03 May 2018

अबोल से सबोल होते हुए वाचाल तक


सिनेमा, फिल्म ये शब्द जैसे ही चर्चा में आते हैं हमारे मन-मष्तिष्क में तुरन्त जो तस्वीर उभरती है उसमें एक बड़ा सा हॉल, उसमें लगा एक बड़ा सा पर्दा, पर्दे पर रंगीनियाँ बिखेरते हीरो-हीरोइन और इनके प्यार के समानान्तर चलती हिंसा-मारपीट-सेक्स-अश्लीलता की दुनिया. फिल्म की छवि इतने पर ही पूर्ण नहीं होती है.  कल्पना की उड़ान आगे जाकर एक-दो रोमांटिक गीतों और एक-दो आइटम सांग की ओर जाती है जहाँ कोई हसीन अदाकारा अपने जिस्म की नुमाइश करती हुई हंगामे के बीच दोहरी हो-होकर दर्शकों का मनोरंजन करती है. वर्तमान में फिल्म की परिभाषा इतने तक सीमित होकर दिखती है. फिल्मों का जो वर्तमान स्वरूप हमारे सामने है वह सदैव से ही ऐसा नहीं था और ऐसा भी नहीं है कि वर्तमान पीढ़ी के सभी फिल्मकार हिंसा-सेक्स-देह प्रदर्शन-फूहड़ नृत्य, गीतों के सहारे ही फिल्मों का निर्माण कर रहे हैं. वर्तमान में भी फिल्मकारों का एक वर्ग ऐसा भी है जो चलताऊ फिल्मों की श्रृंखला से इतर बौद्धिक, कलात्मक फिल्मों का निर्माण कर रहा है. इसके बाद भी नये फिल्मकारों में से अधिकांश स्वस्थ, स्वस्थ, मनोरंजक, संदेशप्रधान फिल्मों का निर्माण करना नहीं चाहते हैं.

देखने में आया है कि हमारे पास फिल्मों से सम्बन्धित तकनीकी साहित्य के अतिरिक्त सामाजिक-मनोवैज्ञानिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से सम्बंधित साहित्य का सर्वथा अभाव रहा है. इस अभाव के कारण ही सिनेमा के प्रारम्भिक बाइस्कोपिक दौर से वर्तमान तक की तकनीकी सम्पन्न फिल्मों की विकास-यात्रा को हम देख-समझ नहीं पाते हैं. सिनेमा के इस बाइस्कोपिक संस्करण का आविष्कार तो 19वीं सदी में ही हुआ था किन्तु इसका विकास और सर्वमान्य स्वरूप 20वीं सदी के आरम्भिक दशकों में ही सामने आया. प्रारम्भ में तस्वीरों के माध्यम से फिल्मी संस्करण का आनन्द उठाने वाले केवल कुछ शौकिया एवं धनाढ्य लोग ही थे. सिनेमा का जो रूप आज हम देख रहे हैं उसकी शुरुआत उसके अबोल रहने से हुई थी. थॉमस एल्वा एडिसन के फोटोग्राफ और बिजली के आविष्कार ने चलती-फिरती तस्वीर को मूर्तरूप देने का कार्य किया और इसी प्रयास में सिनेटोस्कोप नामक मशीन का निर्माण भी किया गया. परिणामतः सबसे पहली चलती-फिरती तस्वीर अमेरिका में 23 अप्रैल 1896 को दिखाई गई. अमरीका से चली फिल्म यात्रा को भारत में विराम मिला 07 जुलाई 1896 को जब लुमिचेर बंधुओं ने बम्बई नगर के वाट्सन होटल में अपना पहला चलचित्र शो किया.


भारतीय सिनेमा में इस अद्भुत और करिश्माई तकनीक का उपयोग विदेशियों के द्वारा अथवा विदेशियों की मदद से होता आ रहा था. सिर्फ और सिर्फ भारतीय तकनीशियनों द्वारा पूरी लम्बाई की पहली फिल्म का निर्माण सन् 1913 में किया गया. राजा हरिश्चन्द्र के नाम से पहला पूर्ण भारतीय चित्र निर्माण का श्रेय दादासाहब फाल्के को जाता है, जिन्होंने तमाम सारी आर्थिक कठिनाइयों से संघर्ष करते हुए भी इस पूर्णतः भारतीय फिल्म का निर्माण किया. चूँकि तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों के कारण कोई महिला फिल्मों में काम नहीं करना चाहती थी, यहाँ तक कि पेशेवर स्त्रियाँ भी फिल्मों में काम करना पसंद नहीं करती थीं. कुछ इस तरह की समस्या पुरुषों के साथ भी थी, वे उस समय मूँछों को कटवाना अपनी शान के खिलाफ मानते थे और इसी कारण से वे भी स्त्रियों की भूमिका में आना पसंद नहीं करते थ. विषम परिस्थितियों में किसी तरह अभिनेता सालुंके स्त्री की भूमिका में आने को तैयार हुए.

फिल्म निर्माण के क्षेत्र में विकास भी हो रहा था और अपनी तरह का नया स्वरूप भी सामने आ रहा था. इसी छटपटाहट का परिणाम यह हुआ कि गूँगी फिल्मों को आवाज मिली. इम्पीरियल फिल्म कम्पनी द्वारा आलमआरा का पहला शो 14 मार्च 1931 को बम्बई के मैजेस्टिक सिनेमा में हुआ था. इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा के गूँगेपन को दूर किया. आलमआरा फिल्म की अद्भुत सफलता ने फिल्मकारों को अतिउत्साहित किया और तत्कालीन फिल्मों में नाच-गाने तथा मनोरंजन की बाढ़ सी आ गई. शीरीं फरहाद फिल्म में 42 गाने और इन्द्रसभा में 72 गानों का होना अपने आपमें एक कीर्तिमान ही है. गूँगी फिल्मों से बोलती फिल्मों की तकनीक विकसित होते ही फिल्म निर्माण का ढर्रा भी बदला. न्यू थियेटर्स, बंबई टाकीज, प्रभात, नवयुग चित्र, प्रकाश, मिनर्वा आदि जैसी फिल्म कम्पनियों के द्वारा प्रयोजनपूर्ण फिल्मों का निर्माण किया जा रहा था. हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बनी रोटी, साहित्यिक कृति पर बनी चित्रलेखा, भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन पर आधारित धरती के लाल आदि फिल्मों का निर्माण सोद्देश्यपूर्ण विषय-कहानी जैसी विचारधारा रखने वालों के कारण ही हो सका था.

इन सबके बीच कुछ निर्माताओं-निर्देशकों ने व्यवस्था की पोल खोलते हुए प्रशासनिक, राजनीतिक भ्रष्टाचार को सामने रखते हुए वास्तविकता को प्रदर्शित करने का हौसला दिखाया. अपने आसपास के भ्रष्टाचार, अत्याचार का पर्दे पर समाधान होता देखकर दर्शकों ने इसे पसंद किया तो निर्माता-निर्देशकों ने वास्तविकता का, जीवन की सच्चाई की ताना-बाना कसते हुए इस सार्थकता के बीच भौंड़ापन पसार कर रख दिया. जीवन की सच्चाई दिखाने के नाम पर आम आदमी का पर्दे के पीछे का जीवन पर्दे पर उभरने लगा. सेक्स का, देह का खुला प्रदर्शन, अश्लील गीतों-नृत्यों-भावभंगिमाओं के साथ अश्लील संवादों की अतिरंजिता फिल्मों में दिखाई देने लगी. कभी अश्लील और द्विअर्थी संवादों के लिए विवादास्पद रहे दादा कोंड़के से भी ऊपर जाकर वर्तमान फिल्मकारों ने इस अश्लीलता और द्विअर्थी शब्दावली को सीधे-सीधे फिल्मों में स्थान दे दिया.  चोली के पीछे क्या है, एक चुम्मा तू मुझको उधार दे दे, सरकाय लेओ खटिया, ए गनपत चल दारू लगा जैसे गानों के बोल और फिल्मों की संवाद अदायगी ने बोलती फिल्मों को वाचाल स्वरूप प्रदान किया.

यही सिनेमाई शक्ति, विचारों और आदर्शों का प्रचार-प्रसार आज कम होता दिख रहा है. जहाँ रंग दे बसंती, तारे जमीं पर, थ्री इडियट्स, वेलकम टू सज्जनपुर, न्यूयार्क जैसी साफ सुथरी और विषय-विशेष को आधार बनाकर बनी फिल्मों से सुखद अनुभूति होती दिखती है वहीं कमीने, कम्पनी जैसी फिल्मों की प्रेतछाया डराती भी है. ऐसी फिल्मों की प्रेतछाया से दर्शक ही भयभीत नहीं है वरन् अच्छी फिल्में भी इनके भय से विलुप्त सी हो जाती हैं. सामाजिक विद्रूपता को फिल्मकार द्वारा एक नये प्रकार का चमकदार मुलम्मा चढ़ाकर पेश किया जा रहा है. जनता की भावाभिव्यक्ति को फिल्मकार अपने लाभ के लिए प्रयोग कर रहे हैं. बुद्धिजीवी सुसुप्तावस्था में पड़े फिल्मों की वाचालता देख समाज में होता व्याभिचार देख रहे हैं. खामोशी समाज के जागरूक वर्ग के होठों पर है और समाज की वास्तविकता का मायाजाल दिखाकर समाज को भरमाने वाले फिल्मकारों की जुबान बोलती है और कहती है -गोली मार भेजे में, भेजा शोर करता है....


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