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17 अगस्त 2025

फिल्म शोले उम्र में हमसे दो वर्ष छोटी है

इस समय उम्र में हमसे दो वर्ष छोटी फिल्म 'शोले' की चर्चा चारों तरफ बनी हुई है. इसका कारण सभी को ज्ञात है. इस फिल्म के बारे में बहुत कुछ पढ़ने को मिला, इसकी तमाम वे जानकारियाँ भी निकल कर सामने आईं जो आम दर्शकों तक, पाठकों तक नहीं पहुँच पाती हैं.

 

'शोले' हमारी भी पसंदीदा फिल्मों में से एक है. कितनी-कितनी बार देख चुके, इसकी गिनती नहीं; कितनी-कितनी बार देख सकते हैं, इसका भी आकलन नहीं. यहाँ फिल्म की अनावश्यक चर्चा (अनावश्यक इसलिए क्योंकि ऐसा कुछ भी नहीं होगा जो आपको पता न हो) करने के पहले बरसों पहले की अपने मित्र पुनीत बिसारिया की बात को यहाँ रखना चाहेंगे.....

 

बहुत साल पहले (अब तो समय भी याद नहीं) पुनीत ने एक दिन फोन करके कहा कि 'कुमारेन्द्र फिल्मों पर लिखना शुरू करो.' उस समय पुनीत ने फिल्मों पर लिखना शुरू ही किया था. उन्होंने आगे कहा कि 'साहित्य और फिल्मों का साथ हमेशा से रहा है, इस पर काम करना, लिखना शुरू करो.' हमने अपने परिचित अंदाज में हँसते (ठहाका मारते) हुए कहा कि 'यार तुम लिख तो रहे हो, हमें काहे जबरन परेशान करते हो. हम लिखने लगे तो तुम्हारा नाम कट जायेगा.' पुनीत भी अपनी शैली में हँसे और बोले कि 'आप जैसे मित्र के लिए नाम कटता हो तो कट जाए.'

 

बहरहाल, पुनीत पूरी तन्मयता से इस क्षेत्र में लगे रहे और आज उनका पर्याप्त नाम इस क्षेत्र में है. हम तो बीच में जुगाली जैसा कुछ-कुछ करने लगते हैं और यदा-कदा मिलती वाह-वाह से ही प्रसन्न हो लेते हैं. (हालाँकि पुनीत हमारे इसी व्यवहार, रवैये से नाराज भी हो जाते हैं. वैसे नाराज तो बहुत से मित्र हो जाते हैं, पर क्या करें अंदाज है अपना कि बदलता नहीं.) वैसे आश्चर्य करने वाली बात आप सबको बता दें कि महाविद्यालय में एम.ए. के विद्यार्थियों को एक प्रश्न-पत्र के रूप में सिनेमा पर ज्ञान हम ही देते हैं. (ये और बात है कि कुछ लोग 'असमर्थ' हैं जो ये देख नहीं पाते.)

 



खैर, दो-चार पंक्तियाँ शोले पर.... वो ये कि अभी तक कि तमाम सारी देखी-अनदेखी फिल्मों के बीच यही एकमात्र फिल्म ऐसी लगी जिसमें सभी पात्र अमरत्व पा गए. इन पात्रों ने भले एक-दो संवाद बोले, भले दो-चार मिनट को परदे पर आये मगर अमर हो गए.

 

"सूरमा भोपाली हम ऐसेही नहीं हैं."

"हम अंग्रेजों के ज़माने के जेलर हैं."

"हमने आपका नमक खाया है सरदार."

"होली कब है?"

"तुम्हारा नाम क्या है बसंती?"

 

ऐसे बहुत से संवादों के बीच सांभा, मौसी, कालिया, अहमद, रहीम चाचा सहित बहुत सारे किरदार आज भी हम सबके दिलों में बसे हुए हैं. शुरूआती असफलता के बाद भी हताशा में न घिरकर फिल्म चलती रही और फिर रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड बनाती रही. इस सफलता के बीच 'शोले' के हिस्से में एक अजब तरह की असफलता भी आई. वो ये कि फिल्म फेयर की लगभग सभी केटेगरी में नॉमिनेट होने पर भी जबरदस्त सफलता के बाद भी मात्र एक पुरस्कार (एडिटिंग का) ही प्राप्त कर सकी.

 

इस फिल्म की सफलता से एक बात सीखने लायक है कि असफलता से निराश नहीं होना है, लगातार आगे बढ़ता रहना है. दूसरे यह कि जबरदस्त सफलता भी सम्मान-पुरस्कार दिलवाने का पैमाना नहीं है.


28 जून 2024

हम चिंता अपनी बेटियों की करें, फिल्म अभिनेत्रियों की नहीं

पिछले कई दिनों से देख रहे कि लोग सोनाक्षी सिन्हा की शादी को लेकर इस कदर चिंतित से होकर पोस्ट लगा रहे, मानो वे ही उसके अभिभावक हैं. 


ऐसे सभी लोगों से एक निवेदन है कि इस तरह की चिंतातुर अभिव्यक्ति वहाँ करें जहाँ आपकी राय को महत्त्व दिया जाये. सोनाक्षी के विवाह की ज्यादा चिंता हो रही हो तो एक बार उसके घर जाकर उससे या फिर शत्रुघ्न सिन्हा से चर्चा कर आओ, अपनी-अपनी औकात का पता चल जायेगा.


हाँ, सभी की ऐसी चिंता का स्वागत भी होना चाहिए क्योंकि कम से कम ऐसे लोग समाज के एक स्व-वर्ग के प्रति चिंतित हैं. तो फिर आप चिंतातुर लोग अपने घर-परिवार-पड़ोस-मित्रों-सहयोगियों की बेटियों की चिंता करें. उन परिजनों की बेटियों की चिंता करें जो आपकी राय, आपकी चिंता को महत्त्व देते हों.


ध्यान रखें, ये सब मसाला फिल्मों वाले लोग हैं. इनके पारिवारिक कार्यक्रम भी बाजार के हस्तक्षेप से चलते हैं, उसमें भी कमाई करते हैं. इनकी बेटियाँ न फ्रिज में मिलती हैं, न सूटकेस में, न किसी आपत्तिजनक स्थितियों का शिकार बनती हैं. ऐसा सिर्फ हम लोगों की बेटियों के साथ होता है. इसलिए अपनी-अपनी बेटियों को समझाएँ, उनको बताएँ कि उनका आदर्श सोनाक्षी जैसी लड़कियाँ न हों.


07 दिसंबर 2023

मानसिक विद्रूपता फैलाती फ़िल्में

इन दिनों फिल्मों को केन्द्र में रखकर चर्चाओं का दौर बना हुआ है. विगत कुछ वर्षों में आये तकनीकी परिवर्तन ने फिल्मों को कल्पनाशीलता से भी ऊपर लेकर एक अलग ही रंग दिया है. जबरदस्त कम्प्यूटर इफेक्ट के चलते भी फिल्मों ने खुद को वास्तविकता के करीब बताने के बाद भी वास्तविकता से बहुत दूर कर दिया है. समाज की कहानी होने के बाद भी एक तरह की फैंटेसी अब फिल्मों में देखने को मिलने लगी है. फिल्मकारों द्वारा कहानी को, फिल्मांकन को, संवादों को, दृश्यों को इस तरह से प्रस्तुत किया जाने लगा है कि वे अब दर्शकों की मानसिकता से खेलते नजर आने लगे हैं. देशभक्ति के नाम पर बनी फ़िल्में हों, दो देशों के बीच प्रेम-संवाद की स्थापना को दिखाती फिल्म हों या फिर समाज की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष हकीकत को सामने लाने वाली फ़िल्में हों सभी में वास्तविकता से कहीं अधिक उस मनोस्थिति का चित्रण होता है जिसे दर्शक देखना पसंद करता है.




फिल्म क्षेत्र में लगातार बदलाव आते रहे हैं, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है मगर इस बदलाव ने अब हिंसा, विकृति, यौन-संबंधों को इस तरह परोसना शुरू कर दिया है जैसे यही समाज की हकीकत हो. फिल्म निर्माण के क्षेत्र में विकास आरंभिक दौर से ही हो रहा था और अपनी तरह का नया स्वरूप भी सामने आ रहा था. इसी का परिणाम था कि गूँगी फिल्मों को आवाज मिली. बोलती फिल्मों की तकनीक विकसित होते ही फिल्म निर्माण का ढर्रा भी बदला. अनेक फिल्म कम्पनियों के द्वारा प्रयोजनपूर्ण फिल्मों का निर्माण किया जाने लगा. हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बनी रोटी, साहित्यिक कृति पर बनी चित्रलेखा, भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन पर आधारित धरती के लाल आदि फिल्मों का निर्माण सोद्देश्यपूर्ण विषय-कहानी जैसी विचारधारा रखने वालों के कारण ही हो सका था.


इन सबके बीच कुछ निर्माताओं-निर्देशकों ने व्यवस्था की पोल खोलते हुए प्रशासनिक, राजनीतिक भ्रष्टाचार को सामने रखते हुए वास्तविकता को प्रदर्शित करने का हौसला दिखाया. अपने आसपास के भ्रष्टाचार, अत्याचार का पर्दे पर समाधान होता देखकर दर्शकों ने इसे पसंद किया तो निर्माता-निर्देशकों ने वास्तविकता का, जीवन की सच्चाई की ताना-बाना कसते हुए इस सार्थकता के बीच भौंड़ापन पसार कर रख दिया. जीवन की सच्चाई दिखाने के नाम पर आम आदमी का पर्दे के पीछे का जीवन पर्दे पर उभरने लगा. सेक्स का, देह का खुला प्रदर्शन, अश्लील गीतों-नृत्यों-भावभंगिमाओं के साथ अश्लील संवादों की अतिरंजिता फिल्मों में दिखाई देने लगी. कभी अश्लील और द्विअर्थी संवादों के लिए विवादास्पद रहे दादा कोंड़के से भी ऊपर जाकर वर्तमान फिल्मकारों ने इस अश्लीलता और द्विअर्थी शब्दावली को सीधे-सीधे फिल्मों में स्थान दे दिया. चोली के पीछे क्या है, एक चुम्मा तू मुझको उधार दे दे, सरकाय लेओ खटिया, ए गनपत चल दारू लगा जैसे गानों के बोल और फिल्मों की संवाद अदायगी ने बोलती फिल्मों को वाचाल स्वरूप प्रदान किया.


यही सिनेमाई शक्ति, विचारों और आदर्शों का प्रचार-प्रसार आज कम होता दिख रहा है. जहाँ रंग दे बसंती, तारे जमीं पर, थ्री इडियट्स, वेलकम टू सज्जनपुर, न्यूयार्क जैसी साफ सुथरी और विषय-विशेष को आधार बनाकर बनी फिल्मों से सुखद अनुभूति होती दिखती है वहीं कमीने, कम्पनी, एनिमल, कबीर जैसी फिल्मों की प्रेतछाया डराती भी है. इसी प्रेतछाया से अब एक और नया शब्द अपने अत्यंत हिंसात्मक स्वरूप में समाज के बीच जगह बनाने लगा है. जबरदस्त हिंसा और नकारात्मकता को अपने में समेटे एनिमल फिल्म के द्वारा अल्फ़ा मेल की उपस्थिति हुई. अपने मूल अर्थ से बहुत दूर इस शब्द को फिल्मकार ने हिंसात्मक रूप में प्रदर्शित किया है.


ऑक्सफोर्ड लर्नर्स डिक्शनरी के मुताबिक, किसी खास समूह का वह शख्स जिसके पास सबसे अधिक ताकत हो, वो अल्फा मेल कहलाता है या यूँ कहें कि एक ऐसा व्यक्ति, जो सामाजिक और व्यावसायिक स्थितियों पर अपनी पकड़ रखता है, वह अल्फा मेल है. यदि इस परिभाषा के सापेक्ष फ़िल्मी अल्फ़ा मेल की छवि देखेंगे तो दर्शकों को, समाज को निराशा ही हाथ लगेगी. अल्फा मेल शब्द का प्रयोग 1960 के दशक से पहले नहीं किया जाता था. एनिमल किंगडम से लिए गए इस शब्द को बाद में इंसानों पर अप्लाई किया गया. जो पावरफुल व्यक्ति के व्यवहार को बताने के लिए था. सामान्य रूप में अल्फा पुरुष को अपने समूह के नेता के रूप में जाना जाता है. वह ऐसा व्यक्ति होता है जिसका प्रत्येक व्यक्ति आदर करता है. अल्फा गुण जन्मजात नहीं होते बल्कि आत्मविश्वास, अनुशासन, सकारात्मकता और सहानुभूति के द्वारा कोई भी अल्फा बन सकता है. इस सन्दर्भ में फ़िल्मी अल्फ़ा समाज में नकारात्मकता फ़ैलाने का ही काम कर रहा है. एक पल को रुक कर सोचिये कि विगत वर्षों में जिस तरह से फिल्मों ने समाज को प्रभावित किया है, अपनी वेशभूषा, जीवन-शैली से युवाओं को आकर्षित किया है उसी तरह से यह फ़िल्मी अल्फ़ा युवाओं को, समाज को किस रास्ते ले जायेगा?


पारिवारिक हिंसा, हत्या, अत्याचार, अपराध आदि के द्वारा जिस अल्फ़ा को चित्रित किया गया है वह मानसिक विकृति का सूचक है. हिंसा, अत्याचार, अपराध से घिरा समाज ऐसे फ़िल्मी अल्फ़ा मेल के चलते सुधार के रास्ते तो नहीं ही जायेगा. ऐसी स्थितियों से दर्शक ही भयभीत नहीं है वरन् अच्छी फिल्में भी इनके भय से विलुप्त सी हो रही हैं. सामाजिक विद्रूपता को फिल्मकार द्वारा एक नये प्रकार का चमकदार मुलम्मा चढ़ाकर पेश किया जा रहा है. बुद्धिजीवी सुसुप्तावस्था में पड़े फिल्मों की वाचालता देख समाज में होता व्याभिचार देख रहे हैं. खामोशी समाज के जागरूक वर्ग के होठों पर है और समाज की वास्तविकता का मायाजाल दिखाकर समाज को भरमाने वाले फिल्मकारों की जुबान बोलती है और कहती है- गोली मार भेजे में, भेजा शोर करता है.




 

22 मई 2023

फिल्मों का विरोध या राजनीति

भारतीय समाज में फिल्मों का अपना ही महत्त्व है. किसी समय जबकि आज की तरह न रंगीन फ़िल्में हुआ करती थीं और न ही बोलने वाली फ़िल्में तब भी भारतीय दर्शकों ने फिल्मों का भरपूर आनंद उठाया था. समय के साथ-साथ तकनीकी बदलाव हुए और न केवल बोलने वाली फ़िल्में बननी शुरू हुईं बल्कि रंगीन फिल्मों ने भी दर्शकों के बीच आना शुरू किया. फिल्मों में जहाँ तकनीकी रूप से परिवर्तन हुए वहीं उनके विषयों में भी जबरदस्त तरीके से बदलाव देखने को मिले. किसी समय धार्मिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, देशभक्ति आदि विषयों की फिल्मों के निर्माण पर ज्यादा जोर दिया जाता था. कालांतर में इनमें वास्तविकता का पुट दिया गया, प्रेम कहानियों का आना हुआ और उसी के पीछे-पीछे आपराधिक पृष्ठभूमि वाली फिल्मों ने जोर पकड़ना शुरू किया. सीधे-साधे, मासूम से नायक की छवि एंग्री यंग मैन में बदल गई. 


समय के साथ फिल्मों के विषय में बदलाव को दर्शकों की रुचि बताया जाता रहा. हिंसा, अपराध, माफिया, अंडरवर्ल्ड आदि को फिल्मों में प्रमुखता से दिखाया जाने लगा. आपराधिक पृष्ठभूमि के चरित्रों को नायक की तरह से प्रस्तुत किया जाने लगा. कहते हैं कि फिल्में समाज का आईना होती हैं. इस आईने ने न केवल सच दिखाना शुरू किया बल्कि अशालीन रूप में दिखाना शुरू कर दिया. नग्नता, गालियाँ, अश्लीलता अपने चरम पर प्रदर्शित की जाने लगी. फिल्मकारों द्वारा कहा गया कि इस तरह के फिल्मांकन द्वारा समाज का वास्तविक सच दिखाया जा रहा है. फिल्मकार अपनी ऐसी फिल्मों के द्वारा जनता को सोशल मैसेज देने का दावा करने लगे. इसी सामाजिक सन्देश देने के पीछे समाज की, राजनीति की असलियत दिखाने के लिए राजनीतिक फिल्मों का निर्माण भी किया जाने लगा. ऐसा नहीं है कि ऐसी फिल्मों का निर्माण इक्कीसवीं सदी की घटना है. आँधी फिल्म और उसके साथ घटित राजनीति किसी भी फिल्म-प्रेमी से छिपी नहीं है. ऐसी कोई एक-दो फ़िल्में नहीं बल्कि अच्छी-खासी सूची है.  




किसी समय इक्का-दुक्का फिल्मों को लेकर राजनीति होती थी, इधर देखने में आ रहा है कि लम्बे समय से लगातार कई फ़िल्में राजनीति का शिकार हुई हैं. इन फिल्मों को लेकर जमकर राजनीति की जा रही है. कभी कश्मीर फाइल्स, कभी द केरला स्टोरी, कभी प्रधानमंत्री पर बनी बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री. इनके अलावा देखा जाये तो पद्मावत, बाजीराव मस्तानी, पीके, गैंग्स ऑफ़ बासेपुर, पठान आदि ऐसी फ़िल्में रहीं हैं जिनको लेकर खूब राजनीति हुई, खूब विरोध हुआ. इधर लम्बे समय से ऐसा लग रहा है जैसे फिल्मों का रिलीज होना सिर्फ बायकॉट के लिए ही होता है. इसके पीछे सोशल मीडिया को जिम्मेवार माना जाता है मगर यही अंतिम और पूरा सच नहीं है. सोशल मीडिया के आने के बरसों पहले से भी बॉलीवुड फ़िल्में बायकॉट का शिकार हो चुकी हैं. नील आकाशेर नीचे देश की पहली ऐसी फिल्म थी जिस पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने प्रतिबन्ध लगाया था. तीन महीने तक विवाद के बाद यह फिल्म 1958 में रिलीज हुई थी. इस फिल्म में राजनीति का उपयोग गलत तरीके से होते दिखाया गया था. देखा जाये तो बॉलीवुड में ऐसे मुद्दों पर अनेक फिल्में बनी हैं जिनमें न केवल राजनीति को गलत ढंग से दर्शाया गया है बल्कि प्रशासनिक मशीनरी को भी जबरदस्त तरीके से भ्रष्ट दिखाया गया है.बहुत सी फ़िल्में ऐसी भी बनी हैं जिनमें राजनीतिक उलटफेर को दिखाया गया है. ऐसी फिल्मों का भी विरोध हुआ है मगर इधर फिल्मों के विरोध के पीछे धर्म, संस्कृति, समाज आदि प्रमुखता से है. इसके साथ-साथ समाज की सच्चाई को दिखाने वाली फिल्में भी राजनीति का, विरोध का शिकार हुई हैं.


ऐसी फ़िल्में जो समाज की वास्तविकता को लेकर बनती हैं, उनके विषयों में राजनीति तलाशने के पीछे राजनैतिक मकसद तो दिखाई देते ही हैं, जनभावनाओं का समाहित होना भी होता है. राजनीति ही एक ऐसा विषय है जो साक्षर से लेकर निरक्षर तक पूर्ण बहस के, विमर्श के साथ उपस्थित होता है. यही कारण है कि राजनीति से जुड़े विषयों पर जब भी फिल्में बनी हैं तो तो दर्शकों ने उनके साथ खुद को सहजता से जोड़ने का प्रयास किया है. इसी कारण से बहुत बार ऐसा होता है कि जनभावनाएँ सकारात्मक रूप से जुड़ने के साथ-साथ नकारात्मक रूप से भी जुड़ती हैं. इस नकारात्मकता में वर्तमान दौर में कुछ ज्यादा ही वृद्धि हुई है. देखा जाये तो इसके पीछे किसी न किसी रूप में राजनैतिक हस्तक्षेप भी रहा है.  


राजनैतिक हस्तक्षेप की सम्भावना होने के बाद भी ऐसा नहीं कहा जा सकता कि फिल्मों के बायकॉट करने के पीछे सिर्फ राजनीति ही काम करती हो. अनेक बार समाज के वास्तविक विषयों को लेकर बनी फिल्मों के प्रस्तुतीकरण को लेकर भी विवाद होता है. कई बार फिल्मों के माध्यम से कड़वी सच्चाई भी सामने आती है, ऐसी स्थिति के कारण भी विवाद का जन्म होता है. ऐसे में फिल्मकारों के लिए यह बहुत ही जिम्मेवारी भरा काम होता है कि वे ऐसे विषयों पर, जिनमें कि समाज की वास्तविकता को दिखाया जा रहा हो, किसी चरित्र को उभरा जा रहा हो, समाज के किसी सच को दिखाया जा रहा हो, संवेदनशील होने की आवश्यकता है. हाल के दिनों में आई दो फिल्मों- कश्मीर फाइल्स और द केरला स्टोरी को इस रूप में सहजता से देखा जा सकता है. दोनों फिल्मों के द्वारा समाज ने देश के उस सच को देखा जिसे उसने अभी तक सिर्फ सुन रखा था. ऐसे में जनभावनाओं में परिवर्तन आना स्वाभाविक सी बात है.


यहाँ फिल्मकारों को ये समझने की आवश्यकता है कि ऐसी फ़िल्में जिनमें समाज का सच, उसकी वास्तविकता दिखाई जा रही हो, वे महज मनोरंजन के लिए नहीं हैं. उनका उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा धन कमाने का नहीं होना चाहिए. उनको भी जानकारी होती है कि जनभावनाओं का विरोध कई बार फिल्मों को हिट करवाता है, ऐसे में अक्सर उनके द्वारा जानबूझकर इस तरह का फिल्मांकन, गीत का प्रस्तुतीकरण किया जाता है कि फिल्म के द्वारा विवाद उत्पन्न हो. ऐसी स्थिति में उनका प्रयास हो कि जनभावनाएँ नकारात्मक रूप में न उभरने पायें. ऐसे लोग, जिन्होंने उस कड़वे सच को भोगा होता है, उनके लिए उसे देख पाना, सहन कर पाना संभव नहीं होता है और वे लोग जो उस सच को फिल्मांकन के द्वारा देख रहे होते हैं, वे भी संवेदित होकर विरोध की स्थिति में आ जाते हैं. ऐसे में जहाँ एक तरफ फिल्मकारों को संयम बरतने की आवश्यकता है वहीं दूसरी तरफ दर्शकों को, राजनैतिक पृष्ठभूमि से जुड़े लोगों को भी संवेदित होने की आवश्यकता है कि वे आक्रोश में, विरोध में ऐसा कदम न उठायें जो जनमानस को नुकसान पहुँचाये.  






 

27 मई 2021

शाब्दिक आपत्ति वाले समाज में कमीने, छिछोरे की स्वीकार्यता

इधर कुछ दिनों से एक बाल कविता पर बहस चलती देख रहे हैं. यह कविता किसी कक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल की गई है. उसके कुछ शब्दों पर आपत्ति जताई गई है. चूँकि सिक्के की तरह किसी भी बात के दो पहलू होते हैं. कुछ ऐसा ही इस कविता के सन्दर्भ में भी हो सकता है. क्या सही है, क्या गलत है इसका आकलन इस पर सभी के मत अलग-अलग हो सकते हैं. कविता के कुछ शब्दों को बालमन पर गलत प्रभाव डालने वाला बताया जा रहा है तो एक पक्ष इन शब्दों को उनकी स्थानीयता के साथ जोड़कर सही मान रहा है. यहाँ हमारा व्यक्तिगत मत उस कविता के न पक्ष में है और न ही विपक्ष में. ऐसा इसलिए क्योंकि कोई एक कविता किसी भी तरह से स्थायी प्रभाव तब तक नहीं डाल सकती जब तक कि उसका कई सालों तक निरंतर वाचन न करवाया जाये.


यदि कोई एक कविता ही किसी भी बालमन को सुधारने, बिगाड़ने का काम करती तो ऐसे लोगों से ही पूछना चाहिए कि उनके अपने समय में पढ़ाई जाने वाली कविताओं को रटने के बाद भी उन्हीं के कालखंड के पुरुष माँ-बहिन की गालियाँ क्यों देते नजर आते हैं? दो-चार शब्दों के सहारे बालमन पर गलत असर पड़ने वालों को ध्यान रखना चाहिए कि वर्तमान में फिल्मों के माध्यम से समाज में लगभग स्वीकार्य शब्दों – सेक्सी, चुम्मा, कमीने, छिछोरे आदि को ऐसी ही पीढ़ी ने रचा है जिसने अपने समय में शालीन शब्दों वाली कविता पढ़ी है.


बहरहाल, उस कविता के कुछ शब्दों पर पढ़ने को मिली बहुत सी आपत्तियों के बाद अपना लिखा एक पुराना आलेख याद आया. यह उस समय लिखा था जबकि फिल्म कमीने बाजार में उतारी गई थी. उसके बाद से तो अशालीन शब्दों की नदी में न जाने कितने शब्द बह चुके हैं. एक बार फिर वही पुराना आलेख आपके बीच.




कमीना.....कमीने....चौंक गये आप? जी हाँ चौंकना स्वाभाविक है क्योंकि हमारे समाज में ये शब्द एक गाली के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. अभी शायद (शायद की जरूरत है?) ऐसी स्थिति आई नहीं है कि इस शब्द को भद्रजनों की भाषा-शैली में शामिल किया जाये. गाली तो गाली ही होती है या समय के साथ उसका भी परिष्कृत रूप सामने आता है? यह सवाल एक हमारे मन में ही अकेले नहीं घुमड़ता होगा, कभी न कभी, कहीं न कहीं आपको भी परेशान करता होगा. अब करता रहे परेशान तो करे जिसको ये शब्द समाज में प्रचलित करने हैं वे तो कर ही रहे हैं.


इस बात से थोड़ा सा इतर....आपको सेक्सी शब्द के बारे में क्या विचार आता है? कुछ सालों तक इस शब्द के मायने कुछ अलग थे. इस शब्द के उच्चारण में एक प्रकार की झिझक देखने को मिलती थी. आज.....आज ये शब्द हम बड़े बेधड़क होकर इस्तेमाल करते हैं. बड़े बैठें हों या फिर छोटे इस शब्द सेक्सी के प्रयोग में कोई शर्म किसी को नहीं है. और तो और सेक्सी शब्द के मायने अब इस रूप में बदले हैं कि हम अपने नन्हे-मुन्नों के लिए भी इस शब्द को प्रयोग करने लगे हैं. कोई विशेष ड्रेस पहना देख कर, किसी विशेष प्रकार के करतब दिखाने पर हम अपने छोटे-छोटे बच्चों के लिए अकसर कह देते हैं कि इस ड्रेस में बड़ा सेक्सी लग रहा है/लगता है. अकसर हम इस शब्द को मजाक के रूप में भी इस्तेमाल कर लेते हैं और क्या हाल है, बड़े सेक्सी बने घूम रहे हो?


इस शब्द की सहज स्वीकार्यता के सापेक्ष देखा जाये तो क्या कमीना शब्द इतना सहज स्वीकार्य है? या हो पायेगा? हो पायेगा का जवाब शायद कोई भी न दे पाये क्योंकि हमारे फिल्मी संसार ने लगभग स्वीकार्यता की स्थिति में तो इस शब्द को लाकर खड़ा कर दिया है. याद है वो गाना मुश्किल कर दे जीना, इश्क कमीना, यह गाना बच्चे-बच्चे की जुबान पर चढ़ा था/चढ़ा है. अब इस गाने का विकास-क्रम बढ़ा. अब एक फिल्म आ गई है कमीने. स्वीकार्यता की ओर एक और कदम. जैसे हमारे विचार से सेक्सी शब्द की स्वीकार्यता बढ़ी थी मेरी पैंट भी सेक्सी, मेरी शर्ट भी सेक्सी..... से. अब मित्रों में आपस में चर्चा होगी चल कमीने देख आते हैं. माँ के पूछने पर बेटी-बेटे कहेंगे माँ दोस्तों के साथ कमीने देखने जा रहे हैं.  


कई बार इस तरह के शब्दों के प्रयोग करने में उसका अर्थ न मालूम होने की स्थिति होती है पर यह भी उनके लिए होती है जो कम पढ़े-लिखे या निरक्षर होते हैं. जैसे हमारे एक मित्र के घर काम वाली बाई आती थी. वह जब भी अपने सात-आठ साल के बच्चे की कोई शरारत या फिर किसी हरकत का बखान करती तो बड़े ही गर्वोक्ति भरे अंदाज में कहती लला ने ऐसो कर दओ, बड़ो हरामी है.....या बड़ो हरामी होत जा रओ, अपयें मन की करन लगो है अब.....बगैरह-बगैरह. जब एक दिन उसको बताया कि इस शब्द, हरामी का क्या अर्थ होता है तो उसने फिर इसका इस्तेमाल करना बन्द कर दिया.


क्या काम वाली बाई की तरह ही इन फिल्म वालों की स्थिति है? क्या ये लोग भी इन शब्दों के अर्थ नहीं समझते? क्या अब समाज में विकृत मानसिकता को ही फैलाने का चलन काम करेगा? हो कुछ भी अब आने वाले समय में इस तरह के वाक्यों से भी रू-ब-रू होने की सम्भावना है देखो-देखो मेरे बेटे को, इस ड्रेस में कितना कमीना लग रहा है, आज गजब हो गया, तुम्हारे कमीनेपन ने तो मजा बाँध दिया.


क्या आप इसके लिए तैयार हैं? ये लेख उस समय का है जबकि छिछोरे शब्द फ़िल्मी दुनिया ने फिल्म के रूप में उतारा नहीं था. अब तो उदाहरण में इस छिछोरे शब्द को भी जोड़ा जा सकता है.


++

ये है वो कविता जो आजकल विवादों में है, अपने कुछ शब्दों के कारण.




24 जून 2020

फिल्म फेस्टिवल में कुछ अपनी बातें

जनपद जालौन की तहसील कोंच के उत्साही युवा पारसमणि द्वारा कोंच फिल्म फेस्टिवल का आयोजन ऑनलाइन किया जा रहा है. उस युवा की क्षमता पर हमें भरोसा है, यदि कोरोना संक्रमण से सुरक्षित रहने की, लॉकडाउन-अनलॉक जैसी व्यवस्था का पालन करने की उसकी ईमानदारी न होती तो निश्चित ही ये आयोजन वास्तविक रूप में बहुत ही भव्य होता. फ़िलहाल तो इन्हीं बाध्यताओं, नियमों का पालन करते हुए इस फेस्टिवल का आयोजन ऑनलाइन किया गया. इसमें निश्चित समय पर अनेक कलाकारों को, फिल्म से जुड़े लोगों को, व्याख्यान देने वालों को आमंत्रित किया गया. सभी ने अपनी-अपनी प्रतिभा का परिचय यहाँ दिया.



इसी में हमें भी ऑनलाइन अपने विचार प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया. ऑनलाइन बोलना, वो भी उस स्थिति में जबकि आपके सामने कोई सुनने वाला न दिखाई दे, बहुत ही अजब सा अनुभव देता है. इसी कारण से बहुत कम लाइव कार्यक्रमों में सहभागिता कर पाते हैं. इस कार्यक्रम में सहभागिता करना हमारा स्नेहिल बंधन था. पारस के स्नेहिल आदेश के बाद इंकार कर पाना संभव ही नहीं होता है. कतिपय कारणों से इस बार उसके कहे अनुसार वीडियो बनाकर नहीं भेज सके. फिलहाल, ऑनलाइन आकर नए फ़िल्मी कलाकारों से बात करने का अवसर मिला.

इस पोस्ट के द्वारा अपनी उसी बात को लगभग दोहराते हुए जनपद जालौन के उन सभी कलाकारों से, जो फिल्म निर्माण में लगे हैं, इतना निवेदन है कि वे विषयों का निर्धारण कुछ इस तरह से करें जो आम विषय से अलग हो. यह सत्य है कि छोटी जगहों के फिल्मकार बड़े बैनर का मुकाबला किसी भी स्थिति में नहीं कर सकते. ऐसी स्थिति में बजाय हतोत्साहित होने के वे ऐसे विषयों का चुनाव करें जो अपने आपमें अलग दिखाई दे. इसके साथ-साथ जनपद जालौन में साहित्यिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक विरासत की अत्यंत समृद्ध है. इनके बारे में भी समाज को बताये जाने की आवश्यकता है. फिल्मकारों को इस तरफ भी ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है.

यहाँ के फिल्मकारों को चंद छोटी-छोटी बातों को ध्यान रखना होगा.

  • उनकी बनाई फ़िल्में व्यावसायिक प्रतिस्पर्द्धा नहीं कर सकतीं. ऐसे में ऐसे विषयों पर फ़िल्में बनाई जाएँ जो लोगों का ध्यान खींचें.
  • बजाय कमाई करने के लोगों तक अपनी पैठ बनाने के लिए फिल्मों को बनाया जाना चाहिए.
  • उन विषयों पर फिल्म बनाने से बचना चाहिए जो आम हैं, सामान्य हैं. किसी विशेष विषय को ऐतिहासिक, सांस्कृतिक रूप से सम्बद्ध करते हुए दिखाया जाना चाहिए.
  • उन स्थानीय बिन्दुओं को भी परिलक्षित करना चाहिए जो आज भी ऐतिहासिक, अमूल्य होने के बाद भी जनमानस की दृष्टि से ओझल हैं.
  • अपनी-अपनी फिल्मों को इधर-उधर रिलीज के चक्कर में फँसने के सीधे इंटरनेट पर, विभिन्न सोशल मीडिया मंचों पर रिलीज करके बहुतायत लोगों तक अपनी पहुँच बनानी चाहिए.
  • सभी फिल्मकारों को खुद का विशेष समझने के अहंकार से मुक्त होने की आवश्यकता है. ऐसा करके वे सामान्य जन से सीधे तौर पर जुड़ सकेंगे.
  • सभी कलाकारों को यह समझना होगा कि नुक्कड़ नाटक, मंचीय नाटक, रंगमंच, फिल्म के अभिनय में बहुत अंतर है. नुक्कड़ अथवा रंगमच का तरीका लेकर फिल्म में अभिनय नहीं किया जा सकता है.
  • वरिष्ठ कलाकार साथियों को समय-समय पर कार्यशाला का आयोजन करना चाहिए ताकि नए लोग कुछ और नया सीख सकें.
  • इसके साथ-साथ जनपद के सभी साथियों को मिलकर एक मंच, एक बैनर की स्थापना करनी चाहिए. इसमें वे सब एकजुट होकर अपनी-अपनी समस्याओं का निदान कर सकते हैं.


बातें तो और भी बहुत हुईं मगर लगता नहीं कि उन पर अमल किया जायेगा. कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद बहुत प्रयास किये कि यहाँ के सक्रिय कलाकार एक मंच पर आयें मगर संभव न हो सका. आज जबकि लोगों में होड़ ज्यादा है, आपसी तनाव अधिक है, ऐसे में सबका एक मंच पर आना कल्पना ही लगता है. अपनी बात कहनी थी सो कह दी, मानना या न मानना सामने वाले की मर्जी. फ़िलहाल तो बड़े अच्छे कार्यक्रम के लिए सभी आयोजकों को बधाई, शुभकामनायें.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

08 जून 2020

सहृदय योगेश जी की यादों के उजाले

विविध भारती पर इधर उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम के अंतर्गत प्रसिद्द गीतकार योगेश और उद्घोषक युनुस खान बातचीत करते सुनाई दे रहे थे. इस बातचीत में योगेश जी के जीवन के बहुत से पहलू सामने निकल कर आये. इसके साथ-साथ फिल्म संसार के भी बहुत से रंग समझ में आये. योगेश जी ने बड़े ही सहज भाव से अपने मुंबई आने की, शुरूआती दिनों के संघर्ष की, रोजगार पाने की जद्दोजहद के बीच अपने अभिन्न मित्र सत्यप्रकाश, जिन्हें योगेश जी सत्तू नाम सी पुकारते थे, के प्रेम, समर्पण को भी सुन्दर शब्दों में उकेरा. इस कार्यक्रम में बातचीत में फिल्म संसार के रंगों पर चर्चा से ज्यादा आकर्षण योगेश जी की बातों में, उनके अनुभवों का रहा.



आपको भी आश्चर्य होगा जानकर कि योगेश जी जब लखनऊ से मुंबई आये तब उनके सामने ये भी तय नहीं था कि उनको करना क्या है. विविध भारती के विभिन्न कार्यक्रमों के द्वारा अनेकानेक कलाकारों के अनुभवों को सुना गया. जिनमें से लगभग सभी का फिल्मों में काम करने का सपना रहा है अथवा किसी से प्रेरणा लेकर वे फिल्मों में आ गए. इसके उलट योगेश जी के पास भी फिल्मों में आने का विकल्प उनके एक रिश्तेदार के माध्यम से था मगर वे मुंबई फिल्मों में काम करने का सोच कर ही नहीं आये थे. उनको फिल्मों में लाने का पूरा श्रेय उनके मित्र सत्यप्रकाश जी का रहा, इसे योगेश जी ने खुलकर स्वीकार भी किया. वे अपनी बातचीत में बताते हैं कि उन्होंने संघर्ष नहीं किया बल्कि संघर्ष तो सत्तू ने किया. ऐसा महसूस भी हुआ. कई जगहों पर योगेश जी के काम करके पैसे कमाने को उनके मित्र ने ही बंद करवाया. वही उनको फिल्मों में काम करने को प्रेरित करते रहे.

इतना होने के बाद भी अंदाजा लगाइए कि उनको नहीं मालूम कि करना क्या है फिल्मों में. इसी चक्कर में उनको एक बार एक्स्ट्रा का काम मिल गया. बहरहाल, उनकी फिल्मों की तरफ जाने की कहानी बहुत ही मजेदार है. अनेक प्रसिद्द गीतों को लिखने वाला व्यक्ति मुंबई आने तक न कविता लिखा करता था न ग़ज़ल, गीत आदि. यह काम भी योगेश जी ने मुंबई में काम की तलाश में धक्के खाते हुए शुरू किया. उनकी तमाम बातों के बीच निष्कर्ष निकला कि वे स्वाभिमानी होने के साथ-साथ कोमल ह्रदय के व्यक्ति थे. एक हिट गाने का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि उन पर ऐसे गीत लिखने का दवाब बना रहता जो कुछ समय बाद उनको पसंद नहीं आया. इसी के चलते वे मुंबई से वापस लखनऊ आ गए. यहाँ भी उनके मित्र ने उनकी सहायता की. मुंबई से उनको बुलावा आया तो उन लोगों ने इसे मजाक समझा और असलियत जानने के लिए उनके मित्र सत्तू ही मुंबई आये.

यहाँ विशेष बात यह लगी कि एक ऐसा व्यक्ति जिसने गीत, कविता लिखना मुंबई आने के बाद शुरू किया. जो अपने घर से बिना किसी निश्चित दिशा की शक्ल बनाकर निकल आया हो, जिसने काम के लिए किसी की चाटुकारिता न की हो यदि वह सच्चे मन से लगा रहे तो सफलता मिल जाती है. उनकी बातचीत में कई संगीतकारों, कई गीतकारों, गायकों के बारे में भी अनछुए पहलू सामने आये. कई-कई महीने प्रसिद्द संगीतकारों द्वारा चक्कर लगवाने के बाद योगेश जी का दो टूक शब्दों में इंकार करना, चाटुकारिता जैसी स्थिति को स्वीकार न कर पाना, अनावश्यक बैठकी लगाने के पक्ष में न रहना आदि ऐसी बातें हैं जो उनके स्वाभिमान को और तत्कालीन स्थितियों को भी दर्शाती हैं.

उनके लिखे गीत आज भी खूब गुनगुनाये जाते हैं, खूब सुने भी जाते हैं. कहीं दूर जब दिन ढल जाए, जिंदगी कैसी है पहेली, रिमझिम गिरे सावन, आए तुम याद मुझे, न जाने क्यों होता है ये जिंदगी के साथ, कई बार यूं भी देखा है, न बोले तुम न मैंने कुछ कहा, बड़ी सूनी-सूनी है, जिंदगी ये जिंदगी है जैसे गीतों को सुनने-गुनगुनाने वालों में बहुत से लोग गीतकार योगेश से अनजान ही होंगे. उजाले उनकी यादों के ने जिस तरह से योगेश जी की यादों के उजाले में बहुत कुछ स्पष्ट किया, उसके लिए उद्घोषक युनुस खान भी बधाई के पात्र हैं.

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05 जून 2020

कमजोर आत्मविश्वास से सच न हो सके बहुत से सपने

स्नातक स्तर तक की पढ़ाई पूरी न हो सकी थी कि पिताजी का आदेश मिला कि वापस घर आ जाओ, आगे नहीं पढ़ाना है. उस समय हम स्थिति समझ सकते थे. घर से पढ़ने के लिए ग्वालियर पहुँचे और वहाँ पढ़ने से ज्यादा नाम सामने आने लगा लड़ाई-झगडा करने में. कहते हैं न कि बद अच्छा, बदनाम बुरा. कुछ नाम वास्तविक रूप में हुआ तो कुछ में नाम काल्पनिकता का शिकार होकर सामने आया. चर्चा उसकी नहीं क्योंकि उन दिनों की अपनी ही एक अलग कहानी है जिस पर घंटों लिखा-बताया जा सकता है. जैसा कि पिताजी का आदेश था बिना किसी विरोध के घर आ गए. आगे की पढ़ाई के रूप में लॉ करने का विचार था या फिर सांख्यिकी से परास्नातक करने का. दोनों में कुछ सहमति सी न दिखी तो सिविल सर्विस की तैयारियों की तरफ ध्यान लगाने की कोशिश की. इसी बीच फ़िल्मी कीड़ा काटने लगा.


उरई जैसे शहर में आने के बाद इस कीड़े के काटने का कोई इलाज भी नहीं था. जिस तरह का माहौल यहाँ दिख रहा था उसमें कुछ नाटकों और कुछ नुक्कड़ नाटकों के द्वारा ही संतुष्टि का एहसास किया जा सकता था मगर आगे बढ़ने जैसा कुछ हिसाब समझ नहीं आ रहा था. कुछ महीनों की भागदौड़ के बाद यहाँ का सांस्कृतिक माहौल भी समझ आने लगा. ऊपरी तौर पर भले ही सब एक मंच पर दिखाई पड़ते हों मगर अंदरूनी रूप से, अपने बैनर के रूप में सभी अलग-अलग विचारधाराओं के पोषक थे. इनके साथ बहुत लम्बा समय नहीं बीत सकता था या कहें कि अपने काटे कीड़े का इलाज यहाँ नहीं समझ आ रहा था.


उन्हीं दिनों एक जगह विज्ञापन दिखाई दिया किसी विज्ञापन कंपनी का. मित्रों के सुझाव के साथ विचार किया गया कि यदि एक बार इस क्षेत्र में घुसना हो गया तो शायद आगे का रास्ता भी यहीं से मिल जाये. विज्ञापन की कुछ शर्तों को पूरा करने के लिए फोटो की आवश्यकता थी. अपने फोटोग्राफी के शौक और सेन्स को प्रयोग में लाने का विचार बनाया. एक दोस्त के कैमरे में रील डालकर खुद को निर्देशित करते हुए, खुद के लिए कैमरामैन बने. आनन-फानन पाँच-दस फोटो निकालकर उनको जल्द से जल्द बनवाया गया. जिस दिन सारी औपचारिकतायें पूरी करके फॉर्म को पोस्ट किया उस दिन से न जाने कितनी सफल फिल्मों के हीरो हम नजर आने लगे.

इतना सारा काम घर में बिना किसी की जानकारी में आये हुआ. उसके बाद का दौर किसी खतरनाक फिल्म की तरह से हमारे सामने आया. एक दिन पिताजी की अदालत में पुकार लगी. बिना किसी गवाह, सबूत के हमें उपस्थित होना पड़ा. उनके हाथ में एक लिफाफा चमक रहा था जो हमारे अपराध की गवाही खुद दे रहा था. उस लिफाफे के साथ-साथ जाने कितनी तरह की बातें हमारे हाथ में रख दी गईं. विज्ञान स्नातक की पढ़ाई का मंतव्य सिद्ध करने को कहा गया, सिविल सेवा की तैयारियों का मतलब बताने को कहा गया, नाचने-गाने को सामाजिकता की श्रेणी में शामिल करने के आधार को बताने को कहा गया.

एक हम चुपचाप सिर झुकाए अपने विज्ञान स्नातक होने का कथित अहंकारी गर्व लिए खड़े रहे. हमारे पास कोई तर्क नहीं थे, सिवाय आज्ञा पालन करने के. वो फॉर्म बरसों हमारे पास सुरक्षित रहा, इस सबूत के साथ कि पहली स्टेज में हम पास हो गए थे. आगे के लिए मुंबई जाना था, कुछ फोटोशूट और अन्य औपचारिकताओं को करना था. फिर एक दिन बहुत सारे फालतू कागजातों के साथ उस फॉर्म और उसके साथ आये पत्र को भी मकान के सामने बहती नाली में प्रवाहित कर दिया. वो पत्र मर गया, वो फॉर्म बह गया मगर आज तक वो कीड़ा न मरा, आज तक वो कीड़ा कहीं और नहीं गया.

बहुत सी बातें हैं जो आज तक समझ आती रहीं, नहीं भी समझ आती रहीं मगर एक बात ये समझ न पाए कि क्या हम डरपोक निकले? क्या हमारे अन्दर अपने सपनों को पूरा करने के लिए पारिवारिक निर्णयों के खिलाफ आवाज़ उठाने की हिम्मत न थी? क्या हमारे अन्दर किसी विश्वास की कमी थी जो हम पिताजी के उस निर्णय का विरोध न कर सके? क्या हम अन्दर ही अन्दर कमजोर थे? ऐसा इसलिए क्योंकि यह उसी एक निर्णय पर नहीं हुआ वरन हमारे साथ एकाधिक मामलों में, बहुतायत विषयों पर ऐसा हुआ. अब लगता है कि उस जैसे अनेक पारिवारिक निर्णयों पर हमारी चुप्पी हमारे आज्ञाकारी होने का नहीं वरन हमारे कमजोर आत्मविश्वास की परिचायक है. ऐसी अनेक चुप्पियों का परिणाम आज भी हम ही भोग रहे हैं.

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30 अप्रैल 2020

प्रसिद्धि पाने का सहज रास्ता है रुपहला पर्दा

पिछले दो दिन में फिल्म इंडस्ट्री के दो नामचीन और मशहूर चेहरे दुनिया को अलविदा कह गए. पहले इरफ़ान खान और फिर ऋषि कपूर का जाना अपने-अपने क्षेत्र में एक खालीपन का एहसास अवश्य कराएगा. ऋषि कपूर के पिता राजकपूर की फिल्म का एक डायलाग है शो मस्ट गो ऑन. ये सही है. दुनिया किसी के जाने से कभी रुका नहीं करती. किसी के जाने से खाली हुई जगह भले ही उसी रूप में न भरी जा सके मगर किसी न किसी रूप में उसी की तरह से भरने की कोशिश अवश्य वहाँ होने लगती है. 

कोरोना महामारी के इस दौर में जबकि सोशल मीडिया पूरी तरह से इसी बीमारी की गिरफ्त में दिख रहा है, सुबह से लेकर देर रात तक बस कोरोना की चर्चा दिखाई दे रही है तब इन दो कलाकारों के बारे में बराबर लिखा जाना इनकी शोहरत को दर्शाता है. यहीं सवाल उठता है कि क्या वाकई इनकी शोहरत या फिर इनके चेहरे का, इनका चमकते परदे पर दिखाई देना? इसमें कोई दोराय नहीं कि इन दोनों कलाकारों का अभिनय के क्षेत्र में अपना अलग स्थान है. दोनों ही अपनी तरफ से अलग तरह के अभिनय के लिए जाने जाते रहे हैं. इसमें एक इरफ़ान खान ने जहाँ अपनी मेहनत से अभिनय जगत में अपनी पहचान बनाई वहीं ऋषि कपूर खानदानी अभिनय क्षेत्र से जुड़े होने के बाद भी मेहनत करते दिखाई देते थे.



बहरहाल, चर्चा ये नहीं कि कौन मेहनत कर रहा था, कौन नहीं? कौन किस तरह का अभिनय करता था, कौन दूसरे तरह का. चर्चा इस बात की कि शोहरत के लिए, नाम के लिए जितना महत्त्वपूर्ण मेहनत करना, कार्य करना है उससे ज्यादा महत्त्वपूर्ण उस माध्यम का है जो आपको जनसामान्य के बीच लेकर जाता है. इसमें दृश्य माध्यम का बहुत बड़ा हाथ है. फिल्मों ने, टीवी ने फ़िल्मी कलाकारों को घर-घर में लोगों के बीच पहुँचा दिया है. ऐसे में सर्वसुलभ माध्यम के चलते प्रसिद्धि सहज, सरल हो जाती है. समाज में इन फ़िल्मी कलाकारों के अलावा भी बहुत से लोग ऐसे होते हैं जो वास्तविक रूप में जमीनी काम कर रहे हैं, समाजोपयोगी कार्य कर रहे हैं, सबके हितार्थ कार्य कर रहे हैं मगर उनको ऐसी प्रसिद्धि नहीं मिल पाती है, जितनी कि किसी फ़िल्मी कलाकार को मिल जाती है.

यहाँ आकर सवाल उठता है कि आखिर इसका जिम्मेवार कौन? इसका सबसे सरल और सहज जवाब है, सरकार. है न? आखिर किसी भी स्थिति की जटिलता से बाहर आने का सबसे आसान रास्ता होता है किसी भी स्थिति के लिए सरकार को जिम्मेवार बता देना. हम अपने आसपास के वास्तविक नायक-नायिकाओं को सामने लाने के प्रति संकुचित मानसिकता अपनाये होते हैं. उनको किसी माध्यम से चमकते परदे पर लाये जाने का काम नहीं किया जाता है. सरकारी, गैर-सरकारी माध्यम, मंच भी ऐसे लोगों को सामने लाने का काम करते हैं जो पहले से किसी न किसी परदे की शोभा बने हुए हैं.

यहाँ कहने का आशय यह नहीं कि इन कलाकारों के प्रति सम्मान प्रदर्शित न किया जाये, ऐसा भी नहीं कि इनको इज्जत न दी जाये मगर इनके साथ-साथ उनको भी सबके सामने लाने का काम किया जाना चाहिए जो वास्तविक रूप से हमारे रोल मॉडल बन सकते हैं.

06 फ़रवरी 2020

अपने दोस्तों के खजाने में हम भी एक नगीना रहें


आज अभी-अभी बैठे-बिठाए हिन्दी फिल्म छिछोरे देखने को मिली. पूरी फिल्म तो नहीं बस अंत की लगभग बीस-पच्चीस मिनट की. इस फिल्म के बारे में सुन रखा था कि हॉस्टल लाइफ के बारे में है, कॉलेज की कहानी है मगर कभी देखने की न तो इच्छा हुई और न ही देखने का मौका लगा. ऐसा इसलिए क्योंकि हमने खुद जिस तरह की बिंदास और मौज-मस्ती भरी, अल्हड़, बेख़ौफ़, बेफिक्री वाली हॉस्टल लाइफ अपने मित्रों के साथ गुजारी है उसके आगे फ़िल्मी कथानक कई बार फुस्स साबित हो जाता है. इस छिछोरे के अंत को देखकर लगा कि इसमें सिर्फ हॉस्टल की अथवा कॉलेज की कहानी नहीं रही है वरन दोस्तों की आपसी समरसता की, समन्वय की, सामंजस्य की, सहयोग की भी कहानी रही है. इस फिल्म का जितना अंत देखा उसमें उन पुराने मित्रों का एकसाथ रहना, एक-दूसरे के लिए तत्पर खड़े होना समझ आया. उसी के साथ कुछ थोड़ी सी कहानी फ्लैशबैक में चलने पर भी उनका विजय के लिए संघर्ष, लूजर से विनर बनने का किस्सा, एक-दूसरे के लिए जी-जान लगा देने वाली बात दिखाई दी. 


दोस्ती एक महसूस किया जाने वाला ही नहीं वरन उसे पूरी तरह से निभाए जाने वाला एहसास है. किसी भी व्यक्ति के लिए सबसे मजबूत पक्ष उसके दोस्त, उसकी दोस्ती होती है. इस पक्ष की हमें व्यक्तिगत रूप से कभी कमी नहीं रही है. ऐसा नहीं कि सभी दोस्त पूरी तरह से निस्वार्थ भावना के मिले. कुछ लोग तो मित्रता के नाम पर लगातार संपर्क में रहे मगर मित्रभाव रहित रहे. समय के साथ उन्होंने अपना चोला बदला और वे वापस सिर्फ एक परिचित की भांति ही नजर आने लगे. बहरहाल, ऐसे लोगों की चर्चा का यहाँ कोई अर्थ भी नहीं और न ही ऐसे लोगों का यहाँ कोई सन्दर्भ. जीवन के विभिन्न पड़ावों से गुजरते रहने के दौरान विभिन्न मित्र हमारे साथ जुड़ते रहे. ये वाकई ऐसे मित्र हैं जो आज भी हमारे साथ हैं. ये और बात है कि समय के चलते हमारे बीच स्थानिक दूरी बनी हुई हो मगर आत्मिक दूरी कतई नहीं है. इस फिल्म में दोस्ती वाली गंभीर भावना को देखकर लगा कि यदि किसी व्यक्ति के साथ, व्यक्ति के पास दोस्तों का साथ है, सच्ची दोस्ती का साथ है तो वह कभी अकेले नहीं हो सकता है. उसके अकेले रहने या कहें कि उसके अकेले रहने की चाह रखने को उसके दोस्त समाप्त कर देंगे. किसी संकट के समय, मुसीबत में, आपदा में यही मित्र संबल बनते हैं, आत्मविश्वास बढ़ाते हैं, आत्मबल में वृद्धि करते हैं.

जिस गंभीरता से, जिस सहयोग की भावना से, जिस निस्वार्थ भाव से हमारे बहुत से सच्चे दोस्त हमारे साथ आज भी हैं, आज भी हमारी एक आवाज़ पर अपनी पूरी तत्परता से साथ खड़े दिखाई देते हैं वह निस्संदेह गर्व करने योग्य है. कुछ मित्र तो बचपन से अभी तक साथ हैं. ‘लंगोटिया मित्रों ने भले ही लंगोट बदल ली हों मगर दोस्ती को न बदला, दोस्त को न छोड़ा’ ऐसा हम अक्सर हँसी-मजाक में अपने दोस्तों का परिचय करवाते समय गर्व से कह देते हैं. कोशिश हमारी तरफ से भी यही रहती है कि हमारा कोई दोस्त जब हमारी अनुपस्थिति में हमारी बात करे तो उसे गर्व की अनुभूति हो. कोशिश यही रहती है कि जिसे हम अपना दोस्त मानते हैं उसे किसी बुरे वक्त का शिकार ही न होने दें. प्रयास यही रहता है कि हमारा कोई दोस्त हमारे रहते अकेला महसूस न करे.

ऐसा सिर्फ हमारा ही नहीं वरन हम सभी का प्रयास होना चाहिए कि हम सभी आपस में मित्रभाव का सम्मान करें. जिन्हें अपना दोस्त मानते हैं, जो हमें अपना दोस्त मानते हैं उनके साथ पूर्ण समर्पण और ईमानदारी से जुड़ें. दोस्ती एक ऐसा रिश्ता होता है जो बिना किसी रक्त-सम्बन्ध के, बिना किसी नाम के, बिना किसी मतलब के सालों-साल, आजीवन आगे बढ़ता है. समय के साथ यही रिश्ता प्रगाढ़ होता जाता है. मित्रता की पूँजी अनमोल है और हमें गर्व है कि हमारे खजाने में अनमोल नगीने बराबर बने हुए हैं. और चाहते हैं कि अपने दोस्तों के खजाने में हम भी एक नगीना बने रहें.



08 जनवरी 2020

फिल्म नहीं उसके दर्द के एहसास ने लोगों को जोड़ा है


जिस जेएनयू मारपीट विवाद को सरकार, शासन, प्रशासन, मीडिया शांत नहीं कर पा रहे थे उसे एक झटके में फिल्म अभिनेत्री दीपिका ने खामोश कर दिया. जेएनयू में हुए मारपीट सम्बन्धी विवाद के बाद दीपिका कथित टुकड़े गैंग से मिलने विश्वविद्यालय पहुँच गईं. दीपिका का वहाँ पहुँचना हुआ नहीं कि एक ऐसे गुट द्वारा, जो टुकड़े गिरोह का विरोध करता रहा है, दीपिका की फिल्म छपाक का बहिष्कार करने का ऐलान कर दिया. इस बहिष्कार की घोषणा सोशल मीडिया के द्वारा सबसे अधिक चर्चा में आ गई. दीपिका की तरफ से कुछ टिप्पणी आती उसके पहले ऐसे गुट के विचार सामने आने लगे जो किसी न किसी रूप में कथित गिरोह के पक्षधर बने हुए हैं. अचानक से इस गुट को समझ आने लगा कि यह फिल्म जागरूकता के लिए बनाई गई है. इसी गुट को अचानक से आभास हुआ कि इस फिल्म का मकसद एक एसिड अटैक पीड़ित के दर्द को, उसकी पीड़ा को दिखाना है.


दीपिका के इस कदम के क्या परिणाम होंगे, एक गुट द्वारा फिल्म बहिष्कार का क्या अंजाम होगा यह तो फिल्म रिलीज के बाद पता चलेगा. इसके बाद भी यदि संक्षेप में सारे घटनाक्रम का अवलोकन किया जाये तो साफ़ सी बात है कि फिल्म का निर्माण किसी भी रूप में सामाजिक जागरूकता के लिए, सामाजिक सन्देश देने के लिए, लक्ष्मी अग्रवाल की सहायता के लिए या फिर किसी अन्य एसिड अटैक पीड़ित की सहायता के लिए नहीं किया गया है. असल में छपाक लक्ष्मी अग्रवाल की कहानी है जो एसिड हमले का शिकार हुई थी. विगत कई वर्षों में उसने व्यक्तिगत रूप से अथक मेहनत की है, अपनी जिजीविषा को समाप्त न होने दिया है, अपने संघर्ष को न केवल जिंदा रखा है बल्कि उसे खुद में जिया भी है. लगभग दो वर्ष पहले एक दौर ऐसा भी आया था जबकि उसके सामने खुद के और अपने बेटी के भरण-पोषण की समस्या खड़ी हुई थी. जिस व्यक्ति के सहारे उसने अपनी ज़िन्दगी की जंग को आगे तक ले जाने का विचार बना रखा था वही उसे मझधार में छोड़कर आगे निकल गया था. यह वह दौर था जबकि लक्ष्मी अपने संघर्ष को सोशल मीडिया के द्वारा, अपने मित्रों के द्वारा लगातार चर्चा में बनाये हुए थी. स्टॉप सेल एसिड (#stopsaleacid) अभियान के सहारे उसने हजारों लोगों से खुद को जोड़ने का काम किया. हजारों लोग बिना किस फिल्म के द्वारा संवेदित हुए, खुद पर एसिड की तीव्रता का एहसास किये बिना ही अनेक लोग खुद लक्ष्मी के संपर्क में आये, उसके अभियान का हिस्सा बने. हम स्वयं भी उसके इस अभियान का हिस्सा बने. तब कहीं भी न फिल्म का विचार था और न ही किसी ऐसे माध्यम के द्वारा सामाजिक जागरूकता लाने का, सामाजिक सन्देश देने का विचार था. 

असल में फिल्मकारों ने हालिया दौर में ऐसे मुद्दों पर फिल्म बनाना शुरू कर दिया है जो किसी न किसी रूप में जनता को आंदोलित किये हों. ऐसे किसी भी मुद्दे पर जिससे जनता, समाज सीधे तौर पर जुड़ता दिखा है, फिल्मकारों ने उस विषय पर तत्काल फिल्म बनाकर पेश कर दी. छपाक भी उसी रणनीति का एक हिस्सा मात्र है. यह विचार करने वाली बात है कि जिस लक्ष्मी अग्रवाल के साथ एसिड हमले की घटना वर्ष 2005 की है उसके लिए फिल्म इंडस्ट्री आज वर्ष 2019 में जाग रही है. आखिर ऐसा क्यों? ऐसी देरी क्यों? कहीं न कहीं इसके पीछे लक्ष्मी का वह संघर्ष का उत्कर्ष है जो विगत दो सालों में हुआ है. उसकी कहानी कोई छिपी कहानी नहीं थी जो एकाएक आज सामने आई. उसका संघर्ष कोई एक दिन का संघर्ष नहीं जो अचानक सामने आ गया. असल में स्टॉप सेल एसिड अभियान के द्वारा लक्ष्मी ने देशव्यापी सन्देश देने का काम किया. इस दौरान उसके संपर्क में अनेक लोग आये. अनेक स्थानों पर, शहरों में उसके समर्थन में छोटे-बड़े आयोजन हुए. उसकी इस प्रसिद्धि को फिल्म इंडस्ट्री ने तत्काल अपने पक्ष में भुनाने का विचार करके सम्बंधित कदम उठा डाला.

अब जबकि दीपिका के कदम से जेएनयू मारपीट विवाद शांत हो गया है और फिल्म के बहिष्कार का विवाद छिड़ गया है तब यह भी जानना आवश्यक हो जाता है कि क्या महज फिल्म ही अब सामाजिक सन्देश देने का काम करेंगी? आखिर जब फिल्म न बनी थी तब कैसे हजारों लोग लक्ष्मी के दर्द का एहसास करते हुए उसके साथ जुड़ गए थे? पूरी तरह से व्यावसायिक मुद्दे को महज व्यावसायिक रूप में ही देखा जाना चाहिए. एक पक्ष है जो किसी भी रूप में समाज में अपनी फिल्म की पब्लिसिटी चाहता है. एक पक्ष है जो कथित गैंग के चलते उस फिल्म का बहिष्कार कर रहा है. एक पक्ष है जो इस बहिष्कार का विरोध करके सरकार पर निशाना साधने का काम कर रहा है. इन सारे पक्षों के बीच लक्ष्मी को अकेले नहीं छोड़ना है क्योंकि उसके संघर्ष की अपनी ही कहानी है जो किसी भी फिल्म से अपना अंजाम नहीं पा सकती.

29 दिसंबर 2018

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या आपातकाल


अभी तक फिल्म का ट्रेलर देखने के अलावा कुछ और देखने को नहीं मिला मगर इसके साथ जिस तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं उनसे लग रहा है कि कहीं कुछ है जो हलचल मचाएगा. जिस फिल्म की चर्चा की जा रही है वह एक किताब पर आधारित है और वह किताब एक व्यक्ति पर आधारित है. देश के इतिहास में वह कालखंड दर्ज किया जा चुका है और उस कालखंड को सभी ने देखा भी है, उसका एहसास भी किया है. इसे लेकर लोगों में कौतूहल इसलिए भी है क्योंकि सम्बंधित किताब का रचनाकार कोई ऐसा नहीं है जिसने महज ख्याली पुलाव पकाते हुए कल्पना और वास्तविकता का सम्मिश्रण किया है. सभी को पता है कि सम्बंधित किताब का लेखक सम्बंधित व्यक्ति से अत्यंत करीब से एक-दो नहीं वरन चार साल जुड़ा रहा, वो भी मीडिया सलाहकार के रूप में. ऐसे में स्पष्ट है कि अगले ने बहुत करीब से सम्बंधित व्यक्ति को देखा-सुना है. उनके साथ होने वाली पल-पल की घटनाओं का न केवल दर्शन किया है वरन उनका विश्लेषण भी किया है. ऐसे में पुस्तक पर आधारित फिल्म को महज कल्पना या मसाला कहकर ख़ारिज नहीं किया जा सकता है. 


अब जबकि महज ट्रेलर आने के बाद से विवाद सामने आने लगे हैं, ऐसा भी सुनाई दे रहा है कि कुछ राज्यों में इस फिल्म को प्रतिबंधित किया जा रहा है तब बहुत सहजता से पूछा जाना चाहिए कि आखिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्या अर्थ है? जो लोग विगत चार वर्षों से देश में अघोषित इमरजेंसी जैसे हालातों की बात करते दिख रहे हैं, वे बताने का कष्ट करें कि इस तरह की हरकतों को क्या कहा जाये? हालाँकि अभी ऐसी खबरों का कोई प्रामाणिक आधार नहीं है क्योंकि फिल्म का रिलीज होना अभी शेष है. इसके बाद भी जिस तरह से सोशल मीडिया में इस फिल्म के ट्रेलर पर लोगों की बौखलाहट दिखाई दे रही है वह साबित करता है कि सच्चाई कहाँ तक है. अभी अंतिम निष्कर्ष निकाल देना गलत होगा, फ़िलहाल तो इंतजार रिलीज का है. उसी के बाद दूध का दूध, पानी का पानी होगा. इसके बाद भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खानदान आधारित दल अपनी नौटंकी अवश्य ही दिखायेगा, इसका पूर्ण विश्वास है.

21 मई 2018

ओरछा बुन्देलखण्ड में भारतीय फिल्म समारोह


बुन्देलखण्ड सदैव से अनेकानेक रत्नों से सुशोभित रहा है. शौर्य, सम्मान, कला, संस्कृति, साहित्य, सामाजिकता आदि में यहाँ विलक्षणता देखने को मिलती आई है. यहाँ के निवासी अपने-अपने स्तर पर बुन्देलखण्ड की संस्कृति को उत्कर्ष पर ले जाने का कार्य करते रहते हैं. इसी कड़ी में बुन्देलखण्ड निवासी फिल्म अभिनेता राजा बुन्देला द्वारा ओरछा में इस वर्ष, 2018 में भारतीय फिल्म समारोह का आयोजन किया गया. पाँच दिवसीय यह आयोजन 18 मई से लेकर 22 मई तक होना है. राजा बुन्देला फिल्मों की दृष्टि से जाना-पहचाना नाम है और उनकी एक विशेषता यह भी है कि मुम्बई में रहने के बाद भी वे बराबर, नियमित रूप से बुन्देलखण्ड से सम्पर्क बनाये हुए हैं. बुन्देलखण्ड राज्य की माँग में भी उनकी आवाज़ सुनाई देती है. फ़िलहाल, उनके बारे में फिर कभी, अभी उनके इस भागीरथ प्रयास के बारे में कुछ चर्चा कर ली जाये.

रुद्राणी कलाग्राम, ओरछा का विहंगम दृश्य 


बुन्देलखण्ड की उस पावन धरा में, जहाँ श्रीराम राजा रूप में विराजमान हैं, भारतीय फिल्म समारोह का आयोजन अपने आपमें सुखद एहसास जगाता है. ओरछा में राजा बुन्देला द्वारा स्थापित, संस्कारित ‘रुद्राणी कलाग्राम’ में पाँच दिवसीय फिल्म समारोह का आयोजन निश्चित ही बुन्देलखण्ड की उन प्रतिभाओं को एक मंच देगा, जो स्व-प्रोत्साहन, स्व-संसाधनों से फिल्म निर्माण में सक्रिय हैं. ऐसे ही सक्रिय लोगों में शामिल झाँसी के संजय तिवारी ने बुन्देलखण्ड फिल्म एसोसिएशन के बैनर तले वर्ष 2016 में बुन्देलखण्ड फिल्म महोत्सव का आयोजन किया गया था. उस आयोजन में बुन्देलखण्ड क्षेत्र में निर्मित लघु-फिल्मों को देखकर फिल्म समीक्षकों को आभास हुआ कि बुन्देलखण्ड क्षेत्र में फिल्म निर्माण में अपार संभावनाएं हैं. ऐसे में राजा बुन्देला और उनकी पत्नी सुष्मिता मुखर्जी (जो फ़िल्मी दुनिया का जाना-पहचाना नाम है) का प्रयास बॉलीवुड तक बुन्देलखण्ड की फिल्म प्रतिभा की गूँज को ले जायेगा.


ओरछा में बेतवा नदी के किनारे लम्बे-चौड़े प्राकृतिक क्षेत्र में फैले रुद्राणी कलाग्राम में भारतीय फिल्म समारोह के लिए दो टपरा टॉकीज बनाई गईं हैं. टपरा टॉकीज एक तरह की अस्थायी व्यवस्था होती है जो बाहर से महज एक विशालकाय तम्बू जैसी प्रतीत होती है मगह अन्दर से पूरी तरह से किसी हॉल का एहसास कराती है. एक टपरा टॉकीज में बुन्देलखण्ड क्षेत्र में बनी फिल्मों का प्रदर्शन किया जा रहा है और दूसरी में हिन्दी फीचर फ़िल्में दिखाई जा रही हैं. इसके साथ-साथ सांध्यकालीन सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के लिए सुरम्य प्राकृतिक वातावरण में, हरे-भरे घने वृक्षों के आँचल में मुक्ताकाशी मंच का निर्माण किया गया है. रुद्राणी कलाग्राम में दिन का आरम्भ योग के साथ होता है और फिर अलग-अलग निर्धारित स्थानों पर, निर्धारित समय पर अलग-अलग कार्यक्रम संचालित होने लगते हैं. टपरा टॉकीज में फिल्मों का प्रदर्शन होता है. कार्यशाला स्थल पर बाहर से आये विषय-विशेषज्ञ फिल्मों से सम्बंधित तकनीकी जानकारी प्रशिक्षुओं को प्रदान करते हैं. कलाग्राम के दूसरी ओर बने स्थल पर फिल्म से सम्बंधित विषय पर आख्यान की भी व्यवस्था है. जहाँ फ़िल्मी दुनिया के रोहिणी हट्टंगड़ी, रजत कपूर, केतन आनंद, नफीसा अली जैसे नामचीन कलाकार सबसे रू-ब-रू होते हैं.

नाटक तीसरा कम्बल 

दिन भर की गतिविधियों का सञ्चालन नियंत्रित रूप में हो रहा है. सबकुछ यथावत चलता देखकर अच्छा लगा. एक अकेले व्यक्ति राजा बुन्देला के प्रयास और उनके छोटी सी टीम के समर्पण से यह समारोह सुखद अनुभूति दे रहा है. यद्यपि इस पहले प्रयास में कुछ कमियां भी देखने को मिलीं तथापि वे इस कारण नकारने योग्य हैं क्योंकि एक तो यह पहला प्रयास है, दूसरे बिना किसी तरह की आर्थिक मदद के इतना बड़ा आयोजन करवाना अपने आपमें जीवट का काम है. राजा बुन्देला और उनकी पत्नी सुष्मिता मुखर्जी इन कमियों को देख-महसूस कर रहे हैं और अगले आयोजन में इनको सुधारने की इच्छाशक्ति भी व्यक्त करते हैं. यही संकल्पशक्ति ही ऐसे समारोहों का भविष्य तय करती है. राष्ट्रीय स्तर के ओरछा में आयोजित इस पहले फिल्म समारोह में निश्चित ही कमियाँ दिखेंगी किन्तु जिस स्तर का समारोह हो रहा है, जिस तरह का उद्देश्य लेकर समारोह संचालित है, जिस तरह का मंच कलाकारों को प्रदान किया जा रहा है उससे आने वाले समय में निश्चित ही बुन्देलखण्ड को, यहाँ के कलाकारों को फिल्म क्षेत्र में उत्कृष्ट पहचान मिलेगी. 



03 मई 2018

अबोल से सबोल होते हुए वाचाल तक


सिनेमा, फिल्म ये शब्द जैसे ही चर्चा में आते हैं हमारे मन-मष्तिष्क में तुरन्त जो तस्वीर उभरती है उसमें एक बड़ा सा हॉल, उसमें लगा एक बड़ा सा पर्दा, पर्दे पर रंगीनियाँ बिखेरते हीरो-हीरोइन और इनके प्यार के समानान्तर चलती हिंसा-मारपीट-सेक्स-अश्लीलता की दुनिया. फिल्म की छवि इतने पर ही पूर्ण नहीं होती है.  कल्पना की उड़ान आगे जाकर एक-दो रोमांटिक गीतों और एक-दो आइटम सांग की ओर जाती है जहाँ कोई हसीन अदाकारा अपने जिस्म की नुमाइश करती हुई हंगामे के बीच दोहरी हो-होकर दर्शकों का मनोरंजन करती है. वर्तमान में फिल्म की परिभाषा इतने तक सीमित होकर दिखती है. फिल्मों का जो वर्तमान स्वरूप हमारे सामने है वह सदैव से ही ऐसा नहीं था और ऐसा भी नहीं है कि वर्तमान पीढ़ी के सभी फिल्मकार हिंसा-सेक्स-देह प्रदर्शन-फूहड़ नृत्य, गीतों के सहारे ही फिल्मों का निर्माण कर रहे हैं. वर्तमान में भी फिल्मकारों का एक वर्ग ऐसा भी है जो चलताऊ फिल्मों की श्रृंखला से इतर बौद्धिक, कलात्मक फिल्मों का निर्माण कर रहा है. इसके बाद भी नये फिल्मकारों में से अधिकांश स्वस्थ, स्वस्थ, मनोरंजक, संदेशप्रधान फिल्मों का निर्माण करना नहीं चाहते हैं.

देखने में आया है कि हमारे पास फिल्मों से सम्बन्धित तकनीकी साहित्य के अतिरिक्त सामाजिक-मनोवैज्ञानिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से सम्बंधित साहित्य का सर्वथा अभाव रहा है. इस अभाव के कारण ही सिनेमा के प्रारम्भिक बाइस्कोपिक दौर से वर्तमान तक की तकनीकी सम्पन्न फिल्मों की विकास-यात्रा को हम देख-समझ नहीं पाते हैं. सिनेमा के इस बाइस्कोपिक संस्करण का आविष्कार तो 19वीं सदी में ही हुआ था किन्तु इसका विकास और सर्वमान्य स्वरूप 20वीं सदी के आरम्भिक दशकों में ही सामने आया. प्रारम्भ में तस्वीरों के माध्यम से फिल्मी संस्करण का आनन्द उठाने वाले केवल कुछ शौकिया एवं धनाढ्य लोग ही थे. सिनेमा का जो रूप आज हम देख रहे हैं उसकी शुरुआत उसके अबोल रहने से हुई थी. थॉमस एल्वा एडिसन के फोटोग्राफ और बिजली के आविष्कार ने चलती-फिरती तस्वीर को मूर्तरूप देने का कार्य किया और इसी प्रयास में सिनेटोस्कोप नामक मशीन का निर्माण भी किया गया. परिणामतः सबसे पहली चलती-फिरती तस्वीर अमेरिका में 23 अप्रैल 1896 को दिखाई गई. अमरीका से चली फिल्म यात्रा को भारत में विराम मिला 07 जुलाई 1896 को जब लुमिचेर बंधुओं ने बम्बई नगर के वाट्सन होटल में अपना पहला चलचित्र शो किया.


भारतीय सिनेमा में इस अद्भुत और करिश्माई तकनीक का उपयोग विदेशियों के द्वारा अथवा विदेशियों की मदद से होता आ रहा था. सिर्फ और सिर्फ भारतीय तकनीशियनों द्वारा पूरी लम्बाई की पहली फिल्म का निर्माण सन् 1913 में किया गया. राजा हरिश्चन्द्र के नाम से पहला पूर्ण भारतीय चित्र निर्माण का श्रेय दादासाहब फाल्के को जाता है, जिन्होंने तमाम सारी आर्थिक कठिनाइयों से संघर्ष करते हुए भी इस पूर्णतः भारतीय फिल्म का निर्माण किया. चूँकि तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों के कारण कोई महिला फिल्मों में काम नहीं करना चाहती थी, यहाँ तक कि पेशेवर स्त्रियाँ भी फिल्मों में काम करना पसंद नहीं करती थीं. कुछ इस तरह की समस्या पुरुषों के साथ भी थी, वे उस समय मूँछों को कटवाना अपनी शान के खिलाफ मानते थे और इसी कारण से वे भी स्त्रियों की भूमिका में आना पसंद नहीं करते थ. विषम परिस्थितियों में किसी तरह अभिनेता सालुंके स्त्री की भूमिका में आने को तैयार हुए.

फिल्म निर्माण के क्षेत्र में विकास भी हो रहा था और अपनी तरह का नया स्वरूप भी सामने आ रहा था. इसी छटपटाहट का परिणाम यह हुआ कि गूँगी फिल्मों को आवाज मिली. इम्पीरियल फिल्म कम्पनी द्वारा आलमआरा का पहला शो 14 मार्च 1931 को बम्बई के मैजेस्टिक सिनेमा में हुआ था. इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा के गूँगेपन को दूर किया. आलमआरा फिल्म की अद्भुत सफलता ने फिल्मकारों को अतिउत्साहित किया और तत्कालीन फिल्मों में नाच-गाने तथा मनोरंजन की बाढ़ सी आ गई. शीरीं फरहाद फिल्म में 42 गाने और इन्द्रसभा में 72 गानों का होना अपने आपमें एक कीर्तिमान ही है. गूँगी फिल्मों से बोलती फिल्मों की तकनीक विकसित होते ही फिल्म निर्माण का ढर्रा भी बदला. न्यू थियेटर्स, बंबई टाकीज, प्रभात, नवयुग चित्र, प्रकाश, मिनर्वा आदि जैसी फिल्म कम्पनियों के द्वारा प्रयोजनपूर्ण फिल्मों का निर्माण किया जा रहा था. हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बनी रोटी, साहित्यिक कृति पर बनी चित्रलेखा, भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन पर आधारित धरती के लाल आदि फिल्मों का निर्माण सोद्देश्यपूर्ण विषय-कहानी जैसी विचारधारा रखने वालों के कारण ही हो सका था.

इन सबके बीच कुछ निर्माताओं-निर्देशकों ने व्यवस्था की पोल खोलते हुए प्रशासनिक, राजनीतिक भ्रष्टाचार को सामने रखते हुए वास्तविकता को प्रदर्शित करने का हौसला दिखाया. अपने आसपास के भ्रष्टाचार, अत्याचार का पर्दे पर समाधान होता देखकर दर्शकों ने इसे पसंद किया तो निर्माता-निर्देशकों ने वास्तविकता का, जीवन की सच्चाई की ताना-बाना कसते हुए इस सार्थकता के बीच भौंड़ापन पसार कर रख दिया. जीवन की सच्चाई दिखाने के नाम पर आम आदमी का पर्दे के पीछे का जीवन पर्दे पर उभरने लगा. सेक्स का, देह का खुला प्रदर्शन, अश्लील गीतों-नृत्यों-भावभंगिमाओं के साथ अश्लील संवादों की अतिरंजिता फिल्मों में दिखाई देने लगी. कभी अश्लील और द्विअर्थी संवादों के लिए विवादास्पद रहे दादा कोंड़के से भी ऊपर जाकर वर्तमान फिल्मकारों ने इस अश्लीलता और द्विअर्थी शब्दावली को सीधे-सीधे फिल्मों में स्थान दे दिया.  चोली के पीछे क्या है, एक चुम्मा तू मुझको उधार दे दे, सरकाय लेओ खटिया, ए गनपत चल दारू लगा जैसे गानों के बोल और फिल्मों की संवाद अदायगी ने बोलती फिल्मों को वाचाल स्वरूप प्रदान किया.

यही सिनेमाई शक्ति, विचारों और आदर्शों का प्रचार-प्रसार आज कम होता दिख रहा है. जहाँ रंग दे बसंती, तारे जमीं पर, थ्री इडियट्स, वेलकम टू सज्जनपुर, न्यूयार्क जैसी साफ सुथरी और विषय-विशेष को आधार बनाकर बनी फिल्मों से सुखद अनुभूति होती दिखती है वहीं कमीने, कम्पनी जैसी फिल्मों की प्रेतछाया डराती भी है. ऐसी फिल्मों की प्रेतछाया से दर्शक ही भयभीत नहीं है वरन् अच्छी फिल्में भी इनके भय से विलुप्त सी हो जाती हैं. सामाजिक विद्रूपता को फिल्मकार द्वारा एक नये प्रकार का चमकदार मुलम्मा चढ़ाकर पेश किया जा रहा है. जनता की भावाभिव्यक्ति को फिल्मकार अपने लाभ के लिए प्रयोग कर रहे हैं. बुद्धिजीवी सुसुप्तावस्था में पड़े फिल्मों की वाचालता देख समाज में होता व्याभिचार देख रहे हैं. खामोशी समाज के जागरूक वर्ग के होठों पर है और समाज की वास्तविकता का मायाजाल दिखाकर समाज को भरमाने वाले फिल्मकारों की जुबान बोलती है और कहती है -गोली मार भेजे में, भेजा शोर करता है....