होने के बाद पुनः अपनी जमीन छोड़कर पलायन नहीं करेंगे? किये रहो चिंता क्योंकि चिता करना कहीं ज्यादा आसान है, काम करने से.

फ़िलहाल ये पंक्तियाँ

जब आवश्यकता थी जमीन, घर-परिवार को तुम्हारी,
सिक्कों की खनक में सबको रोता-बिलखता छोड़ गए थे.
भूख के कारण  नहीं मौत से डर कर आये हो तुम,
किसी दिन सिक्कों की खनक सुन फिर न भाग जाओगे.

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13 मई 2020

संकट में मध्यम वर्ग भी है

वैश्विक महामारी कोरोना के चलते लागू किया गया लॉकडाउन अब मध्यम वर्ग के लिए भी भारी पड़ने लगा है. यह संकट लॉकडाउन खुलने के बाद और अधिक गहराएगा. इस पर चर्चा से पहले इसकी पीठिका पर विचार कर लिया जाये. लगभग दो माह पूर्व लॉकडाउन के लागू होने के तुरंत बाद से ही दिहाड़ी मजदूरों के लिए आय के सारे स्त्रोत बंद हो गए थे. उनकी रोजी-रोटी का संकट उत्पन्न हुआ. ये वे लोग हैं जिनके पास रोज कुआँ खोद कर रोज पानी पीने वाली स्थिति होती है. ऐसी स्थिति से जूझने वाले केवल दिहाड़ी मजदूर अथवा कामगार ही नहीं हैं बल्कि इसमें पटरी, रेहड़ी वाले अत्यंत निम्न श्रेणी के दुकानदार भी शामिल माने जा सकते हैं. इनकी व्यापारिक गतिविधि भी लॉकडाउन के कारण ठप्प हो गई.


लॉकडाउन में सम्पूर्ण बाजार बंद करवाए जाने से सभी प्रकार के व्यापारिक प्रतिष्ठानों के आय के स्त्रोत प्रभावित हुए. सभी तरह के उद्योग बंद करवा दिए गए. सभी तरह की व्यापारिक क्रियाओं को प्रतिबंधित करवा दिया गया. सभी तरह का व्यावसायिक परिवहन रोक दिया गया. अत्यावश्यक सेवाओं को छोड़कर सभी तरह की व्यापारिक गतिविधियों के ठप्प हो जाने से सारा जनजीवन रुक सा गया था. लॉकडाउन के आरंभिक दौर दिहाड़ी मजदूरों, कामगारों, रेहड़ी, पटरी वाले दुकानदारों की आजीविका की समस्या को मुख्य रूप से हल करने की कोशिश की गई. प्रथम दृष्टया यह सही भी था क्योंकि इन लोगों के सामने राशन-भोजन-पानी का संकट उत्पन्न होना स्वाभाविक था. इस गंभीर स्थिति को समझते हुए न केवल शासन-प्रशासन ने बल्कि समाजसेवियों ने इनकी सहायता करना आरम्भ कर दिया. सहायता के लिए उठे हाथों ने न केवल अपने शहर के ऐसे मजबूर लोगों का साथ दिया वरन दूसरे जनपदों, राज्यों से आये मजदूरों को भी सहायता उपलब्ध करवाई.




अब जबकि लॉकडाउन तीन दौर पार करने की स्थिति में आ गया है, शासन-प्रशासन को और सामाजिक संगठनों को दिहाड़ी मजदूरों, कामगारों के साथ-साथ ऐसे परिवारों, ऐसे वर्ग की तरफ भी ध्यान देने की आवश्यकता है जो दिहाड़ी मजदूर, कामगार अथवा दिहाड़ी कमाई जैसा भले ही न हो मगर उसकी स्थिति लगभग इसी के जैसी है. रेहड़ी, पटरी वाले दुकानदारों के अलावा समाज में ऐसे हजारों दुकानदार हैं जिनकी पारिवारिक आजीविका उनके व्यापार पर ही केन्द्रित है. इन्हीं दुकानदारों के सहायकों के रूप में हजारों की संख्या में ऐसे कर्मचारी भी हैं जो इसी व्यापारिक संरचना में अपना भरण-पोषण कर रहे थे. लॉकडाउन के आरंभिक दौर में ऐसा महसूस हो रहा था कि कुछ दिन की इस असामान्य स्थिति से निकलने का उपाय खोज लिया जायेगा अथवा स्थिति स्वतः ही सामने आकर कोई न कोई रास्ता बनाएगी. दुर्भाग्य से ऐसा कुछ न हो सका. समय के साथ कोरोना संक्रमण का आतंक बढ़ता ही रहा और उसी के साथ लॉकडाउन की अवधि को दो बार और बढ़ाना पड़ा. इससे इस वर्ग के सामने भी आर्थिक संकट, भरण-पोषण का संकट आकर खड़ा हो रहा है.

इस सन्दर्भ में विचारणीय होना चाहिए कि छोटे और मंझोले दर्जे के दुकानदार, उनके कर्मचारी और ऐसे मध्यम वर्गीय परिवार जिनकी आय सीमित है, जिनकी बचतें अल्प हैं, जिनके पास अपनी आजीविका को चलाने के लिए, अपने व्यापार को संचालित करने के लिए बैंक सहित अन्य वित्तीय संस्थाओं के ऋण हैं, वे भी दिहाड़ी मजदूरों, कामगारों की तरह अब संकट में हैं. विगत लगभग दो माह की अवधि में व्यापारिक गतिविधि का ठप्प रहना, वित्तीय संस्थाओं के ऋणों के ब्याज का चुकाया जाना, अल्प बचतों का पारिवारिक खर्चों में समाप्त हो जाना आदि ऐसे परिवारों के लिए भी संकट का कारण बन रहा है. सामाजिक रूप से अथवा शासन स्तर पर अभी सहायता उन लोगों तक पहुँच रही है जो फुटपाथ पर जीवन गुजार रहे हैं, झुग्गी-झोपड़ी में गुजर-बसर कर रहे हैं या फिर बेसहारा हैं. देखा जाये तो अब उन बहुत से परिवारों को भी सहायता की आवश्यकता है, जो अपने रोजगार के, व्यापार के, कार्य के बंद होने के कारण आर्थिक अभाव की स्थिति में आ गए हैं. छोटे-मंझोले दर्जे के दुकानदारों का, उनके कर्मचारियों का, ऐसे वेतनभोगियों का जो किसी दूसरे संस्थान की आय पर निर्भर हैं, समय अब वाकई कठिनता से गुजर रहा है.

ऐसे परिवार, व्यक्ति अपने छोटे से व्यापारिक प्रतिष्ठान के चलते सामाजिक स्थिति प्राप्त किये हुए हैं जिसके चलते सहज रूप में समाज इनकी आर्थिक तंगहाली को समझ नहीं पा रहा है. ये वर्ग ऐसा भी है जो अपनी आर्थिक समस्या को समाज के सामने प्रस्तुत भी नहीं कर पा रहा है. सामाजिकता, प्रतिष्ठा आदि के चलते वह उस कतार में भी नहीं लग पा रहा है जहाँ गरीबों के लिए भोजन वितरण किया जा रहा है. ऐसे में न केवल समाज को बल्कि शासन-प्रशासन को ऐसे परिवारों की मदद के लिए आगे आना चाहिए. इसके अलावा इस वर्ग को लॉकडाउन खुलने के बाद भी अनेक तरह की नकारात्मक गतिविधियों का सामना करना पड़ेगा. ऐसे छोटे और मंझोले दुकानदारों, जिनका कपड़ों का, गारमेंट्स का, इलेक्ट्रॉनिक्स का, खाद्य सामग्री का व्यापार है, उनको लॉकडाउन के बाद बाजार खुलने पर एक अनिश्चित नुकसान का सामना करना पड़ेगा. लम्बे समय से दुकानों के न खुलने की स्थिति के कारण सीलन, चूहों आदि के चलते सामानों के ख़राब होने की आशंका अधिक है. इस अप्रत्याशित नुकसान की भरपाई इन्हीं दुकानदारों के हिस्से आएगी. ऐसे में भले ही देश का शीर्ष नेतृत्व सभी कर्मियों को इस बंदी के समय का वेतन देने की बात कह रहा हो मगर छोटे और मंझोले दुकानदारों को ऐसा कर पाना संभव ही न होगा.

इसके साथ-साथ जैसी कि लगातार बात की जा रही है लम्बे समय तक कोरोना के साथ जीवन यापन करने की तो संभव है कि लॉकडाउन हटने के बाद भी लम्बे समय तक व्यापारिक गतिविधियाँ सुचारू रूप से संचालित न हो सकें. इससे भी छोटे और मंझोले दुकानदारों की आय प्रभावित रहेगी. भले ही लॉकडाउन को शर्तों के साथ खोल दिया जाये मगर छोटे, मंझोले दुकानदारों और सीमित आय वाले मध्यमवर्गीय परिवारों के भरण-पोषण के प्रति शासन-प्रशासन को, समाजसेवियों को ध्यान देने की आवश्यकता है.

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17 अप्रैल 2020

मुश्किल वक्त का साथी है अनाज बैंक

लॉकडाउन के कारण दैनिक आजीविका वालों को संकट का सामना करना पड़ रहा है. इनके साथ-साथ वे लोग भी परेशानी में होंगे जिनके पास आजीविका के अल्प-साधन थे. छोटे दुकानदार, छोटे कामगार आदि भी इस समय आर्थिक समस्या से जूझ रहे होंगे. इस विकट समय में बहुत सी जगहों पर बहुत से समाजसेवी सामने निकल कर आये हैं. इनमें से बहुत से सामाजिक कार्यकर्ता वाकई सामाजिक सद्भाव, संवेदना के साथ काम कर रहे हैं जबकि इन्हीं में से बहुत से ऐसे हैं जो अपनी फोटो खिंचाने में, उसे सोशल मीडिया पर अपलोड करने में ज्यादा विश्वास रखते हैं. सामाजिक क्षेत्र में कार्य का अनुभव रखने वाले, ईमानदारी और जिम्मेवारी के साथ संवेदनशीलता के साथ बहुत से लोग सूचीबद्ध तरीके से राशन का, भोजन का वितरण कर रहे हैं. ऐसे लोगों द्वारा वितरण होने के कारण खाद्य-सामग्री का उचित तरीके से वितरण हो पा रहा है, उसकी बर्बादी नहीं हो रही है. लॉकडाउन के चलते एकाएक समाजसेवा का भाव जागने वाले लोग बिना किसी योजना के काम करने में लगे हैं. जिसके कारण न केवल यथोचित जगह तक वितरण हो पा रहा है बल्कि खाद्य-सामग्री का भी बहुत नुकसान हो रहा है. सोशल मीडिया पर ही अनेकानेक वीडियो, फोटो देखने को मिल रहे हैं जहाँ अनावश्यक भोजन पैकेट एकत्र करके, जमाखोरी करके रखे गए हैं.


इसके बीच इन्हीं नवोन्मेषी समाजसेवियों द्वारा एक समस्या सोशल मीडिया पर फोटो अपलोड करने की भी आ रही है. एक जरूरतमंद को राशन सामग्री, भोजन सामग्री देते हुए हुए कई-कई लोग एकसाथ फोटो खिंचवाते नजर आ रहे हैं. अनेक जगहों से ऐसी भी खबरें समाचार-पत्रों में प्रकाशित हुई हैं जिसमें जरूरतमंद लोगों ने ऐसे लोगों से राहत सामग्री लेने से इंकार कर दिया जो फोटो खींचने, खिंचवाने के प्रति ज्यादा लालायित दिखे. स्थिति यहाँ तक असहनीय या अशोभनीय हुई कि सरकारी स्तर पर ऐसे कार्य को रोकने के लिए दिशा-निर्देश देने पड़े. इसी में यदाकदा चर्चा उठी अनाज बैंक द्वारा मदद करने, फोटो खींचने, सोशल मीडिया पर अपलोड करने की. असल में ऐसी चर्चाएँ उठना स्वाभाविक भी है क्योंकि बहुत से लोग उत्साह में, संवेदना के साथ सामाजिक कार्य करने निकल पड़ते हैं. उत्साह में किया जाने वाले सामाजिक कार्य बहुत लम्बे समय तक नहीं चल पाते, विशेष रूप से वे जिनमें बहुत बड़ा क्षेत्र शामिल हो जाये, बहुत ज्यादा जनसँख्या शामिल हो जाये. ऐसी स्थिति के सुचारू रूप से नियमित सञ्चालन के लिए एक कार्ययोजना, एक टीम की, ईमानदारी की, समर्पण की आवश्यकता होती है. ऐसी चर्चा करने वाले अनाज बैंक को गंभीरता से समझने का काम संभवतः कर नहीं सके हैं.



ऐसा इसलिए क्योंकि जैसे ही लॉकडाउन की घोषणा हुई उसके दो-तीन दिन बाद ही शहर के अनेक लोगों ने फोन से संपर्क करके अनाज बैंक के कदमों को जानना चाहा. उसके द्वारा भोजन, राशन वितरण के बारे में जानना चाहा. स्पष्ट है कि उन सभी लोगों की मंशा मदद करने की रही होगी मगर जिस तरह का माहौल उरई में, जनपद में दिखाई दे रहा था वैसे में उस भागदौड़ का हिस्सा अनाज बैंक नहीं बनना चाहता था. ख़ुशी की बात यह रही कि प्रशासन स्वतः ही बराबर अनाज बैंक के संपर्क में बना रहा. आखिर उसने न केवल उरई का बल्कि मुख्यालय वाराणसी का काम बहुत ही नजदीक से देखा-सुना था. ऐसे में अनाज बैंक ने शहर में चल रही भगदड़ का हिस्सा बनने के बजाय प्रशासन की सुविधा, निर्देशानुसार सहायता उपलब्ध करवाई.

बैंक की औपचारिक कार्यवाही सभी निकासी खाताधारक महिलाओं को करनी होती है 

बहरहाल, अनाज बैंक प्रतिमाह मजबूर, गरीब, विधवा, लाचार महिलाओं को पाँच किलो अनाज उपलब्ध कराता है. खाद्य-सामग्री में उपलब्धता के आधार पर परिवर्तन भी होता रहता है मगर मात्रा कम से कम पाँच किलो ही रहती है. प्रतिमाह होने वाले इस वितरण कार्यक्रम का बाकायदा रिकॉर्ड बनाया जाता है. इसी के अंतर्गत वितरण कार्य की फोटो, वीडियो बनाया जाता है, उन्हें जनमानस के संज्ञान में लाने के लिए इंटरनेट पर अपलोड भी किया जाता है. वर्तमान समय में चल रही मदद और उसकी फोटो लेने तथा अनाज बैंक द्वारा ली जाने वाली फोटो-वीडियो का एक मूलभूत अंतर है. वह यह कि अनाज बैंक से जुड़ी महिलाएँ किसी तरह का दान, मदद नहीं लेती वरन उनका बाकायदा अनाज बैंक में एक खाता खोला जाता है. वे यहाँ की नियमित निकासी खाताधारक होती हैं. उनको बैंक से जोड़ने के पहले भौतिक सत्यापन किया जाता है. उनके पास उपलब्ध किसी भी पहचान-पत्र, किसी भी दस्तावेज की फोटोप्रति अनाज बैंक में जमा करवाई जाती है. प्रतिमाह वितरण में शामिल होने वाली निकासी खाताधारक महिलाओं की संख्या, पहचान निश्चित है. कुछ इसी तरह की प्रक्रिया अनाज बैंक की सहायता करने वालों के साथ अपनाई जाती है. उनका जमा खाता खोला जाता है. वे बैंक के जमा खाताधारक कहलाते हैं. उनके द्वारा किया गया सहयोग किसी भी तरह की दान शब्दावली के अंतर्गत नहीं आता है बल्कि उनके खाते में उनकी जमाराशि होता है. इसे भी अनाज बैंक धनराशि के रूप में नहीं वरन खाद्य-सामग्री के रूप में स्वीकारता है.

प्रत्येक निकासी खाताधारक का होता है रिकॉर्ड

इसके बाद भी यदि आलोचनात्मक दृष्टि से भी इसका विश्लेषण करते हुए मान लें कि निकासी खाताधारक, जमा खाताधारक अनाज बैंक की अपनी शब्दावली है. लोगों के बीच अपनी तुष्टिकरण की नीति के लिए बनाये गए शब्द हैं तो भी एक बात स्पष्ट यह होती है कि अनाज बैंक द्वारा प्रतिमाह किये जाने वाला वितरण का यथोचित रिकॉर्ड होता है. उसके द्वारा महज मदद करने के नाम पर मदद करने का काम नहीं किया जाता है. वर्तमान परिदृश्य में यदि अनाज बैंक से जुड़ी महिलाओं को लाभार्थी माना भी जाये तो नियमानुसार लाभार्थियों की संख्या, पहचान निश्चित होती है. उनका एक रिकॉर्ड होता है. यह एक तरह की वैसी ही सरकारी प्रक्रिया है जो कि सरकार द्वारा अपनी विभिन्न योजनाओं के लाभार्थियों की फोटो वीडियो, रिकॉर्ड, पहचान आदि के सम्बन्ध में पूरी करनी होती है. यहाँ एक बात स्पष्ट कर दें कि लॉकडाउन के समय में प्रशासन द्वारा अनाज बैंक की खाताधारक महिलाओं की मदद की गई. उनके लिए उपलब्ध राशन सामग्री को अनाज बैंक द्वारा ही वितरित करवाया गया. अप्रैल माह में हुए इस वितरण को किसी भी रूप में सार्वजनिक नहीं किया गया. अनाज बैंक द्वारा सदैव इसका ध्यान रखा जाता है कि किसी भी महिला के सम्मान को ठेस न पहुँचे. समस्त निकासी खाताधारक महिलाओं को अनाज बैंक पारिवारिक सदस्य के रूप में सम्मान भी देता है. किसी भी पावन पर्व पर उसके साथ परिजनों की भांति ही व्यवहार किया जाता है. फिलहाल, अनाज बैंक मुख्यालय वाराणसी में चौबीस घंटे रसोई का सञ्चालन कर रहा है. उरई स्थिति बुन्देलखण्ड अनाज बैंक लॉकडाउन में भी प्रशासन की मंशा के अनुसार काम कर रहा है. लॉकडाउन के बाद वह अपने मूल रूप में कार्य करता रहेगा. गरीब, मजबूर, बेबस, विधवा महिलाओं की सहायता करता रहेगा.


महिला दिवस के अवसर पर सभी निकासी खाताधारक महिलाओं का सम्मान भी 

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14 अप्रैल 2020

ब्लॉगर पर ब्लॉग बनाना सीखें

ब्लॉग जगत के वरिष्ठ और सक्रिय साथियों द्वारा एक बार फिर ब्लॉग जगत को उसकी पुरानी रौनक लौटाने का प्रयास किया जा रहा है. इस सम्बन्ध में बहुत से पुराने साथियों के साथ-साथ कुछ नए साथियों में भी उत्साह देखने को मिल रहा है. अपने ऐसे नए साथियों के लिए ब्लॉगर पर ब्लॉग बनाये जाने का तरीका यहाँ चित्र के माध्यम से प्रस्तुत कर रहे हैं. वैसे तो इंटरनेट पर अनेक वेबसाइट और ब्लॉग पर ब्लॉग बनाने के वीडियो, चित्र उपलब्ध हैं इसके बाद भी सहयोग भाव से यह पोस्ट उन नए साथियों के लिए जो ब्लॉग जगत से जुड़ने की अभिलाषा रखते हैं. आशा है कि आप नए साथियों को अवश्य ही मदद मिलेगी.

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यदि ब्लॉग बनाने में किसी तरह की समस्या आये तो कृपया टिप्पणी में अपनी समस्या से अवगत करा सकते हैं अथवा kumarendra.com@gmail.com पर हमें मेल कर सकते हैं. 

ब्लॉग बनाने वाले सभी साथियों से अनुरोध है कि ब्लॉग बनाने के बाद अपनी पहली पोस्ट तुरंत ही लिखें और हमें लिंक भेजकर अवश्य ही अवगत कराएँ. आपका ब्लॉग जगत में स्वागत करने को हम तत्पर हैं.

10 अप्रैल 2020

सामंजस्य के अभाव में बर्बाद होती राहत सामग्री

लॉकडाउन के शुरू होते ही सभी जगह समाजसेवियों की भीड़ सी उमड़ आई है. दैनिक आवश्यकता की वस्तुओं के अलावा सभी कुछ बंद होने के कारण बहुत से लोगों की आजीविका पर असर पड़ा है. प्रतिदिन काम करने, कमाई करने वालों के सामने निश्चित ही खाने का संकट आया है. ऐसे में जबकि लोगों का बाजार निकलना बंद है, रोजगार के साधन बंद हैं, आय के स्त्रोत बंद हैं तब ऐसे लोगों के सामने निश्चित ही राशन की, भोजन की समस्या उत्पन्न होनी ही थी. ऐसे विषम समय में सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले आगे आये. ऐसे सभी लोग साधुवाद के पात्र हैं जिन्होंने घर में बने रहने से बेहतर बाहर निकल कर लोगों की सेवा, सहायता करना समझा. प्रतिदिन ऐसे लोगों की टोलियाँ शहर की सड़कों पर निकल कर लोगों की सहायता करने में लगी हुई हैं. जरूरतमंदों को राशन उपलब्ध करवा रही हैं. राशन उपलब्ध करवाने का काम प्रशासन द्वारा भी किया जा रहा है. इसके साथ-साथ समाजसेवी भी तन्मयता से इस कार्य में लगे हैं.


महामारी के इस दौर में एक तरफ समाजसेवियों द्वारा सहायता की जा रही है वह सराहनीय है मगर इसके साथ-साथ यह एक तरह की समस्या भी उत्पन्न कर रही है. बहुत से लोग बिना किसी तालमेल के, बिना किसी सामंजस्य के, बिना किसी निर्देशन के काम करने में लगे हुए हैं. इससे सहायता के साथ-साथ यह हो रहा है कि एक-एक परिवार को कई-कई बार सहायता मिल जा रही है और कुछ परिवार ऐसे हैं जहाँ सहायता सामग्री पहुँच ही नहीं पा रही है. इससे सम्बंधित अब तमाम वीडियो और फोटो सामने आने लगी हैं, जिसमें स्पष्ट रूप से दिख रहा है कि सहायता सामग्री, भोजन सामग्री नालियों में, कूड़े के ढेर पर पड़ी हुई है. कहीं-कहीं सामग्री के बाजार में बेचे जाने की खबरें भी सामने आई हैं. इसके अलावा ऐसे भी परिवार पकड़ में आये हैं जिनके पास पर्याप्त भोजन सामग्री, राशन होने के बाद भी वे सहायता सामग्री लेते जा रहे हैं.

यहाँ देखा जाये तो दोनों पक्ष दोषी नजर आते हैं. एक तरफ सभी को ऐसा लगने लगा है जैसे यदि इस समय सहायता के लिए बाहर न निकले तो उनके समाजसेवी होने पर खतरा आ जायेगा. ऐसा लग रहा है जैसे देश में पहली बार ऐसा संकट आया है जबकि गरीब मुश्किल में है. ऐसा लग रहा है जैसे सभी बस सहायता करने के, भोजन सामग्री देने के ही पक्ष में हैं. इसी तरह जो वर्ग, परिवार मुश्किल में है वह भी अपनी लालसा को, तृष्णा को रोक नहीं पा रहा है. वह एक जगह से सामग्री पाने के बाद भी खुद को दूसरी जगह से राशन लेने के लिए खड़ा कर देता है. ऐसे में सामग्री का आधिक्य होना ही है. जहाँ एक तरफ समाजसेवियों का आपसी समन्वय वितरण व्यवस्था में झोल पैदा कर रहा है वहीं दूसरी तरफ जरूरतमंद सामग्री की अधिकता देखकर भविष्य के लिए जमाखोरी की तरफ बढ़ रहा है.  यह स्थिति किसी के लिए भी सुखद नहीं है. इससे सामग्री बर्बाद हो रही है, लोगों के पास आवश्यकता से अधिक सामग्री पहुँच रही है, सभी जरूरतमंदों के पास सामग्री यथोचित रूप में नहीं पहुँच पा रही है.

ऐसे में भले कह दिया जाये कि यहाँ प्रशसन को ध्यान रखना चाहिए था मगर सोचिये कि प्रशासन कहाँ-कहाँ ध्यान दे? क्या एक शहर के सभी सामाजिक सेवियों की जिम्मेवारी नहीं बनती थी कि वे आपस में समन्वय बनाकर राहत सामग्री का वितरण करते? क्या यह भी उचित कदम नहीं होता कि प्रशासन की मदद करने के लिए सभी लोग एक जगह पर सारी सामग्री का एकत्रण करके उसे सूचीबद्ध करके वितरण करते? क्या ऐसा गलत होता कि जिस व्यक्ति, परिवार के पास एक बार सामग्री पहुँच जाती, उसके पास दोबारा न पहुँचे ऐसी कोई व्यवस्था कर ली जाती, ऐसा चाहे आधार कार्ड के द्वारा होता या राशन कार्ड के द्वारा? फ़िलहाल तो अभी समाजसेवियों की भीड़ सड़कों पर है और बहुत सी राहत सामग्री नालियों, कूड़े के ढेरों पर मिल रही है. अभी भी संभलने की आवश्यकता है.

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30 नवंबर 2019

डरते हैं हम बवंडर आने के पहले की अपनी ही ख़ामोशी से


वर्षों पुराने दो परिचित. सामाजिक ताने-बाने के चक्कर में, शिक्षा-कैरियर के कारण चकरघिन्नी बन दोनों कई वर्षों तक परिचित होने के बाद भी अपरिचित से रहे. समय, स्थान की अपनी सीमाओं के चलते अनजान बने रहे. तकनीकी विकास ने सभी दूरियों को पाट दिया तो उन दोनों के बीच की दूरियाँ भी मिट गईं. वर्षों पुरानी दोस्ती फिर अपने पुराने स्वरूप में लौटने लगी. इस क्रम में समय, परिस्थितियों ने भी अपना असर दिखाया. कुछ ख्वाहिशों ने सिर उठाया, कुछ मजबूरियों ने कदम रोके, कुछ ज्यादा पाने की लालसा, कुछ गलतफहमियों का सामना और फिर जैसा कि होता है कुछ अबोल जैसी स्थिति बनी. दोनों के बीच कॉमन परिचित हम भी रहे. जैसा कि स्वभाव है कि दो दोस्तों के बीच, संबंधों, रिश्तों के बीच आने वाली किसी भी खटास को दूर किया जाये. कोशिश कुछ अच्छा करने की हुई मगर वह गलत साबित हो गई. उन दोनों की अबोल की स्थिति बद से बदतर स्थिति में जाती लगी. प्रयास बराबर किये मगर हमारे हाथ असफलता ही हाथ लगी.

समय ने करवट बदली. उसे शायद उतने बुरे भर से संतोष नहीं था. अभी हमारी झोली में कुछ और ज्यादा बुरा सा उसके द्वारा भेजा जाना था. फिर एक बार वही दोनों दोस्तों का घटनाक्रम आँखों के सामने से गुजरा. फिर उन दोनों के बीच की स्थिति को अपने स्तर से संवारने की, सुधारने की कोशिश की. सोचा किसी अनावश्यक विवाद को कोई और हवा न दे, सोचा किसी और के दिमाग का संदेह किसी मित्र के जीवन में जहर न घोले मगर सोचना बस सोचना ही रहा. बात सँभालने के चक्कर में और ज्यादा उलझ गई. अबकी हम गलत के साथ-साथ बुरे भी साबित किये गए. हमें खुद समझ नहीं आया कि हम बात को सही से समझा न सके या फिर दोनों दोस्तों के बीच के मतभेद को, मनभेद को हम ही सही ढंग से समझ न सके?


वैसे ये कोई नई बात नहीं कि हम कुछ अच्छा करने निकलें और उसका परिणाम बुरे के रूप में हमारे पास न लौटे. हमारे साथ ऐसा अक्सर होता है कि अच्छा करने के प्रयास में बुरा हो जाता है, न केवल बुरा बल्कि बहुत बुरा हो जाता है. किसी के साथ अच्छा करने के पीछे किसी तरह की स्वार्थी भावना भी नहीं रहती है कि एकबारगी ये लगे कि इसी सोच का परिणाम मिला. याद करते हैं अपने बीते दिनों को तो सामाजिक कार्यों के प्रति, लोगों की सहायता के लिए खुद को हरदम तत्पर देखा. उस दौर में जबकि किसी भी युवा के सामने उसका कैरियर महत्त्वपूर्ण होता है, उस दौर में भी लोगों की सहायता के लिए खुद को पीछे नहीं रखा. अपना शहर रहा हो या किसी अनजाने शहर में रहे हों, लोगों की सहायता करने के स्वभाव को न बदला. शहर का कोई भी हिस्सा रहा हो, बाजार हो, कार्यालय को, कॉलेज हो, सफ़र हो, बस हो, ट्रेन हो या फिर कहीं भी हरदम मन में यही भावना रही कि खुद के द्वारा किसी भी जरूरतमंद की जितनी मदद हो सके, कर दी जाये. कभी भी इसके बदले किसी तरह की चाह न रखी. अनेक बार तो सहायता करने के दौरान मुसीबतों से भी पाला पड़ा. लड़ाई-झगड़े की स्थिति तक बनी, कई बार कानूनी पचड़ों में पड़ने तक की नौबत आ गई मगर कहीं न कहीं लोगों की सद्भावना काम आती रही और बिना किसी बड़ी मुसीबत के सहजता से सभी मुश्किलों से निकल लोगों के काम आते रहे.

सहयोग की, अच्छा करने की भावना का कई लोगों द्वारा नाजायज फायदा भी उठाया गया. काम निकल जाने पर ऐसे बहुत से लोगों ने पहचानना भी बंद कर दिया. ऐसे-ऐसे लोगों को जो अपने एक-एक दिन के बहुतायत घंटे हमारे साथ, हमारे घर पर बिताया करते थे, वे भी अनजानों की तरह से व्यवहार करते देखे गए. अच्छा करने की भावना लिए काम करने के बदले में जब आलोचना, धोखा अथवा गलत बातें सुनने को मिलती तो कष्ट होता था. शुरूआती दौर में ऐसी बातें अन्दर तक हिलाकर रख देती थीं मगर समय ने बड़े-बड़े घाव दिए और बड़े-बड़े घावों पर मरहम भी लगाया. कुछ ऐसा यहाँ भी होता रहा. हम अपने स्वभाव के अनुसार लोगों की सहायता करते रहे, क्या अपना क्या पराया, कौन परिचित का, कौन अपरिचित यह बिना जाने-समझे सबके काम आने का प्रयास करते रहे. इस प्रयास के सुफल भी मिले. लोगों की सहायता करने के साथ-साथ सदैव से एक विचार मन में रहा कि किसी के रिश्तों में हमारे कारण खटास न आये. किसी ने यदि हमसे सम्बन्ध बनाये हैं तो वे हमारी तरफ से न बिगड़ें. विगत के अनेक वर्षों में अनेक अवसर ऐसे आये जबकि संबंधों ने, रिश्तों ने जैसे हमारी परीक्षा लेनी चाही. हमारे सबसे करीब बताने से न चूकने वाले भी मौका पड़ने पर मुंह फेरने से न चूके. बिना हमारे एक कदम आगे न बढ़ाने वाले भी हमें पीछे छोड़कर किसी और के साथ आगे निकल लिए. दोस्ती का दंभ भरने वाले लोगों के रिश्तों को बचाने के चक्कर में हम खुद चक्कर खा गए.

जब-जब प्रयास किया कि हमारे कारण लोगों के संबंधों में एकजुटता बनी रहे, हमारे साथ वालों के संबंधों में मजबूती बनी रहे, सभी के बीच आपसी विश्वास-प्रेम-स्नेह बना रहे तब-तब ही हम गलत साबित किये गए. ऐसा कुछ यदि किसी अनजान के साथ हो, अनजान के द्वारा हो तो कष्ट नहीं होता है मगर यदि ऐसा कुछ अपने लोगों के द्वारा किया जाये तो कष्ट होना स्वाभाविक है. हाल की कुछ घटनाओं ने इस बार अन्दर से हिलाकर रख दिया. सोचा न था कि इस बार किसी अपने के द्वारा हमें गलत साबित किया जायेगा. वर्षों के संबंधों को एक झटके में अपरिचित सा साबित कर दिया जायेगा. संबंधों, रिश्तों में समन्वय, विश्वास बनाए रखने की कीमत संबंधों, रिश्तों की समाप्ति जैसी स्थिति से चुकानी पड़ेगी. दो दोस्तों के बीच संबंधों में कटुता न आये उसके लिए उठाया गया कदम हमारे लिए ही घातक साबित होगा समझ नहीं आया था. इसी तरह किसी गलत बात को, अफवाह को रोकने की कोशिश में एक बार फिर अपने आपको ही गलत महसूस किया. 


जीवन में घटित होने वाला कोई भी हादसा, कोई भी घटनाक्रम सीख देता है, ये और बात है कि हम उससे कितना और क्या सीखना चाहते हैं. ऐसी घटनाएँ हमें सदैव एक तरह का पाठ पढ़ाती हैं और हम भी ऐसी किसी भी तरह की घटना से सीखने की कोशिश करते हुए आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं. किसी भी बात पर अटके रहना हमारी आदत कभी न रही है, जिसके चलते कोई बात बहुत लम्बे समय तक परेशान नहीं कर पाती है. किसी भी बुरी से बुरी घटना भी आत्मविश्वास को, आत्मबल को हिला नहीं पाती है, यही वो शक्ति है जो हमें हर गलत बात से लड़ने के लिए प्रेरित करती है, हमारी ऊर्जा बनती है. ये और बात है कि कुछ समय को अन्दर उथल-पुथल तो मचा ही जाती है. इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ. भीतर उठा बवंडर अब शांत है, खामोश है. उठे बवंडर के बाद की ख़ामोशी हमें नहीं डराती, डर लगता है हमें बवंडर आने के पहले अपनी ही ख़ामोशी से. खुद की शक्ति से खुद के बवंडर को खामोश करके पुनः अपने रास्ते चल पड़े हैं क्योंकि हमारी राह में बहुत से लोग ऐसे हैं जो हमारा इंतजार कर रहे हैं. बहुत से मजबूर लोग ऐसे बैठे हुए हैं जिन्हें हमारी आवश्यकता है. सहायता, सहयोग, मदद का कार्य चलता रहे, सतत चलता रहे, आत्मविश्वास, आत्मबल कमजोर न पड़े, यही कामना करते हैं खुद के लिए.

05 अक्टूबर 2018

जमीन दान कर मानवता की स्थापना की

उरई के शांतिनगर में संचालित अंध विद्यालय की प्रबंध समिति का विवाद अंध विद्यालय में अध्यापन करवा रहे दो शिक्षकों सहित वहाँ अध्ययन कर रहे विद्यार्थियों से था। विगत कई वर्षों से प्रबंध समिति अपनी तरह से कार्य करते हुए न तो नेत्रहीन बच्चों की तरफ ध्यान दे रही थी और न ही दोनों नेत्रहीन शिक्षकों को वेतन दे रही थी। इस विवाद के निपटारे में दोनों नेत्रहीन शिक्षकों तथा सभी नेत्रहीन विद्यार्थियों को इस वर्ष जुलाई में विद्यालय छोड़ना पड़ा था। ऐसे में समस्या उनके रहने की थी। इस विषम स्थिति में नगर के एक विवाह घर पुष्पांजलि मैरिज हॉल के मालिक द्वारा उन सभी को अपने हॉल को उनके आवास हेतु निःशुल्क उपलब्ध करवाया गया था। इस दौरान नेत्रहीन शिक्षकों एवं बच्चों की समस्याओं को समय-समय पर उठाने वाले डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर, राहुल सोनी, रोहित त्रिपाठी, रोहित विनायक आदि उनके आवास के लिए लगातार प्रयासरत रहे। इसके लिए वे लोग लगातार प्रशासन के सम्पर्क में भी रहे। प्रशासनिक सहयोग भी यथोचित रूप से मिलता रहा। इसी बीच सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में अधिवक्ता के रूप में कार्य कर रहे अभिषेक तिवारी के पास नेत्रहीन शिक्षकों, विद्यार्थियों की समस्या पहुँची।

दानदाता माँ और संस्था प्रबंधक दीपक कुमार 

सहयोगी जन 

अभिषेक तिवारी ने इस समस्या को निपटाने के उद्देश्य से इस प्रसंग को अपने घर में उठाया। स्वभाव से दानवीर परिवार में समस्या सुनते ही एडवोकेट अभिषेक तिवारी की माता जी श्रीमती रानी तिवारी ने नेत्रहीन शिक्षकों और नेत्रहीन बच्चों के आवास हेतु तत्काल अपनी जमीन से एक प्लाट दान देने का निर्णय किया। उन्होंने अपने पति स्व० श्री देवेन्द्र कुमार तिवारी की स्मृति में दिनांक 05 अक्टूबर 2018 को सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में उपस्थित होकर नेत्रहीन शिक्षकों द्वारा नवगठित, सोसायटी रजिस्ट्रार, झाँसी में पंजीकृत संस्था के नाम सम्बंधित जमीन का हिस्सा कर दिया। शहर उरई में बनी काशीराम कॉलोनी के नजदीक स्थित सोलह सौ वर्ग फुट जगह के क़ानूनी कागजात, अधिकार-पत्र सौंपे उन्होंने स्वयं संस्था प्रबंधक दीपक कुमार को सौंपे। इस अवसर पर श्याम जी सोनी, अखिलेश द्विवेदी, राहुल सोनी, धर्मेन्द्र गुप्ता, मुन्ना जाटव, डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर आदि उपस्थित रहे। इस मौके पर सभी गणमान्य नागरिकों से अपील की गई कि वे नेत्रहीन शिक्षकों, विद्यार्थियों के आवास निर्माण हेतु यथोचित सहयोग करने के लिए आगे आयें।  

जमीन की रजिस्ट्री के कागजात सौंपती माता जी 


इन नेत्रहीन शिक्षकों और नेत्रहीन बच्चों की समस्या का आरम्भ शांति नगर में संचालित अंध-विद्यालय की प्रबंध समिति द्वारा भ्रष्टाचार करने की मानसिकता के साथ हुआ। किसी समय भले उद्देश्य के साथ आरम्भ किये गए इस विद्यालय में शुरुआती दिनों में सब सही से चला। नगरवासियों ने, जनपदवासियों ने खुले दिल से सहयोग करना शुरू किया। सहयोग की पवित्र भावना के साथ बहुत से लोगों द्वारा नकद धनराशि देकर भी सहायता की जाने लगी। नेत्रहीनों के नाम से जमा की जाने वाली धनराशि को प्रबंध समिति द्वारा अपने हितों, स्वार्थ में खर्च किया जाने लगा। 

विधायक निधि के उपयोग के बाद भी अधूरा भवन 

विधायक निधि के उपयोग के बाद भी अधूरा भवन बंद पड़ा है 

इस बीच प्रबंध समिति द्वारा उपयोग में लाये जा रहे भवन को बेच दिया गया। इसके साथ-साथ तिकड़म और जुगाड़ के आधार पर समिति द्वारा ही पास में एक प्लाट पर भवन बनवाने के नाम पर दो विधायकों की निधि का भी उपयोग किया गया। निधि का उपयोग करने के बाद भी भवन पूरी तरह नहीं बनवाया गया, जिससे अंध-विद्यालय नए भवन में संचालित नहीं किया जा सका। उधर जिस भवन में अंध-विद्यालय संचालित था, उसका नवीन मालिक आकर नेत्रहीन शिक्षकों, बच्चों को धमकाने लगा। यहीं से विवाद उत्पन्न हुआ क्योंकि उस भवन का क्रेता-विक्रेता दोनों ही प्रबंध समिति के सम्बद्ध थे। ऐसे में प्रबंध समिति के कार्यों का खुलासा जनता के सामने होने लगा। विवाद बढ़ता ही रहा, जनता नेत्रहीनों के साथ खड़ी रही। 


समस्या से विधायक को अवगत कराया गया 

इस मामले को बराबर जिला प्रशासन के सामने उठाया जाता रहा। मामला विधायक निधि के भ्रष्टाचार से सम्बंधित होने और कतिपय सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा लगातार दबाव बनाये जाने के कारण प्रशासन को इसमें कार्यवाही करने को आगे आना पड़ा। प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद दोनों नेत्रहीन शिक्षकों को वेतन स्वरूप कुछ धनराशि प्रदान की गई। प्रबंध समिति ने विधायक निधि से बनने वाले भवन में जल्द से जल्द विद्यालय संचालित करने का आश्वासन प्रशासन को दिया साथ ही शर्त यह लगाई कि उनकी समिति इन दोनों नेत्रहीन शिक्षकों से अध्यापन कार्य करवाने को तैयार नहीं। अंततः दोनों नेत्रहीन शिक्षकों और नेत्रहीन बच्चों को वह विद्यालय भवन छोड़ना पड़ा। अब जबकि उनके लिए जमीन की व्यवस्था हो गई है, जनता से सहयोग की अपेक्षा है। संभव है कि सबके सहयोग से जल्द ही ये नेत्रहीन शिक्षक और बच्चे अपने स्थायी आवास में रहने लगें।  


प्रशासन के सहयोग से निपटता विवाद 

नेत्रहीन बच्चों की मदद करते समाजसेवी