30 November 2019

डरते हैं हम बवंडर आने के पहले की अपनी ही ख़ामोशी से


वर्षों पुराने दो परिचित. सामाजिक ताने-बाने के चक्कर में, शिक्षा-कैरियर के कारण चकरघिन्नी बन दोनों कई वर्षों तक परिचित होने के बाद भी अपरिचित से रहे. समय, स्थान की अपनी सीमाओं के चलते अनजान बने रहे. तकनीकी विकास ने सभी दूरियों को पाट दिया तो उन दोनों के बीच की दूरियाँ भी मिट गईं. वर्षों पुरानी दोस्ती फिर अपने पुराने स्वरूप में लौटने लगी. इस क्रम में समय, परिस्थितियों ने भी अपना असर दिखाया. कुछ ख्वाहिशों ने सिर उठाया, कुछ मजबूरियों ने कदम रोके, कुछ ज्यादा पाने की लालसा, कुछ गलतफहमियों का सामना और फिर जैसा कि होता है कुछ अबोल जैसी स्थिति बनी. दोनों के बीच कॉमन परिचित हम भी रहे. जैसा कि स्वभाव है कि दो दोस्तों के बीच, संबंधों, रिश्तों के बीच आने वाली किसी भी खटास को दूर किया जाये. कोशिश कुछ अच्छा करने की हुई मगर वह गलत साबित हो गई. उन दोनों की अबोल की स्थिति बद से बदतर स्थिति में जाती लगी. प्रयास बराबर किये मगर हमारे हाथ असफलता ही हाथ लगी.

समय ने करवट बदली. उसे शायद उतने बुरे भर से संतोष नहीं था. अभी हमारी झोली में कुछ और ज्यादा बुरा सा उसके द्वारा भेजा जाना था. फिर एक बार वही दोनों दोस्तों का घटनाक्रम आँखों के सामने से गुजरा. फिर उन दोनों के बीच की स्थिति को अपने स्तर से संवारने की, सुधारने की कोशिश की. सोचा किसी अनावश्यक विवाद को कोई और हवा न दे, सोचा किसी और के दिमाग का संदेह किसी मित्र के जीवन में जहर न घोले मगर सोचना बस सोचना ही रहा. बात सँभालने के चक्कर में और ज्यादा उलझ गई. अबकी हम गलत के साथ-साथ बुरे भी साबित किये गए. हमें खुद समझ नहीं आया कि हम बात को सही से समझा न सके या फिर दोनों दोस्तों के बीच के मतभेद को, मनभेद को हम ही सही ढंग से समझ न सके?


वैसे ये कोई नई बात नहीं कि हम कुछ अच्छा करने निकलें और उसका परिणाम बुरे के रूप में हमारे पास न लौटे. हमारे साथ ऐसा अक्सर होता है कि अच्छा करने के प्रयास में बुरा हो जाता है, न केवल बुरा बल्कि बहुत बुरा हो जाता है. किसी के साथ अच्छा करने के पीछे किसी तरह की स्वार्थी भावना भी नहीं रहती है कि एकबारगी ये लगे कि इसी सोच का परिणाम मिला. याद करते हैं अपने बीते दिनों को तो सामाजिक कार्यों के प्रति, लोगों की सहायता के लिए खुद को हरदम तत्पर देखा. उस दौर में जबकि किसी भी युवा के सामने उसका कैरियर महत्त्वपूर्ण होता है, उस दौर में भी लोगों की सहायता के लिए खुद को पीछे नहीं रखा. अपना शहर रहा हो या किसी अनजाने शहर में रहे हों, लोगों की सहायता करने के स्वभाव को न बदला. शहर का कोई भी हिस्सा रहा हो, बाजार हो, कार्यालय को, कॉलेज हो, सफ़र हो, बस हो, ट्रेन हो या फिर कहीं भी हरदम मन में यही भावना रही कि खुद के द्वारा किसी भी जरूरतमंद की जितनी मदद हो सके, कर दी जाये. कभी भी इसके बदले किसी तरह की चाह न रखी. अनेक बार तो सहायता करने के दौरान मुसीबतों से भी पाला पड़ा. लड़ाई-झगड़े की स्थिति तक बनी, कई बार कानूनी पचड़ों में पड़ने तक की नौबत आ गई मगर कहीं न कहीं लोगों की सद्भावना काम आती रही और बिना किसी बड़ी मुसीबत के सहजता से सभी मुश्किलों से निकल लोगों के काम आते रहे.

सहयोग की, अच्छा करने की भावना का कई लोगों द्वारा नाजायज फायदा भी उठाया गया. काम निकल जाने पर ऐसे बहुत से लोगों ने पहचानना भी बंद कर दिया. ऐसे-ऐसे लोगों को जो अपने एक-एक दिन के बहुतायत घंटे हमारे साथ, हमारे घर पर बिताया करते थे, वे भी अनजानों की तरह से व्यवहार करते देखे गए. अच्छा करने की भावना लिए काम करने के बदले में जब आलोचना, धोखा अथवा गलत बातें सुनने को मिलती तो कष्ट होता था. शुरूआती दौर में ऐसी बातें अन्दर तक हिलाकर रख देती थीं मगर समय ने बड़े-बड़े घाव दिए और बड़े-बड़े घावों पर मरहम भी लगाया. कुछ ऐसा यहाँ भी होता रहा. हम अपने स्वभाव के अनुसार लोगों की सहायता करते रहे, क्या अपना क्या पराया, कौन परिचित का, कौन अपरिचित यह बिना जाने-समझे सबके काम आने का प्रयास करते रहे. इस प्रयास के सुफल भी मिले. लोगों की सहायता करने के साथ-साथ सदैव से एक विचार मन में रहा कि किसी के रिश्तों में हमारे कारण खटास न आये. किसी ने यदि हमसे सम्बन्ध बनाये हैं तो वे हमारी तरफ से न बिगड़ें. विगत के अनेक वर्षों में अनेक अवसर ऐसे आये जबकि संबंधों ने, रिश्तों ने जैसे हमारी परीक्षा लेनी चाही. हमारे सबसे करीब बताने से न चूकने वाले भी मौका पड़ने पर मुंह फेरने से न चूके. बिना हमारे एक कदम आगे न बढ़ाने वाले भी हमें पीछे छोड़कर किसी और के साथ आगे निकल लिए. दोस्ती का दंभ भरने वाले लोगों के रिश्तों को बचाने के चक्कर में हम खुद चक्कर खा गए.

जब-जब प्रयास किया कि हमारे कारण लोगों के संबंधों में एकजुटता बनी रहे, हमारे साथ वालों के संबंधों में मजबूती बनी रहे, सभी के बीच आपसी विश्वास-प्रेम-स्नेह बना रहे तब-तब ही हम गलत साबित किये गए. ऐसा कुछ यदि किसी अनजान के साथ हो, अनजान के द्वारा हो तो कष्ट नहीं होता है मगर यदि ऐसा कुछ अपने लोगों के द्वारा किया जाये तो कष्ट होना स्वाभाविक है. हाल की कुछ घटनाओं ने इस बार अन्दर से हिलाकर रख दिया. सोचा न था कि इस बार किसी अपने के द्वारा हमें गलत साबित किया जायेगा. वर्षों के संबंधों को एक झटके में अपरिचित सा साबित कर दिया जायेगा. संबंधों, रिश्तों में समन्वय, विश्वास बनाए रखने की कीमत संबंधों, रिश्तों की समाप्ति जैसी स्थिति से चुकानी पड़ेगी. दो दोस्तों के बीच संबंधों में कटुता न आये उसके लिए उठाया गया कदम हमारे लिए ही घातक साबित होगा समझ नहीं आया था. इसी तरह किसी गलत बात को, अफवाह को रोकने की कोशिश में एक बार फिर अपने आपको ही गलत महसूस किया. 


जीवन में घटित होने वाला कोई भी हादसा, कोई भी घटनाक्रम सीख देता है, ये और बात है कि हम उससे कितना और क्या सीखना चाहते हैं. ऐसी घटनाएँ हमें सदैव एक तरह का पाठ पढ़ाती हैं और हम भी ऐसी किसी भी तरह की घटना से सीखने की कोशिश करते हुए आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं. किसी भी बात पर अटके रहना हमारी आदत कभी न रही है, जिसके चलते कोई बात बहुत लम्बे समय तक परेशान नहीं कर पाती है. किसी भी बुरी से बुरी घटना भी आत्मविश्वास को, आत्मबल को हिला नहीं पाती है, यही वो शक्ति है जो हमें हर गलत बात से लड़ने के लिए प्रेरित करती है, हमारी ऊर्जा बनती है. ये और बात है कि कुछ समय को अन्दर उथल-पुथल तो मचा ही जाती है. इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ. भीतर उठा बवंडर अब शांत है, खामोश है. उठे बवंडर के बाद की ख़ामोशी हमें नहीं डराती, डर लगता है हमें बवंडर आने के पहले अपनी ही ख़ामोशी से. खुद की शक्ति से खुद के बवंडर को खामोश करके पुनः अपने रास्ते चल पड़े हैं क्योंकि हमारी राह में बहुत से लोग ऐसे हैं जो हमारा इंतजार कर रहे हैं. बहुत से मजबूर लोग ऐसे बैठे हुए हैं जिन्हें हमारी आवश्यकता है. सहायता, सहयोग, मदद का कार्य चलता रहे, सतत चलता रहे, आत्मविश्वास, आत्मबल कमजोर न पड़े, यही कामना करते हैं खुद के लिए.

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