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16 सितंबर 2026

शुल्क का बोझ आएगा ग्राहकों के ऊपर

कराघात (Impact of Tax) और करापात (Tax Incidence) के बारे में क्या आपने पढ़-सुन रखा है? जिसने पढ़-सुन रखा है वह सहजता से यूपीआई लेनदेन सम्बन्धी मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) के सच को समझ सकता है. सरकार द्वारा एक अधिसूचना जारी करके यूपीआई लेनदेन पर कुछ शुल्क लगाये जाने के बारे में जनता को बताया है. इसमें बताया गया है कि इसमें दो हजार रुपये तक के लेनदेन को किसी भी तरह के शुल्क से मुक्त रखा गया है, साथ ही इसके ऊपर के लेनदेन पर लगने वाले शुल्क को भी दुकानदारों से लिया जायेगा, न कि ग्राहकों से.

 

दो हजार रुपये से अधिक के लेनदेन पर तो शुल्क लगाया ही गया है, भले ही वह देखने में बहुत कम समझ आ रहा हो; जारी अधिसूचना की भाषा में भले ही यह शुल्क उपभोक्ता को नहीं देना है किन्तु सोचिए एक पल को कि क्या यह शुल्क दुकानदार देने को तैयार होगा? आज भी क्रेडिट कार्ड से भुगतान करने की स्थिति में दुकानदार लगने वाले टैक्स को ग्राहक की तरफ मोड़ देता है. कुछ इसी तरह की स्थिति यहाँ भी बनेगी. शुल्क चाहे दस रुपये आये या अधिकतम तीन सौ रुपये, उसे दुकानदार के द्वारा ग्राहक पर ही आरोपित कर दिया जायेगा. उदाहरण के लिए आप कोई सामान लेते हैं जो पच्चीस-पचास हजार रुपये का है. इस पर लगने वाला शुल्क सौ-दो सौ रुपये होगा और यह अधिकतम तीन सौ रुपये निर्धारित कर दिया गया है. निश्चित समझिये कि यह अतिरिक्त रुपये भी आपको ही चुकाने होंगे.

 

यूपीआई के कारण बैंकों पर, सरकार पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ की कहानी कहने से पहले देश में मुफ्त में बँटने वाली रेवड़ियों की भी गिनती कर लेना, उससे पड़ने वाले आर्थिक बोझ का भी वजन कर लेना. जनहित के नाम पर मुफ्त के राशन से लेकर लाड़ली-लाड़ला किया जा सकता है; स्कूटी, मोबाइल, टेबलेट किया जा सकता है, बैंक खातों को समय-समय पर भरा जा सकता है, उसी तरह प्रत्येक यूपीआई लेनदेन को भी जनहित में स्वीकारा जा सकता है.

 


16 अक्टूबर 2024

बाज़ार के हाथों में संचालित पर्व-त्यौहार

भारतीय समाज सदैव से पर्वों, त्योहारों, आयोजनों के उल्लास में रँगा-बसा दिखाई देता है. विगत कुछ समय से देखने में आ रहा है कि जैसे किसी त्यौहार का, पर्व का आना होता है वैसे ही बाज़ार केन्द्रित अनेक शक्तियाँ अपने-अपने स्तर से सक्रिय हो जाती हैं. पर्वों, त्योहारों के सन्दर्भ में बाजार में देखने वाली सक्रियता का न तो पर्वों से कोई लेना-देना होता है और न ही त्योहारों की पावनता से. बाज़ार का उद्देश्य किसी न किसी रूप में इंसानी दिल-दिमाग पर अपना नियंत्रण रखना होता है. ऐसे में सवाल स्वयं से ही उठता है कि क्या इंसान बाजार के हाथों की कठपुतली बन चुका है? ये ऐसा सवाल है जो आये दिन हर उस व्यक्ति के मन में कौंधता होगा जो संवेदनशील होगा. स्थिति यह है कि ऐसे आयोजनों में आवश्यकता की छोटी से छोटी वस्तु से लेकर जीवन का बड़े से बड़ा पल बाज़ार के द्वारा संचालित होने लगा है. सुबह जागने से लेकर सोने तक की समस्त गतिविधियों पर बाज़ार अपना नियंत्रण किये बैठा है. सुबह जागने के बाद उसे किन-किन पोषक तत्त्वों से भरे टूथपेस्ट की जरूरत है,  किस तरह के कपड़े उसके स्वास्थ्य का बेहतर ख्याल रख सकते हैं, सुबह के नाश्ते, दोपहर के भोजन, कार्यक्षेत्र की स्थिति, बच्चों का स्कूल, गृहणियों का काम-काज आदि सब कुछ बाज़ार के द्वारा ही पूरा होता दिखाई देता है. 

 

विडम्बना ये है कि बाज़ार स्वयं चलकर घर के भीतर आ चुका है. टीवी, समाचार-पत्र, पत्रिकाओं के सहारे, हाथ में बराबर चलते मोबाइल के सहारे बाज़ार ने घर के साथ-साथ इंसान के दिल-दिमाग पर कब्ज़ा कर लिया है. घर से बाहर निकलते ही सड़क किनारे लगे बड़े-बड़े होर्डिंग्स, गली-मोहल्ले के कोने में झाँकते छोटे-छोटे से बैनर, खम्बों, दीवारों पर चिपके पोस्टर, जगह-जगह बँटते पैम्पलेट हर समय इंसान को बाज़ार की कैद में होने का आभास करवाते हैं. हर एक पल के लिए बाज़ार ने कुछ न कुछ व्यवस्था कर रखी है. इंसान ख़ुशी के क्षणों में जी रहा है या ग़म साझा कर रहा है, बाज़ार ने इसके लिए भी इंतजाम कर रखे हैं. जन्मदिन, शादी, वैवाहिक वर्षगाँठ, पर्व-त्यौहार या फिर कोई भी आयोजन हो, विज्ञापनों के द्वारा इंसान को सम्मोहित कर लिया जाता है. कुछ करते हुए दाग लग जाएँ तो दाग अच्छे हैं. कुछ अच्छा होने पर कुछ मीठा हो जाये. भले ही टेढ़ा लगे पर मेरा सा लगे. कितना भी बड़ा डर हो पर उसके आगे जीत का एहसास दिखे. त्यौहार में पारंपरिक मिष्ठान बने या न बने पर कुछ मीठा हो जाये का विकल्प बाज़ार ने इंसान के सामने परोस रखा है.

 

इस बाजारीकरण की सबसे ख़राब स्थिति यह है कि इंसान कब उत्पादों का उपयोग करते-करते खुद ही उत्पाद बन गया उसे खबर ही नहीं हुई. शादी-विवाह जैसा विशुद्ध पारिवारिक और पवित्र संस्कार बाज़ार के हवाले हो गया. अब विवाह संस्कार परिजनों के हाथों से नहीं बल्कि बाजार के हाथों से संचालित होने लगा है. बाजार बताने लगा है कि दूल्हा-दुल्हन को कैसे तैयार होना है. बाज़ार बता रहा है कि पूरे आयोजन में कैसे और किस तरह से फोटोशूट किया जाना है. करवाचौथ जैसा पावन पर्व विशुद्ध रूप से बाजार का शिकार होकर दाम्पत्य जीवन में प्रविष्ट हो चुका है. बाज़ार द्वारा निर्धारित उपहार जब पत्नी को दिया जायेगा, बाज़ार सज्जित परिधान जब पहने जाएँगे तभी इस उपवास का उचित फल मिलेगा, इस तरह के सन्देश बाज़ार घर-घर में पहुँचाने में सफल हो गया है. पर्वों, त्योहारों के आते ही वाहन खरीदने के लाभ बताये जाते हैं. बाज़ार ही बताता है कि कौन सी मिठाई खिलाई जाए तो रिश्ते मजबूत होते हैं. परिजनों के एकसाथ मिलकर खुशियाँ मनाने में कौन सा रंग, कौन सा पेंट घर को चमकाएगा, ये भी बाज़ार निर्धारित कर रहा है. परिवार, संस्कार, संस्कृति से सम्बंधित वे सभी आयोजन जिनसे व्यक्ति का भावनात्मक जुड़ाव है, सबको बाज़ार ने अपने कब्जे में ले रखा है.

 

बाज़ार ने न केवल शालीनता के दायरे को पार किया बल्कि अनावश्यक रूप से घर-परिवारों में आर्थिक बोझ को भी बढ़ाया है. महँगे होते जाते आयोजन, अत्यंत भव्यता बिखेरती साज-सज्जा, सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर अनाप-शनाप ढंग से बर्बाद किया जाता धन आदि किसी भी रूप में किसी एक व्यक्ति की सकारात्मक सोच नहीं है. इसके पीछे पूरी तरह से नियोजित ढंग से बाज़ार अपना काम कर रहा है. उसका काम अपने उत्पाद को बेचना मात्र है. इस प्रक्रिया में स्वयं इंसान ही उत्पाद बनकर उभरने लगा है. वह बिना सोचे-विचारे बस इन कृत्यों को मशीनी ढंग से करने में लगा है. वह स्वयं ही नहीं समझ पा रहा है कि इन कृत्यों को करने में उसे ख़ुशी मिल रही है या फिर वह बाज़ार के हाथों में नाच रहा है?  

26 जून 2023

बाजारवाद के खिलाफ

चलो अच्छा है बाजारवाद के खिलाफ एक माहौल बन रहा है... भले ही फेसबुक पर बन रहा हो. वैसे बाजार वो स्थिति है जिसने बड़े-बड़े आन्दोलनों को निगल लिया. बड़े-बड़े आन्दोलनों की दिशा को बदल दिया. पहली बात ये कि बाजारवाद है क्या? क्या महज सौन्दर्य प्रसाधन बेचना ही बाजारवाद है? क्या वस्तु के सापेक्ष स्त्री को खड़ा कर देना बाजारवाद है? क्या महज सात दिनों में गोरा बना देने का दावा बाजारवाद है? क्या एक-एक बालों की सफेदी को रंगों में लिपटा लेना बाजारवाद है? क्या माँ के स्तनपान की जगह पर बाजारू दूध बच्चे को पिला देना बाजारवाद है? क्या मेरे कपड़े तेरे कपड़ों से सफ़ेद दिखा देना बाजारवाद है? क्या हवन-पूजन के  समय सेक्स की याद करते हुए कंडोम का फ्लेवर याद कर लेना बाजारवाद है? आखिर बाजारवाद का विरोध करते लोग/लुगाइयां भी बताएं कि बाजारवाद क्या है?

 

यदि बाजारवाद का विरोध लिपस्टिक, काजल, बिंदी, मस्कारा, आई-लाइनर, फाउंडेशन, नेल पोलिश आदि न लगाना है तो विशुद्ध ड्रामा है ये. किसी साबुन, क्रीम, लोशन के सहारे चेहरे की झुर्रियों को छिपाने की कला भी नेचुरल नहीं है. बालों की सफेदी में कालिख पोतना भी नेचुरल नहीं है. सुबह जगाने से लेकर रात सोने तक अनेकानेक रूप में चेहरे को प्रयोगशाला बना देना नेचुरल नहीं है. बाकी का सेल्फी के नाम पर कुछ भी हो मगर नेचुरल नहीं है. हो सकता है बहुतों को ये पोस्ट स्त्री-विरोधी लगे मगर इसे पढ़ने के बाद एक बार जब बेशिन के सामने खड़े होकर कोई फेसवाश लगाया जाये, चेहरे की झुर्रियों पर उँगलियों को फिराया जाये, बालों की सफेदी को दूर करने के लिए कोई नेचुरल कलर घोला जाने लगे तो याद करियेगा कि कहीं इसी नेचुरल कलर की तरह आपकी सेल्फी भी तो नेचुरल नहीं?


 

22 नवंबर 2022

दिमागी सक्रियता पर कब्ज़ा करता बाजार

आज इंटरनेट पर एक साईट पर अपने फाउंटेन पेन और पुस्तकों को खोजते समय अपने आपमें एक अनोखी सी चीज बिकती दिखी. संभव हो कि बहुत से लोगों के लिए ये अनोखी सी न हो पर हमारे लिए थी. इस चीज को आप सबने भी इंटरनेट पर बिकते देखा होगा. ये चीज थी छोटी हो गई पेन्सिल को बड़ा करने का होल्डर. बाजार व्यवस्था के अधीन उपभोक्ताओं के मन को खँगालते हुए इस तरह के उत्पाद बनाये जाते हैं, उनका व्यापार किया जाता है, उनको प्रचारित किया जाता है. इस उत्पाद को देखकर आश्चर्य हुआ. आश्चर्य इसलिए हुआ कि क्या वाकई ऐसे उत्पाद को, ऐसे सामान को खरीदा जाता होगा? इससे ज्यादा आश्चर्य हुआ उसकी कीमत देखकर.




आज उपभोक्तावादी संस्कृति के चलन में आ जाने के कारण बाजार प्रत्येक वस्तु को अपने अधीन कर लेना चाहता है. इसी सोच के चलते उपयोग में लायी जाती पेन्सिल के छोटी हो जाने के बाद उसको बड़ा करने के लिए होल्डर बनाया गया. हम सभी में से जिसने भी बचपन में पेन्सिल का इस्तेमाल किया होगा या आज अपने बच्चों को पेन्सिल का उपयोग करते देखते होंगे, वे भली-भांति जानते होंगे कि उपयोग में लायी जाने वाली पेन्सिल को छीलते-छीलते एक समय ऐसा आता है जबकि पेन्सिल को पकड़ना मुश्किल होता है. छोटे आकार के कारण उससे लिखना कठिन हो जाता है और उतने हिस्से को फेंकना सामान की बर्बादी समझ आती है. ऐसे ही छोटे आकार के पेन्सिल के टुकड़ों को इस तरह के होल्डर में फँसा कर उनका आकार बड़ा कर लिया जाता है. इसके द्वारा पेन्सिल का उपयोग करना सहज हो जाता है.


इस उत्पाद को बिकते देखकर आश्चर्य के साथ बहुत हँसी भी आई. हँसी आने का कारण हमारा व्यक्तिगत रूप से पेन्सिल के ऐसे छोटे-छोटे टुकड़ों को उपयोग में लाने का अनुभव है. ड्राइंग, कैलीग्राफी, स्केचिंग आदि का शौक होने के कारण पेन्सिल का उपयोग बचपन से लेकर अभी तक करते आ रहे हैं. जाहिर सी बात है कि उसके छोटे होते हिस्सों से भी सामना होता है. ऐसे टुकड़ों को बड़ा करने के लिए बाजार में बिकते किसी होल्डर का उपयोग आज तक नहीं किया गया. बेकार हो गईं स्केच के हिस्सों को, बेकार हो गए पेन के ढांचे को अथवा कागज़ को गोलाकार रूप में बदलकर पेन्सिल के छोटे हिस्सों को उसी में फँसाकर बड़ा करते रहे.


इस उत्पाद को बिकते देखकर लगा कि आज बाजार कितनी आसानी से इंसानों की, बच्चों की सक्रियता को, उनकी दिमागी कल्पनाशीलता को छीन ले रहा है. अब बिना दिमाग लगाये कि पेन्सिल के इन छोटे हिस्सों को उपयोग में लाने के लिए कैसे बड़ा किया जाये, बच्चे भी, बड़े भी बाजार में बिकते उत्पाद को ले आते हैं. सक्रियता की इस तरह की कमी के चलते बहुत से इंसानों में नया सोचने-समझने की क्षमता का अभाव होता जा रहा है. वे सभी एक बंधी-बंधाई लीक पर ही चलते चले जा रहे हैं. अभिभावकों को, शिक्षकों को इस बारे में विचार करने की आवश्यकता है. उनको अपने बच्चों को इस तरह की क्रियाशीलता के बारे में बताना-समझाना चाहिए. यदि इसी तरह से सबकुछ बाजार के हाथों में ही नियंत्रित होता चला गया तो भावी जीवन में सोचने-समझने की क्षमता भी कुंद रूप में देखने को मिलेगी. 





 

28 अगस्त 2022

बाजार द्वारा संचालित समाज

क्या इंसान बाजार के हाथों की कठपुतली बनता जा रहा है या कठपुतली बन चुका है? ये ऐसा सवाल है जो आये दिन हर उस व्यक्ति के मन में कौंधता होगा जो संवेदनशील होगा. व्यक्ति के जीवन की आज यह स्थिति बनी हुई है कि रोजमर्रा की आवश्यकता की छोटी से छोटी वस्तु से लेकर जीवन का बड़े से बड़ा पल बाज़ार के द्वारा संचालित होने लगा है. सुबह जागने के लिए व्यक्ति को किस घड़ी के अलार्म की आवश्यकता है, जागने के बाद उसे किन-किन पोषक तत्त्वों से भरे टूथपेस्ट की जरूरत है, यदि वह व्यक्ति सुबह की सैर पर जाता है तो कौन से जूते उसके लिए लाभदायक हैं, किस तरह के कपड़े उसके स्वास्थ्य का बेहतर ख्याल रख सकते हैं आदि-आदि बाज़ार ही तय कर रहा है. सुबह के नाश्ते, दोपहर के भोजन, कार्यक्षेत्र की स्थिति, बच्चों का स्कूल, गृहणियों का काम-काज आदि सबकुछ अब बिना बाज़ार के पूरा होता नहीं दिखाई देता है. 


इन स्थितियों से दो-चार होने के लिए व्यक्ति को बाज़ार जाने की आवश्यकता नहीं है. अब बाज़ार स्वयं चलकर आपके घर के भीतर आ चुका है. टीवी पर विज्ञापन के सहारे, समाचार-पत्र, पत्रिकाओं के सहारे, हाथ में बराबर चलते मोबाइल के सहारे बाज़ार ने न केवल घर में जगह बना ली है बल्कि उसने इंसान के दिल-दिमाग पर कब्ज़ा कर लिया है. घर से बाहर निकलते ही सड़क किनारे लगे बड़े-बड़े होर्डिंग्स, गली-मोहल्ले के कोने में झाँकते छोटे-छोटे से बैनर, खम्बों, दीवारों पर चिपके पोस्टर, जगह-जगह बँटते पैम्पलेट हर समय इंसान को बाज़ार की कैद में होने का आभास करवाते हैं. अब खाने-पीने के सामान को खरीदने की बात हो या फिर पहनने-ओढ़ने के लिए वस्त्रों का चुनाव करना हो, घर को सजाने के लिए किसी वस्तु की चाहना हो या फिर कोई मंगलकारी आयोजन हो, सभी में व्यक्ति की सोच से अधिक तेज चलते हुए बाज़ार अपनी उपस्थिति दर्ज करा देता है. हर एक पल के लिए बाज़ार ने कुछ न कुछ व्यवस्था कर रखी है. इंसान ख़ुशी के क्षणों में जी रहा है या ग़म साझा कर रहा है, बाज़ार ने इसके लिए भी इंतजाम कर रखे हैं.




जन्मदिन हो, शादी हो, वैवाहिक वर्षगाँठ हो, पर्व-त्यौहार हों या फिर कोई भी आयोजन विज्ञापनों के द्वारा इंसान को इतना सम्मोहित कर लिया जाता है कि वह बिना बाज़ार के आगोश में आये कुछ कर ही नहीं सकता है. कुछ करते हुए दाग लग जाएँ तो दाग अच्छे हैं, कुछ अच्छा होने पर कुछ मीठा हो जाये. भले ही टेढ़ा लगे पर मेरा सा लगे, कितना भी बड़ा डर हो पर उसके आगे जीत का एहसास दिखे, त्यौहार में पारंपरिक मिष्ठान बने या न बने पर कुछ मीठा हो जाये का विकल्प बाज़ार ने इंसान के सामने परोस रखा है. एकबारगी यदि देखें तो हँसी-ख़ुशी के माहौल को, अपने उल्लास को ऐसे किसी भी उत्पाद के सहारे मिल-बाँट कर मना लेना बुरा नहीं है. बुरे का एहसास उस समय होता है जबकि व्यक्ति बजाय इन उत्पादों का उपयोग करने के, इनका उपभोग करने के स्वयं ही उत्पाद बनने लगता है.


यह इस बाजारीकरण की सबसे ख़राब स्थिति है कि इंसान कब बाज़ार में उपलब्ध उत्पादों का उपयोग करते-करते खुद ही उत्पाद बन गया उसे खबर ही नहीं हुई. कभी गौर किया है इस बात पर कि शादी-विवाह जैसा विशुद्ध पारिवारिक और पवित्र संस्कार कब बाज़ार के हवाले हो गया? अब विवाह संस्कार परिजनों के हाथों से नहीं, उनकी मनमर्जी से नहीं बल्कि बाजार के हाथों से संचालित होने लगा है. अब बाजार बताने लगा है कि दूल्हा-दुल्हन को कैसे तैयार होना है. अब बाज़ार ने निर्धारित कर दिया है कि सजावट कैसी होनी है. अब बाज़ार बता रहा है कि पूरे आयोजन में कैसे और किस तरह से फोटोशूट किया जाना है. बाज़ार की इन हरकतों ने जहाँ एक तरफ पाश्चात्य स्थिति को भारतीय संस्कृति पर थोपने जैसा काम किया है वहीं अनावश्यक रूप से व्यक्तियों की जेब पर भी डाका डाला है.


इन सबमें भारी-भरकम विज्ञापन, टीवी के रंगीन लकदक करते सीरियल भी सहायक भूमिका में नजर आने लगे हैं. विवाह अब संस्कार नहीं, पारिवारिक आयोजन नहीं बल्कि बाजारीकरण का सशक्त मॉडल बनकर सामने आया है. अकेले विवाह ही नहीं वरन व्यक्ति से सम्बंधित वे तमाम सारे आयोजन जिनमें किसी न किसी रूप में व्यक्ति का भावनात्मक सम्बन्ध जुड़ा है, सबको बाज़ार ने अपने कब्जे में ले रखा है. विवाह के पहले का फोटोशूट कब कैसे जनसामान्य के बीच जा घुसा किसी को खबर न हुई. शालीनता के महीन से परदे को गिराते हुए बाज़ार ने प्री-वेडिंग शूट के नाम पर अशालीनता फैलानी शुरू कर दी गई. विवाह का एकमात्र यही आयोजन नहीं बल्कि उससे जुड़े तमाम सारे छोटे-बड़े आयोजन भी बाज़ार ने हड़प लिए हैं. हल्दी, मेंहदी, द्वारचार, जयमाल, फेरे, विदाई आदि को अब बाज़ार संचालित कर रहा है. कैसे कपडे पहने जाने हैं, किस कंपनी के पहने जाने हैं, किसे क्या भूमिका निभानी है, कैसे नृत्य करते हुए कन्या आएगी, किस तरह से जयमाल होगी, वर-वधु कैसे आधुनिकता के वशीभूत होकर फेरे लेंगे, विदाई के समय कन्या कैसे और कितना रोएगी आदि बाज़ार ने सिखा-पढ़ा दिया है. मातृत्व जैसे भावनात्मक एहसास को भी विज्ञापनों, फोटोशूट के हाथों में थमा दिया गया. इन कृत्यों में आधुनिकता, वर्तमान चलन के नाम पर फूहड़ता, नग्नता, अशालीनता के अलावा और कुछ देखने को नहीं मिला.


बाज़ार ने न केवल शालीनता के दायरे को पार किया बल्कि अनावश्यक रूप से घर-परिवारों में आर्थिक बोझ को भी बढ़ाया है. महँगे होते जाते आयोजन, अत्यंत भव्यता बिखेरती साज-सज्जा, सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर अनाप-शनाप ढंग से बर्बाद किया जाता धन आदि किसी भी रूप में किसी एक व्यक्ति की सकारात्मक सोच नहीं है. इसके पीछे पूरी तरह से नियोजित ढंग से बाज़ार अपना काम कर रहा है. उसका काम अपने उत्पाद को बेचना मात्र है. इस प्रक्रिया में स्वयं इंसान ही उत्पाद बनकर उभरने लगा है. वह बिना सोचे-विचारे बस इन कृत्यों को मशीनी ढंग से करने में लगा है. वह स्वयं ही नहीं समझ पा रहा है कि इन कृत्यों को करने में उसे ख़ुशी मिल रही है या फिर वह बाज़ार के हाथों में नाच रहा है?  




 

12 जुलाई 2021

बाजार के हाथ में मातृत्व

शिक्षित व्यक्ति विमर्श करने की क्षमता का विकास कर लेता है. तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर तर्कशील बन जाता है. इधर कुछ समय से लगने लगा है कि आधुनिकता के नाम पर साक्षरता जैसे देह के आसपास सिमटती जा रही है. इस देह में भी उस विमर्श के लिए स्त्री-देह सबसे सहज विषय-वस्तु बन गई है. इसी कारण अब तर्क-वितर्क में बहुधा महिलाओं से सम्बंधित मुद्दे, महिलाओं से सम्बंधित विषय ज्यादा सामने आने लगे हैं. इन विषयों पर, मामलों पर कुतर्क जैसी स्थितियाँ न केवल पुरुषों द्वारा बल्कि स्त्रियों द्वारा भी अपनाई जा रही हैं. विगत कुछ समय से स्त्री-विषयक बहसें लगातार सामने आ रही हैं. समझ से परे है कि ये स्त्रियों को स्वतंत्रता का अधिकार का ज्ञान कराने के लिए हो रहा है या फिर उनकी स्वतंत्रता की आड़ में बाजार को सशक्त किया जा रहा है? कुछ दिनों पहले हैप्पी टू ब्लीड जैसा आन्दोलन चला. जिसके द्वारा महिलाओं की माहवारी को केंद्र में रखा गया. कुछ अतिजागरूक महिलाओं ने खुद को इस आन्दोलन में सूत्रधार की तरह से आगे धकेलते हुए माहवारी के दाग के साथ खुद को प्रदर्शित किया. इस हैप्पीनेस को पाने के बाद इन्हीं आन्दोलनरत महिलाओं ने सेनेटरी पैड के मुद्दे को हवा देने का काम किया. इस बार इनका मुद्दा सस्ते पैड नहीं वरन इन पैड के विज्ञापनों में दिखाए जा रहे नीले रंग को लेकर था. आखिर जब खून लाल रंग का होता है तो फिर पैड के विज्ञापन में नीला रंग क्यों? वाकई स्त्री-सशक्तिकरण के नाम पर धब्बा था ये नीला रंग. आखिर लाल को नीले से परिवर्तित करके पुरुष महिलाओं को रंगों के अधीन भी लाना चाहता होगा.


अब एक नई बहस छिड़ी हुई है स्तनपान को लेकर. एक पत्रिका के कवर पर स्तनपान कराती मॉडल का चित्र बहुतों के लिए अशोभनीय रहा, बहुतों के लिए मातृत्व का परिचायक. इस मॉडल के मातृत्व के पक्ष में बहुतों ने न केवल हिन्दू धार्मिक उदाहरणों को सामने रखा वरन विदेशी संसद की कुछ महिलाओं के उदाहरण भी दिए. इस तरह की चर्चा लगभग दो-तीन साल पहले उस समय भी छिड़ी थी जबकि कुछ मॉडल्स ने नग्न, अर्धनग्न रूप में स्तनपान कराते हुए फोटोसेशन करवाया था. बहरहाल, स्तनपान किसी भी महिला के जीवन का सुखद क्षण होता है, सुखद अनुभूति होती है. स्तनपान की अहमियत को एक महिला, जो माँ बन चुकी है, बखूबी समझ सकती है. किसी पत्रिका के कवर पेज के लिए, भले ही उसका मंतव्य किसी न किसी रूप में स्तनपान की अवधारणा को विकसित करना ही क्यों अ रहा हो, स्तनपान को सार्वजनिक करना मातृत्व का परिचायक नहीं है. बहुत सूक्ष्म रूप में इसे न समझ सहज भाव से समझने की आवश्यकता है कि स्तनपान के द्वारा एक माँ न केवल अपने शिशु को भोजन दे रही होती है वरन उस शिशु के साथ गहरा तादाम्य स्थापित कर रही होती है. उन पावन क्षणों को जिन महिलाओं और पुरुषों ने पावनता के रूप में देखने की कोशिश की होगी उनको इसका अनुभव होगा कि उस क्षण जहाँ शिशु के हाथ-पैर माता के स्तन से खेल रहे होते हैं वहीं माता के हाथ उसके सिर पर आशीष-रूप बने रहते हैं. इस दौरान उन माताओं के हावभाव कम से कम इस पत्रिका की मॉडल जैसी भाव-भंगिमा जैसे नहीं होते हैं. उनके चेहरे की आत्मीयता, संतुष्टि का भाव इसके चेहरे जैसा कामुक नहीं होता है.

समझने वाली बात यह भी है कि जो महिलाएं कुछ दिनों पूर्व तक हैप्पी टू ब्लीड के नाम पर उस मानसिकता से स्वतंत्रता पाना चाहती थीं जो स्त्रियों को माहवारी के दिनों में कैद जैसी स्थिति दे देता है वे आज़ादी के रूप में स्तनपान की सार्वजनिकता चाह रही हैं. यही महिलाएं ब्रा से मुक्ति की चाह में सडकों पर ब्रा की होली जलाती हैं, खुद को बिना ब्रा के प्रदर्शित करती हैं वही महिलाएं अब स्वतंत्रता, सार्वजनिक होने के नाम पर ब्रा-युक्त स्तनपान की अवधारणा पैदा कर रही हैं. आखिर स्वतंत्रता को किस पैमाने पर उतारकर महिलाओं की आजदी के लिए वास्तविक आज़ादी की माँग ये कर रही हैं, इन्हें स्वयं नहीं मालूम. असल में बाजार ने महिलाओं को आधुनिकता के नाम पर उत्पाद बनाकर रख दिया है. स्त्री-सशक्तिकरण से जुडी महिलाएं, अपने आपको मंचों के सहारे महिलाओं की अगुआ बताने वाली महिलाएं ऐसे किसी भी मामले के लिए पुरुष को दोषी ठहराएँ मगर सत्य यही है कि आज महिलाएं स्वतः बाजार के हाथ की कठपुतली बनती जा रही है. न केवल महिलाओं से जुड़े उत्पादों में वरन पुरुषों से जुड़े उत्पादों में भी स्त्री-देह निखर कर सामने आ रही है. विज्ञापनों में महिलाओं को विशुद्ध कामुकता की पुतली बनाकर पेश करने की होड़ लगी हुई है. बॉडी स्प्रे का विज्ञापन हो तो महिला ऐसे दिखाई जाती है जैसे वह सारी उम्र, सारी शर्म छोड़कर सिर्फ देह की चाह रखती है. एक अगरबत्ती का विज्ञापन ऐसे दिखाता है जैसे उसकी महक किसी भी स्त्री को सेक्स के लिए उत्तेजित कर सकती है. चाय हो, ब्लेड हो, बनियान हो, साबुन हो, सौन्दर्य प्रसाधन हो या फिर कोई अन्य उत्पाद सभी के द्वारा महिलाओं को कामुक, उत्तेजक भूमिका में इसी बाजार ने खड़ा कर दिया है.

वर्तमान में उठा स्तनपान का ये मुद्दा विशुद्ध बाजारीकरण की देन है. जिस तरह से उस मॉडल को स्तनपान कराते प्रस्तुत किया गया है वह बाजारी दृष्टि को ही प्रदर्शित करता है. ऐसे बाजार को न माता से मतलब है, न शिशु से मतलब है और न ही स्तनपान से. इसके लिए बस अपने उत्पादों का विक्रय अनिवार्य है. किसी न किसी कीमत पर उनको बेचना उनकी प्राथमिकता है. अब इसके लिए चाहे हैप्पी टू ब्लीड के दाग हों, चाहे पैड का नीला-लाल रंग हो, कंडोम की कामुकता हो, अगरबत्ती में छिपी मादकता हो, ब्रा-पैंटी का उभार हो या फिर स्तनपान के द्वारा स्त्री-देह का प्रदर्शन हो. मातृत्व की आड़ में सामने लाये गए, बहस का विषय बनाये गए स्तनपान के बाद देखिये बाजार किस-किस गोपन को अगोपन बनाकर सामने लाता है?


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यह आलेख जनसंदेश टाइम्स के सम्पादकीय पृष्ठ पर दिनांक 08-03-2018 को प्रकाशित किया गया था.

24 अगस्त 2020

स्त्री-विमर्श के अपने-अपने भ्रम

इधर कुछ दिन से सोशल मीडिया पर कुछ विशेष लोगों की स्त्री-विमर्श से सम्बंधित पोस्ट देखने को मिल रही हैं. कुछ ब्लॉग पर भी इसी तरह की पोस्ट पढ़ने को मिलीं. समाज में बहुत सारे विमर्शों के बीच आज भी दो विमर्श अपनी-अपनी तरह से जिन्दा रखे जा रहे हैं. इनमें एक स्त्री विमर्श है और दूसरा दलित विमर्श. किसी समय में इन दोनों विमर्शों को एक तराजू पर तौलने की कोशिश भी की गई थी. बहरहाल, देखने में आता है कि इक्कीसवीं सदी में खुद को स्थापित करने के बाद भी यदि कहीं से भी एक भावात्मक बिंदु खोजने की कोशिश की जाती है तो इन्हीं दो विमर्शों के नाम पर. अभी चर्चा स्त्री-विमर्श की. खुद को पुरुषों के बराबर मानने वाली, पुरुषों से कन्धा से कन्धा मिलाकर चलने वाली, कहीं-कहीं खुद को पुरुषों से आगे भी बताने वाली स्त्री अचानक से स्त्री-विमर्श के द्वारा खुद को ही कमजोर बताने लग जाती है. ऐसी पोस्ट से वह खुद को कमजोर बताने के साथ-साथ अपने समकक्ष और अपने बाद की पीढ़ी में एक तरह का भय पैदा करके अपना अनुनायी बनाने की चेष्टा करने का प्रयास भी करती है.



असल में नारी-सशक्तिकरण, स्त्री-विमर्श को लेकर असल बिंदु या फिर असल स्थिति क्या है, ये स्त्री-विमर्श के पैरोकारों को भी असलियत में ज्ञात नहीं. स्त्री-विमर्श आज बाजार के हाथों में सिमट चुका है. स्त्री की दशा सुधारने की बात करने वाली, उसकी दशा कमतर बताने वाली स्त्री खुद बाजार के हाथों संचालित हो रही है. नारी की स्थिति को यदि पुरुष द्वारा चित्रित किया जाये तो वो स्त्री को बदनाम करने की साजिश कही जाती है और यदि वही छवि किसी महिला द्वारा दिखाई जाये तो उसे नारी सशक्तिकरण कहा जाता है. नारी के बिना कोई उत्पाद नही बिक सकता. यहाँ नारी को उत्पाद बनाने की बात हो रही है, उसको कम कपडों में उतारने की बात हो रही है तो ये क्या है, नारी-सशक्तिकरण या फ़िर नारी की गरिमा का पतन?

यदि स्त्री-विमर्श, सशक्तिकरण के लिए पिछली सदी की नायिकाओं की बात करें तो महारानी लक्ष्मी बाई को कोई भी नहीं भूला होगा. उस समय परदा-प्रथा आज से अधिक था, महिलाओं की शिक्षा आज से बदतर थी तब भी रानी ने कई राजाओं को संगठित कर अपने झंडे तले, अपने आधिपत्य में लड़वाया था. ये है नारी-सशक्तिकरण का उदहारण. रानी ने तो कम कपडों का सहारा नहीं लिया था, वे तो किसी फैशन शो का हिस्सा नहीं थीं. फिलहाल समझाने से कुछ नहीं होगा क्योंकि समाज को चलाने वाले नहीं चाहते कि अब ये दो ध्रुव- स्त्री,पुरूष- एक होकर किसी समस्या का हल निकालें. दोनों में संघर्ष बना रहे, बाज़ार चमकता रहे, नारी अपनी झूठी शान में, पुरूष अपने झूठे अहंकार में भटकता रहे. इसी से बिकेंगे अंडरवीयर, शराब, ब्लेड और भी बहुत कुछ पर किसी कम कपडों में बलखाती नारी के साथ. यही तो है आज का नारी-सशक्तिकरण.

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26 जुलाई 2020

बीते दिनों की याद दिलाता खामोश शहर

आजकल हमारे जनपद में बाज़ार शाम चार बजे बंद हो रहा है. बंद हुए बाजार में इसके बाद सिर्फ दवा-दारू की दुकानों के खुले रहने की अनुमति है. ये दवा-दारू वह संयुक्त शब्द नहीं जो आमतौर पर किसी बीमार के इलाज के लिए बोला जाता है. यहाँ इस शब्द का तात्पर्य दो तरह की दुकानों से ही है. एक दुकान दवाओं की और दूसरी दुकान शराब की. बाजार बंद होने के बाद यही दो दुकानें खुली मिलतीं हैं. बाजार खुले रहने की स्थिति में दिन भर दिखाई पड़ने वाली भीड़ शाम को गायब रहती है. दिन की तुलना में कहा जाये तो लगभग न के बराबर. कई-कई दिन की घर-बंदी के बाद शाम को अपने स्कूटर पर बैठे-बैठे शहर का आदतन एक चक्कर लगाने के दौरान अथवा शाम के समय किसी अत्यावश्यक काम से निकलने के दौरान या फिर सप्ताह में होने वाले दो दिनों के लॉकडाउन के दौरान मेडिकल कार्य से निकलने पर शहर की जो स्थिति दिखाई देती है वह बीते दिनों को याद करवा देती है.



गिनी-चुनी संख्या में वाहनों का चलना, इक्का-दुक्का व्यक्तियों का टहलना, न के बराबर चार पहिया वाहनों का गुजरना, कोई शोर नहीं, गाड़ियों-दोपहिया वाहनों के हॉर्न का शोर नहीं, इंसानों की चीख-पुकार नहीं, कोई धक्का-मुक्की नहीं. ये सबकुछ देखकर अपने बचपन के दिन याद आ जाते हैं. 80 के दशक में अपने घर से जीआईसी पढ़ने के लिए जाने पर सड़कें कुछ इसी तरह की दिखाई देती थीं. दिन को खुले बाजार में भी उस समय लगभग ऐसी ही भीड़ हुआ करती थी. गिने चुने वाहन सड़कों पर अपना रोब दिखा रहे होते थे. सड़क पर उस समय साइकिल और रिक्शा का ही साम्राज्य हुआ करता था. दिन के अलावा कई बार रात को परिवार के साथ किसी कार्यक्रम में अथवा उरई की टाकीज में कोई फिल्म देखने जाने को मिल जाया करता था तो लगभग ऐसा ही सन्नाटा पसरा हुआ दिखाई देता था. अच्छे से याद है कि उन दिनों में भी गलियाँ निपट सूनी रहती थीं, आजकल भी सूनी दिख रही हैं. उस समय भी इक्का-दुक्का लोग सड़कों पर टहलते दिखते थे, आज भी वैसा ही मंजर दिखाई दे रहा है. उस समय भी शांत वातावरण मन को सुकून देता था कुछ ऐसा ही आज हो रहा है. वातावरण की ख़ामोशी, सन्नाटा, शोर-रहित सड़कें एक अलग तरह का आनंद दे रहीं हैं.

हमारे कुछ व्यापारी मित्र इस व्यवस्था से प्रसन्न दिखाई दे रहे हैं. उनका कहना है कि कोरोना काल के पहले आपस में व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता होने के कारण दुकान खोले रखने की मजबूरी भी थी. आर्थिक लाभ को अधिकाधिक प्राप्त कर लेने की मानसिकता के कारण भी दुकान को खोलना आवश्यक समझ आता था. आज जबकि नियम के अनुसार सभी दुकानों को एक निश्चित समय पर बंद होना ही है. ऐसे में शाम का बहुत बड़ा भाग उनको अपने संबंधों का निर्वहन करने के लिए मिल रहा है. ये बात और है कि कोरोना काल चलने के कारण किसी तरह के बड़े आयोजन नहीं हो रहे हैं, शादी-विवाह संपन्न नहीं हो रहे हैं मगर मिलने-जुलने की व्यवस्था तो संपन्न हो ही जा रही है. मोहल्ले में आपस में शारीरिक दूरी का पालन करते हुए मिलना हो ही रहा है.

निश्चित ही ऐसी व्यवस्था से आर्थिक रूप से कुछ घाटा अवश्य ही व्यापारिक क्षेत्र से जुड़े लोगों को होगा मगर यदि इस व्यवस्था को एक नियम बनाकर चला जाये तो भविष्य में इसके सुखद परिणाम देखने को मिलेंगे.

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04 जून 2020

समाजोपयोगी हो सकती है यह व्यवस्था

अनलॉक के दौरान बाजार में भीड़ अब अपने पुराने रूप में आती दिख रही है. उरई में शाम पाँच बजे तक बाजार खोलने की अनुमति है. जैसा कि ऊपर से आदेश हैं, उसके अनुसार रात नौ बजे तक नागरिकों के आवागमन पर प्रतिबन्ध नहीं है. एक आवश्यक काम से शाम को सात बजे के बाद निकलना हुआ. उस समय बाजार पूरी तरह से बंद हो चुका था. इक्का-दुक्का दवाओं की दुकानें खुली हुईं थीं. दुकानें बंद करने के नियम का पालन था अथवा प्रशासन का भय कि छोटी-छोटी सी दुकानें भी बंद थीं. ठिलिया वाले भी नहीं दिखाई दे रहे थे. चाय-पान की गुमटियाँ भी बंद मिलीं. सुनसान रास्तों पर चंद वाहनों की लाइट थी, सड़क के खम्बों पर जगमगाती रौशनी थी और शांत सा माहौल. लगा नहीं कि उरई के उसी बाजार में हम चले जा रहे हैं, जहाँ रात को नौ-दस बजे तक बस शोर-शराबा बना रहता था. दुकानों का बंद होना होते-होते भी देर रात कर ली जाया करती थी. गाड़ियों का शोर, हॉर्न का अनावश्यक बजना, तेज रफ़्तार से लोगों को डरातीं बाइक्स तब उरई की सड़कों की पहचान बनी थीं.


अब जो स्थिति दिखाई दे रही है वह किसी छोटे से कसबे से देर रात निकलने का एहसास करवा रही थी. एहसास ऐसा भी हो रहा था जैसा कि भोर में टहलने के लिए निकलते समय हुआ करता था. हलकी-हलकी ठंडी हवा, खम्बों, घरों, दुकानों से झांकती रौशनी और इक्का-दुक्का वाहनों के इंजन की आवाज़. न लोगों की भागदौड़, न अंधाधुंध रफ़्तार, न धक्का-मुक्की, न शोर, न धुआँ, न प्रदूषण बस एक चरम शांति, एक मधुर सा एहसास. लगा कि ऐसा नियम हमेशा के लिए बना दिया जाना चाहिए. किसी भी शहर को सुबह आठ-नौ बजे से शाम छह-सात बजे तक के लिए ही खोलना चाहिए. इससे न केवल कई तरह का प्रदूषण दूर होगा बल्कि समाज में फैली बहुत सी अराजकता अपने आप समाप्त हो जाएगी.



जब जल्दी बाजार बंद होगा तो ज़ाहिर सी बात है कि दुकानदारों को जल्द ही अपने घर पहुँचने का समय मिला करेगा. इससे देर रात पहुँचने के कारण अस्त-व्यस्त होने वाली उनकी दिनचर्या भी नियंत्रित हो सकेगी. बहुत से व्यापारिक परिवारों के बच्चों में इसकी समस्या देखने को मिलती है कि वे अपने पिता, भाई अथवा अन्य पुरुष परिजनों से समय से नहीं मिल पाते हैं. कई बार व्यापारिक अवसरों पर बच्चों को भी अपने परिजनों की सहायता के लिए दुकान पर जाना पड़ जाता है. इस तरह की स्थितियों पर बहुत हद तक लगाम लग सकती है.

इसके साथ-साथ जल्दी दुकान बंद होने के कारण लूट-पाट, छीना-झपटी जैसी घटनाओं पर भी अंकुश लगने की सम्भावना है. लगभग सभी दुकानदार, व्यापारी रात को अपनी-अपनी दुकान बंद करने के बाद बहुत सारा धन, दिन भर की आय अपने साथ लेकर ही घर जाते हैं. कई-कई दुकानदार देर तक दुकान खोले रहते हैं. ऐसे में अँधेरे में अकेले जाने वाले दुकानदारों पर, देर तक खुली दुकानों पर अराजक तत्त्वों का हमला भी हो जाया करता है. उनके साथ लूटपाट हो जाती है. जल्दी बाजार बंद होने से इस पर भी नियंत्रण लग सकता है.

इसी तरह यदि बाजार जल्द बंद होगा तो देर रात तक जलने वाली लाइट को भी रोका जा सकता है. इससे विद्युत ऊर्जा की खपत पर नियंत्रण होने से ऊर्जा की बचत की जा सकती है. लाइट चले जाने की स्थिति में जेनरेटर चलने की स्थिति में होने वाले प्रदूषण को भी रोका जा सकता है.

इनके अलावा बहुत से बिंदु ऐसे हैं जो समाजोपयोगी सिद्ध हो सकते हैं. इस तरह के निर्णय को लागू करने के लिए सरकार से ज्यादा सहयोग नागरिकों का, व्यापारियों का चाहिए है. इसके लिए बहुत से ऐसे व्यावसायिक कार्यों का हवाला दिया जा सकता है जो रात को ही संचालित होते हैं. यदि वाकई ऐसा होता है तो ऐसे व्यापारिक कृत्यों को कुछ निश्चित शर्तों के साथ रात में निश्चित अवधि तक के लिए खोलने की अनुमति दी जा सकती है. देखा जाये तो अभी भी कुछ ऐसा ही हो रहा है. बाजार को शाम पाँच बजे बंद करने का नियम है मगर शराब की दुकानों को रात नौ बजे तक खोलने की अनुमति मिली है. वर्तमान की भयावहता और उसके सन्दर्भ में लगाई गई बंदी के बाद प्रकृति में आये सकारात्मक बदलाव को देखते हुए भविष्य की मजबूत इमारत के लिए ऐसे निर्णयों का पालन किया जाना अनिवार्य होना चाहिए. नागरिकों और व्यापारियों को भी इसके लिए अपनी सहमति देनी चाहिए.  

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03 जून 2020

चीनी उत्पाद विरोध के बाद की संभावनाएँ

चीनी उत्पादों के खिलाफ भारत में एक आन्दोलन सा खड़ा होता दिखने लगा है. अगर यह आंदोलन चीन के विरुद्ध सफल हो जाता है तो भारत को इसके अनेक दीर्घकालिक लाभ होंगे.


इसमें पहला लाभ तो चीन को भारत से होने वाले राजस्व में जबरदस्त कमी आएगी. यह कमी लगभग 5 लाख करोड़ रुपये तक के होने का अनुमान है. ऐसा माना जाता है कि इस राजस्व का उपयोग चीन कहीं न कहीं भारत के खिलाफ सीमाओं पर करता है. यदि वाकई इस राजस्व में कमी आती है तो यह धन देश में ही उपयोग में लाया जा सकता है.

इसके अलावा अनेक हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर तथा दूसरे अन्य उत्पाद बनाने वाली कंपनियों को भारतीय बाजार में अपना अस्तित्व खोजना पड़ेगा. ऐसा उनको अपनी हिस्सेदारी में भारतीय भाग के खोने के डर के कारण करना पड़ेगा. ऐसी स्थिति में वे कम्पनियाँ अपनी उत्पादन कंपनियों, कार्यालयों आदि को भारत में लगाने पर विचार करने पर विचार कर सकती हैं.

यह भी संभव है कि भारतीय स्टार्टअप और उद्योगों के लिए चीनी उत्पादों और सेवाओं के रूप में एक विकल्प भी मिल सके. यदि ऐसा होता है तो भारत में विकसित चीनी विकल्पों के लिए भी एक नया रास्ता मिलने की सम्भावना है.

ऐसी स्थिति में कच्चे माल के स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं के लिए योजनाबद्ध रूप से श्रमिक, मजदूर भी उपलब्ध होने की सम्भावनाएं होंगी. इसके साथ-साथ अपने सामान के बेचने हेतु उनको बाजार का विकसित स्वरूप मिल सकेगा. इसमें रोजगार की अपार संभावनाएं भी विकसित हो सकेंगी.


यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि कोरोना संकट और चीन विरोधी भावनाएं भारत के लिए एक बड़ा वरदान बन सकती हैं. ऐसा तभी संभव है जबकि हम एक साथ ऐसा माहौल बनायें और सद्भाव के साथ काम करें. सरकार के प्रति फैलाये जा रहे विरोधी विचारों के बीच भले ऐसा संभव न दिखता हो मगर हम सभी को नफरत को नजरअंदाज करते हुए मेक इन इंडिया को एक वास्तविकता बनाना होगा. 

हालाँकि यह एक संभावना है और यदि इस पर देशव्यापी दृष्टि के साथ कार्य किया जाये तो इसे वास्तविकता में बदलना मुश्किल नहीं होगा. ऐसे में प्रधानमंत्री जी के आत्मनिर्भर भारत के विचार को सार्थक करना कठिन न होगा. 

(मयूरेश गोयल)

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13 मई 2020

संकट में मध्यम वर्ग भी है

वैश्विक महामारी कोरोना के चलते लागू किया गया लॉकडाउन अब मध्यम वर्ग के लिए भी भारी पड़ने लगा है. यह संकट लॉकडाउन खुलने के बाद और अधिक गहराएगा. इस पर चर्चा से पहले इसकी पीठिका पर विचार कर लिया जाये. लगभग दो माह पूर्व लॉकडाउन के लागू होने के तुरंत बाद से ही दिहाड़ी मजदूरों के लिए आय के सारे स्त्रोत बंद हो गए थे. उनकी रोजी-रोटी का संकट उत्पन्न हुआ. ये वे लोग हैं जिनके पास रोज कुआँ खोद कर रोज पानी पीने वाली स्थिति होती है. ऐसी स्थिति से जूझने वाले केवल दिहाड़ी मजदूर अथवा कामगार ही नहीं हैं बल्कि इसमें पटरी, रेहड़ी वाले अत्यंत निम्न श्रेणी के दुकानदार भी शामिल माने जा सकते हैं. इनकी व्यापारिक गतिविधि भी लॉकडाउन के कारण ठप्प हो गई.


लॉकडाउन में सम्पूर्ण बाजार बंद करवाए जाने से सभी प्रकार के व्यापारिक प्रतिष्ठानों के आय के स्त्रोत प्रभावित हुए. सभी तरह के उद्योग बंद करवा दिए गए. सभी तरह की व्यापारिक क्रियाओं को प्रतिबंधित करवा दिया गया. सभी तरह का व्यावसायिक परिवहन रोक दिया गया. अत्यावश्यक सेवाओं को छोड़कर सभी तरह की व्यापारिक गतिविधियों के ठप्प हो जाने से सारा जनजीवन रुक सा गया था. लॉकडाउन के आरंभिक दौर दिहाड़ी मजदूरों, कामगारों, रेहड़ी, पटरी वाले दुकानदारों की आजीविका की समस्या को मुख्य रूप से हल करने की कोशिश की गई. प्रथम दृष्टया यह सही भी था क्योंकि इन लोगों के सामने राशन-भोजन-पानी का संकट उत्पन्न होना स्वाभाविक था. इस गंभीर स्थिति को समझते हुए न केवल शासन-प्रशासन ने बल्कि समाजसेवियों ने इनकी सहायता करना आरम्भ कर दिया. सहायता के लिए उठे हाथों ने न केवल अपने शहर के ऐसे मजबूर लोगों का साथ दिया वरन दूसरे जनपदों, राज्यों से आये मजदूरों को भी सहायता उपलब्ध करवाई.




अब जबकि लॉकडाउन तीन दौर पार करने की स्थिति में आ गया है, शासन-प्रशासन को और सामाजिक संगठनों को दिहाड़ी मजदूरों, कामगारों के साथ-साथ ऐसे परिवारों, ऐसे वर्ग की तरफ भी ध्यान देने की आवश्यकता है जो दिहाड़ी मजदूर, कामगार अथवा दिहाड़ी कमाई जैसा भले ही न हो मगर उसकी स्थिति लगभग इसी के जैसी है. रेहड़ी, पटरी वाले दुकानदारों के अलावा समाज में ऐसे हजारों दुकानदार हैं जिनकी पारिवारिक आजीविका उनके व्यापार पर ही केन्द्रित है. इन्हीं दुकानदारों के सहायकों के रूप में हजारों की संख्या में ऐसे कर्मचारी भी हैं जो इसी व्यापारिक संरचना में अपना भरण-पोषण कर रहे थे. लॉकडाउन के आरंभिक दौर में ऐसा महसूस हो रहा था कि कुछ दिन की इस असामान्य स्थिति से निकलने का उपाय खोज लिया जायेगा अथवा स्थिति स्वतः ही सामने आकर कोई न कोई रास्ता बनाएगी. दुर्भाग्य से ऐसा कुछ न हो सका. समय के साथ कोरोना संक्रमण का आतंक बढ़ता ही रहा और उसी के साथ लॉकडाउन की अवधि को दो बार और बढ़ाना पड़ा. इससे इस वर्ग के सामने भी आर्थिक संकट, भरण-पोषण का संकट आकर खड़ा हो रहा है.

इस सन्दर्भ में विचारणीय होना चाहिए कि छोटे और मंझोले दर्जे के दुकानदार, उनके कर्मचारी और ऐसे मध्यम वर्गीय परिवार जिनकी आय सीमित है, जिनकी बचतें अल्प हैं, जिनके पास अपनी आजीविका को चलाने के लिए, अपने व्यापार को संचालित करने के लिए बैंक सहित अन्य वित्तीय संस्थाओं के ऋण हैं, वे भी दिहाड़ी मजदूरों, कामगारों की तरह अब संकट में हैं. विगत लगभग दो माह की अवधि में व्यापारिक गतिविधि का ठप्प रहना, वित्तीय संस्थाओं के ऋणों के ब्याज का चुकाया जाना, अल्प बचतों का पारिवारिक खर्चों में समाप्त हो जाना आदि ऐसे परिवारों के लिए भी संकट का कारण बन रहा है. सामाजिक रूप से अथवा शासन स्तर पर अभी सहायता उन लोगों तक पहुँच रही है जो फुटपाथ पर जीवन गुजार रहे हैं, झुग्गी-झोपड़ी में गुजर-बसर कर रहे हैं या फिर बेसहारा हैं. देखा जाये तो अब उन बहुत से परिवारों को भी सहायता की आवश्यकता है, जो अपने रोजगार के, व्यापार के, कार्य के बंद होने के कारण आर्थिक अभाव की स्थिति में आ गए हैं. छोटे-मंझोले दर्जे के दुकानदारों का, उनके कर्मचारियों का, ऐसे वेतनभोगियों का जो किसी दूसरे संस्थान की आय पर निर्भर हैं, समय अब वाकई कठिनता से गुजर रहा है.

ऐसे परिवार, व्यक्ति अपने छोटे से व्यापारिक प्रतिष्ठान के चलते सामाजिक स्थिति प्राप्त किये हुए हैं जिसके चलते सहज रूप में समाज इनकी आर्थिक तंगहाली को समझ नहीं पा रहा है. ये वर्ग ऐसा भी है जो अपनी आर्थिक समस्या को समाज के सामने प्रस्तुत भी नहीं कर पा रहा है. सामाजिकता, प्रतिष्ठा आदि के चलते वह उस कतार में भी नहीं लग पा रहा है जहाँ गरीबों के लिए भोजन वितरण किया जा रहा है. ऐसे में न केवल समाज को बल्कि शासन-प्रशासन को ऐसे परिवारों की मदद के लिए आगे आना चाहिए. इसके अलावा इस वर्ग को लॉकडाउन खुलने के बाद भी अनेक तरह की नकारात्मक गतिविधियों का सामना करना पड़ेगा. ऐसे छोटे और मंझोले दुकानदारों, जिनका कपड़ों का, गारमेंट्स का, इलेक्ट्रॉनिक्स का, खाद्य सामग्री का व्यापार है, उनको लॉकडाउन के बाद बाजार खुलने पर एक अनिश्चित नुकसान का सामना करना पड़ेगा. लम्बे समय से दुकानों के न खुलने की स्थिति के कारण सीलन, चूहों आदि के चलते सामानों के ख़राब होने की आशंका अधिक है. इस अप्रत्याशित नुकसान की भरपाई इन्हीं दुकानदारों के हिस्से आएगी. ऐसे में भले ही देश का शीर्ष नेतृत्व सभी कर्मियों को इस बंदी के समय का वेतन देने की बात कह रहा हो मगर छोटे और मंझोले दुकानदारों को ऐसा कर पाना संभव ही न होगा.

इसके साथ-साथ जैसी कि लगातार बात की जा रही है लम्बे समय तक कोरोना के साथ जीवन यापन करने की तो संभव है कि लॉकडाउन हटने के बाद भी लम्बे समय तक व्यापारिक गतिविधियाँ सुचारू रूप से संचालित न हो सकें. इससे भी छोटे और मंझोले दुकानदारों की आय प्रभावित रहेगी. भले ही लॉकडाउन को शर्तों के साथ खोल दिया जाये मगर छोटे, मंझोले दुकानदारों और सीमित आय वाले मध्यमवर्गीय परिवारों के भरण-पोषण के प्रति शासन-प्रशासन को, समाजसेवियों को ध्यान देने की आवश्यकता है.

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24 अक्टूबर 2019

ऑनलाइन मार्केटिंग के हाथों बाजार ठप्प न हो जाये

समय जब साथ नहीं होता है तो कुछ भी सही से नहीं चलता है. न सामान्य से काम सहज लगते हैं और न ही असामान्य काम करने की हिम्मत होती है. इस काम न करने की मानसिकता का असर ये रहा कि विगत कई दिनों से कोई पोस्ट लिखने का भी मन नहीं किया. इस बारे में एक तो कुछ अच्छा न लगना रहा साथ ही लैपटॉप का ख़राब होना भी रहा. लैपटॉप लेने के बारे में विगत कुछ माह से विचार चल रहा है मगर उस पर अंतिम मुहर न लग सकी है. इधर अपने अभिन्न मित्रों से लगातार मुलाकात होती रही, चर्चा होती रही जो इसी व्यापार से जुड़े हुए हैं. लैपटॉप या अन्य कोई सामान लेने पर उनकी राय को वरीयता दी जाती है. इधर देखने में आया कि बाजार जैसे खामोश है. बहुतेरे लोग इसका कारण मंदी को बता सकते हैं, केंद्र सरकार की नीतियों को बता सकते हैं मगर असलियत इससे कुछ अलग ही है. पिछले कुछ सालों से जिस तरह से ऑनलाइन मार्केटिंग की तरफ लोगों का बढ़ना हुआ है, ऑनलाइन मार्केटिंग से जुड़ी बहुत सी कंपनियों के लुभावने और सस्ते ऑफर लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करने में लगे हैं. जिस तरह की और जितनी योजनायें इनके द्वारा चलाई जा रही हैं, उतनी किसी भी दुकानदार के द्वारा, किसी भी व्यापारी के द्वारा नहीं चलाई जा सकती हैं. ऐसे में स्पष्ट है कि आम नागरिक जो एक-एक पैसे को बचाने में विश्वास करता है, वह ऑनलाइन मार्केटिंग की तरफ ही दौड़ेगा. ऐसे में इन व्यापारियों का, दुकानदारों का घाटे में चले जाना, दिन भर बिना किसी व्यापार के बैठे रहना स्वाभाविक है. 

ऐसे में सरकार को चाहिए कि कुछ कदम इन व्यापारियों के, दुकानदारों के हितार्थ भी उठाये. ध्यान रखना चाहिए कि भारत का बाजार अभी ऐसा नहीं है कि यहाँ सभी काम ऑनलाइन मार्केटिंग के द्वारा चलते रहें. आज भले ही बाजार में गलाकाट प्रतियोगिता सहजता से चलती दिख रही हो, उसमें किसी को कुछ गलत न दिख रहा हो मगर ऐसा मानवीय मूल्यों के पक्ष में नहीं है. दुकानदार, व्यापारी किसी भी प्रतियोगिता में भले हो मगर वह पहले एक आम नागरिक है. उसे भी व्यापार करने का, अपनी आजीविका चलाने का पूरा अधिकार है. यहाँ सरकारों को ध्यान देना चाहिए कि यदि किसी भी तरह से इनका शोषण हो रहा है तो उसे रोका जाये. अब इसे सरकार तय करे कि कैसे इस देश में एकसाथ ऑनलाइन मार्केटिंग और बाजार के दुकानदार-व्यापारी अपने-अपने हितों का संरक्षण कर सकें.