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10 नवंबर 2025

दिल्ली कार धमाका

डॉक्टर सहित तमाम गिरफ्तारियों में हजारों किलो विस्फोटक के पकड़े जाने से हताश आतंकियों या कहें कि हम सबके बीच रह रहे इस्लामिक सफेदपोशों ने दिल्ली वाला कार धमाका करके मासूमों की हत्याएँ कर दीं. ऐसा करने के पीछे इनका उद्देश्य हमारी सुरक्षा व्यवस्था को धता बताना और इन इस्लामिक सफेदपोशों के उन राजनैतिक आकाओं को अपने पक्ष में जगाना है जो कल इनको बचाने के लिए इनके पक्ष में खुल कर उतर आयेंगे.

 

जब तक अदालत कुछ फैसला करे तब तक इन गिरफ्तार लोगों का ख्याल रखा ही जायेगा जेल में.... पूरी सुरक्षा, खान-पान, सुविधा आदि के साथ.


03 सितंबर 2014

भारत सतर्क रहे पाकिस्तान के अंदरूनी बिगड़ते हालातों से



बँटवारे, नफरत, हिंसा आदि की जमीन पर निर्मित पाकिस्तान में जब कुछ समय पूर्व लोकतान्त्रिक सरकार का गठन हुआ तो वहाँ सुखद स्थितियों के बनने का आभास हुआ। लोकतान्त्रिक तरीके से संपन्न चुनाव से हर उस व्यक्ति को पाकिस्तान में कुछ शांति की आशा की किरण दिखाई दी, जो वहाँ की स्थिरता-अस्थिरता को भारतीय सन्दर्भ में देखते हैं। पाकिस्तान में शांति, स्थिरता न केवल पाकिस्तान की दृष्टि से वरन भारतीय परिप्रेक्ष्य में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा सकती है। इसका प्रमुख कारण ये है कि पाकिस्तान की तरफ से आज़ादी के बाद से अद्यतन देश में अराजकता का माहौल बनाने की कोशिशें होती रही हैं; देश के विभिन्न भागों में आतंकवादियों की मदद से खून-खराबा मचाया जाता रहता है; सीमा-पार से आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया जाता है; सीमा पर आये दिन गोलीबारी की जाती रहती है; आये दिन जम्मू-कश्मीर में अलगाववाद की हवा चलाई जाती है; प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से देश के विभिन्न अंदरूनी भागों में; विभिन्न विभागों में, कार्यालयों में जासूसी करवाए जाने के कारनामे भी सामने आते रहे हैं। इस कोढ़ में खाज का काम यहाँ के उन फिरकापरस्त लोगों द्वारा किया जाता है जो तुष्टिकरण के नाम पर देश के मुसलमानों को वोट-बैंक में परिवर्तित करने में लगे हैं।
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अब पाकिस्तान में कुछ दिनों से फिर अराजकता का माहौल बना हुआ है। उसकी अंदरूनी राजनीति में उठापटक जैसे आसार दिख रहे हैं। विद्रोही लोगों ने पाकिस्तान टीवी पर, सचिवालय पर कब्ज़ा कर लिया है। नवाज़ शरीफ के इस्तीफे की लगातार माँग की जा रही है। सेना ने भी कार्यवाही करने जैसी मंशा दिखाई है, जिससे पाकिस्तान का लोकतंत्र पुनः सेना के बूटों तले रौंदे जाने के आसार दिखने-बनने लगे हैं। भारत सरकार को सतर्क रहने की आवश्यकता है। इतिहास गवाह रहा है जब भी पाकिस्तान के अंदरूनी हालात बिगड़े हैं तब-तब पाकिस्तानी हुकुमरानों की तरफ से सीमा पर घुसपैठ, गोलीबारी जैसी स्थितियाँ निर्मित कर दी गईं। इनके पीछे पाकिस्तानी जनता का, विद्रोहियों का, सेना का ध्यान अंदरूनी विवाद से हटाकर भारत-विवाद पर केन्द्रित कर देना रहा है। वर्तमान परिदृश्य में यदि ऐसे हालात बनते हैं तो वे भारत की सुरक्षा की दृष्टि से, आंतरिक सुरक्षा की दृष्टि से, नागरिक सुरक्षा की दृष्टि से नुकसानदेह साबित हो सकते हैं। विगत कुछ समय से जिस तरह से मुस्लिम तुष्टिकरण का खेल खेला जा रहा है, अवैध शरणार्थियों को वैधता देने के प्रयास किया जा रहा है वो एक अलग कहानी कहता दिख रहा है। सरकारों द्वारा किसी न किसी रूप में देश के मुस्लिमों के वोटों के लालच में सीमापार से चलते इस्लामिक आतंकवाद पर भी एकतरफा नजरिया बना लिया गया है; शरणार्थियों को (जो अवैध तरीके से देश में बसने के साथ-साथ अवैध कार्यों में, अराजक कार्यों में, आतंकी कार्यों में लिप्त होते पाए गए हैं) भारतीय नागरिक के रूप में बसाये जाने की कवायद होती रहती हैं; ऐसे लोगों के निवास प्रमाण-पत्र, वोटर कार्ड, राशन कार्ड आदि भी अवैध तरीके से बनवाकर इनको वैध करने का प्रयास किया जा रहा है। ये सब कहीं न कहीं मुस्लिम तुष्टिकरण के नाम पर, उनके वोट पाने के लालच में किया जा रहा है।
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इन सबके अलावा विगत कुछ समय से जिस तरह से हिन्दू लड़कियों के साथ शादी करके उनका जबरन धर्म-परिवर्तन करवाने की कोशिश, उन पर शारीरिक अत्याचार करने, बलात्कार, गैंग-रेप जैसी वारदातों के अंजाम देने में मुस्लिम युवकों की संलिप्तता पाई जा रही है, वो कहीं न कहीं एक दूसरी तरह का आतंकवाद कहा जा सकता है। पाकिस्तान इस बात को विगत कई युद्धों और छिटपुट झड़पों के दौरान भली-भांति समझ चुका है कि आमने-सामने की लड़ाई में वो भारत से किसी भी रूप में जीत नहीं सकता है, ऐसे में उसके द्वारा देश में अप्रत्यक्ष रूप से युद्ध छेड़ रखा गया है। यदि उसके अंदरूनी हालात और बिगड़ते हैं, वहाँ सत्ता-परिवर्तन की आहट दिखाई देती है, सेना के सत्ता पर कब्ज़ा कर लेने जैसी स्थितियाँ बनती हैं तो अपनी आदत के अनुरूप पाकिस्तान सीमा पर तो अपनी कारगुजारी दिखा सकता है, साथ ही वो देश में छिपे अपने गुर्गों के द्वारा माहौल को अशांत बना सकता है। इस तरह की एक हरकत को देश मुम्बई-काण्ड के रूप में पहले भी भुगत चुका है। पूर्व में देश के भीतर की आतंकी साजिशों में पाकिस्तान आतंकवादियों के, पाकिस्तान के संलिप्त होने, अवैध रूप से घुसपैठ करने के, सीमा पर बार-बार शांति-विराम का उल्लंघन करने के, देश में माहौल ख़राब करने के पर्याप्त सबूत मिल चुके हैं। उन सभी के और वर्तमान माहौल के आलोक में पाकिस्तान में चल रहे उपद्रव, सरकार के विरुद्ध होते विद्रोह पर केन्द्र सरकार को, राज्य सरकारों को, ख़ुफ़िया एजेंसियों को, सशस्त्र-बलों को, सेनाओं को व्यापक नज़र रखनी होगी। हमारे पड़ोसी की अशांति हमारे देश में अराजकता ला दे, नागरिकों को असुरक्षित कर दे तो ये किसी भी रूप में सही नहीं होगा।
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09 जुलाई 2013

प्रातः-स्मरणीय आतंकियों को कुछ सलाह



सम्मानित, महान और प्रातःस्मरणीय आतंकवादियो,
सादर नमन
आपकी आत्मघाती जीवटता के चलते ही आपको सम्मानित, महान और प्रातःस्मरणीय से संबोधित किया जा रहा है. इसमें आप या आपके समर्थक कहीं कोई कनेक्शन न ढूंड़ने लगिएगा क्योंकि आप लोग भले ही कोई कनेक्शन न सोचें पर आपके प्रति घनघोर श्रद्धा-भक्ति रखने वाले आपके पैरोकार और किसी के परम चाटुकार अवश्य ही कोई कनेक्शन खोज निकालेंगे.

बहरहाल, आपको अवगत कराना है कि आप आगे से बेधड़क होकर अपना धमाकेदार कार्यक्रम देश में कहीं भी अंजाम दे सकते हैं. वैसे तो आप लोगों के पास सम्पूर्ण विश्व में घूमने और पटाखे फोड़ने की आज़ादी है पर हमारे भारत देश में अब ये और भी सहज-सुलभ हो गया है. नाहक ही आप लोग इतनी सुबह, कभी देर रात काम करते हैं; कभी इतनी हड़बड़ी में होते हैं कि कई-कई बम बिना फूटे ही रह जाते हैं; कभी महीनों हो जाते हैं और आप लोग पटाखों की आवाज़ हम लोगों को नहीं सुनवाते हैं. हम आपको अब विश्वास दिलाना चाहते हैं कि आपके रास्ते यहाँ बहुत आसान हैं.
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१ - यहाँ आपके संगठन के अलावा और भी बहुत से लोग हैं जो आपके लिए पलक-पाँवड़े बिछाए रहते हैं. किसी के लिए आप माननीय होते हैं, तो किसी के लिए आप लोग बेटी-भाई होते हैं, किसी की आँखें आपके एनकाउंटर पर जार-जार रोती हैं.
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२ – हमारे देश के राष्ट्रीय स्तर के बहुत से नेता ऐसे हैं, जिनकी आँखों में आपके प्रति विशेष स्नेह है. वे आपके रूप में हमारे देश के नागरिकों को वोट-बैंक के रूप में स्थापित कर अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं. अपने वोट-बैंक को साधने के लिए वे कभी भी खुलकर आपके खिलाफ बोलने की जहमत ही नहीं उठा सकते, कार्यवाही क्या खाक करेंगे.
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३ – इस देश का आला सरकारी तंत्र इस तरह से मौन धारण किये है कि कुछ भी, कितना भी हो जाये वहां से कोई आवाज़ ही नहीं आती. ये तो आप विगत वर्षों से देख ही रहे हैं कि यहाँ ‘सख्त से सख्त कार्यवाही की जाएगी’ ‘हम ऐसी कायराना हरकतों से डरने वाले नहीं’ ‘किसी को छोड़ा नहीं जायेगा’ आदि-आदि जुमलों का ही प्रयोग किया जाता रहा है.
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४ – अब हमारे नेतागण एक कदम और आगे आ गए हैं. वे चाटुकारिता की हद से आगे निकल कर बजाय कोई ठोस कार्यवाही करने के आतंकियों के कनेक्शन निकालने लगे हैं; रिश्तेदारी बताने लगे हैं. अब ऐसे में काहे का डरना, आओ आराम से और निपटा कर चले जाओ.
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५ – एक बात और, अब बेधड़क, खुलेआम घूमो, अब कोई आपके बारे में एलर्ट जारी करने की, पूर्व-सूचना देने की हिम्मत ही नहीं करेगा. अब यहाँ की राजनीति के चपेटे में सुरक्षा एजेंसियां भी आ गईं हैं. कोई एक के ऊपर हाथ रखे है, कोई दूसरी को अपने पिंजरे में पाले है, कोई खुद को लावारिस सा समझ रही है. अब जब पूर्व-सूचना को गलत बताया जाता है, किसी भी तरह की पकड़ा-धकड़ी पर उसे जबरन हस्तक्षेप बताया जाता है तो कोई काहे को सूचनाओं को एकत्र करेगा.
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६ – हाँ, अब यहाँ मरने का खौफ लेकर तो बिलकुल न आना. पहली बात तो कोई पकड़ने वाला या मारने वाला ही नहीं क्योंकि यहाँ सुरक्षा तंत्र तभी प्रभावी होता है जब उसे आलाकमान से आदेश मिलता है और आज के दौर में आलाकमान अपना वोट-बैंक देखती है. अब मान लो मुठभेड़ हो भी गई तो पहले तो ये पकड़ने का काम करते हैं, सबूतों को एकत्र करने के लिए (पता नहीं आचार रखते हैं क्या?) यदि पकड़ गए तो दस-पंद्रह वर्ष आराम से बिरयानी खाना, मौका लग जाए तो कहीं से चुनाव लड़ने का भी जुगाड़ भिड़ा लेना. कहीं धोखे में यदि मार डाला गया तो संभव है कि आपके घर-परिवार वालों को आर्थिक मदद मिल जाए क्योंकि यहाँ ये साबित करने वाले भी बहुत हैं कि आपको फ़र्ज़ी एनकाउंटर में मारा गया.
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७ – इस बार बौद्ध धर्म स्थल पर आपके हमले ने आपको अंतर्राष्ट्रीय मंच प्रदान कर दिया. आपको बुद्ध प्रतिमा नष्ट कर डालने वाले तालिबानों के समकक्ष खड़ा कर दिया गया पर कहाँ तालिबान और कहाँ आप लोग. हम जानते हैं कि आप लोग तो मजहब के नाम पर अपने आपको कुर्बान कर रहे हो; जिहाद कर रहे हो. वैसे ये सही किया, अभी तक इधर-उधर छुटपुट बम फोड़ने से, हिन्दू धर्म-स्थलों पर धमाके करने से आप लोगों की कोई पहचान थोड़े बन रही थी बल्कि यहाँ के चाटुकार नेताओं ने आप लोगों का प्रतिद्वंद्वी ‘भगवा आतंकवाद’ और खड़ा कर दिया था. अब बौद्ध स्मारक पर हुए धमाके से लोगों को, चाटुकारों को भी लगा कि आपने धर्म पर हमला किया है, संस्कृति पर हमला किया है. ये आपके लिए गौरव की बात है.
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तो फिर आप सब निसंकोच, बेधड़क, निर्द्वंद्व होकर अपने पटाखे बनाओ और फोड़ते रहो. इस बार के धमाके में कोई मरा ही नहीं, इससे लगा कि बहुत ज़ल्दबाज़ी और हड़बड़ाहट में थे आप लोग...तभी तीन बम बिना फूटे भी रह गए और कोई मरा भी नहीं. चिंता न करो, यहाँ क्या है, अत्यधिक जनसँख्या है..कुछ सैकड़े मर भी गए तो कौन सा तूफ़ान आ जायेगा. बस नेताओं को न मार डालना क्योंकि वे तो देश चलाते हैं, वे मर गए तो देश कौन चलाएगा?
आपको नमन करता आपका शुभचिंतक

29 सितंबर 2008

राजनीतिक आतंकवाद

पिछले कई माह देश के लिए बम के धमाके लाते रहे. हरेक धमाकों में लोग मरते रहे और राजनीति जिन्दा होती रही. हर धमाके के बाद पुलिस, जांच संगठन, सरकारें, मंत्री आदि बड़ी तेजी दिखाते नजर आए. लगा कि एक झटके में आतंक फैलाने वाले पकड़ लिए जायेंगे पर जब तक किसी तरह की सफलता मिलती तब तक एक और धमाका हो जाता. धमाकों पर धमाके और बयान पर बयान, आतंक और राजनीति एक साथ चलती रही। समझ नहीं आ रहा था कि जैसे आतंकवाद से राजनीति हो रही है या फ़िर राजनीति के कारण ये आतंकवाद फ़ैल रहा है।

कुछ भी हो पर नेताओं ने अपने-अपने स्तर पर अपनी जानकारी देनी शुरू कर दी. किसी को लग रहा था कि पकिस्तान का हाथ है, कोई कह रहा था कि सिमी अपना जाल फैला रहा है किसी का कहना था कि इस संगठन पर प्रतिबन्ध सही है तो कोई कह रहा था कि यदि सिमी पर प्रतिबन्ध है तो बजरंग दल पर भी प्रतिबन्ध होना चाहिए. जितने मुंह उतनी बातें, अब सबका ध्यान इस तरफ़ था कि किस दल पर क्यों और किस तरह का प्रतिबन्ध लगे? अब जांच बंद हो गई, सुरक्षा का बंदोबस्त ढीला कर दिया गया. बस आतंकियों को मौका मिला और फ़िर धमाका.............

अब फ़िर शुरू हुई जांच, बयानवाजी, प्रतिबन्ध की बातें बगैरह-बगैरह........... इन सबके बीच कभी मन में आता है कि कौन सफल रहा "आतंकी" जो धमाके करके दहशत फैला रहे हैं या फ़िर "राजनेता" जो इसी दहशत का लाभ उठा कर भेदभाव को और हवा दे रहे हैं?

सुरक्षा व्यवस्था तो सफल है ही नहीं पर सोचना होगा कि कौन सफल है आतंकवाद या राजनीति?

20 सितंबर 2008

कब तक चलेगा ये सब?

फ़िर धमाके, फ़िर मौतें.......................उफ़....क्या कहें? क्या लिखें?.............कितनी बार वही सब लिखें?..........हर बार किसी को आरोपी बताया जाएगा......किसी के बहाने किसी और को ताना दिया जाएगा........किसी की मौत पर कोई रोटी सकेगा.......किसी को वोट बैंक खिसकता दिखेगा........कोई किसी पर निशाना साधेगा..........कोई अपनों के जाने के ग़म में रोयेगा......कोई आतंक के सफल होने पर हंसेगा..............और हम?..........हम सब किसी के आंसू......किसी के दुःख..........किसी की मौत पर कुछ लिखने का रास्ता तलाशेंगे।
क्या वाकई हम सब लोगों के दुःख में लिखते रहने का ही काम करेंगे? हम जब तक दवाब बनाने का काम नहीं करेंगे तब तक वोट बैंक, तुष्टिकरण, क्षेत्रवाद, जातिवाद आदि-आदि के कारण ये दर्द भारी घटनाएँ सामने आती ही रहेंगी.
बहरहाल बिना कुछ कहे आतंकी घटनाओं के शिकार लोगों को विनम्र श्रद्धांजलि.