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04 अप्रैल 2017

बिना प्रोत्साहन कैशलेस व्यवस्था संभव नहीं

नोटबंदी के बाद सरकार लगातार कैशलेस अर्थव्यवस्था की तरफ ध्यान दे रही है. जनता को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है कि वह अधिक से अधिक लेन-देन डिजिटल माध्यम से करे. इसी कारण से सरकार की तरफ से नकद लेन-देन को हतोत्साहित करने के लिए दो लाख रुपये से अधिक के नकद लेन-देन पर प्रतिबन्ध लगा दिया है. इसका उद्देश्य जहाँ एक तरफ बैंकों में भीड़ को कम करना है वहीं दूसरी ओर इसके द्वारा काला धन, नकली मुद्रा, भ्रष्टाचार को कम करना या रोकना भी है. यह सच है कि यदि समाज में अधिक से अधिक लेन-देन नकदी के स्थान पर डिजिटल माध्यम से होने लगे, इंटरनेट बैंकिंग, क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड, एटीएम आदि का उपयोग अधिक से अधिक होने लगे तो काले धन को, नकली मुद्रा को नियंत्रण में रख पाना सहज हो जायेगा. नोटबंदी के पहले तक जिस तरह से लोगों में नकद लेन-देन के प्रति एक प्रकार का मोह देखने को मिलता था, वो अभी भी दूर नहीं हुआ है. क्रेडिट कार्ड अथवा इंटरनेट बैंकिंग के प्रति अभी भी उतनी जागरूकता नहीं आई है, जितनी की अपेक्षित थी. इसके पीछे एक ओर तो समाज की बहुसंख्यक जनता का डिजिटल माध्यमों के साथ दोस्ताना सम्बन्ध विकसित न कर पाना है. इसके साथ ही साथ सरकारी स्तर पर डिजिटल विनिमय को बढ़ावा देने के लिए भी प्रोत्साहन योजनाओं की जबरदस्त कमी देखने को मिल रही है. इसके उलट सार्वजनिक क्षेत्र के अग्रणी बैंक भारतीय स्टेट बैंक द्वारा नकद जमा-निकासी पर, एटीएम के उपयोग पर अपना ही नया नियम लागू कर दिया गया है. इससे आमजन के नकारात्मक रूप से प्रभावित होने की आशंका बढ़ी है. 


सरकार के साथ-साथ बैंक भी चाहती हैं कि उनके पास कम से कम भीड़ पहुँचे और इसके लिए उनके द्वारा समय-समय पर इस तरह की योजनायें लागू की जाती हैं जो जनता को घर बैठे सुविधाएँ मुहैया कराती हैं. इधर भारतीय स्टेट बैंक द्वारा तीन बार नकद जमा के बाद जमा पर शुल्क लगा दिया है. ये शुल्क नाममात्र को नहीं वरन इतना है कि आम खाताधारक की जेब पर असर डालेगा. यहाँ यदि सरकार का अथवा बैंक का ये विचार हो कि लोगों की नकद जमा-निकासी की सीमा बनाकर उनको डिजिटल विनिमय के लिए प्रोत्साहित किया जा सकेगा तो ऐसा सोचना उसकी भूल है. ऐसा उनके लिए तो सहज हो सकता है जो वेतनभोगी हैं किन्तु उनके लिए कतई सहज नहीं है जिनको महीने भर फुटकर-फुटकर धन मिलता रहता है. ऐसे में ये लोग अपने धन को बैंक में जमा करने के स्थान पर अपने पास ही संग्रहित करके रखना शुरू कर देंगे. ये स्थिति जहाँ एक तरफ डिजिटल विनिमय माध्यम को हतोत्साहित करेगी वहीं दूसरी तरफ धन-संचय की प्रवृत्ति को बढ़ावा देकर मुद्रा को चलन से दूर करेगी. इसके अलावा खाते में न्यूनतम मासिक जमाराशि को लेकर भी भारतीय स्टेट बैंक द्वारा बनाया गया नियम गले से नीचे न उतरने वाला है. चाहे मेट्रो शहर हों अथवा ग्रामीण इलाके, सभी में आमजन की स्थिति ये है कि उसके लिए एक-एक रुपये का महत्त्व होता है. ये देखने में भले ही न्यूनतम राशि समझ आ रही हो किन्तु उनके लिए बहुत बड़ी धनराशि है जिनके पास धनोपार्जन के न्यूनतम अथवा सीमित साधन हैं. ऐसे में न्यूनतम मासिक जमाराशि रखना उनकी मजबूरी हो जाएगी. इस मजबूरी के चलते उनका पारिवारिक बजट गड़बड़ाने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है.



यदि सरकार को अथवा बैंकों को डिजिटल माध्यम को प्रोत्साहित करना है तो उन्हें आमजन को कुछ लाभ देने होंगे. डिजिटल लेन-देन को विकसित करने के लिए सरकार को चाहिए कि क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड आदि से भुगतान करने पर न्यूनतम टैक्स लेने की व्यवस्था समाप्त की जाये. इससे सामान्य उपभोक्ता बड़ी रकम को कार्ड के माध्यम से भुगतान करने से बचता है. इसी तरह इंटरनेट बैंकिंग में भी भुगतान करने पर टैक्स लगाया जाता है. इससे भी उपभोक्ता के अन्दर हिचकिचाहट पैदा होती है. इसके अलावा तकनीकी रूप से अभी इंटरनेट सेवाएँ अभी इतनी उन्नत और सशक्त नहीं हो सकी हैं कि आमजन आर्थिक लेन-देन के लिए इस प्रणाली पर पूर्णरूप से विश्वास करने लगे. आये दिन होती धोखाधड़ी के चलते, एटीएम में धन के फँसने, भुगतान के समय इंटरनेट सेवा बाधित होने के चलते भी उपभोक्ता में भय का माहौल बना रहता है. इससे भी वह डिजिटल माध्यमों से भुगतान के लिए खुद को प्रेरित नहीं कर पाता है. सरकार को, उसके सहयोगी अंगों को चाहिए कि वे पहले मूलभूत सुविधाओं को उन्नत और विकसित करें. कार्ड के लेन-देन के साथ-साथ इंटरनेट बैंकिंग में लगने वाले शुल्क को समाप्त करें. डिजिटल माध्यम से भुगतान करने वालों को किसी तरह से लाभान्वित करें. भारतीय स्टेट बैंक द्वारा लागू किये गए हालिया नियमों को जनहित में, कैशलेस व्यवस्था के हित में तत्काल प्रभाव से रद्द करें. यदि सरकार इस तरह के कदम नहीं उठाती है, जिससे आम उपभोक्ता स्वयं को लाभान्वित महसूस करे, सुरक्षित महसूस करे तब तक डिजिटल माध्यमों को, कैशलेस व्यवस्था को पूर्णरूप से लागू कर पाना दूर की कौड़ी समझ आती है. 

10 दिसंबर 2016

डिजिटल युग ही भविष्य है

ये अपने आपमें कितना विद्रूप है कि एक तरफ देश को विश्वगुरु बनने के सपने देखे जा रहे हैं, दूसरी तरफ आधुनिक तकनीक से वंचित किये जाने की कोशिश भी की जा रही है. केंद्र सरकार द्वारा पाँच सौ रुपये और एक हजार रुपये के नोट बंद किये जाने के बाद से लगातार डिजिटल ट्रांजेक्शन पर जोर दिया जा रहा है. नोटबंदी के दीर्घकालिक परिणाम क्या होंगे और कैसे होंगे ये अभी भविष्य के गर्भ में है लेकिन ये बात स्पष्ट है कि नोटबंदी के बाद से कालेधन पर, जाली मुद्रा पर अवश्य ही अंकुश लगेगा. भविष्य में पुनः जाली मुद्रा का कारोबार देश के अन्दर अपना साम्राज्य न फैला सके इसके लिए सरकार द्वारा लगातार कैशलेस सोसायटी बनाये जाने पर जोर दिया जा रहा है. आम आदमी को खुद प्रधानमंत्री द्वारा संबोधित करके अधिक से अधिक मौद्रिक आदान-प्रदान इलेक्ट्रॉनिक रूप में किये जाने को कहा जा रहा है. आज वैश्विक स्तर पर देखा जाये तो सभी विकसित देशों में लगभग समस्त मौद्रिक आदान-प्रदान इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से किया जाता है. हमारे पडोसी देशों में चीन में भी कैश के रूप में मात्र दस प्रतिशत लेनदेन होता है.


विपक्ष द्वारा जिस तरह से नोटबंदी का विरोध किया जा रहा है, उसकी अपनी राजनीति है. इसके उलट जिस तरह से कैशलेस सोसायटी का विरोध किया जा रहा है, इलेक्ट्रॉनिक ट्रांजेक्शन का विरोध किया जा रहा है वो कहीं न कहीं देश के विकास को बाधित करने जैसा ही है. ऐसे मुद्दे पर देश की सबसे पुरानी पार्टी होने का दम भरने वाली कांग्रेस का विरोध भी हास्यास्पद है. उसे इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि उसी पार्टी के एक पूर्व प्रधानमंत्री द्वारा देश में कम्प्यूटर लाये जाने की बात लगभग सभी के द्वारा एकसमान रूप से की जाती है, उसी के द्वारा तकनीक का विरोध किया जा रहा है. कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों की, सुदूर क्षेत्रों तक इंटरनेट की पहुँच न होने की बात कहकर डिजिटल ट्रांजेक्शन को अनावश्यक बताया जा रहा है. उन सभी लोगों को विचार करना होगा कि आखिर देश में छह दशक से अधिक तक केंद्र की सत्ता संभालने वाली कांग्रेस ने देश के ग्रामीण अंचलों में शिक्षा का, तकनीक का, बैंकों का, विद्युत् व्यवस्था का उचित प्रबंध क्यों नहीं किया?

ये सत्य है कि आज अचानक से देश को कैशलेस बना देना न तो आसान है और न ही उचित है. आज भी देश का बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जो एटीएम का उपयोग करने में घबराता है. आज भी बहुत बड़ा बुद्धिजीवी वर्ग ऐसा है जो नेट बैंकिंग का, इलेक्ट्रॉनिक ट्रांजेक्शन के प्रति शंकित भाव रखता है. आज भी देश में बहुत से भाग ऐसे हैं जहाँ इंटरनेट सुविधा नहीं पहुँच सकी है. ऐसी हालातों में निश्चित ही कैशलेस सोसायटी की अवधारणा एक स्वप्न के समान ही लगती है. इसके बाद भी इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि भविष्य इसी तरह के लेनदेन का है. देश को यदि विश्व के अन्य उन्नत देशों, विकसित देशों के साथ आर्थिक, राजनैतिक, व्यापारिक प्रतिस्पर्धा करनी है; उनके साथ तालमेल बैठाना है तो इस तरह के ट्रांजेक्शन को अपनाना ही होगा. इसके लिए अभी कठिनाइयाँ भले ही सामने दिख रही हों मगर देश के महानगरों के साथ-साथ छोटे-छोटे शहरों, कस्बों, गांवों में ऐसे लोगों को जागरूकता का कार्य करना होगा जो इलेक्ट्रॉनिक ट्रांजेक्शन के बारे में सहज हैं. इस विधि, तकनीक से अपरिचित लोगों को परिचित करवाना पड़ेगा. व्यापारी वर्ग को, नौकरीपेशा वर्ग को, महिलाओं को, संस्थानों को कैशलेस सोसायटी बनाने के लिए अपना सहयोग देना होगा.  


इस देश में हमेशा से आधुनिक तकनीक का अपने स्तर पर विरोध किया जाता रहा है, आज भी हो रहा है. इस विरोध के अपने-अपने राजनैतिक लाभ है मगर कैशलेस सोसायटी के लाभों को समझते हुए अधिकाधिक उपयोग करने पर जोर देना ही होगा. इस तरह के लेनदेन से जहाँ नकद मौद्रिक चलन कम होगा, इससे नकली नोट के बाजार में आने की सम्भावना समाप्त हो जाएगी. इलेक्ट्रॉनिक ट्रांजेक्शन होने से रिश्वतखोरी को, भ्रष्टाचार को रोकने में मदद मिलेगी. सरकारी स्तर पर, निजी स्तर पर आम आदमी को परेशान करने की, काम लटकाए जाने की प्रवृत्ति से छुटकारा मिलेगा. संभव है कि राहजनी, लूटमार आदि की घटनाओं में कमी आये. वैश्विक स्तर पर देश की आर्थिक स्तर पर साख भी मजबूत होगी और देश विकसित देशों के साथ सहजता से प्रतिस्पर्धा कर सकेगा. इसके अलावा बहुत से लाभ ऐसे हैं जो देशहित में हैं और याद रखना चाहिए कि देशहित से ही नागरिकहित बनता है. यदि इसी तरह तकनीक का विरोध होता रहता तो आज देश में कम्प्यूटर का युग न आया होता और देश की अनेक कम्प्यूटर प्रतिभाएं वैश्विक स्तर पर अपना लोहा न मनवा रही होती. आज विरोधी लोग भले ही मोदी के नाम पर, पे टू मोदी के नाम से कटाक्ष करके कैशलेस सोसायटी बनाये जाने का, इलेक्ट्रॉनिक ट्रांजेक्शन का विरोध करें मगर देश के उन्नत, विकसित भविष्य के लिए इसे अपनाना ही होगा. देश को कैशलेस बनना ही होगा, देशवासियों को डिजिटल ट्रांजेक्शन के लिए खुद को तैयार करना ही होगा.