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27 अप्रैल 2025

नफरत फ़ैलाने वाले भी तुम

अनुभव कीजिए कि क्या पहलगाम हत्याकांड के ठीक पहले मिनट तक किसी ने पोस्ट किया कि पहलगाम के मुसलमानों की सेवा न ली जाए?


दो चार मुसलमानों की तात्कालिक सहायता के वशीभूत क्या ये भुला दिया जाएगा कि उन आतंकियों ने ही हिन्दू, मुस्लिम की पहचान करने के बाद ही गोली मारी?


पर्यटकों को घुमाने और अन्य सेवायें देने वाले स्थानीय मुसलमान जो अब सीना ठोंक कर सहायता करने का झंडा गाड़ रहे, उस समय मिलकर आतंकियों का मुक़ाबला करने का दम क्यों न दिखा पाए?


हिन्दू मुस्लिम उन आतंकियों ने शुरू किया था, उसका विरोध बंद हो गया, क्यों?


इस घटना ने आतंकियों को अब नया ढंग दे दिया है हत्याएं करने का. अब वे विशुद्ध काफिरों को ही मार सकेंगे. अपने मजहबियों की हत्या करने का दोष अब उनके सिर नहीं आयेगा.


इस घटना के दौरान या बाद में सम्भव है कि स्थानीय लोगों में सहायता की होगी पर क्या मात्र इसी कारण से भुला दिया जाए कि जो लोग मारे गए, उनको मुसलमान न होने के कारण मारा गया?


फिर हिन्दू मुसलमान कौन कर रहा?


आँखें खोलिए और सजग, सचेत, सुरक्षित रहिए. ज़्यादा भावनाओं में बहने से पहले आतंकवाद का इतिहास देख लें, कट्टरपंथियों की मानसिकता देख लें. यहाँ वक़्फ़ के ख़िलाफ़ बोलने पर शहर भर आग में जलने लगता है. एक पोस्ट लगाने पर दर्जी का गला काट दिया जाता है. क्रिकेट के विवाद में मुहल्ले भर में मारा-काटी मचा दी जाती है.


और आप सब कहते हो कि नफ़रत हम फैलाते हैं. सच को पहचानो और उसे सामने लाने की कुव्वत रखो.


05 सितंबर 2023

साम्प्रदायिक राजनीति का बढ़ता चलन

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे और राज्य सरकार में मंत्री उदयनिधि स्टालिन के सनातन उन्मूलन सम्बन्धी बयान को महज मानसिकता समझ कर दरकिनार नहीं किया जा सकता है. असल में धर्म और राजनीति का आपस में जिस तरह से घालमेल कर दिया गया है, उसके बाद से ऐसे बयान आश्चर्य नहीं. इसके पहले भी अनेकानेक बार इस तरह के बयान सामने आये जहाँ कि राजनीति को धर्म के द्वारा चमकाने का काम किया गया. आज भले ही प्रत्येक राजनैतिक दल अपने हित साधने हेतु धर्म का सहारा लेते दिख रहे हों किन्तु यह कार्य स्वतंत्रता के पहले से होता आया है. अंग्रेजों ने धर्म का सहारा लेकर ही 1857 के स्वतंत्रता संग्राम को प्रभावित किया था. उन्होंने फूट डालो और राज करो की नीति अपनाई. इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि धर्म के नाम पर हिन्दू और मुसलमानों के बीच अनेक दंगे हुए और अंततः सन 1947 में देश को धार्मिक आधार पर विभाजित कर दिया गया.


साम्प्रदायिकता की इस आग ने देश को आज तक अपने कब्जे में ले रखा है. यह विचारणीय है कि ऐसा तब हो रहा है जबकि वर्ष 1976 में 42वें संशोधन के द्वारा संविधान की प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को अंकित कर भारत को धर्मनिरपेक्ष घोषित किया गया. प्रस्तावना में इसके बाद स्पष्ट रूप से उल्लिखित है कि ‘हम, भारत के लोगभारत को एक संप्रभु समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने और इसके सभी नागरिकों को सुरक्षित करने का गंभीरता से संकल्प लेते हैं.’ यहाँ धर्मनिरपेक्ष का सीधा सा अर्थ है कि सरकार और धार्मिक समूहों के बीच सम्बन्ध संविधान और कानून के अनुसार निर्धारित हैं. यह राज्य और धर्म की शक्ति को अलग करता है.




धर्म और राजनीति का समाज पर गहरा प्रभाव रहता है. इनके द्वारा राष्ट्र के, मानव के विकास को नयी दिशा प्राप्त होती है. ऐसे में धर्म और राजनीति को समझने की आवश्यकता है. शास्त्रसम्मत विचार से जिसे धारण किया जा सके वह धर्म है. यह वो क्रिया है जो मानव को जीने का रास्ता दिखाती है. यदि विस्तीर्ण रूप में देखें तो हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, जैन, बौद्ध आदि धर्म नहीं बल्कि सम्प्रदाय हैं. इसी तरह योजनाबद्ध नीति एवं कार्यक्रमों का सञ्चालन करना ही राजनीति है. जनता के सामाजिक, मानसिक, शैक्षणिक, आर्थिक स्तर आदि को विकास की राह पर ले जाना ही इसका लक्ष्य होता है. धर्म में राजनीति को शामिल नहीं किया जा सकता किन्तु राजनीति बिना धार्मिकता के साथ नहीं हो सकती है. बिना धर्म के राजनीति मूल उद्देश्य से भटक जायेगी, मानव-कल्याण की भावना से परे हो जाएगी. मानव-कल्याणयुक्त धर्म से की गयी राजनीति ही धर्मनिरपेक्षता को प्रतिपादित करती है.


धर्म और राजनीति के इस विवेचन के मूल में छिपा है कि राज्य का कोई धर्म नहीं होता है. वह सभी धर्मों का सम्मान करते हुए उनको एकसमान दृष्टि से देखता है. यह किसी भी शासन की राज्य की प्रमुखता में शामिल है कि वह किसी धर्म विशेष के विकास हेतु कार्य नहीं करेगा और न ही किसी तरह के धार्मिक हस्तक्षेप हेतु स्वयं को अग्रणी भूमिका में लायेगा. धर्मनिरपेक्षता का यही वास्तविक स्वरूप है. इसके बाद भी न केवल राजनैतिक व्यक्तित्व, राजनैतिक दल धर्म के द्वारा अपनी-अपनी राजनीति को चमकाने में लगे हैं बल्कि राज्य भी इसी तरह की गतिविधियों में लिप्त होने लगे हैं. ऐसी गतिविधियाँ चुनावों के समय स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगती हैं. पूर्व में हुए चुनावों में शाही इमाम द्वारा एक दल विशेष को मतदान करने की अपील राजनैतिक मंच से की गई तो एक प्रतिष्ठित पत्रिका के पत्रकार ने टिप्पणी करते हुए लिखा था कि ‘समाजवाद और गणतंत्र की बात करने वाले लोग अगर इमाम के नाम से वोट पाना चाहेंगे तो हो सकता है कि कुछ लोग शंकराचार्य के नाम पर वोट माँगने लगें. फिर क्या, इस देश को शंकराचार्य और इमाम के बीच चुनाव करना होगा.’ यह सामान्य टिप्पणी नहीं है. आज बहुत तेजी के साथ यही हो रहा है. अब धार्मिक संगठनों से जुड़े लोग खुलकर राजनैतिक दलों के लिए, राजनेताओं के लिए वोट माँगते हैं.


धर्म किसी भी व्यक्ति के आंतरिक विश्वास का विषय होता है. इसके माध्यम से व्यक्ति न केवल स्वयं को सुरक्षित समझता है बल्कि सकारात्मक रूप से प्रभावित भी मानता है. इतिहास में भी किसी समय शासन का आधार धर्म हुआ करता था. तब धर्म के आधार पर व्यक्तियों के, जनता के क्रियाकलापों को संचालित किया जाता था, नियंत्रित किया जाता था. वर्तमान में संवैधानिक रूप से ऐसा न होने के बाद भी राजनैतिक दलों द्वारा संवैधानिक अनुच्छेदों का कथित रूप से फायदा उठाकर धर्म के द्वारा राजनीति को चमकाया जा रहा है. संविधान के अनुच्छेद 25 के अनुसार धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है, अनुच्छेद 26 के द्वारा धार्मिक संस्थानों की स्थापना का अधिकार मिला है, अनुच्छेद 29 और 30 नागरिकों, विशेष रूप से धार्मिक अल्पसंख्यकों को मौलिक अधिकार प्रदान करते हैं. इन संवैधानिक अधिकारों को राजनैतिक दल सत्ता प्राप्ति के लिए इस्तेमाल करते रहते हैं. सार्वजानिक स्थलों पर धार्मिक कृत्यों को समर्थन देना, शैक्षणिक संस्थानों की आड़ में मजहबी शिक्षा प्रदान करना, अल्पसंख्यकों के नाम पर दबाव समूह के रूप में राजनीति करना इन्हीं अनुच्छेदों की आड़ लेकर किया जाने लगता है. समय-समय पर अलग राज्य की माँग, धार्मिक स्थलों का उपयोग राजनीतिक कार्यों के लिए करने जैसे कदम उठाये जाते रहते हैं. पंजाब, जम्मू-कश्मीर, दक्षिण भारत के राज्य इसके ज्वलंत उदाहरण हैं. यहाँ धर्म के नाम पर ही अलगाव की स्थिति एक पल में ही हिंसक रूप धारण कर लेती है. इसी अलगाववाद का लाभ उठाकर राजनैतिक दलों द्वारा मतदान को प्रभावित कर लिया जाता है. धार्मिकता के आधार पर प्रत्याशियों का चयन, धर्म के आधार पर मतदान, उसी आधार पर मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व के द्वारा नागरिकों की धार्मिक भावनाओं से खेला जाता है.


देखा जाये तो ये राजनैतिक दल राजनीति में धर्म का समावेश नहीं कर रहे हैं बल्कि धर्म में राजनीति का घालमेल करने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं. इसका खामियाजा समाज को, नागरिकों को भुगतना पड़ता है. जरा सी बात को हिन्दू, मुस्लिम अथवा किसी अन्य सम्प्रदाय से संदर्भित करके नागरिकों की भावनाओं को भड़का दिया जाता है. ऐसे एक-दो नहीं सैकड़ों उदाहरण हैं जबकि देश इस कारण से हिंसा की आग में जला. देश में वर्तमान दौर में अनेक धार्मिक, मजहबी प्रवृत्तियाँ राजनीति पर प्रभावी रूप से हावी हैं. इनका अराजक राजनैतिक रूप भारतीय लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है. साम्प्रदायिकता के बढ़ते प्रभाव से देश की धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रीय एकता और अखंडता को खतरा है. इस समस्या का समाधान देश के लिए आवश्यक है और इसे हम सभी नागरिकों को, राजनैतिक दलों को मिलकर ही निकालना होगा. इसके लिए सर्वोपरि एक काम हो और वो है राजनीति से धार्मिक उन्माद का समाप्त होना. 





 

08 जनवरी 2016

पठानकोट और मालदा के संकेत


नववर्ष आते ही देश में एकदम से भूचाल ला देगा, इसका कतई अंदाज़ा नहीं था. मात्र एक सप्ताह के भीतर ही देश में दो अलग-अलग घटनाओं के चलते हलचल मच गई. पठानकोट में आतंकी घुसपैठ और पश्चिम बंगाल के मालदा में साम्प्रदायिक हिंसा. पठानकोट की आतंकी घटना ने जहाँ एक तरफ हमारी सुरक्षा व्यवस्था को आईना दिखाया है वहीं पाकिस्तान के साथ शांति-वार्ता जैसी पहल की आशंका को भी चकनाचूर सा किया है. ऐसा इसलिए क्योंकि चंद रोज पहले ही देश के प्रधानमंत्री ने एकाएक पाकिस्तान की यात्रा करके सबको भौचक कर दिया था. उनकी इस औचक यात्रा के साये में उपजे कुछ हलके-फुल्के पलों और उसके बाद की गतिविधियों के चलते ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कुछ सकारात्मक कदम उठें. हालाँकि पाकिस्तान अपनी आदतों से बाज़ आने वाला नहीं था, ऐसा मानना था तथापि एक नई पहल हो इसकी गुंजाईश से इंकार भी नहीं किया जा सकता था. देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पाकिस्तान की उस औचक यात्रा के अपने निहितार्थ निकाले जा सकते हैं, जो पाकिस्तान की, वहाँ की सेना की आतंकवाद के सापेक्ष असलियत को ही उजागर करते हैं.
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देखने और सोचने की बात है कि मोदी जी जितनी देर पाकिस्तान में ठहरे, उतनी देर पाकिस्तान में कहीं से भी किसी आतंकी घटना की खबर नहीं आई, वहाँ कहीं भी कोई बम नहीं फूटा. इसके साथ-साथ भारत में कहीं से भी किसी पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन ने अपनी कोई गतिविधि अंजाम नहीं दी. जबकि ये सर्वविदित है कि मोदी जी पाकिस्तान-समर्थित आतंकवादियों की हिट-लिस्ट में सबसे ऊपर हैं. स्पष्ट है कि मोदी जी की सुरक्षा व्यवस्था चौकस रखने की मजबूरी और मोदी जी को मिलते अंतर्राष्ट्रीय समर्थन के चलते उनके पाकिस्तान में रहने के दौरान वहाँ के हुक्मरान, वहाँ की सेना, वहाँ के सत्ताधीश लोगों ने किसी न किसी तरह आतंकी कार्यवाहियों को नियंत्रित किये रखा. इस घटनाक्रम ने सम्पूर्ण विश्व में एक सन्देश भी प्रसारित किया था कि यदि पाकिस्तान की सेना, वहाँ के सत्ताधारी यदि चाह लें तो कोई भी आतंकी संगठन एक बम धमाका भी नहीं कर सकता है. ऐसे में यात्रा के तत्काल बाद ही पठानकोट पर आतंकी हमला सारी कहानी स्पष्ट करता है. ये कहीं न कहीं आतंकियों की वो खीझ है जो मोदी जी की यात्रा के बाद उपजी है, एक तरह की हताशा है जो कहीं न कहीं पाकिस्तान के कुछ उदार कदमों के उठाये जाने की सम्भावना से उपजी होगी.
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इस बाहरी हमले के साथ-साथ पश्चिम बंगाल में मालदा में हुए हिंसात्मक प्रदर्शन ने भी हमें डराया है. पूरे दिन लाखों मुस्लिम उन्मादी सडकों पर उत्पात मचाते रहे, निजी, सार्वजनिक संपत्ति को लूटते, मिटाते, जलाते रहे, पुलिसवालों को, मासूम नागरिकों को मारते रहे किन्तु उनको नियंत्रित करने कोई आगे नहीं आया. मजहबी उन्माद का इससे भयंकर उदाहरण और क्या होगा जबकि लगभग ढाई लाख मुस्लिमों ने बेख़ौफ़ उत्पात मचाना आरम्भ कर दिया. ये समझने वाली बात है कि कल को देश में यदि कोई बड़ा आतंकी हमला हो जाये और उसी समय देश में कई-कई जगहों पर मालदा जैसी स्थितियाँ पैदा हो जाएँ तो सुरक्षा, शांति व्यवस्था को संभालना किसी भी सरकार के लिए परेशानी का सबब बन जाएगी. इससे भी भयावह स्थिति ये रही कि उत्तर प्रदेश के दादरी में अख़लाक़ के साथ हुई घटना को मीडिया ने जिस तरह से वैश्विक स्तर पर उभार दिया था; देश के कथित धर्मनिरपेक्ष लोगों ने पुरस्कार/सम्मान वापसी का घृणास्पद कार्य करना शुरू कर दिया था; गैर-भाजपाई राजनैतिक दलों ने जिस तरह से वैमनष्यतापूर्ण बयानबाज़ी की थी वे सब मालदा की हिंसा पर शांति धारण किये रहे. तुष्टिकरण की नीति राजनीति से निकल कर अब समाज में, मीडिया में जिस तरह से फ़ैल रही है वो भविष्य के लिए घातक संकेत है.
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फ़िलहाल तो पठानकोट का आतंकी हमला कई सवाल छोड़ गया; मालदा की साम्प्रदायिक हिंसा ने भी कई सवाल छोड़े हैं किन्तु अब इनको अनदेखा किया जाना राष्ट्रहित में नहीं होगा. सरकार के लिए जितना आवश्यक बाहरी आतंकी ताकतों से लड़ना है उससे कहीं अधिक आवश्यक आंतरिक ताकतों से निपटना भी है. ये आंतरिक आतंकी ताकतें अलग-अलग, नामालूम से स्वरूप में हमारे तंत्र के साथ मिली-जुली हैं और यही कारण है कि इनके द्वारा कभी पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगाये जाते हैं कभी पाकिस्तान के, कभी आईएसआईएस के झंडे फहराए जाते हैं, कभी भारत मुर्दाबाद का शोर उठाया जाता है, कभी तिरंगा जलाया जाता है. ऐसे में स्पष्ट रूप से संकेत स्वतः मिलता है कि अब शांति और ज्यादा देर तक नहीं, अब धैर्य बहुत समय तक नहीं. पठानकोट में शहीद सैनिकों को, मालदा के हिंसात्मक प्रदर्शन में मारे गए मासूम नागरिकों को विनम्र श्रद्धांजलि के साथ यही कामना कि सबकुछ जल्द सही हो.

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06 अक्टूबर 2015

राजनीति-प्रेरित हिन्दू-मुस्लिम विभेद

गाय का माँस पकाने की अफवाह या फिर सत्यता, इसके प्रत्युत्तर में भीड़ का हमलावर हो जाना. हमलावर भीड़ का एक व्यक्ति के साथ मारपीट करना और अंततः उसे जान से ख़तम कर देना. ये किसी फिल्म का अथवा धारावाहिक का हिस्सा नहीं, किसी कहानी का कोई हिस्सा नहीं वरन हमारे देश का ही एक सच है. ऐसी किसी भी घटना के बाद उस पर धर्म-जाति संदर्भित राजनीति शुरू कर दी जाती है, जो अपने आपमें अत्यंत शर्मनाक है. कुछ ऐसा ही इखलाक वाले मामले में किया जा रहा है. भीड़ द्वारा उसकी हत्या किये जाने के बाद से सम्पूर्ण घटनाक्रम को हिन्दू-मुस्लिम विरोधी बताकर, भाजपा-संघ समर्थित बताकर राजनीति की जा रही है. इसी राजनीति का परिणाम ये हुआ कि मृत व्यक्ति के परिजनों को दस लाख मुआवजे की राशि बढ़ते-बढ़ते 45 लाख तक पहुँच गई. इसके साथ ही प्रदेश सरकार द्वारा इसका भी आश्वासन दिया गया कि किसी एक परिजन को नौकरी भी दी जाएगी. संवेदनात्मक रूप से किसी भी पीड़ित परिवार के लिए कुछ भी करना सहज स्वीकार्य है किन्तु राजनीति के चलते, वोट-बैंक के चलते सरकारी स्तर पर ऐसा किया जाना किसी भी रूप में  सही नहीं है. ऐसा भी नहीं है कि प्रदेश में इस तरह की ये पहली घटना है; ऐसा भी नहीं है कि ऐसी किसी भी वारदात में मारे गए सभी व्यक्तियों को इसी तरह की सरकारी मदद मिलती रही है. ऐसे में स्पष्ट है कि खुद सरकारी स्तर पर नफरत फ़ैलाने का, आपस में द्वेष बढ़ाने का कार्य किया जा रहा है.
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इस पूरी घटना को सम्बंधित क्षेत्र के हिन्दुओं द्वारा मुसलमानों के खिलाफ साम्प्रदायिक माहौल बनाने और उनको प्रताड़ित करने की तरफ मोड़ा जा रहा है. इसको पुष्ट करने के लिए बार-बार इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि गौमाँस की अफवाह महज इसलिए उड़ाई गई ताकि वहाँ के हिन्दू मुसलमाओं को मार सकें. सोचने वाली बात है कि क्या वाकई ऐसा था? यदि ऐसा ही होता तो उस गाँव के अन्य मुस्लिम परिवारों के साथ किसी तरह की मारपीट वहाँ के हिन्दुओं द्वारा क्यों नहीं की गई? यदि गौमाँस उस व्यक्ति के घर में नहीं पकाया जा रहा था तो फिर उसके द्वारा दिखाने से मना क्यों किया गया? बहरहाल, ये बातें जाँच का विषय हैं किन्तु जिस तरह से पूरे घटनाक्रम को हिन्दू-मुस्लिम विभेद से जोड़ा गया वो अत्यंत निंदनीय है. जो भी इस तरह की बात कर रहा है उसे सम्पूर्ण परिप्रेक्ष्य में इस घटना को देखना होगा. प्रदेश सरकार के अनेकानेक क़दमों से स्पष्ट तौर पर परिलक्षित होता है कि उसके लिए एक जाति विशेष और एक धर्म विशेष ही प्राथमिकता में रहते हैं. इस कारण से इस जाति और धर्म के लोगों द्वारा लगातार निरंकुशता का व्यवहार किया जाने लगता है और ये बात किसी से छिपी भी नहीं है. इसके अलावा पूरे उत्तर भारत की राजनीति में मुस्लिम वर्ग को हमेशा से वोट-बैंक के रूप में देखा जाता रहा है. इधर लोकसभा चुनावों में विभिन्न गैर-भाजपाई राजनैतिक दलों द्वारा बखूबी दुष्प्रचार किया गया कि भाजपा के आने से मुसलमानों को खतरा होगा; मोदी के प्रधानमंत्री बनने से मुसलमानों के खिलाफ वातावरण बन जाएगा; भाजपा के सत्तासीन होते ही संघ का एजेंडा काम करने लगेगा. ऐसे में ऐसी किसी भी घटना पर शक की सुई गैर-भाजपाई राजनैतिक दलों पर भी आकर टिकती है. आखिर किसी मुसलमान के साथ ऐसी वारदात हो जाने पर सभी राजनैतिक दलों के द्वारा उसके घर-परिवार से मिलने-जुलने का, मुआवजा राशि का, नौकरी देने का, अन्यान्य तरीके से सहायता देने का काम शुरू हो जाता है. क्या इसी तरह की चहलकदमी किसी हिन्दू व्यक्ति के मारे जाने पर होती है? ऐसे में स्पष्ट तौर पर लगता है कि गैर-भाजपाई दल ही प्रदेश में, देश में हिन्दू-मुस्लिम विरोधी माहौल बनाने का कार्य कर रहे हैं.
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ये आम जनमानस को समझना होगा कि इस तरह के विवाद से किसी भी वर्ग का लाभ होने वाला नहीं है. ये भी समझना होगा कि राजनैतिक दलों की सम्पूर्ण सत्ता इस तरह के विवादों के साए में ही पलती-बढ़ती है. यदि प्रदेश में अथवा सम्पूर्ण देश में  हिन्दू और गैर-हिन्दू आपस में सिर्फ और सिर्फ विभेदकारी स्थिति में, वैमनष्यता में रह रहे होते तो इसी देश-प्रदेश में सदभाव के उदाहरण देखने को नहीं मिलते. इसी प्रदेश में जहाँ एक तरफ गाय के माँस को पकाए जाने के चलते एक मुस्लिम व्यक्ति की हत्या कर दी जाती है, वहीं दूसरी तरफ इसी प्रदेश में एक मुस्लिम युवक कुँए में गिरी गाय को बचाने के लिए अपनी नमाज बीच में छोड़कर कुँए में उतर जाता है. इसी प्रदेश में जहाँ मुस्लिम समुदाय द्वारा आपत्ति जताने के कारण मंदिर से लाउडस्पीकर उतारे जाने का विवाद होता है वहीं इसी प्रदेश में मंदिर में मुस्लिमों को नमाज अता करने दी जाती है, मंदिर में ही एक मुस्लिम महिला का प्रसव कराया जाता है. ऐसे एक-दो नहीं अनेक उदाहरण हैं जिनके आलोक में समझा जा सकता है कि राजनैतिक दलों के द्वारा लगातार कुप्रयास के बाद भी प्रदेश में सदभाव जैसी स्थिति बनी हुई है. इस सन्दर्भ में इसी सजगता को बनाये रखने की आवश्यकता है. सरकारी रवैया इस तरह का है जिससे पक्षपात की बू स्पष्ट रूप से आती है, ऐसे में हिन्दू-मुस्लिम, दोनों पक्षों को अत्यंत सजगता से, धैर्य से काम लेने की जरूरत है. किसी भी तरह से यदि घटनाओं की लगातार पुनरावृत्ति होती है तो फिर इसका नकारात्मक प्रभाव समाज पर पड़ता है. उग्र गतिविधियाँ, हिंसक आन्दोलन जनमानस की संपत्ति को ही नुकसान पहुंचाते हैं. स्कूल, बाजार, कार्यालय प्रभावित होने से जनमानस को ही समस्या उत्पन्न होती है. दंगाई, फिरकापरस्त, लुटेरे आदि सक्रिय होकर अपना हित सिद्ध करने लगते हैं और इन सब बातों से किसी का भी भला नहीं होता है.

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विगत कुछ समय से प्रदेश में इस तरह का माहौल बन रहा है जहाँ एक जरा सी बात से बड़ी से बड़ी घटना होने की आशंका है. ऐसे माहौल के निर्माण में कहीं न कहीं शासन-प्रशासन की महती भूमिका है. किसी भी पक्ष के उत्पात करने वाले लोगों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्यवाही किये जाने की आवश्यकता है, जैसा कि कदापि नहीं किया जा रहा है. वास्तविकता की गहन जाँच किये बिना सरकारी धन को मुआवजे के रूप में लुटा देना भी समाज में अलगाव पैदा कर रहा है. एक पक्ष को पूर्वाग्रही रूप से दोषी मानकर उसके खिलाफ कार्यवाही करते जाना भी दूसरे पक्ष के विरुद्ध वातावरण का निर्माण करता है. शासन-प्रशासन को भी इस बारे में सचेत होने की, पूर्वाग्रह-रहित होने की जरूरत है. किसी धर्म-जाति को महज वोट-बैंक मानने से, सत्तालोभ की खातिर वैमनष्यता फैलाने से, उत्तेजक बयानों के द्वारा वर्ग-विशेष की सहानुभूति लेने से, कोई भी घटना देश-प्रदेश के किसी भी भाग में हो उसके लिए सिर्फ और सिर्फ हिन्दुओं को, भाजपा को, संघ को, मोदी को आरोपी बना देने से भले ही क्षणिक लाभ मिल जाए किन्तु कालांतर में इस विषबेल के दुष्प्रभाव समाज को ही झेलने होंगे, हमारे-आपके नौनिहालों को सहने होंगे, हिन्दू-मुस्लिम दोनों वर्गों को उठाने होंगे. सँभलना आज ही होगा क्योंकि कल तक बहुत देर हो चुकी होगी. 
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17 सितंबर 2015

धार्मिक कट्टर होते जा रहे हम


आप सभी को गणेश चतुर्थी पर्व की शुभकामनायें. वर्तमान में हमारे समाज का ताना-बाना कुछ इस तरह का हो गया है कि धार्मिक अनुष्ठानों-पर्वों-आयोजनों आदि पर शुभकामनाओं का आदान-प्रदान भी विवाद की विषयवस्तु बन जाता है. ऐसा किसी एक धर्म विशेष के प्रति न होकर कमोबेश सभी धर्मों के साथ हो रहा है. किसी भी धार्मिक दिवस के, पर्व के आने की आहट मात्र ही उन फिरकापरस्त तत्त्वों को सक्रिय कर देती है जो समाज में विघटन का, अलगाव का, हिंसा का, भय का, उन्माद का वातावरण बनाने की फिराक में लगे रहते हैं. इसमें सबसे बड़ी विडम्बना देखिये कि समाज का वो वर्ग जो अपने आपको बुद्धिजीवी कहता है, सोशल मीडिया का जमकर उपयोग करता है, खुद को किसी धार्मिक खाँचे से मुक्त बताता है, जो अपने आपको राजनैतिक रूप से भी निरपेक्षता का सबसे बड़ा संवाहक सिद्ध करता है वो भी कहीं न कहीं इन तत्त्वों की चपेट में आ जाता है. इसके बाद शुरू होता है अफवाहों का इधर से उधर प्रसारण, विभेदकारी विचारों का आदान-प्रदान और उसके बाद जन्म लेता उन्माद अलगाववादी ताकतों को सड़कों पर उतार भय, हिंसा के वातावरण का निर्माण करता है; समाज से स्नेह, प्रेम, सौहार्द्र, समन्वय की हत्या करता है.
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बहुत पीछे मुड़कर देखने की आवश्यकता नहीं है, हाल ही में कुछ प्रदेशों में सरकारों द्वारा धार्मिक आयोजन के अवसर पर मीट के प्रतिबन्ध जैसा कदम उठाया. इसके बाद क्या हुआ इसको कहने की, बताने की आवश्यकता नहीं है. जहाँ एक तरफ हम विश्व बंधुत्व की बात करते हैं; तकनीकी के चलते सम्पूर्ण विश्व को एक ग्राम के रूप में परिभाषित करते हैं; वसुधैव कुटुम्बकम पर गर्व करते हैं वहीं अपने पड़ोसी के धार्मिक आयोजन का मखौल उड़ाते हैं; अपने सहयोगी के धार्मिक विचारों की अवहेलना करते हैं; अपने परिचित के धार्मिक क्रियाकलापों में व्यवधान पैदा करते हैं. आखिर ये कैसी बंधुत्व की भावना है? आखिर ये कौन सा अपनापन है? आखिर ये किस तरह की धार्मिक सहिष्णुता है? आखिर ये किस तरह की धर्मनिरपेक्षता है?
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वास्तविकता ये है कि तकनीकी रूप से, वैज्ञानिक रूप से सक्षम होते जाने के कारण हम सबने अपने अन्दर एक तरह के अहं को जन्म दे दिया है. ‘सबसे उत्कृष्ट हम, हमारा धर्म, हमारे विचार, हमारे क्रियाकलाप’ आदि ने इंसान इंसान के बीच की दूरी को अदृश्य रूप से बढ़ा दिया है. सामने होते हुए भी हम सामने वाले व्यक्ति से बहुत-बहुत दूर होते जा रहे हैं; धार्मिक रूप से सहिष्णु बनने के बाद भी हम धार्मिक रूप से अत्यंत कट्टर होते जा रहे हैं. एक दूसरे का सम्मान करने के साथ-साथ उसका घनघोर अपमान करते जा रहे हैं. देखा जाये तो कहीं न कहीं हम तकनीकी समाज विकसित करते रहने के साथ-साथ मानवीयता भरा, इंसानियत भरा समाज मिटाते जा रहे हैं.
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आइये इस समाज के मिटने को रोकने का काम करें; समाज को विखंडित करने वालों को समाप्त करने का काम करें; दिलों के बीच बढ़ती दूरियों को मिटाकर स्नेह, प्रेम पैदा करने का काम करे. कामना करें कि आदिदेव श्री गणेश जी इसके लिए शक्ति प्रदान करें.  
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17 जुलाई 2015

इफ्तार के नाम पर तुष्टिकरण


माह-ए-रमज़ान अलविदा कहने को तैयार है और बहुत से चर्चा-प्रेमी नागरिक किसी का इफ्तार पार्टी की दावत देना, किसी का इफ्तार की दावत न देना, किसी का इफ्तार पार्टी में शामिल होना, किसी का शामिल न होना आदि-आदि की चर्चाएँ करने में लगे हैं. रमजान के आरम्भ होते ही तमाम राजनैतिक दलों की तरफ से, तमाम राजनेताओं द्वारा, अनेक सामाजिक प्रबुद्ध किस्म के लोगों की तरफ से इफ्तार का आयोजन किया जाने लगता है. इस तरह के आयोजनों के मूल में कहीं से भी धार्मिक भावना के दर्शन नहीं होते. देखा जाये तो नितांत धार्मिक कृत्य कतिपय तुष्टिकरण की नीति के चलते राजनैतिक बना दिया गया है. इफ्तार के आयोजन करने वालों की मानसिकता में मजहबी सोच, धार्मिक पावनता के स्थान पर विशुद्ध राजनीति दिखाई पड़ती है. कौन किस नजरिये से शामिल हुआ, कौन किसके बगल में बैठा, किसने किसकी प्लेट से खाद्य सामग्री उठाई, किसने टोपी पहनी, किसने टोपी पहनने से मना किया, किसने किसको गले लगाया आदि ऐसी दावतों के केंद्र में छिपा होता है. एक सबसे बड़ी बात जो यहाँ सामने निकल कर आती है वो ये कि इन दावतों का आयोजन करने वालों में मुस्लिम समुदाय से कहीं अधिक हिन्दू समुदाय के लोग शामिल रहते हैं.
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भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में, सर्वधर्म सदभाव की भावना वाले इस देश में ये अच्छी बात है कि आपसी सदभाव बढ़ाने हेतु ऐसे आयोजन होते रहें. इस अच्छाई के साथ एक बुराई ये भी दिखती है कि ऐसे सदभाव पसंद राजनैतिक दल, राजनेता, सामाजिक व्यक्तित्व एक धर्म विशेष पर ही अपनी सद्भावना प्रकट करने आ जाते हैं. ऐसे में सवाल उठाना लाजिमी है कि धार्मिक सद्भावना दिखाने के लिए किसी भी राजनैतिक दल को, किसी भी राजनेता को मात्र मुस्लिम समुदाय ही क्यों दिखाई देता है? किसी भी तरह के धार्मिक आयोजन के लिए मुस्लिम त्योहारों पर ही सबकी निगाह क्यों होती है? आखिर क्यों सभी दलों के लोग, समाज के प्रबुद्ध माने जाने वाले लोग मस्जिद के पास बधाइयाँ देने को अलस्सुबह से एकत्र होने लगते हैं? क्यों इन सबमें मुस्लिम समुदाय के लोगों से पहले-पहल गले मिलने की बेताबी दिखाई देने लगती है? क्यों ऐसे लोगों के लिए एक रोजेदार पावनता का सूचक होता है? कहीं न कहीं भेदभावपूर्ण ये कदम इन्हीं के द्वारा घोषित गंगा-जमुनी विरासत को खोखला करने का काम करता है. आखिर हिन्दुओं के तथा अन्य धर्मों के त्योहारों पर ऐसी तत्परता किसी भी दल में, किसी भी व्यक्ति में नहीं दिखाई देती है. विजयादशमी, नवदुर्गा, होली आदि हिन्दू पर्वों पर भी लोगों द्वारा व्रत-उपवास रहा जाता है; मेलों, पर्वों का आयोजन किया जाता है किन्तु किसी भी दल द्वारा, किसी भी राजनैतिक व्यक्ति द्वारा उनसे गले लगने की, व्रत के पारण करवाए जाने की तत्परता नहीं दिखाई जाती है. लंगर के आयोजनों में, क्रिसमस के दिन अथवा अन्य गैर-मुस्लिम पर्व-त्योहारों पर इन सदभाव-प्रेमियों की सक्रियता, सद्भावना कहाँ गायब हो जाती है?  
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इस लोकतान्त्रिक देश की विडंबना देखिये कि यहाँ मुस्लिम-समर्थन में किये जाने वाले काम धर्मनिरपेक्षता से परिभाषित किये जाते हैं. राजनैतिक दलों द्वारा, राजनेताओं द्वारा मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति अपनाये जाने की अपनी ही मजबूरी समझी जा सकती है किन्तु संवैधानिक पद पर बैठे किसी व्यक्ति द्वारा इस तरह के आयोजन किये जाने के पीछे की मंशा स्पष्ट नहीं होती है. यदि उसके द्वारा मुस्लिमों के लिए इफ्तार दावत का आयोजन सामाजिक-धार्मिक सदभाव को बढ़ावा देने में कारगर सिद्ध होता है तो शेष गैर-मुस्लिम धर्मों के लिए भी उसके द्वारा ऐसे आयोजन किये जाने चाहिए. अब जबकि देश के राष्ट्रपति द्वारा भी इस तरह के कदम उठाये जा रहे हों तब एक आतंकवादी की फांसी को भी धार्मिक आधार पर, दलगत आधार पर विवादित किया जाना कोई आश्चर्य का विषय नहीं. कहा तो जाता है कि आतंकवाद का कोई धर्म, कोई मजहब नहीं होता, यदि ये ही अंतिम और पूर्ण सत्य है तो फिर एक आतंकवादी का कोई धर्म या मजहब कैसे हो जाता है? इस सवाल के साथ एक कामना उस परमशक्ति से यह कि माह रमजान मुस्लिम समुदाय के उन सभी लोगों को सद्बुद्धि दे जो राजनैतिक दलों के, व्यक्तित्व के हाथों में खेल रहे हैं. उन्हें इन राजनैतिक दलों के हाथों की कठपुतली बनने से रोके. काश! वे इस बात को समझ सकें तो....

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19 फ़रवरी 2015

भय का वातावरण बनाते राजनैतिक दल



देश की वर्तमान राजनीति को घेर-घेर कर भाजपा, मोदी के इर्द-गिर्द खड़ा कर देने में जितनी महारथ भाजपाइयों को है उससे कहीं ज्यादा गैर-भाजपाइयों को है. केंद्र में जबसे मोदी ने सत्ता संभाली है तबसे गैर-भाजपाई किसी न किसी रूप में मोदी को घेरने की कोशिश में लगे रहते हैं और इस काम में उनका साथ मीडिया भी बखूबी निभाता रहता है. देखा जाये तो ये काम नया नहीं है, ऐसा उनके मुख्यमंत्री रहते लगातार होता रहा है और प्रधानमंत्री बनने के बाद भी रुका नहीं है. गैर-भाजपाइयों द्वारा भाजपा अथवा मोदी के काम को लेकर जितनी आलोचना की जाती है उससे कहीं ज्यादा हिंदुत्व को लेकर घेरने का काम किया जाता है. अपने इस नए कार्यकाल में मोदी ने किसी भी रूप में हिंदुत्व की चर्चा नहीं की और न ही अपने पूरे चुनाव अभियान में इस मुद्दे को उठाया था. लोकसभा निर्वाचन में सम्पूर्ण देश में उनके चुनाव अभियान को सरसरी निगाह से या फिर गहराई से देखा जाए तो उसमें स्पष्ट रूप से विकासपरक चिंतन सामने आता है. गैर-भाजपाइ दलों, मीडिया और अनेक राजनैतिक चिंतकों को इस बात का अंदेशा भी नहीं रहा था कि भाजपा पूर्ण बहुमत से केंद्र की सत्ता संभालेगी और नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनेंगे. पूरे चुनाव अभियान भर उनका मजाक  पीएम इन वेटिंग के रूप में उड़ाया जाता रहा था.
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इधर परिस्थितयां कुछ ऐसी बनी कि बहुत कुछ भाजपा के, मोदी के पक्ष में हुआ. चार-चार राज्यों के विधानसभा नतीजे उनके पक्ष में आये. दिल्ली का चुनाव बहुत बुरी तरह से हार जाने के बाद भी असम और मध्य प्रदेश के निकाय चुनावों में मतदाताओं ने अपनी निष्ठा भाजपा के प्रति ज़ाहिर की. इस तरह की स्थितियों के चलते गैर-भाजपाई दलों का विचलित होना स्वाभाविक है. वे कहीं न कहीं अपने बयानों से मोदी सरकार को साम्प्रदायिकता के आगोश में घसीटना चाहती हैं. किसी न किसी रूप में ऐसा साबित करने का प्रयास किया जाता है कि कब मोदी सरकार हिन्दू शब्द का प्रयोग कर दे, कैसे भी गैर-हिन्दुओं के लिए कुछ कठोर बोल दे. उत्तर प्रदेश की कुछ सांप्रदायिक घटनाओं के चलते, छतीसगढ़ सहित अन्य जगहों पर हुई फुटकर-फुटकर सांप्रदायिक झड़पों में बजाय राज्य सरकारों को दोषी ठहराने के सीधे मोदी सरकार को कटघरे में  करने की कोशिश की गई. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मोदी सरकार वाकई हिंदुत्व एजेंडे पर काम कर रही है? क्या वाकई उसके द्वारा कोई कदम ऐसा उठाया जा रहा है जो सांप्रदायिक है? क्या भाजपा के केन्द्रीय शासन में गैर-हिन्दू धर्मावलम्बी वाकई घबराये हुए हैं?
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गैर-भाजपाई दलों की आशंका घनघोर रूप से निर्मूल है. वे कहीं न कहीं हिंदुत्व के राग को समाज में जीवंत रखते हुए अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने के प्रयास में लगे हैं. हाल के वर्षों में व्यवस्था परिवर्तक के रूप में उपजे दल ने भी मुस्लिम तुष्टिकरण दिखाते हुए अपने पक्ष में मतदान की अपील तक करवा डाली तो किसी की तरफ से भी इसका विरोध नहीं किया गया. मीडिया तो जैसे इस घटना पर मुंह में दही जमाये बैठी रही. देश के अनेक प्रदेशों में इस तरह की घटनाएँ आये दिन हो रही हैं जहाँ से हिन्दुओं को प्रताड़ित करने की ख़बरें आ रही हैं और इनकी वजहें भी ऐसी हैं जिनको कोई वजह नहीं माना जा सकता है. कभी सोशल साइट्स पर किसी कमेंट को लेकर होता उपद्रव, कभी मंदिर में लाउडस्पीकर निकालने को लेकर होती घटना, कभी आतंकी के मारे जाने का विरोध, कभी बांग्लादेश, पाकिस्तान के नाम पर मारपीट जैसी वजहें आक्रामकता पैदा कर रही हैं. शायद ही किसी गैर-भाजपाई दल द्वारा, किसी भी मीडिया संगठन द्वारा इन घटनाओं के विरोध में एक शब्द भी निकाला गया हो.
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ये समझने की आवश्यकता है कि केंद्र के लिए भाजपा को, मोदी को मिला बहुमत उनके विकासपरक चिंतन का परिणाम है. यदि के पल को ये मान भी लिया जाये कि ऐसा विकास के कारण नहीं हिन्दू मतदाताओं के ध्रुवीकरण के कारण हुआ तो इसमें गलत क्या रहा? क्या सत्ता में आने के बाद गैर-हिन्दू समुदाय को मारा-पीता गया? क्या गैर-हिन्दू समुदाय को परेशान, प्रताड़ित किया गया? ऐसा नहीं है तो फिर यदि मुस्लिम तुष्टिकरण जायज़ है, मुस्लिम मतदाताओं के एकजुट होकर अपनी पसंद के प्रत्याशी, दल के प्रति मतदान करना सही है, इमाम का मुस्लिम मतदाताओं के लिए खड़े होना जायज़ है तो हिन्दुओं का ध्रुवीकरण गलत कैसे हो गया? यदि मुस्लिम मतदाताओं का एकजुट होना, सभी राजनैतिक दलों का मुस्लिम मतदाताओं के हितार्थ बात करना गैर-मुस्लिम समुदाय में भय पैदा नहीं करता, हिन्दुओं में भय पैदा नहीं करता तो मोदी का हिंदुत्व की बात न करना भी मुस्लिमों में, गैर-हिन्दू समुदाय में कैसे भय पैदा कर रहा है? मीडिया और गैर-भाजपाई दलों द्वारा जिस तरह अपनी ऊर्जा निर्थक कार्यों में खर्च की जा रही है, जबरन समाज में भय का, साम्प्रदायिकता का माहौल बनाया जा रहा है वो निंदनीय है. इससे समाज का, राजनीति का भला होने वाला नहीं है.