19 February 2015

भय का वातावरण बनाते राजनैतिक दल



देश की वर्तमान राजनीति को घेर-घेर कर भाजपा, मोदी के इर्द-गिर्द खड़ा कर देने में जितनी महारथ भाजपाइयों को है उससे कहीं ज्यादा गैर-भाजपाइयों को है. केंद्र में जबसे मोदी ने सत्ता संभाली है तबसे गैर-भाजपाई किसी न किसी रूप में मोदी को घेरने की कोशिश में लगे रहते हैं और इस काम में उनका साथ मीडिया भी बखूबी निभाता रहता है. देखा जाये तो ये काम नया नहीं है, ऐसा उनके मुख्यमंत्री रहते लगातार होता रहा है और प्रधानमंत्री बनने के बाद भी रुका नहीं है. गैर-भाजपाइयों द्वारा भाजपा अथवा मोदी के काम को लेकर जितनी आलोचना की जाती है उससे कहीं ज्यादा हिंदुत्व को लेकर घेरने का काम किया जाता है. अपने इस नए कार्यकाल में मोदी ने किसी भी रूप में हिंदुत्व की चर्चा नहीं की और न ही अपने पूरे चुनाव अभियान में इस मुद्दे को उठाया था. लोकसभा निर्वाचन में सम्पूर्ण देश में उनके चुनाव अभियान को सरसरी निगाह से या फिर गहराई से देखा जाए तो उसमें स्पष्ट रूप से विकासपरक चिंतन सामने आता है. गैर-भाजपाइ दलों, मीडिया और अनेक राजनैतिक चिंतकों को इस बात का अंदेशा भी नहीं रहा था कि भाजपा पूर्ण बहुमत से केंद्र की सत्ता संभालेगी और नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनेंगे. पूरे चुनाव अभियान भर उनका मजाक  पीएम इन वेटिंग के रूप में उड़ाया जाता रहा था.
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इधर परिस्थितयां कुछ ऐसी बनी कि बहुत कुछ भाजपा के, मोदी के पक्ष में हुआ. चार-चार राज्यों के विधानसभा नतीजे उनके पक्ष में आये. दिल्ली का चुनाव बहुत बुरी तरह से हार जाने के बाद भी असम और मध्य प्रदेश के निकाय चुनावों में मतदाताओं ने अपनी निष्ठा भाजपा के प्रति ज़ाहिर की. इस तरह की स्थितियों के चलते गैर-भाजपाई दलों का विचलित होना स्वाभाविक है. वे कहीं न कहीं अपने बयानों से मोदी सरकार को साम्प्रदायिकता के आगोश में घसीटना चाहती हैं. किसी न किसी रूप में ऐसा साबित करने का प्रयास किया जाता है कि कब मोदी सरकार हिन्दू शब्द का प्रयोग कर दे, कैसे भी गैर-हिन्दुओं के लिए कुछ कठोर बोल दे. उत्तर प्रदेश की कुछ सांप्रदायिक घटनाओं के चलते, छतीसगढ़ सहित अन्य जगहों पर हुई फुटकर-फुटकर सांप्रदायिक झड़पों में बजाय राज्य सरकारों को दोषी ठहराने के सीधे मोदी सरकार को कटघरे में  करने की कोशिश की गई. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मोदी सरकार वाकई हिंदुत्व एजेंडे पर काम कर रही है? क्या वाकई उसके द्वारा कोई कदम ऐसा उठाया जा रहा है जो सांप्रदायिक है? क्या भाजपा के केन्द्रीय शासन में गैर-हिन्दू धर्मावलम्बी वाकई घबराये हुए हैं?
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गैर-भाजपाई दलों की आशंका घनघोर रूप से निर्मूल है. वे कहीं न कहीं हिंदुत्व के राग को समाज में जीवंत रखते हुए अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने के प्रयास में लगे हैं. हाल के वर्षों में व्यवस्था परिवर्तक के रूप में उपजे दल ने भी मुस्लिम तुष्टिकरण दिखाते हुए अपने पक्ष में मतदान की अपील तक करवा डाली तो किसी की तरफ से भी इसका विरोध नहीं किया गया. मीडिया तो जैसे इस घटना पर मुंह में दही जमाये बैठी रही. देश के अनेक प्रदेशों में इस तरह की घटनाएँ आये दिन हो रही हैं जहाँ से हिन्दुओं को प्रताड़ित करने की ख़बरें आ रही हैं और इनकी वजहें भी ऐसी हैं जिनको कोई वजह नहीं माना जा सकता है. कभी सोशल साइट्स पर किसी कमेंट को लेकर होता उपद्रव, कभी मंदिर में लाउडस्पीकर निकालने को लेकर होती घटना, कभी आतंकी के मारे जाने का विरोध, कभी बांग्लादेश, पाकिस्तान के नाम पर मारपीट जैसी वजहें आक्रामकता पैदा कर रही हैं. शायद ही किसी गैर-भाजपाई दल द्वारा, किसी भी मीडिया संगठन द्वारा इन घटनाओं के विरोध में एक शब्द भी निकाला गया हो.
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ये समझने की आवश्यकता है कि केंद्र के लिए भाजपा को, मोदी को मिला बहुमत उनके विकासपरक चिंतन का परिणाम है. यदि के पल को ये मान भी लिया जाये कि ऐसा विकास के कारण नहीं हिन्दू मतदाताओं के ध्रुवीकरण के कारण हुआ तो इसमें गलत क्या रहा? क्या सत्ता में आने के बाद गैर-हिन्दू समुदाय को मारा-पीता गया? क्या गैर-हिन्दू समुदाय को परेशान, प्रताड़ित किया गया? ऐसा नहीं है तो फिर यदि मुस्लिम तुष्टिकरण जायज़ है, मुस्लिम मतदाताओं के एकजुट होकर अपनी पसंद के प्रत्याशी, दल के प्रति मतदान करना सही है, इमाम का मुस्लिम मतदाताओं के लिए खड़े होना जायज़ है तो हिन्दुओं का ध्रुवीकरण गलत कैसे हो गया? यदि मुस्लिम मतदाताओं का एकजुट होना, सभी राजनैतिक दलों का मुस्लिम मतदाताओं के हितार्थ बात करना गैर-मुस्लिम समुदाय में भय पैदा नहीं करता, हिन्दुओं में भय पैदा नहीं करता तो मोदी का हिंदुत्व की बात न करना भी मुस्लिमों में, गैर-हिन्दू समुदाय में कैसे भय पैदा कर रहा है? मीडिया और गैर-भाजपाई दलों द्वारा जिस तरह अपनी ऊर्जा निर्थक कार्यों में खर्च की जा रही है, जबरन समाज में भय का, साम्प्रदायिकता का माहौल बनाया जा रहा है वो निंदनीय है. इससे समाज का, राजनीति का भला होने वाला नहीं है.

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